सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 301–310
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 301–310
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५४६ ] रेकमेव वेदोंका सनातन वीज है " इत्यादि वाक्योंसे श्रोंकार सव उपनिषद्रूप नयुक्तोषि वेद निश्चित है ।... शूद्र नाममन्त्रका अधिकारी होता है! विशेषरूपसे केवल ' स्वाहा ' करना तथा नमस्कारमन्त्र विहित है । उनसे शूद्र 4. ' नाम. ' शूम्रकेलिए ब्रह्मवान् होकर यज्ञ करें । स्वयं ताभ्यां इत्यादिद्वारा शूद्रका बेन्दमें तो अधिकार सर्वथा सिद्ध नहीं होना; पुराणादिके भी ॐ तथा ब्रह्मज्ञानमें भी उसका साक्षात् अधिकार नहीं वर्णोंको होता 1 ) वधान II यह श्रीवल्लभाचार्य - गोस्वामीका श्राशय समाप्त हुआ । ना है । शु ( ५३ ) श्रीनिम्बार्काचार्यका अपशूद्राधिकरण - भाष्य । करते हैं प्रागे दयानन्दी वादी श्रीनिम्बार्काचार्य और शूद्र ' शीर्षकसे उनका तुर आदि टाके वेदाधिकारविषय में ब्रह्मसूत्रके उन सूत्रोंका भाष्य उद्धृत करता । और है । प्रतिपक्षीने श्रीनिम्बार्काचार्यका भी पूरा उद्धरण नहीं दिया । हम उनके कृत नहीं पूर्व - सूत्रोंका भाष्य भी ' वेदान्तपरिजात - सौरभ ' से उद्धृत करते हैं— संन्यास, रण होते ' विद्याप्रदेशे तं ह उपनिन्ये ' इत्यादिना उपनयन संस्कार- परामर्शात्-दाड. ' शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः न च संस्कारमर्हति ' इति तदभावाभिलापाच्च उन विद्यार्थी शूद्रो नाधिक्रियते ' ( ११३१३६ ) । कि काम ( विद्याप्रदेशमें यह आता है कि- ' उसका उपनयन किया ' इत्यादिसे उपनयन - संस्कारका अनुशासन किया गया है । शूद्र चौथा वर्ग एकज है, ग पढ़ना वह उपनयन संस्कारका अधिकारी नहीं है, इस प्रकार शूद्रके उपनयना-' धिकारका निषेध श्रासे वह वेदविद्यामें अधिकारी नहीं होता । ) भी छोड़ इसी प्रकार वहीं लिखा है- ' शूद्रः चतुर्थो वर्ण एक जातिः ' इत्यादिना ( ॐकार ) शूद्रस्य उपनयनादि - संस्काराभाव - कथनाद् - इत्यर्थः । इतरेषां तु ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, एकादशे क्षत्रियं, द्वादशे वैश्यम् - इत्युपनयनमभिधीयते ' ( १।३।३६ ) ( शूद्र चौथा वर्ण है, एकज है, द्विज नहीं । इससे शूद्रको श्रीनिम्बार्काचार्यका श्रपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५४७ उपन्यनामत्कारका प्रभाव कहा गया है । शेष वर्णोंका ' घाठ वर्षं वाले ग्राणवा उपनयन करे, ११ वें में क्षत्रियका, १२ वें में वैदयका - इस प्रकार उपनयन कहा गया है ) । ' शूद्रो नाधिक्रियते, शूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् - इत्यादिना तस्य वेद-श्रवणादि - निषेधात् न चास्योपदिशेद धर्मान् ' इत्यादि स्मृतेच ' ( वे.पा. मो. १३३८ ) यद्य ह वा एतत् श्मशान यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्रसमीपे नाव्येतव्यम् ' यस्य समीपे प्रध्ययनमपि न कर्तव्यम्, तस्य वेद - श्रवणं, तदध्ययनं तदर्थज्ञान तदुक्तधर्मानुष्ठान च सुतरां निषिद्धमित्यर्थ ' । ( शूद्रका अधिकार नहीं है, ' शूद्रके पास नहीं पढना चाहिये इससे शूद्रका वेद सुनने आदिका निषेध है । ' शूद्रको धर्मका उपदेश न करें ' यह स्मृतिवचन भी हैं । ' शूद्र श्मशानसदृश है, अतः उसके पास वेद मत पड़ो ' । जिसके पास वेद पढने का भी निषेध है, उन शूद्रका श्रवण तथा वेदका अध्ययन तथा उसका प्रज्ञान एवं वेदोक्त धर्मका अनुष्ठान करना सर्वथा निषिद्ध है ) । ( ५४ ) श्रीयतिपण्डित - भगवत्पादाचार्य का प्रपशुद्रात्रिकरण - भाष्य श्रागे दयानन्दी वादी ' श्रीयति पण्डित भगवत्पादाचार्य और शूद्र ' शीर्षक से अपने ' उदारतम आचार्य स्वा.द. ' ट्रैक्ट में उनका वेदान्तसूत्रके श्रीकरभाष्यसे उद्धरण देता है । हमारे पास उसका संग्रह नहीं है, ग्रतः • हम वादीने न पाठ ही देते हैं, पर ' आलोक ' पाठकों को याद रख लेना चाहिये कि वादी जब सनातनधर्मी पुस्तकोंके उद्धरण देता है; तब उसके बहुत आवश्यक उद्धरणोंको ढीला करनेकेलिए उन्हें छिपा दिया करता है - इसमें भी बहुत सम्भव है - उसने ऐसा किया हो । ' इतश्च न शूद्रस्य अधिकारः, कस्मात्? स्मृतेश्च ', ' मृतितो वेद-' ववणस्य तदध्ययनस्य तत्प्रयोजनयोरर्यज्ञानानुष्ठानरूपयोः प्रर्थयोः
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५४८ ] श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) प्रतिपेधात् निषेधाद् इत्यर्थः । अथ वास्य वेदमुपशृण्वतः वपुजतुम्यां श्रोत्र-परिपूरणम्, उदाहरणे जिह्वाच्छेदो, घारणे शरीरभेदः, इति श्रुतौ शूद्रस्य वेदाध्ययनादौ शिक्षा ( दण्डः ) श्रूयते । ' शूद्रस्य वेदवणे तच्छत्रे परमादरात् । त्रपु प्रपूरयेद् राजा तदु-च्चारणमात्रतः । तज्जिह्वां छेदयेत् तूर्णं, तद्धारणवशात् तदा । शरीरभेदन • कुर्याद् विधिरेषोऽयमुच्यते ' इति स्मृतिरपि श्रूयते ' । ( शूद्रका वेदादिका अधिकार नहीं है; क्योंकि - स्मृति भी यह वहती है । स्मृतिशूद्रका वेदश्रवण तथा उसका अध्ययन, तथा उसके प्रयोजन-बाले अर्थज्ञान तथा अनुष्ठानरूप प्रथका निषेध है । ' अथ वा अस्य वेदमुपशवत: ' इस श्रुति में शूद्रको वेदाध्ययनादि करनेपर कड़ा दण्ड सुनाई गड़ता है । स्मृति में भी कहा है कि- राजा शूद्रको वेदादि सुननेपर कड़ा दण्ड दें । ) इस भाष्यसे यह भी प्रतीत होता है कि - ' अथ वास्य शूद्रस्य वेद-मुपशृण्वतः ' यह ' गौतमधर्मसूत्र ' में किसी ब्राह्मणभागसे श्रुति उद्धृत की गई है । ऐसा प्रकार श्रुतियोंको उद्धृत करना - ' वसिष्ठधर्मसूत्र ' तथा ' बोधायनघमंसूत्र ' एवं ' प्रापस्तम्बधर्मसूत्र ' में भी देखा गया है । इस प्रकार ' ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी वैसा करना स्वाभाविक है । तब उसके लिए ' धृष्टता वा धूर्तता ' शब्द लिखना प्रतिपक्षीका अपने पक्षको निर्बलता बताना है । मनुस्मृति भी जब ऐसे शूद्रके दण्डको बताती है, उन अक्षरों-को स्मरण करती है, जैसाकि पहले बताया जा चुका है और वह मनु-स्मृति ' वैदिकस्मृति ' भी मानी जाती है; तब हमारा यह पक्ष सिद्ध हो गया । ( ५५ ) ' वैयासिक - न्यायमाला ' का अपशूद्राधिकरण । आगे प्रतिपक्षीने इस विषय में श्रीसायणा का उद्धरण दिया है । हम इस विषय में ' वैयासिक -न्यायमाला ' ( १/३ ) दशमाधिकरणका उद्धरण वैयासिक - न्यायमालाका अपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५४८ ५५० भी देते हैं । प्रतिपक्षी कदाचित् इसका उद्धरण देना भूल गया यह है - है । वह प्रतः ' शूद्रोऽधिक्रियते वेदविद्यायामथवा नहि । श्रत्रैवर्णिकदेवाद्या प्रवि शूद्रोऽधिकारवान् ' यह पूर्वपक्ष है, और महत्त्वपूर्ण है, इसे एक इव महाशय ने भी अपने ' वैदिकभाष्य ' में अपनाया है कि - ' देवता रामानन्दी | नहीं अत्रैवर्णिक हैं; और उनको वेदाधिकार है; तब शूद्रको भी वेदाधिकार भी जब क्यों न माना जावे '? इसका उत्तरपक्ष वहाँ इस प्रकार लिखा है— होने ‘ देवाः स्वयम्भातवेदाः, शूद्रोऽध्ययन- वर्जनात् । नाधिकारी: अधि मधिकारो न वायते ' ( १६-२० ) अर्थात् देवताओं को वेद वतो. कोई भी नहीं पढ़ाता; वे भी गुरुसे वेदका अध्ययन नहीं करते हैं । उनको ' वेदा स्वेद स्फुरित हो जाते हैं । क्योंकि- ' विद्वा ंसो हि देवाः ' ( शतपथ स्वयं ३ ॥ हो । सिद्ध झ १० ) देवता जन्मसे ही स्वतः विद्वान होते हैं । शूद्रको कोई भी श्र चामृति वेदाध्ययनका अधिकार नहीं देती । श्रतः शूद्र वेदका अधिकारी नहीं होता । हां, उसे स्मार्त- कर्मसे नहीं हटाया जा सकता । ) ' स्ति देवशूद्रयोर्वेषम्यम् । उपनयनाध्ययनाभावेपि स्वयंभात वेदा देवा:, तादृशस्य सुकृतस्य पूर्वमुपार्जितत्वात् । शूद्रस्तु तादृशसुकृतराहि. स्यान्न स्वयम्भात्त - वेदः; नापि तस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनाऽभावात् । तक शुद्रक अतो विद्वत्ताख्यस्य अधिकारहेतोरभावान्न श्रौतविद्यायां शूद्रोऽधिकारी... शावर यत्तु शूद्रस्य वेदाविद्यायामनधिकारे सति मुमुक्षायां सत्यामपि मुक्तिनं तथा सिध्येत् - इति चेन्न - स्मृतिपुराणादिमुखेन ब्रह्मविद्योदये सति युक्ति-सिद्धेः । तस्मान्न शूद्रो वेदविद्यायामधिक्रियते । ' ( उत्तरपक्ष ) देवताओं और शूद्रोंमें बड़ी विषमता है । उपनयन एवं वेदाध्ययन न होनेपर भी देवताओंको तो वेद स्वयं प्रतिभात हो जाते हैं । वावे क्योंकि वे वैसा पुण्य पूर्व जन्म में उपार्जित कर चुके हैं; परन्तु पूर्वमी गत - जन्म में वैसे पुण्य न होने से उसे वेद स्वयं प्रतिभात नहीं होगा । सूत्र ' उसका वेदाध्ययन भी नहीं होता; क्योंकि उसका जनेऊ नहीं होता । तब
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[ श्री सनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) १४१ ५५० ] है । नामक अधिकारके हेतु न हो सकनेसे शूद्र वैदिक - विद्या में वह अतः विद्वत्ता- । अधिकृत नहीं होता द्या इ जोकि यह प्रश्न किया जाता है ' यदि शूद्रका वेदविद्या में अधिकार रामानन्दी तो उसे यदि मुक्तिकी इच्छा हो, तो उसको मुक्ति सिद्ध न होगी भी जब नहीं है, भी ठीक नहीं । स्मृति, पुराण - प्रादिद्वारा ब्रह्मविद्याका उदय, दाधिकार यह कहना उसकी मुक्ति भी सिद्ध हो जावेगी । इस कारण शूद्र वेदविद्या में होनेपर अधिकारी नहीं । रो भूतो यह पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । इस प्रकार कोई भी ' वेदान्तदर्शन ' के ' स्वयं हो सिद्ध हो गया । पथ ३ || भी श्रुति अधिकारी ( ५६ ) भात - वेश ' भीमांसादर्शन ' ' या शूद्रस्य भावात् । शुद्रका अधिकार अपशूद्राधिकरण ' के अनुसार शुद्रका वेदमें अनधिकार यज्ञमें शूद्रका अनधिकाराधिकरण । ( मीमांसादर्शन ६ | १ | २५-३८ ) के छठे अध्यायके प्रथमपादके २५ वें सूत्रसे ३८ वें सूत्र अनधिकाराधिकरण ' है; इसका अर्थ है कि यज्ञमें नहीं होता - यह इस अधिकरणका विषय है । हम गरी!.... शावरभाष्यको श्राधारीकृत करके मीमांसादर्शन के सूत्रोंके पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष मु तथा सिद्धान्तपक्ष स्पष्ट करेंगे । उसमें दोनों पक्षोंकी जो युक्ति - प्रयुक्तियाँ मुक्ति होंगी तथा प्रमाण होंगे; हम उन्हें भी उद्धृत करेंगे । ' मीमांसादर्शन ' श्रीव्यासजीके शिष्य श्रीजैमिनिमुनिसे प्रणीत है । नवन एवं कोई भी वेदादिशास्त्रका प्रमाण ऐसा नहीं मिलता; जिससे शूद्रका यज्ञ जाते हैं । वा वेदोंमें अधिकार सिद्ध होता हो । ' मीमांसादर्शन ' को ' कर्ममीमांसा ' एवं परन्तु शुद्ध पूर्वमीमांसा तथा वेदान्तदर्शनको उत्तरमीमांसा एवं ' ज्ञानमीमांसा ' वा ' ब्रह्म-हीं होगा । सूत्र ' कहते हैं । जब वेदान्तदर्शन शूद्रको वेदज्ञानमें अधिकारी नहीं मानता; नहीं होता || तब मीमांसादर्शन भला. शूद्रको कर्ममें अधिकारी कैसे स्वीकृत कर सकता यज्ञमें शुद्र प्रधिकाराधिकरण [ ३५१ है? अब हम पूर्वमीमांनाके सूत्रोंका हिन्दीमें व्याख्यान देते हैं । ( १ ) " चातुवंष्यंमविशेषात् " ( ६११/२५ ) यह पूर्वपक्षका सूत्र है । इसमें श्रग्निहोत्रादि - कर्मोंके प्रधिकारी विषय पूर्वपक्षवादीकहता है कि- कर्मोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - यह चारों वर्ण अधिकारी हैं? वा शूद्रको छोड़कर तीन प्रादिम - वर्ण अधिकारी है? इसपर बादी कहता है कि हमें तो यह प्रतीत होता है कि - ' यजेत, जुहुयात् प्रादिशब्दवेद आते हैं; यह सामान्य शब्द हैं, यहाँ किसी विशेष वर्णका नाम गृहीत नहीं । श्रतः शूद्र भी ग्रनधिकारी नहीं है । ( २ ) “ निर्देशाद् वा त्रयाणां स्याद् श्रग्न्याधेये हि असम्बन्धः ऋतुषु ग्राह्मण - श्रुतिः - इति श्रात्रेयः ” ( ६।१।२६ ) यह प्रावेयके नामसे सिद्धान्तसूत्र है । इसमें ' वा ' शब्द पूर्वपक्षको काट रहा है । श्रात्रेय कहते हैं - आदिम तीन वर्णोंका ही यज्ञमें अधिकार होता है, चारों वर्णोका नहीं; क्योंकि प्रग्न्याधानमें तीन ही वर्णोंका निर्देश मिलता है । जैसेकि - ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निमादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः ' ( वसन्त ऋतुमें ब्राह्मण अग्न्याधान करे, ग्रीष्म ऋतु क्षत्रिय और शरद् ऋतुमें वैश्य ' । शूद्रके श्रग्न्याधानमें श्रुति सर्वया नहीं मिलती; इसलिए शूद्र अनग्नि ( अग्निरहित ) होनेसे अग्निहोत्र करनेमें अधिकारी नहीं । ' तस्माद् अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः ' ( स्वर्गकी कामनावाला अग्निहोत्र करे ) इत्यादि स्थलोंमें गृद्रको प्राप्त करानेवाली कोई श्रुति नहीं मिलती, नहीं तो उसका उपनयन भी होता । ब्राह्मणादि-चैवणिककेलिए तो पूर्वोक्त श्रुति मिलती है । वे समर्थ भी होते हैं; क्योंकि वे अग्निमान् हैं, और शूद्र अर्नाग्नि ( अग्निहोत्रकी अग्नि रखनेवाले नहीं ) हैं । ग्राहवनीयादि अग्नियोंके रखनेका शूद्रकेलिए कही विधान नहीं । क्योंकि - प्राहवनीय आदि अग्नियां संस्कार वालों ( उपनीतों ) की ही होती हैं; अतः अनुपनीत शूद्र अग्निहोत्रादिमैं अधिकारी नहीं । रह प्रात्रेय मुनि कहते हैं ।-.
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५४८ ] श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) प्रतिषेधात् निषेधाद् इत्यर्थः । अथ वास्य वेदमुपशृण्वत: त्रपुजतुभ्यां श्रोत्र-परिपूरणम्, उदाहरणे जिह्वाच्छेदो; धारणे शरीरभेद:, इति श्रुतौ शूद्रस्य वेदाध्ययनादी शिक्षा ( दण्डः ) श्रूयते - 1 ' शूद्रस्य वेदश्रवणे तच्छ्रोत्रे परमादरात् । त्रपु प्रपूरयेद्राजा तदु-च्चारणमात्रतः । तज्जिह्वां छेदयेत् तूर्णं, तद्धारणवशात् तदा । शरीरभेदन • कुर्याद् विधिरेषोऽयमुच्यते ' इति स्मृतिरपि श्रूयते ' । ( शूद्रका वेदादिका अधिकार नहीं है; क्योंकि - स्मृति भी यह वहती है । स्मृतिशूद्रका वेदश्रवण तथा उसका अध्ययन, तथा उसके प्रयोजन-वाले अर्थज्ञान तथा अनुष्ठानरूप प्रर्थीका निषेध है । ' अथ वा अस्य वेदमुपशवत: ' इस श्रुति में शूद्रको वेदाध्ययनादि करनेपर कड़ा दण्ड सुनाई पडता है । स्मृति में भी कहा है कि राजा शूद्रको वेदादि सुननेपर कड़ा दण्ड दे ' । ) इस भाष्यसे यह भी प्रतीत होता है कि ' प्रथ वास्य शूद्रस्य वेद-मुपशृण्वतः ' यह ' गौतमधर्मसूत्र ' में किसी ब्राह्मणभाग से श्रुति उद्धृत की गई है । ऐसा प्रकार श्रुतियोंको उद्धृत करना - ' वसिष्ठधर्मसूत्र ' तथा ' वोधायनधर्मसूत्र ' एवं ' आपस्तम्बधर्मसूत्र ' में भी देखा गया है । इस प्रकार ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी वैसा करना स्वाभाविक है । तब उसकेलिए ' घृष्टता वा धूर्तता ' शब्द लिखना प्रतिपक्षीका अपने पक्षकी निर्बलता बताना है । मनुस्मृति भी जब ऐसे शूद्रके दण्डको बताती है, उन अक्षरों-को स्मरण करती है, जैसाकि पहले वताया जा चुका है और वह मनु-स्मृति ' वैदिकस्मृति ' भी मानी जाती है; तब हमारा यह पक्ष सिद्ध हो गया । ( ५५ ) ' वैयासिक - न्यायमाला ' का अपशूद्राधिकरण । आगे प्रतिपक्षीने इस विषय में श्रीसायणाचयंका उद्धरण दिया है । हम इस विषय में ' वैयासिक - न्यायमाला ' ( १/३ ) दशमाधिकरणका उद्धरण वैयासिक - न्यायमालाका अपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५४६ ५५० भी देते हैं । प्रतिपक्षी कदाचित् इसका उद्धरण देना यह है - भूल गया है । प्रतः शूद्रोऽधिक्रियते वेदविद्यायामथवा नहि । अत्रैवर्णिकदेवाद्या अधि शूद्रोऽधिकारवान् ' यह पूर्वपक्ष है, और महत्त्वपूर्ण है इसे महाशयने भी अपने ' वैदिकभाव्य ' में अपनाया है, कि- ' एक रामानन्दी अत्रैवर्णिक हैं; और उनको वेदाधिकार है; तब शूद्रको देवता भी बद नहीं क्यों न माना जावे '? इसका उत्तरपक्ष वहाँ इस प्रकार लिखा भी वेदाभिचर पह है-‘ देवाः स्वयम्भातवेदाः, शूद्रोऽध्ययन- वर्जनात् । नाधिकारी स्मर्तेष्वधिकारो न वायंते ' ( १६-२० ) अर्थात् देवतानों को वेद भूतो कोई से नहीं पढ़ाता; वे भी गुरुसे बेदका ध्यन नहीं करते हैं । उनको स्वयं से वेदान वेद स्फुरित हो जाते हैं । क्योंकि - ' विद्वा ंसो हि देवाः ' ( शतपथ अ सिद्ध ३।१० ) देवता जन्मसे ही स्वतः विद्वान होते हैं । शूद्रको कोई भी श्रनि चा स्मृति वेदाध्ययनका अधिकार नहीं देती । अतः शुद्र वेदका श्रधिकारी नहीं होता । हां, उसे स्मार्त - कर्म से नहीं हटाया जा सकता । ) ' अस्ति देवशूद्रयोर्वेषम्यम् । उपनयनाव्ययनाभावेपि स्वयंभात - वेस देवाः, तादृशस्य सुकृतस्य पूर्वमुपार्जितत्वात् । शूद्रस्तु तादृशसुकृतराद्द्-ि त्यान्न स्वयम्भात्त - वेदः; नापि तस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनाऽभावात् । शूद्रका अतो विद्वत्ताख्यस्य श्रधिकारहेतोरभावान्न श्रीतविद्यायां शूद्रोऽधिकारी ।.... शावर यत्तु शूद्रस्य वेदाविद्यायामनधिकारे सति मुमुक्षायां सत्यामपि मुस्ि तथा सिध्येत् इति चेन्न - स्मृतिपुराणादिमुखेन ब्रह्मविद्योदये सति मुक्ति होंगी: सिद्धेः । तस्मान्न शूद्रो वेदविद्यायामधिक्रियते । ' ( उत्तरपक्ष ) देवताओं और शूद्रोंमें बड़ी विषमता है । उपनयन एवं वेदाध्ययन न होनेपर भी देवताओंको तो वेद स्वयं प्रतिभात हो जाते हैं । क्योंकि वे वैसा पुण्य पूर्व जन्म में उपार्जित कर चुके हैं; परन्तु मुद्र गत जन्ममें वैसे पुण्य न होनेसे उसे वेद स्वयं प्रतिभात नहीं हो । उसका वेदाध्ययन भी नहीं होता;: क्योंकि उसका जनेऊ नहीं होता । तब म
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श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ५५० ] है | ३ विद्वत्ता - नामक अधिकारके हेतु न हो सकनेसे शूद्र वैदिक - विद्या में | प्रतः होता । प्रधिकृत नहीं जोकि यह प्रश्न किया जाता है — ' यदि शूद्रका वेदविद्या में अधिकार रामानदी तो उसे यदि मुक्तिकी इच्छा हो, तो उसको मुक्ति सिद्ध न होगी भोज नहीं है, भी ठीक नहीं । स्मृति, पुराण- प्रादिद्वारा ब्रह्मविद्याका उदय, उदाधिकार यह कहना उसकी मुक्ति भी सिद्ध हो जावेगी । इस कारण शुद्र वेदविद्या में होनेपर श्रधिकारी नहीं । रो यह पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं । इस प्रकार कोई भी ' वेदान्तदर्शन ' के ‘ स्वयं ही सिद्ध हो गया । पथ ३ | ३ | भी श्र अधिकारी ( ५६ ) भात वेदा ‘ मीमांसादर्शन ' कृत राहि तक ' योगे शूद्रस्य ऽभावात् । शूद्रका अधिकार अपशूद्राधिकरण ' के अनुसार शूद्रका वेद में अनधिकार यज्ञमें शूद्रका अनधिकाराधिकरण । ( मीमांसादर्शन ६।१।२५-३८ ) के छठे अध्यायके प्रथमपादके २५ वें सूत्रसे ३८ वें सूत्र अनधिकाराधिकरण ' है; इसका अर्थ है कि यज्ञ में नहीं होता - यह इस प्रधिकरणका विषय है । हम री.... शावरभाष्यको श्राधारीकृत करके मीमांसादर्शन के सूत्रोंके पूर्वपक्ष - उत्तरपक्ष तथा सिद्धान्तपक्ष स्पष्ट करेंगे । उसमें दोनों पक्षोंकी जो युक्ति - प्रयुक्तियाँ ब मुक्ति होंगी तथा प्रमाण होंगे; हम उन्हें भी उद्धृत करेंगे । ' मीमांसादर्शन ' श्रीव्यासजीके शिष्य श्रीजैमिनिमुनिसे प्रणीत है । नयन एवं कोई भी वेदादिशास्त्रका प्रमाण ऐसा नहीं मिलता; जिससे शूद्रका यज्ञ ते हैं । वा वेदोंमें अधिकार सिद्ध होता हो । ' मीमांसादर्शन ' को ' कर्ममीमांसा ' एवं परन्तु पूर्वमीमांसा तथा वेदान्तदर्शनको उत्तरमीमांसा एवं ' ज्ञानमीमांसा ' वा ' ब्रह्म-होगा । मूत्र ' कहते हैं । जब वेदान्तदर्शन शूद्रको वेदज्ञानमें अधिकारी नहीं मानता; ही हो । तब मीमांसादर्शन भला. शुद्रको कर्ममें अधिकारी कैसे स्वीकृत कर सकता यज्ञमें शूद्रका अनधिकाराधिकरण [ ५५१ है? अब हम पूर्वमीमांसाके सूत्रोंका हिन्दीमें व्याख्यान देते हैं । ( १ ) " चातुर्वण्यंमविशेषात् " ( ६।११२५ ) यह पूर्वपक्षका सूत्र है । इसमें श्रग्निहोत्रादि - कर्मों के अधिकारी विपयमें पूर्वपक्ष में वादी कहता है कि- कर्मों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - यह चारों वर्ण अधिकारी हैं? वा शूद्रको छोड़कर तीन प्रादिम - वर्ण अधिकारी हैं? उसपर वादी कहता है कि हमें तो यह प्रतीत होता है कि - ' यजेत, जुहुयात् ' आदि शब्द वेदमें आते हैं; यह सामान्य शब्द हैं, यहाँ किसी विशेष वर्णका नाम गृहीत नहीं । श्रतः शूद्र भी प्रनधिकारी नहीं है । ( २ ) “ निर्देशाद् वा त्रयाणां स्याद्, अग्न्याधेये हि प्रसम्बन्धः क्रतुषु ब्राह्मण - श्रुतिः- इति आत्रेयः ” ( ६।११२६ ) यह श्रात्रेयके नामसे सिद्धान्तसूत्र है । इसमें ' वा ' शब्द पूर्वपक्षको काट रहा है । प्रात्रेय कहते हैं - आदिम तीन वर्णोंका ही यज्ञमें अधिकार होता है, चारों वर्णोका नहीं; क्योंकि श्रग्न्याधानमें तीन ही वर्णोंका निर्देश मिलता है । जैसेकि - ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निमादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः ' ( वसन्त ऋतुमें ब्राह्मण अग्न्याधान करे, ग्रीष्म ऋतुम क्षत्रिय और शरद् ऋतु में वैश्य ' । शूद्रके श्रग्न्याधानमें श्रुति सर्वथा नहीं मिलती; इसलिए शूद्र अनग्नि ( अग्निरहित ) होने से अग्निहोत्र करनेमें अधिकारी नहीं । ' तस्माद् अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग कामः ' ( स्वर्गकी कामनावाला अग्निहोत्र करे ) इत्यादि स्थलोंमें गुद्रको प्राप्त करानेवाली कोई श्रुति नहीं मिलती; नहीं तो उसका उपनयन भी होता । ब्राह्मणादि-वणिककेलिए तो पूर्वोक्त त्रुति मिलती है । वे समर्थ भी होते हैं; क्योंकि वे अग्निमान् हैं, और शूद्र अर्नाग्नि ( अग्निहोत्रकी अग्निं रखनेवाले नहीं ) हैं । ग्राहवनीयादि अग्नियोंके रखनेका शूद्रकेलिए कहीं विधान नहीं । क्योंकि - श्राहवनीय प्रादि अग्नियाँ संस्कार वालों ( उपनीतों ) की ही होती हैं; अतः अनुपनीत शूद्र अग्निहोत्रादिमें अधिकारी नहीं । यह प्राय मुनि कहते हैं 4-
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५५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( ३ ) " निमित्तार्थेन बादरिः, तस्मात् सर्वाधिकारं स्यात् " ( ६।१।२७ ) यह वादरिका पूर्वपक्षका सूत्र है । यह जो कहा गया है कि - शूद्रका अधिकार नहीं है - यह ठीक नहीं । जो भी यजनका अर्थी ( चाहनेवाला हो ) उसकेलिए ' यजेत ' ( यज्ञ करे ) यह आता है । जब तक शूद्रका साक्षात् निषेध न मिले, तब तक शूद्र यज्ञसे हट नहीं सकता । जो कि कहा जाता है कि - शूद्र अनग्नि होनेसे यज्ञमें असमर्थ है, यह ठीक नहीं, उमे श्रग्नि भी प्रर्थ प्राप्त हो सकती है । ' काम ' शब्दसे ' जो चाहता हो ' यह अर्थ निकलता है, उसमें किसी वर्णका बन्धन नहीं हो सकता । ( प्र. ) अग्न्याधानकी चोदना ( श्राज्ञा ) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको युक्त है, तब इसमें शूद्र गृहीत नहीं हो सकेगा; क्योंकि - चोदना - वाक्य में शूद्रका नाम नहीं । ( उ. ) वे श्रुतियाँ निमित्तार्थक हैं; शूद्रको प्राप्त करानेवाली नहीं है । यह शब्द निमित्त स्वभावक हैं- ' ब्राह्मणं श्रादधानो वसन्ते राजन्यो ग्रीष्मे, वैश्यः शरदि ' यहाँ ब्राह्मणादि तीनोंका क्रमसे वसन्त, ग्रीष्म और शरद् इन तीन ऋतुस्रोंसे अग्न्याधानका सम्बन्ध रखा गया है । तब ब्राह्मणादिका वसन्त श्रादि ऋतुग्रोंसे सम्बन्ध है - यह बताया गया है; तब ' आदधीत ' वाक्यसे शूद्र व्यावृत्त नहीं हो सकता ( हट नहीं सकता ) । इसलिए बादरि प्राचार्य शास्त्रको सर्वाधिकार ( सभी वर्णों में अधिकृत ) मानते हैं । यह ' वादरि ' व्यासजी के पिता नहीं हैं, कोई अन्य आचार्य हैं । व्यासजी के पिता तो पराशर हैं; उन्होंने कहीं भी शूद्रका कार नहीं माना है, इसपर पराशरस्मृति भी देखी जा सकती है— उसमें लिखा है-' पतितोपि ( दुःशीलोपि ) द्विजः श्रेष्ठो न च शूद्रो जितेन्द्रियः । निदुग्धापि च गौः पूज्या न च दुग्धवती खरी ' ( ८३३ ) यह उत्तराधं स. प्र. में स्वा. द. जीने उद्धृत किया है । इसका अर्थ यह है - पतित भी द्विज श्रेष्ठ है, जितेन्द्रिय भी शूद्र ठीक नहीं । दूधसे रहित भी गाय पूजनीय होती. मीमांसा में अपशूद्राधिकरण - भाष्य १५४ है, परन्तु दूधवाली गधी भी पूजनीय नहीं- कैसा सुन्दर आजकलकी पराशरस्मृति में यह पाठ मिलता दृष्टान्त है? तक नह गां दुष्ट दुहेत् शीलवती खरीम् ' ( सींग मारनेवाली है- ' कः परिद शूद्रके ज छोड़कर कौन द्विज भला सौम्य स्वभाववाली गधीका गायत्रो निष्फल अपने पीनेकेलिए दुहेगा? सो वैदिक यज्ञ उच्च कर्म दूध यशकेलिए सकता होनेसे अधिकृत नहीं । अथवा स्मार्तयज्ञ पञ्चमहायज्ञ इष्ट हो; तो शु है, क्योंकि – वे नम: अन्तवाले मन्त्रोंसे शूद्रोंसे भी अकर्तव्य नहीं और है । उ यह ( ४ ) " अपि वाऽन्यार्थदर्शनाद् यथाश्रुति प्रतीयेत ” है; अतः नहीं । ( ६।११२८ ) ( जो इस यह उत्तरपक्षको बतानेवाला सूत्र है । ' वा ' शब्दसे पूर्वपस बाहिर वचनमें सूचित होना है । कि - यथाश्रुति ( श्रुत्झनुसार ) ही मानना उचित! जावेगा; क्योंकि - प्रग्न्याधानकी श्रुतिमें ब्राह्मणादि आदिम तीन वर्णोंका ही सुनाई पड़ता है; तब प्रग्न्याधान भी उन्हीं आदिम तीन वर्षांका होगा । वसन्त आदि शब्द साथ होनेसे उन उन ऋतुयों में ही वह प्राप्त तथा यह ब्राह्मणादिका होगा । उस श्रुतिमें शूद्रकी कोई ऋतु नहीं बताई गई है । होनेसे प तब वह अग्न्याधान शूद्र - वर्जितोंका ही होगा । ' बाहंदगिर ब्राह्मन्त्र ब्रह्मसाम कुर्याद, प्रार्थं रथ्यं राजन्यस्य, राजोवाजीयं वैश्यस्य ' इस विि वाक्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके तो विशेष साम बताये गये हैं र पूर्व शूद्रका साम कोई भी नहीं बताया गया है । नहीं है । व्रत भी तीन आदिम - वर्णोंके ही प्राये हैं— ' पयोव्रतं ब्राह्मपत् ब्रह्मसाम यवागू राजन्यस्य, श्रामिक्षा वैश्यस्य ' यह दूध, यवागू ( लप्सी ), प्रालि ' चक्षुर्विि ( रसगुल्ला ) व्रत भी तीनों वर्णोंके ही उपनयनमें बताये गये हैं, इनमें हो जावे शूद्रका नाम नहीं है । अग्निका प्रधान भी ' अष्टसु प्रक्रमेषु ब्राह्मणोई व्रत मस्त मादधीत, एकादशसु राजन्यः, द्वादशसु वैश्यः ' यह तीनों वर्णोंका ८-१ इस १२ वर्षकी श्रायुमें बताया गया है । सो साम, व्रत, तथा म प्रग्न्याधान भी तीनों वर्णोंके ही बताये गये हैं, शूद्रका तो इनवें यह
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ १५४ है? नहीं । तब ब्रह्मसाम, दूध आदि व्रत, तथा क्रम प्रक्रम प्रग्न्याधान कः परिद तक जब नियत नहीं; तब वह उसका किया हुआ भी श्रविहिन कर्म गायको शूद्रके हो जायगा । इस कारण शूद्र हवन एवं यज्ञादि नहीं कर निष्फल यशकेलिए सकता । होनेसे शु ( ५ ) " निर्देशात पक्षे स्यात् ” ( ६।१।४ ९ ) तो और बर यह पूर्वपक्षका सूत्र है । जो किं - शूद्रको यज्ञिय अग्नि श्रधिकृत नहीं नहीं है । है; अतः वह अग्निहोत्रका अधिकारी नही " यह कहा जाता है- यह ठीक नहीं । शुद्रका प्रधान भी हो सकता है - ' य एवं विद्वान् श्रग्निमाधत्ते ' ( जो इस प्रकार विद्वान् पुरुष अग्निका प्रधान करता है । इस शास्त्र-वंपस वचनमें सामान्य शब्द ' विद्वान ' रखा गया है, यह भी निमित्तार्थक हो उचित जानेगा; तब शास्त्र भी सर्वाधिकारका समर्थक सिद्ध हुआ । काही ( ६ ) " वैगुण्यान्न - इति चेत् ” ( ६।१।३० ) वर्णों यह पूर्वपक्षपर तटस्थका शङ्कासूत्र है फि - यदि शूद्र ब्रह्मसाम, व्रत वह प्रात तथा क्रमप्रक्रम - रहित कर्म करेगा भी; तो वह कर्म विगुण ( गुणहीन ) ताई गई है । होनेसे फलदायक नहीं होगा, इस शङ्काका तो समाधान करो? ' र ब्राह्मपत्र इस विि ( ७ ) " न, काम्यत्वात् " ( ६।१।३१ ) गये हैं पूर्वपक्षीका यह उत्तरसूत्र है । इसके समाधानकी आवश्यकता ही नहीं है । क्योंकि शूद्र उस कर्मकी कामना करेगा । अभीवर्त नामक तं ब्राह्म ब्रह्मसाम है; उसे भी आरम्भ न करके उसे सामान्यतया कहा गया है । 7 ), प्राप्ति ' चक्षुर्विमित प्रादध्यात् ' इन अनियत प्रक्रमों में भी शूद्रका प्राधान नियमित हैं, इनमें हो जावेगा । इस प्रकार रुद्रका व्रत भी हो जावेगा, ' मस्तु शूद्रस्य ' शूद्रका ब्राह्मणोई व्रत मस्तु है - यह सम्बन्ध दीखनेसे मालूम होता है कि वह शूद्रका ही मौका है । इस कारण यज्ञमें चारों वर्णोंका ही अधिकार होना चाहिये । याम ( ८ ) " संस्कारे च तत्प्रधानत्वात् ” ( ६।१।३२ इनमें रा ) यह पूर्वपक्षीका युक्तिसूत्र है । व्रतमें विशेषता प्रतीत होती है— ' मीमांसादर्शन ' का प्रपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५५५ यहाँ प्रधानताका भाव है । पुरुषप्रधान संस्कारमें व्रतमें पुरुषकी प्रधानता होती है । जब संस्कारमें पुरुषकी प्रधानता है, वह बिना उपसंहारके शूद्रको निषिद्ध नहीं कर सकता । ' यजेत ' ( यज्ञ करे ) इस वचनमें स्वर्ग-की कामना कहने से शूद्र भी स्वर्गकी कामना कर लेगा । तब उसका उसमें नाम नहीं है - यह कैसे कहा जा सकता है? यज्ञकी ऐसी क्या वस्तु है; जो पुरुषसे पूरी हो सकती है, और उसको शूद्र न कर सकें । यदि कहो कि वह व्रतको न कर सकेगा, तो यह ठीक नहीं । सामर्थ्य प्राप्त करनेकेलिए वह जिसको कहा जावे; उसोका उसके विना सामर्थ्य नहीं होता; दूसरेका सामर्थ्यं इससे निषिद्ध नहीं होता । इस प्रकार व्रत अङ्ग है, जो कर्ताको समर्थ कर दिया करता है । पर जिस शूद्रादिको उस व्रतसे प्रयोजन नहीं है, वह उसकी बिना परवाह किये ही यज्ञको सम्पन्न कर लेगा; इसलिए भी शूद्रको छोड़ा नहीं जा सकता । " पि वा वेदनिर्देशाद् प्रपशूद्राणां प्रतीयेत " ( ६।१।३३ ) यह उत्तरपक्षका सूत्र है । ' अपि वा ' से पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति इष्ट है । वेद कथनसे शूद्रजित त्रैवर्णिकोंका ही अधिकार है । क्योंकि वेदमें तीन वर्णों का ही निर्देश है । ' वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीन, ग्रीष्मे राजन्यम्, वर्षासु वैश्यम् ' वसन्तमें ब्राह्मणका, ग्रीष्ममें क्षत्रियका श्रर वर्षामें वैदयका उपनयन होता है । तब शूद्रका उपनयन न होनेसे उसे वेदका भी अधिकार नहीं होता; और वेदके न होनेसे शूद्र वैदिक यज्ञमें भी अधिकृत नहीं होता! ( १० ) " गुणार्थित्वाद् न इति चेत् ” ( ६ | १ | ३४ ) यह प्राशङ्कासूत्र है । शूद्र विना उपनयनके स्वयं प्राज्ञायंके पास जाकर पढ़ लेगा; उसका यजन में सामर्थ्य भी हो जावेगा । ( ११ ) " संस्कारस्य तदर्थत्वाद् विद्यायां पुरुषश्रुतिः ” ( ६।१।३५ ) वह उत्तरपक्षका सूत्र है । विद्यामें जो कि पुरुषका नाम आता है; वहाँ उपनयन - संस्कार श्रावश्यक होता है । विद्याकेलिए हो प्राचार्यके पास
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५५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जाना होता है; न तो अदृष्ट के लिए; और न कोई दीवार बनाने के लिए । इसीका नाम आचार्यकरण होता है । ' उपनयेत ' में ग्रात्मनेपद प्राचार्य-करणार्थं होता है । उपनयनाधिकारी न होनेसे प्राचार्य शूद्रको प्राचार्य-कुलमें नहीं ग्राने देगा । उपपूर्वक णीञ धातु आचार्यकरण अर्थमें हो होता है । देखो पाणिनिका सूत्र – ' सम्मानन उत्सञ्जन- प्राचार्यकरण... व्ययेषु निय: ' ( पा. १।३।३६ ) । उस प्रर्थसम्बन्धसे ही उपनयन आचार्य-करणार्थंक ही है । वेदके पढ़ानेसे ही प्राचार्य होता है । अतः वेदाध्ययन में ब्राह्मणादि प्रादिम तीन वर्ण हो सुने गये हैं, शूद्र सर्वथा नहीं । शूद्रका वेदाध्ययन नहीं सुना गया है । तब वेदरहित होनेसे शुद्र याग में भी श्रधिकृत नहीं होता । ( १२ ) " विद्यानिर्देशाद् न इति चेत् " ( ६।१।३६ ). यह भ्राशङ्कासूत्र है । यदि वेद न होनेसे शूद्र वेदमें अनधिकृत है; तो यह दोष ठीक नहीं । वह न कही हुई विद्याको भी पढ़ लेगा । न कही हुई विद्या भी पढ़ी जा सकती है । अतः यागमें चारों वर्णोंका ही अधिकार है । ( १३ ) " अबेद्यत्वाद् प्रभावः कर्मणि स्यात् " ( ३७ ) यह पूर्व प्राशङ्काको खण्डित करनेवाला सूत्र है । शूद्र पढ़ लेगा - यह कथन ठीक नहीं । शूद्रका अध्ययन निषिद्ध है- ' शूद्र ेण नाध्येतव्यम् - इति ' ( शूद्रको अध्ययन नहीं करना चाहिये । ) पढ़नेपर भी उसका पढना सफल नहीं होता; बल्कि दोष भी उसको होता है । अतः शूद्र श्रवैद्य ( वेदानधिकृत ) है । इस कारण वह अनग्नि होनेसे कर्म में भी अधिकृत नहीं । वह अनग्नि कैसे है? प्रधानमें वचन ब्राह्मणादि तीनों वर्णोंके ही प्रापक हैं । ( प्र. ) ' य एवं विद्वान् श्रग्निमाधत्ते ' यह प्रधानका विधायक सामान्य - वाक्य है । इसमें शुद्र भी गृहीत हो जावेगा । ( उ. ) उसमें ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निमादधीत ' इत्यादि वचनोंमें ब्राह्मणका नाम उसके सम्बन्ध बतानेकेलिए ही है कि- ब्राह्मण वसन्तमें ही प्राधान करे । जो मीमांसादर्शनका अपशूद्राधिकरण - भाष्य [ th इस प्रकार जाननेवाला अग्निका प्राधान करे यह स्तुत्यर्थक तव अनुमानिक बात प्रत्यक्षभूतसे दुर्बल हुआ करती है वाक्य है । ब्राह्मणादिके प्राप्त करानेवाले हैं । अतः शूद्रका वेदमें अधिकार । तब वे द बांधे ( १४ ) " तथा च प्रत्यार्थदर्शनम् " नहीं । ते म ( ६।११३८ ) | इवाऽ यह शूद्रके अनधिकारका उपसंहारसूत्र । शूद्रको यागादिश बान्ध धिकार नहीं होता, इसमें अन्य भी लिङ्ग वा वचन हैं । ' यद्य हे श्मशानं यत् शूद्रः । तस्मात् शूद्र - समीपे नाध्येतव्यम् ' ( वा ए बैठे ) श्मशान है; सो उसके पास वेद नहीं पढ़ना चाहिये यह एक शूद्र बह श्रुति है ॥ यहाँ शूद्रका अध्ययन दिखलाया गया है । इसलिए शूद्रों का यान अनधिकार है । ( प्र. ) ग्राहवनीय आदि श्रग्निके बिना भी यज्ञमें वचः । ४१३ देते बलसे शूद्रका यज्ञ हो जावेगा? ( उ ) यहाँ स्वर्ग चाहनेवालेको सत्ता नहीं कही जाती; किन्तु स्वर्ग फलविशिष्ट यज्ञकी सत्ता बताई है, तब शूद्रका वंसे अग्निहोत्रादिमें अधिकार असम्भव ही है । प्रत: अपने यज्ञ प्राप्त नहीं । के इ श्रीग यह ' याग में शूद्रका अनधिकाराधिकरण ' समाप्त हो गया । ए मीमांसाकारका शूद्रको यज्ञका अनधिकार ही इष्ट है, का हार्दिक अभिप्राय निकाल कर ही भाष्य में रखा है भी जो वेदके महान् पण्डित थे- यही सिद्धान्तपक्ष रखा युग - प्रवाह के पीछे चलनेवाले कई सनातनधर्मिंत्र व भी श्रीमा शवरस्वामीने हुए ॥ श्रीकुमारिल है । पर धावक ऐदंयुगीन समा शुरू . वाह - वाही पानेकेलिए पूर्वपक्ष को उत्तरपक्ष और उत्तरपक्षको पूर्व . बनाते हुए बहुत खींचातानी करते हैं; इन लोगोंके मस्तिष्क पर है नशा सवार है कि वे परमात्मासे भी नहीं डरते; अनृत - बोलनेवाले अछूत वरुणके पाश बान्धते हैं— ' ये ते पाशा वरुण! सप्त सप्त श्रेषा विद सूत्रों विषिता - रुषन्तः । छिनन्तु सर्वे श्रनृतं वदन्तं यः सत्यवादी श्री सृजन्तु ' ( अ. ४।१६।६ ) ( हे वरुण! जो तेरे तीन प्रकारके ४१ ॥ लिख स्थित हैं, खुले हुए हैं, और चमकते हुए हैं; वे सारे श्रसत्य बोलने । शुद्रक
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५५८ / कवास तव है । जो सत्यवादी हों; उन्हें छोड़ दें ) ' शनेन पर्णः श्रभिधेहि एन मा बांधे । र नहीं । ते मोचि अनृतवाङ् नवक्षः! ग्रास्तां जात्म उर म गयित्वा कोश परिकृत्यमानः ' ( ७ ) ( हे वरुण! असत्यवक्ताको सो पाशों से १३८ ) वाऽन्धः 7 बान्ध । जो झूठे वचन वाला है, मनुष्योंके शुभाशुभ चाचरणोंके द्रष्ट यागादि हे वरुण! तुमसे छूटने न पावे । वह श्रममीकारी पेटको ढिलकाकर ए बैठे ) । शूद्र बद्द श्रुति है ॥ इत्यादि वेदमन्त्रोंकी भी परवाह नहीं करते - यह हम पीछे प्र. ४१२-काया ४१३ 3 में संकेतित कर चुके हैं । हम उनकी थोड़ी - सी बालोचना भी कर यज्ञमें बर देते हैं । बालेको प . श्रीतकंरत्नजी - जिनके ' प्रालोक ' - पाठकोंने पीछे पूर्वपक्ष देखे होंगे, ने हा बताई ज अपनी बनाई ' अछूतोद्धार - निर्णय पुस्तिका पृ. १५-२० में ' मीमांसादर्शन ' । अतः बड़े के इन सूत्रोंकी छीछालेदर की है । पुस्तकके नामसे ही स्पष्ट है कि वे श्रीमान्धिजीके अछूतोद्धारसे प्रभावित हुए हैं । उनमे सनातनधर्मी गया । इ श्रीमालवीयजी प्रभावित हुए, और उनसे सनातनधर्मी तर्करत्नजी प्रभावित वामीने हुए । फिर वे जो न करत; थोड़ा ही था । ' ब्लैकमार्कीट ' व्यापारियोंकी कुमारित सुनी जाती थी अब वह ब्लैकमार्केट शास्त्रोंमें भी इन लोगोंने शुरू कर नर दो है । अपनी इच्छानुसार खींच - खांचकर शास्त्रोंकी दुर्गति इन लोगोंने गीन समाते . शुरू कर दी है । नक्षको पूर्व तष्क पर है । रामानन्दी श्रीम.प्र. सनातनधर्ती होते हुए भी श्रीगान्धिजीके - बोलनेवा अछूतोद्धारसे प्रभावित हुए हैं । फिर भी उन्होंने मीमांसादर्शन के इन-श्रेधा विन सूत्रोंकी श्रीतकंरत्नजीकी भान्ति छीछालेदर नहीं की; उन्होंने मीमांसा-वादी प्रति दर्शनके इन सूत्रोंको ' वेदान्तदर्शन ' के अपने वैदिकभाष्य में शूद्रका अनधिकार रके ४ ९ ८ लिखना उचित कोटि में माना है । उनका अभिप्राय यह है कि- ' शूद्रका बोलनेक • कम में तो प्रतिबन्ध हो सकता है, पर ज्ञानमें नहीं; अतः श्रीजैमिनिने शूद्रका जो अनधिकार माना है, वह कर्ममीमांसा होनेसे ठीक है ' । अस्तु! ' मीमांसादर्शन ' का अपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५५२ मीमांसाका यह अधिकरण ' यागे गूद्रस्य अनधिकाराधिकरण ' है; तर भला उस श्रधिकरणसे विरुद्ध ' शूद्रका अधिकाराधिकरण ' कैसे बन गया; यह तर्क रत्नजीने क्यों नहीं सोचा? और फिर उसमें पहला सूत्र ' चातुर्वण्यंमविशेषात् ( ६।१।२५ ) स्पष्ट पूर्वपक्ष - सूत्र है, जिसमें चारों वर्णोको अधिकृत किया गया है । काई भी श्रुति स्मृति - पुराण- इतिहासादि साहित्य, शूद्रको वेद एवं यज्ञमें अधिकृत नही मानता; तब मीमासाकार भला शूद्रको अधिकारी कैसे कर सकता था? अत: यह स्पष्ट पूर्वपक्ष है । यजुर्वेद - शतपथब्रा. में लिखा है- ' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ( ३ | १ | १ | २ ) ( यज्ञ के अधिकारी श्रादिम तीन वर्ण ही हैं ( शूद्र नहीं ); वल्कि यजमें दीक्षितको शूद्रसं साक्षात् बातचीत करनेका मी निषेध है । उसे शूद्रमे, वातचीत करनी हो, तो वह बात यजमें प्रदीक्षित किसी द्विजकी माफ यज्ञ - दीक्षितको करनी पड़ती हैं, देखो यजुर्वेदशतपथब्रा ( ३ | १ | १ | १० ) तर्करत्नजीकी खींचातानीका यह एक आदर्श दर्शनीय है- ' पञ्च-यज्ञ - विधानं तु शूद्रस्यापि विधीयते । प्रोक्तः तस्य नमस्कारः कुर्वन् नित्यं न हीयते ' ( ५६ ) यह विष्णुस्मृतिका पद्य है । इसका अर्थ स्पष्ट है कि-शूद्रका वैदिकयज्ञमें तो अधिकार नहीं है, पर स्मार्तयज्ञ - पञ्चयज्ञके विधान में शूद्रका अधिकार नहीं; उसे वह कर सकता है । फिर प्रश्न होता है कि शूद्र पञ्चयज्ञमें किन मन्त्रों का प्रयोग करे? क्या वेदके मन्त्रोंका वा पौराणिक मन्त्रोंका? उसपर स्मृतिकार कहते हैं कि यहां शूद्रका मन्त्र ' नमस्कार ' है, अर्थात् ' ब्रह्मणे नमः, विष्णवे नम: ' इस प्रकार चतुर्य्यन्त पदके साथ ' नमः ' शब्द वह लगाता जावे-यही शूद्रका मन्त्र है । इसे करता हुआा पतित नहीं होता । इसे हम पहले पृ. ४०८-४१३ में स्पष्ट कर चुके हैं । पर तर्करत्नजीने यहाँ ' नमस्कारः ' शब्दको छिपा दिया; उसका अर्थ ही नहीं किया ( देखो प्रछू. पू. २४ ) - पर शुक्रनीतिके ' पुराणाद्य क्तमन्त्रैश्च नमोन्तेः कर्म केवलम् ' ( ४१३६ ९ )
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५६० ] श्री सनातनध मालोकः ( ३-२ ) इस पद्यका अर्थ तर्करत्नजीने ठीक ही किया है कि- ' शूद्रको वेदमन्त्रका अधिकार नहीं है । पुराणोंके ' शिवाय नमः ' आदि मन्त्रोंस अपने सारे कर्मोंको कर सकते हैं । याज्ञवल्क्यस्मृति में भी लिखा है –'नमस्कारेण मन्त्रेण पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ' ( प्राचाराध्याय गृहस्थधर्मं प्रकरण १२१ ) । इसपर मिताक्षरामें लिखा है ' नमः ' इत्यनेन मन्त्रेण पूर्वोक्तान्. पञ्चमहायज्ञान् ग्रहरहर्न हापयेत् प्रनुतिष्ठेत् । नमस्कार मन्त्रं च केचित्-' देवता: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमोनम: ' इति वर्णयन्ति । नम इति श्रन्ये । तत्र वैश्वदेवं लौकिके अग्नौ कर्तव्यम्, न वैवाहिकेऽग्नौ इति श्राचाया: ' ( शूद्र ' नमः ' इस मन्त्रसे पञ्चयज्ञोंको न छोड़े - प्रर्थात् करे । ' ब्रह्मणे नमः भूतेभ्यो नमः, पितृभ्यो नमः, देवेभ्यो नमः, अतिथिभ्यो नम: ' - इन नमोऽन्तमन्त्रोंसे शूद्र पञ्चयज्ञ करे | कई विद्वान् नमस्कारमन्त्र यह कहते हैं— ' देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायें स्वाहार्यं नित्यमेव नमो नम: ' इसे ही शूद्र जप ले । दूसरे विद्वान् केवल ' नमो नमः ' यही शुद्रका मन्त्र मानते हैं । आचार्योंका यह मत है कि वैश्वदेव - यज्ञ लौकिक - प्रग्निमें किया जावे, वैवाहिक प्रग्निमें नहीं 1 ) श्रीप्राज्ञवल्क्य मुनिने स्मार्तकर्म विवाहाग्निमें तथा वैदिककर्म श्रोत-अग्नियोंमें माना है । जैसेकि - ' कर्म स्मार्त विवाहाग्नी कुर्वीत प्रत्यहं गृही । दायकाल हृते वापि श्रौतं वैतानिकान्निनु ' ( १२५२ ९ ७ ) ( स्मृतियों में कहे हुए वैश्वदेवादिकर्म, और पाकयज्ञादि लौकिक कर्मको गृहस्थी द्विज विवाह संस्कृत अग्निमें कर ) और श्रुतिमें कहा हुआ अग्निहोत्रादि कर्म श्राहवनीयादि श्रोत ( वैतानिक ) अग्निमें करे । श्रार्यसमाजी - श्री तुलसीराम स्वामी भी शूद्रकेलिए वेदमन्त्रोंका हवन नहीं बताते । मनु १०।१२७ के अर्थ भावार्थ में वे लिखते हैं- ' धर्मकी इच्छावाले और धर्मको जाननेवाले शूद्र मन्त्रवजित, सत्पुरुषोंका प्राचरण मौ.द.के अपशूद्राधिकरणभाष्यपर आपत्तियोंका निरास [ ५६ ॥ करते हुए दोषको नहीं, किन्तु प्रशंसाको प्राप्त करते हैं १६२ धर्मकार्य यज्ञादि करनेका शुद्रों को अधिकार नहीं है । भाव यह है हि धर्म करना चाहें; तो बिना वेदमन्त्रोंके उच्चारणके.... किन्तु यदि शूद्र बर्फीका सकते हैं । उसमें उनको अमन्त्र- होमका कोई दोष नहीं हो । यज्ञ ' होमादि कर स्पष्ट स्वा.द.ने भी ' आख्यातिक ' ( लकारार्थ - प्रक्रिया ( २६३ ज है— ' अपि तत्र भवान् वृषलं याजयति, अहो! श्रन्याय्यमेतत् पृ ) में लिखा दिया; नाम तत्रभवान् वृषल याजयत् पृ. २६४ यच्च यत्र वा तत्रभवान् । कवं प्रोर याजयेत्, गर्हामहे । अन्याय्य मेतत् ' इन उदाहरणोंसे शूद्रों को यज्ञ कराना उप प्रायंस निन्दित सिद्ध किया हैं । भी अप ‘ स्त्रैणताद्धित ' ( ४।१।६३ ( ११४ ) में स्वामीजीने वृपलको जाति- मुनिजी धानका चाचक ( शुद्र ) माना है | इसलिए स्वामीजीने संस्कारविधिके २३ पृष्ठों अधिक ' ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्यके घरसे श्रग्नि ला... श्राधान करें । कहकर यज्ञके लिए शूद्रकी अग्निका भी निषेध सूचित कर दिया है 1 । धान्यां श्रीश्रार यह हम इस पुष्पके ४११-४१२ पृ. में सूचित कर चुके हैं । इससे इ स्पष्ट है कि तर्करत्नजीने जैसे विष्णुस्मृतिके पद्यके अर्थमें कुछ गोलमाल इन मं किया है; वैसे ही मीमांसासूत्रों में भी यही हाल किया है । हम लिखते हैं — ' यज्ञ करनेका शूद्रको अधिकार है; या नहीं ' इसपर विशेष-विचार करते हुए जैमिनि मुनि लिखते हैं- ' चातुर्वर्ण्यमविशेषात् ' ( २५ ) द्वारा यहाँ तर्करत्नजीसे प्रष्टव्य है कि उक्त सूत्रमें ' जैमिनि ' का नाम कहाँ ग्रावश्य लिखा है? २६ सूत्रमें प्रात्रेयका तथा २७ सूत्रमें वादरि ' का नाम लिखा ' 4 है - इस प्रकार २५ वें सूत्रमें ' जैमिनि ' का नाम कहाँ लिखा है - इससे उनकी चोरी स्पष्ट सिद्ध हो गई कि यह ' चातुर्वर्ण्यमविशेषात् ' ( ६।१।२५ ) ' वा ' = पूर्वपक्षका सूत्र है । यहाँ उनके अनुसार ' यज्ञ करनेका शुद्रको अधिकार है यहाँक या नहीं यह अधिकरण ही नहीं है । वहाँ अधिकरण तो ' यागमें नाम शूद्रानधिकार ' का ही है; तव ' चातुर्वर्ण्यमविशेषात् ' सूत्र जिसमें चारों वर्णों के स ० ध ० ३६ हो गय