सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 311–320

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 311–320

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५६१ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ३-२ ) ६२ } हैि सामान्यतया कहा है, जमिनिजीका कैसे हो सकता है? यदि शूद्र वर्फीका होम ही सिद्ध है । विकर स्पष्ट यह पूर्वपक्ष सूत्रको ही तर्करत्नजीने जैमिनिका सिद्धान्त - सूत्र कर जब इस पूर्वपक्ष-में लिखा दिया; फिर तो सभी सूत्रोंका अर्दन -विमर्दन करके उनने पूर्वपक्षको उत्तरपक्ष । कवं उत्तरपक्षको पूर्वपक्ष करना ही था । प्रतीत होता है कि यह उनपर और प्रार्यसमाजीश्रीश्रार्यमुनिजीके मीमांसार्यभाष्य ' का प्रभाव हुआ है । उन्होंने न प कराना भी अपने भाष्यमें मीमांसा - सूत्रोंकी यही दुर्गति की है । फिर भी प्रार्थ-मुनिजीने निषादस्थपतियाजन ' ' में निषादस्थपति ( शूद्रविशेष ) को ' अग्न्या-' धानका अनधिकारी ' लिखा है । देखिये उनके शब्द – अग्न्याधानका ' सबको जाति- अधिकार नहीं; अर्थात् निषादस्थपति जिसकी उक्त इष्टि है, वह पृष्ठों । वह प्रन्याधानका अधिकारी नहीं 1 श्रीश्रार्यमुनिजीकी यह बात नोट इससे श्रागे जो मीमांसादर्शनमें ' लिमल इन मीमांसा के सूत्रोंमें तोड़ - फोड़ हम इसी पुष्पके १२८-१२९ ( मी. ६८१ ) | की है-. निषादस्थपतियाजन ' मचाई है यह ठीक पृ. में स्पष्टता कर विशेष - वचनके बलसे याग उसका प्रतीत होता है, इसपर श्री रत्नीने भी देखकर तर्करत्नजीने नहीं । इस विषय में चुके हैं कि वहाँ पर वह ऋत्विक्के ( २५ ) द्वारा उसे करा लिया करता है । नहीं तो उसकेलिए पृथक् श्रधिकरणकी कहाँ श्रावश्यकता ही नहीं थी । लिखा ' निर्देशाद् वा त्रयाणां ' ( २६ ) यह सूत्र पूर्वपक्षका बाधक उत्तरपक्ष उनकी है; यहाँ तर्करत्नजीने इस सूत्रको पूर्वपक्ष बताया है । इस सूत्र में स्थित २५ ) ' वा ' शब्द पूर्वसूत्र में स्थित पूर्व पक्षका बाधक है, यह दार्शनिक शैली है । है यहाँ वमन्तादि - ऋतुओं में ब्राह्मणादिका अग्न्याधान कहा है । इनमें शूद्रा यागमें नाम भी नहीं है । चारों ' अपि वा वेदनिर्देशाद् श्रपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( ६।११३३ ) में तीन वर्णोंके लिए ही वेदका निर्देश किया गया है । इससे शुद्रका निषेध स्वतः हो गया । यह शङ्कासूत्र कभी नहीं हो सकता, जैसेकि तर्कर अपशूद्राधिकरणभाष्यकी आपत्तियों का निरास [ ५६३ लिख है; वेद पूर्वपक्ष नहीं रख सकता, वह उत्तरपक्ष ही रखेगा । फिर उसका उत्तर भी तो तर्करत्न ने कोई नहीं दिखलाया । श्रतः स्पष्ट है कि — यह उत्तरसूत्र है । इसमें शूद्रको छोड़कर त्रैवर्णिकोंका उपनयन - विधान बताया गया है । तब शूद्रोंका वैदिक यज्ञ कैसे हो सकता है? ३४ सूत्रमें तर्करत्नजीने, विना यज्ञोपवीतके शूद्रका यज्ञ करना शास्त्र-विरुद्ध माना है । फिर ३५ सूत्रके अर्थ में उनने ' यज्ञोपवीत संस्कार'को वेदाध्ययनकेलिए माना है । यह उत्तरसूत्र है, पर तर्करत्नजीने इसे कृत्रिमता से पूर्वपक्षका सूत्र माना है । ३७ सूत्रके अर्थ में तर्करत्नजीने लिखा है कि- ' यदि उपनयन न होने-पर भी किसी प्रकार विद्वान् हो जावे; तो हमारे यहाँ वह यज्ञका अधिकारी होगा ' । इसमें उनने शूद्रके विषयमें कुछ नहीं लिखा; तत्र उसके अधिकारके विषयमें उनका लिखना गलत है । ३८ सूत्र शुद्रके अनधिकारका उपसंहार - मूत्र है । इसका तर्कग्लजी-द्वारा यह अर्थ करना कि- ' इस प्रकारके अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें उपनीत श्रनुपनीतके वेदाध्ययनका कथन है; यह श्रयं उनका बनावटी है । अनुपनीतका भला वेदाध्ययन कैसे हो? कोई उन्होंने इसमें प्रमाण भी तो नहीं दिया । यहां तो भाष्य में शूद्रको श्मशानके समान बतान उसका वेदका प्रनधिकार ही स्पष्ट सिद्ध है । श्रागे जो उनने उवट - महीधरके मतमें यज्ञाधिकार लिखा है उपनग समाधान हम पृ. ४०८-४१३ में कर चुके हैं । जो उनने पञ्चजन ' आदि शब्दोंसे शूद्रका वेदाधिकार सिद्ध किया है, उसका भी समाधान हम १५६-१६४ पृष्ठमें कर चुके हैं । उनके अन्य प्रमाणों का भी समाधान हम इस पुष्पमें तथा अन्य पुष्पोंमें यत्र - तत्र कर ही चुके हैं । श्रीतकरत्नजी हमारे विद्यालयकी सभाके सदस्य थे । हमने उनसे पूछा था कि- ' प्राप अपने आपको सनातनधर्मी कहते हैं, फिर क्यों यह सनातनधर्मसे विरुद्ध निर्मूल बातें लिखा करते हैं । इस पर उन्होंने कहा

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५६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) था कि आप लोग प्राचीन सनातनधर्मी हैं; प्रापकी शास्त्रीय बात कोई भी नहीं सुनता; वा सुनना चाहता । इससे शास्त्र भाररूप व्यर्थ पड़े रहते हैं । हम युगानुरूप सनातनधर्मी हैं । आजकलके सुधारक कहीं हमारे हाथसे छूट न जावें; अतः हम उनको युग - प्रवाह के अनुरूप अपने में खींचनेकेलिए यह परिश्रम किया करते हैं ' । पाठकोंने देख लिया उनका प्रान्तरिक ग्रभिप्राय; पर हम यह बात ठीक नहीं समझते, यह तो शास्त्रीय ब्लेकमार्कीटिङ्ग है; हमें शास्त्रका वास्तविक अभिप्राय बताना चाहिये, चाहे उसे कोई माने, वा न माने । अस्तु । यह प्रकरण समाप्त करके अब हम ग्रागे चलते हैं । इन मीमांसा-सूत्रोंपर वादिप्रतिवादिमान्य प्रसिद्ध वेदविश्वासी श्रीकुमारिलभट्टकी टीका हम पूर्वप्रतिज्ञानुसार उद्धृत करते हैं । ( ख ) मीमांसादर्शनपर श्रीकुमारिल भट्टकी ' टुप् ' टोका । ( अपशूद्राधिकरण ) मीमांसादर्शनके ' यागे शूद्रानधिकाराधिकरण ' पर हम अपने पूर्व-कथनानुसार उक्त सूत्रोंका भाष्य उद्धृत करते हैं । -श्रीकुमारिलभट्ट वेदों जहाँ पूर्ण पण्डित थे, वहां वेदके पूर्णवि भी थे । एक राज - स्त्रीका कथन प्रसिद्ध है - ' किं करोमि गच्छानि को वेदान् उद्धरिष्यनि ' ( मैं क्या करूं, कहाँ जाऊं, कौन का उद्धार करेगा? इसपर श्रीकुमारिलभट्टने उस स्त्रीको प्राश्वासन दिया सुना जाता है कि - ' मा विभीहि वरारोहे! भट्टाचार्योस्ति भूतले ' ( ऐ स्त्री, तू मत डर । भट्टाचार्य ( कुमारिलभट्ट ) अभी पृथिवीमें जीवित है ( वही वेदोंका उद्धार करेगा ) । श्रीकुमारिलभट्टका परिचय । श्रीकुमारिल ने देखा कि - तथागत ( जैन - बौद्ध ) लोग अपना राजा मीमांमादर्शनपर श्रीकुमारिलभट्टको वृत्ति होने से वेदोंको प्रमाणित करते हुए सर्वत्र फैल गये हैं लगे हैं कि - वेदमागका आदर न करो ( ' शंकर -दिग्विजय; ' और प्रचार करने तब ७६०-६२ लोगोंकी कुछ प्रतिक्रिया न हो सकी । श्रीकुमारिलभट्टने उनसे ) न पर पर उनको जीत न सके; उसका कारण यह था कि वे उनके बाद ि सर्वज्ञ - मुनि रहस्य नहीं जानते थे । जिसका खण्डन करना; उनके सिद्धाश रहा हूं, रहस्य पहले जान लेना पड़ता है; तब खण्डनयोग्यका खण्डन सिद्धान्तका पड़कर उस सकता है ( प्रवादिषं वेद - विघातदक्षः, तान नाऽशकं शोध हो । एडी, जिस जेतुमवुध्यमानः तयसिद्धान्तरहस्य- वार्धीन, निषेध्य - बोधाद् हि निषेध्यबाधः । प्रपराध हु ( ७१२३ ) तव कुमाग्लिभट्ट ग्रपना वेष बदलकर तथागतोंके मण्डलम इन ' उनका रहस्यज्ञान कर लिया । तथागत गुरुने जो बहुत तीव्र जा घुसे, देवपानल बुद्धिका प | दो बह चैटिकमार्गका प्रबल खण्डन किया ( ६४ ) | उसके सुननेस भट्टदशे श्राँखोंमें आँसू ढुलक पड़े, यह देखकर बौद्धोंको शक पड़ गया कि ब्रह्मसूत्रपर चाहता था बौद्ध नहीं है, किन्तु वैदिकधर्मी है ( १५ ) । उन लोगोंने सोचा कि यह ब्राह्मण है, इसने हमारा रहस्य ले लिया, अब इसे मार डालना | देव वृत्तिकी त भ चाहिये ( ९ ६ ) । यह विचार करके उन अहिंसकमानियोंने उसे ऊंचे महल से निवेदन ' तथा आल दिया ( ६७ ) तब कुमारिल चिल्ला उठे - ' पतन् पतन् सौघतलान्यरोद्धुं | दोपके लिए यदि प्रमाणं श्रुतयो भवन्ति । जीवेयमस्मिन् पतितोऽसमस्थले, मज्जीवले क्रिमें तच्छू तिमानता गतिः ' ( ७/६८ ) ( यदि वेद प्रमाण हैं; तो इस ऊ उन्होने जो गिराया हुआ मैं मरू ँ नहीं, बच जाऊं ) । नहीं हो स ग्राह! श्रीकुमारिलभट्टका कितना वेदविश्वास था? वह ऊंचेसे निरा क - ते हैं । दिये गये; मरे नहीं, वच गये; पर उनकी एक श्रृंख फूट गई । उसस शावरभ कारण उन्होंने सोचा कि मैंने ( यदि वेद प्रमाण हैं, इसमें वेदों को प्रविश्वात, मट्टको टुप् करनेवाले ' यदि ' शब्दका प्रयोग किया है; तभी मेरी एक प्रांत किरण ' गई । यदि मैं ‘ यदि ' शब्दका प्रयोग न करता; तो यह एक आँख भी है । कई फूटती ( ९९ ) । ' चात

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६६ ] वचार करने भट्टजीने सोचा कि एक अक्षरका देनेवाला भी गुरु माना जाता १२ ) म तब जो पूरे शास्त्रको पढ़ावे, उसका तो भला क्या कहना? मैंने बाद किये पर ( बौद्ध ) से शास्त्र पढ़ा, पर ग्रव में उसका खण्डन कर सिद्धान्नांश मंत्र - मुनि सुगत मेरा गुरुके प्रति महान् अपराध है ( १०० ) । मैंने सुगत से सिद्धान्तस रहा हूं, यह नष्ट किया; फिर मैंने श्रीजैमिनिकी कर्ममीमांसा शोध होली | पड़कर जिसमें उसके कर्मकी कुलको प्रधानता रखनेसे ईश्वरका आदर नहीं था यह मेरे दो बुध्यमानः । अपराध हुए ( १०१ ) । ( ७१३ ) इन दो दोपोंका प्रतीकार यह है कि- मैं अग्निमें प्रवेश करू - सोचकर वे बुपानल में प्रविष्ट हुए । कुमारिलभट्टने उस समय श्राये • हुए शङ्कराचार्य काया, वह सब कहा ( १०२ ) और यह भी कहा कि- मैंने सुना था कि आपने भट्ट की सूत्रपरभाय्य किया है, मैं उसपर भी वृत्ति बनाकर यश प्राप्त करना वाहता था; पर अव कुछ नहीं हो सकता । मीमांमाभाय्यपर की हुई सोचा क्रि- इतिकी भांति आपके भाष्य पर भी वृत्ति करनेसे मेरा यश होता, पर र डालना देववश न हो सका । ( ७।१०५ ) ' श्रालोक ' पाठकोंने जान लिया होगा कि श्रीकुमारिलभट्ट कितने इलसे गिरा | वेदश तथा वेदविश्वासी थे; वे मीमांसादर्शनके भी मर्मज्ञ थे । इस थोड़ेसे चान्यरो | दोषकेलिए उन्होंने तुषानल प्रवेशका प्रायश्चित्त किया— श्रतः ऐसे - मज्जीवरे क्रिमें छल - मलका भी उदय तथा वेदविरुद्धता नहीं हो सकती; अतः इस बेडे उन्होंने जो मीमांसासूत्रों का श्राशय बताया; उसमें भी छलकी प्राशङ्का नहीं हो सकती; अतः महत्त्वपूर्ण होनेसे हम श्रीभट्टपादका प्राशय उद्धृत ऊंचे निराक · ते हैं । है । उसन शाबरभाष्यका तो हमने हिन्दी अनुवाद दिया था; पर अव श्रीकुमारिल-श्रविश्वस्त की टुप् टीकाको ही प्रायः उद्धृत करेंगे । उन्होंने भी यहां ' अपशूद्रा-- किरण ' ही रखा है । श्रुतः उनका सिद्धान्त भी वही शावरभाष्यवाला पाँख भी ही है । कई सूत्रोंपर उनकी वृत्ति नहीं मिलती, यह कठिनता अवश्य है । ' चातुर्वर्ण्यमविशेषात्, ( पू. ) ( ६।१।२५ ) को वहां पर भी पूर्वपक्षसूत्र मीमांसादर्शनपर श्रीकुमारिलभट्टकी वृत्ति [ ५६७ माना है; पर उसकी ' टुप् ' टीका नहीं मिलती है । निर्देशा वा त्रयाणां ' ( ६।१ / २६ ) को उन्होंने सिद्धान्तपक्ष ही रखा है । वहां ' टुप् ' टीका इस प्रकार है-' वसन्ते ब्राह्मणकर्तृत्वविशिष्टमाधानम् अग्न्युत्पत्यर्थम् । च अग्निर्यज्ञाङ्गम् । न च शूद्रस्य अग्निरस्ति । विशिष्टेन कारणेन उत्पद्यमाना स श्राहवनीयादीनां श्राहवनीयादयो भवन्ति, अलौकिकत्वात् । न च यूप-तुल्योऽयम् । तत्र हि बन्धनसमयं यत्, तद् श्रवगतम् । विशेषस्तु अनवगतः । स हि उपपदाद् वाक्यान्तराद् वा श्रवधार्यते श्रयं यूप इति । इन तु होमेन श्राहवनीयस्य प्रनाक्षेपात् सामान्यावगतिर्नास्ति । तस्माद् प्रत्येन अनाक्षेपाद् वेदाद योऽवगम्यते स आहवनीयः । स च वसन्तं ब्राह्मणकर्तृ कोऽवगम्यते । तेन अन्यकालकर्तृ को न भवति श्राहवनीयः । तदभावे फलाऽभावः । तस्मात् शूद्रस्य श्रनधिकारः ' ( २६ ) यहाँ पर सिद्धान्तपक्ष उनने यही रखा है कि - शूद्रका यज्ञमें अधिकार नहीं है, क्योंकि शूद्रको अग्निरहित माना गया है । ' निमित्तार्थेन बादरिः ' ( २७ ) यहाँपर टुप् - टी का इस प्रकार है -' प्राहवनीयादिभिः अर्थाक्षिप्तसमाधानम् । नहि तेन विना ग्राहवनीयादयः सन्ति । तस्मात् प्राप्तसमाधानम् - अनूद्य तत्र वसन्नादिगुंणो विधीयते । तस्य तेन गुणेन सगुणम्, शूद्रस्य गुणाऽभावाद अगुणमेव । ( ब्राह्मणादि की वसन्तादिगुणसे सगुणता बताई गई है, और शुद्रकी वसन्तादि गुणके प्रभावसे गुणहीनता वताई गई है । ( २७ ) ' अपि वा अन्यार्थदर्शनात् ' ( २८ ) ( टुप् टीका ) - निमित्तार्थता न घटते । नहि प्रर्थाद् श्राधानं प्राप्नोति । नहि इदं लोके विज्ञायते, आधानेन श्राहवनीयादयो भवन्तीति शास्त्राद् हि अवगम्यते । तच्च विशिष्टकालकर्तृ कम् आह्वतीय-सुत्पादयति । ( निमित्त प्रथं घटित नहीं होता । अर्थसे अग्निका प्राधान प्राप्त नहीं होता । लोकमें यह नहीं जाना जाता कि - प्राधानसे

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५६८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) आहवनीय यादि अग्नियाँ हो जाती हैं । यह बात तो शास्त्रसे ज्ञात होती हैं । और शास्त्र वसन्तादि विशेषकालकतृक ग्राहवनीयको पैदा करता है । ) अन्यकाल - कर्तृकं कथमुत्पादयेत्? शास्त्रेण प्रचोदित्तत्वात् । ( भिन्नकाल - कर्तृक ग्राहवनीयको कैसे पैदा करे; क्योंकि - शास्त्रने उसकी आज्ञा नहीं दी है ) ' श्राधानोत्तरकालाः कामश्रुतयः । ( कामवाली श्रुतियाँ आधानके बादकी होती हैं । ) न च अध्ययनमेव केवलोऽभ्युपायः अग्नीनां गुणद्वय-विधानाच्च वाक्यादे: स्थित एव । बार्हदुगिरं गवामयने समाम्नायते । प्रभीवर्ती ज्योतिष्टोमे । बार्हद्रथ्यमश्वमेधे । विदेश - पाठाद् अनुदाहरणम् । ( २८ ) २६-३०-३१-३२ सूत्रों की टप - टीका नहीं मिलती है । " अपि वा वेदनिर्देशात् " ( ३३ ) ( टुप् टीका ) ' वसन्ते गर्भाष्टमे ब्राह्मणमुपनयीत ' इति वसन्तो गर्भाष्ट-मत्वम्, अन्ये च नियमा अध्ययनाङ्गम । पुरुषस्य च ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' इत्यध्ययनं चोद्यते । अत ईदृश्या विशिष्टेतिकर्तव्यतया वेदोपादान पुरुषार्थम् । ऋतुना अर्थाद् वेदोऽपेक्षितः प्रात्मनित्यर्थम् । अतः स वेदाध्ययनम् अप्रयोजयन् प्रसङ्गाद् निराकाङ्क्षीक्रियते । श्रतो यादृशमध्ययन तादृशेन निराकाङ्क्षत्वात् शूद्रस्य श्रध्ययनाऽ-भावाद् अनधिकारः - इति श्रन्तनीताभिप्राय: - सिद्धान्तवादी श्रह ( ३३ ) ( यहाँ सिद्धान्तवादीने बताया है कि - शूद्रका वेदाध्ययन नहीं होता; श्रतः श्रव्ययन - साध्य यज्ञमें भी उसका अधिकार नहीं होता । ) ( उत्तर. ) " गुणार्थित्वाद " ( ३४ ) ( टुप् टीका ) - इतरस्तु अविदिताभिप्राय ग्राह - गुणायित्वाद् इति चेत् श्रस्वङ्गमध्ययनम् ( ३४ ) (.पू. ) मीमांसादर्शनपर श्रीकुमारिलभट्टकी ' टुप् ' टीका “ संस्कारस्य तदर्थि– ” ( ३५ ) 130 1 ( टुप् टीका ) - संस्कारो विद्यार्थः । विद्या च पुरुषार्था द एव न्यायो द्रष्टव्यः ' ( ३५ ) । - इत्यत्र पूर्व उद्धरण फलतः " विद्यानिर्देशान्न " ( ३६ ) गया है । ( टुप् टीका ) - यस्य उपनयनादयः सस्कारा विहिताः भवन्तु । इतरस्तु अनुपनीतः पठिष्यति । न च ऋतु - वैगुण्यम्, तस्य दीनां पुरुषार्थत्वात् ( यह पूर्वपक्ष - सूत्र है कि जिन; उपनयना. उपनयनादि विहित किये गये हैं; वे उसके भले ही हो जावें ब्राह्मपाि आग तो बिना उपनयनके पढ़ लेगा । इससे यज्ञकी विगुणता नहीं; पर होगी मूत्र । विषयमें उपनयनादि पुरुषार्थ है ) ( ३६ ) ( पूर्वपक्ष ) ज्ञानार्थी ज्ञानापेक्षा " प्रवैद्यत्वाद् श्रभावः " ( ३७ ) प्रतिषि ( = ( टुप् टीका ) — ग्रनुपनीताध्ययने ऋतुवैगुण्यम् ( उपनयनके बिना पुरुषाणां अध्ययन करनेपर यज्ञकी विगुणता होती है ) कथम्? ( कैसे ) ' स्वाध्यादो न होनेसे ध्येतव्यः ' इति यमनियमादिभिरध्ययनं पुरुषार्थत्वेन श्रवगतम् । ताव, वेद प्रमङ्गात् कर्तृगृह्णाति । न च अन्यथानुपपत्त्या प्राक्षिपति । श्रन्यचारि इसी [ स्वाध्यायविधिप्रयुक्तविद्योपजीवनेनापि - टि. ] ग्रतो विशिष्टेन श्रध्ययनेन उपोद्घात निराकाङक्षीकृतत्वाद् अन्यादृशमव्ययनं न गृह्यते । यथा गोदोन शूद्रसहित दर्शपूर्णमासाङ्ग -प्रणयनेन नराकाङक्ष्याद् वहिः प्रणयनेन विगुणं भवति । प्राशिषः एवमिहापि अनियताऽध्ययनेन विगुणो भवति । श्रत ग्राह - मधीयानस्यापि उपायबोध अध्ययफलं न भवतीति । द्रव्यानाक्षेपिऽपि श्रयमेव न्याय: [ यहाँपर आ अनिथमपूर्वक, विना उपनयनकी विधिके पढ़नेसे विगुणता बताई गई है । मूद्रयोर्वेद तब बिना विधिके पढ़नेवालेको भी पढ़नेका फल नहीं हुआ करता है- ( स्त्री - श श्रतएवोत्त यह बताया गया है ) ( ३७ ) । ( उत्तरपक्ष ) माल्यानं ३८ वें ( उपसंहार- ) सूत्रकी टुप् टीका भी नहीं मिलती है । यह हमने श्रीकुमारिलभट्टकी टीका - जिन सूत्रोंपर मिली है, उसके भूमिका में

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[ ५६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५७० दिये हैं, इसलिए कि - विद्वानों केलिए यह संग्रह हो जाये ) । -इत्यत्र उद्धरण दे इस अपशूद्राधिकरणमें याग में शनधिकृत ही बताया पूर्व- ततः शुद्रको गया है । तस्य ( ५७ ) श्रीसायणाचार्य । उपनयना बाह्यपादिक द्यागे प्रतिपक्षीने सुप्रसिद्ध सर्ववेदभाष्यकार श्रीसायणाचा का इस पर शूद्र विषयमें यह उद्धरण ऋग्वेदभाष्यके उपोद्घातसे दिया है — ' मन्त्रह्म-हीं होगी । ज्ञानार्थी वेदेऽधिकारी । स च त्रैवर्णिकः पुरुषः । स्त्री - शूद्रयोस्तु सत्यामपि ज्ञानापेक्षायाम् उपनयनाऽभावेन अध्ययनराहित्याद् वेदे अधिकार: प्रतिषि ( ब ) द्धः । धर्मं ब्रह्मज्ञानं तु पुराणादिमुखेन उत्पद्यते । तस्मात् त्रैवर्णिक-नके दिन पुष्पाणां वेदमुखेन अर्थज्ञाने अधिकार: ' ( प्रर्थात् स्त्री - शूद्रादि उपनयन-स्वाध्यायेध न होनेसे वे वेदके शब्दों द्वारा धर्म और ब्रह्मका ज्ञान नहीं कर सकते । ताहादेव हां, वेदके प्रर्थं रूप - पुराणादिके द्वारा कर सकते हैं ) । अन्यचारि इसी प्रकार केवल ऋभा. के उपोद्घात में नहीं; बल्कि ऐ.ब्रा. के भाष्य के श्रध्ययनेन उपोद्घातमें भी श्रीसायणाचार्यने लिखा है - ' ( प्र. ) ननु एवं सति स्त्री-यो द्रसहिताः सर्वेपि वेदाधिकारिणः स्युः, इष्टं मे स्याद् - अनिष्टं मा भूद् इति गं भवति । प्राशिषः ( इच्छायाः ) सार्वजनीनत्वात् ' ( उ ) मैवम् - स्त्रीशूद्रयोः सत्यपि यानस्यापि उपायबोधार्थित्वे ( अनुपनीतत्व - ) हेत्वन्तरेण वेदाधिकारस्य प्रतिव ( षि ) द्ध-[ बहरला । उपनीतस्यैव अध्ययनाधिकारं ब्रुवत् शास्त्रम् अनुपनीतयोः स्त्री-ई गई है । शूद्रयोर्वेदाध्ययनम् श्रनिष्टप्राप्तिरिति बोधयति । ( प्र ) कथं तर्हि तयोः करता है- ( स्त्री - शूद्रयोः ) तदुपायावगमः? ( उ ) पुराणादिभिरिति ब्रूमः । श्रतएवोक्तम् – ' स्त्री - शूद्र द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारत-माझ्यानं मुनिना कृपया कृतम् ' ( भाग १।४।२५ ) । तस्माद् उपनीतैरेव वर्णिकर्वेदस्य सम्वन्ध इति । इसी प्रकार श्रीसायणने कृ.य. तै.सं. की है, उसके भूमिकामें भी लिखा है । श्रीसायणाचार्य [ ५७१ इससे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि - वेदमें स्त्री और शूद्रको वेदका अधिकार कहीं नहीं बतलाया गया । नहीं तो सर्ववेद भाष्यकार श्री-सायणाचार्य ऐसा स्पष्ट स्त्री - शूद्रोंका वेदानधिकार कभी न लिखते । स्त्री-शूद्रको ज्ञानसे सर्वथा वञ्चित भी नहीं किया गया । वही वेदका ज्ञान वे सृष्ट्या दिसे ग्रा रहे हुए पुराण आदिके सुननेसे ( तभी वेदोंने भी पुराण-इतिहासका नाम मिलता है ) प्राप्त कर सकते हैं । इस कारण इसमें ' अनुदारता ' भी सिद्ध न हुई, किन्तु उदारता ही सिद्ध हुई कि उन्हें परिश्रमसे बचाकर निचोड़ सुना दिया गया । ' अक्कं चेन्मधु विन्दत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् । इष्टस्यार्थस्य संसिद्धौ को विद्वान् यत्नमाचरेत् ' ( सांख्यतत्त्वकौमुदीमें १-२ कारिकामें उद्धृत ) जैसे किसीको समय न होनेसे सारा समाचार - पत्र न पढ़वाकर उसे उसका निचोड़ ही सुना दिया जाय । पुराणादि भी वेदके साथके और वेदार्थके उपवृ हक हैं । इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३७७-३८८ में पाठक स्वयं देखें । यह पक्षपात भी नहीं है । स्त्री और शूद्रका जन्म पूर्व - जन्मके कई विशिष्ट पापोंके कारण होता है । स्वा. द. जीने भी स्त्री - पुरुषोंके कर्मों में भेद माना है । जैसे कि - ' जो स्त्रीके शरीर - धारणयोग्य कर्म हों; तो स्त्री, और पुरुषके शरीर धारण करने योग्य कर्म हों; तो पुरुषके शरीरमें [ जीव । प्रवेश करता है । ( स.प्र. ६ पृ. १५६ ) स्त्रीकी उत्पत्तिकेलिए यह स्मृतिवचन देखिये- ' अदुष्टां विनतां भार्यां यौवने यः परित्यजेत् । सप्त जन्म भवेत् स्त्रीत्वं वैधव्य च पुनः पुनः ' ( परागर. वसिष्ठ ५1३० ) ( जो पुरुष अपनी प्रदुष्ट और अपतित स्त्रीको जवानीमें छोड़ दिया करता है; वह सात जन्म स्त्री बनता है ) । इसलिए गीता में भी शूद्र तथा स्त्रियोंको पापयोनि माना है - येपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्याः ( वेश्यापुत्राः ) तथा शूद्राः ' ( ६।३२ ) । इस पापयोनिताके कारण ही स्त्री - शूद्रोंको वेदका अधिकार नहीं दिया गया । स्वा. द. जीने वेदके प्रारम्भिक प्राप्त करनेवाले अग्नि आदि

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५७२ ] श्रीसनातनधमालोकः ( ३-२ ) चार ऋषि (? ) माने हैं । उनमें एक भी स्त्री वा शूद्र नहीं रखा, वल्कि कोई क्षत्रिय, वैश्य भी नहीं रखा । जैसे यह पक्षपात नहीं माना जाता, वैसे स्त्री - शूद्रादिके बेदविषयक अनधिकारमें भी कोई पक्षपात नहीं । स्वा.द.जीने ' ऋभाभू. ' में चार मनुष्य ऋषियोंको (? ) त्री प्रारम्भ में क्यों ज्ञान दिया? क्या यह पक्षपात नहीं? इस विषयमें स्वा. द. जीने प्रश्न और उत्तर इस प्रकार लिखा है--( प्र. ) ईश्वरो न्यायकारी प्रस्ति, वा पक्षपाती? ( उ ) न्यायकारी । ( प्र. ) तहि चतुर्णामेव [ ऋषीणां ] हृदयेषु [ वेदाः । प्रकाशिताः कुतो न सर्वेषाम् [ स्त्रीशूद्रादीनाम् ]? ( उ ) अत्राह - ' प्रत ईश्वरं पक्षपातस्य शोपि नैवागच्छति, किन्तु अनेन तस्य न्यायकारिणः परमात्मनः सम्यङ् न्यायः प्रकाशितो भवति । कुत:? न्यायेति (? ) अस्यैव नामास्ति, यो यादृशं कर्म कुर्यात्, तस्मै तादृशमेव फलं दद्यात् । अत्र एवं वेदितव्यम् -तेषामेव! चतुर्णां मनुष्य - ऋषीणां ] पूर्व- पुण्यमासीत् । न स्त्री - शूद्रादीनाम् ] अतः खलु एतेषां हृदये वेदानां प्रकाशः कर्तुं योग्योस्ति ' ( वेदोत्पत्ति - विषय पृ. १६ ) । इसका हम अनुवाद देते हैं— ( प्रश्न ) ईश्वर न्यायकारी है, या पक्षपाती? ( उत्तर ) न्यायकारी । ( प्र. ) तब फिर चार मनुष्य ब्राह्मण ऋषियोंके ही हृदयों में वेद - प्रकाशित हुए, सब [ स्त्री - शूद्रादि ] के हृदयोंमें वेद प्रकाशित क्यों न हुए? ( उ. ) इससे ईश्वर में पक्षपातका लेश भी नहीं प्राता, किन्तु इससे उस न्यायकारी परमात्माका ठीक - ठीक न्याय प्रकाशित होता है । क्योंकि-न्याय इसीका नाम है, जो जैसा कर्म करे; परमात्मा उसको वैसा ही फल दे । इनमें यह जानना चाहिए कि उन्हीं चार ऋषियोंका पिछले जन्मका पुण्य था; [ स्त्री - शूद्रादिका नहीं ] प्रत: उन्हीं ( ऋषियों ) के हृदयमें वेदोंका प्रकाश करना ठीक था । ) इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य [ पुरुषों ] के वेदाधिकार तथा तत्तद्-वर्ण - प्राप्ति में पूर्वपुण्यका कारण था; जैसा कि वैयासिकयायमाला ' का स्वामी दयानन्दजी [ ५७३ २७४ उद्धरण हम पीछे दे चुके हैं कि- ' उपनयनाध्ययनाभावेपि स्वयंभातवेदा देवाः; तादृशस्य सुकृतस्य पूर्वमुपाजितत्वात् ' ( १1३ ) ( उपनयन ही का अध्ययन न होनेपर भी देवताओंोंको वेद स्वयं प्रतिभात हो गये एवं भी ईश्व वैसा सुकृत ( पुण्य ) उन देवोंने गतजन्म में उपार्जित कर रखा; क्योंकि ' देवता ' = स्त्री - शूद्रादिको अनधिकारका कारण गत जन्मके वैसे पुण्यके था, परन्तु स्वामीजी कारण जानना चाहिये; जैसेकि - उक्त वैयासिक न्यागमाला ' में प्रभाव । इष्ट हुई, ही पूर्वके आगे कहा है- ' शूद्रस्तु तादृशसूतराहित्याद् न स्वयंभातवेदः ' ( शूद्रके वैसे पूर्वजन्मके पुण्य न होनेसे उसको वेद स्वयं प्रतिभात ( ११३ ) जीका लेट हुए ) तभी तो स्त्री - शूद्रों का द्विज - पुरुषकुलमें जन्म नहीं हुआ । नहीं कपोलक जो कि मन्त्रद्रष्ट्री स्त्रियाँ ऋषिकाए वेदमन्त्रोंपरकी अनुक्रमणिकाएँ स्वामीजी लिखी हैं, इसपर याद रखना चाहिये कि वे मनुष्यसे भिन्न ऋषियोनि- प्राश्चर्य ह वाली थीं, इस विषय में ' वेदकी ऋषिकाएं ' ' निबन्धको इसी पुष्पके ७२- स्थित अप ७ ९ पृष्ठों में देखिये । यह व्यङ्ग १ ९ ४६ प वस्त ( ५८ ) स्वामी दयानन्द जी श्रीचन्द्रका आगे वादी स्वा.द.जीके हृदयकी विशालताका परिचय देते हुए ' हिरण्यके उनसे दिये गये ' यथेमां वाच कल्याणीम् मन्त्र तथा उसका अर्थ उपस्थित किया है करते हुए उससे स्त्री - शूद्रों का वेदाधिकार सिद्ध करता है । हम उनके वयं सह मन्त्रार्थका निराकरण सम्यक्तया २-५५ पृष्ठों में कर चुके हैं । वैदिककालते है । तब लेकर स्वा. दयानन्दजीके समय तक वेदोंके बड़े - बड़े विद्वान् हो चुके हैं । पर आगे स्वा. द. जी तथा उनके पिछलगुआओं के प्रतिरिक्त अन्य किसी ने भी ' यथेमा प्रर्वदेकर वाचं ' मन्त्रसे स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकार नहीं माना; अतः स्वामीजीका में ' ब्रह्मचर अर्थं निर्मूल ही है । उत्तरार्ध इस मन्त्रका तथा अग्रिममन्त्रका जब ' ईश्वर देवता ' है; जबकि चुके हैं । यह स्वामीजी भी मानते हैं कि - " यही इस मन्त्रका ठीक अर्थ है, उच्चभाव क्योंकि — इससे अगले मन्त्र ( ' वृहस्पते! अति यदर्यः ' ) में भी परमेश्वर इत्यादि व

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[ ५७३ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५७४ ] भातवेश है, तब अग्रिम मन्त्र में ईश्वरके प्रतिपाद्य होनेसे इस मन्त्रमें नयन एवं ही का ग्रहण प्रतिपाद्य ही है, प्रतिपादक नहीं । इधर ' अनुक्रमणी ' स्थित क्योंकि भी ईश्वर ' अर्थ वादीके साम्प्रदायिक भी ' प्रतिपाद्य ' ही मानते हैं; तब 3, परन्तु ' देवता का अर्थ निर्मूल ही सिद्ध हुआ । तो ' वाच ' से जीवकी वाणी प्रभावके स्वामीजीका इष्ट हुई, परमात्माकी नहीं । ही पूर्व प्रागेवादी ' स्त्रीशूद्रो नाधीयाताम् ' के उत्तरमें स. प्र. में स्थित स्वा.द.-जीका लेख नदधृत करता हैं -- ‘ तुम कुप्रा में पड़ो; और यह श्रुति तुम्हारी मात नहीं कपोलकल्पनासे हुई है; किसी प्रामाणिक ग्रन्थ की नहीं ' । यहाँपर स्वामीजीने स्त्रियोंकी भान्ति गाली ही दी है कि- ' तुम कु'वामें पड़ो ' ब्राश्चर्य है कि - वादीने भी उसे उद्धृत कर दिया, क्या वादी ' सार्वदेशिक'-षियोनि-स्थित अपना- ' मैं निष्पक्षपात विचारशील विद्वानोंसे पूछता हूँ कि ' क्या के ७२० वह व्यङ्गपूर्ण भाषा और शैली विद्वानोंको शोभा देती है? ' ( जुलाई १ ९ ४६ पृ. २१८ ) यह अपना वाक्य भूल गया? वस्तुत: यह श्रुति ब्राह्मणभागकी है । गोभिलगृह्यसूत्रके भाष्यकार श्रीचन्द्रकान्त - तर्कालङ्कारने ( गो. २२७।१६. सूत्रके भाष्य में ) तथा देते हुए ' हिरण्यकेशी ' गृह्यसूत्रके भाष्यकार श्रीमातृगुप्त आदिने भी इसे उद्धृत उपस्थित किया है । मन्त्रभागने भी ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १६७१1१ ) हम उनके श्रयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ. ११४६।५-४ ) आदिसे यही बताया ककालते है । तब इसकी अप्रामाणिकता क्या हुई? हैं पर श्रागेवादी ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्र देकर उसपर स्वा. दयानन्दका - ' यबेमां प्रर्व देकर ' स्त्रियों का वेदाधिकार सिद्ध करना चाहता है; पर उक्त मीजी में ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' उपस्थसयम ' ही है; इस विषय में इस मन्त्रका मन्त्र उत्तरार्ध भी साक्षी है - इस विषय में हम पूर्ण - विवेचना पृ. ५५-७२ में कर जबकि चुके हैं । फिर आगे बादी लिखता है कि- " महर्षि स्त्रियों के प्रति बड़ा वार्य है उच्चभाव रखते थे; क्योंकि वे ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमाः ' रमेश्वर इत्यादि वैदिक भावनाओं को माननेवाले थे स्त्रियों , जहां को शुद्ध, पवित्र स्वामी दयानन्दजी [ ५७५ श्रर ' यज्ञाधिकारिणी ' बताया गया है । पर यह वादीकी अपनी कपोल-कल्पना है, इस मन्त्रका ऐसा अर्थ नहीं है । यह तो जलोंका प्रतिपादन करनेवाला, मन्त्र है । इसीसे इसके प्रागे जो ' प्रापः ' यह पाठ था, वादीने उसे छिपा दिया । इसकी विशिष्ट विवेचना हम पूर्व कर चुके हैं, आगे भी विशेष कर करेगे । वादी धागे लिखता है - " मनुस्मृतिके ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ' इत्यादि श्लोकोंको स.प्र. में उद्धृत करके महर्षिने लिखा है-' जिस घरमें स्त्रियोंका सत्कार होना है; उसमें विद्यायुक्त पुरुष होके ' देव ' संज्ञा धराके ग्रानन्दसे क्रीडा करते हैं ' इत्यादि; पर वह स्वामीजीका प्र स्वकल्पित है; मनुपम्मत नहीं । किसी ग्रन्थकारके वाक्यका अर्थ उसके पूर्वापरको देखकर जात होता है; केवल उसी वाक्यसे पूर्ण अयं ज्ञात नहीं होता । " येन उपक्रम्यते येन च उपसंह्रियते स वाक्यार्थः यह न्याय हमा करता है । ( जिससे उपक्रम ( प्रारम्भ ) होता है, और जिससे उपसंहार ( समाप्ति ) होता है, वही वाक्यका अर्थ हुआ करता है । ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' से पूर्व ' पितृभिर्भ्रातृभिश्चैनाः पतिभिर्देव-रैस्तथा । पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभि: ' ( ३।५५ ) यह पद्य है । ' शोचन्ति जामयो यत्र ' ( ३।५७ ) ' जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रति-पूजिता: ' ( ३।५८ ) ये मध्यके पद्य हैं । ' तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छा-दनाशनैः । भूतिकामं ने रैनित्यं सत्कारेपूत्सवेषु च ' ( ३।५६ ) यह उपसंहार-का पद्य है । प्रणेताको उपसंहारका ही अर्थ इष्ट हुआ करता है; क्योंकि-वह उससे पूर्वकी बातों को अन्तमें संक्षेपसे कह देता है, इसको न्यायशास्त्र में ' निगमन ' कहा है; उसका लक्षण भी ' हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ' ( १।१।३६ ) यही किया गया है । तो श्रीमनुजी को यहां यह इष्ट है कि- स्त्रियों को विवाहादि उत्सवों के अवसरमें खाना - पीना, कपड़ा - गहना आदि देकर सम्मानित करना चाहिए । जहाँ स्त्रियोंको भूषण कपड़ा

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५७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) आदि देकर उन्हें सम्मानित न किया जायगा, इस कारण वे शोकमग्न रहेंगी; और उस घरको शाप देंगी; वह घर नष्ट हो जाता है — यह आशय है । यही वहाँ स्त्रियोंकी पूजा बताई गई है । न तो स्त्रियोंकी पूजा यह है कि उन्हें ' नमस्ते किया करो; न ही यह किं- उनके पैरोंमें पड़ा करो; यहाँ वेदादि पढ़ाना इष्ट है । वादी लोग इन पद्योंको देकर न ही उनका श्राह्ला ' गाया करते हैं । आगे जो वादीने ' पञ्चायतन-' अपने मनकी पति और पुरुषकेलिए पत्नी पूजनीय है ' पूजा ' से स्वामीजीका ' स्त्रीकेलिए उद्धृत किया हैं; यह वहाँ ' पूज्यो देववत् पतिः ' । ' विशीलः यह वाक्य परिवर्जितः । उपचर्यः स्त्रिया साध्या ] सतत देववत् कामवृत्तो वा गुणैर्वा पतिः ' ( ५।१५४ ) इम मनुपद्यका अर्थ है, इसमें ' पुरुषकेलिए पत्नी पूजनीय है ' यह वाक्यार्थं स्वामीजीने स्वयं प्रक्षिप्त किया है । श्रथवा यदि यह ' पितृभिर्भ्रातृभिश्चैता: ' इस मनुपद्यका अर्थ है; तो उसका भाव हम पूर्व दिखला ही के हैं । ( ५ ९ ) स्वामी दयानन्द और अछूत । थागे वादीने ' रौमा रौलां ' आदि पाश्चात्योंकी स्वामिप्रशंसासूचक सम्मति उद्धृत की है । जबकि दिखला दिये; अंग्रेजी शराब स्वामीजीकी प्रशंसा क्यों न सहानुभूति दिखलाई गई है; रौलां ' ही जानें; पर हमें तो यह विचार मिले हैं— ' शूद्र- नीच लोग जूठा कर स्वामीजीने पाश्चात्योंके ही सिद्धान्त वेदसे वेदकी शीशीमें वन्द दिखला दी; तो वे करते? जो अस्पृश्योंसे स्वामीजीकी यह ठीक है या नहीं - यह तो ' रोमा स्वामीजीके शूद्र वा अन्त्यजोंके सम्बन्धमें देते हैं ' ( स.प्र. ११ पृ. २०२ ) साधु - सन्तों को लेके शूद्र और अन्त्यज पर्यंन्त एक पंक्तिमें बैठकर एक - दूसरेका जूठा भोजन करते हैं... महा अनाचार है ' ( पृ. २०२ ) । तब वे अन्धे उस स्वामी दयानन्द और अछूत भङ्गी चमार आदि नीचके पगोंमें पड़के कहते हैं पू ७८ ' कवीर तब ऊट - पटांग भाषा बनाकर जुलाहे श्रादि नीच ( स.प्र. २ पृष्ठ १६ लगा ' ( स.प्र. ११ पृ. २२८ ) यहां पर स्वामीजीने लोगोंको स समन्हाने ) कानि शूद्र, भंगी यहांपर तथा जुलाहा आादियोंको नीच माना है ।, चमार, माना भङ्गी नदियोंके भोजन खानेकी भी स्वामीजीने जैसे कि - ' ( प्रश्न ) कहो जी, मनुष्यमात्रके हाथकी की हुई मनाही रसोईके की है; जैसे क्या दोष है? क्योंकि ब्राह्मणसे लेके चाण्डाल- पर्यन्तके शरीर खाने में ' बाबुस्प चमड़े हैं; और जैसाँ रुधिर ब्राह्मणके शरीर में है; वैसा हाड - मांस सेवनीय आदिके; पुनः मनुष्यमात्रके हाथकी पकी हुई रसोईके खानेमें ही चाण्डाल | से आय है? ( उत्तर ) दोष है; क्योंकि जिन उत्तम पदार्थोंके क्या दोष भंगियो खाने - पीनेसे ब्राह्मण और ब्राह्मणीके शरीर में दुर्गन्धादि दोष रहित रज - वीयं क्र उत्पन्न होता है, वैसा चाण्डाल और चाण्डालीके शरीरमें नहीं, क्योंकि प्रन्त्यज ' चाण्डालका शरीर दुर्गन्धके परमाणुत्रोंसे भरा हुया होता है । इसलिए कि - ख ब्राह्मणादि उत्तम वर्णोंके हाथका खाना, और चाण्डाल आदि नीच भङ्गो- जायगा चमार आदिका न खाना ' ( स.प्र. १० पृ. १६ ९ ) यहां भी स्वामीजीने ( स.प्र. भङ्गी - चमार आदिको नीच माना है. तथा उनके भोजनका निषेत्र भोलेभ किया है । मान भ तथा ' शूद्र के पात्र तथा उसके घरका पका हम्रा अन्न आपत्कालके बिना न जातिभ खावें ( स.प्र. १० पृ. १६६ ) यहाँ स्वामीजीने शूद्रके घरके पात्र तथा 6 भोजनको भी अस्पृश्य माना है । ' देखो इन ' गवगण्ड पोपों ' की लोला कि- जो वेदविरुद्ध महा अधर्मके काम हैं, उन्हीं को श्रेष्ठ, वाममानियोने ग्राम्र मनुष्य माना है ।... परन्तु अर्थात् जिन नीच स्त्रियोंको छूना नहीं [ लिखा ]; उनको जाति प्रतिपवित्र उन्हों ( वाममार्गियों ) ने माना है; जैसे- शास्त्रोंमें रजस्वता अन्त्यज [ रजस्वला, चाण्डाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] श्रादि स्त्रियोंके सर्व- तथा स ० ध ० ३७ इतनी

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ५७४ ५७८ ] है, उनको अतिपवित्र उन्होंने माना है । ( स.प्र. ११ पृ. १७७ ) समन्हाने १६ ) का निषेध चाण्डाल, यहाँ पर स्वामीजीने , चमार, माना है । चाण्डालका अर्थ अन्त्यज ' ' किया है । अर्थ यजुर्वेद की है; जैसे कि उनके के खाने ' वायुस्पर्शाय चाण्डालं परासुव ड्राड - मांस सेवनीयः । ( वायुके स्पर्शके चमकार आादियोंके स्पर्शका निषेध शास्त्रीय स्वामीजीने ' भंगी ' किया है; ' पुत्रकम ' का उनके शरीरकी वायुको प्रस्पृश्य माना है , भाष्य में - ' वायवे चाण्डालम् ' ( ३०।२१ ) , चाण्डालस्य शरीरागतो वायुदु गन्धत्वान्न अर्थ भंगीको दूर कीजिये । भंगीके शरीरमें चाण्डाल से आया वायु दुर्गन्धयुक्त होनेसे सेवनेयोग्य नहीं होता ) । यहाँ स्वामीजीने क्या दोष भंगियोंको अस्पृश्य माना है । ने - पीनेसे कुछ उनके अन्य उद्धरण भी देखिये- ' इन्होंने अंग्रेज, यवन, यं उत्पन्न अन्त्यमा दिसे भी खाने - पीने का भेद नहीं रखा । इन्होंने यही समझा होगा क्योंकि कि - खाने - पीने और जातिभेद तोड़नेसे हम और हमारा देश सुधर इसलिए जायगा, परन्तु ऐसी बातोंसे सुधार तो कहां; उल्टा बिगाड़ होता है ' चभङ्गो. ( स.प्र. ११ समु. पृ. २४१ ) ' यह जातिभेद नहीं तो क्या है? और तुम मीजीने भोलेभालोंको बहकाते हैं कि- हममें जातिभेद नहीं । तुम अपनी मूर्खता से निषेत्र मान भी लेते हो ' ( ११ समु. पृ. २४२ ) यहांपर स्वा. द. जीने जातिभेद तोड़ने तथा अन्त्यजोंसे खाने - पीने से देशका बिगाड़ माना है । अन्त्यजादि बिनान जातिभेदको स्वामीजीने ईश्वरकृत माना जैसे कि -मात्र तबा ' जैसे पशुओं में गो, अश्व, हस्ति आदि जातियां, वृक्षोंमें पीपल, वट, की लीला ग्राम्र श्रादि जातियाँ... जल - जन्तुनोंमें मकरादि जातिभेद हैं, वैसे ही मानियोने मनुष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद ईश्वरकृत हैं । परन्तु मनुष्यों में ब्राह्मणादिको सामान्य जाति में नहीं, किन्तु साजान्यविशेष-उनको जातिमें गिनते हैं ' ( स.प्र. ११ पृ. २४१ - २४२ ) यहाँपर स्वामीजीने. रजस्वला अन्त्यको शूद्रसे भिन्न जाति माना है; और उसे सामान्यविशेष जाति; कस्पर्श-तथा उसके जातिभेदको ईश्वरकृत माना है । स्वामीजीने चाण्डालोंसे इतनी छुआछूत की है कि - स.प्र. के ४ र्थं समुल्लास ४८ वें पृष्ट में ' चाण्डाली स्वामी दयानन्द और श्राजके विद्वान् [ ५७६ श्रादि श्रन्त्य नामवाली कन्याके साथ विवाह भी निषिद्ध कर दिया है । यह है स्वामीजीकी शूद्र - अन्त्यजादि जातियों के प्रति ' उदारता ' । आगे रोमारोलां साहबके लेखसे स्वामीजीकी स्त्रियोंसे सहानुभूति भी वादीने दिखलाई है । श्रव स्वामीजीके स्त्रियोंके सम्बन्धमें विचार भी सुनें - ' स्त्री स्वतन्त्र न होवे, क्योंकि स्त्रीका स्वभाव चञ्चल होता है; इससे कुमार्गमें चलेगी; और धनादिकों का नाश भी करेगी ' ( प्रथमावृत्ति सत्यार्थप्रकाश ४ समु. पृ. १०५ ) । वर्तमान - ' सत्यार्थप्रकाश ' में भी देखिये- ' स्त्री - पुरुषकी कामचेष्टा तुल्य अथवा पुरुषसे स्त्रीकी [ कामचेष्टा ] अधिक होती है ' ( ११ समु. पृ. २३६ ) प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होता है ' ( ४ समु. पृ. ४७ ) प्रायः स्त्रियोंको प्रिय वह होता है, जो ' स्त्रैण अर्थात् स्त्रीभोगमें फंसा है ' ( ११ समु. पृ. २३४ ) इत्यादि । आगे जो ' जातिभेदकी मूर्खता ' जर्मन विद्वान् के अनुसार स्वामी-जीके मत में बताई गई है, यह भी ठीक नहीं । जातिभेदकी वश्यकता स्वामीजी. मान गये हैं; हम उनका उद्धरण पहले ले चुके हैं- ' परन्तु इन लोगों ( ब्राह्मसमाजी और प्रार्थनासमाजियों ) ने साइयोंके आचरण बहुतसे लिये हैं 1... इन्होंने यही समझा हो, कि खाने - पीने और जातिभेद तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जायगा, परन्तु ऐसी बातों सुधार तो कहीं, उल्टा विगाड़ होता है ( स.प्र. पृ. २४१ ) यहाँपर स्वामीजीने जातिभेद तोड़ना देशको हानिप्रद तथा ईसाइयोंका श्राचरण है 1 ( ख ) स्वा. दयानन्दजी और ग्राजके विद्वान् । आगे वादीजीने ' यथेमां वाचं ' मन्त्रसे शूद्रादिके वेदाधिकार - समर्थनमें श्रीसत्यव्रतसामश्रमी, स्वामी हरिप्रसाद वैदिकमुनि, स्वामी भगवदाचार्य

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५८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( रामानन्दी ) प्रादिके उद्धरण दिये हैं; पर ये लोग अधिकांश आर्यसमाजी विचारवाले हैं; अतः उनके उद्धरण ' साध्य ' हैं ' सिद्ध ' नहीं । अतः उनका भी मूल्य नहीं । जिस व्यक्तिपर जिसकी श्रद्धा हो जाती है; फिर कुछ यदि वह किसी मन्त्रका प्रशुद्ध भी अर्थ करे; यदि अपने भी वैसे विचार हो जाएं तो उस अशुद्धि की ओर वह श्रद्धालु पुरुष ध्यान नहीं देता । इस प्रकार श्रीसत्यव्रत - सामश्रमीकी उक्त मन्त्रार्थपर उपेक्षा भी समझ लें । ' शूद्रस्य वेदाधिकारे साक्षाद् वेदवचनमपि प्रदर्शितं स्वामि-दयानन्देन ' यह सामश्रमीका वचन यह सिद्ध करता है कि यह स्वा. दयानन्दका वैयक्तिक मत है; सामश्रमीको इसका ऐसा अर्थ इष्ट नहीं - यह स्वाद के नामग्रहणसे सूचित होता है । सो हमने जब स्वा. दयानन्दजी के अर्थका खण्डन कर दिया है; उसका उद्धार किसीके भी द्वारा नहीं किया गया; तो ' गर्भिणी- हनने गर्भ हननवत् ' न्यायसे उनके अनुयायियों का भी उक्त श्रर्थं खण्डित हो गया । स्वा. द. से पूर्व यदि इस मन्त्रका किसी वैदिक विद्वान्ने स्त्रा. द. वाला अर्थं किया होता; तब तो उस अर्थका कुछ महत्त्व भी था; पर वादीने वैसा दिखलाया नहीं । स्वा. द. जीके बाद कई उनके पिछलगुझने यदि भेड़ाचालकी भान्ति ऐसा अर्थ कर दिया है; वा वैसी लकीर पीट दी है; तो उसका कुछ भी महत्त्व नहीं । ' वमं कर्षतु पुरः परमेकः, तद्गतानु-गतिको न महार्घः ' ( एक कोई पहले किसी मार्गको पकड़ ले, तो फिर भेडाचालकी तरह उसके पीछे चलनेवालोंकी कमी नहीं होती ) । ( नैषध. ) ( ६० ) " भारतीय - धर्मशास्त्र " की ग्रालोचना । ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' इस पुस्तक ( जिसपर द्यालोचना हम आगे करनेवाले हैं ) के प्रणेताने अपनी ' उदारतम श्राचार्य दयानन्द ' पुस्तक में श्री शाण्डिल्यजीके जिनके पूर्वपक्ष इस पुस्तकमें प्राये हैं- ' भारतीय धर्मशास्त्र ' भारतीय - धर्मशास्त्रको आलोचना के भी कुछ स्त्री - शूद्रादि सम्बन्धी उद्धरण दिये हैं १८२ करते हैं ।, हम उनपर भी वि भी लिय वादीने श्रीशाण्डिल्यजीकी पुस्तक ' भारतीय ' वेदाधिकार विषय ' को ' प्रत्युत्तम विद्वत्तापूर्ण लिखा धर्मशास्त्र ' में ि लेखको ' प्रत्युत्तम ' माना है । हम भी उनके लेखकी हुआ तवा सिद्ध फलहो आलोचना कर देना उचित समझते हैं । -श्रीशाण्डिल्यजी लिखते हैं- ' वेद भी प्रभुका निःश्वास ही यज्ञ- = कारण सभीकेलिए पठनीय है । वेदके ईश्वरीय ज्ञान या वाणी हे नहीं । ' होने में सब एक मत हैं ।... जब धर्मका अधिकारी मानव है; तो धर्मबोबड दे नहीं, यह ग्रन्थका अधिकारी भी तो मानवमात्र है ' । यह ठीक नहीं । धर्मके नानाभेद होनेसे सब धर्मो में सब मानह जिनके माना है ग्र अधिकार नहीं हो जाता । ' जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नानाषक श्रीपाणि ॥ पृथिवी यथोकसम् ' ( अथर्व १२।१।४५ ) इसमें मनुष्य नाना- धर्मोव बताये गये हैं । वेदका प्रमुख विषय यज्ञ है । पर सब यज्ञोंमें भी न त्रिविधा १२ में मानवोंका अधिकार नहीं । ' राजसूय ' - यज्ञ ब्राह्मण नहीं कर सकता । क्षत्रिय व ' ब्रह्मसव ' में क्षत्रिय अधिकारी नहीं हो सकता । ' वैश्यस्तोम ' में वे अधिका अतिरिक्त अन्य अधिकारी नहीं । शूद्रको वैदिक यज्ञका अधिकार हो । पाणिपी है ( मीमांसा. २।३।३ ) ६।१।२५-३८ ) वैदिक - म इस विषय में वैसे तो बहुत ही प्रमाण हैं; पर इसमें हम दि भत वादिमान्य ' मनुस्मृति ' का भी प्रमाण देते हैं - ' याजनाध्यापने नित्यं इतरस्या संस्कृतात्मनाम् । प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादपि अन्त्यजन्मनः ' ( १०१११० ) इस इस पद्यको किसीने भी प्रक्षिप्त नहीं माना । यह पद्य प्रतिग्रहकी निन्दित पुस्तक में बता रहा है । तु इसका अर्थ यह है कि - वैदिक यजन तथा वेदाध्ययन संस्कृतात्मा - रीतास्त जिसका श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीतुलसीरामस्वामीने ' उपनयनादिके संकासेच्छा बाले द्विजोंका ' यह श्रर्थं लिखा है - हुआ करता है, पर प्रतिग्रह तो क्षत्रियां