सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 41–50

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 41–50

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२५ २६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) T द्य savitarantee ईश्वर नहीं है । वह ईश्वर उस मन्त्रका ऋषि ( प्रतिपादक ) नहीं; वह तो उस मन्त्रका देवता प्रतिपाद्य है । तब उस रो ( प्रतिपाद्य ) परमात्माकी वाणी यहाँ इष्ट नहीं हो सकती । i ' तब इस मन्त्रसे ईश्वरके प्रति ऋषि द्वारा यह प्रार्थना की जा रही है । कि - ' कि है ऋतप्रजात! ( यज्ञार्थं प्रजात इति वेङ्कटमाधवः ) यज्ञकी पूर्ति गी के लिए प्रकट हुए बृहस्पति! बृहती भूतसाधनी वाक् ' दीयतां भुज्यताम् ' द वाणी स्वामी उसका प्रयोग करने वाले ईश्वर! ( वाग् वै बृहती ) जिस प्रकार मैं यजमान - ऋषि यज्ञमें ' दीयतां भुज्यताम् ' इस मनुष्योंको सुखी करनेवाली वाणीको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपने पराये सभीके प्रति कह सकूं... इस प्रकारका चित्र धन मुझे दीजिये ( तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ) यह बात अग्रिम मन्त्रमें कही है — क्योंकि इन दोनों ही मन्त्रों का देवता ईश्वर है । ( २६ ) यहाँ ' दीयतां भुज्यताम् ' इसी यज्ञमें कही जाने वाली वाणी-का बोध होता है, इसमें लिङ्ग है ' इहे यज्ञे दक्षिणायै दक्षिणाया दातुः ' 1 ( षष्ठ्यर्थे चतुर्थी ) । भाव यह है कि ऋषि लोग बड़े - बड़े यज्ञ किया करते कासे थे, उनमें सबको खूब दिल खोलकर भोजन कराया जाता था; चाहे वे ब्राह्मण हों, वा शुद्रादि । उन सबको इष्ट वस्तुएं भी दी जाती थीं । जैसे I कि- जाम्बूनदं ' कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा । दरिद्राय द्विजायाऽथ T: हस्ताभरणमुत्तमम् । कस्मैचिद् याचमानाय ददी राघवनन्दन: ' ( वाल्मीकि-से रामायण १।१४।५४-५५ ) ' दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च ' ( १ । १४ । १४ ) । उन यज्ञोंकेलिए बहुत धन - दक्षिणा की आवश्यकता पड़ती थी, जिससे सब अन्न - वस्त्रादि खुले तौरसे दिया जा सके, इसलिए ऋषि लोग ईश्वरसेवा कभी राजासे प्रार्थना करते थे । जैसे कि इस विषय में एक मन्त्र देख लीजिये - ' नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र! दक्षिणा मघोनी । शिक्षा स्तोतृभ्यो माइतिधग्, भगो नो, बृहद् वदेम विदथे सुवीराः ' ( ऋसं. २।११।२१ ) इसमें ऋषि द्वारा धनकेलिए प्रार्थना की गई है कि हे यथेमां वाचं कल्याणीम् { २७ इन्द्र! हमें इतना धन दो कि हम विदय - यज्ञ ( निघण्ट 1१७ ) में ' वृहद वदेम ' बड़ा बोल बोल सकें अर्थात् ' दीयतां भुज्यताम् ' यह बड़ी वाणी ( वृहती ) बोल सकें । श्री दुर्गाचार्यने भी निरुक्तमें हम मन्त्रका यही भाष्य किया है- ' सा दक्षिणा यजमानाय प्रतिदुग्धाम् धनं नोऽस्तु येन किं कुर्याम? वृहद वदेम - महद् ऊर्जित बदेम - दीयतां भुज्यतामिति, क्व? विदथे - यज्ञे ' ( निरु. ११७१ ) यह मन्त्र संहितामें बहुत बार श्राया है । इसी प्रकार ' अस्मभ्यं तद् वसो! दानाय राधः ( धन ) समर्थयस्व बहु वसव्यम् । इन्द्र! यचित्रं श्रवसा अनुद्यन् ( प्रतिदिनं ) वृहद बदेम विदथे सुवीराः ( ऋसं. २1१३।१३ ) इसका भी वही पूर्व जैसा अर्थ है । ( २७ ) इस मन्त्रका चौथा पाद ' वृहद् वदेम विदथे सुवीरा: ' बहुत स्थानों में आया है । श्री सायणाचार्यने प्राचीन भाष्यकार श्रीवेंकट माधवने भी २ १ १६ मन्त्रमें इसका यही प्रयं किया है - ' राति दानम् उदाराः प्रयच्छन्ति... ' यज्ञे दीयतां भुज्यताम् ' इति वृहद् वचनं वदेम सुपुत्राः । ' इस प्रकारके सभी मन्त्रों में धनकी प्रार्थना की गई है; उसका कारण पूर्व बताया जा चुका है । धन होनेसे ही बड़ा बोल बोला जाता हैं । इस कारण इस मन्त्रसे अग्रिम मन्त्र ' वृहस्पते प्रति ' में द्रविण ( धन ) माँगते हुए उसे ‘ क्रतुमत् ' कहा है - ‘ क्रतवः - यज्ञा विद्यन्ते येन तत्, येन यज्ञा: क्रियन्ते, तादृशं धनं देहि ' अर्थात् ऐसा चित्र, द्यमत्'- चमकदार धन दो जिससे यज्ञ सम्पादित किये जाते हैं । इसी प्रकार यथेमां वाचं कल्याणी ' मन्त्रमें भी यह बात है । यजमान ऋषि ' प्रियो दक्षिणाया दातुरिह भूयासम् ' इसीलिए कहता है कि मैं इह इस यज्ञ में दक्षिणादाताका ऐसा प्रिय बन जाऊं, मेरी यह धनादि - प्राप्तिकी कामना पूर्ण हो जाय, और वह धन मेरे पास उपस्थित हो जाय, जिससे मैं यज्ञ में ' दीयतां, भुज्यताम् ' यह कल्याणी वाणी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अपने एवं परायेकेलिए कह सकूं । ( २८ ) यज्ञकी विशेषता यह होती है कि उसकी समाप्तिमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र अपना पराया आदि जो भी आवे; उसे यज्ञशेष ( भोजन ) खिलाया

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२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जावे । जो - जो भी मांगे, उसे वही दिया जाय । इस वाणी ' दीयतां भुज्यताम् ' को भूतसाधनी भूतवशीकरणी इसलिए कहा है कि इससे अपने तथा पराये नभी वश हो जाते हैं । यज्ञ ही उनके वश करनेका समय होता है, ' यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति ( नारायणोपनि. ७६ ) इसलिए महाराज - दशरथके किये यज्ञकेलिए कहा गया है- ' ब्राह्मणा [ त्रैवणिकोपलक्षणम्, द्विजत्वात् इति रामाभिराम: ] भुञ्जते नित्यं, नाथवन्त ( शुद्रा इति रामाभिरामः ) श्च भुञ्जते । तापसा भुञ्जते चापि श्रमणा ( संन्यासिन ) श्चापि भुञ्जते ' ( वाल्मी. १।१४ / १२ ) वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्री- बालाश्च तथैव च ' । ( १३ ) दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च ( १४ ) । महाभारत सभापर्वमे भी यज्ञके समय यही कहा है- " श्रामन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान् भूमिपानथ । विशश्च मान्यान्, शूद्रांश्च, सर्वानानयतेति च ' ( २।३३।४१ ) यहाँ शूद्रांको भी खाने प्रादिकेलिए बुलाना कहा है । फिर ' भुञ्जतां चंव विप्राणां वदनां च महास्वनः । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् । दीनां दीयनामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवं प्रकाराः संजल्पाः ( वाचः ) श्रूयन्ते स्मात्र नित्यशः ' ( ३३।५०-५१ ) । इस प्रकार वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्डमें अश्वमेघयज्ञमें भी कहा गया है- ' दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् ' ( ६२८५,८८ ) । इस प्रकार महाभारत प्राश्वमेधिक पर्व में भी ऋषि अगस्त्यका द्वादश वार्षिकी दीक्षा में भी कहा है- ' अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः ' ( १४/१२/१३ ) ' विमत्सरः ' का भाव यह है कि- प्रन्न देनेमें ब्राह्मण और शूद्रादिकमें भी पक्षपात नहीं करता था । इसलिए उन लोगोंको बुलाया जाता था कि- ' पञ्चजना! मम होत्रं जुषध्वम् ' ( ऋ. १०।५३।४ ) इसे प्रागे स्पष्ट किया जावेगा । फलत: ‘ इमां कल्याणीं वाणीं जनेभ्य श्रावदानि, ब्रह्मराजन्याभ्यां, शूद्राय च, अर्याय, स्वाय च, अरणाय च ' मन्त्रकी ' वाचं ' से वही ' दीयतां भुज्यताम् ' आदि यज्ञमें कही जाती हुई भूतसाघनी वाणी ही ब्राह्मणादि-यथमा वाच कल्याणम् [ २ ९ ३० शूद्रान्तोंको कहना इष्ट है; वेदवाणीका उनको अधिकार देना इष्ट नहीं । यजुर्वेदका यह २६ वाँ अध्याय यज्ञ - प्रतिपादक है । जैसे कि उवटने भी कहा है – ' अग्निष्टोमाग्नि सौत्रामण्यश्वमेध - सर्वमेध - पितृमेध प्रवयोंप- अव प्रत पनिषत्सम्बद्धा मन्त्रा व्याख्येयाः; ते इह उच्यन्ते ' । २६ वां अध्याय श्रश्व-मेध तथा अग्निष्टोमका शेष परिशेष है; इसलिए इसे ' खिल ' कहा जाता प्राथ है । तो अन्तिमकर्ममें दूसरोंको अन्नदान दक्षिणादानादि दिया जाता है । प्रक फलतः ‘ यथेमां वाच ' में वही ' दीयतां भुज्यता ' वाली याज्ञिक वाक़ हो कह इष्ट है; वेदवा नहीं । देने उप इस मन्त्रमें ' इमां कल्याणीं वाचमावदानि ' ' श्रावदानि ' में लोट्कार है; जो ' लोट् च ' ( पा. ३।३।१६२ ) ' प्राशिषि लिङ्नोटी ' ( ३।३।१७३ ) वक्त इन सूत्रोंसे प्रार्थना वा श्राशी: अर्थमें है । उसका अर्थ है - ' मैं कहूं ' । भी ' मैं कहता हूँ यह अर्थ ' आवदानि ' का नहीं हो सकता, क्योंकि - ' श्रावदामि ' इस प्रकार लट्लकार यहाँपर नहीं कहा गया । अर्थ भा यहाँ लट्लकारका आनभुज विवक्षित नहीं; किन्तु लोट्लकारका ही है । इसीके प्रमाणस्वरूप यहाँ देखिये कि उसके साथ वाली सभी क्रियाएं भी वैसी हैं- ' प्रवदानि, कैस भूयासम्, समृध्यताम्, उपनमतु ' । यह सभी लोट् वा लिङ् की समानार्थक क्रियाएं हैं । अब इन क्रियानोंके कर्म देखिये - ' इमां वाणीमावदानि ' बुद्धि यह मैं इस वाणीको कहूं, ' इह प्रियो देवानां भूयासम् ' इस यज्ञ में मैं दे दीपि का प्यारा बनूं, ' दक्षिणायै दातुः प्रियो भूयासम् ' यज्ञमें दक्षिणा देनेवालेका उर्व मैं प्यारा धनूं । ' अयं मे काम: समृध्यताम् ' यह मेरी कामना पूरी होवे । प्रका ' माम् मद उपनमतु ' यह फल वा धन मेरे पास प्राप्त हो । प्रति ( २ ९ ) ' आलोक ' पाठकोंने यह अनुभव किया होगा कि — पूर्व - उत्तर कहूं, सभी क्रियाए समान अर्थ वाली हैं । अब यह प्रार्थनाएं किसके प्रति की मनः जा रही हैं - यह विचार उपस्थित है । उसका उत्तर ' देवता ' देता है । आप देवता है इस मन्त्रका ' ईश्वर ' । तो यहां सभी प्रार्थनाएं वा आशीष परमात्मासे वा राजासे मांगी जा रही हैं, क्योंकि प्रतिपाद्य वही ईश्वर है । जिस बदल

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२ ९ ३० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ययेमां वाचं कल्याणीम् [ ३१ अब शेष रह गया इन प्रार्थना क्रियाओं का कर्त्ता, तो कर्ता अथवा इनका पि- प्रतिपादक हुआ ऋषि ' लोगाक्षि ' । सो वह लोगाक्षि ऋषि ही परमात्मासे नव- प्रार्थना कर रहा है कि- ' हे ईश्वर! मैं यज्ञमें ' दीयतां भुज्यताम् ' इस ता प्रकारकी वाणीको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अपने वा परायोंको कहनेवाला बनूं, मैं यज्ञ के स्वामी देवताओंका तथा यज्ञमें सहायक दक्षिणा हो देनेवाले का प्यारा बनूं, मेरी यह कामनाएं पूरी हों, मेरे आगे धन आकर उपस्थित हों । कार अब पाठकोंने यह भली भान्ति समझ लिया होगा कि इस मन्त्रका ३ ) वक्ता ईश्वर नहीं, तथा हो सकता भी नहीं । तब ' वाच ' से ' ईश्वरकी वाणी ' भी विवक्षित नहीं; क्योंकि वह प्रकृत नहीं, किन्तु याज्ञिकी ' दीयतां, मि ' भुज्यताम् ' रूप यजमानकी प्रकृंत वाणी ही विवक्षित है । यह बात सोलहों का आने वाली पैसे ठीक है । जब ईश्वर इस मन्त्रमें ' देवता ' अथवा प्रतिमाद्य नहीं हैं, क्योंकि - ' देवता ' शब्द मन्त्र - प्रतिपाद्यमें रूढ होता है, तो वह प्रतिपादक नि, कैसे हो सकता है? यह बहुत मोटी बात है, आश्चर्य है कि- वादियोंकी र्यक बुद्धि क्यों न समा सकी! इसमें पहले यम यमी वा पुरूरवा - उर्वशीके सूक्तसे नि ' यह बात उदाहृत की जा चुकी है । इसी कारण ' सर्वानुक्रमणी ' की वेदार्थ-नों दीपिका पडगुरुशिष्यने कहा है- ' इति ऐलस्य पुरूरवसो वाक्यम्, शिष्टा नक का उर्वश्या बाक्यम् । यस्य वावयं स ऋषिः; या तेन उच्यते सा देवता ' । इस । प्रकार प्रकृत - मन्त्र में भी जब ईश्वर देवता है, तो वह प्रतिपाद्य ही होगा-प्रतिपादक कैसे हो? क्या वादी नहीं सोच सकते कि मैं यह वाणी लोगों को तर कहूं, मैं देवताओंका प्यारा बनूं, दक्षिणादाताका प्यारा बनूं, यह मेरी की मन: कामना पूर्ण हो, वह धनादि मुझे मिले ' इस प्रकारकी प्रार्थनाको है । आप्तकाम वा समर्थ ईश्वर दूसरेके प्रति कैसे कर सकता है? गोष ( ३० ) श्रव हम इस विषय में ऐसा प्रवल प्रमाण उपस्थित करते हैं-जिसे सभी वादी स्वीकार करेंगे, और फिर ' यथेमां वाच ' के अर्थको कभी बदलने में सक्षम न हो सकेंगे- ' आलोक ' पाठक यह बात सावधानता से देखें-' यथेमां बाचं कल्याणीम् ' यह शुक्ल यजुर्वेद माध्यं ० संहिताके २६ वें अध्यायका द्वितीय मन्त्र है । आर्यसमाजके मूलभूत ' वैदिक यन्त्रालय अजमेर में प्रकाशित मूल यजुर्वेद संहितामें इसका ' ईश्वर ' देवता लिखा है । उससे अग्रिम मन्त्र वहां है- ' बृहस्पते! प्रति यदर्यो... तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ' ( २६।३ ) इस मन्त्रका देवता भी आर्यसमाज से छपाई हुई उसी मूल यजुर्वेद संहितामें ' ईश्वर ' माना गया है । तब यदि २६।३ मन्त्रमें ईश्वर, देवता होनेसे प्रतिपाद्य है, तो उससे पूर्वके २६।२ मन्त्रमे भी ईश्वर ' देवता ' होनेसे प्रतिपाद्य ही होगा । यदि ' बृहस्पते... तदस्मासु द्रविणं हि चित्रम् ( २६।३ ) मन्त्रमें ईश्वर प्रतिपादक है, तो ' यथेमां वाचं ' ( २६।२ ) में भी देवता ' ईश्वर ' होनेसे ईश्वर प्रतिपादक होगा । स्वा. द. जीने ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' के अधिकारानधिकार- विषय ३३१ पृष्ठमें संस्कृत तथा हिन्दी भाषामें यह लिखा है- ' अस्य । यथेमा-.मिति मन्त्रस्य ] प्रयमेव [ ईश्वर - सम्बन्धी ] प्रयस्ति, कुत:? ' बृहस्पते! श्रति यदर्यः ' ' इत्युत्तरस्मिन् मन्त्रे हि ईश्वरार्यस्यैव प्रतिपादनात् ' - ' यही इस [ यथेमाँ ] मन्त्रका अर्थ ठीक है, क्योंकि इससे अगले मन्त्र ' वृहस्पते प्रति ' में भी परमेश्वर ही का ग्रहण किया है ( पृ. ३३२ ) । यदि स्वामी जी ऐसा स्वीकार करते हैं, तो वे ' वृहस्पते अति ' मन्त्रमें भी ईश्वरको प्रतिपादक क्यों नहीं मानते? यदि स्वामीजी ' बृहस्पते! प्रति ' इस मन्त्रके अनुरोधसे ' यथेमां वाचं ' मन्त्रको भी ईश्वरविषयक ही मानते हैं, तो जिस प्रकार वे अपने भाष्यमें ' बृहस्पते! ' इस मन्त्रम ईश्वरको प्रतिपाद्य मानते हैं- जैसे कि उनका भाष्य आगे उद्धृत किया जावेगा, वैसे ही उसके अनुरोधले ' यथेमां वाचं ' में भी स्वामीजीको ईश्वर प्रतिपाद्य ही मानना होगा, प्रतिपादक नहीं । इसमें भी उन्हें ' बृहस्पते ' को अनुषक्त करना पड़ेगा । ( ३१ ) अब बिज्ञ पाठक देखें कि ' बृहस्पते... तदस्मासु द्रविणं बेहि

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३२ ] श्रीसनातनधमालोकः ( ३-२ ) यथमा वाच कल्याणीम् [ ३३ चित्रम् ' ( २६ ) यहाँ ऋषि ईश्वरसे प्रार्थना कर रहा है कि- ' मुझमें ' अस्मदो द्वयोश्च ' ( पा. १२२।५६ ) सूत्रसे यहां एकमें बहुवचन है, अथवा पुत्रादि सहित हममें तू धनका श्राधान कर । क्या कोई वादी साहस कर सकता है कि इस मन्त्रका अर्थ यह करे कि ईश्वर कहता है- हे बृहस्पति!. मुझे घम दें ' । जब कोई ऐसा अर्थ नहीं कर सकता, क्योंकि इस मन्त्र में देवता ' प्रतिपाद्य ' ईश्वर है ( कारण कि देवता शब्द मन्त्रों की देवतादि-सूची में प्रतिपाद्य अर्थ में ही रूढ़ होता है ) और न ईश्वर कभी दूसरेसे ' अस्मासु द्रविणं घेहि ' लोट्लकार द्वारा ऐसी प्रार्थना कर सकता है, किन्तु यज्ञ - प्रमी ऋषि हो ' दीयतां भुज्यताम् ' इस भूतप्रज्ञप्तिकरी वाणीको अपनाने के लिए तदर्थं अवश्य - प्रपेक्षित धनकी प्रार्थना कर सकता है, तब इस मन्त्रसे पूर्वके ' यथेमां वाच ' ( २६।२ ) मन्त्रमें भी ' जिसका देवता-प्रतिपाद्य ईश्वर है ' कोई भी विद्वान् ईश्वरको प्रतिपादक सिद्ध नहीं कर सकता, न ही ईश्वर ' अहम् इमां वाचं जनेभ्य श्रावदानि, अहं प्रियो देवानां, दक्षिणादातुश्च प्रियो भूयासम्, अयं ये कामः समृध्यताम् ' इत्यादि प्रार्थना कर सकता है । वह ईश्वर ही कैसा, जो अन्यसे लोट् लिङ् आदि लकारों द्वारा ऐसी प्रार्थनाएं करे । ( ३२ ) हम पहले कह चुके हैं कि - यथेमां वाचं ( यजुः २६।२ ) इंस मन्त्रका देवता ईश्वर है, उसके श्रागेके ' बृहस्पते! यति यदर्यो... तदस्मासुँ द्रविणं घेहि चित्रम्, उपयामगृहीतोसि ' यजुः ( २६।३ ) इस मन्त्रका भी देवता ईश्वर है । यह वैदिक यन्त्रालय अजमेर - मुद्रित मूल - यजुर्वेद - संहितामें भी देखा जा सकता स्वा.द.के यजुर्वेदसंहिता - भाष्य में भी । वहाँ लिखा है — ‘ यथेमां इत्यस्य लौगाक्षिऋषिः, ईश्वरों देवता ' ( २६१२ ) ' बृहस्पते । इत्यस्य गृत्समद ऋषिः ईश्वरो देवता ' ( २६३ ) । इस प्रकार जब दोनों ही एक - दूसरेके साथके मन्त्रोंका देवता ' ईश्वर ' है, तो दोनों ही मन्त्रोंका अर्थ भी समान ही शैलीसे होगा । मन्त्रोंके विनियोग में ' देवता ' मन्त्र-प्रतिपाद्य ही होता है, मन्त्र - प्रतिपादक ऋषि ही होता है यह पहले कहा जा चुका है । जब इस प्रकार दोनों मन्त्रोंका देवता ईश्वर ही है, दोनों ही मन्त्रोंमें प्रार्थनाभिधायक लोट् - लिङ् लकार हैं, तो दोनों ही मन्त्रोंमें ईश्वर प्रतिपाद्य ही होगा; प्रतिपादक [ वक्ता ] नहीं । अत्र ' वृहस्पते! प्रति यदर्यो... तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् उपयामगृहीतोसि ' ( यजुः २६१३ ) इस मन्त्र ' को ही लीजिये । इसका देवता ईश्वर है - यह कहा ही जा चुका है । यहाँ यह देखना चाहिये कि यहाँ ईश्वर प्रतिपाद्य है, ईश्वरसे प्रार्थना की जा रही है- ' हे बृहस्पते! तत् चित्र धनमस्मभ्यं मह्य ं वा देहि ' । इस प्रकार इससे पूर्वके ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' ( २६।२ ) मन्त्रका भी देवता ' ईश्वर ' हैं । यहाँ भी ईश्वर ' देवता ' होनेसे प्रतिपाद्य है, प्रतिपादक नहीं । उत्तर मन्त्रसे यहां भी ' वृहस्पते! ' का समान - देवनावश अध्याहार करना पड़ता है.। ( ३३ ) तो जब यहाँ ईश्वर प्रतिपादक नहीं, तब ' जैसे मैं ईश्वर चार वेदरूप वाणीका उपदेश करता हूं ' यह स्वाद का अभिप्रेत अर्थ भी ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि - ' अहम् ' यह प्रतिपादकका शब्द है, प्रतिपाद्यका नहीं । जबकि - ईश्वर यहाँ प्रतिपाद्य है, प्रतिपादक नहीं, तो वह यहाँ ' मैं ' ईश्वर ' यह कैसे कह सकता है? यदि स्वाद के अनुयायी यहाँ ( २६।२ ) ईश्वरको देवता होनेपर भी जवर्दस्ती ' प्रतिपादक ' मानें तो उसके अग्रिम ' बृहस्पते! प्रति यदर्यो... तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् उपयाम- गृहीतोसि ( यजुः २६ । ३ ) मन्त्रमे भी उन्हें ईश्वरको प्रतिपादक मानना पड़ेगा । तो क्या ईश्वर ऐसी प्रार्थना कर सकता है? ( ३४ ) वा. द. जीके अनुयायी यदि हमारी बात न मानें, तो हम ' बृहस्पते! अति यदर्थो ( २६।३ ) मन्त्रका स्वा. द. का भाष्य उद्धृत करते हैं - ' है ( बृहस्पते ) बड़े - बड़े प्रकृति आदि पदार्थों और जीवोंके पालने हारे ईश्वर! जो प्राप ( उपयामगृहीत ) प्राप्त हुए यमनियमादि योग - साधनोंसे जाने गये ( असि ) हैं, उन आपको ( बृहस्पतये ) बड़ी वेदवाणीको पालनेके - स ० ध ० ३

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३३ ३४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) हो श्वर लिए तथा जिन ( ते ) आपका ( एषः ) यह ( योनिः ) प्रमाण है, उन f... ( वृहस्पतये ) बड़े - बड़े प्राप्त विद्वानोंकी पालना करने के लिए ( त्वा ) श्रापको मन्त्र हम स्वीकार करते हैं... ( तत् ) उस ( चित्रम् ) आश्चर्य रूप ज्ञान ( द्रविणम् ) धन और यशको ( अस्मासु ) हम लोगों में ( घेहि ) धारण जा स्थापना कीजिये । कार इस स्वा. द. के भाष्यसे स्पष्ट है कि ईश्वर यहाँ प्रतिपाद्य है; क्योंकि स्वर ' वह इस मन्त्र ( २६।३ ) का देवता है । ऋभाभू. ( शता. पृ. ६४२ ) में भी उत्तर स्वा. द. जीने ' बृहस्पते! अति ' के लिए लिखा है- ' तदस्मदधीनं द्रविणं-रना धनं कृपया घेहि ' इत्यनेन मन्त्रेण ईश्वरः प्रायंते ' । इस प्रकार इस मन्त्र पूर्वके ' यथेमां वाचं ' का भी ईश्वर देवता है । तव वह ईश्वर वहाँ भी ' हे चार बृहस्पते! ' इस प्रकार प्रार्थ्य होगा, प्रार्थक नहीं । जैसे कि- ' वेदवाणी के ठीक वेदांक ( ५।१-२ ) के १२१ पृष्ठमें श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने भी लिखा है-( ७ ) मन्त्रके प्रतिपाद्य विषयको देवता माना है ( शत. २ पं ० २३ ) ' यस्य यस्य मन्त्रस्य यो - योऽर्थोस्ति, स - सोऽर्थस्तस्य देवता - शब्देन अभिप्रायार्थ-विज्ञापनार्थं प्रकाश्यते । एतदर्थं ' देवता ' शब्दलेखनं कृतम् ' ( पृ. ६६० ऋभाभू. शतासं. ) तो एक दयानन्दीके ' दयानन्द - वेदभाष्यानुशीलन ' में भी लिखा है--' सर्वानुक्रमणी ' ' ( २५ ) में लिखा है - ' या तेनोच्यते सा देवता ' इसीपर षड्गुरुशिष्य कहता है- ' तेन वाक्येन प्रतिपाद्य वस्तु सा देवता ' अर्थात् मन्त्रके प्रतिपाद्य विषयका नाम ही देवता है ( पृ. २० ) । जब यह वादी मानता है तब जो उसने नीक्षीवि. में प्रक्षेप किया है कि- मैं भी आपसे पूछता हूँ कि आपके पौराणिक पण्डित | महीधरा-चार्य ] ने किस प्रकार ' हे परमात्मन्! ' अर्थ किया है । यह उसकी वात स्वयं खण्डित हो गई । क्योंकि - जव, वादीने ' देवता ' का अर्थ स्वयं प्रतिपाद्य ' माना है; तब ' परमात्मानं प्रत्युच्यते ' तथा ' हे परमात्मन ' यह प्रतिपाद्य परमात्माको कहा जा सकता है । परमात्मा यथेमां वाचं कल्याणीम् [ ३५ यहाँ ' ऋषि ' न होनेसे ' मैं ईश्वर ' यह स्वा.द. कृत श्रयं वादीके अनुसार भी गलत सिद्ध हुआ, और श्रीमहीधराचार्यका अर्थ ठीक सिद्ध हुआ । जब ऐसा है; तो २६।३ मन्त्र में जैसे ' अस्मासु ' का ' हम जीवों वा मुझ ऋषिमें यह श्रथं है; वैसे ही २६।२ मन्त्रमें भी ' ग्रहं प्रावदानि ' का ' मैं ईश्वर ' अर्थ नहीं; किन्तु ' मैं जीव यजमान - ऋषि ' यही अर्थ होगा । यदि वादी लोग ‘ अस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ' ( २६।३ ) इस मन्त्रमें ईश्वरकी श्रोरसे ऐसी प्रार्थनाके असम्भव होनेसे उसे इसमें प्रतिपादक मानकर प्रतिपाद्य मानें तो वैसे २६।२ मन्त्रमें भी ' प्रियो देवानां, दक्षिणायाश्च दातुः प्रियो भूयासम् अयं मे कामः समृव्यताम्, माम् अद उपनमतु ' इस अन्तिम प्रशमें ( जिसे वादी छिपा दिया करते हैं ) कही प्रार्थना को भी पूर्णकाम ईश्वर नहीं कर सकता । अतः २६।२ मन्त्रमें भी ईश्वर प्रतिपाद्य ही होगा, प्रतिपादक नहीं । तब ' हे बृहस्पते! अहं कल्याणी वाणीमावदानि ' इसका कता भी जीव ही हुआ, ईश्वर नहीं । तब उसमें वाणी भी जीवकी होगी, ईश्वरकी चतुर्वेदरूप वाणी नहीं । ( ३५ ) फलतः यहाँ ऋषिकी ' दीयताम्, भुज्यताम् ' यह वाणी ही इष्ट है, उसका पूर्ण करना ईश्वरके ही अधीन है; अतः उस वाणीका पति भी ईश्वर है । इसीसे ' यथेमां ' के अग्रिम मन्त्रमें ईश्वरको ' बृहस्पति ' शब्दसे सम्बोधित किया गया है । ' वाग् हि बृहती, तस्या एप पतिः ' यह प्रयं ' छान्दोग्योपनिषत् ' [ ११२ ११ ] में किया गया है - ' कुक्कुटयादीनामण्डा-' दिषु ' ( वार्तिक ६।३।३५ ) इससे पुंवद्भाव हो गया है । प्रकरणानुसार ' वृहती वाक् ' यहाँपर ' दीयताम्, भुज्यताम् ' इत्यादि पूर्ववर्णित याज्ञिक वाणी ( बड़ा वाल ) ही हैं । अथवा ' बृहद् वदेम विदये ' इस मन्त्रके ' बृहत् ' की तरह यह ' बृहद् ' नपुंसकलिंग है, ' बृहतो वचनस्य पतिः बृहस्पतिः । ' तब यहां वही ' दीयतां भुज्यताम् ' यह ऋषि - प्रोक्त वचन वा वाणी ही विवक्षित है । यज्ञमें देववाक् देवताओंको ही सुनाई जाती है; क्योंकि उसके वही उपास्य है, मनुष्य नहीं । तब वेदवाणी यहाँ प्रकृत नहीं ।

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३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यथेमा वाच कल्याणीम् [ ३७ ' आवदानि ' का अर्थ ' कहता हूं ' नहीं है; किन्तु ' कहूँ ' यह है, क्योंकि-' प्रावदानि ' यह प्रार्थना - प्रर्थमें लोट् है, वर्तमानार्थक लट् नहीं । परमात्मा प्रार्थना नहीं कर सकता । इस प्रकार वादियोंके अर्थके प्रशुद्ध सिद्ध होनेसे तदाश्रित उनका पक्ष गिर गया । इससे स्पष्ट हुआ कि दोनों ही मन्त्रोंमें ईश्वर ' देवता ' होनेसे वाच्य ( प्रा ) है, वाचक ( प्रार्थक ) नहीं, प्रतिपाद्य वा सम्बोध्यमान है, प्रति-पादक वा सम्बोधक नहीं, तब जो स्वा. द. जीने स.प्र. में ' यथेमां ' इस मन्त्रका ' परमेश्वर कहता है कि जैसे मैं सब मनुष्योंके लिए... ऋग्वेदादि चारों वेदों की वाणीका उपदेश करता हूँ यह अर्थ किया हैं, वह देवतावादसे विरुद्ध है, तथा प्रकरणसे भी विरुद्ध है; क्योंकि इस मन्त्रके सामने चारों वेद नहीं रखे हुए हैं । वेदोंके प्रन्तमें होनेपर तब वहाँ वह अर्थ घटता, पर अब वैसा न होनेसे वह श्रर्थं सम्भव भी नहीं हो सकता । खेद तो यह है कि गतानुगतिक, उनके पीछे बिना स्वयं कुछ भी विचार किये भागते हुए लोग गड्डलिका - प्रवाहमें बहकर थोड़ा - सा भी विवेचनका कष्ट नहीं उठाना चाहते । ऐसी उनकी परप्रत्ययनेयता देखकर हमें अत्यन्त खेदमिश्रित प्राश्चर्य होता है । ( ३६ ) ' देखो परमेश्वर स्वयं कहता है कि - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और प्रतिशूद्रादि, अपने भृत्य वा स्त्रियोंकेलिए भी ॠग्वेदादि चारों वेदोंका प्रकाश किया है ' यह अर्थ स्वामीजीका स्वयं कल्पित है, क्योंकि-' परमेश्वर कहता है ' यह शब्द मन्त्रस्थित किसी भी पदका अर्थ नहीं । ' ऋग्वेदादि चारों वेदोंकी ' यह शब्द भी मन्त्रान्तर्गत नहीं हैं । ' अतिशुद्रादिके लिए भी ' यहाँ के ' भी ' शब्दका वाचक पद ' अपि ' भी मन्त्रमें नहीं है. । " भृत्य वा स्त्रियादिकेलिए भी वेदोंका प्रकाश किया है ' यह शब्द भी मन्त्रस्थ किसी भी पदका श्रयं नहीं । ' स्वाय ' क्ट अर्थ ' अपने ' और ' अरणाय ' का अर्थ ' अपगतोदकसम्बन्ध ' अर्थात् ' पराया ' है, ' अतिशूद्र ' का यहाँ कोई सम्बन्ध ही नहीं । देखिये निरुक्त- ' परिषद्य " हि अरंणस्य ' ' अरणोऽपार्णो भवति ' ( ३।२।१ ) । श्रथवा इसका अर्थ ' अन्त्यज माना जावे, तो उसे ' पराया ' बतानेसे तथा अपगतोदक सम्बन्ध होने से उनकी अस्पृश्यता वेबसम्मत सिद्ध होगी, क्या प्रार्यसमाजी लोग प्रवर्णी अस्पृश्यता वैदिक मानते हैं? इससे स्पष्ट है कि इस प्रकारके अशुद्ध अर्थ करने तथा प्रचलित करने का उत्तरदायित्व म्बा.द.जीपर ही है, किसी भी प्राचीन ऋषि - मुनि ऐसा श्रयं नहीं किया, वा नहीं माना । इस कारण हमने विचार भी स्वामीजी के दृष्टिकोण से किया है । स्त्री ' शब्दका तो इस मन्त्रमें गन्ध ही नहीं है । जबकि — ' जनेभ्य: ' से ' मनुष्यमात्र ' का ग्रहण प्राप्त था, तो ' ब्राह्मण-राजन्य ' आदि पृथक् क्यों कहे गये? इससे ब्राह्मणी, शूद्रा श्रादि स्त्रियोंके बाधित हो जानेसे उक्त मन्त्रमें स्त्रियाँ इष्ट नही हैं । तभी तो स्त्री-वेदाध्ययन - पक्षपाती स्वा. द. जीने जब देखा कि यहाँ ' स्त्री ' का वर्णन किसी पदसे नहीं निकलता, अपितु ' जनेभ्यः ' से पृथक् ब्राह्मणादिके कहनेसे स्त्रीका ग्रहण बाधित होता है, यह सोचकर स्वामीजीने विवश होकर ' स्वाय ' इस पदका ' अपने भृत्य वा स्त्रियादि ' यह अर्थ बलात् कर दिया । कदाचित् निराकारकी पत्नियाँ वा नौकर भी होते हों! वस्तुतः ऐसा अर्थ करना जनताकी आँखों में धूल झोंकना है; तब स्त्री - शूद्रके वेद अध्ययनके अधिकारमें इस मन्त्रको उपस्थापित करना व्यर्थ ही है । फलतः उक्त मन्त्रमें जब परमात्मा ' प्रोच्यमान ' ( प्रतिपाद्य ) है, प्रवक्ता नहीं, तब यह मन्त्र ईश्वरप्रवक्तुक सिद्ध न हुआ, किन्तु जीवप्रवक्तृक ही सिद्ध हुआ । तब ' यथेमां वाचमावदानि ' इससे ईश्वरकी वाणी वेदवाणीका ग्रहण न हुआ । तब जो लोग वैसा मानते हैं, उनका पक्ष देवतावाद - द्वारा निसकृत हो गया । उक्त मन्त्रसे पूर्वके मन्त्रमें ' सकामानु श्रध्वनः कुरु ' ' संज्ञानमस्तु मेऽमुना ' ( २६३१ ) इन पदोंसे तथा उत्तरमन्त्रमें ' तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ' ( २६३ ) इत्यादि मन्त्रों द्वारा प्रार्थना करनेसे और. . ' यथेमां वाचं ' ( २६१ ) इस प्रकृत मन्त्रमें ' हे बृहस्पते! इमां वाचम्

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३७ ३८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रावदानि ' प्रियो दक्षिणाया दातुरिह भूयासम् ' दक्षिणायै ' यहाँ षष्ठ्यर्थ में चतुर्थी है ( वार्तिक २।३।६२ ), अयं में कामः समृध्यताम् ' इत्यादि प्रार्थनाओं से सिद्ध होता है कि पूर्णकाम परमात्मा इस मन्त्रके अर्थका वक्ता नहीं, क्योंकि सर्वशक्तिमान् ईश्वर ऐसी प्रार्थना अन्यको नहीं कर सकता । हाँ, ईश्वरको जीव ऐसी प्रार्थना कर सकता है । स्वा. द. जीने स.प्र. में लिखा हैं कि - ' न उस ( ईश्वर ) को कोई अप्राप्त पदार्थ, न कोई उससे उत्तम और पूर्ण सुख - युक्त होनेसे सुखकी अभिलाषा भी नहीं है; इसलिए ईश्वरनें इच्छाका तो सम्भव नहीं ' ( ७ समु. ईश्वर सगुण - निर्गुण पृ. १२४ ) तब यहाँ कामना होनेसे यह ईश्वरका वाक्य सिद्ध न हुआ । माण्डूक्योपनिषद् ( गौ. का. ११६ ) में भी लिखा है - ' प्राप्त-कामस्य का स्पृहा ' ( जिसको सभी कामनाएं प्राप्त हैं; उनको भला कामना कैसे? तब देवतावादके कारण इस मन्त्रका ' वक्ता ' जीव और ' वाच्य ' ईश्वर सिद्ध हुआ । तब फिर ' वाचम् ' से ईश्वरकी वाणी वेद-वाणीका ग्रहण भी सिद्ध न हुआ । किन्तु जीवकी वाणी - यज्ञमें कही ना जाती हुई ' दीयतां भुज्यताम् ' इस पूर्व प्रोक्त ऋषिकी वाणीका ही यहाँ ग्रहण सिद्ध हुआ; और वादिगणसम्मत अर्थ न रहा । वेदमें अधिकार ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अथर्ववेदसं. १ ९ ७१ । १ ) केवल द्विजोंका हुआ । क्ता ( ३७ ) द्विज, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य यह तीन ही होते हैं । शूद्र एकज ही होता है । ' गोतमधर्मसूत्र ' में कहा है- ' शूद्रश्चतुर्थो वर्णं एकजातिः ' का ( २१५१ ) यहाँपर श्रीहरदत्ताचार्यने व्याख्या की है- ' वर्णसामान्यत्वे रा सत्यपि चतुर्थग्रहणं पूर्वेषां त्रयाणां ब्राह्मणादिवर्णानां पृथग्वर्णत्वोपपादनार्थम् । रु ' वणिका इति सिद्धत्वात् एकजातिः । उपनयनं पूर्वेषां द्वितीय - जन्म । तद् सु ( द्वितीयजन्म ) अस्य ( शूद्रस्य ) नास्ति - इति उपनयनंप्रतिषेधात् तत्पूर्वक-र. मध्ययनमपि न भवति । ' ' स्मृतिचन्द्रिका ' के संस्कारकाण्डमें उपनयनप्रकरण-म में भी कहा है- ' ब्राह्मणादीनां त्रयाणामेव द्विजत्वं; न तु शूद्रस्य तस्य द्वितीय- जन्मनोऽभावात् । तथा च याज्ञवल्क्यः - ' मातुर्यदय े जायन्ते द्वितीयं यथेमां वाचं कल्याणीम् [ ३६ मौजिबन्धनात् । ब्राह्मणक्षत्रियविदास्तस्मादेते द्विजाः स्मृताः । ब्रह्मसूत्र ३।४।१२ सूत्र के माध्वभाष्यमें भी कहा है- ' प्रवैष्णवस्य वेवेऽपि ह्यधिकारो न विद्यते ।... न च वर्णावरस्यापि ( शूद्रादेः ) । ' तो यदि ' पथेमां याचं ' मन्त्र, द्विजेतरों को भी बेदका अधिकार दे दे; तब उक्त दोनों मन्त्रोंमें परस्पर - व्याघात हो जावे; और फिर ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तेभ्यः ' ( न्याय. २।१।५७ ) वेद श्रप्रमाण हो जावें, पर ऐसा नहीं । ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( श्र. १६७१११ ) यहाँ ' वेद ' शब्द तथा ' द्विज ' शब्द स्पष्ट है; पर ' यथेमां वाचं... शूद्राय चार्याय च ' ( यजुः २६/२ ) में केवल ' वाचं ' है, ' वेदवाचम् ' नहीं । साथ ' द्विज ' शब्द भी नहीं । अतः उक्त मन्त्रसे शूद्रादिको वेदका अधिकार देना भी प्रसिद्ध है । उक्त पक्ष देवतावाद द्वारा निराकृत हो गया । ( ८ ) सनातनधर्मने स्त्री - शूद्रादिको वेदमें साक्षात् अधिकार न देकर उन्हें वेदके ज्ञानसे वंचित भी नहीं किया, किन्तु वेदके शब्दमें अधिकार न देकर पुराणेतिहास - श्रवणद्वारा उस वेदके प्रयंमें अधिकार देकर उनपर बड़ा अनुग्रह किया है । ' तपसे शूद्रम् ' ( यजु. माध्यं.सं. २०१५ ) वेदने शूद्रोंके लिए कड़े कर्म बताये हैं. ' ब्रह्मणे शूद्रम् ' नहीं कहा । तब सेवाधर्म- जैसे कठिन काममें लगे हुए स्त्री - शूद्रादिको वेदके बंध अध्ययनका श्रवकाश ही नहीं रहता । तब उनपर अनुग्रह करके पुराणादि - द्वारा उन्हें वेदका निचोड़ ही सुना दिया जाता है । यह उन सेवाकार्यमें लगे हुत्रोंका समय बचाकर उनपर बड़ा अनुग्रह किया गया है । इसका एक उदाहरण देख लीजिये- मुझे दिनरात लेख लिखनेके कार्योंमें व्यस्त रहनेसे सामयिक समाचारपत्र पढ़ने का अवकाश ही नहीं मिलता । यदि मैं उधर लगू; तो मेरा समय नष्ट होता है, अथवा उसमें मैं रसिक हो गया, तो मेरा लेखकार्य छूटता है । यदि उस समाचारपत्रका वृत्त मुझे पता न लगे, तो मुझे देशकी दशाका परिचय नहीं मिल सकता । पर मेरा कोई हितैषी मित्र. मेरी स्थितिपर विचार करके यदि मुझे उस

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४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्राक्षेपोंका परिहार [ ४१ वृत्तपत्रका निचोड़ सुना देता है, तो मैं समझता हूं कि उसने मेरा समय बचाकर मुझे अपने कर्तव्यके पालनमें सहायता देकर मुझपर प्रतिशयित अनुग्रह किया है- मुझे उसका प्रत्यन्त कृतज्ञ होना चाहिये । यही स्थिति सनातनधर्मकी शूद्रादिकी वेदादिके सम्बन्धमें है । सनातनधर्मने वेदका संकेत देखकर ही उन्हें वेदका अधिकारी नहीं बनाया । क्योंकि वह इधर प्रवृत्त हो जाय, तो उससे अपना कठिन कर्तव्य छूटता है । हवाई जहाज प्रादि देश रक्षाका कार्य है । यदि वह उसका छूट जावे; तो देशकी कितनी बड़ी हानि हो । शत्रु प्रसन्न हो जावें । यदि वह अपनी बुद्धिका उपयोग सेवा - शिल्प आदिमें करता, तो देशका अधिक उपकार करता, जो अब उसने एक ब्राह्मणकी वृत्ति छीनकर किया । इसी एक - दूसरेके कर्म तथा वृत्तिकी छीना - झपटीसे प्राज देसमें प्रव्यवस्था मची हुई हैं, और कभी इधर कभी उधर ऐसी बातों में लगा हुआ समाज अव्यवस्थित - चित्त होकर ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः ' का उदाहरण बनकर संस्कार- हीन हो सकता है । सनातनधर्मं सवका मित्र है, तथा देशभक्त हो सकता है; अतः सबको अपने अधिकारमें रखनेको प्रेरित करता है । आक्षेपोंका परिहार ( स्वा ० द ० जीका प्रक्षेप ) ( ३ ९ ) अब एतद्विषयक कई आक्षेपोंका परिहार किया जाता है— ( १ ) ( क ) इसी मन्त्रके अर्थमें स्वा. द. जीने लिखा है- ' जैसे परमात्माने पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सबके लिए बनाये हैं, वैसे ही वेद भी सबके लिए प्रकाशित किये हैं ( स.प्र. ३ पृ. ४४ ) । इस पर यह जानना चाहिए कि - सूर्यादिके प्रकाशको कालकोठरी में पड़ा एक अपराधी कंदी भी प्राप्त नहीं कर सकता, उल्लू भी प्राप्त नहीं कर सकता, निशाचर भी प्राप्त नहीं कर सकते, इस प्रकार पूर्व जन्म के जघन्य कर्मोंसे अपराधी, जन्मभरका बन्दी, शूद्र जन्म प्राप्त व्यक्ति भी साक्षात् वेदके प्रकाशको प्राप्त नहीं कर सकता । वस्तुतः यहाँ सूर्य-चन्द्रादिका दृष्टान्त ही विषम है । सूर्य पृथिवी जलादिकी प्राप्तिकेलिए यज्ञोपवीतका परिधान अनिवार्य नहीं रहता, अध्ययन तथा प्राचार्यकरणकी भी अन्नादिकेलिए अनिवार्य श्रावश्यकता नहीं रहती, परन्तु वेदकी प्राप्त्यर्थं श्राचार्यकरण, यज्ञोपवीत तथा उसका अध्ययन अनिवार्य ही होता है; शूद्रको तो सेवातिरिक्त अध्ययनकी आज्ञा नहीं; वेदका अधिकार पट्ट, श्राचार्यकुलमें प्रवेशका प्रमाणपत्र स्वरूप उपनयन - सूत्र उसका नहीं होता; तब उसे वेदका अधिकार कैसे हो? अतः सूर्य - चन्द्रादिका दृष्टान्त इस विषयमें विषम हैं । आश्चर्य तो यह है कि वादी लोग वेदको ईश्वरका ज्ञान मानते हैं; वह ईश्वरका ज्ञान वेद अपने आपम ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १ ९ ७१ १ ) ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं... तपसे ( सेवादि कृच्छ्र-कर्मणे ) शूद्रम् ( यजु.माध्यं. ३०१५ ) द्विजों का वेदमें अधिकार बताता है, एकज शूद्रादिका नहीं; पर वादी वेदकी यह बात नहीं मानते । इसका तात्पर्य यह हुआ कि - वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीं; उनका वैयक्तिक ज्ञान ही ईश्वरीय ज्ञान है! ( ख ) यदि प्रिन्सिपल उत्तम तीन श्रेणियोंको ही स्वयं पढ़ाता है; निचली प्रारम्भिक पहली श्रेणीको स्वयं न पढ़ाकर उन तीन श्रेणीवालोंमें ही किसीको आज्ञा दे देता है कि इन पहली श्रेणीवालोंको मेरा तुम्हें दिया हुआ ज्ञान अपने सुगम और सरस शब्दों में समझा दो, तो यह न पक्षपात हो जाता है; न अनुपपन्न ही । फलतः इस विषय में सूर्य चन्द्रादि का दृष्टान्त विषम होनेसे ग्राह्य नहीं । ( ग ) “ जो परमेश्वरका अभिप्राय शूद्रादिके पढ़ाने - सुनानेका न होता, तो इनके शरीरमें बाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता " यह स्वा. द. जीका आक्षेप भी निस्सार है । यदि यह दोनों इन्द्रियाँ केवल वेदकेलिए ही होतीं, तो यह उनका कथन ठीक था, पर इनका उपयोग अपने कार्योंकेत्रिए है दूसरेके कार्य के लिए नहीं । वाकु

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४१ ४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्राक्षेपोंका परिहार [ ४५ और श्रोत्र तोते आदि पक्षियोंके भी होते हैं, इसी कारण मनु ( ७।१५० ) ने मन्त्रकालमें उनका हटा देना कहा है - पर इससे उनका वेदमें अधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । फलत: इन तर्काभासोंका कुछ भी मूल्य नहीं । ( एक सिद्धान्तालङ्कारका प्राक्षेप ) ( २ ) हम पूर्व सिद्ध कर चुके हैं कि – ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका ईश्वर देवता है. देवता प्रतिपाद्यको कहते हैं, तब यहां ईश्वर प्रतिपादक नहीं, T;इस प्रतिपाद्य है, प्रतिपादक जीव है, तो यहाँ वाणी भी जीवकी है, इस पर ' उदारतम प्राचार्य म. दयानन्द ' निबन्धमें एक सिद्धान्तालङ्कार लिखते हैं । का कि- " यह बात उपहासजनक है, ' देवता ' का अर्थ म. दयानन्द तथा निरुक्तादिके अनुसार केवल ' प्रतिपाद्य विषय ' ही नहीं है, ' देवो दानाद् वा, द्योतनाद् बा, दीपनाद् वा ' आदि निरुक्त - वचन के अनुसार देनेवाला, प्रकाशित करनेवाला इत्यादि भी है । ईश्वरने उपदेश दिया है; तथा वह सत्य - ज्ञानको प्रकाशित करता है, अतः उसे देव वा देवता कहना सर्वथा उचित ही है । " प्रक्षेपक इस अपने कथनमें सफल नहीं हो सका, यह विद्वानोंसे ; तिरोहित नहीं । तव यथेमां वाचं ' के अग्रिम भन्त्र ' बृहस्पते ' को भी वह ' ईश्वर देवता ' होनेसे क्या परमात्माकी उक्ति मान लेगा कि-- ऐ मनुष्य मुझे चित्र धन दे । ' अग्निमीले पुरोहितम् ' का अग्नि देवता होनेसे वह न यह अर्थ करेगा कि - परमात्मा उपदेश देता है कि मैं परमात्मा अग्नि-परमात्माकी स्तुति करता हूं? अब वह दो परमात्मा मान लेगा? जब य ईश्वर सारे मन्त्रोंका उपदेष्टा है, तो फिर केवल ' यथेमां वाचं ' और त्र ' बृहस्पते! अति ' इन दो मन्त्रोंका ही ' ईश्वर देवता ' लिखनेका क्या अर्थ ह रहता है? फिर अन्य मन्त्र ईश्वरके नहीं रहेंगे, यह दोष उपस्थित हो T, जाता है । तब यहाँ ' चौबेजी गये थे छब्बे बनने, दुबे बनकर प्राये ' यह लोकोक्ति चरितार्थ हो जायगी गये थे शूद्रोंको परमात्माकी वाणी वेद पढ़ाने, पर इन दो मन्त्रोंसे शेष वेद को जीवकी वाणी सिद्ध करवा बैठे । वस्तुतः अनुक्रमणीकारों का कहा ' देवता ' शब्द सिद्धान्तालंकारसे उद्धृत निरुक्त वाले अर्थको नहीं रखता । श्राप सांख्यके ' गुण ' का प्रथ क्या व्याकरणके ' प्रदेगुण: ' सूत्रसे करेंगे? अनुक्रमणोकारोंका ' ऋषि ' वा ' देवता ' शब्द परिभाषिक होता है, वह परिभाषा है - ' यस्य वाक्यं स ऋषिः, या तेन उच्यते, सा देवता ' । इसकी स्पष्टता पूर्व की जा चुकी है । यही बात निरुक्तकारने भी मानी है— काम ऋषिर्यस्यां देवताया-माथंपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते, तद् - देवतः स मन्त्रो भवति ' ( ७ | १ | ३ ) इसकी स्पष्टता पूर्व की जा चुकी है । इससे स्पष्ट है कि - तत्तद्मन्त्रमें प्रतिपाद्य हो ग्रनुक्रमणीकारोंका ' देवता ' होता है, प्रतिपादक नहीं । इसके उदाहरण भी पूर्व वेदसे दिये जा चुके हैं; वादी उनका खण्डन नहीं कर सका और न कर सकता है । श्रतः ' देवता ' इस अनुक्रमणिकाके ' पारिभाषिक ' शब्दका उससे किया हुआ निरुक्तानुसारी अर्थ ठीक नहीं. उसका इस ' देवता ' शब्दसे कोई सम्बन्ध भी नहीं । वह तो केवल मन्त्रस्थ ' देवता ' शब्दका निर्वाचन है, विनियोगा-नुक्रमणिकाके ' देवता ' शब्दकी वह परिभाषा नहीं । अनुक्रमणिका वाले ' देवता ' शब्दका अर्थं निरुक्तकारको भी प्रतिपाद्य ही इष्ट है, यह दैवत-काण्डका ‘ यत्काम ऋषिर्यंस्यां... तद्देवतः स मन्त्रो भवति ' ( ७ | ११३ ) श्रीयास्कका वचन देकर हम उसे स्पष्ट कर चुके हैं । यदि यहाँ ' ईश्वरो ' देवता ' का ईश्वर इस मन्त्रको प्रकाशित करनेवाला है यह अर्थ किया किया जावेगा, ता शेष वेदमन्त्र अनीश्वर जीवकी वाणी बन जायेंगे । क्योंकि इन दो के अतिरिक्त शेष वेदमन्त्रोंका ' ईश्वरो देवता ' नहीं लिखा गया है, यह निस्सार बात लिखकर वादीने स्वामीजीके पक्षको और भी निर्मूल सिद्ध कर दिया है; और हमारे पक्षको ही पुष्ट कर दिया । क्योंकि वह ' देवता ' का अर्थ ' प्रतिपाद्य ' भी मानता ही है । यहाँ वह ' अर्य है भी सही । अतः हम वादीकी ही बात मान लेते हैं कि - ' देव ' शब्द द्योतन - वाचक भी है, सो दीव्यति प्रकाश्यते, स्तूयते वा ' ( क्योंकि यह

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४४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) दोनों ही प्रर्थं दिवु धातुके प्राये हैं - धति स्तुति । यह धातु अकर्मक है, अतः उसका अर्थ यहाँ ' प्रकाशक ' वास्तविक न होकर ( क्योंकि तब सकर्मकता प्रसक्त हो जाती है ) प्रकाश्यमान वा स्तूयमान ही अर्थ है । जैसाकि ' अग्निमीले ' मन्त्रपर सायणने भी लिखा है- ' द्योतनार्थ - दीव्यति धातु - निमित्तो ' देव ' शब्दः, श्रतो दीव्यतीति देवः, मन्त्रेण द्योतते इत्यर्थः । श्रस्मिन् सूक्ते स्तूयमानत्वाद् श्रग्निर्देवः ' सो उक्त मन्त्रमें भी ईश्वर द्योतमान स्तुयमान होनेसे ' देवता ' है, द्योतक वा स्तावकका नाम ' देव ' कहीं नहीं माना गया, तब वह वाच्य ही सिद्ध हुआ, व चक नहीं । ( तर्क रत्नजीके प्राक्षेप ) ( ३ ) ' छूतोद्धार - निर्णय ' (: ० ३१-३३-३ पृष्ठ ) में श्री ' तर्करत्न ' जींने भी सनातनधमियोंसे किये जात हुए यथेमां बाच ' के अर्थ में कई आक्षेप किये हैं, उनपर भी विचार कर लेना चाहिए । आप लिखते हैं कि- ( क ) ' वेदमें कल्याणकारी - वाणीसे सर्वत्र भाष्यकारोंने ' वेदवाणी ' का ग्रहण किग्ग पर यह बात उनकी प्रमाण - रहित होनेसे सिद्ध नहीं । उन्हें चाहिये था कि- ' कल्याणी वाक् ' शब्दधारी कुछ मन्त्र देते - जहाँ भाष्यकारोंने ऐसा श्रथं किया हो, पर उन्होंने एक भी ' कल्याणीं वाचं ' का उदाहरण नहीं दिया । उवट - महीधरने यहां स्पष्ट वेदका सकेत वेखकर ' दीयतां भुज्यताम् ' यह कल्याणकारिणी याज्ञिक - वाणीका ही ग्रहण किया है, हम इसे पूर्व स्पष्ट कर भी चुके हैं, उसमें वेद एवं शास्त्रोंके प्रमाण भी दिये जा चुके हैं, अतः सर्वत्र ' वाक् ' शब्दसे वेदवाणी गृहीत नहीं हो जाती । ( ख ) यदि श्रीमहीधर २२।६१-६२ मन्त्रमें ' वाचः ' का त्रयी-लक्षणाया: ' प्रर्थ लिखने से मान्य है, तो ' यथेमां ' मन्त्रमें वेदवाणीका प्रकरण न होनेसे, प्राकरणिक ' दीयतां भुज्यताम् ' श्रादि वाणीका अर्थ करते हुए भी वे मान्य हैं । यात्राके समय ' सैन्धव ' का ' लवण ' अर्थ कोई भी मान्य नहीं करता । और फिर ' पृच्छामि वाचः ' मन्त्र में ' कल्याणी वाक् ' शब्द प्रक्षपोका परिहार [ ४५ भी नहीं है, तब तर्करत्नजीकी ' वेदमें कल्याणकारी वाणी से वेदवाणीका ग्रहण है ' यह बात कैसे घट सकी? ( ग ) “ अजीर्णंके रोगीको तो ' भुज्यताम् ' यह वाणी कल्याणकारिणी नहीं, प्रत्युत प्रकल्याणकारिणी है " यह आक्षेप भी व्यर्थ है । जीर्णका रोगी उस याज्ञिक ' भोजन ' में आने ही क्यों लगा, और भोजन भी कई प्रकारके होते हैं, उसे दधिका भोजन भी कल्याणकारी रह सकता है, उसे यज्ञमें वही दिया जा सकता है, इसमें प्राक्षेप क्या? यज्ञमें खाद्य, पेय, लेह्य, चूष्य सब प्रकारके भोजन होते हैं । ( घ ) ' इससे ब्राह्मण एवं शुत्रका सह - भोज सिद्ध हो गया ' यह भी आक्षेप ठीक नहीं । साहचर्यनियम सर्वत्र माना गया है, ब्राह्मण ब्राह्मणोंकी पंक्ति में होंगे, शूद्र शुद्धों की पतिमें । यज्ञमें सबके अधिकारानुसार पृथक् - पृथक् स्थान बनाने पड़ते हैं, पृथक-पृथक् प्रबन्ध करने पड़ते हैं । इस मन्त्रमें एक पक्तिमें सबको जिमाना तो कहीं लिखा नहीं । तब यह प्रक्षेप भी निस्सार है । ( ङ ) " क्या यज्ञ - परक अर्थ हो जानेके बाद अन्य अर्थ जो वेदके निकलते हैं, वे मान्य ही नहीं हैं? किन्तु ऐसा नहीं । यजुर्वेदके ' चत्वारि शृङ्गा ' इस यज्ञ प्रतिपादक मन्त्रका महाभाष्यकारने ' शब्द ' अर्थ भी किया है । यह अशुद्ध होना चाहिए ' यह प्रक्षेप भी ठीक नहीं । मन्त्रका अर्थ देवतावादके अनुमार होता है । ' चत्वारि शृङ्गा ' का देवता ' गाव: ' भी है, उसका ' बैल गाय ' अर्थं तो यहाँ सम्भव नहीं, ' गो ' का अर्थ ' वाणी ' भी होता है, मो शब्दा-त्मक वाणीका अर्थं करते हुए श्रीपतन्जलिने कोई अपराध नहीं किया । पर यहाँ जब ईश्वर देवता है - प्रतिपाद्य है, तो उसकी वाणी यहाँ इष्ट नहीं, किन्तु यज्ञके प्रकरण होनेसे उसमें प्रयुक्त की जाती हुई यजमान-' ऋषिकी ' दीयताम् भुज्यताम् ' यही वाणी इष्ट है । ( च ) ( प्र ० ) ' जिससे वाणीका सम्बन्ध न हो वह ' रण ' है, फिर जिससे बात ही नहीं, उससे ' दो और खाम्रो ' यह वाणी कैसे कही जा सकती है? ( उत्तर ) जब ऐसा व्यक्ति भी यज्ञमें श्रा जाता है, तो उसे