सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 321–330
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श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ] र भी वि लिया जा सकता है, अतः याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रहमें प्रति-भी है । प्रवृत्ति निन्दित : इससे शूद्रका वैदिक यज्ञ तथा वेदाध्ययनमें स्पष्ट अनधिकार तथा स्त्रे सिद्ध फलत होरहा है । मनु. १०।१२७ पद्यके अर्थ में श्री तुलसीराम - स्वामीने लिखा लोचना धर्म करना जानते भी हों; तो बिना वेदमन्त्रोंके उच्चारण है- यदि ' शुद्र होमादि - कर सकते हैं; इससे उनको श्रमन्त्रक होमका कोई दोष ही यज्ञ वाणी हेलें नहीं । ' तेमें सबकी यहाँ भी स्पष्ट रूपसे शूद्रको वेदानधिकार सिद्ध हो रहा है । यही बोदे | नहीं, श्रीशाण्डिल्यजीके भी श्रद्धेय एवं मान्य श्रीसत्यव्रत - सामश्रमी जिनके ग्रन्थोंका श्रीशाण्डिल्यजीपर गम्भीर प्रभाव पड़ा है - ने भी यही सव मानो माना है । वे शूद्रोंके विवाहमें वेदमन्त्रोच्चारण नहीं मानते; उसमें सं नानाधर्क श्रीपाणिनिकी सम्मति भी बताते हैं । देखिये उनका ऐतरेयालोचन । पृ. १२ में वे लिखते हैं- ' अस्ति हि ब्राह्मणस्य ब्राह्मणक्षत्रियवंश्येति शो भो त्रिविधाऽऽर्याणां तदितरस्य शूद्रस्य श्रनार्यस्य कन्यापरिणये अधिकारः; तथा कर सकता । सत्रिय - वैश्येति द्विविधयोराययोः तदितरस्य शूद्रस्य चानार्यस्य कन्यापरिणये म में देखें अधिकारः । तत्र सर्वेषामेव प्रयवर्णानां प्रथमं स्वजातीया-कार ही नहीं पाणिपीडनमेव विहितम् । किञ्च - श्रार्यकन्यानामेव उद्वहने यथाविधि वैदिक मन्त्रादीनां व्यवहारः समुचितः । तत एव तेषां पत्नीत्वम् । ' हम दि अत एवोक्त भगवता णणिनिनापि - ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ( ४ | १ | ३३ ) नित्यं किं इतरस्याः ( शूद्रायाः ) तु अमन्त्रकं ग्रहणमात्रम् ' । ( १०१११० ) इसमें सामश्रमीजीने शूद्रकौ श्रार्य नहीं माना । पृ. १५ में उसी की निन्दित पुस्तक में ' उत शूद्र ' उतायें ' मन्त्र देकर सामश्रमीजीने स्पष्ट किया है -' ये तु श्रनार्या अपि श्रार्याणामानुगत्यमाललम्विरे त एव दासाः । तद्वि-स्कृतात्मा - ( रीतास्तु ' दस्यव ' इति व्यपदिष्टाः । त एव दासाः शूद्रा इति । दस्यवस्तु बिके संका लेच्छा इति ।... तदेवम् एषु पञ्चजनेषु कमादि भेदत एव ब्राह्मणाः, यह तो ले सत्रिया वैश्याः इति श्रय श्रार्याः । दासो दस्युश्च इति द्वौ इति भारतीय धर्मशास्त्रकी प्रालोचना [ ५८३ स्थितम् । ' रस प्रकार सुधारक भी श्रीसामश्रमीजीने शुद्राके विवाह में वेदमन्त्रोच्चारण भी युक्त नहीं माना । तब शूद्रको शाण्डिल्यजी वेदाधिकार कैसे दे सकते हैं? आगे श्रीशाण्डिल्यजी लिखते हैं - ' वेदोंमें शं नो देवी: ' ' शं नो मित्रः ' ' शं नो s स्तु ' ' तन्न ग्रासुव ' इत्यादि प्रयोग अधिकता से मिलते हैं, जिनमें सुखकी प्राप्ति ' हम सबकेलिए मांगी गई है; तब क्यों न सारे मिलकर ऐसी प्रार्थना करें? ' यह भी कथन ठीक नहीं । इसपर प्रष्टव्य है कि-' शं नः ' इत्यादि शब्दोंको मानव कह रहा है - या परमात्मा? अथवा यह शब्द ऋषिके हैं, या द्विजके हैं, या शूद्रके हैं '? जब तक शाण्डिल्यजी इन शब्दोंके कहनेवालेको ' शूद्र ' सिद्ध न कर दें; तब तक वे इनसे शूद्रका वेदमें अधिकार त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं कर सकते । आगे वे लिखते हैं- ' इसलिए जो भी वेदाध्ययनकी योग्यता प्राप्त करते जावें; वे सभी उपनीत होकर वेदाध्ययनमें प्रवृत्त होते जायें ' । जव शाण्डिल्यजीके मतमें सभीको वेदाधिकार है; तो योग्यताका प्रश्न हो क्या? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंके वालकोंका उपनयन ८-११-१२ वर्ष में होता है; पूर्वे वर्ष से भी शुरू होता है; उस समय उनकी वेदाध्ययनकी योग्यता भला क्या होती है? यह तो अधिकारके कारण ही ऐसा होता है । नहीं तो ५, ६, ८, वा ८, ११, १२ वर्ष यह त्रैवर्णिकोंके वर्ष रखने-की आवश्यकता ही क्या थी? शाण्डिल्यजी कर्मते वर्ण मानते हैं; तो जो वेदाध्ययनकी योग्यता प्राप्त कर लेगा; वह उनके मतमें शूद्र तो रहेगा ही नहीं; किन्तु ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्य ही हो जावेगा, तब उनके मत में भी शूद्रका वेदाधिकार सिद्ध न हो सका । अतः ' मानवमात्र वेदका अधिकारी है यह शाण्डिल्यजीकी बात उनकी अपनी ही बातसे कट गई । उनने भी वेदको तीन वर्णोंमें बांध दिया, शूद्रपर प्रतिबन्ध लगा दिया । स ध का खण्डन करना कोई हंसी - ठट्ठा तो नहीं?
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५६४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यदि वे वेदाध्ययनकी योग्यतावालेको भी शूद्र मानते हैं, तो ' कर्मसे वर्ण ' उनका सिद्धान्त कट गया । ' सेयमुभयतः - स्पाशा रज्जु ' इस रस्सीसे वे बंध गये हैं । इससे वे कभी छूट नहीं सकते । तभी छूट सकते हैं, जब वे दृढ सनातनधर्मी वन जावें । तब उनका यह कहना कि -' इनको जन्मजात ही, आदिम जन्मजात त्रैवर्णिक ही पढ़ सकते हैं, यह वेदोंपर प्रतिबन्ध लगाना, श्रमौलिक है, अप्रामाणिक है ", इसपर हम कहते हैं कि यही शाण्डिल्यजीका कथन स्वयम् अप्रामाणिक है, बिना आधारके है । क्योंकि- शास्त्रोंमें जन्मनात प्रादिम तीन वर्णोंके ही द्विजत्वका तथा वेदाध्ययनका अधिकार प्राया है । शूद्रका अध्ययन या ज्ञानका अधिकार किसी भी शास्त्रमें नहीं आया । जब नहीं आया, तो शूद्र वेदाध्ययनकी योग्यता प्राप्त कर सकता ही नहीं । तब उसका वेदमें अनधिकार भी तदवस्थ ही हुआ । ' तपसे [ कृच्छ्रकर्मणे, सेवायै ) शूद्र ' है - ' ब्रह्मणे [ वेदाय ] शूद्रम् ' नहीं आया ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ही आया है, देखिये यजुर्वेदमाध्यं. ३०।५ ) । कमसे कम वैदिक अपने आपको मानने वालेको वेदका कुछ प्रादर तो करना ही चाहिये! प्रागे शाण्डिल्यजी कहते हैं- ' महाभारत में भी सबके लिए वेदाध्ययन की साक्षी मिलती है- ' इत्येते चतुरो वर्णां येषां ब्राह्मी सरस्वती । विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्तु प्रज्ञानतां गताः ' ( १८५८ प्र. ) ( ब्रह्माने यह वेदवाणी चारों वर्णोंकेलिए प्रकट की ) । इससे पं. जीने ' महाभारत ' को प्रमाण मान लिया यह स्पष्ट है । अब देखना चाहिये कि क्या महाभारतको पं.जीका किया यह अर्थ मान्य है? महाभारत कहता है - ' मन्त्रः शूद्रे न विद्यते ' ( शान्तिपर्व ६० ३७ ) सतां वृत्तमधिष्ठाय निहीना रद्दिधीर्षवः । मन्त्रवर्ज न दुष्यन्ति कुर्वाणाः पौष्टिकी: क्रिया: ' ( शान्ति. २६६।२६ ) । इन पद्योंमें शूद्रका मन्त्रभागात्मक वेदमें अनधिकार बताया गया है । इसी बातको महाभारतने अन्यत्र उपमाद्वारा भारतीय धर्मशास्त्रकी आलोचना १८६ भी व्यक्त किया है- ' न च तां [ रुक्मिणीं ] प्राप्तवान् शूद्रो वेदश्रुतीमिव ' ( सभापर्व ४५।१६ ) यहांपर मूढः ( शिशु ) है, ' वेट प्राप्ति ( अनधिकृति ) कही है । शूद्रको वेदश्रुति बोलचाल ऐसा ही भाव प्रकारान्तरसे रामायणमें भी छन्द वा नचाऽस्याऽहमनुप्रदातुम् अलं द्विजो मन्त्रमिव द्विजाय ' आया है- प माचायो २८५ ) यहां भी शूद्रको मन्त्रका न देना ही सिद्धान्तित ( वाल्मी, सुन्दर पर ' छ ' महाभारत ' का अन्य प्रमाण भी देख लीजिये । ' नाधीयीत किया है । छान्दस-यज्ञः |... स्यादेवं स्मृतः शूद्रधर्मः पुराण: ' ( उद्योग २१/२६ प्रतिषिद्धो सम्मत पं.जी अपने मान्य श्रीपाददामोदर. ) सुंदर इस सातवलेकर महोदयका श्रथं भा देव । संस्कृतभ लें— ' शूद्रको वेद पढ़ने और यज्ञ करनेका अधिकार नहीं है, और हं बताता शूद्रके लिए प्राचीन धर्म कहा गया है ' । लेन यही नहीं, बल्कि शुद्रके सामने भी वेदके उच्चारणक । महाभारने हो सका निषेध किया गया है । देखिये - ' न च शूद्रसमभ्याशे वेदान् उच्चारयन् । श्रा ( श्रादिपर्व ६४।२० ) । यह बात ठीक भी है - ' श्मशाने नाध्येवन् की है । एक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक वाक्य है । मनुस्मृति में भी कहा है- पृष्ठमें द ' नाधीयीत श्मशानान्ते ' ( ४ । ११६ ) श्रीशवरस्वामी ( मी. ६ ११३८ ) झा अन्य भी बहुतों ने इस उद्धरणको दिया है । वादिप्रतिवादिमान्य - महाभाष्यं ( प्र. १ भी कहा है- ' देश: खल्वपि ग्राम्नाये नियतः — ' श्मशाने नाध्येयम् ' चतुरे बलात्का नाध्येयम् ' ( ५२ १५ ९ ) । शूद्रको भी ' पद्य ( पादयुक्त ) ह वा एड अधिका श्मशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ' ( ब्रह्मसू. शाङ्करसाद मानकर ( १ | ३ | ३८ ) ( रामानुजाचार्य स्वामीका ब्रह्मसूत्रभाष्य ११३१३८ ) ( * वाणीको वल्लभाचार्यगो.का उक्तसूत्रका भाष्य ) इत्यादि । हैं कि य जब ऐसा है; तब महाभारत के मत में भी शूद्रको वेदाधिकार द्धि और ि न हुआ । शेष रहा शाण्डिल्यजीका ' इत्येते चतुरो वर्णाः ' यह महाभारत विद्य पद्य, सो उसका किया हुआ पं. जीका अर्थ भी महाभारतसे विरुद्ध है । देखा हो इस विषय में इसी पुष्पके पृ. २०३-२०४ में देखिये । ' ब्राह्मी ' यहाँ ' भारा वे
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५६६ ] ( शिशुपालः ' वेद - वाणी ' नहीं । उसका कारण यह है कि- ' वेदवाणी कोई ) है, चाकी भाषा नहीं होती; इसलिए श्रीपाणिनि, श्रीयास्क प्रादिने उसे वेदश्रुतिशे | अध्याय - स्वाध्याय कहा है । पर लौकिक वाणीको तो दोनों छन्द वा ' भाषा ' कहा है । ' भाषा भाषणात् ' भाषा बोलनेसे होती है मायने, पर ' छन्द ' होता है — ' छादनात् ' । ' मन्त्रः - ' मत्रि गुप्तभाषणे ' इसलिए मी. सुन्दर प्रयोगोंका भाषामें प्रयोग नहीं होता । यह बात वादिप्रतिवादि-किया है । छान्दस । प्रतिषिद्धोज सम्मत है ६ ) यहां इससे स्पष्ट है — उक्त महाभारतीय - पद्यमें वेदोंकी बात नहीं है; किन्तु संस्कृतभाषाकी बात है । शूद्रोंका वेदका अधिकार न तो महाभारत है और बताता है, न कोई अन्य प्राचीन शास्त्र ही । अतः महाभारतसे विरुद्ध अर्थ लेनेके कारण श्री शाण्डिल्यजीका अर्थ तथा उससे उनका पक्ष सिद्ध न महाभार हो सका । श्रागे पं. जीने ' यथेमां वाचं ' मन्त्रसे अपना पक्ष सिद्ध करने की चेष्टा ध्येय की है; पर वे इसका प्रत्युत्तर इसी पुष्पके २-४० पृष्ठमें तथा ४६-५० कहा है- पृष्ठमैं देखें । १०३८ ) म आगे पं.जी ' स्तुता मया वरदा वेदमाता... पावमानी द्विजानाम् ' -महाभा ( प्र. १ ९ ०७१११ ) मन्त्रको उक्तिसे जो शूद्रका वेदाधिकार काटती थी-' चतु बलात्कार करते हैं । लिखते हैं - ' इस मन्त्र में द्विजोंको वेद पढ़ने का हवा एस अधिकारी कहा गया है ' । यहाँतक तो शाण्डिल्यजीने परमात्माकी बात शाङ्करभा मानकर हमारा पक्ष सिद्ध कर दिया; पर आगे उस परमात्मा की ३८ ) ( वाणीको मानवी वाणी से छिन्न - भिन्न करना रूप स्वहृद्गत तात्पर्यं बताते है कि यह मन्त्र वेदोंका अध्ययन करनेकी इच्छावाले मनुष्यमात्रको - पुरुषों धिकार दि और स्त्रियोंको - द्विज बनानेकी भावनाका बोधकहै । महाभारता विद्वान् - पाठकोंने पं.जीके इस लम्बे - चौड़े निज - कल्पित तात्पर्यको न विरुद्ध है । देखा होगा । प्रष्टव्य यह है कि यह मन्त्र के किन पदोंका यहाँ ' भा तात्पर्य है? अब वे तात्पर्य पहले बताकर फिर उसका अर्थ बताते हैं- ' अर्थात् जो भी भारतीय धर्मशास्त्र की आलोचना [ ५८७ मनुष्य पुरुष हो वा स्त्री, वेद पढ़नेकी भावनासे गुरुके पास जाता है, और उससे उपनीत होकर वेदाध्ययन करता है, वह द्विज है ' । श्राश्चर्य है कि- शाण्डिल्यजी अपनी मानव - वलसे निकाली वाणी से परमात्माकी वाणीको दबाते हैं । स्वाभाविक प्रथमें बहुत बल लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ा करती । यदि परमात्माको इससे सभी मानवमात्रको वेद देनेकी इच्छा थी, तो ' द्विजानाम् ' इस द्रविड़ प्राणायामकी क्या श्रावश्यकता थी? सीधा ' प्रचोदयन्तां पावमानी जनानाम् ' यह वे कह सकते थे । इससे पूर्व पं. जीने लिखा है- ' यह दूसरी बात है कि - शूद्र विलष्टकार्यो-या सेवाकार्यों में रत होने से वेद न पढ़ सके । यदि वह पढ़ना चाहे;. तो उपनीत होकर पढ़ सकता है । " ' यह दूसरी बात क्यों है? ' जब पं. जी वेदशास्त्रानुसार शूद्रका क्लिष्ट-कर्म वा सेवाकर्म कर्तव्य मानते हैं. तब उसे वेद पढ़ना प्राप्त ही कव हो सकता है? ' यदि वह पढ़ना चाहे ' कब पढ़ना चाहे? अपने कर्मको यदि वह छोड़ता है; तो ' जहां वेदादिशास्त्र विरुद्ध करता है; क्योंकि-' तपसे शूद्रम् ' ( यजुः ३०१५ ) है ( शूद्रका जन्म कृच्छ्र - कर्मकेलिए होता है ) वहाँ भगवान की पूजा भी नहीं मानी जावेगी । ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ' ( गीता १८१४६ ) यहां अपना कर्म पूरा करनेसे ही भगवान् की पूजा मानी जाती है, उसके छोड़ देनेसे भगवान्का अनादर माना जावेगा । तब अपनेसे विरुद्ध कर्म करनेवाले शुद्रको वेद अपना अधिकार दे ही कैसे सकता है? इधर जब वह शूद्र उपनीत हुआ, तो शाण्डिल्यजीके अनुसार भी शूद्र न रहा; क्योंकि वे कर्मसे वर्ण मानते हैं, तो उस वेदको शूद्र न पढ़ सका, उस वेदको द्विजने पढ़ा; तब उनके मतमें भी शूद्र वेदानधिकारी ही सिद्ध रहा । यदि उस समय भी वह शूद्र रहा, तो वर्णव्यवस्था ' कर्मणा ' कटकर ' जन्मता ' सिद्ध हो गई, क्योंकि उसने शूद्रवाला कर्म तो छोड़ रखा, फिर भी वह शूद्र रहा; तब वेद पढ़ा, इससे वह वर्ण ( ब्राह्मण
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५८८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) और शूद्र वर्णका ) सङ्कर भी हो गया । यदि वह शूद्र रहा; तो द्विज न होनेसे वह वेद कैसे पढ़े; क्योंकि— मन्त्र में ' पावमानी द्विजानाम् ' है । श्रीशाण्डिल्यजीका इस ' उभयतस्पाशा रज्जु ' से छुटकारा नहीं हो सकता । पं.जी मुझे क्षमा करेंगे, यदि मैं कहूं कि - कृत्रिमतामें बनावट दीख ही पड़ती है । द्विज ब्राह्मणादि ही होता है, शूद्र नहीं । ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः त्रयो वर्णा द्विजातयः ' । अत्र तेषामधीकारो धर्मेषु द्विपदां वर! ( महा. शान्ति. २६६।२५ ) आगे श्रीशाण्डिल्यजी कहते हैं कि- " उपनयनका अर्थ भी यही है कि-गुरुके पास जाना, और यज्ञका चिन्ह यज्ञोपवीत गुरुसे लेकर वेदाध्ययनमें प्रवृत्त होना । तब यह नियम तो मनुष्यमात्रकेलिए लागू हो सकता है । मनुने भी इस भावनाको पुष्ट किया है – ' उपनीय तु यः शिष्यं वेद-मध्यापयेद् द्विज: ' ( २।१४ - १५ ) जो ब्राह्मण श्रागन्तुक शिष्यको उपनीत करके वेद पढ़ाता है, वह आचार्य कहा जाता है । इसमें शिष्यमात्रको उपनयन देना इष्ट है । " अत्यन्त खेदका विषय है कि श्रीपं. जी स्पष्ट ही मनुजीका मनुजीसे विरुद्ध अभिप्राय दे रहे हैं । मनुजी वर्णव्यवस्था जन्मसे मानते हैं । जैसे कि-' सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीषु - अक्षतयोनिषु । श्रानुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेया: त एव ते ' ( मनु. १०१५ ) इन्हीं - जन्मजात ब्राह्मणादिके मनुजीने ( १८८-८९ - ९ ० - ९ १ पद्योंमें ) कर्म बतावे । इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णोंका अध्यापन बताया है । उन्हींके लिए उपनयनका विधान कहकर मनुजीने उन्हें ' द्विज ' बताया । जैसेकि - ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः यो वर्णा द्विजातयः ' ( १०/४ ) ( त्रैवर्णिक ही द्विजत्वके अधिकार वाले हैं ) शूद्रको मनुजीने ' चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो ' ( १०।४ ) एकजाति कहा । उसके लिए ' एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूया ' ( १ ९ १ ) इससे द्विजोंकी सेवा बताई । ' यद् ग्रतो अन्यद् हि कुरुते तद् भवति ग्रस्य निष्फलम् ' ( १०।१२३ ) सेवासे भिन्न कर्म. भारतीय धर्मशास्त्रकी मालोचना [ ५८१ करनेवाले शूद्रकी निष्फलता भी बताई । ५६० ' वरं स्वधर्मो विगुणः, न पारत्र्यः स्वनुष्ठितः वैसे ही स्वधर्माचरणको वैध तथा परकीयाचरणको अवैध बताया ( १०११७ ) में कि - द्वि वे ही मनुजी ' उपनीय तु यः शिष्यं ( २ | १४० ) में शूद्रको गया है । फिर टोकि-आचार्यका शिष्य बना ही कैसे सकते हैं? तब ' शिष्य ' वेदाध्यापक- ' ब्राह्मण अर्थ करना यह पंजीका मनुके साथ अन्याय करना है का ' शिष्यमात्र मुद्रादि । तो मनुष्यमात्र-लिए पंजीका अभीष्ट अर्थ यज्ञोपवीत कट गया । जीका जब मनुजीने ' शूद्र ेण हि समः तावद् यावद् वेदे न जायते ' ( २०१७२ ) इसमें वेदसे हीन द्विजको भी शूद्रके समान कहा है; ' योनीपि तो होत वेदं …….स जीवन्नेव शूद्रत्वम् ' ( २।१६८ ) इसमें वेदाऽनध्येताको श्रर्थवादन करनेपर ' शूद्र ' कहा है । ' स शूद्रत्रद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ' ( २।१०३ ) ' नहीं बनाता । में शूद्रको द्विजकर्म में मनुजी अधिकार नहीं देते; तब शाण्डिल्य मनुकी मनुष्यमात्रको यज्ञोपवीत देनेकी भावना कैसे बताते हैं? वास्तवमें पं. जी श्रावश्य का हृदयदर्पण इतना स्वच्छ है कि वे अपने भावको मनुके पद्यमें देखते ( १०/४ वर्णोंको हैं । अपनी उक्तिको मनु वा वेदकी उक्ति समझते हैं । दणं हैं आगे पं. जी एक प्रापत्ति खड़ी करते हैं । लिखते हैं- यदि वेद उन्हीं भी न द्विजोंकेलिए होता; जो जन्मसे त्रैवर्णिक हैं; तो वे द्विजपुत्र होनेते पं.जीकी पहले ही द्विज हैं; उनको पुनः द्विज बनानेकी भावनासे उपनीत करना ' व्रात्य ' तो पिष्टपेषण है । ' द्विजपुत्र खेद है पं.जी इन बातोंको जानते वूझते हुए भी इनपर प्राप बनाना उठाते हैं! ' अत्रिस्मृति ' में ठीक ही लिखा है- ' जन्मना ब्राह्मणो क्षेत्र एकज ह संस्काराद् द्विज उच्यते ' ( १३८ ) जन्मसे ब्राह्मणका लड़का ' ब्राह्मण ' माना यह जाता है, पर उपनयनसे ' द्विज ' कहा जाता है । यह दूसरी बात है कि वैश्यः त्र भविष्यत्का विचार करके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको पहले से ही द्विज वह ' द्विज ' क दिया जावे । जैसेकि — कोई तन्तुएं लेकर जुलाहेके पास जाकर कहे कि इसकी चरितार्थ धोती नो, सो उन तन्तुको ' धोती ' कहना भविष्यद् - दृष्टिते है । ( १०१४
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[ ५८१ 1 ५६० वैसे ही यहां २७ ) में कि द्विजका फिर जोकि कहा श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) भी त्रैवर्णिकको द्विज कहना इसी दृष्टिसे है । भाव यह है । पुत्र ' द्विज ' नहीं होता; जब तक उसका जनेऊ न हो जाय । जाता है- ' यो वर्णा द्विजातय: ' इसका भाव यह है कि-प्रध्यापक क्षत्रिय, वैश्यको ही उपनयनका अधिकार है, त्रैवर्णिकसे भिन्न ष्यमात्र ब्राह्मण,; तव ' शिष्यमात्र ' उपनीत हो सकता है ' यह शाण्डिल्य -व्यमान शूद्रादिको नहीं सर्वथा कट गया । जीका कथन ' द्विज ' यह वर्णका नाम नहीं होता । पितृपरम्परासे वर्णव्यवस्था २१७२ ) तो होती है, पर द्विजत्वकी व्यवस्था नहीं । वह तो त्रैवर्णिककी उपनयन करनेपर ही होगी । सो द्विज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य उपनयनसे ही प्रर्थवादसे बनाता है । तभी वह उपनयन के बाद वेद पढ़ता है, अन्य स्त्री - शूद्रादि २११०३ ) ' नहीं । जन्म से ही द्विजत्व माननेपर तो फिर ब्राह्मणादिको उपनयनकी मनुकी प्रावश्यकता भी नहीं थी । ' ब्राह्मणः क्षत्रियो, वैश्यः त्रयो वर्णा द्विजातयः ' पं.जो ( १०१४ ) यह मनुवचन तो इस अभिप्रायको रखता है कि - इन तीन में देखते वर्णोंको ही उपनयनका विधान है; शूद्रादिको नहीं । अतः द्विज तीन ही वर्ग हैं । चतुर्थ - शूद्रको यज्ञोपवीतका कहीं प्रदेश नहीं ( अतः वह ' द्विज ' चिद उन्हीं भी नहीं है ) श्रव भी नहीं, आगेकेलिए भी नहीं । यह तात्पर्य होनेसे त्र होनेसे पं.जीकी कही आपत्ति खण्डित हो जाती है । उपनयनहीन ब्राह्मणादि करना ' व्रात्य ' होता है ' द्विज ' नहीं । जोकि आगे पं. जीने लिखा है कि- ' यदि वे द्विजपुत्र होते हुए भी जन्मसे एकज हैं; अतः उन्हें उपनीत करके ' द्विज ' बनाना असङ्गत नहीं ' ऐसा कहा जावे, तो शेष ( शूद्र ) पुरुष भी तो ह्मणो शेष. एकज हैं; उन्हें क्यों न द्विज बनाया जाय? ' माना यह शाण्डिल्यजी की प्रापत्ति भी व्यर्थ है; क्योंकि - ' ब्राह्मण:, क्षत्रियो द्विजातय: ' ( मनु. १०।४ ) इन तीन वर्णोंको तो एकजसे - द्विज वह ' द्विज ' करनेका विधान है; जिससे ' द्विबंद्ध सुबद्धं भवति ' इस न्यायकी कि इसने चरितार्थता हो जावे । पर शूद्र के लिए ' चतुर्थ एकजातिस्तु ' ष्टिसे है; ( २०१४ ) इस प्रकार अनधिकार होनेसे द्विजत्वका अधिकार नहीं । भारतीय धर्मशास्त्रकी आलोचना [ ya? जबकि शुद्रको कड़े कामों वा सेवाकेलिए लगाना शाण्डिल्यजी भी वेदानुसार स्वीकृत करते हैं; तब उसका भावी वेदाध्ययन ही नहीं होता । उसके न होनेसे उसका उपनयन नहीं होता । उपनयन न होनेसे उसका द्विजत्व नहीं होता । यह बड़ी स्पष्ट वात है । इसपर आपत्ति क्यों? वह ' एकज ' का एकज ही बना रहता है । सेवाका कड़ा कार्य उसके पास होनेसे समयाभावके कारण यह न्याय्य भी है । शूद्रको ' ब्रात्व ' भी नहीं कहा जाता । अधिकार सबका अपने कर्ममें तो हो सकता है; पर दूसरेके कर्म नहीं । सेवकका प्रमुवाले कार्यमें वा उसकी गद्दीपर बैठनेमें अधिकार कैसे हो? यदि राजा अपने झाडू - बुहारी करनेवाले भृत्यको अपना मन्त्री नहीं बनाता, वा अपनी गद्दी पर उसे नहीं वंठाता; तो यह न्याय्य बात है । यह मानवताका अधिकार छीनना नहीं है । द्विजोंके पुत्र द्विज बनें और द्विज- कृत्य में अधिकृत हों; और एकजके पुत्र एकज बनें; तथा उनका कृत्य सेवा सम्भालें, यह व्यवस्था तो बहुत सुन्दर एव न्याय्य है । संसारमें शान्ति एवं सुव्यवस्था रखने वाली है । ' परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ' ( गीता १८१४४ ) ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ' ( १८४८ ) | मानवको सिद्धि प्राप्ति, तथा मानवकी ईश्वरपूजा स्वकर्मप्रवणता ही है । वेदका यह वचन याद रखिये— ' तपसे शूद्रम् ' ( यजुः माध्यं. ३०१५ ) ( शूद्र कृच्छ्र-कर्म रूप - तपकेलिए नियुक्त होता है । ) ' तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( मनु. ११ | २३५ ) । आशा है - पं. जी वेदविरुद्ध प्राचरणका उत्तरदायित्व अपने पर न लेंगे । जब ऐसा है, तो ' केवल द्विजोंके पुत्रोंको एकजसे द्विज बनाना, और शेष एकजोंको शूद्र मानकर उनको वेदाविकारते वञ्चित रखना मानवताका अधिकार छीनना है ' यह श्रीशाण्डिल्यजीका तर्क सभी वेदादिशास्त्रोंसे विरुद्ध है । द्विज जनताको अपनी सेवा अपेक्षित है, और शूद्रको पनी वृत्ति अपेक्षित है । द्विज - पतिको अपनी सेवा अपेक्षित है, जिसके लिए उसने स्त्रीका वरण किया है, जिससे वह निश्चिन्त होकर
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५६२ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) धार्मिक कृत्य तथा जनताके ज्ञानार्थं पुस्तकादि - निर्माण एवं अन्य कार्य करने हैं । स्त्रीको वृत्तिके स्थान एक पुरुषका सहारा अपेक्षित है । जिससे उसे पर - पुरुषका मुंह न देखना पड़े । यह न्याय्य बात है । परन्तु स्त्री एवं शूद्र अपने भी कृत्य करें, तथा द्विजोंके कर्तव्य भी निभाव - यह प्रन्याय्य बात है । उनपर अत्याचार है - यह लौकिक दृष्टि भी यहाँ स्वयं समझ लेनी चाहिये । पं. जी याद रखें - ' आषं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना । यस्त-कॅणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ' ( मनु. १२ । १०६ ) ( वेद तथा धर्मशास्त्रका जो पुरुष वेद तथा शास्त्रसे श्रविरुद्ध तकँसे अनुसन्धान करता है, वही धर्मको जान सकता है, दूसरा नहीं । ) अपने शास्त्रोंसे विरुद्ध द्विजत्वको सार्वभौम बनाना ' योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साघुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ' ( मनु. २।११ ) ( जो द्विज धर्मके मूल - श्रुति एवं स्मृतिको केवल तर्कसे अपमानित करता है, वेद एवं शास्त्रके निन्दक उस नास्तिकका बहिष्कार करना उचित है ) इस पद्यको निमन्त्रण देना है और द्विजत्व के गौरवको घटाना है । द्विजका पुत्र द्विज रहे, और एकजका पुत्र एकज- यह न्याय्य बात है । समूचे भूमण्डल के पुरुषोंको द्विजत्वका अधिकार नहीं होता, किन्तु ' स्वं स्व चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: ' ( मनु. २।२० ) सभीको ब्राह्मणसे अपना - अपना चरित्र सीखना ही उन्हें प्रदिष्ट है, अन्य ग्रन्यका चरित्र लेना आदिष्ट नहीं । वेदकेलिए त्रैवर्णिक प्राचार्यकुल में जाएंगे; तद्-व्यतिरिक्त शूद्र - अन्त्यजादि लोग यहांके प्रग्रजन्मा ( ब्राह्मण ) से अपना-अपना चरित्र सीखेंगे । वेदको सर्वसाधारण नहीं ग्रहण करेंगे । यज्ञोपवीत वेदपठनार्थ होता है, साधारण अपने चरित्रोंके सीखनेकेलिए नहीं? आगे वादी, श्रीशाण्डिल्यजीका कथन उद्धृत करता है - ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ' इत्यादि । इसमें कोई पुरुष विशिष्ट गुणोंसे युक्त हो, तो उसे वेदाधिकार दिया जा सकता है ' । यह परिश्रम भी पं. जीका व्यर्थ है । ' भारतीय धर्मशास्त्रकी ' प्रालोचना [ ५३1 इस विषय में इस पुष्पमे पृ. १५६-२०४ देखिये | असूयक प्रादि दोष शूद्रोंके स्वाभाविक हैं । कर्मसे वर्ण माननेवाले , अन्जु, सुषि नकार कर ही नहीं सकते । जन्मसे 1 वर्ण माननेवाले पाप इसमें ऋत हम लोगों के नदि भी पूर्वजन्म के कर्मोंके संस्कारानुसार ये दोष शूद्रमें स्वाभाविक मत प्रव हाँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों में भी यदि वे पूर्वजन्ममें हैं । प्राप तो यह दोष अपवादरूपसे आ सकते हैं । इन मन्त्रोंसे शूद्र रहे हों; पढ़ाने का भी निषेध हो जावेगा । उन द्विज - पुत्रोंके ईश्व स्पष्ट है कि - श्रीशाण्डिल्यजी यहां भी सफल नहीं हो सके परम यह है कि उन्होंने अमौलिक सिद्धान्त पकड़ रखा है, वहाँ असफलता । कारण प्रसङ्गति स्वाभाविक ही है । अन्तमें वादी श्रीशाण्डिल्यजीका लेख वा उद्धृत करता है - ' यदि भारतमें रहनेवाले परिमित द्विजमात्र ही वेदाधिकार प्राप्त कर सके, और अन्य भूमण्डलवासी मनुष्यमात्र शूद्र मानकर वेदाधिकार पृ. ) बहिष्कृत कर दिये जावें, तो यह परमेश्वरकी दृष्टिमें महान् पक्षपात प्रका होगा ' । श्रीशाण्डिल्यजी ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( प्र. १ ९ ०७१११ ) कहनेबाजे केवल वैदिक - ईश्वरकी भी अव भूल निकालते हैं । स्वा. द.के सत माननेवाले व श्रीशाण्डिल्यजी बताएं कि अग्नि, वायु, सूर्य, श्रङ्गिरा भारतीय ऋषि जो उनके मतमें ब्राह्मण हैं, को परमात्माने वेद दिये, किसी शूद्रको तथा विदेशीको एवं स्त्रीको परमात्माने वेद क्यों नहीं दिये? क्या यह उनके मतमें पक्षपात नहीं? परमात्माने मरुभूमिवालोंको जल परिमित दिया है, इधरके लोगोंको जल अपरिमित दिया है; जहाँ सुन्दरता केलिए फौवारे भी चला करते हैं; ज्ञान और पानीको व्यर्थ किया करते हैं । उधर छाया, शाक आदि परिमित सकत दिये; और इधर अपरिमित दिये । क्या यह आपके मऩमें पक्षपात नहीं? छोटी विदेशोंमें शीत बहुत अधिक दिया; वहाँ गर्मी कम दी; केवल एक - दो अपने स ० ध ० ३८ नास
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५६४ ] परन्तु भारत में पूरे छः ऋतु दिये, गङ्गा जैसी लाग्दायक अशुचि ऋतु ही दिये; वेद भी भारतमें ही भेजे, विदेशों में नहीं । परमात्मा के के इसमें नदियां दीं, भारतमें ही परमात्माने किये, विदेशों में नहीं, क्या यह मतम अवतार भी नहीं होगा? क है । आपके मतमें पक्षपात रहे हों; आप इसका उत्तर स्वा. द. जीके शब्दोंमें यह दं कि - ' अत ज - पुत्रोंके पर यदि लेशोपि नैव प्रागच्छति, किन्तु अनेन तस्य न्यायकारिणः ईश्वरे पक्षपातस्य न्याय: प्रकाशितो भवति । कुत:? न्यायेति (? ) कारण परमात्मनः सम्यङ यो यादृशं कर्म कुर्यात् तस्मै तादृशमेव फलं दद्यात् । लता वा अस्यैव ग्रश्रवं वेदितव्यम् नामास्ति -, तेषामेव [ चतुऋषीणां ] पूर्वपुण्यमासीद्, अतः खलु एतेषां उदद्भुत हृदये वेदानां प्रकाशः कतु ं योग्योस्ति ' ( ऋभाभू. वेदोत्पत्तिविषय १६ पू. ) ( उन चार ऋषियोंका पूर्वपुण्य था; अतः उन्हींके हृदय में बेदोंका धिकारसे प्रकाश किया गया । ) • पक्षपात तब हमारा भी यही उत्तर जान लीजिये । स्वामीजीने भूमण्डलभर में केवल चार ब्राह्मण अधिकारी माने, लेकिन हमारे सनातनधर्मने भारतीय-कहने वाले वर्णिकों को उनके पूर्व पुण्यके कारण जिनके कारण उन्हें त्रैवर्णिकता प्राप्त मानने वाले हुई, वेदाधिकारी माना । शूद्र अन्त्यजादिके तथा विदेशियोंके पूर्वजन्मके भारतीय कर्म इस प्रकार थे, जिनसे उनका त्रैवर्णिकों के तथा भारतीय परिवारमें जन्म नहीं हुआ । तब उनके इस अनधिकारमें पक्षपात कुछ भी नहीं दिवे? हुप्रा । यदि आप हमारी यह बात नहीं मानते; तो अपने श्रद्धेय स्वा.द.-की युक्ति भी गलत मानिये । लोगों को तथापि शूद्रादिको भी वैदिक ज्ञानसे वञ्चित नहीं किया गया । वही करते हैं; ज्ञान उन्हें अनादिसे वा सृष्ट्यादिसे चालू पुराणादि द्वारा सुनाया जा परिमित सकता है । वड़ी तीन श्रेणियोंको यदि मुख्याध्यापक स्वयं पढ़ाता है, नहीं? छोटी श्रेणियोंको यदि मुख्याध्यापक साक्षात् न पढ़ाकर अपनी वही विद्या एक दो - अपने छात्रों द्वारा पढ़वा देता है, तब इसमें भी कुछ पक्षपात नहीं माना वा सकता । ' भारतीय धर्मशास्त्रकी ' प्रालोचना [ ५३५ श्रागे श्रीशाण्डिल्यजी लिखते हैं- ' वस्तुतः परमेश्वरने ऐसा नहीं किया; किन्तु उसके अदूरदर्शी पुजारियोंने ही यह पक्षपात किया है ' महोदय! भगवान् के प्राचीन पुजारी - प्रदूरदर्शी नहीं थे, भगवान्का श्रन्तस्तल जाननेवाले थे । मनु - याज्ञवल्क्यादि समाधि - सिद्ध ऋषि - मुनि, तथा सभी गृह्यसूत्रकार एवं सभी प्राचीन ग्राचार्य वेदानभिज्ञ वा प्रदूर-दर्शी नहीं हो सकते । श्रागे शाण्डिल्यजी लिखते हैं- ' प्रभुकी वाणी वेदने तो स्पष्ट ही ' जनेभ्यः ' कहा है ' वस्तुतः यहाँ भी पं.जीकी अपनी ही भारी भूल रही है । पहले उन्होंने ही इसे एक ऋषिकी उक्ति ( देखो पृ. ४६ ) माना; अव उसे ही ' प्रभुकी वाणी ' कहने लगे । तभी तो श्रीयास्कके शब्दोंमें ' पुरुषकी विद्या अनित्य ' ( निरु. ११२ ७ ) हुआ करती है । आजकल के प्रभुके पुजारी प्रभुको प्रपनी इच्छानुसार ही चलाना चाहते हैं । प्राचीन- पुजारी प्रभुके कथनानुसार ही चलना चाहते थे, और हैं । उसके सम्भवी अर्थको तोढ़ - मोड़ करके बदलते नहीं थे । ' जनेभ्यः ' यदि वेदश्रुतियोंके लिए होता; तो ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १६७१।१ ) प्रभु यह शब्द न कहते, किन्तु उसके स्थानपर ' वेदमाता पावमानी जनानाम् ' कहते; पर ऐसा नहीं है; मतः पहला ' जनेभ्यः ' ( यजुः २६ २ ) शब्द ' वेदवाक् ' के लिए नहीं है; तभी तो उसमें केवल ' चाचं ' है, ' वेदवाचं ' नहीं है । यह तो प्रत्यक्ष बात है । जिस मन्त्रमें ' वेदमाता ' शब्द है, वहां ' द्विजानाम् ' हैं, ' जनानाम् ' नहीं । अन्तमें पं. जी कहते हैं - ' अतएव दूरदर्शी कण्व ऋषिने दस हजार यवनोंको संस्कृत पढ़ाकर यज्ञोपवीत दिया; और द्विज बनाकर ईश्वरीय-ज्ञान वेदको सबके लिए देनेका मार्ग ही खोल दिया । अतः दूरदर्शी ब्राह्मणों को शास्त्रसिद्धान्तानुसार सभी मानवोंको द्विज बनाकर अपनाना चाहिये ' |
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५६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कहना पड़ता है कि- पं. जीने अपने ' भारतीय - धर्मशास्त्र ' मुझे खेदसे में जो बातें लिखी हैं; उन बातोंको न तो उन्होंने सहित वेदोंमें देखा; और न ही उन्हें पुराणादिमें किन्तु दयानन्दी - निबन्धकारोंने जैसा लिख डाला, विना वहाँका पूर्वापर- प्रकरण देखे उनको वैदिक लिख दिया । यहाँ भी उन्होंने उक्त भविष्यपुराणके की है । इस विषय में शाण्डिल्यजी इसी पुष्पके पृ. स्वयं पूर्वापर प्रकरण-देखनेका कष्ट किया; श्रीशाण्डिल्यजीने भी वा शास्त्रीय बताकर इतिहास में यही वात २३८- २४६ में उसका पूर्वापर देखें । यहाँपर श्रीशाण्डिल्यजीने म्लेच्छ बा यवन शब्दसे मुसलमान रखे हैं । पर यह उनकी भूल है । इस विषय में भी वे पूर्वोक्त समझ पृष्ठोंमें देखें । शाण्डिल्यजीके माननीय श्रीसत्यव्रत - सामश्रमीने ' ऐतरेयालोचन ' के १७-१८ पृष्ठमें लिखा है - ' एवं च प्रस्मत् - शास्त्रकृता ब्राह्मणादि - जाति-संज्ञा तु अस्माकमेव [ भारतीयानाम् ]; भारताद् अन्यत्र [ विदेशेषु ] तु ब्राह्मणादयः त्रयो वर्णाः शूद्रम्लेच्छाश्च नैव सन्ति इति तत्रत्यानां ब्राह्मणादि-जातिभावेन श्रार्यत्वं, शूद्रम्लेच्छत्वेन श्रनार्यत्वं वा न किमपि सङ्गच्छते-। तदेवमिङ्गलेण्डादिदेशानां म्लेच्छदेशत्वम् न कथमपि अस्मत्शास्त्रानुसारतः संगच्छते इति प्रणिधानेन यालोच्यताम् ' । म्लेच्छादि - देशा भारते विद्यन्त एव; म्लेच्छा अपि भारतीयेष्वेव केचन ' । सो श्रीशाण्डिल्यजीका यवन- म्लेच्छ आदिका ' मुसलमान ' ( ' विदेशी जाति ) अर्थ करना श्रीसामश्रमीजीके अनुसार भी खण्डित हो गया । इस विषयकी स्पष्टता पूर्वोक्त पृष्ठों में पं.जी देखें । इससे पं. जीके मतकी पुष्टि न होकर उनके मतका खण्डन हो जाता है । यह दयानन्दी लोग छल करके अपने गलत-पक्षकी सिद्धिकेलिए ग्रन्थोंके पूर्वापर छिपाकर लिख दिया करते हैं । आशा है - भोले - भाले पं. जी आगेसे उन श्रार्यसमाजियोंके दिये प्रमाणोंपर विश्वास न करके भविष्य में स्वयं उनका पूर्वापर प्रकरण देख लिया = करेंगे; अन्यथा उनके पक्षको प्रबल प्राघात प्राप्त होगा; और उन्हें ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' पर विचार [ ५१४ ५६ लज्जित होना पड़ेगा, पं. जीने वहांका ' दैत्यों का मत ' तो लिया; परन्तु देवताओंका जो वहाँका मत ' सिद्धान्तपक्ष ' था अपना तक तक नहीं । फिर वहाँका इतिहास आधा छोड़कर प्रमाणित उसे देना इस ' जरतीय ' न्यायकी चरितार्थता हो जाती है । इस ग्रार्यसमाजी करना प वादी पकड़नेसे सरल - प्रकृति पण्डितजीकी शोभा नहीं बढ़ेगी । इंग उसप इसके श्रागे एक दयानन्दी - सिद्धान्तालङ्कारकी ' स्त्रियोंका वेदाध्यवनं गया पुस्तककी आलोचना करके इस पुस्तकको समाप्त किया जावेगा । ' श्रीस चुका बादी ( ६१ ) ' स्त्रियों का वेदाध्ययन ' पर विचार । ( प्रथम अध्याय - वैदिक प्रमाण ) पुस्त इस हमारे सामने ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन और वैदिक कर्मकाण्ड में प्रधिकार उसक एक दयानन्दी - सिद्धान्तालङ्कार की एक पुस्तक पड़ी है । इसके २३६ पृष्ठ हैं । इसमें ५ अध्याय तथा एक परिशिष्ट तथा उपसंहार दिया गया है । या न प्रथम अध्याय ( पृ. १ से ३३ पृ. तक ) में तथाकथित ' वैदिक प्रमाण ' हे हुई गये हैं । द्वितीय अध्याय ( पृ. ३४ से ५३ पृ. तक ) ' ब्राह्मण - ग्रन्थों और श्रौतसूत्रोंके प्रमाण दिये हैं । तृतीय अध्याय ( पृ. ५४ से पृ. ९ ० तक ) अर्वाच गृह्यसूत्रों के प्रमाण दिये । चतुर्थ श्रध्याय ( पृ. ६१ से पृ. १५३ तक ) या उ ' स्मृतिवचनविमर्श ' दिया गया है । पञ्चम अध्याय ( पू. १५४ से १ लिया २२२ तक ) ' ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार किया गया है । ि क्रमिक ' परिशिष्ट ' ( पृ. २२३ से २२ ९ तक ) तथाकथित ' कुछ ग्रन्थ सट समुल प्रमाण ' दिये गये हैं । फिर उपसंहार ( पृ. २३०-२३६ ) त कर्मे संखेने तवय पूर्वोक्त कहा गया है । विचा यह पुस्तक वादीका कोई नया वा अपूर्व अध्यवसाय नहीं है । कई पुष्पमे पोपक उसने अपने पत्र ‘ सार्वदेशिक ' ( जून, जुलाई, अगस्त १ ९ ४६ ) में विज्ञा था । उसका हमने ‘ सिद्धान्त ' में ( चैत्र कृ. ८ सं. २००२ से सं. २००८
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[ ५ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५६८ ३ वर्ष प्रत्युत्तर दिया था । उसी ' सार्वदेशिक ' के सन्दर्भको वादीने -उसे देखा तक पूरे में संकलित किया है । हमने जो उसका पूरा प्रत्युत्तर दिया था करना इस पुस्तक उसका उद्धार नहीं किया । तथापि यह सोचकर कि यदि; पडू वादीने प्रायः हम समाजी संग - उसपर कुछ लिखे नहीं, तो कहा जाता है कि इसका उत्तर नहीं दिया गया- हम उसपर लिखते हैं । --वेदाध्ययनं हमने ' सिद्धान्त ' में दिये गये अपने विस्तीर्ण उत्तरको सक्षिप्त करके TI ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के तृतीय पुष्प में दिया था । श्रव वह समाप्त हो चुका है । उसकी द्वितीयावृत्ति में कुछ हम परिवर्धन कर रहे हैं । उसमें बादीकी उक्त पुस्तककी ' प्रत्यालोचना ' भी संलग्न कर रहे हैं । वादीकी पुस्तकके पृष्ठोंका भी हम इसमें उल्लेख करेंगे । और उसका प्रत्युत्तर जो इस पुष्पमें पहले श्रा गया है; हम उनको दोबारा न लिखकर यहाँ हम में अधिकार उसकी अपनी पृष्ठ संख्या लिख देंगे । २३६ पृष्ठ पृ. १ वादी लिखता है - ' स्त्रियोंको वेदाध्ययन करनेका अधिकार है-गया है ।. या नहीं " इस विषयक चर्चा विद्वानोंमें मध्यकालके पश्चात् प्रारम्भ - प्रमाण हे हुई है । ग्रन्थों और यह वादियोंका कथन निर्मूल है । सनातनधर्म जो कहता है, ) अर्वाचीन विचारधारावाले यदि उसे नहीं मानते, तो उसे वे मध्यकाल की १५३ ६० तक तक ) या उस मध्यकालके पीछेकी विचारधारा कहकर उससे अपनी जान छड़ा १५४ से लिया करते हैं । मनुस्मृति स्पष्टतया स्त्री एवं शूद्रका उपनयन तथा है । क्रमिक एवं वैध वेदाध्ययन नहीं मानती । स्वा.द.जी स.प्र. ११ वें अन्य पट समुल्लासके प्रारम्भ में ' मनुस्मृति ' को सृष्टिकी प्रादिमें प्रणीत मानते हैं; कमें सं यह आदिकालकी विचारधारा हुई, मध्यकालकी वा उसके बादकी विचारधारा कहाँ हुई? वेद भी यही मानता है - यह हम इस तृतीय हीं है । पुष्पमें स्पष्ट कर चुके हैं; तब वह भी क्या मध्यकालकी विचारधाराका द ) में विद्या पोषक है? सं. २००६ " स्त्री - शूद्रो नाधीयाताम् इति श्रुतेः ” इस प्रकारके कल्पित वचन श्रुति-' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' पर विचार [ ५३ या वेदके नामसे स्वार्थी लोगोंने घड़ दिये, तथा इस आशय के वचन स्मृतियों प्रादिमें मिला दिय " । यह वादियोंका थाने पक्षसिद्धिका निर्मूल दूसरा श्राविष्कार है । जिस बात को वे नहीं मानते; उसको वे ' प्रक्षिप्त ' होनेका ' फतवा ' दे दिया करते हैं । पर विद्वान् लोग जो इन वादियोंके हथकंडोंने पूरी तरह जानकार हैं, इसका उन लोगोंपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा करता । ' स्त्री - शूद्रौ नाधीयाताम् ' यह वचन किसी ब्राह्मणग्रन्थका है; बहुतसे ब्राह्मणग्रन्थ व लुप्त हैं; पर यह निर्मूल नहीं है । हम इस विषय में स्पष्टता इसी पुष्प में पहले कर चुके हैं । बहुतसे भाष्यकारोंने अपने भाष्य में इसे उद्धृत किया है । वादीके स्वामीके स.प्र. तथा संस्कारविधि भी इसकी सत्यता में प्रमाण हैं । सं.वि. के उपनयन संस्कारमें उपनयनके अधिकारियोंमें स्त्री-शूद्रका कहीं नाम तक भी नहीं लिखा । उनमें ' लडके ' शब्दका स्वामीने न थककर १६ वार प्रयोग किया है, लड़कीका नाम स्वामीने एक बार भी नहीं लिखा । स.प्र. में भी स्वामीने- ' अपने घरमें लड़कोंका यज्ञोपवीत और कन्याओंका भी यथायोग्य संस्कार करके ' ( तृतीय समु. पू. २० ) यह वाक्य लिखा है । यहाँ लड़कोंका तो स्वामीने ' यज्ञोपवीत ' लिखा है । पर लड़कियोंका ' यज्ञोपवीत ' न लिखकर ' ययायोग्य संस्कार करके यह लिखा है, इससे स्पष्ट हो रहा है कि वे लडकियोंका ' यज्ञोपवीत ' नहीं चाहते थे, यह स्पष्ट सूचित हो रहा है । नहीं तो इस भिन्न वाक्यको पृथक् आवश्यकता नहीं थी । शेष जो स्वा.ट.के वेदभाष्यमें कहीं - कहीं लड़कियोंका यज्ञोपवीत लिखा दिखाई देता है, तथा स.प्र. में भी कहीं - कहीं, तथा स्वाद के पत्र-व्यवहार में भी कहीं - कहीं ऐसा दिखाई देता है; यह सव दयानन्दियोंका प्रक्षेप ही है । स्वाद के वेदभाष्य तो स्वा. द. की मृत्युके बहुत पीछे तक छपते रहे । तथा स.प्र.का द्वितीय सस्करण भी स्वामीजीकी मृत्युके पीछे छपा;
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६०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सो उसमें दयानन्दियोंका प्रक्षेप करना कुछ कठिन नहीं था । पत्र - व्यवहार में इस विषय में उसके विषयमें कई गलत बातें पीछेले प्रक्षिप्त कर दी गई । स्वा.द. जातिपक्ष नहीं मानते थे, इसमें उनका ' यथेमां ' मन्त्र का अर्थ प्रमाण है, पर मनुस्मृतिमें जहाँ पुरुषके यज्ञोपवीतकी बात थी; वहाँ स.प्र. आदिमें कहीं - कहीं कन्या वा स्त्रीका नाम भी प्रक्षिप्त कर दिया गया । ( भूमिका ) वादीने ' सार्वदेशिक ' ( जून १ ९ ४६ ) में लिखा था कि- ' वेदोंमें न केवल स्त्रियोंके वेदाध्ययनका कहीं निषेध नहीं; बल्कि हजारों मन्त्रोंमें उनके कर्तव्यों का विशेष करके प्रतिपादन है, और उन्हें सम्बोधित किया गया है । यदि स्त्रियोंको वेद पढ़नेका अधिकार नहीं; तो फिर इन मन्त्रोंका वेदोंमें होना सर्वथा व्यर्थ हो जाता है ' । वादी अपनी चार वेदसंहितानों में लगभग २२-२३ हजार मन्त्र मानता है; तब उनमें हज़ारों मन्त्र स्त्रियोंके कैसे हो गये? वादी प्रतिशयोक्ति-अलङ्कारका प्राचार्य कवसे बना है? ऋषिकाएं भी वेदमें उसने हजारों बताई; पर २८ तक गिनकर आगे उसका मुख वन्द हो गया । वस्तुतः ऐसे व्यक्ति लोगोंको इस प्रकारकी गलत बातें कहकर ठगते हैं । इस पर हमारा कथन यह है कि - प्रतिपक्षीने ' वेदमें क्या कहा गया है ' यह न देख - भालकर उसमें आर्यसमाजके ( दयानन्दी ) सिद्धान्त ढूंढनेका घोर परिश्रम किया है । तव वादीको उन सिद्धान्तोंसे भिन्न वेदमें दीखे ही क्या? ' पश्यति पित्तोपहतः शशि - शुभ्र शंखमपि पीतम् ' ( पीलिया के वीमारको चन्द्रमाकी भाँति सुफेद शंख भी पीला दिखलाई पड़ता है । ) वेद में स्त्रियोंकेलिए तो क्या, छोटे बच्चोंकेलिए भी मन्त्र प्राये हैं । देखिये अपनी ' संस्कारविधि ' । इसका कुछ निर्देश हम पृ. १३८ - १३६ तथा भूमिका पृ. २३६-२३६ में कर आये हैं, आगे ( पृ. क्या उससे वादी छोटे बच्चोंका भी वेदमें बच्चोंके तो क्या; वेदमें बादलों, सांपों तथा | ६ | ६०२ ६०७-६०६ ) भी करेंगे अधिकार मान लेगा? । स काण्डक विच्छुग्रोंके लिए छोटे पत्रके हैं । वेद में तो लोकदृष्टिमें जड़ोंको भी सम्बोधित करके भी मन्त्र वादीने अपनाया गया है । तब क्या इससे उन बिच्छू, सांप, तथा जड़ मूर्तिपू - पदार्थो कोई स भी वेदमें वादीके मतसे अधिकार हो जायगा? जाता वेद मन्त्रोंमें वादी नियतानुपूर्वी तथा नियतपदप्रयोग - परिपाटीका- दूसरेके की विशेषता जानता होगा । इसीको लक्ष्य करके निरुक्तकारने' अनश परिवर्त हि मन्त्राः ' यह कौत्सका मत उद्धृत किया है, और उसकी यह उपन भी दी है — ' नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्ति ' ( १११५२४ ) । रहता । वस्तुतः यह केवल कौत्सका मत नहीं, बल्कि यह सभी वैदिकोंका मत है । फलवन्त नियमप इसलिए ' मीमांसादर्शन ' में भी कहा है- ' अनाम्नातेषु श्रमन्ववन् ( २ | १ | ३४ ) ' वाक्यनियमात् ' ( १ २ ३२ ) यहाँपर भाष्य है - नियर- • प्रात्माप पदक्रमा हि मन्त्राभवन्ति, ‘ अग्निमूर्धा दिव ' इति, न विपर्ययेण । ( मनरे इसका पद नियत क्रमवाले होते हैं, विपरीत नहीं किये जाते ) । पद - क्रम इसका रहस्य क्या वादी जानता है? न जानता हो; तो कर य रखे । वेदमन्त्रका अधिकारी द्वारा जिसपर यथाविधि उच्चारणमूह क्योंकि प्रयोग किया जावेगा, उसपर उसका प्रभाव पड़ जावेगा, चाहे वह छोटा लिखा बच्चा हो, वा बड़ा | चेतन हो या लोकदृष्टिसे अचेतन, चाहे वह पढ़- करके इ लिखा हो, वा न पढ़ा - लिखा हो । इसलिए वेदमन्त्रोंका संस्कार गर्भपर मे प्राप्त ह पड़ता है, जातमात्र बालकपर भी पड़ता है, पाँच - छः वर्षके व पर भी का कर पड़ता है; बल्कि बादल आदिपर भी पड़ता है । यही वेदमन्त्रयुक्त - संस्कारो विशेषता होती है । चाहे वह उस मन्त्रका अर्थं जानता हो, वा नजान इस १२ वर्ष हो? नहीं तो संस्कार सभी देशभाषाओं में होने चाहियें थे; पर ऐसा नहीं । नहीं भी होता । है; तो इसका कारण यह है कि यह कर्मकाण्ड है, ज्ञानकाण्ड नहीं । है । उस