सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 331–340

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 331–340

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६०२ ] करेंगे । स नाम वेदमें ' अविद्या ' ( यजुः माध्य. ४०।६-११ ) हे ' वैदिक धर्म ' ? छोटे- काण्डका आरम्भिक वर्षोंमें ' ईशोपनिषद् ' का पद्यमय अनुवाद करते 1 मन्त्र प्रारं uri नदीने भी यही अर्थ माना है । ' अविद्या ' का यह भाव है कि चाहे उसे हुए मूर्ति पूराशे कोई समझे, वा न समझे; पर उस ध्वनिसमूहका उसपर प्रभाव पड़ ही ड़ - पदायको जाता है । वहाँ यह ' कर्ममात्र ' करना पड़ता है, उस मन्त्रका प्रयोगमात्र दूसरेके कहनेपर करना पड़ता है, इसलिए महाभाष्य में भी कहा है-र्डरपाटीका ' धाज्ञे कर्मणि प्रयोगनियमः ' ( पस्पशा. ) पर्याय श्रादि द्वारा श्रथवा व्युत्क्रमले अना परिवर्तन करनेपर वैसा नियतध्वनिसमूह न रहनेसे वह ' मन्त्र ' नहीं यह उपपति रहता । ' यथा वेदशब्दा नियमपूर्वकम् ( नियतक्रमेण ) अधीताः सन्तः - १।१५ ( ४ ) । फलवन्तो भवन्ति ' इस ' पस्पशाह्निक- स्थित महाभाष्यके वचनानुसार का मत है । नियमपूर्वक वर द्वारा पत्नीके सामने बोले जानेपर पत्नीके शरीर तथा श्रमन्वलम् | • श्रात्मा पर उसका प्रभाव पड़ जाया करता है । ऐसा प्राचीन सम्प्रदाय है, है - निवड | इसका कारण वेदका ‘ शब्द - प्रधान ' होना है । मीमांसा भी इस नियत-| ( मनके पद - क्रमको ' श्रदृष्टार्थ ' ही मानती है । यही बात दयानन्दी - वादीके स्वामीजीने भी अपनी ' संस्कारविधि ' ; तो चन की भूमिका के अन्त में लिखी है- " यहाँ सब मन्त्रोंका अर्थ नहीं लिखा है, चरण G क्योंकि इसमें कर्मकाण्डका विधान है, इसलिए विशेषकर क्रियाविधान लिखा है ।... यहाँ तो केवल क्रिया करनी ही मुख्य है, जिस [ क्रिया ] वह पड़ करके शरीर और श्रात्मा सुसंस्कृत होनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको गर्भपर नं प्राप्त हो सकते हैं, और सन्तान अत्यन्त योग्य होते हैं, इसलिए संस्कारों-कोंपर भी का करना सव मनुष्यों को उचित है " । - संस्कारो न जानता इस वादीके स्वामीके कथनसे भी हमारी बात स्पष्ट हो गई कि -सामने ऐसा नहीं १२ वर्षकी लड़कीका यदि विवाह हो रहा है, चाहे वह कुछ पढ़ी - लिखीं नहीं भी है; वर यदि उसे लक्ष्य करके यधाविधि सस्वर मन्त्र बोल रहा । है; तो उसकी पत्नीके शरीर वा श्रात्मापर उसका प्रभाव पड़ ही जाता नहीं है । उस लड़कीके पढ़ने - लिखनेका प्रश्न ही नहीं उठता । गर्भ में दवें मासमें भूमिका [ ६०३ भी उसका प्रभाव पड़ना सभी मानते हैं; याद रखो अभिमन्यु श्रीर प्रह्लादको । उस समय क्या वे पढ़े - लिखे थे । पर वादीके स्वामी तो गर्भाधान के दिनसे ही उपदेशका प्रभाव मानते हैं । देखो स.प्र. भ्य समुल्लासका प्रारम्भ । यह हम आगे कहेंगे । गर्भ कोई भाषा पढ़ा हुआ तो होता ही नहीं, और स्वाद के कहे हुए गर्भाधानमें तो उस समय चैतन्यका सञ्चार ही नहीं होता । उसका चैतन्य उस समय श्रव्यक्त होता है । यदि उसपर भी स्वामीके कथनानुसार प्रभाव पड़ जाता हैं; तो फिर नियतानुपूर्वी वाले वेदमन्त्रका प्रभाव लड़की वा स्त्रीपर क्यों नहीं पड़ेगा? वह तो चेतन होती है । कमसे कम ११-१२ वर्षकी होती है । इसका विशेष कारण यह है कि - वेद ' शब्द - प्रधान ' हुया करते हैं । शब्द - प्रधान होनेसे ही उनकी प्रानुपूर्वी तथा उनके पद - प्रयोगकी परिपाटी नियत होती है । वेद परब्रह्ममें समाधि लगाकर स्थित हुए तथा उससे उठे हुए ऋषियों के मुखसे अवितर्कित निकले हुए अर्थात् परमात्मासे सीधे आये हुए शब्दोंका पुञ्ज होता है । मन्त्र न केवल शब्दसमूह है, प्रत्युत परमात्माभिप्रेत ध्वनिसमूह हैं । इसमें स्वरोंका विशिष्ट गुम्फन होता है । इसके विशिष्ट उच्चारणसे शरीर तथा श्रात्मापर उसका अपूर्व प्रभाव पड़ता है । इसलिए उसके लौकिक - अनुवादमें उस दिव्य पदक्रम तथा स्वरक्रमके न होनेसे उन - उन ध्वनिविशेषोंके सम्मिलित परिणाम न होनेसे वह अपूर्व प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता । इसी कारण विवाहादि संस्कार न तो प्रान्तीय भाषाओं में होते हैं; और न ही श्रीपुरुषोत्तमदास टण्डनकी लड़कीके विवाहकी भान्ति हिन्दी में अनूदित मन्त्रोंसे होते हैं । मन्त्रोंका प्रभाव केवल मनुष्यपर ही क्या, सांप - बिच्छू आदि पर तथा मेघ आदि अचेतन - पदार्थोंपर, वल्कि बिच्छू प्रादिके डङ्कपर भी पड़ता है । तब क्या इससे सर्प आदि तथा प्रचेतन - पदार्थ भी वेद के अर्थके ज्ञाता होने चाहियें? जिनके सम्बोधनका भाव ' अधिष्ठात्री देवता ' में न समझकर वादी के स्वामीने सब स्थान में प्रथमान्तता में परिवर्तन कर

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६०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) दिया है । अथवा कोई न पढ़ा- स्त्री - शूद्र अपना संस्कार करा रहा होता है; तब वादी उसे अपनी भाषामें समझा रहे होते हैं; तब क्या उसे कर्तव्यका बोध नहीं हो जाता? जिन मन्त्रों में स्त्रीके कर्तव्योंका प्रतिपादन है, पतिके बोल देने पर उसका प्रभाव उसपर हो जाता है । इससे उनका अर्थज्ञान अनिवार्य नहीं; किन्तु अधिकारी उन्हीं कर्तव्योंको समयपर अपनी भाषा में उसे समझा देता है । जैसे प्राप लोग उस समय हिन्दी में समझा रहे होते हैं । आगे वादीने कई स्त्री सम्बन्धी वेदके मन्त्र दिये हैं; हम उनके विषय में वास्तविकता बताते हैं । वादी ॠसं.का १०८५ सूक्तका ही एक मन्त्र देखे – ' गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं ' इत्यादि जितने भी मन्त्र हैं, इनमें स्त्री सम्बोधक नहीं है, किन्तु सम्बोध्य है । तव इन मन्त्रोंको स्त्री नहीं, किन्तु वर पढ़ेगा । तब इसमें स्त्रीका वेदाध्ययनका अधिकार कैसे सिद्ध हो गया? पूर्वोक्त प्रकारसे मन्त्र पढ़नेके प्रभावसे स्त्रीकी श्रात्मापर प्रभाव पड़ता । पत्नी वह इन्हीं मन्त्रोंके शब्दोंकी शक्तिसे बनती है; उनके अनुवादसे नहीं । नहीं तो क्या वादी भी श्रीपुरुषोत्तमदास टंडनकी भान्ति अपनी लड़कीका विवाह अनूदित मन्त्रोंसे कराएंगे? प्रापको स्वयं शब्दशक्ति माननी पड़ेगी; अर्थशक्ति नहीं । उल्टा धर्थ विचार तो उस समय उस शब्दोच्चारण में व्यवधान करनेवाला सिद्ध होगा । श्रव वादीके दिये ऋ. १०।८६ सूक्तकी परीक्षा कीजिये । यह मानुषी स्त्रीकेलिए हैं ही नहीं । यहाँपर तो ' इन्द्राणी ' को ही कहा जा रहा है । इन्द्राणी देवपत्नी है, मनुष्यपत्नी नहीं । इसपर देखो निरुक्त- ' देवपत्नी ' शब्दपर ( १२।४४ / २ ) ' इन्द्राणी - इन्द्रस्य पत्नी ' ( १२/४६ । १ ) तव वादी-का यह उद्धरण व्यर्थ है । ऋ. १०/१५६ सूक्तका भी वादीका उद्धरण व्यर्थ है । क्योंकि वहाँ भी शची- पौलोमी ( इन्द्राणी देवता ) का वर्णन है, किसी मानुषी - स्त्रीका नहीं । पुलोमकी लड़की एक विशेष स्त्री है, भूमिका [ ६०५ ६०६ वह सब लड़कियों का नाम नहीं हो सकता । ऋ. ( १०।१८३ यजमानकी पत्नीको आशीर्वाद दिया जाता है, जिसे पुरोहित - १६४ ) ३ इसमें एक ऋचा पत्नीद्वारा बोली जा सकती है, वह ' तूष्णीमेताः देगा । हां, में स्प स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज्ञ १।२।१३ ) इस अपवादका क्रियाः य मात्र है । इसी प्रकार अथर्व के १४ वें काण्ड केलिए भी समझें । उदाहरण- पर प्रव इसे स्त्रीका वेदमें क्रमिक एवं वैध ( मनु. २।१७३ ) अधिकार नहीं हो जाता ही क प्र. २।३६ मन्त्रको कुमारी नहीं पढ़ती, किन्तु कुमारीका । सोन ये कोई सम्वन्धी पढ़ता है; तब वह उद्धरण भी व्यर्थ है । अ. ३।३६ का वादन तिखा उल्लेख किया है, पर तीसरा काण्ड तो ३१ सूक्ततक समाप्त हो जाता स नरः है । तब ३६ वां सूक्त कदाचित् वादीने बनाया हो । ५।१७ में तो स्त्रीके वाणी में बोलनेका कोई भी मन्त्र नहीं । हां, पतिके बोलनेके हैं । तो इससे उसमें चोरता स्त्रीका क्या अधिकार हो? स्त्रीको उपदेश देनेके मन्त्र पति बोले- इसमें करनेवा हमारा कोई नकार नहीं । और न ही इससे हमारे पक्षकी कुछ हानि है । प्र इसी प्रकार ६।६ भी पतिके बोलनेका सूक्त है, स्त्रीका नहीं । ६।११ में मन्त्र स भी स्त्रीके बोलनेका कोई मन्त्र नहीं । पुंसवन - कर्म केवल पति ही करता कहे जा है । स्त्री तो केवल साथ बैठी भर रहती है । ६।१७ सूक्त गर्भको इ क्योंकि-करने के लिए पतिकी देवसे प्रार्थना है । स्त्रीके पढ़ने का कोई भी मन्त्र पतिगुं इसमें नहीं । गुरुः स्त्र होता है अथर्व ६७८ में विवाहित पुरुषको पुरोहितादि आशीर्वाद देता है । दिया क इसमें भी स्त्रीके पढ़नेका कोई भी मन्त्र नहीं । ६।१०१ में वाजीकरण नहीं प है, वह पुरुष करता है, स्त्री नहीं करती । ६।१०२ में स्त्रीवशीकरण है । जैसेकि -यह सब पुरुषके कर्म हैं । स्त्री उसमें कोई भी मन्त्र नहीं बोलती । तव उस माण वादी इन सूक्तोंसे स्त्रीका वेदाध्ययनमें अधिकार कैसे सिद्ध करता है — यह कार्यो का आश्चर्यका विषय है । ६ । १३० - १३१ देव तथा देवाङ्गनाओं- अप्सरास चाहिये है, वे मनुप्ययोनिसे भिन्न हैं; अतः मानुषियोंसे उनका कोई सम्ब स्त्र नहीं । देवयोनि मनुष्ययोनिसे भिन्न है - यह सभी प्राचीन आचार्य मान धरण

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६०५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) 7 ६०६ 2 = ४ ) में देवयोनिरन्यः मनुष्ययोनिरन्य: ' ( शत. ७ | ४ | २ | ४० ) यह ' शतपथ ' हां हैं । ' इसपर देखिये- ' आलोक ' ( ४ ) । में स्पष्ट है । ः क्रियाः यदि वादी ऐसा नहीं मानता; तो यह उसका श्रुतिसे बलात्कार है । उदाहरण- देना विद्वत्ता नहीं होती, किन्तु छल होता है । मनुजीने ठीक पर इससे अर्थ बदल ' वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यः जाता । ही कहा है-नयेद् वाच स सर्वस्तेयकृन्नरः ' ( ४/२५६ ) इसका अर्थ श्रीकुल्लूकभट्टने का कोई लिखा है –'अतो यः तां वाचं स्तेनयेत् - स्व - प्रयं व्यभिचारिणीं वाचयति, का वादीने सर्वस्तेयकृद् भवति ' । स्वा. द. जीने इसका यह अर्थ किया है- " जिस हो जाता वाणीमें स नः सब अर्थ अर्थात् व्यवहार निश्चित होते हैं - उस वाणीको जो तो स्त्रीके चोरता है, अर्थात् मिथ्या भाषण करता है, वह सब चोरी श्रादि पापोंको ससे उसने करनेवाला है ', यह वाणीकी चोरी ' साहित्यिक ब्लैकमार्केटिङ्ग ' है । -इसमें प्रतिपक्षीके दिये सव वैदिक - सूक्त समाप्त हो गये । इनमें एक भी हानि है । मन्त्र स्त्रीके बोलनेका नहीं दीखता । हां, स्त्रीके प्रति वर - द्वारा यह मन्त्र ६।११ में कहे जायेंगे । उसीसे स्त्रीको उनका बोध पति द्वारा करा दिया जावेगा; को ह क्योंकि – ' यो मे भर्ता स मे गुरुः ' ( वाल्मी सुन्दर. २४।६ ) ' नार्याः भी मन्त्र पतिर्गुरुः ' ( अयोध्या. ११८।२ ) ' पतिर्गुरुः ' ( उत्तर ४८।१७ ) ' पतिरेव गुरुः स्त्रीणां ' ( चाणक्य ५।१ ) इत्यादि प्रमाणोंसे पत्र गुरु सिद्ध होता है । जिस प्रकार गुरु अशिक्षित बालकोंको उनके कर्तव्यका बोध करा देता है । दिया करता है । बाजीकरण नहीं पढ़ा होता करण है । जैसे कि - ' मम व्रते ती । त उस माणवकको जब माणवक पहले गुरुके पास जाता है, तब वह विद्या । कई उनके कर्तव्यके बोधक मन्त्र भी आते हैं, ते हृदयं दधामि ' आदि । जब प्रशिक्षित वा श्रनधीत प्राचार्य विधिमात्र कराकर समयपर उसको कर्तव्य -T है - यह कार्यो का अपनी भाषा में बोध करा देता है; वैसे यहाँ पर भी समझना सरायक चाहिये । ईसम्बन्ध चार्य मानते स्त्री न पढ़ी हो; तब भी पूर्व कहे हुए प्रकारसे कर्मकाण्ड होने कारण उससे वह कर्म करा लिया जाता है । इससे स्वा.द.के पूर्व-भूमिका [ ६०७ वचनानुसार उनके शरीर वा ग्रात्मापर उसका प्रभाव हो जाता है । अथवा गुरुरूप पति उसको उन मन्त्रोंका तात्पर्य उसकी मातृभाषा में समझा देता है । जैसे वादी लोग दयानन्दिन स्त्रियों का विवाह कराने जाते हैं; क्या उनमें एक भी स्त्री उन मन्त्रों का तात्पर्य समझती है? अन्ततः आप लोगों को उनका तात्पर्य समझाना पड़ता है; तब इससे स्त्रियों के वेदाध्ययनका अधिकार क्या सिद्ध हुआ? यह विवाह्यमान-लड़की तो न्यूनसे न्यून ११-१२ वर्षकी होती हैं, मन्त्रादि तो छोटे बच्चेको भी सम्बोधित करके बोले जाते हैं । इससे वादी क्या सिद्ध करेगा कि नवजात शिशु पहलेसे ही वेद पढ़ा हुआ है? देखे वादी अपनी ' संस्कार विधि ', निकाले उसका ५७ पृष्ठ । वहाँ जातमात्र लड़के-को सम्बोधित करके उसे कहा जाता है-' भूः त्वयि दघामि ' ( ३ ) ' भुवस्त्वयि दधामि ' ( ४ ) स्व: त्वयि दधामि ( ५ ) ' भूर्भुव: स्व: सर्वं त्वयि दधामि ( ६ ) तब इससे क्या कोई यही अनुमान कर लेगा a कि पैदा हुआ बच्चा कमसे कम १६ वर्षका होना चाहिये । यह वेद पढ़ा हुआ समझदार होना चाहिये, जिसे इतना भार सौंपा जा रहा है, वेदमन्त्र सुनने से वह ' यज्ञोपवीती ' होना चाहिये । और देखिये उसी ५७ पृष्ठमें— ' मेघां ते देवः सविता, मेवां देवी सरस्वती ' बालकको सम्बोधित करके यहां ' मेधा ' के लिए कहा गया है । क्या उस समय नवजात शिशु वादीके अनुसार वारणाशक्ति रखनेवाला होना चाहिये, क्योंकि- ' धीर्धारणावती मेघा ' ( ११२ ) । इसी प्रकार ५८ पृष्ठमें ' अस्मे शतं शरदो जीवसे ' यह मन्त्र जातमात्र पुत्रके कन्धेपर हाथ रखकर पढ़ा जा रहा है? यदि वह वच्चा यह नहीं समझता; तो क्या यह मन्त्र विवि में व्यर्थ ही रखे गये हैं? नामकरण में ११ दिनके बच्चेसे ' कोसि कतमोसि को नामासि ' ( ६५ ) इत्यादि प्रश्न- परम्परा की जा रही है । निष्क्रमणमें चार मासके बच्चे के दाहिने कानमें ' प्रस्मे वीरान् शश्वत! इन्द्र! शिप्रिन्! '

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६०८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( पृ ६८ ) मन्त्र पढ़कर उसकेलिए प्रजाकी प्रार्थना की जाती है । चूडाकर्म में १ वा ३ वर्षके लड़केकेलिए ' अयमस्तु प्रजावान् ' ( पृ. ७४ ) यह मन्त्र पढ़ा जाता है । इत्यादि । अन्य भी इस प्रकारके बहुतसे उद्धरण दिये जा सकते हैं; तब क्या वादीके अनुसार वह बच्चा कमसे कम २४ वर्षका और समझ सकने वाला पैदा होना चाहिये? क्या उसे उसी समय वेदके अध्ययनका अधिकार मिलना चाहिये, क्योंकि उसे सम्बोधित करके वेदमन्त्र पढ़े जाते हैं? क्या उसे यज्ञोपवीत भी उत्पत्तिसे ही देना चाहिये? धन्य है यह वादी; वास्तव में उसकी दृष्टिमें दयानन्दी आवरणने पड़कर उसे बहुत गदला कर दिया है | सात - आठ वर्षके बच्चोंको छोड़ दीजिये, जातमात्र शिशुत्रों को भी छोड़ दीजिये, जबकि ७-८ मासका गर्भ भी चैतन्यसञ्चारवश दिये हुए उपदेशको धारण कर लेता है, जबकि उस समय किसी भी भाषाको पढ़ा नहीं होता । ८ मासके गर्भ में ही प्रभिमन्युने चक्रव्यूहका प्रवेश - प्रकार सीखा था । चक्रव्यूहके निकलनेका संस्कार उम समय माताकी नीन्द कारण उसपर न पड़ सकनेसे बड़ा होनेपर भी वह उसमें फेल हो गया था । जबकि प्रह्लादने ८ मासके गर्भनिवासमें नारदका उपदेश पाकर कुलकी प्रासुरी - प्रकृति छोड़ दी थी । जबकि - नेपोलियन बोनापार्ट अपनी माता द्वारा गर्भावस्थामें ही शूरवीरोंके चित्र देखे जानेसे आगे ५२ दुर्गोको जीतनेवाला बना । जबकि वादीके स्वाद के ' धन्य वह माता है कि- गर्भाधान ( गर्भके श्राधान ) से लेकर जब तक विद्या पूरी न हो, तब तक सुशीलताका उपदेश करे ' ( स.प्र. २ समु. पृ. १४ ) इस कथन के अनुसार गर्भके प्राधानके दिनसे ही; जबकि गर्भ में चैतन्यका संचार ही नही होता, निषिक्तमात्र न पढ़े - लिखे गर्भकेलिए स्वा. द. के बतलाये हुए जननीके उपदेश भी वादीके ' महर्षि ' के मतमें भी निरर्थक नहीं; तब सामने बैठी हुई, विवाह्यमान ११-भूमिका ६०६ १२ वर्षकी लडकीपर वरके द्वारा ' यथा वे शब्दा नियमपूर्वकमधीताः १-वन्तो भवन्ति ' इस भाष्यकारके कथनानुसार बोल हुए महाप्रभावबारे फल-वेद शब्दों का प्रभाव क्यों न पड़ेगा? साम आप लोग जिन लड़कियोंका विवाह - संस्कार करा रहे होते उच्च इसी हैं; वे वेदों का पढ़ना वा अभ्यास तो दूर रहा, साधारण - संस्कृत भी नहीं जानती, तान और आप लोग एक - दो घण्टे में विवाहकार्य कर देते हैं, सब मन्त्रों भी नहीं करते; स्त्री के सामने देवकामा ' प्रादिका अर्थ भी नहीं काकरते; लिख तत्र प्राप उनके सामने जो मन्त्र पढ़ते हैं; वे आपके अनुसार क्या निरक प्रिय होते हैं? नही : यदि उनके संस्कृत से अनभिज्ञ होनेपर भी उस क्रियाका प्रभाव उन मृतक लड़कियोंपर पड़ना मानत हैं; नहीं तो फिर मन्त्रोंके पढ़ने की श्रावश्यकता उप ही क्या है? श्रीटण्डन की भाँति मन्त्रों के अनुवादोंसे ही लड़कियोंके स्त्री विवाह - संस्कार कराएं, पर ऐसा श्राप नहीं करते; इसमें मन्त्रोंका प्रभाव उनपर पड़ना भी मानते ही होंगे; इसी प्रकार यहाँ भी समझ लीजिये । मन्य इससे स्त्रीको वेदाधिकार नहीं हो जाता । इम अपने लेख में जितने मन्त्रोंका वादीने संग्रह किया है, इनमें तो स्त्रीके तुल 12 बोलने का एक भी मन्त्र नहीं है । ' वाचयेत् ' ( गो.गु. २।१।२० ) इन प्रकार वह ऋत्विक् प्रादिकी सहायतासे बोला जाने वाला मन्त्र श्राभी जावे; तो ' नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः । विवाहो मन्त्र- मृत तस्तस्याः, शूद्रस्याऽमन्त्रतो ' ( व्यासस्मृति २०१५-१६ ) इम स. घ. सम्मत (घ अपवादके अनुसार हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । इससे स्त्रियोंका ऊप वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । बल्कि - ' स्वयं जपेद् मजपन्त्याम् ' ( गोभिल. २।१।२१ ) इसका अर्थं वादीके मान्य ठाकुर उदयनारायर्णान लिखा है - ' उस समय वधूको ' प्र मे ' मन्त्रका पाठ करावे । वह [ व हम मन्त्रपाठ ] न कर सके तो पति स्वयं मन्त्र पढ़े | आपके मान्य श्री-सा स ० ध ०३६. मा

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| ६०६ श्रीसनातनधर्म ' लोक: ( ६-२ ) १० 7 भी यही स्वीकृत कर गये हैं । इस सूत्र के अनुसार स्त्रीके व वाले सामश्रमीजी मन्त्रमें ऊह द्वारा परिवर्तन करके पति बोल सकता है । उच्चारणीय इसीलिए तो गोभिलके पुत्रको ' गृह्यासंग्रह ' में लिखना पड़ा – ' वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ( दाम्पत्य - वाचकान् मन्त्रान् ) ( २०२४ ) । जानतो; तब वादीका व तकका परिश्रम व्यर्थ है । वादीने जो वड़े संरम्भसे करते; लिखा है - ' हजारों मन्त्रों में स्त्रियोंको सम्बोधित किया गया है ' पर निरयंक प्रियवर! आपके वेदों में तो २२-२३ हजार मन्त्र हैं, यह हज़ारों तो नहीं है; न यह सब, स्त्रियोंके हैं । सम्वोधन तो वेदमें ग्रन्त्येष्टि - संस्कारमें मृतकका भी होता है, देखिये - ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यते भाव उन उप त्वा मत्यं! प्र ेतम् ( मृतकम् ) ' ( १८ | ३ | १ ) ( ऐ मृतक! यह तेरी वश्यकता स्त्री तुझ मृतक के पास सती होनेकेलिए लेटी ई है । ) ' हे मत्थं! ड़कियोंक ( मरणशील! ) प्रेतं का प्रभाव अन्वय है । लीजिये । इस मन्त्रका देवता तुलना करो इसकी तो स्त्रीके ( ५/६५ ) इस पद्यसे ० ) इन ( मृतकं ) त्वाम् इयं नारी उपनिषद्यते ( शेते ) ' यह इस यहाँ मृतकको सम्बोधित किया गया है; क्योंकि-( वर्णनीय विषय ) यम वा पितृमेध ( ग्रन्त्येष्टि ) है, मनुके ' गुरो. प्र ेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् ' । इसी प्रकार ' सूर्य चक्षुषा गच्छ बातमात्मना ' इत्यादि बहुत से मन्त्र श्राभी मृतकको कहे जा रहे होते हैं, देखे वादी इसपर अपनी ' संस्कार विधि ' हो मन्त्र-( प्रत्येष्टि प्रकरण ); क्योंकि उन मत्रोंते थाप लोगों द्वारा मृतकके सम्मत स्त्रियोंका ऊपर प्राहुति डाली जाती है । तब क्या वादी मृतकको भी वेदका त्याम् ' अधिकार दे देगा? इस प्रकार वादीका पक्ष सर्वथा कट गया । यह वर्णन ' लोक ' पाठकोंने देखा होगा । वादीसे दिये मन्त्रोंकी भी परीक्षा यहाँ वह [ हम कर रहे हैं । न्य श्री- पृ. १७-१८ वादी कहता है- ' ऋ. १०1८५ में जिसकी ऋषिका ' सूर्या-सावित्री है, नववधूको कहा है – ' गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथाऽसो विदथ-मावदासि ' ( ऋ. १०।८५।२६ ) अर्थात् तुम यज्ञादिका उपदेश करो ' । भूमिका [ ६११ ' विदथ ' का अर्थ ' घर ' भी हुआ करता है । जैसे कि श्रीदुर्गाचार्यने निरुक्तमें ' वृहद् वदेम विदथे ' ( ११७१ ) में लिखा है । इसलिए श्री-सायणाचार्य ने भी लिखा है- ' विदयं पतिगृहम् ' श्रावदामि - गृहस्थितं भृत्यादिजनम् श्रावद ' इस भाष्यको वादीने बड़े मंरम्भसे ' श्री ' पत्रिका में प्रमाणित कर उद्धृत किया था । इसके साथवाले मन्त्रमें भी श्रीमायणने लिखा है- ' विदथं गृहमावदाथ: -ग्राभिमुख्येन वदनम् | यह अर्थ ठीक भी है 1 जब पत्नीको ' गृहपत्नी ' ' घरकी मालिकिन ' कहा जा रहा है; चाहे वह छोटी श्रायुकी भी हो, तो वह घरके नौकर - चाकरोंको हुकम देगी ही कि - ' यह काम करो, यह लाभों सो यह तात्पर्य सङ्गत हुआ । ग्रज्ञयिक - उपदेश अर्थ तो यहाँ श्रसम्बद्ध है । निघण्टुमनाम ' पद ' धातुका अर्थ करना वादीका निमूल है । ' यज्ञ ' अर्थ यहाँ माना भी जाय; जैसे कि वादीने इसपर श्री. हरदत्ताचार्यका अर्थ उद्धृत किया है; तो भी वहाँ यह श्राशय होगा कि तू मुझसे यज्ञ - विषयक बातचीत करेगी कि आप यज्ञ कब कर रहे हो; उसमें किस - किसको बुलवाना है, किस मात्रामें स्वयं करना है-इत्यादि '; तो स्त्री भी तो पतिसे यज्ञमें उसके साथ ही बैठती है, क्योंकि-' पत्युर्नो यज्ञसयोगे ' ( पा. ४1१1३३ ) पतिके यज्ञमयोगमे सहावस्थितिमें वह पत्नी बनती है । जो काम पनि, यज्ञमें लगातार व्यस्त होनेसे नहीं कर मकता; वह सेवाकार्य समिधा श्रादि नापकी काटनी, घी सफ कर देना, उठना - बैठना - प्रमुक वस्तु उठा लाना वह स्त्री ही करती है; उसके बिना यज्ञ अपूर्ण रह जाता है । इससे बादीकी कुछ पक्षसिद्धि नहीं । इधर १८ पृ. में स्त्रीको वृद्धावस्थामें उसका वादीनं यज्ञविषयक उपदेश माना है; इस विषय में ' न वै कन्या न युवति ' इस मनुपद्या मिलान भी वादीने किया था देखो इस पुस्तकका पृष्ठ ४१ ९ -४२७ वृद्धावस्थाका काम वादी ' नववधू ' को सौंपकर कंसे व्याघात कर रहा है? मनु तथा हरदत्त के वचनोंमें ' ज्ञानवृद्धा ' अर्थ तो है नहीं, यह

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६१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तो वादीकी कृत्रिमता है, उसकी कपोल - कल्पना है । वास्तविक तात्पर्य हम लिख ही चुके हैं । अतः वादीके पक्षकी कुछ भी बात नहीं । ' जीणों सन्तो आवां श्रौतस्मार्तविषयां कथां वीर्तयिष्याव: ' इस वादिमान्य - श्रीहरदत्ताचार्यके वचनमें भी कोई वादीकी इष्ट बात नहीं है । वादीको तो ' मक्खीको मल - मलकर भैंसा बनाना ' अभ्यस्त है; जो निर्मूल होता है । तब उसका यह लिखना कि- ' स्वय वैसी व्याख्या करनेपर भी पौराणिक - संस्कारवश स्त्रियोंका हरदत्ताचार्यने यदि वेदों में अधिकार लिख दिया है, तो वह वैदिक - प्रदेशसे विरुद्ध होनेसे अमान्य है ' कट गया । कभी तो टीकाकार वादीके मत में वेदसे भी अधिक मान्य हो जाता है, पर यदि वह वास्तविक सिद्धान्त लिख देता है; तब वह ' पौराणिक - संस्कारोंवाला ' हो जाता है; यह है इनका हाल! थोड़ी देरमें उसके किये - करायेपर पानी फेरकर कृतघ्नता अपना लेते हैं । श्री हरदत्ताचार्यने स्त्रीको उपनयन वा वेदका अधिकार देनेवाली व्याख्या कहीं की भी नहीं है - यह हम दावेके साथ कहते हैं । न ही उक्त मन्त्रमें ऐसी कोई बात उसने लिखी है । वादी स्वयं ही साम्प्रदायिकताका ' अन्धा चश्मा ' उतारकर देखे कि- ' जीणों ' सन्तौ यज्ञम् प्रावदाव- श्रौतस्मार्त-विषयां कथां कीर्तयिष्यावः ' क्या इसमें स्त्रियोंके उपनयन वा वेदाध्ययन-की कोई गन्ध भी है? श्रीहरदनने अपनी टीकाओं में स्त्रीका उपनयन कहीं भी नहीं माना; बल्कि खण्डित ही किया है । तब उसका निराधार वेदाध्ययन ही क्या होगा? वादीको खुला प्राह्वान है कि उसके भाष्यसे स्त्री उपनयन कहींसे दिखलावे? केवल यही बात है कि श्रौतस्मार्त यज्ञोंकी प्रापसमें बात किया करेंगे कि- कब यज्ञ करना है; यादि । यज्ञके विषय में बातचीत तो निरक्षर भी कर सकते हैं कि अमुक स्थानमें ऐसा यज्ञ हुआ; इतना उसमें जन-सम्मर्द था - प्रादि - आदि । ' जीण सन्ती ' इस हरदत्तके वचनमें यदि वादीके गत- निबन्धके भूमिका [ ६ ॥ अनुसार मनुजीने इस हरदत्तके कथनानुपार स्त्रीको बुढ़ापेमें अधिकार दिया है; तो उसमें पतिका भी नाम यज्ञ कराने पति भी वृद्धावस्थामें ही यज्ञ करा सकेगा साथ है; तो फिर ; युवावस्थामें नहीं ब सन्ती ' इस श्रीहरदत्तके वचनमें उसे बूढ़ी आयुका श्रथं । ' जीणों ' ' ' जीण सन्तौ ' कहा है, ' ज्ञानवृद्ध ' अर्थ उसे इप्ट है, तभी तो इष्ट नहीं । मनुके भी मनुजीको ग्रायुवाचक अर्थ इष्ट नहीं; वहाँ तो प ' विवाहिता विवाहिता ' प्रथं ही इष्ट है दोनों प्रकारको कन्या - युवति से ' स का होतृत्व निषिद्ध किया है । यतः वादीकी, पक्षसिद्धि इन स्त्रियों कि नहीं । इस विषय में हम स्पष्टता पृ. ४१६-४२७ में पहले कर चुके हैं । उक्त मन्त्र में यज्ञविषयक अनुष्ठानकी कोई बात नहीं । केवल शत्र बातचीत है । यज्ञमें स्त्रीको साथ बैठानेसे स्त्री को वेद तथा यकी • रह अधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । जबकि अत्रैवर्णिक निषादस्थति उपनयनका ( ६।१।४४-५२ ) को मीमांसा ( ६।१।३३, ३५ ) के कथनसे उपनवन अन तथा वेदाधिकार न होनेपर भी वचनविशेष के बसे मीमांसा उ का निषादस्थपतिसे यज्ञ कराती है, तो फिर स्त्री की भी यज्ञविषयक बातचीत- वि का यदि कहीं वर्णन श्रा जावे; तो इससे निषादस्थपतिकी भांति यह स्वामीसेवा ऋत्विक्से वह यज्ञ करा लिया जाता है, पर इससे स्वीका नव यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन सिद्ध नहीं हो जाता । अ. भे गुरुके कहने से कोई छात्र किसी छात्रको चपेट लगा दे; तो वह उस समय गुरु वा मैजिस्ट्रेट बन जानेका अधिकारी नहीं हो जाता । इस अनुमानसे अ तो वादी निषादस्थपतिका भी यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययनादि मान लेगा! उ पर यह मीमांसाशास्त्र तथा अन्य शास्त्रोंसे विरुद्ध है । वैसे ही स्त्रीके विषय वि में भी वादी याद रखे । गत निबन्धों में स्त्रीके विषय में भी मीमांसाका मत ऋ दिया जा चुका है । इसके अतिरिक्त यह भी याद रखना चाहिये- ' ऋत्वि च । कर्म में भी केवल ब्राह्मणका अधिकार है - सबका नहीं । इम विषयों प्रय मीमांसादर्शन ( १२।४३८, ६।३।१८ ) तथा ' आर्त्विजीनं ' ( ऋत्विक I

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| ६ || श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५१४ ] करानेका अर्हति इति ) ब्राह्मणकुलम् ' यह पातञ्जल - महाभाष्य ५।१।७१ ) देखें । फिर बड़ वादी स्त्रीमात्रको यज्ञ करानेका निर्मूल अधिकार कैसे कह रहा है? | ' नोणों aa ' सम्राज्ञी श्वशुरे भव ' ( ऋ. १०/०५/४६ ) इस वादीके दिये मन्त्रमें तभी तो भी ऐसी कोई बात नहीं, जिससे स्त्रीका वेद में अधिकार सिद्ध होता हो । केप ' - ससुर देवर - ननद श्रादिमें शोभमान वन ' में शोभमानका भाव है । -युवति से सास कि तेरे सुशीलतादि गुण तथा प्राचरण अच्छे रहें; ताकि तू इनके वीचमें स्त्रियों स विषयमें म; अन्यथा तू निन्दित हो जायगी । वेदमें न होती हुई बातको भी यह स्वार्थी लोग वेदार्थ में प्रक्षिप्त कर दिया करते हैं । यह वेदोंसे इनकी शत्रुता है कि अपने निर्मूल साम्प्रदायिक भाव वेदपर भी वलात् लाद यकी उपनयनका रहे हैं । दस्थ ' ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्व, ब्रह्म अन्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः । ि उपनयन श्रनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलांके विराज ' ( प्र. १४ | १ | ६४ ) साउन का वादी अर्थ करता है— ' तेरे आगे पीछे, मध्यमें, अन्तमें सर्वत्र वेद-बातचीत- विषयक ज्ञान रहे ' । पहले तो यह मन्त्र सविताकी पुत्री सूर्याके लिए है, और वह मानुषी से स्वीका नहीं; किन्तु देवता है - यह हम अन्यत्र बता चुके हैं । ' सूर्येव नारि! ' प्र. १४/२/३२ ) इस मन्त्र में भी सूर्या एवं नारीकी उपमामें ' साधम्यमुपमा भेदे ' इस अलङ्कारशास्त्र के नियमानुसार उपमा दा भिन्नों की होती है । उस समय अन: सूर्या एवं नारी भिन्न - भिन्न सिद्ध हो गई । उसमें इस मन्त्रका अनुमानसे उत्तरार्ध स्थित अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य ' ( व्याधियोंसे रहित अथवा न न लेगा? बीघें जानेवाली देवपुरी स्वर्ग में पहुंचकर ) यह वचन भी ज्ञापक है । ' नृणां के विषय विवाहमन्त्रा श्राशीः प्रायाः ' यह अजमेरके वैदिक यन्त्रालय में छपी हुई साका मत · स. में मनुष्यो के विवाहमन्त्र पृथक् हैं । अथर्व में भी ऐसा ही समझता ऋत्विक विश्व में चाहिये । कथञ्चित् विनियोगवश मानुषी - वधूमें भी इस मन्त्रका प्रयोग मान लिया जावे; तो भी कोई बात नहीं । यहाँपर ' ब्रह्म ' का अर्थ ' वेदज्ञान ' नहीं । यह ग्रयं तो वादीकी वञ्चनामात्र है; क्योंकि— भूमिका [ ६१५ वेदज्ञान तेरे ग्रागे जुड़े, पीछे जुड़े ( युज्यताम् ) यह बात ही असम्बद्ध है, ग्रह वेदज्ञान है, या रेलवे इञ्जन; जो ग्रागे, पीछे, मध्य वा सब प्रोरसे जुड़ेगा? यहाँ ' ब्रह्म ' का अर्थ परमात्मा है । उसके सर्वव्यापक होने से घट मकना है । वस्तुत: ' कौशिकसूत्र ' ( 351२ ) के अनुसार इस मन्त्रका ब्रह्माके सूर्या रथ के प्रथवा वधूरयके प्रागे - पीछे चलने में विनियोग है । इसी बातको सायणभाष्यवाने अथर्ववेदसं. के १४ वें काण्डमें जो वादीको ' श्री ' पत्रिका-में प्रामाणिक रूप से स्वीकृत था - लिखा है- ' कर्ता श्रग्रे व्रजति ' । कभी वह वधू- रयके पीछे हो जाता है, कभी श्रागे । कभी साथ । उसी विनियोग के अनुसार यहां अर्थ होगा । वादीको भी ' श्री ' पत्रिकामें यह बात अभिमत थी 1 देखिये वहां वादीके शब्द- ' वस्तुतो विनियोगानां मन्त्रः समानार्थकत्वं भवत्येव । क्वचिद् व्यक्त, क्वचिच्च पारम्पयेंण. नो चेद् वैयथ्यंम् ग्रप्रमाण-त्वं च तेषां स्यात् ' ( ' श्री ' ७१४ ) ( विनियोग मन्त्रोंने समानार्थक हो होते हैं, कहीं प्रकटरूपसे और कहीं परम्परा सम्वन्धसे । नहीं तो वे व्यर्थ तथा श्रप्रमाण हो जावें ) । तब वारीके अर्थकी विनियोगानुसार कुछ गन्ध भी सिद्ध न हुई । प्राश्चर्य तो यह है कि यह लोग वेदमन्त्रमें अविद्यमान भी अर्थको वेदार्थ में प्रक्षिप्त करनेका दुस्माहम कर दिया करते हैं । ' विशेष रूपसे ज्ञानादि - गुणोंसे चमकने वाली वन ' यह प्रथं करके वादी बेदमें भी प्रक्षेष कर रहा है! यह किस पदका अर्थ है? यदि समस्त जनता संस्कृताभिन हो जावे, तो इन लोगोंका ऐसा दुस्साहस ही न हो सके । स्त्रीके वेदके अधिकारकी इस मन्त्रमें कोई गन्ध ही नहीं । प्रभो बघू मार्ग में रथपर हैं, न पितृगृहमें है, और न अभी श्वशुरालयमें पहुंची है; केवल उसे ब्रह्मकी साक्षी करके कुशलसे पतिगृह में पहुंचनेका प्राशीर्वाद 0 दिया जा रहा है । जैसे कि वैदिकयन्त्रालयकी अथर्व. सं. में निवा है--'२८ -६४ विवाहमन्त्राशिषः ' ( पृ. २६० ) । आशीर्वाद प्राप्त वस्तुका होता

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१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) है । तब इससे वादीकी पक्षसिद्धि नहीं । उल्टा वादीके किये प्रशंसे सिद्ध होता है कि - बधूको अभी तक वेदज्ञान प्राप्त नहीं हुआ । ' वेदज्ञानको प्राप्त करके तदनुसार तू अपना जीवन बना ' इस वादीके अर्थसे ही स्पष्ट हो रहा है कि प्रभी तक वधूने वेद नहीं पढ़ा, तथा वेदज्ञान प्राप्त नहीं किया । तब गृहस्थाश्रममें प्रवेश कर रही हुई उसे घरके कामोंसे ही अवकाश नहीं मिलेगा; वह उस समय क्या वेद पढ़ने गुरुकुल में जायगी? वस्तुतः यह सब वादीकी कृत्रिमताए है । आगे वादी एक मन्त्र देकर उसका अर्थ करता है - ' प्रबुध्यस्व प्रबुधा वुध्यमाना दीर्घायुत्वाय गतशारदाय ' ( प्र. १४/२/७५ ) ( तू बुद्धिमती " ज्ञानसम्पन्ना होती हुई सौ वर्ष की ग्रायुकेलिए ज्ञानपूर्वक कार्य करती रह । अपने कर्तव्य पालनमें सदा जागती रह ' । यही अर्थ वादीका मान भी लिया जावे; तब भी यहाँ वादीकी कुछ भी इष्टसिद्धि नहीं । यहाँ तो यह तात्पर्य है कि- ' समझदार बनकर तू घरमें सावधान रहा कर ' । बुद्धि स्वाभाविक वस्तु हुआ करती है, वह नई पैदा नहीं होती । उसका वेद पढ़ने से सम्बन्ध तो दूर रहा, साधारण-विद्या पढ़नेसे भी कुछ सम्वन्ध नहीं । तव वादीने क्या यह मन्त्र साधारण-जनताके वञ्चन के लिए नहीं दिया? इसमें स्त्रीको वेदके अध्ययनका अधिकार कहीं भी नहीं दिया गया है । वादी भगवती श्रुतिसे बलात्कारका दोषी है । वस्तुत: यहाँ कौशिकसूत्रानुसार ( ७७/१३ ) जब वधू मार्गमें रथमें यो जाय, तब वर इस मन्त्रको पढ़ता है कि तू जाग, सावधान हो जा, पतिगृह में पहुंच । तेरी सौ वर्षकी आयु हो । इससे पूर्व. अ. १४।२।७४ मन्त्र पढ़ा जाता है; जब कोई दूसरी डोली रास्तेको काटकर जावे । इस प्रकार कई मन्त्र कि जब वधू रोवे, तो पढ़ने पड़ते हैं- इत्यादि स्वयं वादी अपनी ' संस्कार विधि ' में देख ले । जबकि वादीने ' श्री: -भूमिका ६१० श्रीनगर ' पत्रिका में माना था कि- ' कौशिकसूत्र ' के विनियोगके थर्ववेद के अर्थ होते हैं, तब उसकी वह प्रतिज्ञा कहाँ अनुसार मनमानी अपनी ' आह्ला ' गा रहा है? उक्त मन्त्र केलिए गई, जो कि शब्द सायणभाष्यवा फिर प्रथर्ववेदमें यहाँ कौशिकसूत्र के अनुसार लिखा है- ' वध्वां प्रवोधयति ' ( ७७।१३ ) रथमें मार्ग में वधू सो सुप्ताय करा ' प्रबुध्यस्व प्रवृधा बुध्यमाना ' इस मन्त्रसे जगावे ) यह अर्थ विनियोगानुसार जाय तो से मन्त्रमें ठीक समन्वित भी हो रहा है । तब रास्ते में स्थित नह वेदाध्ययनको बात वादीने बलात् श्रुतिमें कैसे घुसेड़ दी? क्या अब बा वधुड़े । श्रपनी कल्पनानुसारं कौशिकसूत्र के विनियोगोंको मानना बन्द कर दिया? कि क्या यह ' श्री ' पत्रिका में ही जनवञ्चनकेलिए वादीने लिख दिया था? देखा साम तब ' ऐसे ही हज़ारों मन्त्र वेदमें हैं; जो स्त्रियोको सम्बोधित करते. प्रस हुए उनको वेदज्ञानादि - सम्पन्ना तथा यज्ञ करनेका अनुभव तद्विषयक उपदेशादि ग्रन्योंको देनेका प्रतिपादन करते है ' कथन सम्पूर्णता से खण्डित हो गया । क्योंकि यह बातें इन ही नहीं - यह ' आलोक ' - पाठकोंने भली - भाँति देख लिया है । प्राप्त करके यह वादीका वेदा मन्त्रोंमें हूँ-हम ' स्त्री जोकि वादीने लिखा है - ' यदि शास्त्रीजीके कथनानुसार स्त्रियोंको याज्ञ वेद पढ़ने का अधिकार ही नहीं; फिर इन मन्त्रोंका वेदोंमें होना सर्वपा मनु व्यर्थ हो जाता है ' । इसका प्रत्युत्तर पहले दिया जा चुका है कि छोटे विदा बच्चेके आगे भी मन्त्र पढ़ने पड़ते हैं, जिनको लड़का कुछ भी समझ नहीं सकता; तब क्या वादीके अनुसार वे बच्चोंके मन्त्र व्यर्थ है? कर्मकाण्ड दोनोंमें तुल्य है; यह न भूलें । जैसे तर्कसंग्रहादिमें ' बालानां प्रमा सुखबोधाय ' में वड़ी प्रयुके भी, अन्य शास्त्रोंमें तो पण्डित, परन्तु ग्रा न्यायवैशेषिक - प्रादिसे कोरेको ' बाल ' कहा जाता है, वैसे ही यहां वेदानधिकृत लड़की को भी ' बच्ची ' माना जाता है । बाद कर्मकाण्ड · होनेसे केवल यहाँ बरद्वारा मन्त्र पढ़ने से भी स्त्रीके आत्मापर प्रभाव पड़ ही जाता है । यह बात न होती; तो मूत स्त्रिय

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६१८ ] के अनुसार विवाहादि न कराकर अनुवादोंसे ही संस्कार कराये जाते, और जो कि वह शब्दोंसे मन्त्रोंका वक्ता वर ही है, वधू नहीं । तो स्त्रीसे वह कर्मकाण्ड गभाध्यवाले फिर इन उन मन्त्रोंका निचोड़ सुना हो देगा । क्योंकि - स्त्री-न सुप्तानं कराकर पुरोहितादि वर अथवा पुरोहितादिका कार्य है । पति यदि द्विज-; तो उसे को समझाना उसे तो गुरुरूप अधिकार है ही, तब इससे स्त्रियोंका वैध - वेदाध्ययन सिद्ध योगानुसार है; तो वधु न हुआ वस्तुतः । तो यहां स्त्रीके रथमें सो जानेपर जगानेका मन्त्र है; न वादीने कि उस समय वेद पढ़ाना शुरू कर देनेका मन्त्र है । ' आलोक ' पाठकोंने र दिया? देखा होगा कि यह वादी लोग कैसे - कैसे ' गलत हथकण्डे ' अपनी न्या था? साम्प्रदायिक बातोंको सिद्ध करनेकेलिए अपना रहे होते हैं । इन्हें धित करते असत्य से भी डर नहीं आता!!! नाप्त करके ' अतः उत्सगं रूपमें ही ( केवल अपवादरूपसे नहीं ), स्त्रियोंका हवादीश वेदाध्ययनाधिकार वेदों द्वारा सिद्ध है ' यह वादीकी बात गलत सिद्ध हुई । नत्रों हूँ- हम गत- लेख में स्त्रीका वेदाध्ययनानधिकार सिद्ध कर ही चुके हैं । उसीमें ' स्त्रीणाममन्त्रतः तानि विवाहस्तु समन्त्रकः ' अग्निपुराण ( १५३।११ ) = स्त्रियाँको याज्ञवल्क्य ( १।२।१३ ) ' विवाहो मन्त्रतः तस्याः ' ( व्यासस्मृति १।१५-१६ ) सर्वा मनु ( २।६६-६७ ) ' एता: क्रिया: स्त्रीणाममन्त्रकाः, तासां समन्त्रको -कि - छोट विदाहः ' ( वृहद्विष्णुस्मृ. २६ । १३-१४ ) यह अपवाद सिद्ध कर ही चुके भी समक व्यर्थ है? यह स्मृतिपद्य मैंने अभी - अभी तो बना नहीं डाले कि - वादीके ' बालानां प्रमाणोंसे डरकर मैंने अपवाद कह दिया हो । यह पद्य तो परम्परासे चले त, परन्तु ग्रा रहे हैं कि- विवाह तथा ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' ( पा. ४ | १ | ३३ ) यज्ञमें ही यहाँ यह अपवाद है । कन्याके तो अन्य संस्कारोंमें स्पष्ट ही मन्त्र पढ़ने का निषेध किया गया है । विवाहमें स्त्रीको मन्त्र - संस्कृत करनेकी उपपत्ति भी स्त्रीके दादीसे उद्धृत हारीतके शब्दोंमें देखिये— तो मूल- ' नहि शूद्रसमाः स्त्रियः, नहि शूद्रासु ब्राह्मणक्षत्रियवैश्या जायन्ते, तस्मात् स्त्रियो मन्त्रतः संस्कार्या: ( उद्बाह्याः ) ' । यह वचन ' शूद्रासु ब्राह्मणाक्ष्यो भूमिका [ ६१६ नहि जायन्ते ' इस लिङ्गसे तथा ' मन्त्रैयेदि न संस्कृता ' ( वसिष्ठ १७१६५ ) इत्यादि लिङ्गसे विवाहसंस्कारविषयक है । वाटीकेलिए तो यह प्रमाण हानिप्रद है; इससे वर्णव्यवस्था जन्मसे सिद्ध होगी, तथा शूद्रको उपनयन-का अधिकार हटेगा । यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । देखो-पृ. २३-६४ । यह हमने वादीकी रीढ़ की हड्डी जो उसके इस विषयका मूल था; तोड डाली; अब हम इससे आगे उसकी पुस्तकपर क्रमसे विचार रखते हैं । -पृ. १ यह जो वादी लिखता है कि- ' इस प्रकारके कल्पित वचन श्रुति या वेदके नामसे स्वार्थपरायण लोगोंने घड़ लिये; तथा इस आशय के कुछ वचन स्मृतियों प्रादिमें मिला दिये ' । यह वादीको बात उनके सम्प्रदाय के स.प्र. तथा वेदभाप्य श्रादिकेलिए तो ठीक है; उनमें स्वार्थी दयानन्दियोंने अनेक इस विषय के प्रक्षेप कर दिये; पर स्मृति श्रादिमें किसीने प्रक्षिप्त कर दिये - यह बात उनकी गलत है, कल्पित है । वादीने जिन वचनोंका गढ़ना गढ़ लिया है, तथा स्मृतियों में प्रक्षेप बताया है, हम उनका पूरा - पूरा समाधान इस पुष्पमे कर चुके हैं, जिससे वादीकी कमर टूट चुकी है । यह जो वादीने लिखा है- ' किन्तु आज तक एक भी विद्वानको यह साहस नहीं हुआ कि मूल वेदों ( मन्त्र - संहिताओं ) में से एक भी प्रमाण इस भावका उद्धृत कर सके कि स्त्रियोंके लिए वेदोंके अध्ययन या वैदिक कर्मकाण्ड यज्ञ - याग संस्कार आदिमें भाग लेनेका वेदोंमें कहीं निषेध पाया जाता है ' । इससे वादीने यह सिद्ध कर दिया कि शेष वेदशाखात्रों, ब्राह्मणभाग, श्रीत तथा गृह्यसूत्रों में तथा स्मृति आदि साहित्य में तो लड़कियोंका वैसा निषेध है । ब्राह्मणभाग भी वेद होता है, इसपर ' आलोक ' ( ६ ) देखो ।

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६२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पृ १-२ आगे वादी लिखता है- ' वेदों का जिन्होंने निष्पक्षपात होकर थोडा भी vover किया है, वे इस बातको स्वीकार किये बिना नहीं रह सकते कि न केवल यह कि वेदोंमें स्त्रियोंके वेदाध्ययन- निषेधका प्रतिपादक कोई मन्त्र नहीं है, बल्कि स्त्रियोंके करनेवाले हजारों मन्त्र है ' । यह बात वादीकी गलत है । वेदमें कहीं भी वेदाध्ययन वैधरूपसे श्रादिष्ट नहीं किया गया है स्पष्ट कर चुके हैं । शेष रहे ' स्त्रियोंके कर्तव्योंका बाले मन्त्र ' यह कथन भी ठीक नहीं । वेदमें कर्तव्य भी प्राते हैं, आठ वर्षसे पहले के बच्चोंके भी प्राते कर्तव्योंका प्रतिपादन स्त्रीको उपनयन तथा । यह हम इस पुष्पमें वेदमें प्रतिपादन करने-तो सद्योजात बच्चोंके हैं; पशुनोंके भी प्राते हैं जैसे ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो घासं जिगीषति ' ( प्र. ११/५/१८ ) बल्कि मृतकों के कर्तव्य भी प्राते हैं; इससे उनका वेदाधिकार नहीं हो जाता, किन्तु उनके स्वामी उनसे वैसा करा लिया करते हैं । वेदको ' जातिपक्ष ' भी इष्ट नहीं है कि लड़केसे लड़कीका भी ग्रहण हो जाए; इसे हम ( पृ. १६४-१७३ ) में तथा अन्यत्र भी बहुत स्थानोंमें स्पष्ट कर चुके हैं । तब वादीका यह प्रारम्भिक कथन भी सम्पूर्ण रूपसे खण्डित हो गया कि - जिनमें से सैकड़ों ऐसे हैं, जिनको स्वयं स्त्रियोंको यहाँ संस्कारादिके अवसरपर करना होता है ' । ' महाशय, विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज्ञ. १ २ १३ ) ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' ( पा. ४ | १ | ३३ ) पत्नी, इत्यादि प्रपवाद - वचनोंसे यदि कहीं लड़कियों-का मन्त्रोच्चारण श्रा जाय; वह वर - पुरोहितादिके सहारेसे उनसे बुलवा दिया जाता है; पर इससे उनका लड़कोंकी तरह स्वतन्त्र वैसा अधिकार नहीं हो जाता - यह हम इस पुस्तकमें स्पष्ट कर चुके हैं- इनमें ' दीर्घश्मश्रु ' की स्पष्टता ' ( पृ.६५-७२ ) में वादी देख ले । स्वा.द.ने वेदके ' दीर्घश्मश्रु ' का अर्थ ' संस्कार विधि ' में यह किया है-' जव विद्यासे प्रकाशित और मृगचर्मादि धारण कर दीक्षित होके वेदोंमें स्पष्ट स्त्री - शूद्रोंका अधिकार ' दीर्घश्मश्रुः ४० वर्ष तक डाढ़ी - मूंछ प्रादि ५२२ वाला ब्रह्मचारी होता है, यह स्वा. द. जीने पञ्च अथर्ववेदस केशोंका धारण का के मन्त्रका अर्थ किया है, वह भी वेदारम्भ - संस्कारमें. ( १११५१६ ) । पाठक सोचें कि स्त्रीके वे पाँच कौनसे केश; अब ' प्रालोक इप्टन करेगी? स्पष्ट है कि- वेदको इनमें स्त्री इष्ट हैं, जिनको वह धारण मनुस्म नहीं । ऐसा तब उसका उपनयन तथा वेदारम्भ वेदको इप्ट नहीं कालक कुछ अनुकल भी हैं - वे भी उसका मृगचर्मका है । जो उसके । यमस्मृतिका वचन वादी प्रमाणित करता धारण भी नहीं मानते ' वर्जयेद् अजिन ( क्रष्णमृगचर्म है । पर उसमें लिखा है- ' मन्त्रस ) चीरं जटाधारणमेव च ' ' पिता पितृमो नक भ्राता वा नैनामध्यापयेन् परः ' यहाँ यमने स्त्रीके गुरुकुल विशेष नहीं शूद्रो माने, तब उनका उपनयन क्या हुआ? तभी वादीने यमस्मृति के पूर्व पि प्रतिप ' अपर ' भागको छिपा दिया । बस यह लोग पूर्वापरको छिपाकर उसने अपना काम निकालते हैं; अतः ' प्रालोक ' पाठकोंने समझ लिया होगा कि इन लोगोंका पक्ष निर्मूल है । चेले - चाटोंसे किये हुए प्रक्षेपवच मन्त्र कहीं - कहीं स्वा. द. के नाम पर गलत बातें लिख दी गई हैं । इस स्मृतियोंमें भी जो स्त्री - शूद्रोंका उपनयन तथा वेदाध्ययनादिश निषेध प्राता है, स्पष्ट है कि वह भी प्रचेप नहीं; किन्तु वेदादिशास्व- हैं, मूलक ही है । यह हमने इस पुष्पमें सप्रमाण सिद्ध कर दिया है । हम स.प्र. के २ य समु. में स्वामीने लिखा है - ' हवें वर्षके आरम्भएँ ' द्विज ' अपने सन्तानों का उपनयन करके श्राचार्यकुल में भेज दें, और लिख शूद्रादि वर्ण उपनयन किये बिना विद्याध्ययन केलिए गुरुकुलमें भेज दें अनु ( पृ. १८ ) ' बि यहाँपर स्वामीने दो ' कुल ' बताये हैं, एक प्राचार्यकुल और दूसरा स्त्र गुरुकुल | प्राचार्यकुल में द्विजों की ही सन्तानोंको उपनीत करके भेजना न लिखा है, परन्तु शूद्रोंको उपनीत किये बिना गुरुकुलमें पढ़ने के लिए भेजना इस लिखा है ।