सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 341–350
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 341–350
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श्रीसनात धर्मालोकः ( ३-२ ) ६२२ ] चारण करने उपनयन तथा उपनयनमूलक वेदाध्ययन स्वा. द. को ( ११ ) श इससे शूद्रोंका लक्षणमें उपनयन तथा वेदाध्ययन नहीं लिखा; यह ' प्रालोक ) इष्ट नहीं । गुरुके देखा जा । पर प्राचार्यके लक्षण में . मनुस्मृति ( २।१४२ ) में वह धारण ऐसा लिखा है । अव वादी बनावे कि - स्वाद की यह विचारधारा मध्य-कालकी वा उसके पीछे की है? वा वेदकालीन है? जो उसके स.प्र. ३ य समुल्लास में लिखा है- जो शुभलक्षणयुक्त छूद्र हो; तो उसको हीं मानते मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ वें । शूद्र पढ़े, परन्तु उसका उपनयन लिखा है- ' न करे — यह मत अनेक आचार्यों का है । ( पृ. २५ ) इसमें भी स्वा.द.ने पितृव्य शूद्रोकेलिए उपनयन तथा मन्त्रसंहिता ( वेद ) अनधिकृत किये हैं । इससे शेषन प्रतिपक्षियोंके सिद्धान्तका मूल ही कट गया । के पूर्वापर में कर छल पू. २ आगे वादी ' समानो मन्त्र: समितिः समानी ' ( ऋ. १०।१११।३ ) लिया होगा मन्यसे ' समस्त नर - नारियोंको सम्बोधित करवाता है, पर यह गलन प्रक्षेपश इस विषय में हम ३५६ - ३६१ पृष्ठोंमें स्पष्टता कर चके हैं । पृ. ३ ग्रागे वादी कहता है- ' ऋग्वेद में अनेक ' सरस्वती ' -सूक्त आते नयनादिका हैं, जिनमें विदुषी - देत्रियोंके कर्तव्यों का विशेषरूपसे प्रतिपादन है, इनार दिशास्त्र. हम ४३१-४४४ पृष्ठों में पूरा प्रत्युत्तर दे चुके हैं । 1 पृ. ४ जोकि वादीने कई मन्त्र विवाहमें स्त्रीके उच्चारणीय भी आरम्भमं लिखे हैं, सो इससे ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. २।१७३ ) के दें, और अनुसार स्त्रियोंके वैध - वेदाध्ययनादिके साधक नहीं । स.व. भी तो भेज दें ' तूष्णीम् एता: क्रिया: स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज. ११२११३ ) ' विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्याऽमन्त्रतो दश ' ( व्यास स्मृति १।१५-१६ ) दूसरा स्त्रीका विवाह समन्त्र कहता है, तव वादीकी कोई यह नई बात के भेजना न हुई । इस विषय में हम अन्यत्र कई बार स्पष्टता कर चुके है । ए भेजना इससे लड़कीका उपनयन सिद्ध नहीं होता । स्वाद ने शूद्रोंका उपनयन नहीं माना है; पर फिर यथेमां वाचं ' स्त्रीका ब्रह्मा बनना गलत [ ६२३ ( २६।२ ) इससे उन्हें वेदकेलिए कह दिया है । इससे यह सिद्ध होता है । कि यह विना उपनयनके जो शूद्रोंका वेदाध्ययन बताया है, वह वास्तविक वेदाध्ययन नहीं होता, किन्तु औपचारिक ही होता है । इमी प्रकार लड़कियोंका भी उन्होंने उपनयन नहीं बताया; पर यदि कहीं उनका वेदाध्ययन लिख दिया है, वह वास्तविक वेदाध्ययन नहीं होता । कई छात्राएं शास्त्री परीक्षा दे रही होती हैं; उनमें वेदके विशेष सूक्त भी पढ़ रही होती हैं; पर वह उनका वस्तुतः वेदाध्ययन नहीं हो जाता । मनुजीने ' क्रमेण विधिपुर्वकम् ' ( २११७३ ) का नाम वेदाध्ययन माना है. उनसे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि मनुजीके अनुसार जहां क्रमेग एव विधिपूर्वक वेदाध्ययन नहीं होता; उसका नाम वेदाध्ययन होता ही नहीं । वह तो अवैध एव स्वेच्छाकल्पित व्यवहार होता है, शास्त्रीय नहीं । पृ. ५-८ में कही ' सरस्वती ' एक देवता है, मानुषी नहीं, पृ. ४३३-४५ देखो 1 पृ. ६-१३ में जो वादीने ' स्त्रीका ब्रह्मा बनाना ' लिखा है, यह तो सर्वथा उपहासास्पद तथा बिल्कुल श्रमङ्गत एवं सम्भव है । इस विषय में पृ. ४४५-४५ में हम कर चुके हैं । इसमें एक इतिहास भी आता है, जिसे श्रीसायणाचार्यने स्पष्ट किया है । इसपर वादीने कुछ आपत्ति उठाई है, हम उसका प्रत्युत्तर पृ. ४४५-४५६ मे भली- भान्ति दे चुके हैं । पू. १३-१४ आगे वादी ' सूर्या - मुक्त ' पर कुछ लिखता है - ' १०1६५ मुक्तकी ' ऋषिका ' सूर्या सावित्री ' एक विदुषी स्त्री है । ' ऋषि ' का अर्थ ' ऋषिदर्शनात्, स्तोमान् ददर्श, ऋषयो मन्त्र - द्रष्टारः ' निरुक्त श्रादिके वचनोंके अनुसार मन्त्रोंका द्रष्टा अथवा उनके रहस्य को समझकर प्रचार करनेवाला होता है । जितनी आर्यसमाजी लोगोंने वेदका नाम लेकर वेदकी छीछालेदर की है, इतनी अन्य किसीने नहीं की । श्राश्चयं यह है कि यह लोग असत्य से भी नहीं डरते । निरुक्तमें स्पष्ट लिखा है - ' तद् यद् एनान्
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६२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु प्रभ्यानर्षत, त ऋषयोऽभवन्, तद् ऋषीणाम् ' ऋषित्वम् - इति विज्ञायते ' ( २।११।१ ) इसका भाव यह है कि सृष्टिकी श्रादिसं पूर्व प्रलयमें जो वेदमन्त्र लुप्त हो गये थे; सृष्टिकी आदिमें ऋषियोंका अवतरण हुआ । उन्होंने उन लुप्त मन्त्रोंके ढूंढनेवे लिए त्पस्या की । तपस्या से उन्हें वे मन्त्र समाधिमें दीख गये और वे स्वयम्भु ब्रह्म ( वेदमन्त्र ) उन्हें प्रतिभात हो गये, इसलिए उन्हें ' ऋषि ' कहा जाता है । अब देखिये प्रतिपक्षीकी बनावट जो कि निरुक्तसे स्पष्ट विरुद्ध है । ' मन्त्रोंका द्रष्टा ' का वादी अर्थ लिखता है - ' मत्रोंके रहस्योंको समझकर प्रचार करनेवाला ' । वादीसे प्रष्टव्य है कि निरुक्तमें मन्त्रोंका दर्शन कहा है, या मन्त्रोंके रहस्यका समझना कहा है? यदि मन्त्रोंके शब्दोंका; तो वादीकापक्ष गिर गया; क्योंकि -समाधि द्वारा वे मन्त्र किसी ऋषिका के मुखसे प्रति निकल पड़े; तो इससे ऋषिकाका वह महत्त्व तो न रहा; जो बादी उसका बताया करते है, जिससे उसको विदुषी कहा करते हैं । वह मन्त्र तो देवशुनी सरमाको जिसे श्रीसत्यव्रत - सामश्रमी ' निरुक्तालोचन ' श्रादिमें ' सुशिक्षिता कुक्कुरी ' कहते हैं; भी प्रतिभात हो गये, जालवद्ध-मत्स्योंको भी प्रतिभात हो गये । तब क्या यह विदुषी मानुपियाँ हैं? अन्य बात है प्रतिपक्षियोंके सिद्धान्त खण्डन की । वह ऐसे कि-वादियोंसे प्रष्टव्य है कि- मन्त्रका अर्थ - रहस्य भी क्या मन्त्र ( वेद ) होता है? और वह रहस्य या अर्थ ऋषिकाने किस ग्रन्थमें लिखा है, वस्तुतः यह वादीकी कृत्रिमता है । और फिर तो मन्त्रके रहस्य वा अर्थ ' ब्राह्मण ' को भी प्राप वेद मानिये? क्यों नहीं मानते? फिर ब्राह्मणभागकी प्रवेदता में जो स्वा.द.ने ' वेदव्याख्यानात् ' यह हेतु दिया है, उसका खण्डन को जिये । यदि उसका खण्डन न करके उसे ठीक मानते हो, तब अपना ' ऋषि ' का ' मन्त्रद्रष्टा ' का अर्थ खण्डित कीजिये कि यहां ' मन्त्र ' का अर्थ ' मन्त्रका रहस्य ' नहीं है; किन्तु ' मन्त्रका शब्द ' है; तब मन्त्रके शब्द के प्रकट करने में ' विदुषी ' कहकर उस स्त्रीका गौरव मत कीजिये । ' सूर्या ' देवता है, मानुषी नहीं [ ६२५ अव वादी पीछे लौटे । वादी सूर्या सावित्रीको ऋषिका बनाता है । और उसे ' सूर्या सावित्री नामक ऋ '. १०६५ सूत प्र कर उसे मानुषी स्त्री बताता है । यह भी वादीकी बात ' विदुषी देवी वह प्र वादी इसे इस प्रकार समझे- यहाँ सविताकी पुत्री सूर्याको सबंधा अशुद्ध है । य गया है । उसको पता होना चाहिये कि यहां ' सविता ' ऋषिका कहा है । ' असो वा आदित्यो देवः सविता ' ( शत. ६ ३ का अर्थ ' सूर्य अर्थात् सूर्यदेवता की पुत्री थी । इस विषय में ' आलोक ' १ २० ) वह सविता स्पष्टता देखें । पुंयोग में ' सूर्याद् देवतावां ( ५ ) के पृ. १७८ इ वार्तिकसे ' देवता ' अर्थ में चाप् ( वा. ४ | १ | ४६ ) उ इस चात् प्रत्यय होता है । यदि वह ' होती, तो ' पुंयोगादाख्यायाम् ' ( पा. ४११।४८ ) से ङीष् होकर ' सूर्यागस्ययो मानुषौ व छेचां च ( वा. ४ | १ | ४६ ) से ' य ' का लोप होकर ' सूरी ' क जैसेकि - ' सूरी कुन्ती ' के लिए ' मानुषी इयम् ' लिखा गया है । कुन्ती बनता यद्यपि त विदुषी थी; पर मानुषी होनेसे उसे ' सूर्या ' देवता नहीं कहा जाता । क [ क्योंकि - देवता होनेपर ही उसे पुंयोगमें चाप होता है । स पुंयोग भी तीन प्रकारका होता है । एक जन्य- जनकभाव ( पिता-पुत्री ) जैसे देवक - देवकी । दूसरा भ्रातृ - भगिनीभाव - यमस्य भगिनी यमौ । इ तीसरा - पति - पत्नीभाव । जैसे कि – ' पुंयोगादाख्यायाम् ' ( ४ । ११४८ ) वि के उदाहरण ' गोपी ' में गोपकी स्त्रीका नाम भी ' गोपी ' बहिनका नाम भी ' गोपी ', तथा गोपकी लड़की का नाम है । सो सूर्या में सूर्यकी लड़कीका नाम ' सूर्या ' होता है । ' सूर्या ' अश्वियोंके रथमें बैठी थी; वहाँ उसकेलिए ' दुहिता सूर्यस्य रथं तस्थौ ( अश्विनोः ) ' ( ६ । ६३।५ ) ' f और ' गोप ' की भी गोपी होता वेद में कहा है-ब रथं... पं सूर्यस्य दुहिता वृणीत ' ( ऋ. ४।४२।२ ) ' आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य... प्रतिष्ठ 3 ( ऋ. १।११६।१७ ) ' युवो रथं दुहिता सूर्यस्य ' ( ऋ. १।११७।१३ ) प्रर्थात् है घ अश्वियो; तुम्हारे रथमें सूर्यकी लड़की ( सूर्या ) देवता बैठी थी । अब इसीके स ० ध ० ४०
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[ ६२५ ६२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५. सूरुडी धनुबादमें अन्य मन्त्रको देखिये- ' त वां ( अश्विनो ) रथं वयमद्या हुवेम... देवी - पह प्रश्विना! यः सूर्या वहति ' ( ऋ. ४/४४१, प्र. २०११४३१ ) इससे ' सूर्या ' शुद्ध है । यहाँ सूर्य देवताकी पुत्री ' सूर्या ' हुई, देवता होनेसे ' सूर्या ' में ' चाप् ' प्रत्यय पिका रहा हा । सो यहाँ ' सूर्या ' कोई मानुग्री - स्त्री सिद्ध न होकर ' देवता ' सिद्ध हुई । अब उसे मानुषी कहता हुआ वादी खण्डित हो गया । ह सविता वह यहां ' ऋषिका ' है । ऋषि मनुष्यसे भिन्न एक योनि है, पृ. १७८ इसे हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं । जैसे कि - ' देवान्, मनुष्यान्, असुरान् ( १२४६ ) उत ऋषीन् ' ( श्र.८ ९ / २४ ) ऋषियज्ञ पृथक् है, नृयज्ञ पृथक् । इस मानुषी विषय में पृ. ७३-७४ देखिये । तब वादीका स्त्रियोंको वेद पढ़ाना पक्ष गिस्वयो: कट गया । ' हजारों सैकड़ों ऋषिकाओंको कहता हुआ वादी २८ संख्या बनता तक पहुंचा है । यह तो आटेमें नमक बराबर भी नहीं । सावित्री सूर्याका श्री यद्यपि कोई मन्त्र वादी ऐसा नहीं दे सका, जिससे उसका कुछ पक्ष सिद्ध हो जाता । सके । पृ. १ ९ ' अहं केतु:... मे दुहिता विराट् ' यह मन्त्र प्रकृतोपयुक्त नहीं 1 - ( पिता- इसमें वादीने ' केतु ' का ' वेदज्ञानका श्रवण करानेवाली है, यह अर्थ बनावटसे यमी । किया है । इसमें वेदका नाम तक भी नहीं । अतः ' कल्पित ' है । यहाँ 1१ | ४८ ) ' विराट ' का ' विशेषरूपसे शोभित होनेवाली ' अथं तो है, पर यहां गोप को ' वेदज्ञान ' अर्थ डालना वादीका श्रुतिसे बलात्कार हैं । यह लोग वेदमें होता अपनी कपोल कल्पनाएं लादते हुए भी लज्जित नहीं होते । हा है- प्र. २०-२१ ऋषिकाओंका वर्णन करते हुए वादी उन्हें ब्रह्मवादिनी सूर्यस्य बताना है । इसपर पूरा मुंहतोड़ प्रत्युत्तर पृ. ७२-७६ पर देखिये । प्रतिष्ठ प्र. २२ ' सुगन्धिं पति- वेदनम्... इतो मुक्षीय मामुत: ' ( यजुः अर्थात् है ३।६५ ) मन्त्र जो वादीने लिखा है । यहाँ तो कहा गया है कि मैं पिताके इसके घर छूट, पतिके घरसे नहीं । इससे ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' स.ध.के सिद्धान्त के अनुसार हमारे पक्षकी तो कुछ भी हानि नहीं । यह मन्त्र उस लड़कीने तो बनाया नहीं, इसे वसिष्ठजीने समाधिमें देखा । उसे ' कुलायिनी ' का गलत अर्थ [ ६२७ frat farm मान लड़की से कहलवाया । इसी प्रकार फिर उसे क लवाता है । इससे हमारे पक्ष की कुछ भी हानि ऋत्विक् श्रादि पर आप लोग तो वेदसे विरुद्ध विधवा - विवाह नहीं होती । स्त्रीको उस पतिके घरसे छुड़वाकर नियोगादि कराकर उस होते हैं । खुल्लमखुल्ला वेदविरुद्धता कर रहे शेष रहा स्त्रीका मन्त्रोच्चारण; तो उसे वह वर - पुरोहितादिके स्त्रीके श्राश्रयसे पूर्वोक्त - सिद्धान्तानुसार उमसे बुलवाया ही जा सकता है । इससे नियमित वेदाध्ययन या ग्रभ्यासकी बात वादीकी कपोलकल्पना-मात्र है । बुलवाना भला क्या कठिन है, फिर भी पुरुष उसे बोल सकता है । जैसे कि गोभिलने ही स्वयं लिखा है- स्वयं जपेद् ग्रजपरस्याम् ( २११२१ ) यदि स्त्री उसे न बोल सके, तो पुरुष ही उसे पढ़ दे - यह ' प्राज्ञा दी गई है । गोभिलपुत्रके ' गृह्यासंग्रह ' में भी लिखा है- ' विवाहे यो विधि: प्रोक्तो मन्त्रा दाम्पत्यवाचकाः । वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ' ( २।२८ ) यहाँ भी स्त्रीपठनीय सभी मन्त्रोंको वरद्वारा ही बोलना लिखा है । कहीं उम स्त्रीसे प्रशुद्ध बोलनेकी प्रसक्तिमें श्रीगोभिलके अनुसार ' नमो विष्णवे इति ब्रयात् ' ( १।६।३१ ) । ऐसा लौकिक वाक्य कह देना पड़ता है । पृ. २२-२६ में वादीने कई काण्वस. श्रादिके मन्त्र दिये हैं, वे शाखा मन्त्र होनेसे वादोंके मनमें उनका बोलना ' स्त्रीका वेदाध्ययन ' नहीं । पृ. २७-२८ आगे झूठा वादी ' स्त्रियोंको वेदामृतपानकी स्पष्ट प्राज्ञा ' ' कुलायिनी घृतवती ' मन्त्र से देता है — इसका प्रत्युत्तर हम पृ. २११-२१६ में दे चुके हैं । यह मन्त्र यज्ञकी इष्टकाके विषयमें है । इसका इष्टका अर्थ निरुक्तसे विरुद्ध भी नहीं है । बल्कि यह वेदाङ्ग - व्याकरण तथा ' सर्वानुक्रमणिका ' आदि सबके अनुकूल है । पृ. २६-३२ भागे वादी अपनी समझमें एक बड़ा भारी प्रमाण ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' यह मन्त्र देता है, तथा ' कौमारब्रह्मचारिणी ' तथा
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६२८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ३-२ ) कुमारी ब्रह्मचारिणी ' आदि महाभारतके वचन देता है । हम इसका मुंहतोड़ तथा पूरा उत्तर पृ. ५५-७२ में दे चुके हैं कि यहाँ ' ब्रह्मचर्य'का श्रर्थं वेदाध्ययन नहीं हैं । इसमें हम उसी ब्रह्मचर्य -सूक्तके कुछ उद्धरण देते हैं-भूतभव्यम् अहोरात्रे वनस्पतिः । संवत्सरः सहर्तु ': ते जाता ' प्रोषधयो दिव्याः पशवः श्रारण्या ग्राम्याश्च ये । द्यपक्षा: ब्रह्मचारिणः ' ' पार्थिवा पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः ' ( प्र. ११।५।२० २१ ) क्या वादी इन पशु, पक्षी, प्रोषधियों - प्रादिका ब्रह्मचर्यं वेदाध्ययन मानेगा? यदि नहीं; तब इसके साथ वाले ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' आदिका भी अर्थ वेदाध्ययन न होकर ' उपस्थसंयम ' ही अर्थ होगा । प्रथम अध्याय समाप्त । श्रथ द्वितीयाध्याय । पृ. ३४-३५ वादी लिखता है - ' हमारे पौराणिक भाई ब्राह्मणग्रन्थोंको भी वेद ही मानते हैं, किन्तु हम वेदोंको ईश्वरीय ज्ञान और ब्राह्मण-ग्रन्थोंको ' चतुर्वेदविद्भिः ब्रह्मभिः ब्राह्मणैर्महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेद-व्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि इस महाभाष्यादि सम्मत व्युत्पत्तिके महर्षियों द्वारा प्रणीत वेदव्याख्यान वा वेदभाष्य मानते है ' । अनुसार यह वादीका भयानक एवं प्रक्षम्य छल है । यह स्वाद की अपनी गढ़ी हुई संस्कृत है । यह ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकामें ' वेदसंज्ञा- विचार ' विषय पृ. ६६ में स्वामीने लिखी है । ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' के कर्ता प्रतिपक्षीने इसे ही महाभाष्य तथा शतपथादिके नामसे उद्धृत कर दिया है । देखो उसका ' वेदोंका यथार्थस्वरूप ' । इन झूठे लोगोंको दयानन्दी लोग बड़ा विद्वान् मानते हैं । इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) पाठक पृ. ८००-८०४ देखें । वादी ब्राह्मणभागको महर्षियोंसे बनाया हुआ भाष्य कहते हैं, फिर उन्हींको वेदविरुद्ध कहते हैं । ' ब्राह्मण ' ऋषियोंके ' बनाये ' नहीं हैं; किन्तु प्रोक्त हैं । वे भी वेद हैं; इस विषयमें ' प्रालोक ' ( ६ ) देखें । भूतप्रेत गन्धर्वसे पकड़ी लड़की पृ. ३५-३७ आगे वादीने ' ऐतरेय ब्राह्मण ' से ६३० गृहीता ' ( २८ ) की आख्यायिका दी है । एक कुमारी ' गन्दनं यह वादीकी, पुलिन सामश्रमीजीकी जालसाजी है । यहां ' गन्धर्वगृहीता ' कोई या श्री. ' गन्धर्षेण गृहीता ' यह व्युत्पत्ति है; वह ' भूतविद्या ' के कारण नाम नहीं है । ' माला ग्रहसे गृहीत थी; उस लड़की से पूछा गया कि तू कौन है गन्धर्व - नामक गन्धव ठहरे हुए गन्धर्वने कहा- ' मैं सुधन्वा प्राङ्गिरस हूँ । ' नहीं । उसके अन्दर । गन्धक अपना नाम लेती । पूछनेपर उसके अन्दर रहने वाला तो वह लड़की । भीतरका स्वामी बना हुआ था, वही बोल रहा था जैसे कि गन्धर्व जो उसके की भूतग्रस्त व्यक्तिसे पूछनेपर अन्दरका प्रेत अपना नाम, बताता ग्राजकल भी ' घाल भूत विद्या के लक्षण में ' सुश्रुतसंहिता ' में है । स्थान कहा है- ' भूतविद्या दिभि देवाऽसुर - गन्धर्व - यक्ष - रक्षः पितृ - पिशाच - नागन्प्रहाद्य ुपसृष्टचेतसां शान्ति नाम । बलिहरणादि ग्रहोपशमनार्थम् ( ε1 ' ( सूत्रस्थान - १ | ११ | ( ७ ) ) यह देव- प्रमा गन्धर्व आदि ग्रहोंसे गृहीत हुई बताई गई है । सुश्रुतस में ' देवास्तथा होता गणाश्च ( असुराः ) तेषां गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः । रक्षांसि या शत्रु-पिशाचजातिः एषोऽष्टको देवगणो ग्रहाख्य: ' ( उत्तरतन्त्र ६०1७ ) में छिप लड़क देव, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, पितर, नाग, राक्षस, पिशाच, यह सब देवयोनिके जीव ' ग्रह ' माने गये हैं । क्योंकि इनकी मनुष्य प्रादियोंमें पकड़ सम्भव हो सकती है; वे व्यक्ति उपद्रवग्रस्त हो जाते हैं, अतः उनका देवी- स्पर अनुप उपचार करना इसीका नाम उपवेदमें ' भूतविद्या ' आया है । ' नैनं घ्नन्ति प्रप्सरसः, न गन्धर्वाः... यो विभर्ति इमं मणिरे वेदर ( अथर्व ८।५।१३ ) यहां विशेष मणिसे गन्धर्व श्रादिका प्रभाव हटना कहा है । इससे किसी कुमारीकी गन्धर्वसे गृहीतता सिद्ध हो जाती है । एक सुश्रुतसं तथा चरक्रम में इस ग्रहों गृहीताके लक्षण भी दिये गये सम् हैं । उसमें गन्धर्वगृहीत व्यक्ति के लक्षण यह बताये गये हैं- हृष्टाला बाट है । पुलिनवनान्तरोपसेवी, स्वाचारप्रियपरिगोन गन्धमाल्यः । नृत्यन् वै प्रह ' वेद चारु - चाल्पशब्दः गन्धर्वग्रहपरिपीडितो मनुष्यः ' ( ६।१० ) ( प्रसन्नचित, पींग
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६३० ] रो ' बरं. ' या श्री. पुलिन तथा नहीं माताओं में है । गन्धर्वग्रहसे - नामक उसके गन्धर्वग्रहसे श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) बनके बीच रमण करनेवाला, अच्छे प्राचारका, गीत - गन्ध-रुचिवाला, नाचते हुए सुन्दर और थोड़ा बोलनेवाला मनुष्य गृहीत होता । इस प्रकार चरकस. के चिकित्सास्थान में भी गृहीतके लक्षण बताये गये हैं । अन्दर ' गन्धर्वाः प्रायशोऽष्टम्यां ' ( सुश्रुतसं उत्तरतन्त्र ६०।१७ ) में गन्धवों-वह लड़की तिथिमें पकड़ बताई गई है । इन सबका पूरा वर्णन हम जो उसके की ' भ्रालोक प्रष्टमी ' ( ११ ) में करेंगे । भूतोन्मादके लक्षण में चरकस. के चिकित्सित-" 1 जकल मो स्थानमें कहा है — ' अमर्त्यवागु - विक्रम वीर्य चेष्टा ज्ञानादि - विज्ञानबला-विद्यानाम दिभिर्यः । उन्मादकालोऽनियतश्च तस्य भूतोत्यमुन्मादमुदाहरेत् तम् ' शान्तिसं ( १५ ) जो देव, गन्धर्व आदि आठ ग्रहोंसे गृहीत होता है, वह प्रमानुषी वाणी, देववाणी, संस्कृत बोलता है, उसका बल भी श्रमानुषी यह देव- होता है; पर इस बातको न माननेवाले प्रतिपक्षी उस गन्धर्वग्रहसे गृहीत तथा - लड़कीका नाम ही गन्धर्वगृहीता बताकर इस भूतविद्या विषयको ही या पा छिपाना चाहते हैं । पर उन्हें इस विषय में सफलता नहीं मिल सकती । ६०१७ ) में देवयोनिके श्रीसायणाचार्य ने ऐ.ब्रा. की तथा ऋग्वेदादिकी भूमिकाओं में बहुत कड़ सम्भव पट ही लिखा है कि- ' उपनीतस्यैव श्रध्ययनाधिकारं ब्रुवत् शास्त्रम् नका देवी- श्रनुपनीतयोः स्त्री - शूद्रयोः वेदाध्ययनमनिष्ट - प्राप्तिहेतुः इति बोधयति ' ( स्त्री एव शुद्रके उपनीत न होनेसे उन्हें वैध वेदाधिकार नहीं । सव-वेदभाष्यकार श्रीसायण जो वेदादिशास्त्रोंके प्रकाण्ड विद्वान थे, एवं मि शास्त्रोंके चतुरस्र पण्डित थे; उनके इस विषयके लेखको जो केवल भाव हटना एक स्थानपर ही नहीं लिखा गया, जिससे उसमें भूल वा प्रमादकी तीं है । सम्भावना हो; किन्तु वहुत्र उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में लिखा हैं-दिये गये चादीका ' वेदशास्त्रविरुद्ध ' कहना ' छोटे मुंह बड़ी बात ' होनेसे उपेक्षणीय - हृष्टाला है । स्थान - स्थान पर बड़े बहुश्रुत विद्वानोंके ऋषि - मुनियोंके लेखोंको भी प्रह ' वेदविरुद्ध ' कह देना- यह तो वादियोका ' तकिया कलाम ' है; गलत है-सन्तविर गाधींगी है । ' वेद ' शब्दका अर्थ वादीका अशुद्ध [ ६३१ समस्त - वेदादिशास्त्र सेवावृत्ति आदि कृच्छ्रमोंमें स्त्री - शूद्रोंको ग्रनुपनीत ही मानते एवं कहते हैं । केवल लगे हुए ' ब्रह्म येण कन्या ' यह मन्त्रका टुकड़ा मिला हुआ है, जिनके वादियोंको छिपाकर यह लोग उपसंहारसे विरुद्ध अर्थ कर दिया करते हैं, उत्तरार्धको इसीसे उसके उत्तरार्धको छिपाकर जनवञ्चन कर दिया करते ही पृ. ५५-७५ में अकाट्य प्रत्युत्तर हैं, जिसका हम दे चुके हैं, जिसपर यह लोग कभी बोल हो नहीं सकते; अतः स्वयं ही वे वेद - ज्ञानहीन सिद्ध होते हैं । ' सुगन्धि पतिवेदनम् ' इत्यादि मन्त्र विवाह्यमाना कुमारियोंके विवाहविष उनका द्विजस्त्राधायक वैदिक - सस्कार लिए हैं, ६७ ) सो उनकी वहां द्विज - कल्पता माना जाता है ( मनु. २ होनेसे स्वविषयक कुछ मन्त्रों का पाठ अपवाद होनेसे ' नत्रोत्सर्गस्य प्रपत्रादाद् निवृत्तिः इस न्यायसे स्त्रियों क्रमिक तथा वैध वेदाध्ययनके ग्रनधिकारको प्रभावित नहीं कर सकता ' प्रकल्प्य च प्रपवाद - विषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते अपवादत्रियो । प्रकल्पित करके फिर अन्यत्र उत्सर्ग ( मामान्यशास्त्र ) का ही साम्राज्य छाया रहता है ) । पृ. ३६-४० श्रागे वादी ' अथ वेदे पत्नीं बिस्त्र ' सर्याति ' वेदोसि ' का अशुद्ध अर्थ करता है कि - वेद खोलकर पत्नीको ' वेदोसि ' इत्यादि मन्त्र बोलनेका विधान है । वादीने यहां ' वेद ' शब्दका अर्थ वेदग्रन्थ समझा है - यह उसका शास्त्रीय प्रज्ञानका द्यातक है । यह लोग ऐस गलत अर्थ करके सस्कृतानभिज्ञ जनताको अन्धेरेमे रखते है । हमने बीसों प्रमाण देकर इस विषयको पृ. १८३-१८६ में स्पष्ट कर दिया है । पृ. ४१-४२ में वादी तैत्तिरीय - सहिताके कुछ प्रमाण देता है. वह तो वादीके मतमें वेद नहीं; तब उन कई मन्त्रोंका बोलना वादीके अनुसार स्त्रीका वेदाध्ययनाधिकारश्वाश्रव्यक नहीं; यद्यपि स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' इस सिद्धान्तानुसार हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । पृ. ४२-४३. ' अर्धो वा एष प्रात्मनो यत् पत्नी ' ( ते. ३३३५ )
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६५२ । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' प्रयज्ञो वा एप योऽपत्नीकः ' ( तै. २६ ) पत्नी अपना श्राधा भाग है, जो पत्नीसे रहित हो, वह यज्ञ नहीं । इन वचनोंसे वादीकी कुछ भी पक्षसिद्धि नहीं । पत्नी यज्ञमें बैठती है, सोनेकी सीताकी भान्ति । इस विषय में हम पूर्व बहुत स्पष्टता कर चुके हैं ( पृ. १४६ ) पृ. ४३ पञ्च महायज्ञ शूद्र भी ' नमः ' अन्तवाले मन्त्रोंसे कर सकता है । मनुजी के ' अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ: ' इस वचन के अनुसार पढ़ानेका काम ब्राह्मणका है, शुद्रका नहीं । जबकि वह क्षत्रिय - वैश्यको भी विहित नहीं । सो शुद्रोंका ' ब्राह्य ' हुतं द्विजाग्रचाच ' ( मनु. ३।७४ ) ब्राह्मणका पूजन ही ब्रह्मयज्ञ है, वा ' ब्रह्मणे नमः ' कहना । पृ. ४४-४६ आगे वादीने जो कि - कात्या.श्रौ.सू. के सूत्र ' स्त्री चावि-शेषात् ' ( १११७ ) आदि दिये हैं, यह व्यर्थ हैं । उसके पक्षसाधक नहीं । इसमें स्त्रीक कथन ' स्वर्गकामो यजेत ' इस वचनकेलिए ही है कि स्त्री भी स्वर्गकी कामना कर सकती है । ' दर्शनाच्च ' ( ११११८ ) इस सूत्र के भाष्यमें लिखा है- ' सा च पुसा सह अधिक्रियते, न पृथक् । येन एकस्मिन् कर्मणि पत्नीसाध्याः पदार्था दृश्यन्ते, यजमानसाध्याश्च । पत्नी ग्रज्यम-वेक्षते । यजमानो वेदं ( कुशमुष्टि ) बध्नाति यहाँपर यज्ञमें स्त्रीका कार्य ' घी ' प्रादिको देख देना कहा है । नापकी समिधाए काटना, अग्नि प्रज्वलित कर देना; कोई चीज़ उठा देना- कुशका वन्डल बान्धना - प्रादि स्वयं समझ लिया जा सकता है । इस विषय में स्पष्टता पृ. १४५-१४७ में देखनी चाहिये । पृ. ४६-५० में वादीके - ' पत्नी वेद प्रमुञ्चति वेदोसीति ' ( कात्या.श्री. ( इष्टिनिरूपणाध्याय ) में पत्नीका वेद खोलनेका तथा ' वेदे पत्नीं वाचयति ' ( शाङ्खायनश्री १११२-१३ ) आदि; ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' ( आश्व. श्री. १।११।१ ) वेदको पत्नीके हाथमें देकर मन्त्र पढ़वाने आदिका सम्यक् उत्तर हम १८३-१८६ पृष्ठमें दे चुके हैं । सभी प्राक्षेपोंका समाधान वहाँ किया जा चुका है । स्त्रीका विशेष मन्त्र बोलना अपवाद ६३४ पृ. ५० में वादीने लिखा है- ' जब तक कुमारियों तथा नियमपूर्वक वेद और वेदाङ्ग - व्याकरणका अध्ययन न किया अन्य सिर संकेत अध्वर्युद्वारा बुलवानेपर भी मन्त्रोंका शुद्ध आचरण नहीं हो, तो निस्सा यज्ञों में अशुद्ध मन्त्रपाठका ' याज्ञे कर्मणि पुनर्नापभाषन्त कर सकी । स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्यो दुष्टः सभी हिनस्ति ययेन्द्र - शत्रुः स्वरतोऽपराधात् ' इत्यादि महाभाष्योक्त म जाते । प्रवल निषेध है । ' वचनारे होती इसका उत्तर पृ. १३७-१४० में दिया जा चुका है । वादोर ए कृत्वा मान लिया कि - विशेष - मन्त्र स्त्रीको अध्वर्यु द्वारा बुलवाये जाते हैं । कर्तव्यत हर उसमें मुख्यता अध्वर्यु की होनेसे शुद्धताका उत्तरदायित्व उसापर श्रा बताते ह है । स्त्रीने तो उसका अनुकरण ही करना है । दाम्पत्यवाचक मन्त्र बता गोभिलपुत्रके ‘ गृह्यासग्रह ' के अनुसार वस् भी पढ़ सकता है । इस पृप्ते प्रतिपट हम पूर्व इस विषय पर बहुत स्पष्टता कर चुके हैं । ' ह वादी स्वयं भी सोचे कि जब उपनयनसंस्कारका प्रारम्भ होता है मन्त्रों में उस समय में माणवकको अपने अधिकारानुसार कई मन्त्र पढ़ते पढ़ते हैं । यह स्त्री उस समय ५ वा ८ वर्षकी प्रायु होनेसे और फिर उस समय वेदाङ्गको प्रति व्याकरण भी न पढ़े होनेसे वह लड़का उन वेदमन्त्रों को जैसे प्राचा प्रकार के सहायतासे बोलता है; इस प्रकार स्त्री भी विवाहित होनेपर प्रनावा मल्लनि = प्राप्त द्विजकल्पत्वके कारण ऋत्विक् प्रादिकी सहायता से कई मन्त्र बन्यायसे लेगी । इतना अवश्य है कि- माणवकका तो उस समय जनेऊ होता है । पृ. पर कुमारीका विवाह ही अनायास द्विजत्वाधायक संस्कार हो बसे इस उसे माणवककी भांति सीधा वेदाधिकार तो नहीं हो जाता । हां, में पचं प्रम स्वविषयक मन्त्र उस औपचारिक द्विजत्वसे ऋत्विक् के सहारे बोल स है - यह स ध का सिद्धान्त है, पर शूद्रको तो किसी भी ढंग से द्विजन्तर १ ) मन “ मिलनेसे थोड़े मन्त्रोंको भी बोलनेका उसका अधिकार प्राप्त नहीं होता ॥ यह रहस्य वादीके सामने रख दिया है । पहले भी बैंक रह यह हमने स.ध.का
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६३४ 7 अन्य विदारे कई बार दिया जा चुका है । अतः वादीकी आपत्तियां या हो, तो निस्सार सकेत हैं । कर हो । जोकि वादीने स्त्रीपठनीय कई मन्त्रोंका संग्रह कर दिया है । यह दुष्ट: सभी मन्त्र एक ही विवाह, वा एक ही यज्ञमें वा एक ही कुलमें नहीं बोले ज्यो म जाते 1 । सभी की सभी शाखाएं ही नहीं होती, एक कुलकी एक ही शाखा योक्त बसारे होती है । ' य: स्वशाखोक्तमुत्सृज्याऽन्यशाखोक्त माचरेत् । श्रप्रमाणमृषि कृत्वा धन्धे तमसि मज्जति ' ( गृह्यास. शा९ २ - ९ ३ ) ( अपनी शाखाकी 1 बादोरे ह कर्तव्यता छोड़कर अन्य शाखाकी कर्तव्यता करता है; वह ऋषिका अप्रमाण जाते हैं । सेके अन्धेरेमें डूबता है ) सो तदनुसार यह थोड़े ही दो - चार मन्त्र वच पर या जान जाते हैं; पर प्रतिपक्षी दिखलाता है कि हमने बहुतसे मन्त्र स्त्री - पठनीय चकमन्न बता दिये । साधारण जनताको यह रहस्य ज्ञात न होनेसे वह । इस पुष् प्रतिपक्षियोंकी भूल - भुलाइयोंके चक्कर में पड़ जाती है । ' स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' इस अपवाद सिद्धान्त के अनुसार इन थोड़े रम्भ होता है मन्त्रोंमें क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. १ २ १७३ ) न होनेसे उनके अनुसार पढ़ने पड़ते है । यह स्त्रीका वेदाधिकार वा वेदाध्ययन नहीं हो जाता । यज्ञमें सोनेकी सीता समय वेदाह की प्रतिमाका दृष्टान्त भी पहले कई बार दिया जा चुका है । वादीके इस जैसे धाचा प्रकार के संगृहीत मन्त्रोंपर पुनरुक्ति तथा विस्तारके डरसे हम ' प्रधान-नेपर प्रनावा मत्तनिवर्हण ' न्यायसे पुनः पुनः नहीं लिखेंगे । पाठकों को ' स्थाली पुलाक'-कई मन्त्र न्यायसे स्वयं समझ लेना चाहिये । जनेऊ होता है । पृ. ५२ ' घृतवन्तं ' कुलायिनं ' इति वेदे पत्नीं वाचयति ' प्रथात् वेदमें कार होने से इस मन्त्रका पत्नीसे पाठ करवावे ' ( शाखा. श्रौत. १।१२१३ ) ' वेवं ता हूं, पल्यं प्रदाय वाचयेद् होताऽध्वर्युर्वा ' वेदोऽसि वित्तिरसि ' अर्थात् होता या रे बोल प्रध्वर्युं पत्नी के हाथ में वेद देकर ' वेदोसि वित्तिरसि ' ( प्राश्व.श्रौ. १।११ । लुंगसे हिल १ ) मन्त्रका उच्चारण करावे ' । नहीं होता । ' वेद ' का अर्थ ' वेदपुस्तक ' करके जनताकी आँखों में धूल • पहले भी मॉक रहा है । महाशय! यहाँ ' वेद ' का अर्थ ' वेदपुस्तक ' नहीं है | ' वेद ' का ग्रथ भी वादीका नहीं श्राता [ ६३५ यदि वेदपुस्तक अर्थ है, तो वादी अपने वेदसे " घृतवन्तं कुलायिनं ' तथा ' वेदोसि वित्तिरसि ' (? ) यह मन्त्र दिखलावे । पर उसे नहीं मिलेंगे । यदि न दिखला सका, तो उसका श्रर्थ अशुद्ध मिद्ध हो गया । इस प्रकार ' पूर्णमसि पूर्णं भूयाः ' (? ) यह मन्त्र भी वादी अपने वेदसे दिखलावे । यदि न दिखला सका; तो स्पष्ट है कि यह अर्थ गलत है । इस विषयमें हमने पृ. १८३-१०६ में बीसों प्रमाण देकर सिद्ध कर दिया कि यहाँ ' वेद ' का अर्थ ' कुशोंका वडल ' है, वेदपुस्तक नहीं । यह पाठकोंने वादीका जनवञ्चन देख लिया । पृ. ५१ वादी सामवेदसं. के लाट्यायन श्री. से ' पत्नी च उपग्रह प्रभृतीनि निधनानि उपेयादिति ' ( ११६४ ) अपना पक्ष सिद्ध करना चाहता है । इसपर वादीस प्रष्टव्य है कि क्या श्राप उपग्रह प्रादि निधनोको अपने ' सामवेद ' मे दिखला सकते हो? आपकी ' सामवेदस ' में वां उपग्रह तथा निधन आदि शब्दोंका ही अत्यन्ताभाव है । ' देवतत्रा ' के भाष्य में श्रीसायणने ' निधन नाम पञ्च भक्तिकस्य सप्तभक्तिकस्य साम्नोऽन्तिमो भाग: ' ( ११२ ) यह ' निधन ' का लक्षण करते हुए इडानिधन, कालेयर-वादि पदनिधन, यौद्यात्रय संहिता आदि, ईकार निधन, वैराज प्रादि बताये हैं, उनको अपनी सामवेदस में दिखलावे । वादी क्या हजार - संहिताओं के सामवेदको मानता है? यदि हां, तब अपने सिद्धान्तका पराजय स्वीकृत करे, और सामका भी निधन ( अन्तिम भाग ) बोलनेकेलिए कहा है, सब नहीं । उसमें भी उपग्रह प्रादिकी सीमा बना दी गई है । हम पूर्व कह चुके हैं कि स्त्री शास्त्रानुसार यज्ञमें बैठती हैं । उसकेलिए कोई वचन - बलसे नियत कार्य गान आदि या जावे; तो वह पतिके श्राश्रयसे कर सकती है । पर इतनेसे उसको सर्वसाधारणतासे वेदाधिकार नहीं मिल जाता । जैसा पति कहता आये, वह भी वैसा कहता श्रावे, तो क्या आप इतने भरसे उसका वेदाध्ययन मान लेंगे? इसकी स्पष्टता बहुत बार पहले की जा चुकी हैं ।
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६३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पृ. ५३ आगे वादीने ' व्योमसंहिता ' का स्पष्ट प्रमाण ' आहुरप्युत्तम-स्त्रीणां यह देकर अपना पक्ष सिद्ध करना चाहा है ' इसका स्पष्ट प्रत्युत्तर हम पृ. २४७-२५२ में पूर्णतया दे चुके हैं । अथ तृतीयाध्याय ( गृह्यसूत्रों के प्रमाण ) पृ. ५४-५७ ‘ गृह्यसूत्रोंमें प्रमुख पारस्करके अनुसार लाजाहोम ' प्रयंमणं नु देवं ' आदि मन्त्रोंको पढ़कर कन्या ही करती है । ' प्रमण नु देव ' इयं नारी उपब्रूते लाजान् प्रावपन्तिका ' ' इमान् लाजान् ग्रावपामि अग्नी ' । यह तीनों ही पारस्करप्रोक्त मन्त्र वादी के वेदपुस्तकमें नहीं हैं । तीन मन्त्रोंमें एकमें वेदमें ' पूल्यानि श्रावपन्तिका ' यह पाठ हैं, पर यहां ' लाजान् श्रावपन्तिका ' यह पाठ है । या तो वादी फिर मन्त्रोंके अर्थ ब्राह्मणको भी वेद माने; नहीं तो चुप होकर बैठ जावे । यह तो श्रीमन्त्र हैं, इससे वादीके पक्षकी कुछ भी सिद्धि नहीं । और फिर यहां यज्ञका चरु अग्निमें हुत नहीं किया गया है, किन्तु लाजाए । इससे लड़कीको वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । यह तो ' स्मात कम ' है । इसमें स्त्रीको कोई निषेध नहीं । इस विषय में पृ. ४२७-४२ में देखो । इन मन्त्रोंको वर पढ़ता है, इसमें अन्य गृह्यसूत्रोंकी तथा अन्य टीकाकारों की भी साक्षी देखें । श्राश्वलायनगु. के भाष्यकार श्रीगार्ग्यनारायणने तो स्पष्ट लिखा ही है- ' नहि स्त्रीणां मन्त्रे धिकारोस्ति, तस्माद् वरस्यैते मन्त्रा: ' । अब दूसरों-की भी साक्षी देखिये - श्रीकुमारिलभट्टने आश्व.गृ. कारिका में लिखा है-' वरः शूर्पगतान् लाजान् प्रवत्ताश्चाभिघारयेत् । पठेच्चार्यमणं मन्त्रम् ' अथ पत्नी स्थिता सती । कुर्वत्यञ्जलिविच्छेदमङ्गुल्य जुहोति तान् ' ( १।२२।११-१२ ) यहां पर ' वर:... पठेच्चार्यमणं मन्त्र ' में यह ' अर्यमणं ' मन्त्र वरद्वारा ही पढ़वाया गया है वादीके प्रिय भाष्यकार श्री हरदत्ताचार्यका भी कथन देखें । ' इयं नारी ' आदि मन्त्र वरद्वारा बोलना सर्वसम्मत है | ६ ६३० लिखते हैं- ' प्रर्यमणमिति त्रिभिर्मन्त्रैर्लाजान् जुहोति ' वरस्यैव ' | 1... मन्त्रालु भी ' खादिरगृह्यसूत्र ' में रुद्रस्कन्दने भी यही लिखा है वेर्दा [ लाजान् ] जुहुयादेव, न मन्त्रं वयान् । पतिरेव मन्त्र - सा बहू पर मर्थम् ' ( १।३।२२ ) । इससे अन्य स्पष्टता क्या होगी या इ. भाव ? आपस्तम्बगृ निम ' जुहोति इयं नारीति ' ( २।५।६ ) वादीके प्रिय भाष्यकार श्रीहरदत्तने लिखा है- ' वरस्यैव जुहोतिक्रिया, पात्रस्थानीयो वध्वञ्जलिः । ' श्री ' पत्रिकाके बादीके लेखानुसार ' प्रामाणिकमूर्धन्य ' श्रीस॒दर्शनाच बर यहाँ लिखते हैं- ' वर एवं ' इयं नारी'ति अनया ऋचा श्रमिकहाँ वध्वञ्जलिना लाजान् जुहोति ' यहांपर भी वर द्वारा ही उक्त मन् भी बोलना वा हवन बताया है । पहले कौशीतकी में भी यही कहा है- ' इयं नारी उपब्रूते - इति पतिपन का -जपति ' यहाँ भी पतिद्वारा ' इयं नारी ' यह मन्त्र बोलना कहा है । कार ' लघ्वाश्वलायनस्मृति ' में भी विवाह प्रकरण ( १५० ३६-४०-४१०४२ ) ३ वरकी लाजाहोमादिका कर्ता वर ही बताया गया है । इसी प्रकार ' साल्याप डालल गृ. में प्रकृत- स्थलमें यही लिखा है । ' गोभिलगृ. ' ( ३१२१६ ) ६ दानक भाष्यकार श्रीचन्द्रकान्त - तर्कालङ्कारने भी यही लिखा है- ' इयं ना इससे उपब्रूते ' श्रनेन वरपठितेन मन्त्रेण ' इत्यर्थः, इयमिति मन्त्रलिङ्गात् डाले, ह वा एष श्रात्मनो यद् जाया नाम ' इति वाजसनेये ब्राह्मणे पठ्धः । श्रतः शरीरार्धेन चेत् क्रियते, तर्हि स्वयमेव क्रियते ' यह कह करके ' गोति - नारी ' पुत्रके गृह्यासंग्रहका यह प्रमाण दिया है- ' मन्त्री दाम्पत्य वाचकाः । ब्रूते-वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ' ( २२४ ) । गोभिलसूत्र में गोभिलको f व्यवस्था मानी जावेगी, सामश्रमी वा ठाकुर उदयनारायणकी नीं । प्रमा पर वही गोभिलपुत्र ' श्री ' पत्रिकामें ' वैदिक ' था, अब यहाँ बे है - वह ' वेदान ' बन जायगा, यह है इन लोगोंकी लीला!!! कि वह इस विषय में ऐकमत्य है, तब तदनुरोधसे पारका पति के
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| ६३ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६३८ ... मन्त्रासु भी यही व्यवस्था होगी । पर वे गृह्यसूत्र तो अव वादीके अनुसार ' वेदविरुद्ध ' हो गये; ग्रव कुछ भाष्यकारोंके अनुसार वादीची पारस्करगृ. श्रद्धा जाग उठी, और उसे ' प्रमुख ' और ' लोकप्रिय ' मानने लगा । - याद सा इत्येव- बह पर ' मार्वदेशिक ' जून १६४६ में इमी वादीने लिखा था- ' पारस्करग के . पस्तम्ब निर्माणके समय वैदिकमर्यादाका कुछ लोप हो चुका था ' । श्री हरद जो कि यहाँ जयराम, गदाधर आदि भाष्यकारोंने लिखा है- ' अत्र 1 इदं मन्त्रत्रयं कन्यैव वरपाठिता पठति ' । यहाँ ' वरपाठिता ' का अर्थ है कि-सुदर्शनाचा वर ही यहाँ कन्याको सीतमन्त्र पढ़वाता है । तो यहाँ स्त्रीकी स्वतन्त्रता प्रभिद कहाँ रही? यह मन्त्र ब्राह्मणभागादिके हैं; सो वादी ब्राह्मणभागको उक्त मन्त्र भी वेद मानकर अपने साम्प्रदायिक पक्षका खण्डन करे । इस विषय में पहले के पृष्ठों में पूरी स्पष्टता की जा चुकी है । यहां ' संहितेन श्रञ्जलिना ' इति पतिमन का अर्थ वर - वधूकी सम्मिलित प्रञ्जलि इष्ट है, अर्थात् वधूकी अञ्जलि T कहा है । कर रहे; उनमें भ्राता खीलें डालता है । वधूकी अञ्जलिसे नीचे - ४१-४२ ) ३ वरकी अञ्जलि होती है 1 वधू उन खीलोंको वरकी अञ्जलिमें ' साङ्ख्यायः डालती है । ' जुहोति ' में हु धातु है, जिसका अर्थ ' दान ' होता है; और ३१२६ ) दानका श्रर्थ वहाँ ' प्रक्षेप ' है । उसे लेकर फिर वर अग्नि में डालता है । 5- इयं नारी इससे वादीकी किसी भी प्रकार पक्षसिद्धि नहीं । श्रथवा वधू ही अग्नि में लङ्गा डाले, फिर भी पूर्व कहे प्रकारसे हमारी कुछ पक्षहानि नहीं । ह्मणे पठ्ने माध्यकार श्री जयरामने तो यह भी लिखा है- ' यद्वा वरो ब्रूते ' इयं करके ' गोकिनारी ' ( १ ९ ६३ ) इस प्रकार श्रीगदाधराचार्यने भी कहा है – ' यद्वा बरो त्य - वाचन ब्रूते- ' कन्या इयम् अग्निम् ' । वादीने इनको छिपा दिया है । गोभिलपुत्र फिर ' तर्कमनोबी ' वादी इसपर ' बड़ा भारी त ' उठाता है- ' स नो नहीं । प्रमा ' का अर्थ सर्वथा स्पष्ट है कि हम कन्याएं श्रर्यमाकी पूजा करती यहाँ बेच् - वह हमें पितृकुलसे छुडाये, पतिकुलसे नहीं ' । श्रव शास्त्रीजी बतावें कि - नया पति यह प्रार्थना करेगा कि परमात्मा हमें पिताके कुलसे छुडावे पारस्पतिके कुल से नहीं ' ( सार्व. अगस्त १ ९ ४६ ), । लाजातिके मन्त्र वरके बोलने के हैं [ ६३ ९ बाढीका यह तर्क इसलिए निकम्मा है कि- दूसरेकी ओरसे कहने पर ऐसा कहनेकी भी शैली होती है कि - ' यह लाजा छोड़ती हुई नारी कहती है । कि अर्यमा देव मुझे निकुलसे तो छुडावे; पतिकुलसे नहीं, मेरा पति चिरायुष्मान् हो । ' इय नारी उप ते लाजान् श्रावपन्तिका ' यह पारस्करगृ में ठहरा ' इय नारी उपत्र ते ' यह प्रथम पुरुष हमारे पक्षका दृढ़ प्रमाण है । वादीने ' कन्या अग्निमयक्षत ' इस प्रथम पुरुषका श्रयं ' हम न्यायकारी परमात्माकी पूजा करती हैं; इस प्रकार उत्तमपुरुष तथा वर्तमानकालका किया है ' यह सर्वथा अशुद्ध है । ' श्रयक्षत ' यह लुङलकारके प्रथमपुरुषके बहुवचनका प्रयोग भूतकालवाचक तथा अन्य वाचक है । वह इस वर्तमन कन्याकेलिए नहीं है । तभी श्रीगाग्यंनारायणने श्राश्वग के भाष्य में ठीक ही लिखा था- ' यत्तु उक्त मन्त्रलिङ्गादिति, तत्र ब्रूमः - नहि श्रत्र इयं कन्या श्रभिधीयते श्रन्या एव तु कन्या: ' [ पूर्वकल्पस्थाः ' ] यदि इयमभिधीयते-बहुवचनं नोपपद्यते, तथाभूतश्च [ भूतार्थको लुङ -घटितः ] प्रत्ययः श्रपि नोपपद्यते, तस्माद् वरस्य [ इमे मन्त्राः | ' यह बात बिल्कुल ठीक है । इसलिए यह इस कन्या के बोलनेके मन्त्र नहीं हो सकते; पर उन पूर्वकल्पस्थित कन्याओंकी प्रार्थना बताकर अपनी वधूको भी वर वैसा ही चाहनेका उपदेश दे रहा है । अतः वरका उक्त मन्त्र बोलना सङ्गत भी है । वादी इनके वेदमन्त्र न होनेसे इनमें व्यत्यय भी नहीं बता सकता । पृ. ५७-५८ बादी लिखता है - ' अथैनां सूर्यमुदीक्षयति ' वर बघको सूर्य - दर्शनके लिए प्रेरित करता है, और वह ' तच्चक्षु ' ' मन्त्रको पढ़कर सूर्यदर्शन करती है । यह कहकर वादी लिखता है - कर्क, जयराम, हरिहर श्रादि सब भाष्यकारोने स्पष्ट माना है कि इस वेदमन्त्रका उच्चारण व करती है ' । ( सावं. ) इस बादीकी लीलाका पता नहीं चलता । कभी तो वह इन
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६४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) भाष्यकारोंको ‘ पौराणिक ' कहकर इनसे पहला छुड़ा लिया करता है, और कभी उनको ' मूलकार ' से भी अधिक महत्त्व दे देना है । यद्यपि ' स्त्रीणां विवाहस्तु ममन्त्रक: ' इम अपवाद सिद्धान्त के अनुसार ' तच्चक्षुः ' मन्त्रके भी विवाहविधिके अन्तर्गत होनेसे वरके सहारे पत्नी-द्वारा मन्त्र वुलवानेपर हमारे पक्षकी रञ्चमात्र भी क्षति नहीं, तथापि वादी यहां गृह्यसूत्रके मूलशब्दों को तो देख्ने कि वे क्या सूचित करते हैं, और मूलका यहां ' ठीक अर्थ ' क्ण हो सकता है? ठीक अर्थं तो यह है - वर ' तचक्षु ' इस मन्त्रसे बधूको सूर्यका दर्शन कराना है । वादी ही बता कि इस ' अति ' क्रियाका कर्ता वर है, या वधू? इसी बात पर तो सत्यासत्यका निर्णय होगा । वधू तो यहां ' एनाम् ' शब्दके कहनेसे ' कर्म ' है । ' तच्चक्षः ' मन्त्रका सम्बन्ध ' उदीक्षयति ' क्रिया के साथ होनेसे उस क्रिया के कर्ता से हुआ । ' उदीक्षयति ' में प्र ेरणार्थक ' णिच् ' प्रत्यय है । ' तत्प्रयोजको हेतुश्च ' ( पा. १/४/५५ ) इस सूत्र से प्रेरक, हेतु भी होता है, और ' कर्ता ' भी होता है । सो उसका कर्ता प्रकरणानुसार ' वर ' ही है । सो वह ही ' तच्चक्षुः ' मन्त्र बोलकर वघु को सूर्यदर्शन कराता है । सो वर प्रयोजक-कर्ता है, और वधू प्रयोज्यकर्म है । कर्ता स्वतन्त्र होता है, और कर्म परतन्त्र । प्रत. इसमें पूर्ण उत्तरदायित्व तथा मुख्यता वरकी ही है । सो मन्त्र भी वही बोलकर वधुको सूर्यदर्शन करावेगा । तब वादी क्यों ' पौराणिक टीकाकारों ' के पीछे लगता है? वह मूलको ही देखे । यदि वादी टीकाकारों को मानता है; तो वह यह जाने कि- टीकाकार स्त्रीका उपनयन नहीं मानते; कोई स्त्रोका विशेष मन्त्र या जानेसे वे उससे स्त्रीका वेदाध्ययनका अधिकार हो जाना नहीं मानते; तब वादी उनके इन सिद्धान्तोंको जान ले; भले ही वे लोग ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' इस अपवादवश विवाह में कोई विशेष मन्त्र विशेष वचन के वलसे वर यादिके सहारे बुलवा दें; क्योंकि वे जानते हैं इस अपवादसे स्त्रीका ' उदीक्षयति ' का कर्ता वर है [ ६४१ वेदाध्ययनाधिकार नहीं हो जाता । ' यस, नो ' ' रेडी ' आदि शब्दमात्र कह देनेसे कोई अंग्रे जीके भी का अधिकारी नहीं हो जाता, यद्यपि ' यस, नो, रंडी ' आदि अंग्रेजी m.A. स शब्द एम.ए. की पुस्तकोंमें भी आ जाते हैं । अथवा एम. ए. की पुस्तक के पट कोई पोइट्टी किसी से बुलवानेसे वह व्यक्ति एम.ए. का अधिकारी नहीं को जाता । इस प्रकार कतिपय विशेष - मन्त्र बोलने से वह स्त्री वेदकी हो अधिकारिणी नहीं हो जाती । सो इसमें पूर्ण उत्तरदायित्व वरका नि हो होता है । और फिर भाष्यकारोंसे भी तो हमारा ही पक्ष सिद्ध होता है द । ' वधूर्वरप्रषिता सती ' इस हरिहरके कथनसे यही सिद्ध होता है ि व वरकी प्र ेरणासे वह मन्त्र बोलती है । यदि उसको वेदस्वच्छ अधिकार होता; तो वरकी प्रेरणाकी आवश्यकता ही क्या थी? यही ' वरपाठिता पठति ' का अभिप्राय होता है, जिससे वादी खीझता है । सो हमने मूलका अनुसरण करके कोई भूल नहीं की । वादी ही ' अन सूर्यम् उदीक्षयति तच्चक्षुरिति ' का स्वपक्षानुसार अन्वय लगाकर कर दिखलावे; पर वह इस समय अपने दुराग्रहको क्यों छोड़ने लगा? पत तब यह उसकी भूल सिद्ध हो गई । I पृ. ५८- ६० आगे वादी ' अथ इमौ ( वधूवरी ) समञ्जर्यात-' समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ( श्रावयोः ) ' । यह मन्त्र व देकर ' भर्तृयज्ञ ' के मतमें दोनोंका पाठ दिखलाता है । ' क I वादीके अनुसार यह एक ' भर्तृ यज्ञ ' नामक अप्रसिद्ध - प्राचार्यका मत स है कि- पति - पत्नी दोनों मन्त्रपाठ करें । ' इससे धन्य श्राचार्योंका न कथन सर्वदेशी होनेसे मान्य सिद्ध हुआ कि केवल वर हो इस मन्त्रको पढ़ स दे कि- ' हम दोनोंके हृदय दो जलोंकी भान्ति समान हो जावें, इससे वधू द प स ० ध ० ४१