सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 351–360
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 351–360
पृष्ठ 351
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६४१ ६४२ ] गृहीत हो जावेगी; एकसे दूसरीका ग्रहण भी हो जानेसे दोनों के भी मन्त्र स्वतः पढ़नेसे जो ' गौरव ' दोष उपस्थित जाता है, वह भी नहीं होगा । m.A स्पष्ट लिखा ही है- ' मन्त्रा दाम्पत्य वाचकाः । वरस्तु तान् ग्रेजी के गुह्यासंग्रहमे सर्वान् ( २१२४ ) इससे वादीकी पक्षसिद्धि कुछ नहीं, और स्तक को पठेत् पक्ष हानि कुछ नहीं । इसपर कई बार लिखा जा चुका है । नहीं हो हमारी वेदको पृ. ६०-६१ ' पुमांसी मित्रावरुणी - इति ' गर्भकामा इति स्त्रीप्रत्यय-निर्देशाद् स्त्री एव जुहोति । रका हो यह स्मार्तयज्ञ है, श्रीतयज्ञ नहीं । वेदमन्त्र भी नहीं, सौत्रमन्त्र है । देखो अपनी संस्कारविधि । और फिर यह एक विशेष ( श्रपवाद ) -ता है । वचन हो, उस स्त्रीसे यह कराया जा सकता है । पर वर भी है कि-इसे कर सकता है । स्वयं प्रयोगरत्नका प्रमाण वादीके पक्षको काट रहा स्वच्छन्द ? यहाँ है । वहाँ लिखा है— ' होमे कर्तारः स्वयं स्वस्य असम्भवे पत्न्यादयः ' । होमकर्ता स्वयं पति हो; वह कहीं बाहर हो, तो पत्नी करे – ' पत्नी कता है । कुमारः पुत्रो वा शिष्यो वापि यथाक्रमम् । पूर्वपूर्वस्य चाभावे विदध्याद् नय एनां उत्तरोत्तरः ' । स्मृत्यर्थं सार में भी कहा गया है- ' यजमानः प्रधानं स्यात्, श्र पत्नी पुत्रश्च कन्यका । ऋत्विक् शिष्यो गुरुर्भ्राता भागिनेयः सुतापतिः । लगा? अत्र वचनात् पत्न्यादीनां मन्त्रपाठेऽधिकारः ' । इससे स्पष्ट हो गया कि वास्तविक कार्यं यह यजमानका है, उसके -जयत-बाहर होनेसे उपस्थिति असम्भव होनेपर फिर पत्नी आदि भी कार्यनिर्वाह यह मन्त्र कर दें - यह यहां सूचित किया गया है, क्योंकि- ' श्रभवनान्मन्दभवनं श्रेयः ' । ' सर्वनाशे समुत्पन्ने - ह्यर्धं त्यजति पण्डितः । अर्धेन कुरुते कार्यं का मत सर्वनाशः सुदुःसहः ' जहाँ इस प्रकारका भाव हो जाय, वहाँ सिद्धान्तकी बात चार्योंका नहीं रहती । इससे वादी प्रसन्नता मना रहा है । वह यह नहीं जानता कि-को पढ़ उससे उसका साम्प्रदायिक पराजय हो रहा है । इससे उसे एकके कर्मसे वधू दूसरेको फल प्राप्त हो जाना - मानना पड़ेगा । फिर श्राद्ध भी मानना पड़ेगा । फिर श्राप लोग हवन वायुशुद्धि के लिए मानते हैं; उसमें मन्त्र ' यज्ञोपवीतिनी ' का अर्थ दुपट्टा जनेऊ की भांति पहरे हुए [ ६४३ ] पढ़नेकी आवश्यकता भी नहीं रहती । क्या मन्त्र न पढ़नेसे वायुशुद्धि नहीं हो सकती? वस्तुतः श्रार्यसमाजी मत निरुपपत्तिक है । वादीका यह कहना भी गलत है कि - ' यदि विना उपनयन संस्कार के वेदमन्त्रोंके उच्चारणका अधिकार नहीं प्राप्त होता; तो कन्याओंोंका भी यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिये ' । यज्ञोपवीतके बिना भी वेदमन्त्र वोलनेका अपवाद मनुस्मृति में भी मिलता है - ' स्वधानिनयनाद् ऋते ' ( २।१७२ ); तब कार्यनिर्वाहार्थं यहाँ भी अपवाद समझना चाहिये नहीं तो वादीके अनुसार उस यज्ञोपवीतिनीको । होना चाहिये था, या फिर गोभिलके वादीके कन्या - गुरुकुलमें पक्षके अनुसार उसका विवाह कर देना चाहिये था, पर वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि - यहाँ न कन्याका यज्ञोपवीत है, न ही स्त्रीका । शेष रहा - यजन; वह तो उपनयन-तथा यज्ञके अधिकारसे हीन निषादस्वपतिका भी वचन -चलते प्राया है । पर वह तो उसमें द्विजकी सहायता लेता है; लेकिन स्त्री साक्षात् तो शूद्र नहीं; पर विवाह उसका द्विजत्व जैसा होनेसे कार्यनिर्वाहार्थं वह पतिके प्रवासमें पतिको अग्निमें प्राहुति दे सकती 1 सो यह ' प्रतिनिधिवाद ' है । इसमें लड़की आदिके उपनयनके अधिकारकी बात नहीं हो जाती । स्वा.द.ने शूद्रोंको उपनयन नहीं दिया, पर उनको ' यथेमां वाचं ' से वेदकेलिए कहा है । इससे शूद्रोंका उपनयन नहीं हो जाता । बल्कि ऐसा वेदपाठ भी उनका वैध न होकर अवैध वा श्रौपचारिक ही होगा; उपनयनपूर्वक न होनेसे भला वैध कैसे हो? वचन - वलसे होनेवाला कार्य अपवाद होता है, उत्सगं नहीं । सिद्धान्त तो उत्सर्ग ही होता है, अपवाद नहीं । पृ. ६१-६२ आगे वादीने ' गोभिलगृ ' से ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' सूत्र उद्धृत करके कन्याको यज्ञोपवीतका अधिकार दिया है; पर यहाँ ' यज्ञोपवीतिनीम् ' का ' यज्ञोपवीतयुतां ' प्रथं जो सामश्रमीजीने किया है, यह निरुपपत्तिक होनेसे गलत है । यहां तो विवाहिता हो रही लड़कीको
पृष्ठ 352
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६४४ ] दिया जा रहा होता है । वह उस दुपट्टे को ही वरकी प्रोरसे दुपट्टा है । यही उसका ' यज्ञोपवीतिनीत्व ' जनेऊ की तरह पहन लिया करती प्रकारका है । ' श्रीः ' पत्रिकामें होता है । कौशिकसूत्रका भी विनियोग इसी बड़े जोर - शोरसे माना था; वादीने कौशिक के जिस विनियोगभागको ' वा ' मूर्ख ' न बन अब वही कौशिक वादीके विरुद्ध होनेसे कहीं ' वेदविरुद्ध जावे? हैं कि यदि आपमें कुछ शक्ति हो; हम वादीको खुला श्राह्वान देते अर्थको सोपपत्तिक तो यहाँ ' यज्ञोपवीतिनीम् ' के ' यज्ञोपवीतयुता ' इस ' दिखाये । क्योंकि जब वह विवाह्यमाना स्त्री ' ब्रह्मवादिनी सिद्ध कर नहीं; ब्रह्मचर्याश्रमारम्भमें नहीं; उस समय नहीं; यावज्जीवन ब्रह्मचारिणी उपनयन के समय हुआ करता है, उसका मुण्डन भी नहीं कराया गया; जोकि ही कैसे जा सकेगा? तब उसे वेदाधिकार देनेवाला मुख्य यज्ञोपवीत दिया स्वा.द. भी वहाँ उपवस्त्रको ही कन्याद्वारा यज्ञोपवीतकी जबकि वादीके भान्ति लपेटना मानते हैं । बादी बतावे कि इस अवसरमें स्वा.द. गलत? वा सामश्रमी अब ही ठीक मानोगे; तो वादीके महर्षि (? ) गलत? यदि सामश्रमीको शक्ति वादीमें है? गलत हो जावेंगे । क्या उनको गलत बतानेकी स्वामीजीको पौराणिक मानते हो; और सामश्रमी-क्या इस समय भी सामश्रमीके मतको मानो, स्वा.द. के को वैदिक? फिर वेदविषयमें नहीं । सभी शाखाओंोंको वेद मानो । इस विषय में हम पूर्ण मतको पृ. ६६-१०६ में दिखला ही चुके हैं, वादी उसे काटनेमें असमर्थ विवेचन ही रहा है । बल्कि स्वा.द.ने प्रथम स. प्र. में तो स्पष्ट ही लिखा है-' कन्या लोगोंको यज्ञोपवीत कदापि नहीं करना चाहिये, और संस्कार तो सब कराना चाहिये ' ( पृ. ३८ पं. ९ ) द्वितीय स.प्र. में तथा सं. वि. में भी नहीं माना । यह हम पूर्व दिखला चुके हैं । अन्यत्र स्वा. द. की मृत्युके पीछे ' भीमा जाया ब्राह्मस्योपनीता ' का अर्थ [ ६४५ ६४६ छपे हुए वेदभाष्यों वा स्वाद के नामसे प्रकाशित पत्र - व्यवहारादिये उन्हीं के पुस्तकों में आर्यसमाजियोंने बहुत प्रक्षेप कर दिये हैं ॥ ठा. उदयनारायणसिंहने भी इस अवसर पर अपनी कौशिकसूत्र कर टीका में यही हमारा ही अर्थ दिया है । परन्तु गोभिलकी टीका में गलत अर्थ दिया है; अतः वह मान्य नहीं । ग्रतः स्पष्ट है कि- गोभिला उसने बादी ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्द गोभिलकी १।२।१ की हीं परिभाषाके प्रका ' पारिभाषिक ' है, जहाँ वस्त्र - उपवस्त्रादिको भी दाहिनी वगलमें पहरनेवर अनुसार बादी भी ' यज्ञोपवोती ' कहा जाता है 1 । वादीमें इतना सोचनेका मस्तिष सत्यत नहीं है कि यह विवाह क्या ब्रह्मचर्याश्रमका प्रारम्भ है; महत्त्व उसमें वह लड़कीका यज्ञोपवीत कराने बैठा? विवाह्यमान लड़की हार के अनुसार यावज्जीवन कुमारी न होनेसे ब्रह्मवादिनी नहीं है, किंतु उससे सद्योवधू है | श्रुत: उसमें ब्रह्मवादिनियोंवाले उपनयन, तन्मूलक प्रग्नीन्त और वेदाध्ययन तथा भिक्षाचर्या आदि नहीं होंगे? गृह्य-घर है पृ. ६३ प्रागे वादी लिखता है - ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' एव ' उपनीता ' शब्दका प्रयोग है; तब ' कर्मकरान् उपनयते ' में भी वादी ' उपगृह इ नी धातुका प्रयोग देखकर क्या वहां भी नौकरोंका जनेऊ करना मन बह लेगा; जबकि यहां ' भृतिदानेन कर्मकरान् स्वसमीपं प्रापयति ' धर्व है । इच्छा हानि क्या वादी ' अश्मानमुपनीतमृम्वा ' ( ऋ. १११२१: ९ ) ' उपनीत ' एद श्राहुति देखकर वज्रका उपनयन संस्कार अर्थ मान लेगा? I आगे लिखता है - ' यहाँ उपनीता स्त्रीको दुष्टोंकेलिए भयङ्कर तम म.म. कठिनसे कठिन कार्योंके करनेमें समर्थ बताया है ' । यहाँ ' उपनीता ' छ राष्ट देखते ही वादीको स्त्रीके जनेऊ के सपने आने लगे । यह अर्थ प्रमाणा तर्कसे हीन है । जनेऊ पहरे हुई आर्यसमाजिन स्त्रियोंका दुष्टकेल, हॉमी भयङ्कर और कठिन कार्योंमें समर्थ बताना प्रत्यक्ष से विरुद्ध है, बीमार असाभिप्राय भी है । इस विषयमें इस पुष्पके पृ. १०६-११२ पृ.में अनुसर सो यह दे चुके हैं, वादी इसपर कुछ भी नहीं बोल सका, और न बोल सकता है । कि ज-
पृष्ठ 353
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ६४५ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६४६ हारादिमें यह पुस्तक जो बादीने लिखी है, इसमें उसने वही सव कथन उद्धृत दिया है, जो अपनेसे सम्पादित ' सार्वदेशिक ' में लिखा था । उसका कौशिकसूत्र कर ' सिद्धान्तमें ' में मुँह तोड़ ग्रक्षर - अक्षर उत्तर दिया था । उसके बाद टीका उपने हमने वाढीने उक्त पुस्तक प्रकाशित की, सो उसने नाम कमानेको उक्त पुस्तक - मोमिलका प्रकाशित कर दी । हमसे दिये हुए प्रबल युक्ति - प्रमाणोंको देख अशक्तिवश के अनुसार वादी इसपर चुप्पी साध गया । पाठक स्वयं उक्त पृष्ठोंमें हमारी में पहनेपर सत्यता जान सकते हैं । हाँ, कुछ नये प्रमाण उसने दिये हैं, जो विशेष का मस्तिष महत्त्वपूर्णं नहीं । उनकी इस पुष्पमें आलोचना कर दी गई है । न है; वो पृ. ६३-६४ में वादीने ' कामं गृह्यग्नी पत्नी जुहुयात् ' ( गोभि. ड़की हारी: - ११४/१५ ) यह वचन लिखा हैं, और उसपर सामश्रमीका अर्थं देकर है, किन उससे स्त्रीका हवन सिद्ध किया है । सामश्रमीने लिखा है कि यदि नक अग्नीवर गृह्य - अग्निमें पत्नी चाहे; तो आहुति कर सकती है; क्योंकि पत्नी ही घर है; और यह गृह्य अग्नि है । नीता मन्चने इससे सिद्ध हो गया कि = पत्नी वादी ' यह प्राश्वलायन यादिमें ' स्मार्तकर्म क करना म इच्छा रखी गई है, उसमें पतिसे ति ' धर्व है ॥ श्रौत प्रग्निमें हवन नहीं कर सकती । ' माना गया है; और वहां स्त्रीकी अनुमति लेकर आहुति दे; तो कोई उपनीत द हानि नहीं । स्मार्त होम दुर्गा आदिके हुआ करते हैं, उसमें स्त्री भी श्राहुति देती रहती है, पर वैतानाग्निमें वह अधिकृत नहीं हो जाती । और फिर इसपर भी श्रीचन्द्रकान्त, नारायण, भवदेव, मुरारिमिश्र, भयङ्कर म म.म. श्रीमुकुन्दमिश्रादि बहुत से विचारशील प्राचीन अर्वाचीन भाष्यकारोंने उपनीता द स्पष्ट लिखा है-व्यं प्रमाण दुष्टोफर ' कामम् - इत्यनुमत्यर्थो निपातः । स्वस्य असामर्थ्ये गृह्येऽग्नी सायं प्रात-वरुद्ध है,! हॉमी पत्नी ( पत्यनुमता ) जुहुयात् ' पतिकी हवनमें सामर्थ्यं न हो, सख्त पृ. मैं प्रहर बीमार हो प्रादि, तो पति की अनुमति से पत्नी आहुति डाल सकती है । २ ल सकता है । हो यह प्रोत्सगिक सिद्धान्त नहीं हो जाता । इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि जब पति ठीक - ठाक हो, तो वह स्वयं हवन करे, स्त्री केवलसाथ स्मार्त- होम में पत्नी को भी प्रम्यनुज्ञा है । [ III बैठी रहे । यजुर्वेदमाध्यं.सं. में कहा है-' तं पत्नीभिरनुगच्छेम देवाः! पुत्रैर्भ्रातृभिरुत वा हिरण्यैः ' ( १५३ ५० ) यहाँ अग्निपरिचरण में हिरण्य ( सुवर्ण ) का नाम भी लिखा है; सो सोना तो हवन नहीं करता; किन्तु यज्ञमें उसकी सहायतामात्र होती है; इस प्रकार सोनेकी सीताकी भांति स्त्रीकी भी सहायतामात्र होती है, वह साथ बैठी रहती है । श्राश्वला के ' पाणिग्रहणादिगृह्य ं परिचरेत्, स्वयं, पत्नी अपि वा पुत्र: ' इस वचनका भी यही भाव है । यह तो स्मार्तकर्म है, इसमें विशेष प्रतिबन्ध नहीं । ' सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः । अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशः सुदुस्सहः ' इस नीतिको भी देखना पड़ता है । इसमें भी ' स्वयं ' की उपस्थिति अनिवार्य है; अपनी अनुपस्थिति में पतिसे अनुमत पत्नीकी भी उपस्थिति हो सकती है, पर श्रीत - हवनमें तो स्त्रीका महाभारत में भी निषेध है— यह हम अन्यत्र वता चुके हैं । यह नीलकण्ठने भी स्पष्ट लिखा है । इस प्रकार ' न वै कन्या न युवति: ' इस मनुपद्य में भी । इस पुष्पके पृ. ४१६-४२३ में देखिये । इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्मार्त- होममें अनुपनीत भी सम्बद्ध हो सकते हैं; उसमें कुमारियां भी शामिल हो सकती हैं; इससे वे उपनीत सिद्ध नहीं हो जातीं । बादीसे अनुमत हारीतके वचनके अनुसार यावज्जीवन कुमारी ब्रह्मवादिनीका तो श्रग्निसमिन्धन तथा वेदाध्ययन आता है, सद्योवधूका नहीं । पृ. ६५-६६ में वादीने लिखा है - स्वयं त्वेव एतान् व्यावद् वसेद् वलीन् हरेत् ' ( गोभि. ११४/१५ ) ' अपि वा अन्यो ब्राह्मण: ' ( १६ ) दम्पती एव ( १७ ) इति गृहमेधिनम् ' ( १८ ) यहां वादीने स्त्रीका वलिवैश्वदेव बताया है । उसके मान्य श्रीसामश्रमीने लिखा है कि-यजमानको वलिवैश्वदेव यज्ञ स्वयं ही करना चाहिये । पीडा प्रादिके कारण अन्य ब्राह्मणसे भी यह कृत्य कराया जा सकता है । इस प्रकार
पृष्ठ 354
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पीड़ावश पत्नीसे भी कराया जा सकता है - ' सर्वनाशे समुत्पन्ने ' यह न्याय है । और मनुजीने पत्नीकेलिए मन्त्र पढ़ना निषिद्ध किया है-' पत्नी श्रमन्त्रं वलि हरेत् ' ( ३।१२१ ) इससे हमारा ही पक्ष मिद्ध होता है । पृ. ६६-६७ आगे वादी लाजाहुतिकी बात बताता है । इस विषयपर पूरा प्रत्युत्तर हम पृ. ४२७-४२६ पर दे चुके हैं । ' अर्यमणं नु देब ' इति वरको ही पढ़ना पड़ता है । यह भाष्यकारोंने ठीक ही लिखा है- ' अनेन वरपठितेन मन्त्रेण ' इत्यर्थः इयमिति मन्त्रलिङ्गात् । ' अर्धो वा एष आत्मनो यद् जाया नाम ' इति वाजसनेये ब्राह्मणे पठ्यते । श्रतः शरीरार्धेन चेत् क्रियते, तर्हि स्वयमेव क्रियते - ' विवाहे यो विधि: प्रोक्तो मन्त्रा दाम्पत्य-वाचकाः । वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ( गोभिल. पुत्रकृत गृह्यासं. ) ( इन मन्त्रों का पाठ वर ही करता है कि क्योंकि शतपथमें लिखा है- पत्नी पतिका आधा शरीर है । अतः पत्नीका कार्य यदि पति करता है, तो यह एक ही बात है ' यह भाष्यकारोंकी वात सोपपत्तिक है । यद्यपि इन मन्त्रोंके सौत्र होनेसे यदि स्त्री भी इन्हें पढ़े, तो हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । ' समञ्जन्तु ' पर पहले कहा जा चुका है । पृ. ७३-७४ में वादीने ' हारीतकी ब्रह्मवादिनी तथा सद्योवधू ' स्त्रियों-के विषय में लिखा है - इस विषय में ऊहापोहसे विचार पृ. ८०-६६ में देखो । पृ. ७५ ' आर्यविद्यासुधाकर ' में ' नहि शुद्रसमाः स्त्रियः ' कहा है । वादीके इस उल्लेखपर विचार पृ. ६३-६४ में देखो । श्राचार्या, उपाध्याया, अध्वर्युर्ब्राह्मणी, श्रादिपर पहले पृष्ठ में लिखा जा चुका है । इसपर स्त्रीप्रत्ययों में तत्त्वबोधिनीकारका उत्तर सुनिये ।— ' वह्व.ची ' पर श्रीज्ञानेन्द्रसरस्वती - स्वामी लिखते है – ' यद्यपि स्त्रीणामध्ययनं प्रतिषिद्धम्, तथापि पुराकल्पे ह्य ेतद् ' अग्निहोधस्य शुश्रूषा ' का अर्थ [ ६५ ६५० प्रासीत् । तदाह यम: - ' पुराकल्पे तु नारीणां मोञ्जीवन्धनमिष्यों इत्यादि । यद्वा मा नाम श्रध्यगीष्ट, ताद्वश्यात् ताच्छन्दयं भविष् ( यद्यपि स्त्रियोंका वेदोंका अध्ययन निषिद्ध है; तथापि वहां प्रारम्भमें था । श्रथवा स्त्री न भी पढ़े; तथापि उस वंशमै उत्पन्न यह कई होने उसे उस शब्द से कहा जा सकता है । कल्पारम्भकी स्पष्टता हम हारीतरे शिक्ष वचनपर कर चुके हैं । यही उत्तर प्राचार्या, उपाध्याया, कठो किया श्रध्वर्यु ' ब्राह्मणी ' प्रादिपर जान लेना चाहिये । इससे पं. शिवदत्त , वह्नी, आक्षेपका समाधान भी हो गया । । यज्ञ के ' पाणिग्रहणादिगृह्य ं परिचरेत् ' के विषयमें पहले कहा जा चुका है । देलिटी यह स्मार्त - होम है; इसमें स्त्रीके होमका निषेध नहीं । वस्तुतः यह यवार गृह्याग्निके परिचरणका भाव गृह्याग्निका पत्नीद्वारा संरक्षण है । पलो के घरसे वह अग्नि लाई जाती है, और पतिके घरमें उसका प्राधान ' थवा किया जाता है । पति अपना दैनिक होम आदि भी उसी में करता है । तभी उस अग्निका परिचरण - संरक्षण पत्नीके जिम्मे होता है कि वुमने बहीं ' जुहो पावे; अन्यथा उस स्त्रीको उसके प्रायश्चित्तमें उपवासादि प्रायश्विन सकत करना पड़ता है । यही भाव रामायणके कौशल्या केलिए कहे हुए अग्नि ' अग्न्यगारपरा भव ' ( २२५८१८ ) का है कि - अग्निगृहकी देख-रेख है | शब्दो इससे पूर्व वादीने ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा सन्ध्योपासनमेव च इत्या पन्या प्रतिदिनं वलिकर्म वैदिकम् ' यह मनुस्मृतिका एक प्रक्षिप्त पद्य देवत मनुस्मृतिकी क्रमसंख्यामें परिगणित नहीं था- किसी भी टीकाकाले ( यज्ञ जैसे उसकी व्याख्या नहीं की थी; दिया था, हम उसकी आलोचना दे दे | क्यो हैं; जिससे वादियोंकी शङ्का दूर हो जावे । यहाँ भी वही अर्थ है । ( घ ‘ निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति: ' ( ६ । १८ ) इस मनुषढके यह ' अनुसार यह सव कार्य स्त्रीको मन्त्रक करने पड़ते हैं । इस प्रकार स्त्रियोंका बलिहरण भी अमन्त्रक ( मनु. ३।१२१ ) ही होता है । ध्यान
पृष्ठ 355
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६५० ] बन्धन मिटतें ' सन्ध्योपासनमेव च ' के स्थान ' सायम् उद्वासमेव च पाठ भी है भविष्य स्त्रियोंका सन्ध्यास्नान इष्ट है, कदाचित् ' सन्ध्योपासनमेव चं ' पाठ हो, यह वहां उससे भी स्त्रियोंका स्नान ही इष्ट है । जैसाकि -'सन्ध्यायें वरवर्णिनी ' IIIII I तो ( ५ | १४ | ४ ) इस रामायणके पद्यमें टीकाकारोंने स्नान ह हम हारोज किया है । यह हम पहले पृ. १४०-१४३ में स्पष्ट कर चुके हैं । ठी, बहू.पी. शिवदत्तवर शेष रहा – ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' उसका भाव यह है कि - स्त्री ust हवि बनावे । ' प्रग्निहोत्र ' हविका नाम भी हुया करता है । देखिये- ' तृतीया च होश्छन्दसि ' ( पा. २१३ ३ ) यह वैदिक सूत्र । यवाग्वा जा चुका है ॥ यवागू ' वा श्रग्निहोत्र ं जुहोति ' यह उक्त सूत्रका उदाहरण है । वस्तुतः प ' कारकीय ' पृ. ( ८ ) में स्वा. द. जीने भी यही उदाहरण दिया है । है । पी' थवागूम् ' यहाँपर कर्म हैं; यह ' अग्निहोत्र ' का विशेषण है । ऐसी बात सका प्राधार में करता है । तभी सार्थक हो सकती है, जब ' अग्निहोत्र ' का अर्थ ' हवि ' हो; तभी वुमने नहीं ' जुहोति ' की भी सार्थकता हो सकती है । नहीं तो पुनरुक्ति दोष हो दिप्राय सकता है । अब अर्थं हुआ कि - यवागूरूप हविको देवताके उद्देश्यसे अग्नि में डालता है । एकहे गृहकी देख- ' सिद्धान्तकौमुदी ' में इसे स्पष्ट किया है । देखिये- ' प्रग्निहोत्र'-शब्दोऽत्र ' हविषि ' वर्तते; ' यस्य श्रग्निहोत्रम् श्रधिश्रितम् श्रमेध्यमापद्यत व इत्यादि प्रयोगदर्शनात् श्रग्नये हूयते इति व्युत्पत्तेश्च । यवाग्वास्यं हविः क्षिप्त पक्ष जो देवतोद्देशेन त्यक्त्वा प्रक्षिपति ' ( यहाँ ' अग्निहोत्र ' शब्दका श्रर्थं हवि टीकाकारले ( यज्ञका चरु, शाकल्य ) है, इस अर्थ में इसका प्रयोग भी देखा जाता है-लोचना दे देते जैसे जिसका अग्निहोत्र ( अग्निका हव्य ) पका हुधा अशुद्ध हो जावे ' । वही पर्व है । क्योंकि इसकी व्युत्पत्ति भी यही है- ' अग्नये हूयते इति श्रग्निहोत्रम् ' मनुषढ ( प्रग्निमें जिसे डाला जाता है ), तव पतिकेलिए हवि तैयार करना, इस । इस प्रकार यह ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' का अर्थ हुआ । है । अथवा ' अग्निहोत्रकी सेवा करें ' अर्थात् पत्नी अग्निको जलावे, उसका ध्यान रखे, अग्निको बुझने न दे । अब वादी बोले- इस प्रर्थमें हमारी श्री हरदत्ताचार्यका स्पष्ट वचन [ ६५१ पक्षहानि क्या है? इसमें स्त्रीका हवन अभीष्ट नहीं; क्योंकि - मनुजी तो ' न वै कन्या न युवतिः... होता स्याद् अग्निहोत्रस्य ' ( १११३६ ) पद्यसे विवाहिता एवं अविवाहिता स्त्रीमात्रका होतृत्व निषिद्ध करते हैं । यह उनके प्रमाणोंसे पहले सिद्ध किया जा चुका है । अन्य प्रमाण भी देखिये- ' नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्र: ' ( २१८ ) ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञः ' ( ५११५५ ) ' स्त्रीणां... गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २।६७ ) । इत्यादि । तब उक्त पदसे स्त्रीकी अग्निस्थानकी ही सेवा इष्ट हुई, होम नहीं । इसलिए आदवला. गृ में कहा है- ' अग्निहोत्रादि गृह्य ' परिचरेत् ( शुश्रूषेत ) स्वयं, पत्नी अपि वा पुत्रः, कुमारी अन्तेवासी वा ' ( १७११ ) इसकी व्याख्या में वादीके परममान्य श्रीहरदत्ताचार्य लिखते हैं-' गृह्यमग्नि परिचरेत् । परिचरणं शुश्रूषा, समिन्धनादिः । होमश्च पत्नी कुमारी व्यतिरिक्तानाम् ( गृह्य अग्निका परिचरण अर्थात् सेवा, जलाना आदि करे । होम पत्नी तथा कुमारीसे भिन्न करें । ) ' तयोस्तु संमार्जनम्, उपलेपनं, हविरूपकल्पनं समिन्धनमित्यादि । पुत्रस्यापि उपनीतस्य ग्रहणम् ( पत्नी तथा कुमारीका कार्य तो गृह्याग्निके स्थानका झाड़ना - बुहारना, उस स्थानका लीपना, यज्ञकी हवि तैयार करना, अग्नि-को प्रदीप्त करना एवं उसे जलाना यही उनका कार्य है । पुत्र भी उपनीत हो तो होम करे, नहीं तो कोई छोटी - मोटी वस्तुएं उठा दिया करे ) । जब यह श्री हरदत्ताचार्यका स्पष्ट लेख है- ' तव ' जिग्री ' इस मन्त्रके हरदत्ताचार्यके अर्थसे वादी अपना पक्ष कैसे सिद्ध कर सकता है? वैसा न माननेवाले पर वैसा अर्थ लाद देना- यह वादीकी धींगाधींगी है । इससे स्पष्ट है कि पत्नीका काम उस अग्निको परिचर्या ( देखरेख ) है कि प्रग्नि बुझन जावे । इसलिए श्राश्व.गृ.में कहा है कि यदि गृह्य अग्नि बुझ जावे; तव पत्नी उपवासरूप प्रायश्चित्त करे, क्योंकि
पृष्ठ 356
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यह कार्य उसीका है । ' न गृहं गृहामित्याहुः गृहिणी गृहमुच्यते ' ( घर-वालीका नाम ही गृह है, और यह गृह्य - अग्नि उसीके नामसे होने से बुने प्रादिपर प्रायश्चित्त भी उसीको करना पड़ता है । ' यदि तु उपशाम्येतुं, पत्नी उपवसेद् - इत्येके ' ( प्राश्व. १।७१३ ) यदि अग्नि बुझ जाये; तो पत्नी उपवास करे । इससे स्पष्ट है कि— उस गृह्याग्निको बुझने न देना, यही उसकी अग्निहोत्रकी शुश्रूषा वा परिचर्या ( सेवा ) है । वादी श्रीहरदत्तका मत बार - बार देता है; पर उसने हमारे पक्षकी सिद्धि करके वादीका पक्ष खण्डित कर दिया है । अग्नि वुझ न जावे, इसके लिए पत्नीको उसका ध्यान रखना पड़ता है । इसलिए चाश्व.गृ. में कहा है- ' नित्यानुगृहीतः स्यात् ' ( १/७/२ ) इसपर श्रीहरदत्त लिखते हैं- ' प्रथमग्निर्नित्यपरिगृहीतः स्यात्, यजमानेन तत्पत्न्या वा, अन्यतरोऽवश्यमग्नि - समीपे तिष्ठेत् ' ( इस अग्निका सदा ध्यान रखा जावे; पति - पत्नीमें एक तो अग्निके पास सदा रहे ही ) । पतिका इधर - उधर ग्राना - जाना लगा रहता है, तो गृहस्वामिनी पत्नीको उस गृह्य अग्निकी देख - रेख करनी पड़ती है । यही उसकी ' अग्निहोत्रकी शुश्रूषा ' है । इसलिए श्रीरामने अपनेसे पीडित पिताका विचार करके अपनी माता कौशल्याको सुमन्त्र के द्वारा सन्देश भिजवाया था कि- ' अग्न्यगारपरा भव ' ( २२५६।१८ ) यहाँ ' अग्निहोत्रपरा भव ' न कहकर ' अग्न्यगारपरा भव ' यह कहलवाया । इस कहने से ' अग्निशाला-की शुश्रूषा ' अर्थात् अग्निकी देख - रेख में रहना कि अग्नि न बुझे, तथा अग्निगृहकी शुद्धि - लोपना आदि ही अपेक्षित है । जब विवाह हो जानेपर पति अग्निहोत्र स्वीकार करता है, तव यह श्रावश्यक हो जाता है कि उसकी श्रग्नि वुझे नहीं, सदा जलती रहे; तभी उसका शुभ होता है, नहीं तो उसके अशुभ होने की सम्भावना रहती है । तब उस अग्निकी रक्षाकेलिए उस पुरुषको स्वयं सतर्क रहना पड़ता है । यदि वह अन्य कार्योंकी अधिकतामें ऐसा न कर सके; तो होमका कार्य ऋत्विक्के जिम्मे [ ६५३ उसकी मुख्य परिचारिका पत्नीको ही श्रग्निकी रक्षाका I हो जाता है । अग्निके बुझनेपर प्रायश्चित्तस्वरूप उपवास मुख्य अधिकार कर्तव्य हो जाता है । भी उसीका जब अनुप फलतः ' अग्न्यगारपरा भव ' का अर्थ अग्निगृहकी पहरेदारी ही हुई । इसीलिए रामायण के भूषण - टीकाकार श्रीगोविन्दराजने रक्षा अर्थात् अनुस गृहपत ' भी उक्त पद्यकी व्याख्यामें कहा है- ' यागशाला रक्षिका भव ' । वह यही अर्थ केवल श्रीहरदत्त तथा श्रीगोविन्दराजने ही नहीं घी । प्रत्युत धर्मशास्त्रोंका भी इसमें अनुग्रह है । देखिये- ' कात्यायन किया; ' या चाप्यवियोगिन्या शुश्रूष्योऽग्निः विनीतया । सौभाग्यवित्ताऽवैधव्य- स्मृति ' २२-' कामया भर्तृ भक्तया ' ( १८१३ ) यहां पत्नीको अग्निकी सेवाकेलिए कौशल आदेश दिया गया है । इससे उसकी सौभाग्य - धन श्रादिकी वृद्धि बताई गई । यहाँ स्त्रीको होम नहीं बताया गया है । ' प्रवि अपनी अनुपस्थितिमें तो पति श्रन्तिरक्षाका कार्य पत्नीको साँपे ही, और होमका कार्य ऋत्विक्को सौंपे । देखिये इसपर कात्यायन - वचन— श्रतः ' निक्षिष्याग्नि स्वदारेषु परिकल्प्य ऋत्विजं तथा । प्रवसेत् कार्यवान् विप्रो ' हावय वृथैव न चिरं ववचित् ' ( १६।१ ) ( ग्रग्निकी रक्षा स्त्रीके जिम्मे सीप, श्रोर पद्योंक परदेस में कार्यवश जावे, पर व्यर्थ देरी न करे ) यहां ' कार्यवान् प्रवसेत् ' यह पतिकी अनुपस्थितिका उपलक्षण है । शेयः सो. स्त्रीको वहाँ पतिकी अनुपस्थिति में बैठनामात्र पड़ता है, पतिकी ने अनुपस्थिति में होम ऋत्विक् करता है । पति - पत्नी दोनोंकी अनुपस्थितिमें ब्राह्मण तो ऋत्विक्का होम व्यर्थं होता है । इसलिए ज्येष्ठ- पत्नीको तो वहाँ अवश्य रहना पड़ता है; क्योंकि उसका काम घरमें ही रहना होता है । श्रतएव बाहरका काम करना नहीं । इसीलिए स्मृतिकार श्रीकात्या कहा है- स्थानक ' असमक्षं तु दम्पत्योः, होतव्यं न ऋत्विगादिना । द्वयोरप्यसमक्षं तु न देना भवेद् हुतमनर्थकम् ' ( २०।१ ) इसका तात्पर्यं पूर्वं कह चुके है । इसीलिए तभी
पृष्ठ 357
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६५३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६५४ ] अधिकार दशरथ राजकार्य वा पीड़ा आदिके कारण श्रग्निगृहमें उसीका जब महाराज रहते थे, तब वादीके स्वाद के मान्य मनु ( ७७८ ) पद्य अनुपस्थित उन्होंने ऋत्विजोंका वरण कर रखा था; तब ज्येष्ठ पत्नी तथा अर्थात् अनुसार होने के नाते वहाँपर कौशल्याको बैठना पड़ता था । होम वहां दराजने गृहपत्नी पत्नी ) स्वयं स्वतन्त्र करनेमें अधिकृत न होनेसे ऋत्विजोंसे कराती वह ( थी । जैसा कि रामायण में स्पष्ट कहा है-किया; ' अग्निं जुहोति स्म तदा ( कौशल्या ) मन्त्रवत् कृतमङ्गला ' ( वाल्मी. निस्मृति ) यहां ' जुहोति ' अन्तर्भावितण्यर्थं है । जिसका अर्थ है कि-२/२०१५ चाके लिए कौशल्या ऋत्विक्से हवन करा रही थी ( ऋत्विजा हावयति स्म ) । इसकी साक्षी स्वयं वाल्मीकि - मुनिने इसके साथवाले पद्यमें दी है—! बताई ' प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् । ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ' ( २।२०।१६ ) यहां पर ' हावयन्ती ' यह स्पष्ट णिजन्त है । ही श्रतः इसके साथ वाले पूर्वपद्य में भी ' जुहोति स्म ' का अर्थ ' अन्तर्भावितणिजर्थ ' वचन-न् विप्रो ' हावयति स्म ' है । इसलिए रामाभिराम टीकाकारने भी उक्त दोनों पद्योंकी व्याख्यामें लिखा है— पे, और प्रवसेत् ' ' अग्निहोत्र ं मन्त्रवद् जुहोति स्म ज्येष्ठ पत्नीत्वाद् । ऋत्विजा इति शेषः । तद् आह - हावयन्तीमिति ( २।२०१५-१६ ) । केवल रामाभिराम-पतिको ने नहीं, शिरोमणि- टीकामें भी यही बात लिखी गई है - ' हावयन्तीम् स्थिति में ब्राह्मणेरिति शेषः । एतदनुरोधेन पूर्वत्र ' ' जुहोति ' इत्यस्य ' हावयति ' इति -तो वहाँ प्र यही बात भूषण - टीकामें भी कही गई है -- जुहोति हावयति । ता है; श्रतएव ' हावयन्तीम् ' इति वक्ष्यति ब्राह्मणैरिति शेषः ' । यायन फलत: उक्त वादीसे उपक्षिप्त पद्य में ' अग्निहोत्रकी शुश्रूषा ' अग्निहोत्र-स्थानकी मार्जन- लीपना आदि द्वारा शुद्धि, अग्निहोत्रकी अग्निको बुझने नम न देना, उसके पात्रोंकी शुद्धि, अग्निका समिन्धन आदि इष्ट होता है । इसीलिए तभी इसकी स्पष्टता ' व्यासस्मृति ' में भी की गई है कि-स्त्रीका अग्निस्थानका परिचरण [ ६५५ ' पत्युः पूर्वं समुत्थाय देहशुद्ध विधाय च । उत्थाप्य शयनाद्यानि कृत्वा वेदमविशोधनम् । मार्जनलेपनैः प्राप्य साऽग्निशालां शोधयेद् अग्निकार्याणि ( पात्राणि ) स्निग्धानि - उष्णेन वारिणा स्वमङ्गणम् । प्रोक्षण- । रिति तान्येव यथास्थानं प्रकल्पयेत् । पात्राणि ( शूर्प - अग्निहोत्रहवणी, स्र ुच् - सुव्, उलूखल - मुसल; हृपदुपलानि सर्वाणि ) न कदाचिद् वियोजयेत् । शोधयित्वा तु पात्राणि पूरयित्वा च धारयेत् ' ( २।१६-२२ ) यही स्त्री-द्वारा अग्निहोत्रकी शुश्रूषा है, होम नहीं । उसका कारण यह है - ' न पृथग् विद्यते स्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ' ( व्यासस्मृति ३।१८ ) । ' प्रस्वतन्त्रा स्त्री पुरुष प्रधाना श्रनग्निः ' ( अग्निहोत्रानधिकारिणी ) ( ११-२ ) यहाँ वसिष्ठ - वचनमें स्त्रीको अस्वतन्त्र और पुरुष प्रधान कहा है । और उसे श्रग्निहोत्रकी श्रनधिकारिणी बताया है । ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो ' ( मनु. ५।१५५ ) ( स्त्रीको स्वतन्त्रतासे यज्ञका अधिकार नहीं है ) । यदि पत्नीको स्वतन्त्रतासे यज्ञका अधिकार होता; तो फिर उसको पतिकी मृत्यु में भी श्रग्निहोत्र करना पड़ता । पर पतिके मरनेपर पतिकी अग्नि तथा पतिके यज्ञपात्रादि घरसे ले जाये जाते हैं । उन पात्रोंको पतिके उन - उन अङ्गोंपर रखकर उसे उस यज्ञाग्निसे जलाया जाता है । फिर वह अग्नि समाप्त हो जाती है - श्राश्व.गृ.में कहा गया है- ' अथैतां दिशम् अग्नीन् नयन्ति यज्ञपात्राणि च ' ( ४।२।१ ) ' अर्थतानि पात्राणि योजयेत् ' ( ४ । ३ । १ ) । ' दक्षिणे हस्ते जुहूं... स्पयं, अग्निहोत्रहवणीं, ग्राव्णः स्रुवौ पात्रीं, चमसं, शम्यां, अरणीम, उलूखल - मुसले शूर्प -इत्यादि ( ४।३।२-१५ ) इसी तरह ' अग्निवेश्यगृ. ' ( ३।४।२ ) में भी कहा है । ' लाट्यायन-. श्रौतसूत्र ' ( दादा १८-३२ ) में भी ऐसा ही वर्णन है । इसी प्रकार ' कात्यायनस्मृ. ' ( २१ खण्ड ) में भी ऐसा ही है । उस श्रग्निहोत्रकी उस अग्निसे मृतक पतिके जला देनेपर पत्नी पृथक् प्रग्न्याधान नहीं कर सकती । इसलिए वह पुनर्विवाह भी नहीं कर सकती । तव पत्नीका
पृष्ठ 358
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्वतन्त्र अग्निहोत्रका अधिकार न रहा । परन्तु पति पत्नीके मर जानेपर उस अग्निसे पत्नीको जलाकर फिर यदि अन्य अग्निका आधान करना चाहे, तो या तो अन्य स्त्रीसे विवाह करता है, या फिर वानप्रस्थाश्रम में चला जाता है । क्योंकि - पुरुषको अनाश्रमी नहीं रहना पड़ता । मनुस्मृति में कहा है - ' भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाऽग्नीन् ग्रन्त्यकर्मणि । पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ' ( मनु. ५।१६८ ) ' अनाश्रमी न तिष्ठेत दिनमेकमपि द्विज: ' ( दक्षस्मृति ५ १६६ ) अन्य स्त्री इसलिए लेनी पड़ती है कि यह होती है गृह्याग्नि । गृह्याग्नि-का सम्बन्ध ' गृह ' से होता है । वास्तविक गृह स्त्री होती है - ' गृहिणी गृहमुच्यते ' । पर स्त्रीका स्वतन्त्र अधिकार न होनेसे वह अन्य पति नहीं ले सकती । गृह्याग्किा पतिसे सीधा सम्बन्ध नहीं । पर वह पत्नी लेकर गृह्णाग्निका आधान कर सकता है । इससे द्विज - पुरुषका ही यज्ञविषयवाले वेदमें अधिकार सिद्ध है, स्त्री-शूद्रका नहीं । ' बोधायनीय - पितृमेधसूत्र ' में कहा है- ' मृतपत्नीकः क्रतून् आहरिष्यन् जायामुपयम्य अग्नीन् प्रादध्यात् । विज्ञायते च - ' तस्माद् एको द्व े जाये विन्दते । तस्माद् एको बह्वीजया प्रादत्ते इति च ' ( जिसकी पत्नी मर चुकी हो, और उसने यज्ञोंको करना हो; अन्य कुमारीसे विवाह करके उसके घरसे लाई हुई अग्निका वर अपने घर में आधान करे । ब्राह्मणभागमें कहा गया है- ' इस कारण एक पुरुष दो वा बहुत स्त्रियोंका ग्रह्ण करता है ) । इससे पुरुषके लिए स्त्रीके देहान्त हो जानेपर पुनः अग्न्याधान तथा पुनर्विवाह कहा है । परन्तु स्त्रीकेलिए कहा है-- ' मृतपतिकायाः श्रोपासने पितृमेव: ' ( २०४३ ) ' नहि अस्याः प्रपतित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते । विज्ञायते च तस्मान्नैका द्वो पती विन्दते ' ( २०४४ ) ( जिस स्त्रीका पति मृत्युको प्राप्त हो गया हो; तब उसका पितृमेध ( अन्त्येष्टि ) करना पड़ता है | उस स्त्रीके पति न होनेसे उसका पुनः अग्निका प्राधान नहीं ' अग्निहोत्र ' का अर्थ ' अग्निगृह ' होता है[ ६५७ ६५८ हुआ करता । ब्राह्मणभाग में कहा हैं कि एक स्त्रीके दो पति दरख सकते 1 ) नहीं है इससे स्त्रीके विधवा हो जानेपर जहां उस स्त्रीका पुनविवाह में स्त्र हो रहा है, और पतिकी पत्नीका देहान्त हो जानेपर उसकी निषिद्ध का अग्न्याधानकी इच्छा होनेपर जहां पुनर्विवाह सिद्ध हो रहा पुनः का पत्नीका स्वतन्त्रतासे अग्न्याधान निषिद्ध सिद्ध हो रहा है । परन्तु है, वहीं इष्ट अग्न्याधान पत्नीके निधनपर पहली ग्रग्नि समाप्त करके द्वितीय पुरुपका अना करके बताया जा रहा है । अथवा स्त्रीके वियोग में अन्य स्त्रीसे विवाह स्त्रो श्राव इच्छा न होनेपर श्रीरामकी भांति सुवर्णमयी- सीताकी रखने की भांति की उसके प्रतिनिधित्वसे भी हो सकता है । परन्तु उस स्त्रीका पतिसे वियोग नहीं वा प्रात्यन्तिक वियोग होनेपर श्रग्न्याधान किसी भी प्रकार नहीं हो सेवा, सकता । इसमें उदाहरण भी सीताका ही समझ लीजिये I । - जाता वाल्मीकिके श्राश्रममें श्रीसीताका पतिके वियोग में कहीं भी अग्न्याधान नहीं बताया गया । इससे स्पष्ट है कि - कौसल्याको श्रीरामद्वारा कहे गये ( शर्म ' अग्न्यगारपरा भव ' इस वाक्य में, अथवा ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा श्रादिमें अस्मा पतिके जीवन में भी उसकी अनुपस्थिति में पतिकी अग्निकी रक्षा ही इष्ट बजार हुधा करती है, होम नहीं । ' अग्निहोत्र ' का अर्थ भी ' अग्न्यगार ' है । इस जैसे कि महाभारतमें— इसमें ' अग्निहोत्र ' पितुर्भीतः सहसा प्रविवेश ह । स वै प्रविशमानस्तु शूद्रणान्धेन रक्षिणा । निगृहीतो वलाद् द्वारि सोऽवातिष्ठत पार्थिव! ' जड़ ( वनपर्व १३६।१७-१८ ) । यहाँ निर्दिष्ट व्यक्तिका ' श्रग्निहोत्र में प्रवेश ' यह बताया गया है । ' अग्निहोत्र ' का ' अग्न्यगार, अग्निगृह ' अर्थ होनेपर उस ‘ अग्निहोत्रमें प्रवेश ' उस पुरुषका उपपन्न होता है । तव उस ' अग्निहोत्र- प्रतिज्ञ अग्न्यगार ' द्वारपर ठहरे हुए शुद्र पहरेदारने उसे अग्निगृह प्रवेश - द्वारपर कहा ही पकड़ लिया । शूद्रकी ड्यूटी अग्न्यगारके अन्दर न होकर बाहर घर में स ० ध ० ४२
पृष्ठ 359
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६५८ ] ६५७ हुआ करती है । नहीं हो दरवाजेपर ' अग्निहोत्र ' का अर्थ अग्न्यगार होनेसे ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' फलतः अग्निस्थानकी मार्जन - लेपन आदि सेवा ही प्रभीष्ट होने से वादी-निषिद्ध में स्त्रीका कट गया । इसलिए वादीने ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' में ' शुश्रूषा ' पुनः का अर्थ छोड़ दिया । उक्त श्रथ है भी ठीक ही, यदि यहाँ होम अर्थ वहाँ का अर्थ ' अग्निहोत्र ' शब्द भी पर्याप्त था । यहाँ ' शुश्रूषा शब्द इष्ट होता, नुरुपका था । पर ' अग्निहोत्र ' का ' अग्न्यगार ' प्रथं होने से यह अनावश्यक स्त्री आवश्यक है । वाह की इस प्रग्न्यगारकी रक्षा करने अर्थसे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि भांति नहीं । इस प्रकार अग्निके परिचरण ' में भी यही अर्थ इष्ट हैं कि - प्रग्निकी वियोग सेवा, अग्नि बुझे नहीं, आदि, इससे स्त्रीको वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो नहीं हो जाता । पृ. ७७ ‘ काठकगृ. ' के कुछ वचन लिखते हुए वादी कहता है — ' तान् न्याधान ( शमी - लाजान् ) अविच्छिन्दती ' जुहोति ( वधूः ) ' प्रयंमणं नु देवं... सो कहे गये श्रस्मान् देवो अर्यमा प्रतो मुञ्चतु नाऽमुष्य गृहेभ्यः स्वाहा ' ' त्र्यम्बकं आदिमें यजामहे सुगन्धिं पतिपोषणम्... मृत्योर्मुक्षीय मामुष्य गृहेभ्यः स्वाहा ' । ही इष्ट इन मन्त्रों में भगवान् से प्रार्थना है कि- ' पतिसे कभी वियोग न हो ' । रहे । इस लाजाहोमका उत्तर पूर्व- जैसा है । यह सौत्रमन्त्र है. वेदमन्त्र नहीं । इसमें उस विवाह्यमान षतिका नाम लेना पड़ता है कि- मैं पितृगृहसे तो मानस्तु छू, पर इस पतिगृहसे न छूटू । इससे वादिसम्मत विधवा - विवाह की चैव! ' जड़ ही कट गई । जब उसके पतिका तथा उसके घरका नाम है, इससे प्रवेश ' यह सूचित होता है कि वह स्त्री कथञ्चित् विधवा भी हो जाय तो होनेपर उस पतिका घर उसे छोड़कर अन्य पतिके घर न जाना पड़ेगा । नहीं तो नहोत्र. प्रतिज्ञा - भङ्गवश यह पाप होगा । क्योंकि इन मन्त्रोंमें पितृगृह तो छोड़ना द्वारपर कहा है, पर निर्दिष्ट- नामवाले पतिके घरका छोड़ना; और फिर पिता के बाहर घरमें वापिस जाना नहीं कहा है । और फिर यहाँ अग्निमूर्ति - द्वारा क्वाचित्क - अपवादसे उत्सर्ग हट नहीं जाता [ ६५ वादीके अनुसार ऐसी प्रार्थना भगवान्से करनी मूर्तिपूजा भी ' वैदिक ' सिद्ध हो गई । पड़ती है - इससे पृ. ७८-७९ आगे कई ' ऊजं विभ्रती, गृहाणामायुः, इरा बहतो, येषां मध्ये अधिप्रवसन्ना, सुनृतावन्तः स्वधावन्तः, उपहूता इह भूरिधानाः ' आदि मन्त्र वादीने स्त्रियों गाव: ' उपहूता स्त्रियोंकी वेदाध्ययनादिकी द्वारा बुलवाये हैं, इनसे वादीने सिद्धि मानी है, इसपर वादी स्पष्ट बतावे कि क्या यह मन्त्र उसके वेदोंमें प्राते हैं? यदि हाँ तो उन्हें अपने वेदोंसे दिखलावे | यदि यह मन्त्र उसके अनुसार शाखाओं के हैं, तब वादी शाखाके मन्त्रोंको वेद मानता है? यदि हाँ; तो उसका यह सैद्धान्तिक पराजय हो गया; क्योंकि उसके सम्प्रदाय में वेदशाखाएं वेद नहीं होतीं । यदि वादी वेदशाखाओंको वेद नहीं मानता; तब वह शाखाओं के मन्त्रों स्त्रियोंका वेदाधिकार कैसे सिद्ध कर सकता है? हमारे सिद्धान्तानुसार तो ' स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' इस स्मार्त - वचनकी व्यवस्था के अनुसार यह विवाह सम्बन्धी मन्त्र स्त्रियोंकेलिए श्रपवाद हैं । तव अपवादवचनोंसे स्त्रियोंका प्रोत्सर्गिक वेदाध्ययन सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि - ' न च उत्सगंस्य अपवादाद् निवृत्तिः ' ( योग. साधन. १३ ) ( उत्सर्ग अपवादसे नहीं हट जाता ) । ' याज्ञ े कर्मणि प्रयोगनियम: ' इस महाभाप्यके कथनानुसार याज्ञिक-कर्ममें प्रयोगका नियम तो होता है, प्रर्थज्ञानका नियम नहीं । हमने यह भी लिखा था कि- पुरोहितादि वे विशेष मन्त्र उस विवाह्यमान - स्त्रीसे बुलवाते हैं, स्त्रियोंका विवाह उनकी द्विजकल्पता करता है- यह कई बार हम सप्रमाण कह चुके हैं । और फिर जैसा कोई बड़ा व्यक्ति बोलता जावे; छोटा बच्चा भी उसके अनुसार बोलता जावे; इसमें कोई भी आक्षेप नहीं हो सकता । स्वा. द. का भी वचन हम पहले दे चुके हैं कि-वे भी यज्ञमें शूद्रकेलिए भी कई मन्त्र पुरोहितादि द्वारा बुलवाते हैं, कमसे
पृष्ठ 360
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कम उस मन्त्रकी क्रियाओंको तो कराते ही हैं । देखे वादी अपनी ' संस्कारविधि ' की भूमिका । तब इसमें हमारी वादीसे प्राक्षिप्त ' टाल-मटोल ' तो कुछ भी सिद्ध न हुई । पृ. ८१ ' लौगाक्षिगृ. ' के ' आशासाना सौमनसं ' के प्रयोगमें कुछ भी नवीनता नहीं है - स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' यह बताया जा चुका ' अग्नेरनुव्रता ' का ' आहवनीयादिपरिचरणशीला अग्निकी रक्षा करनेकी सेवा वा व्रत स्त्रीके जिम्मे होता है - यह कई बार बताया जा चुका है । सो ' अग्निका परिचरण ' यही होता है कि- ' अग्नि वुझने न पावे ' । उसके हवनार्थं पतिको स्त्री चरु आदि जुटा दे, नापकी लकड़ियाँ बना दें-यही ' अग्निका परिचरण ' होता है । पृ. ८२ ‘ गन्धवं पतिवेदनम्... गन्धर्वः प्र ेतो मुञ्चतु माऽमुष्य गृहेभ्यः स्वाहा ' ‘ त्र्यम्बकं... माऽमुष्य गृहेभ्यः स्वाहा ' इस लौगाक्षिगृ.के मन्त्रका उत्तर काठकगृ के अनुसार है । गत पृ. ६५८ देखो । पृ. ८४ ‘ अपश्यं त्वां प्रजया पुत्रकामा ' आदि मन्त्रोंमें ' विवाहस्तु समन्त्रक: ' के अनुसार कुछ नवीनता नहीं है । विवाहसे वह द्विजकल्प हो जाती है; अत: विवाह तथा उससे सम्वन्ध रखनेवाले गर्भ श्रादिके संस्कारमन्त्रोंमें स्त्री भी भाग ले सकती है । पृ. ८५ ‘ शांखायनगृ. ‘ सायं प्रातवँबाह्यमग्निं परिचरेयाताम् ' ( १ । १७ । २१ ९ ) विवाहवाली अग्निका पति - पत्नी दोनों द्वारा परिचरण कहा है । स्त्रीका परिचरण अग्निसंरक्षण पहले हम वता चुके हैं; पुरुष: उसमें स्त्रीको साथ बैठाकर स्वयं होम करेगा । यज्ञिय, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी होते हैं- यज्ञिय पाश भी होते हैं - ' यज्ञिया पाशाः ' ( पार. ११२८ ) यज्ञिय शब्द दोनोंके लिए समान होनेपर भी दोनोंकी यज्ञियता समान नहीं होती । इसी प्रकार वहां भी समझना चाहिये । पृ. ८६ ' पुमांसौ मित्रावरुणी... पुमान् मयि संवर्ततां स्वाहा ' यह तो सौत्रमन्त्रोंके पढ़नेसे स्त्रीका वेदाध्ययन सिद्ध नहीं ६६ | ६६२ मन्त्र वादीके वेदका ही नहीं, तब उसका पक्ष कट गया अनुसार शाखामन्त्रोंको भी वह वेदमन्त्र मानता है; तो उसका । अथवा स्पर्थका पराजय हो गया । यहां ' पुमान् ' ( mail ) की प्रार्थना संक्षन्ति ( पति ) • लड़की भी समता अवैदिक सिद्ध होनेसे वादीका तदर्थं है; तब लड़श. यदि इस हो गया । ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' के अनुसार हमारे पक्षमें प्रयास समि नहीं है भी ठेस नहीं पहुंचती । तो थोड़ो धनुपर्या ' मानवगृ. ' के ' अर्यमणं नू देवं... प्र ेतो मुञ्चतु माऽमुतः पृ. मन्त्र हैं । इनसे वादीकी पक्षसिद्धि कुछ भी नहीं । पहले यह सोत्र में इन प्रत्युत्तर दिया जा चुका हैं । स्पष्ट कुछ भी पृ. ८७ विष्णुर्योनि कल्पयतु... घाता गर्भ दधातु ते '... ' ते मन्त्र ' स्त्रीणां त हवामहे ' आदि १२ मन्त्र तो शब्द के कारण पुरुषके पढ़नेके हैं, मान्य नहीं; तब इससे हमारे पक्षकी क्या हानि है यह वादी ही बतावे? शूद्रालु पृ. ८७-८८ वाराहगृ. के ' श्रर्यमणं नु देव '... इतो मुञ्चतु ' प्रालि ( प्रथत मन्त्र भी सौत्र हैं, इनका प्रत्युत्तर पूर्व - जैसा है । पढ़ा ज पृ. ८८ जैमिनिट. ' ध्रुवोसि ध्रु वाऽहं पतिकुले भूयासम् । प्रमुषः । विवाह इति पतिनाम गृह्णीयात् ' यह भी सौत्रमन्त्र हैं, और विधवा - विवाह सु क्योंकि-मन्त्र कतरनेवाले हैं । इससे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । स्त्रियों क पृ.वादी लिखता है - ' प्रक्षकान् ग्रनुमन्त्रयते- ' सुमङ्गलीलिं लिङ्गसे ' वधूः इमां समेत पश्यत ' अर्थात् वर यज्ञमण्डप में उपस्थित दर्शकों उसका निषेधव aat देखनेकेलिए निमन्त्रित करता है ' यह लिखकर फिर बादी का है -- वेदों, ब्राह्मणों, श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्रोंमें कहीं स्त्रीके पर्देका विधान अ नहीं है । ' एवं यज्ञ हरिवन पर्देका विधान वैदिक, सौत्र, एवं शास्त्रीय है । इस विषय में ' आनो ( १० ) पृ. ८ ९ ३ - ९ ३७ में वादी देखे, उसका समाधान सम्यकृतण हो चुका ह जावेगा । ‘ ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् ' यह सौत्रमन्त्र है । अतः यह बाईला क लेखको