सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 361–370
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 361–370
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[ ६६ | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६२ ] अथवा से प्रयास है । ' सौभाग्यदाऽहं श्रीमते ' मैं पतिकुलमें दृढा होकर श्राप संक्षनिर स्पर्धका के सौभाग्यका कारण वनूं । ' ' यह पति कैसे कह सकता है? " तब लड़श ( पति ) सत्र मन्त्रको स्त्री भी कहे; तथापि वादी के अनुसार वेदका स समि. यदि इस और पति भी स्त्रीकी ओरसे कह सकता है । इनमें कुछ भी लो. घोड़ो नी - नहीं है । हो जाती । धनुपपत्ति नहीं ६० ' अरुन्धत्यसि रुद्धाऽहं पत्या भूयासम् ( जैमिनिगृ. ११२२ ) पू. यह सौ मैं इन पतिदेव के साथ सदा बन्धी रहूं । ' इस सौत्रमन्त्रसे हमारे पक्षकी लेखष्टमे भी हानि नहीं; न वादीके पक्षकी कुछ सिद्धि है, क्योंकि — यह वेद-कुछ मन्त्र तो नहीं । हो भी सही, फिर भी हमारी कुछ भी हानि नहीं; -.. ' ते ' स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' इसे पहले स्पष्ट कर चुके हैं । वादीके के हैं, स्वीरें मान्य हारीत भी इनमें उपपत्ति देते हैं— ' नहि शूद्र - समाः स्त्रियः । नहि बतावे? शूद्रासु ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्या जायन्ते । तस्मात् स्त्रियो मन्त्रतः संस्कार्याः ’ चतु ' प्रालि ( प्रर्थात् स्त्रियां शूद्रके समान नहीं होतीं, कि उनके विवाहमें मन्त्र न पढ़ा जावे, वेदश्रवणका शूद्रको तो अधिकार नहीं है, पर स्त्रीको म् । प्रमु विवाह होनेपर द्विजकल्प हो जानेसे उसे वेदमन्त्र सुननेका निषेध नहीं । - विवाह छ क्योंकि शूद्राओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पैदा नहीं होते । इस कारण हीं । स्त्रियोंको मन्यसे विवाह में संस्कार करना चाहिये । यहाँ ' जायन्ते ' इस लिङ्गसे उत्पत्तिप्रकरण होने से ' संस्कार्याः ' का अर्थ ' विवाह्या ' है कि-सुमङ्गलीसिं त दर्शकों उसका मन्त्रोंसे विवाह कराओ । और फिर यह वचन विधवा विवाह बादी निषेधक होनेसे वादी के पक्षको ठेस पहुंचानेवाला है । बँका विधान और फिर पत्नी भी स्त्री ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' ( ४ | १ | ३३ ) विवाह एवं यज्ञ में होती है; अतः विवाहके वा यज्ञके कुछ मन्त्र या जावें; तव में प्रातो ऋत्विक् बा पतिके सहारे वह बोल सकती है । यह कई बार कहा जा य चुका है; पर वादीको पुनरुक्तिदोष करनेका बार - बारका व्यसन है । यह बा कई अधकचरे दयानन्दी यह समझते हैं कि हमारे इस दयानन्दी लेखकाने बहुत सेमन्त्र स्त्रीपठनीय संगृहीत कर डाले हैं; श्रतः श्रार्यसमाजी-मनुका विविवचन वेद - वचन [ ६६३ पक्ष इसमें ठीक है । इसपर यह जानना चाहिये कि एक कुलकी एक ही वेदशाखा होती है, और उसका एक ही गृह्यसूत्र होता है । सो एक कुल उसी अपने एक ही गृह्यसूत्रका प्रयोग करता है । उसमें प्रायः कर्म-काण्डके सोत्रमन्त्र ही अधिक हैं, वा अन्य शाखाओं के होते हैं । इसके मुताविक वादीके इष्ट मन्त्र बहुत थोड़े वचते हैं । वे ' स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' के अनुसार अपवाद - रूप हो जाते हैं; अपवादसे उत्सर्गका बाघ नहीं हो जाता । इस विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । इस विषय में पृ. २४८ देखो । चतुर्थ श्रध्याय ( स्मृतिवचनविमर्श ) पृ. ९ १ - ९ ५ आगे वादी स्मृतियोंके वचन देता है, और कहता है-' श्रुतिस्मृतिविरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी । श्रविरोधे सदा कार्य स्मार्त वैदिकवत् सदा ' ( जावाल ) ( मनु. २।१३ ) की कुल्लूकभट्टकी व्याख्याते वादीने यह वचन उद्धृत किया है । ( श्रुति एवं स्मृतिके विरोध में श्रुतिका ही वचन ठीक होता है । विरोध न होनेपर स्मार्तं कर्म ही सदा वैदिककी भान्ति समझना चाहिये ) । पर वादी याद रखे कि - मनुस्मृतिकेलिए लिखा गया है- ' य: कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ( २/७ ) ( मनु सर्वज्ञान रखनेवाले हैं; अतः उनने जो जिसके-लिए धर्म कहा है; वह सब, वेदोंमें कहा है ) यह मनुस्मृतिके प्रवक्ता भृगुने कहा है; और यह ठीक है । तब वादी मनुके सुप्रसिद्ध और प्राचीन विद्वानोंसे अनुमोदित वचनोंको वेदविरुद्ध कहने का साहस कैसे कर सकता है? कई थोड़े से मन्त्र दयानन्दी - वादीने अपनी ' नोटबुक ' में संग्रहीत कर रखे हैं, और अर्थ भी उनका भगवती श्रुतिसे बलात्कार करके अपने सम्प्रदायानुकूल कर रखा है; पर यह पक्ष उसका गलत है । वहां वह अर्थ उनका होता नहीं । तब इन लोगोंका स्मृतिवचनोंको ' वेदविरुद्ध ' कह
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६६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देना यह इनका ' तकिया कलाम ' है; अतः वह ग्राह्य नहीं । हम उनका समाधान कई बार कर चुके हैं । ' विरोधे त्वनपेक्षं स्याद् सि ह्यनुमानम् ' ( मीमांसा ११३१३ ) इस सूत्र के अनुसार श्रुतिसे साक्षात् विरोध न होनेसे उनको वैदिक ही समझना चाहिये । जो मनुस्मृति डंकेकी चोटसे ' या वेदवाह्या: स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वाः ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ' ' उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यानि अतोऽन्यानि कानिचित् । तानि अर्वाक्कालिकता निष्फलान्यनृतानि च ' ( १२।६५-६६ ) इन वचनोंसे स्वयं वेदविरुद्ध वचनोंकी निन्दा करती है; वह मनुस्मृति भला स्वयं वेदविरुद्ध कैसे कह सकती है? तब वादीका यह कहना गलत है कि- वर्तमान - मनुस्मृति में भी वेदविरुद्ध वचन हो सकते हैं? जो कि वादी अपने अनभिमत वचनोंको उसमें प्रक्षिप्त वचन कहता है; यह भी कथन निराधार है । उसमें कोई प्रमाण नहीं । हम इस विषय में पूरा समाधान कर चुके हैं । जो उसमें वचन श्रार्यसमाजका सिद्धान्त काटने वाले हैं, वे वेदविरुद्ध नहीं हो सकते । उन अंशों में श्रार्य-समाजका मत ही वेदविरुद्ध है । जोकि वह उसमें जन्मना वर्णव्यवस्था तथा स्त्रियोंकी. स्थिति-आदिको वेदविरुद्ध कहता है, यह उसका कहना सर्वथा गलत है । वेदमें भी वर्णव्यवस्था जन्मना ही है, इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) ( ६ ) ( ८ ) पुष्पोंमें देखा जा सकता है । स्त्रियोंकी स्थिति जैसी वेदमें लिखी है - यह हम पहले कई बार स्पष्ट कर चुके हैं । शेप है मनुस्मृति में मांसभक्षण आदि; यह भी देश, काल, पात्र यादिभेदसे हुआ ही करता है । यह स्वाभाविक है । स्वाभाविक वात भला कैसे विरुद्ध हो सकती है? जैसे आप लोग शिखाको धार्मिक सस्कार होते हुए भी गर्म देश - कालादिमें उसे कटवा दिया करते हैं; वैसे ही इसके व्यतिरेकमें शीत- बहुल देश में वहाँ के निवासी मासके बिना मांसादिका प्रयोग विशेष देश - काल - पाथकेलिए [ ६११ नहीं रह सकते । इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण जनता सर्वथा सात्विक fff नहीं सकती । सात्त्विक जनताको राजसिक और तामसिक हो दिया करती है, मार दिया करती है; तब क्या उन जनता दर घ तिरस्कृत करके उनको अपनेसे अलग करके हिन्दुधर्मको लोगोंको हर पृ. दें । सो मांसादि भी उन्हीं राजसिक तामसियोंके लिए नष्ट कर - कर प्रक्षिपत ' कांटेसे काँटा निकाला जाया करता है । पाकिस्तानके हुआ विप्लव करता है । खाता पाकिस्तानियोंका मुकावला. भी मांसभक्षी पाकिस्तानियोंने बेदा अपने धर्मको बचा लिया था । हो कहे स्त्रीभ निषिद्ध वेदमें भी मांसकी प्रवृत्ति जनतामें स्वाभाविक बताई गई है । वेदान देखिये — ‘ यथा मांस यथा सुरा यथाऽक्षाः परिदेवने । यथा पुसो उषः । अपने प स्त्रियाँ निहन्यते ( गच्छति ) मनः । एवा ते अघ्न्ये! मनोऽपि उनके म निहन्यताम् ' ( श्र. ६।७०।१ ) ( जैसे माँस, जैसे मद्य, जैसा जुए में पुष्प प्रक्षिप्त मन खिंच जाता है; जैसे कामी पुरुषका मन स्त्रीमें खिंच जाता है; इस पृ. प्रकार ऐ गाय! तेरा मन भी अपने बछड़ेपर खिंच जाता है । है - ' य मन्त्रका अनुवाद मनुस्मृति ( ५।५६ ) में प्रवृत्तिरेषा भूतानाम् ' है । इस कुल्लूक ' मांस ' का निर्वचन ' मनोऽस्मिन् सीदति ( गच्छति ) ( ४१३३२ ) यह दिशा | पिता ब है । इसीके उदाहरणस्वरूप इतिहास में पुरुषों में मांसकी प्रवृत्ति दोनों इत्यादि है । क्योंकि इससे वेदने औचित्यवश विशेष देश - काल - पात्रवश- मांस - मद्य शादि लिखकर तथा कामिनीमें कामकी स्वाभाविक प्रवृत्ति दिखलाई है; पर बू रखनेसे: सात्त्विक के लिए उत्तमता से ग्राह्य नहीं । अतः रजोगुणियों पुत्रोंकेल तमोगुणियों को अपनी वा अपने जातिवालोंको तथा अपने देशकी वह लिख देश में रखना पड़ता ही है । बलवान् होनेसे रक्षा भी वे ही कर डे ' मा हैं । इससे सात्त्विकों के लिए अन्न भी कुछ बच जाता है । इन बातो ' एतावान विचार करके आपत्तिकालकी नीतिका अवलम्बन करके ऐसे ब नास्मृत परिहृत समझने चाहियें । वादी लोग तो केवल रोड़ा अटकाने सन्तान एप
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६६ ] स्विक हो ला पटकते हैं । जनता ऐसी अप्रासङ्गिक बातें लोगोंको देव स्वा. श्रानन्दतीर्थंका जो कि वादीने ' क्वचिद् ग्रन्थान् टकरा हन पू. ६५-६६ ' आदि पद्य दिया है, इसके ' क्वचित् ' पदसे वादीका पक्ष कट करता है । प्रक्षिपन्ति है । श्रीमानन्दतीर्थस्वामी ही स्वयं ' अशुद्धमितिचेन्न शब्दात् ' प्लव जाता वेदा. ३ ११२५ ). मांसकी व्यवस्था लिख गये हैं; और उन्होंने हो हे त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ' में स्त्रियोंका वेदाधिकार स्पष्ट शब्दों में विषद्ध सिद्ध कर दिया है, पर अब वे ही स्वामी वादीके मतभें ई गई है । ' वैदानभिज्ञ ' बन जावेंगे । वस्तुतः यह प्रतिपक्षियोंका महामोह है; केवल सो उपन्य अपने पक्षके बचावकेलिए उनके यह ' गलत हथकण्डेमात्र ' हैं । वादी यदि मनोऽपि उनके मतको प्रक्षिप्त मानता है, तो दूसरा व्यक्ति भी वादीके बचनोंको एमें पुत्र प्रक्षिप्त मान सकता है । जाता है; इस पृ. ६७ आगे वादी अपने गलतपक्षको सिद्धयर्थं मनुके कुछ प्रमाण देता ता है । इस है — ' यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ' ( ६ १३० ) इतने अंशकी - है । इस कुल्लूकभट्टकी व्याख्या भी लिखकर वादी लिखता है - पुत्र अपने २ ) यह दिन | पिताके ] श्रात्मा के समान होता है; जैसे कि - ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' वृत्ति दोन इत्यादि वाक्यों में कहा गया है । कन्या भी पुत्रके समान होती है; क्योंकि उसकी उत्पत्ति भी उसी प्रकार माताके प्रङ्गोंसे होती है, यह -मद्य शाहिद लिखकर आगे प्रतिपक्षी लिखता है - ' इस मौलिक सिद्धान्तका ध्यान - है; पर रखनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि वेदाध्ययन, यज्ञ करना - कराना आदि गुणियों पुत्रोंके लिए जैसे विहित है, वैसे ही कभ्यानों के लिए भी है । ' फिर आगे देशकी बहू लिखता है -ही कर ' मनु ६।४५ में एक दूसरे सिद्धान्तका उत्तमतासे प्रतिपादन है कि-इन बातों ' एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह । विप्राः प्राहुः तथा चैतद् यो भर्ता ऐसे ना स्मृताङ्गना ' अर्थात् पुरुष अकेला नहीं होता, किन्तु स्वयं, पत्नी और घटकानेवर सन्तान मिलकर पुरुष बनता है । जैसेकि - शतपथब्रा में कहा है — ' अर्धो वा एष श्रात्मनः, तस्माद् यद् जायां न विन्दते, न यावत् प्रजायते, सर्वो मनुके पद्योंका उत्तरभाग वादीने छिपा दिया [ ६६७ हि तावद् भवति । श्रथ यदैव जायां विन्दते, अथ प्रजायते, तर्हि सर्वो भवति । तथा चैतद् वेदविदो वदन्ति- ' यो भर्ता सैव भार्या स्मृता ' इतना ही कुल्लूकभट्टका पाठ लिखकर वादी उसका अर्थ करता है— ' पत्नी पुरुषका प्राधा श्रङ्ग है, इसलिए जब तक पुरुष स्त्रीको नहीं पाता; जब तक उसकी सन्तान नहीं होती; तब तक वह अधूरा है । जब पत्नीको प्राप्त करके वह सन्तानोत्पादन करता है; तब वह पूरा बनता है । इसलिए वेद जानने वाले विद्वानोंने कहा है कि जो पति है, वही पत्नी है, उनमें ग्रन्तर नहीं । यह लिखकर उसपर वादी टिप्पणी चढ़ाता है - ' इस सिद्धान्तानुसार भी पुरुषों का वेदाध्ययन - अध्यापन यज्ञ करना, कराना आदि कर्तव्य पुरुषोंके समान उनकी पत्नियोंके भी हैं " । इन आर्यसमाजियोंने जितनी शास्त्रोंकी कतरब्योंत की है, शास्त्रोंके पूर्वापर छिपाकर उनसे अपने मनगढन्त सिद्धान्त निकाल कर अनुसन्धान - विरहित जनताकी आँखों में धूल झोंकी है, ऐसा अन्य किसीने भी नहीं किया । जब हम धार्यसमाजियोंसे हमारे पक्षके खण्डन करने केलिए मनु प्रादिके दिये प्रमाण देखते हैं; तव हम घवरा नहीं जाते । समझ जाते हैं कि इन्होंने उनका पूर्वापर अवश्य छिपाया होगा । अतः हम निश्चिन्त रहते हैं । स्वा.द.ने स.प्र. की भूमिकामें ठीक ही लिखा है- " प्रसत्ति ' जिस पदके साथ जिसका सम्बन्ध हो; उसीके समीप उस पदका बोलना बा लिखना ' | ' त'त्पर्य ' जिसकेलिए वक्ताने शब्दोच्चारण वा लेख किया है, उसीके साथ उस वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी दुराग्रही मनुष्य होते हैं कि जो वक्ता के अभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेष कर मतवाले लोग । क्योंकि मतके प्राग्रहसे उनकी बुद्धि अन्धकारमें फंसके नष्ट हो जाती है " । यहाँ पर भी वही बात है । प्रतिपक्षीने मनुके पूर्व दिये पद्यका उत्तरार्धं
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६६८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) छिपा दिया है, तथा उस उत्तरार्धकी कुल्लूककी व्याख्याको भी छिपा दिया है; इस पूर्वापर छिपानेसे ही यह लोग अनुसन्धानसे हीन जनता में अपना प्रभाव डालकर उस मुसलमानकी तरह बन रहे हैं- जिसने ' मत पढ़ो निमाज, जब हो नापाक ' इन दो वाक्यों में पिछले वाक्य ' जब हो नापाक ' को छिपा दिया था । सो प्रतिपक्षीने मनुके पूर्वपद्यके उत्तरार्धको छिपा दिया । वह है-. ‘ तस्या मात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यः हरेत् श्रियम् ' ( १।१३० ) इस पद्य में दायभागका प्रकरण चला हुआ है कि पिताके दाय ( जायदाद ) का स्वामी पिताके पीछे उसका पुत्र ही होता है, क्योंकि उसने पिताका पारलौकिक - उद्धारकार्य करना होता है, और वह पिताका आत्मा होता है । पर यदि उस पुरुषका पुत्र न हो; पुत्री ही हो; तब मनुजी कहते हैं कि इस अवसर पर पिताकी आत्मा पुत्री ही होती है, क्योंकि वह भी पुत्रकी भान्ति पिताके अङ्ग - प्रङ्गसे उत्पन्न होती है; तब आत्मस्वरूप-लड़की यदि विद्यमान है; तो उस जायदादको शून्य कौन छीन सकता है । क्योंकि उस लड़कीका लड़का फिर अपने नानाका पारलौकिक उद्धार करता है । वादीने इस उत्तरार्धको भी छिपा दिया; उसकी कुल्लूककी टीकाको भी छिपा दिया । वह यह है कि- ' अतः तस्यां पुत्रिकायां विद्यमानायाम् पुत्रस्य मृतस्य पितुः धनं पुत्रिका व्यतिरिक्तः कथमन्यो हरेत् '? ( अतः जव पिताकी आत्म - स्वरूप पुत्री जीवित है; तो पुत्ररहित पिताकी जायदादको उस पुत्रीसे भिन्न दूसरा कौन ले सकता है? ) ' आलोक ' पाठकोंने देखा होगा कि - वादीने दायभाग- प्रकरण के इस पद्यके उत्तरार्धं तथा उसकी कुल्लूककी टीकाको छिपाकर उनमें अपनी साम्प्रदायिक भावना भर दी । श्रीर लिखा कि- ' वेदाध्ययन, यज्ञ करना-कराना प्रादि पुत्रोंकेलिए जैसे विहित है, वैसे ही कन्याओं के लिए भी हैं । उपमा सर्वसारूप्य नहीं होता [ ६६६ ६७० इन लोगोंको यह शर्म नहीं प्राती कि जो मनुके विधानमें नहीं है, उसको हम ग्रसत्यता से उसमें कैसे ठूसते पद्य में तथा भी इ लड़की के लिए वेदाध्ययन, यज्ञादि करना - कराना स्पष्ट निषिद्ध हैं? मनुजीने उत्पन्न यह हम गत निबन्धों में स्पष्ट कर चुके हैं । पर इस छली किया है, पिता अपने विचार भर दिये । वादीने उसमें पहले तो ' पुत्रेण दुहिता समा ' लिखनेसे वादीका उपन खण्डित हो जाता है । नहीं तो जातिपक्ष इष्ट होनेपर इष्ट जातिपक्ष है । लिखनेकी आवश्यकता नहीं थी । इससे दोनोंके सभी इस वाक्य के जाते । जब दूसरा पाद लिखा है; तो स्पष्ट है समान धर्म नहीं हो आपस में भेद हुआ करता है । श्रीर फिर इसमें कि पुत्र - पुत्रीका वास्त वेदाध्ययन आदि लड़कीका लिखा ही कहां है? अतः वादीका इसे ' सिद्धान्त ' गलत है । यहाँ तो श्रभ्रातृका - कन्याको पिताके दायभाग में अधिकार कहना दिया ही मानत गया है, वेदाध्ययनादिमें नहीं । सदाव यहाँ याद रखना चाहिये कि - ' समा ' यह उपमा - शब्द है । उपमा कुछ विवक्षितांश में हुआ करती है, सर्वसारूप्य में नहीं । ' चन्द्रेण समं स्पष्ट प्रतिपक्षिणो मुखम् ' कह देने से वादीका मुख चन्द्रके समान उसका कुछ मत से विवक्षितांश प्रह्लादकत्व धर्म समान माना जाता है. सर्वसारूप्य नहीं । अन्यथा तो वादी अपने मुखको चन्द्रसमान कहनेपर चन्द्र जैसे परिमाणवाला और रात्रि में भी आकाशपर ठहर कर रात में प्रकाश देनेवाला होगी मान लेगा? पर ऐसा अनुपपन्न हो जायगा । यही बात यहाँपर भी वेदा समझ लेनी चाहिये | उसस यदि वादी मनुके इस पद्यके ' पुत्रेण दुहिता समा ' अंशसे पुत्र और पक्षी पुत्री में सर्वसारूप्य मान लेगा, तब क्या पुत्री भी पुत्रकी भाँति अन्यकी कन्या से विवाह करने जायगी? पुत्रकी भाँति सदा पिता के घर रहा दृष्टि उसक करेगी? क्या उस अन्य कन्यासे विवाह करके उससे उत्पन्न सन्तान-द्वारा वह अपने पिताके वंशको बढ़ाएगी? नहीं, कभी भी नहीं । कोइ कुल्ल
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६ ९ ६७० ] बातको न मानेगा । सो पुत्री जब पिताके से पुत्र की तरह तथा भी इस है; तब वह पिताके पुत्र न होनेपर पिताकी आत्मा होनेसे जीने उत्पन्न हुई सम्पत्ति में अधिकृत हो सकती है । यह इस पद्यका सम्बन्ध है । कया है, पिताकी उसमें इस पद्यका कन्या के वेदाध्ययनादिसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं; क्योंकि-उसे उसके पिताने नहीं देना है, किन्तु प्राचार्यने ही देना उपनयनादिको तिपक्ष प्राचार्य उसका पतिसे भिन्न अन्य नहीं होता । पति भी उसका है । वाक्य के ब्रह्मचर्याश्रम न होनेसे उसका उपनयन तथा वेदारम्भ - संस्कार नहीं करा नहीं हो सकता । अतः वह आचार्य जैसा होता है, वास्तविक आचार्य नहीं । -पुत्रीका वास्तविक श्राचार्य हो, तो उस लड़की को अपनी पत्नी न मानकर उसे. आदि पुत्री के समान ही मानना पड़ेगा । श्राचार्य शिष्यको पुत्रके समान ही नाही मानता है । पर यहाँ ऐसा नहीं होता । पिताको पुत्रीको पालकर उसे र दिया सदाकेलिए पतिको दे देना है । पतिसे भिन्न गुरु श्रादिको सदाकेलिए नहीं दे देना है । उपमा मनुजी लड़कीका वेदाध्ययनादि सर्वथा नहीं मानते । यह हम उनके ण समं स्पष्ट तथा सोपपत्तिक - प्रमाणोंसे गत - निवन्धों में बता चुके हैं । वादीके का कुछ मत से भी यह अर्थ विरुद्ध है; क्योंकि आगे वादी ' न वै कन्या न युवतिः ' नहीं । इस मनुपद्यसे वृद्धा स्त्रीका ही अनुभववश यज्ञका होतृत्व मानता है; तब जैसे यहां अनुभवहीन छोटी लड़की भला यज्ञविषयवाले वेदमें अधिकृत कैसे नेवाला होगी? तब मनुजीके इस पद्य केवल पूर्वार्धसे लड़कीका उपनयन एवं पर भी वेदाध्ययनादि निकालना ' खींचातानी ' है, जबकि उक्त पद्यका उत्तरार्ध उससे लड़कीका केवल दायभाग ही बता रहा है ' । इसीलिए ही प्रति-त्र और पक्षीने अपने पक्ष के कट जानेके उरसे उक्त मनुपद्यके उत्तरार्ध तथा अन्यकी उसकी कुल्लूकभट्टकी व्याख्याको जनदृष्टिसे छिपा लिया है, उसे जन-र रहा दृष्टिमें नहीं आने दिया । सन्तान- अव हम वादीसे दिये हुए मनुके पद्यके उत्तरार्धको तथा उसके कोई कुल्लूकभट्टकृत व्याख्यानको उसके साक्षी ' निरुक्त ' के वाक्य तथा उसके वादी उत्तर अंग छिपा देते हैं [ ६७१ व्याख्यानभूत श्रीदुर्गाचार्यंके कथनको उद्धृत करते हैं, जिससे प्रतिपक्षीका पक्ष वैसे उड़ जायगा, इस प्रकार है— ' यथैवात्मा तथा कथमन्यो घनं हरेत् ' जब पुत्री भी पिताके पुत्र नहीं है; पिताके कौन ले सकता है? जैसे प्रचण्ड - वाताघातसे बादल । वह पूर्ण मनुपद्य पुत्रः, पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां ( १।१३० ) । पद्यका अर्थ तथा प्रकरण यह है कि-अङ्ग अङ्गसे जन्मी है; तब यदि पिताकी आत्मा धनको उसकी दूसरी श्रात्मा पुत्री ही लेगी, दूसरा श्रव देखिये यही बात श्रीकुल्लकभट्टने भी लिखी है- ' ग्रात्मस्थानीयः ' पुत्र: ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' इति मन्त्रलिङ्गात् । तत्समा च दुहिता, तस्या श्रपि [ पितुः ] श्रङ्ग ेभ्य उत्पादनात् । श्रतः तस्यां पुत्रिकायां पितुः आत्म-स्वरूपायां विद्यमानायां, पुत्रस्य, मृतस्य पितुर्धनं पुत्रिकाव्यतिरिक्तः कथमन्यो हरेत्? - श्रव विद्वान् पाठकोंने यह रहस्य समझ लिया होगा कि प्रतिपक्षीने उक्त मनुपद्यका उत्तरार्धं तथा उसीकी कुल्लूककृत - व्याख्या क्यों छिपाई? वास्तवमें यही प्रतिपक्षी क्या, पर इस सम्प्रदायके प्रायः सभी पक्षी अपने अशुद्ध पक्षको सिद्ध करनेके लिए पुस्तकोंके पूर्वोत्तर- प्रकरण छिपा दिया करते हैं, जिससे अनुभवी लोग समझ जाते हैं कि इन प्रतिपक्षियोंका पक्ष निर्मूल एवं निर्बल है । अब हम इस विषय में ' निरुक्त ' प्रणेता श्रीयास्क तथा उसके व्याख्याता श्रीदुर्गाचार्यका मत भी दिखलाते हैं । विद्वान् पाठक देखें । ‘ निरुक्त ' के दायभाग - प्रकरणमें श्रीयास्कने लिखा है- ' तदेतद् ( मिथुनाः पुत्रा दायादाः इति ) ऋक् - श्लोकाभ्यामुक्तम्- ' प्रङ्गाद् श्रङ्गात् सम्भवसि हृदयाद् श्रधिजायसे । श्रात्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरद: शतम् ' ( इति ऋक् ) ' अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः । मिथुनानां विसर्गादी मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ' ( इति श्लोकः ) ( निरु. ३।४१२ ) ।
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६७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यही वह मनुजीका मत है जिसे हम उद्धृत कर चुके हैं । इसी पर निरु. ३।५।६ में श्रीदुर्गाचार्यंने कहा है – ' यदपि च उक्तम्- ' प्रविशेषेण पुत्राणां दायों ' इति [ सृय्ट्यादिजात - मनुमतम् ], तदपि अभ्रातृमतीपक्षे द्रष्टव्यम् ' वात स्पष्ट हो गई कि यह अभ्रातृमती कन्याको पिताके दाय-देनेके अर्थ में है । इससे हमारा पक्ष सिद्ध तथा वादीका कन्याको वेदाध्ययनादि करानेका पक्ष खण्डित हो गया । अन्य बात यह है कि पुत्रेण दुहिता समा ' यह यहाँ पर उपमा वा है । दृष्टान्त दाष्टन्तिका सर्वसारूप्य कभी नहीं लिया दृष्टान्तवाक्य जाता । जैसा कि - ' ब्रह्मसूत्र ' ( ११२२१ ) के सूत्रके भाष्य में श्रीस्वा. शङ्कराचार्यने कहा है- ' नहि दृष्टान्त - दान्तिकयोः श्रत्यन्तसाम्येन भवितव्यम् - इति नियमोखित ' ( दृष्टान्त और दान्तिकों में प्रत्यन्त-समता हो - यह कभी नहीं हो सकता । ) सो यह सारूप्य भ्राताके अभाव में भगिनीका पिताकी जायदादकी स्वामिनी बनाने में हैं; इसमें कन्याके वेदाध्ययनादिकी कुछ भी गन्ध नहीं । फलतः पुत्रके अभाव में ही पुत्रीका पुत्रसादृश्य बतानेसे पुत्री के पुत्रवाले सभी अधिकार सिद्ध न हुए । ( २ ) इसी प्रकार ' यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ' ( ६२४५ ) यह जो मनुपद्य वादीने दिया है, उसका भाव यही है कि- ' तस्यामुत्पादितं भर्तृ रेव अपत्यं भवति ' ( कुल्लूक ) ( उस स्त्री में पैदा की गई सन्तान भर्ता और स्त्रीके अभेदवश भर्ताकी ही होती है ) इसमें भी स्त्रीके वेदाध्ययनकी कुछ गन्ध भी नहीं है । प्राश्चर्य है कि वादी स्मृति से भी कितना वलात्कार कर रहा है । विद्वान् पाठक देख रहे हैं कि - वादीके इन तिलोंमें कुछ भी तेल नहीं । ( ३ ) पृ. २६-१०० ग्रागे वादीने ' न वै कन्या न युवति: ' यह मनु-पद्य उपस्थित करके इससे वृद्धा - स्त्रीका अनुभवशील होनेसे होतृत्व माना है, इस विषयमें हम पृ. ४१६-४२५ में स्पष्टतया उसका पक्ष काट बालाओं और युवतियोंको हवन- निषेध [ ६७३ ७४ चुके हैं ।बाद इस पद्यको ' बड़ा महत्त्वपूर्ण ' बनाता है, पर कहनेस गलत एवं निर्मूल पक्षको सिद्ध करनेकेलिए एक भद्दी वह अपने इस स्त्रियो श्री तुलसीराम स्वामीकी चाल कुछ उसमें सुधार करके लेता है तथा कृष्टिन ध्रुवः ' इसमें प्रग्निहोत्रको करानेका निषेध भी कन्या और । कहता है- है । युवतिकेलिए चेष्टा अर्थापत्ति से स्पष्ट सिद्ध होता है कि वृद्ध स्त्रियां ( आयु वा ज्ञानको है । तब उ दृप्टिसे ) न केवल हवन कर सकती है, बल्कि करा भी सकती हैं । " प यहाँ पर दयानन्दीने दयानन्दिन -लड़कियों तथा युवतियोंको बनकर करनेका सर्वथा निषेध करके अपने साम्प्रदायिक सिद्धान्तपर पानी हवन फेर प्राचरण दिया है । वादीने जिस बेचारी एक लड़कीकेलिए यह सब पापड़ बेने, जिसके पुस्तक छपवाई; वह भी वृद्धा नहीं थी, न श्रायुको दृष्टिसे और न होनेसे ज्ञानकी दृष्टिसे । इस विषयपर पाठक इसी पुष्पमें पृ. ४१६-४२५ में देखें, श वादीका पूरा पक्ष खण्डित हो जावेगा । जानना पृ. १०१ ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' का सभी हूँ । पर भाष्यकारोंने हमारे पक्ष के अनुकूल ही अर्थ लिखा है । वादीकी इससे शिक्षा कुछ भी पक्षसिद्धि नहीं । इस विषय में पृ. १७४ -१८३ देखें । बादीकी उनकी समस्त - प्रापत्तिर्योका इससे निरास हो जावेगा । यह पद्य वादीके निर्मूल वेदका कथनानुसार वेदविरुद्ध सर्वथा नहीं है । हमने इस विषय में ऐसा प्रबल धर्मशास विचार रखा था कि- वादी उसपर कुछ भी ' ननु नच, किन्तु परन्तु नहीं स्वामी कर सकता । यह हमने स्मृतिवचन तथा उसका समाधान लिखा था ।. । ४ । ११६ इसपर वादी जिता है— प्रामाण्य " पं.जीको वेदोंमें से ग्रपने इस पक्षकी पुष्टिमें एक भी प्रमाण नहीं पुराणध मिला, इसलिए वर्तमान स्मृतियोंमें पाये जानेवाले वचन उद्धृत करके लोकवृत्त उन्होंने अपने पक्षको समर्थित करनेका यत्न किया है । " इसका उत्तर तत्रैकेन यह है कि वेद " दीर्घश्मश्रु " तथा " शुक्रवान् " " द्विज ” को बेदाधिकार पुराने ति स ० ध ० ४३
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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ६७३ ६७४ कहने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुरुषोंको ही अपना अधिकार देता है न तो , और न शूद्रोंको । ' गोपथब्राह्मण ' में ' पुमांसः श्मश्रुवन्तः, अपने इस स्त्रियोंको: स्त्रियः ' ( १०३।७ ) यह कहकर श्मश्रुमान्से पुरुषका ही श्रश्म-कुष्ठित ध्रुवः ' सार्वदेशिक ' के तीन प्रोंमें मेरे लेखका ग्रहण किया कहता है- है । वादीने भी कहीं इन मुझसे दिये मन्त्रोंका प्रत्युत्तर देने की नकेलिए चेष्टा करते हुए प्रत्युत्तर नहीं दिया । है कैसा? 7 ज्ञानशे तब उपालम्भ पुरुषत्वका चिन्ह मूछें हैं, जिन्हें मुडाकर आजकलके पुरुष स्त्री को जनकर यज्ञोपवीतको उतारते हुए स्त्रीके यज्ञोपवीताभावको प पानी हवन फेर प्रावरणसे भी सिद्ध कर रहे हैं । दूसरा पुरुषत्वका चिन्ह ' शुक ' । ने जिसके निग्रहसे पुरुष ' ब्रह्मचारी कहलाता है । ये दोनों वातें स्त्रीमें न श्रीर होनेसे बेदानुसार वह अपूर्ण है, अतः वेदकी अधिकारिणी भी नहीं । ५ में देखें, शेष प्रश्न यह है कि ऐसे प्रमाण वेदके थोड़े मिलते हैं, तो इसपर यह जानना चाहिये कि यज्ञोपवीत तथा शिखा हिन्दुधर्मके कितने प्रसिद्ध अङ्ग का सभी हैं । पर वेदमें उनका एक - दो मन्त्रोंमें संकेतरूपसे वर्णन है, पर इस बात से की इससे शिखा और यज्ञोपवीतकी अकर्तव्यता श्रथवा साधारणता नहीं हो जाती, वादी उनकी विशिष्ट व्यवस्था धर्मशास्त्र ही करेगा । इसी प्रकार ' स्त्री - शूद्रों को निर्मूत- बेदका अधिकार नहीं ' इसका भी वेदमें संकेत ही मिलेगा, बाकी व्यवस्था ऐसा प्रबल धर्मशास्त्रों ( स्मृति, गृह्य एवं धर्म - सूत्रों ) से ही मिलेगी । आपके रन्तु नहीं स्वामीजीके भी मान्य ' न्यायदर्शन ' के भाष्यकार श्रीवात्स्यायन - मुनिने लखा था । ४ । १ । ६२. सूत्रके भाष्य में लिखा है - ' विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । अन्यो मन्त्र - ब्राह्मणस्य ( वेदस्य ), विषय:, अन्यश्च इतिहास -माण नहीं पुराण धर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य ( वेदस्य ) विषयः, धृत करके लोकवत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः । नका उत्तर सर्वकेन न सर्व व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयमेतानि दाधिकार पुराणेतिहास - धर्मशास्त्राणि ) प्रमाणानि इन्द्रियादिवत् ( मन्त्रब्राह्मण-है । " । यह बहुत स्पष्ट वेद, स्मृति, पुराणोंके द्रष्टा- प्रवक्ता समान हैं [ ६७५ इसमें कहा गया है कि मन्त्र ब्राह्मण ( वेद ) तथा धर्मशास्त्र श्रादि अपने - अपने विषयमें अधिक प्रमाण पुराणेतिहासका मुख्य हैं । वेदका मुख्य विषय यज्ञ है, विषय लोकचरित्र बतलाना है, परन्तु लोकव्यवहार-की व्यवस्था अर्थात् क्या करना चाहिए, क्या नहीं, यह धर्मशास्त्रोंका मुरुप विषय होता है । जैसे नाक, कान आदि इन्द्रियाँ अपने - अपने विषय-में अधिक तथा स्वतःप्रमाण हैं, वैसे ही धर्मशास्त्र आदि भी अपने - अपने विषय में अधिक प्रमाण है । धर्मशास्त्रमें स्मृतियाँ तथा गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र आदि सब सम्बद्ध होते वेदके व्यवस्थापक देख - भालकर ही तदनुकूल हैं । ये सब वेदको सम्यकृतया बनाये गये हैं । अतः वे वेदसे विरुद्ध नहीं, क्योंकि उनके प्रवक्ता बहुत विद्वान् तथा निष्पक्ष एवं वेदोंमें निष्णात थे । जब ऐसा है, तब हम स्मृतियोंके प्रमाण क्यों न दें? आश्चर्य यह है कि आजकल के साधारण अर्वाचीन पुरुष ' किञ्चिज्ज ' होकर भी ' सर्वज्ञता ' का दम भरते हुए ' यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहम् ' इस पद्यके श्राशयको अपनाते हुए, उन स्मृत्यादिके प्रणेतानको तरीके से वेदज्ञान-विरहित सूचित कर रहे होते हैं । पर यह याद रखना चाहिए कि वैदिक-पदार्थोंके स्मरणका नाम ' स्मृति ' होता है । वह स्मृति भी वेदतुल्य माननीय होती है । वादीके मान्य ' मीमांसादर्शन ' तथा ' न्यायदर्शन ' में वेदस्मृत्यादिके द्रष्टा- प्रवक्ता समान कहे गये हैं । देखिये ' न्याय ' में वात्स्यायनभाष्य-" द्रष्टृप्रवक्त सामान्याञ्च प्रप्रामाण्यानुपपत्तिः । ये एवं मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते एव खलु इतिहासपुराणस्य घर्मशास्त्रस्य चेति ' ( ४/१/६२ ) अर्थात् वेद तथा धर्मशास्त्रादिके द्रष्टा प्रवक्ता समान है । अतः इनमें अप्रमाण भी कोई नहीं हो सकता । जब ऐसा है, तब लोकव्यवहारव्यवस्था धर्मशास्त्र से क्यों न मानी जाय? ' श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो घर्मशास्त्र ं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थष्व-मीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बंभों ( मनु. २1१० ) इससे धर्मशास्त्र
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६७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्मृतिका नाम है । तब उसे प्रमाण क्यों न माना जाय? जबकि कहा है - " ते ( श्रुतिस्मृती ) सर्वार्थेषु ग्रमीमांस्ये " । बल्कि ' योऽवमन्येत ते मूले ( श्रुतिस्मृती ) हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ” ( मनु. २।११ ) इस प्रकार श्रुति तथा स्मृतिका युक्तिवादसे खण्डन करनेवालेको देश निकाला भी कहा गया है । में अब स्मृतियोंके विषय में ' मीमांसादर्शन ' के ' स्मृतिप्रामाण्याधिकरण देखिये - ' अपि वा वेदतुल्यत्वाद् उपायेन प्रवर्तेरन् " ( ६।२।२२ ) । देखिये इस विषय में शबरस्वामीने कितनी स्पष्टतासे कहा है - " वेदतुल्यत्वात् । वैदिका एव पदार्थाः स्मर्यन्ते इत्युक्तम् । वैदिकाश्च पदार्था उपनयनो-समाम्नाताः । स्मार्ताश्चैते वैदिका एव " । यहाँ ' मीमांसादर्शन ' ने त्तरकाले स्पष्टरूपसे स्मृतियोंको वेदतुल्य माना है । ' अपि वा कर्तृ सामान्यात् प्रमाणमनुमानं स्यात् ' ( ११३१२ ) यहाँपर मीमांसाका हृदयप्रकाशक शाबरभाष्य देखिये-‘ प्रमाणं स्मृतिः, कर्तृ सामान्यात् स्मृतिवैदिकपदार्थयोः । तेनोपपन्नो वेदसंयोगस्त्रैवणिकानाम् ' । यहाँपर ' कर्ता ' का अर्थ ' न्यायदर्शन ' के पूर्वोक्त - वचनानुसार द्रष्टा तथा प्रवक्ता जानना चाहिए, जैसाकि ' सूर्यऋषिमंन्त्रकृत् ' ( ऐ.ब्रा. ६१ ) " मन्त्रकृतां स्तोमः ” ( ऋ.शा.सं. 1११४।२ ), “ यामृषयो मन्त्रकृतः ” ( तैत्ति.ब्रा. २८।८ ( ४ ), ऋषिः कुत्सो भवति कर्ता स्नोमानाम् ' ( निरु. ३।११।५ ) इत्यादिमें; क्योंकि ' कृ ' धातु अनेकार्थक होता है । जबकि वेद स्त्रियोंके उपनयन तथा अध्ययन में सहमत नहीं, यह हम गत लेखों में स्पष्ट कर चुके हैं, तब स्मृतिके वेदानुकूल होनेसे उसका प्रप्रामाण्य नहीं है । इसीलिए वादीके मान्य ' जैमिनिन्यायमालाविस्तर ' में भी कहा है-' वैदिकैः स्मर्यमाणत्वात् सम्भाव्या वेदमूलता । विप्रकीर्णार्थसंक्षेपात् सार्थत्वादस्ति मानता ' ( १/३/२ ), ' स्मृतिर्वेदमूला, वैदिकमन्वादिप्रणीत-स्मृतित्वात् उपनयनाध्ययनादिस्मृतिवत् । न च वैयथ्यं शास्त्रीयम्, वेदको भी पुत्र मुख्य इष्ट है ६७८ श्रस्मदादीनां प्रत्यक्षेषु परोक्षेषु च नानावेदेषु विप्रकीर्णस्य एकत्र संक्षिप्यमाणत्वात् । तस्मादियं स्मृतिधर्म प्रमाणम् ' ( अनुष्ठेयाचा दु संस्कृत - सीरीज ) । तव मन्वादि स्मृतिके वैदिक होनेसे पृ. २६ / कृपणं वैदिक सिद्ध हुआ । तब वादीका स्मृतिकी निन्दा करना हमारा अपने पक्ष सबैल दावहै, दुर्बलता प्रकट करना है । तो फिर स्त्रियोंका वेदाध्ययनादिमें अधिकार पड़ ( गोभि.ग होना — यह बात स्मार्तवचनोंसे बतलाई जानेपर भी वैदिक है । वेदा देख मत हम बतला भी चुके हैं । और भी वादी कुछ सुने— कराई है वादी यह बतलावे कि ' पुंसवन ' - संस्कार वैदिक है; या नहीं? उसे अन्ततः मानना ही पड़ेगा कि उक्त संस्कार वेदसम्मत है, धन्न जब आबना । आपको उसे संस्कारोंसे बहिष्कृत करना पड़ेगा । श्रव बतलाइये ि पुरंसवन, गर्भके दूसरे - तीसरे महीने क्यों किया जाता है? इसका का वात समझिये । ' पु ंसवन ' में ' पु'सवन ' यह दो शब्द हैं । इसका प्रयं है- जनिष्यते पुरुष पैदा करनेवाला कर्म । इसलिए प्रसिद्ध है - ' पु सवनात् पुसीकरोति । इसका विग्रह भी यही है – ' पुमान् सूयते येन कर्मणा, तदिदं पुसरं शिय इस गर्भसंस्कारकर्म ' । ' आश्वलायनगृह्यसूत्र ' के ११११।१ सूत्रकी व्या वर्धन हो वादी प्रिय भाष्यकार श्रीहरदत्ताचार्यने भी कहा है- " येन स प्रकी पुमान् भवति, तत् पुंसवनम् ' । खिलाकर अत्र बतलाइये कि वेद पुत्रके उत्पन्न कराने के लिए क्यों प्रेरित कर उन्हीं दिन है? कन्याको वह मुख्यतासे क्यों नहीं चाहता? ' कन्यासवन संस्कार ' से नूत्रकार ' नहीं? इससे स्पष्ट है कि वह अपना अधिकार पुत्र को देना चाहा है । द्वारा स्त्री कन्याको नहीं । इसीलिए पुत्रके निमित्त प्रार्थना कराता है कि नपुं विद्या उत्पन्न हो, न लड़की । देखिये वेदका हृदय- " पुमांस पुत्रमापेहि ' ( इ. प्रथर्व (. शौ.सं. ६।१७।१० ), ' पुमांसं पुत्र जनय ' ( अ. ३।२३।३ ), ' तेस्तवं पुर बाद विन्दस्व ' ( प्र. ३।२३।४ ), प्र ते योनि गर्भ एतु पुमान् ' ( अथर्व २३ ' पुंसवन २ ), “ भवासि पुत्राणां माता " ( श्र. ३।२३।३ ), " विन्दस्व पुत्रं नारि होवे ”( ( अ. ३।२३५ ), " दश अस्यां पुत्रान् श्राधेहि " ( ऋ. १०/६३ को
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १७ = ] श्रनुष्ठेयावस्य, ज्योतिर्ह पुत्र: ' ( ऐत.ब्रा. ७११३ ), पुत्र ब्राह्मणा!! इच्छध्वं पृ. २८ ' कृपणं दुहिता वदावद: ' ( ऐ. ७ ३५ ) " तो एहि सम्भवाव सह रेतो मारा पक्ष सर्व लोको वेत्तवे " ( तै.ब्रा. ३।७।१ ( ६ ), " पुमान् गर्भस्तवोदरे , " अपने पड़ दधावहै, पुसे पुत्त्राय ) । अधिकार ( गोभि.गृ. २।६।३ र ये यहाँ कितने जोर - शोरसे पुत्रकेलिए वेदने प्रार्थना कहै । वेदश कराई है । बल्कि यहाँ कहा है – “ जायमानं मा पुमांसं स्त्रियं ( प्रथनं. ८।६।२५ ) अर्थात् उत्पन्न हो रहा हुम्रा पुरुष स्त्री न बन या नहीं! साब । इस प्रकार स्त्रीको न चाहकर पुरुषको चाहा गया है । यही नवे गृह्यसूत्र ' ( ११५१५ ) में की गई है - ' पुमान् स्त्री बतलाइये ि जाय गर्भो अन्तः " ( स्त्री पुमान् जायताम् यह श्रन्वय है ), ' पुमांस गर्भ-" इसका समाघस्व ", " पुमांस्ते पुत्रो नारितः पुमाननुजायताम् " । " पुमान् श्रयं तका प्रर्व है- जनिष्यते " ( गोभि. २७/१५ ) इस प्रकार पु सन्तानकी प्राशा की गई है । पुसीकरोनि इस सारे कथनका रहस्य यही है कि गर्भाधान में तीन मास तक तदिदं पुनर्भाशय में जो पिण्ड होता है, उसमें शिश्न तथा योनि - श्रङ्गका समानरूपसे की व्या वर्धन होता है । इसके बाद उन दोनों में एककी वृद्धि रुक जाती है, दूसरे " येन स बङ्गकी वृद्धि होने लग जाती है । उस समय कोई विशिष्ट प्रि खिलाकर पुंसन्तान पैदा कराई जा सकती है, जैसा कि डाक्टर लोग प्रेरित कर उन्हीं दिनों में कोई दवा देते हैं, और पुत्र होने की शर्त बढ देते हैं । हमारे न - संस्कार को नूत्रकार भी उसी पुंसवन संस्कार में ' पुसवन ' प्रोषधिविशेष दाहिनी नाक के देना चाहता है द्वारा स्त्री को पिलवाते थे, जिससे पुरुष उत्पन्न हो । जिसका मूल " तास्त्वा - किन नपुं पुत्रविद्या ( पुत्रलाभाय ) देवी: प्रावन्तु ( सहाया भवन्तु ) प्रोषधयः ” घिहि ' ( ( प्रथर्व. ३।२३१६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें है । ), तेस्तवं दु • वादी के स्वामीजी भी पुंसवन संस्कार में कुछ दवे शब्दों में कहते हैं— ( पर्व ३२ ' पुंसवन संस्कार करना चाहिए, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्य की हानि न वपुत्रं नारि! " हो " ( सं.वि.पू. ४७ ) । जब योषधिविशेषसे गर्भाशय के भीतर स्थित - १०/८३ वर्यको लाभ अर्थात् सहायता पहुंचेगो, तब वीर्यके प्राबल्य से " पु ंसि वै वादीने स्त्री - शूद्रको वेदके अधिकारमें कोई वेदवचन नहीं दिया [ ६७ रेतो भवति, तत् स्त्रियामनुषिच्यते । तद् वै पुत्रस्य वेदनम् ' ( श्र. ६ | ११ | २ ) रजकी शक्ति कम होकर कन्या उत्पन्न न होकर शिदन की होनेसे पुत्र हो उत्पन्न होगा । इसलिए वादीकी ' संस्कारविधि ' उन्नति में वहाँ " पुमान् गर्भस्तवोदरे ", " पुमांसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमान्, अनुजायताम् " ( मं.ब्रा. ११४१८-६ ) यह दो मन्त्र पुंसवन में मिलते हैं । इसलिए पारस्करादि - गृह्यसूत्रोंमें पुरुंसवन, सीमन्तादि संस्कार " यदहः पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युज्यते ” ( पा. १:१४ ), " पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युक्तः स्यात् ” ( प्राश्व.गृ. १1१४/२ ) पुरुषनक्षत्र में करनेका प्रादेश दिया गया है । तव भला ऐसी प्राज्ञा देनेवाले वेदसे ' पुरुषका ही वेदमें अधिकार है, स्त्रीका नहीं; यह ढूंढने की आवश्यकता ही क्या है? तब भी हम " वेदमाता... द्विजानाम् ” ( अ. १६७१1१ ), " ब्रह्मचारी... दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः " ( अ. १११५५६ ), " अयं स होता यो द्विजन्मा ” ( ऋ. १११४२१५ ) इत्यादि प्रमाण दे ही चुके हैं । फिर तदनुकूल स्मृतिवाक्य तो लिखे ही थे । वादीने तो वेदका कोई एक भी वचन नहीं दिया, जिसमें स्त्री तथा शूद्रको वेदाध्ययनका अधिकार दिया गया हो । तत्र वादीका पक्ष प्रसिद्ध सिद्ध हो गया । यज्ञमें बैठनेके स्त्रीके प्रमाण व्यर्थ हैं, यज्ञ तो प्रत्रैवर्णिक, अनुपनीत, वेदाध्ययनाधिकाररहित - निषादस्थपतिका भी आता ही है, जिसका कि वादीने हमारे लिखनेपर भी अपने ' सार्वदेशिक ' के ३३ पृष्ठके उत्तरमें कहीं भी प्रत्युत्तर नहीं दिया । अतः उसका सारा परिश्रम व्ययं ही सिद्ध हुआ; और हमारे उक्त वेदोंके प्रमाण हैं भी महत्त्वपूर्ण, क्योंकि वेद ' ब्रह्मचारी ( शुक्रनिरोधकः ) दीर्घश्मश्रुः ' ( श्र. ११/५/६ ) का जो आदेश देता है, उसका भाव यही है कि सर्वाङ्गपूर्ण । सर्वाङ्गपूर्णता होती है । शुक्रसे । स्त्री में शुक्र न होनेसे दाढ़ी मूछें नहीं होती । इसीलिए अथर्ववेदके ब्राह्मणमें कहा गया है- " पुमांसः श्मश्रुवन्तः प्रश्मश्रुवः स्त्रियः " ( १।३।७ ) तब प्रथर्ववेदको ' दीर्घश्मश्रु ' से ' पुमान् ' इष्ट है, स्त्री नहीं ।
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६८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मुखके लोमोंको छोड़िये, अन्य अङ्गोंपर भी स्त्रियोंके पुरुषवत् बाल नहीं होते । इससे स्पष्ट है कि स्त्रीमें न्यूनता है । शुक्र न होनेसे ही बलकी न्यूनता है । बलकी न्यूनतासे स्वरोंकी न्यूनता है । वेदमें सात गीतस्वर तथा उदात्तादि तीन स्वर प्रत्येक मन्त्र में हैं । " उदात्तो निषादगान्धारी अनुदात्तो ऋषमधैवतौ । स्वरितप्रभवा ते षड्जमध्यमपञ्चमाः ” ( ' पाणिनीयशिक्षा ' १२ ) पुरुषमें पूर्णता होने से वह सब स्वरोंका यथास्थान प्रयोग कर सकता है । पर स्त्री में शुक्राभावमूलक बलकी न्यूनता से केवल पञ्चमस्वर प्रधान होनेसे अन्य स्वरोंकी न्यूनतावश उनको वेद में अधिकार देना " मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ' ( पाणिनीयशिक्षा ५२ ) इस वादीके भी मान्य पद्यवाली आपत्तिको मोल लेना है | इसी वेदके आशयका अवलम्वन करके ' अस्यवामीय सूक्त ' के श्रात्मानन्द - भाष्य में ' स्त्रीणां शूद्रान्घपड्गुनां बधिराः पतिताश्च ये । क्लीवानां नैव काणानां वेदविद्याधिकारिता ' यह स्मृतिपद्य जन्म से अपूर्णता वालोंके लिए वेदाधिकार - निषेधार्थं आया है । यद्यपि पुरुषों में भी गर्भाशय एवं स्तनोंके न होनेसे अपूर्णता कही जा सकती है, तथापि उन अङ्गोंका वेदमें उपयोग न होनेसे वेदने उनका स्मरण भी नहीं किया । afe यही प्रङ्गद्वय वेदमें प्रतिबन्धक हैं, क्योंकि वेदस्वाध्यायकी नित्यतामें बाधक हैं । अतः वेदका अधिकार भी पुरुषोंको ही है । इसी वेदके प्राशयको लेकर वादीके मान्य श्रीकाशी शेषवेङ्कटाचल-शास्त्रीने ग्रपने ' त्रिमुनिकल्पतरु ' के १४ वें पृष्ठ में " अश्मारोहणमारभ्य स्त्रीणां गौर्यर्चनं परम् । पुराणपठनं श्रेयो न वेदाध्ययनादिकम् ' यह स्त्रियोंके वेदाधिकारका निषेधक - स्मृतिवचन दिया है । जब स्मृतियोंने इस प्रकार वेदवचनका ही भाष्य किया है, तब वे वचन भी वैदिक सिद्ध हुए । शुक्रहीन होनेसे स्त्रीको वेदका निषेध | ६६१ ६८२ हाँ, विवाह - यज्ञादिमें कोई एक - प्राध नियत मन्त्र स्त्रीको पड़ता है । पर वह भी स्वतन्त्रतासे नहीं, क्योंकि ग्राभ्यन्तरिक बोलना तथा उसकी न्यूनता के कारण उसका कभी ग्राभ्यन्तरिक प्रपूर्णता निर्मूल नहीं हो सकता । उसके लिए वर वा ऋत्विक्का ही उसे शुद्ध उच्चारण देखकर पड़ता है । इसलिए उसकेलिए " वाचयेत् " ( ग्रा.श्रौ. ११११११ श्राश्रम तेरा शखि ऋत्विक बुलवाये इस प्रकार शब्द क्वचित् अनिवार्य स्थल में ) ' उसले है । पुरुष के लिए ' बाचयेत् ' ऐसा शब्द प्राय: नहीं श्राता । यदि श्रा भ्राता जाता भी प है, तो अशिक्षितत्व तथा अनुपनीतत्वमें । यह हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके अपना हैं । सुनुतः अनेक इन सबसे हमारा पक्ष पुष्ट तथा प्रबल है । इसी स्त्रीकी प्रपूर्णता । धरने को मनुने ' निरिन्द्रिय ' शब्दसे कहकर उसे वेदकी अधिकारिणी माता य - है, जैसा कि ' निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतम् ' ( १।१८ ) । भी नह केवल मनुजीने ही नहीं, वेदने भी यही कहा है- " सोमो नातिष्ठत य स्त्रीभ्यो गृह्यमाणः, तं घृतं वस्त्र ं कृत्वा धन निरिन्द्रियभूतमगृह्णन्, तस्पात् कोई प्र स्त्रियो निरिन्द्रिया प्रदायादीरपि पापात् पुंस उपस्तितरं वदन्ति " ( कृ.प. अर्व व तैत्तिरीयसं. ६५८२ ) यहां पर स्त्रियोंको निरिन्द्रिय होनेसे सोन इ ( वैदिक यज्ञ ) के अयोग्य ठहराया है । सोमसे यज्ञ इष्ट होता है, इसलिए निचोड़ ' वैदिक - प्रकरण ' सिद्धान्तकौमुदी ' में ' सोम्यो ब्राह्मण: ' का ' यज्ञार्हः इत्यर्थः ' जनेऊ ( ४४ । १३७ ) अर्थ किया गया है । इसी तरह " दशपुरुषानूकं यस्य गृद्रा मस्तिष= न विद्य ेरन् स सोम पिवेत् " ( महाभाष्य ४ | ११६३ ) ( यहाँपर भी " उसके ' सोमपान ' वैदिक - यज्ञका उपलक्षण है । ) इसी प्रकार " अब्राह्मणस्य सोन चुकी ह प्रतिषेधति " ( मीमां. ३१५/७ ) यहाँपर भी । जब इस प्रकार वेद स्पष्ट-रूपसे स्त्री एवं शूद्रका वेदमें अनधिकार बतला रहा है, तव वादीका ग्रह पृ. है । त कहना कि ' वेदोंमें स्त्री - शूद्रादिका वेदाध्ययनादि - अधिकारमें निषेध नहीं ' रहा स्त्र जनताको धोखा देना है । इससे पृ. १०२ में ‘ भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ( ऋ. १०/१०६४ ) बाता