सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 371–380

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 371–380

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| ६५१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६८२ । बोलना इससे वादीने स्त्रियोंका उपनयन सिद्ध करना चाहा है, पर यह बिल्कुल अपूर्णता निर्मूल है । वादी ऐसे दुस्साहस करनेका व्यसनी है । केवल शब्दमात्रको उच्चारण देखकर उसमें न होती हुई बातको भी निकालने का दुस्साहस करता है सेना - शाखिर वह भी ' तरुतारं ' तारविद्या निकालनेवालेका साम्प्रदायिक शिष्य । ) ' उससे है । इस विषयपर विचार पृ. १० ९ -११२ में देखें । श्रा जाता पृ. १०३ में ‘ या दम्पती समनसा सुनुत: ' ( ऋ. ८ ३११५ ) से वादीने आता भो अपना पक्ष सिद्ध करना चाहा है, वाढी इसपर लिखता है - ' या दम्पती... कर चुके सुनुत: ' ( ऋ. ८।३११५ ) ' बीतिहोत्रा कृतद्वसू ' ( ऋ. ८ ३१२६ ) इत्यादि अनेक वैदिक प्रमाण हैं, जिनमें स्त्रियोंके उपनयन तथा श्रग्निहोत्रादि अपूर्णता करनेका स्पष्ट प्रतिपादन हैं ' । णी माना यह वादीकी 1 भी नहीं लिखा है नातिष्ठत यहाँ ' सुनुतः ' तस्मात् कोई प्रयोजन नहीं " ( कृ.प.अर्व किया है । नेसे सोन इस विषय में बात बिल्कुल गलत है । इसमें स्त्रीका उपनयन कहीं । यह वादीकी धींगाधींगी है । का अर्थ ' सोमरसका निकालना ' है, इसमें उपनयनका । श्रीसायणने भी ' सुनुतः ' का यही ' सोमाभिषवं कुरुतः ' ' षुअ श्रभिषवे ' धातु सुप्रसिद्ध है, जिसका सोमवल्लीको इसलिए निचोड़ कर उसका रस निकालना है । सोमरस निकालनेकेलिए भला ईः इत्यर्थः नेकी क्या आवश्यकता है; क्या इस वातको समझने के लिए वादीका यस्य शूद्रा हरी मस्तिष्क असमर्थ है? हाँ, सोमयज्ञ तो पति ही करेगा । स्त्री केवल णव सोनं " उसके साथ बैठी ही रहती है । इसपर कई वार स्पष्टता की जा चुकी है । वेद सप्ट बादीका यह पृ. १०३ श्रीसायणाचार्यने स्त्रियोंके उपनयनका प्रभाव ही माना नषेध नहीं है । तब उसके वचनसे वादी बलात् उपनयन कैसे निकालता है? शेष रहा स्त्रीको यज्ञप्रिय होना, सो वह पति के साथ यज्ञमें बैठती ही है । ॥१०६॥४ ) इससे उसका उपनयन सिद्ध नहीं हो जाता । श्रीसायणका अर्थ वादी

जाता है । यह वह भी जानता है कि - श्रीसायणाचार्यने स्त्रीका उपनयन श्रीसायण स्त्रीका उपनयन नहीं मानते [ ६८३ कहीं नहीं माना । बल्कि अधिकारि - निरूपण में उसका निषेध किया है । तब स्पष्ट है कि यज्ञ पुरुष करता है, स्त्री नहीं । परन्तु ' पत्थुन संयोगे ' ( पा. ४ | १ | ३३ ) के अनुसार ' वसिष्ठस्य पत्नी ' में यह अयं किया गया है - ' वसिष्ठ - कर्तृ कयज्ञस्य फलभोक्त्री ' अर्थात् यज्ञ, पुरुष वसिष्ठजी करते हैं, पर अपने पति के साथ बैठनेमात्र से उनकी पत्नी यज्ञका फल प्राप्त कर लेती है । इसे हम कई बार स्पष्ट कर चुके हैं । यजन तो निषादस्थपतिका भी प्राता है, पर इससे उसका जनेऊ सिद्ध नहीं हो जाता । तव वचनके वलसे किसी हिजसे वा वरसे अपना वह यज्ञ करा लेती है; वह यज्ञ तत्स्वामिक हो जाता है । यह हम कई बार स्पष्ट कर चुके हैं । " वित्वा ततस्त्र " ( ऋ. १।१३१।३ ) पर दादी लिखता है - इस मन्त्रकी व्याख्या में सायणाचार्यने लिखा है- ' हे इन्द्र! स्वामुद्दिश्य " मिथुनाः ' पत्नी सहिता यजमाना यज्ञं वितन्वते । त्वं स्वर्गं गन्तुमुक्तो द्वौ जायापती संयुक्तयोरेवाभिमतं स्वर्गादिकं प्रापयसि श्रतः पत्नीसहिता अनुतिष्ठन्तीत्यर्थः ' हे इन्द्र, तेरे उद्देश्यसे पत्नी सहित यजमान श्रनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, और तू उन दोनोंकी अभिमत स्वर्गकी प्राप्ति कराता है, इसलिए वे मिलकर यज्ञ करते हैं-S इससे क्या वादी स्त्रीका उपनयन सिद्ध करना चाहता है? वस्तुतः यह गलत है, श्रीसायण स्त्रीका उपनयन नहीं मानते, तब बलात् उसके किये असे वादीकी क्या शक्ति है कि उनका उपनयन सिद्ध कर सके । यहाँ तो यजमानका यज्ञ करना दिखलाया है, स्त्री तो उसके साथ बैठी ही रहती है । आगे वादी लिखता है - ' इस अर्थकी पुष्टिमें सायणाचार्यने ' जायापती अग्निम् श्रादघीयाताम् ' वेद पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' इत्यादि मन्त्रोंको उद्धृत किया है ।

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६८४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वादीमें यह छलकी दुष्प्रकृति है कि वह जो अपनी पुष्टि के लिए किसीका वचन उद्धृत करता है, उसका पूर्वापर - प्रकरण छिपा लेता है । जनता बेचारी जो स्वयं अनुसन्धान नहीं करती; इन छलियोंके पक्षको सच्चा समझ लेती है । अब हम वह श्रीसायणका पूरा पाठ उद्धृत करते हैं । — ' न च सर्वत्र अग्निहोत्रादि - नित्यवाक्येषु काम्य वाक्येषु, नैमित्तिक-वाक्येषु च पुरुषस्यैव प्रर्थित्वादेः सद्भावात् तस्यैव श्रधिकारः स्त्रियास्तु सत्यपि अर्थित्वे श्रध्ययनाभावेन विद्वत्ताया प्रभावात् श्रतएव सामर्थ्या-भावाच्च नास्ति अधिकार इति वाच्यम् । ' ( सभी नित्य, काम्य तथा नैमित्तिक वाक्योंमें पुरुषको ही अर्थी बताया गया है; अतएव उनमें उसी पुरुषका अधिकार है, परन्तु स्त्रीके अर्थी होनेपर भी उसका अध्ययन न होनेसे विद्वत्ता न होने और सामर्थ्य न होनेसे स्त्रीका अधिकार नहीं है-. यह न कहना ) । इसपर श्रीसायण आगे कहते हैं- ' यद्यपि स्त्रियाः नास्ति पृथगधिकारः; तथापि पूर्वमीमांसायां षष्ठेधिकाराध्याये ३ य ४ र्थाभ्यामधिकरणाभ्याम् अस्त्येव स्त्रिया अधिकारः; स च पत्या सह - इति प्रपञ्चितत्वात् । ' जायापती अग्निमादधीयाताम् ' इति श्राधान - विधानात् स्मृतिषु ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं ( मनु. ५।१५५ ) इति पृथग् श्रधिकारस्यैव निवारितत्वात् । श्रस्त्येव स्त्रियाः पत्या सह अधिकारः । ( यद्यपि स्त्रीका यज्ञका पृथक् स्वतन्त्र अधिकार तो नहीं; तथापि मीमांसादर्शन में छठे अध्याय में ३ य और ४ थं ग्रधिकरणोंसे पतिके साथ ही स्त्रीका यज्ञमें अधिकार है - यह हम स्पष्ट कर चुके हैं । पति - पत्नी अग्निका प्राधान करें, इससे दोनोंका अग्निका आधान ( स्थापन ) कहा गया है । स्त्रियोंका पृथक यज्ञ वा व्रत नहीं होता, यहाँ मनुने भी स्त्रियोंका पृथक् अधिकार ही निवारित किया है; सो स्त्री पतिके साथ तो यज्ञमें सम्बद्ध हो सकती है । ) श्रीसायण स्त्रीका अध्ययन नहीं मानते [ ६८५ मागे श्रीसायण लिखते हैं- ' प्रध्ययनाऽभावेपि ' वेदं पत्न्यै वाचयेत् ' ( प्राश्व.श्री. १।११ ) इति सूत्रकार - वचनात् ' पत्नी प्रदाय नहीं इत्यादि विधिषु ' सुप्रजसस्त्वा वयम् ' ( ते.सं. १११११०११ ) इत्यादि अन्वास्ते ' बादी विधानात् यत्र वचनमस्ति; तत्र प्रस्त्येव मन्त्रे श्रधिकारः । किं मन्त्र- कन्या न कुर्यात् नास्ति वचनस्य प्रतिभारः - इति न्यायात् । हि वचनं हम तस्मात् ' मिथुना यज्ञ ' ततस्र " इत्येतद्युक्तम् ' । ( श्री सायणाचार्य कहते हैं कि - स्त्रीका श्रध्ययन तो नहीं बुद तथापि ' पत्नीको कुरा बण्डल देकर उससे मन्त्र बुलवावे हुआ करता; ' अतुट ; इस सूत्रकारके वचनसे ' पत्नी बैठी रहती है, इत्यादि विधियों में, तथा जहां स्त्रीकेलिए तस्का वचन है, वहाँ वह ' सुप्रजसस्त्वा ' इत्यादि विशेष - मन्त्र बोल सकती है । पाल्प इसपर श्रीसायण कहते हैं - विशेष मन्त्र बोलनेमें स्त्रीको भला क्या भारी भार है - इस न्यायसे उससे विशेष मन्त्र वुलवावे । ' होता तो इससे श्रीसायणाचार्य सिद्ध करते हैं कि स्त्रीका वेदाध्ययन बिहित शब्दस न होनेसे वह मन्त्र सामान्यतया तो नहीं बोल सकती; पर जहाँ उसका इसलि कहीं बोलने के लिए विशेष वचन श्रावे; उसे वह बोल सकती है; क्योंकि-कुमाय बोलनेमात्रमें उसपर कोई भार नहीं पड़ जाता । गया इसमें वादीने सायणके सिद्धान्तको छिपा लिया है । ' वेदं पत्न्यै प्रदाय ' होगा यह वचन वादीने लिखा है; इससे उसने स्त्रीका वेदाधिकार समझ लिया II है; पर उसको कदाचित् पता नहीं, कि - यहाँ ' वेद ' शब्दका कुमारी वेदपुस्तक नहीं है, किन्तु कुशाका बन्डल उसे दिया जाता है, वेदपुस्तक वादी नहीं । इस विषय में हम पृ. १८३-१८६ में स्पष्टता कर चुके हैं । पृष्ठों इसपर वादी लिखता है कि - यदि ' मन्त्रिका तु कार्येयम् ' ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां यह मनुके श्लोक वस्तुतः स्त्रियोंके उपनयन वेदाध्ययन बदलन और अग्निहोत्रका निषेध करते हैं; तो वे वेदविरुद्ध होनेसे प्रमाण श्रीर वैदिक परित्याज्य हैं । यह वादीका कथन गलत है । हम इनकी प्रमाणता और पृ. १७४- १८३ में बता चुके हैं । श्रीसायणका वचन भी इनका बाधक " विदा

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६८५ ] श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) ६८६ प्रदाय नहीं है, किन्तु उसके अनुकूल है । मनुके वचनोंको वेदविरुद्ध कहने की स्वास्ते ' छोटे मुंह बड़ी बात ' है । यदि उक्त मनुपद्य न होते तो मन्त्र. वादीकी कोई भी संस्कार न हो सकता । यह उक्त पद्यके समाधानमें ; वचनं कन्याका कर चुके हैं । हम स्पष्ट मिबुना पृ. १०५-१०६ वादी लिखता है - ' श्रमन्त्रिका तु कार्येयें स्त्रीणामा-प्रशेषतः ' । यहाँ ' श्रमन्त्रिका ' का अर्थ सर्वथा मन्त्ररहित नहीं किन्तु करता; ' अनुदरी ' (? ) कन्याकी तरह ' अल्पमन्त्रिका ' करना चाहिये |, कन्या-चकारके संस्कार में मेखला बन्धनादि विषयक कई मन्त्र छोड़ने पड़ते हैं अतः , केलिए ' मन्त्र ' कहा है । ती है । यह वादीकी बात सर्वथा गलत है । मेखलाबन्धन सब संस्कारोंमें तो - भारी होता नहीं; तब ' अल्पमन्त्रा ' अर्थ कैसे हो सकता है? परन्तु मनुजीने ठो लिखा है- ' श्रमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृद् प्रशेषतः । यहाँ ' अशेषतः ' विहिर शब्दसे सूचित होता है कि उसका कोई भी संस्कार समन्त्रक मत करो । उसका इसलिए गृह्यसूत्रमें प्रत्येक - संस्कारमें लड़कीकेलिए लिखा है- ' आवृतब क्योंकि कुमायें ' आवृताका अर्थ ' बिना मन्त्रके ' होता है । तब बादीका पक्ष कट गया । मेखलावन्धन तो उपनयनमें होता है, जब मेखलाबन्धन ही न प्रदाय ' होगा; तो उपनयन क्या होगा? ' मेखलाबन्धन ' तो इतना प्रसिद्ध है लिया कि उपनयनका नाम ही ' मेखलाबन्धन ' प्रसिद्ध है, जैसे कि - ' पुराकल्पे.. का अर्व कुमारीणां मौजी - बन्धनमिष्यते ' ग्रतः वादीका यह कथन कट गया । दपुस्तक वादीके इस पक्षका अक्षर - अक्षर निराकरण हमने इस पुष्पके १७४ -१८३ पृष्ठों किया है । बाहिको पृ. १०६ आगे वादी ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' इस मनुपद्यका अर्थ दाध्ययन बदलनेकी हास्यास्पद चेष्टा करता है— ' स्त्रियोंकी विवाहविषयक - विधि ण और बंदिक है । पतिसेवा, वेदाध्ययनाथ गुरूप्रोंके पास निवास, घरका कार्य प्रमाणता और अग्निहोत्रादि ये स्त्रियोंके कर्तव्य हैं । कुल्लूकभट्टादि - टीकाकारोंने बाघक विवाहविधिरेव ' वैदिकः संस्कारः, पतिसेवा एव गुरुकुलेवाः ' एव ' का कथन स्वाभाविक ही होता है । [ II व्याख्या ' एव ' को अपनी तरकसे जोड़ कर की है, जो इसका नहीं पाया जाता; वह उनकी कपोल - कल्पना होनेसे मूलमें कहीं इसका भी हमने अक्षर - अक्षर खण्डन श्रमान्य है ' । है । पाठक वहीँ देख ले पू. १७६-१८० में कर दिया दे सकता । वादी १०० वर्षतक भी इसका प्रत्युत्तर नहीं । पृ. १०६-१०७ आगे वादी लिखता है - ' प्रमन्त्रिका तु काय ( २६६ ) और ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' ( २६७ ) यह दोनों श्लोक प्रक्षिप्त हैं, यह इससे भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि मनु. २२६५ ' केशान्तः षोडशे वर्षे ' इस श्लोकको मनु २१६६ के ' एष प्रोक्तो के श्रीपनानिको विधि: ' इसके साथ सङ्गति मिल जाती है । द्विजातीनाम् यह वादीने श्रीतुलसीरामकी असफल चालवाजी बेली है । महाशय; २।६६-६७ यह पद्य अपवाद है; सो अपवादको काट कैसे दिया जा सकता है? उत्सर्ग- अपवादके बाद फिर श्रागेका उत्सगं माना ही हुआ, इसमें क्या नवीनता हो जाती है; और क्या प्रक्षिप्तता हा जाती है? इन छलोंसे वादीका पक्ष सिद्ध नहीं हो सकता । पृ. १०७-१०८ वादी ६६-६७ पद्यको तो प्रक्षिप्त मानता है, पर उसके बाद लिखे हुए ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा पुन्ध्योपासनमेव च । कार्य पत्न्या प्रतिदिनं वलिकर्म च नैत्यिकम् ' इस साक्षात् प्रक्षिप्त श्लोकको जो न तो मनुस्मृतिके पद्योंकी संख्या में परिगणित है; और न ही टीकाकारोंसे व्याख्यात है, उसे उद्धृत कर दिया है यह है इन लोगों की लीला । तथापि उक्त पद्य भी हमारे पक्षको कुछ भी हानि नहीं पहुंचाता । यहां अग्निहोत्रकी पत्नीकी शुश्रूषा यह है कि जो अग्नि उसके घरसे लाई हुई है, उसकी रक्षा करना कि - सदा जलती रहे उसमें उपले आदि डालते रहना यह काम स्त्रीके जिम्मे होता है । सन्ध्योपासना से वैदिक सन्ध्या पत्नीकी इष्ट नहीं होती, किन्तु भगवान् का नामस्मरणरूप सन्ध्या

श्लोकों वा हिग्दीपदों में होती है । वे स्त्रियां सवेरे - शाम अब भी करती

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६८८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रहती हैं । यहाँ पाठ ' सायमुद्वासमेव च ' था, वादीने उसके स्थान ‘ सन्ध्योपासनमेव च ' कर डाला । बलिकर्मकेलिए स्वयं मनुने कहा है-' पत्नी - प्रमन्त्र ' बलि हरेत् ' ( ३।१२१ ) अर्थात् पत्नी बलिकर्म प्रतिदिन करे, परन्तु बिना मन्त्रके ही । इससे भी वादीकी कुछ भी पक्षसिद्धि नहीं; वल्कि हमारे ही पक्षकी सिद्धि है । पृ. १७८ आगे वादीसे कुछ बन न पड़ा, तो ' अछूतोद्धार - निर्णय ' से ` कुछ शब्द लिखता है - पर यह उसके प्रणेताने बिल्कुल ही झूठ लिखा है-“ यदि आप पारस्करादि - गृह्यसूत्रोंको देखेंगे; तो उनमें कन्याके भी समस्त संस्कार समन्त्रक हो पायेंगे ' । इस विषय में पृ. २१०-२११ में हम स्पष्ट कर चुके हैं । पृ. १०६ - ११३ इसके आगे वादी आर्यसमाजी श्री भीमसेनजीके कई तर्क लिखता है । जब वे उस श्रार्यसमाजके अज्ञानसे निकल आये; सनातनधर्मी बन गये; तब उनके अज्ञानमूलक तर्कोंका क्या महत्त्व रह जाता है; तथापि उनके तर्कोंपर भी यहां विचार किया जाता है । हम इन तर्कोंका उत्तरदायित्व वादीपर ही डालते हैं; क्योंकि श्रार्यसमाजी " पं.भी.से. जी तो इस समय हैं नहीं । वे लिखते हैं-' अमन्त्रिका तु कार्येयें ' श्लोक विचारणीय है । महाशय; तर्क और प्रमाणमें ' तर्क ' का मूल्य उतना नहीं होता; जितना कि प्रमाणका । ' तर्काऽप्रतिष्ठानात् ' ( वेदा. २।१।११ ) तकं अप्रतिष्ठित हुआ करता है । केवल ' तकको ' हैतुक ' कहते हैं, ' हेतुक ' का शास्त्र में सम्मान नहीं होता । मनुस्मृति में कहा है- ' हैतुकान् वकवृत्ती श्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ' ( ४१३० ) ( तर्कियोंका वाणीमात्रसे भी प्रादर न करे ) । न्यायशास्त्र तर्कशास्त्र माना जाता है, पर वह भी तर्ककी अपेक्षा ' आगम ' को ही अधिक प्रमाणित करता है । न्यायविद्याको ' प्रान्वीक्षिकी ' कहते हैं । न्यायभाष्यकार वादिप्रतिवादिमान्य श्रीवात्स्यायनमुनि १ । १ । १ सूत्र के भाष्य में लिखते हैं ।— तर्कसे आगमकी प्रचलना ६६ ' कः पुनरयं न्याय:? प्रमाणैरथं परीक्षणं न्याय: ( प्रमाणोंसे परीक्षाका नाम ' न्याय ' कहा है, तर्क को यहाँपर नहीं पदार्थकी प्रमाणको । ) आगे वे लिखते हैं- प्रत्यक्षागमाश्रितम् अनुमानं कहा, किन्तु है । सा अन्वीक्षा प्रत्यक्षागमाभ्याम् ईक्षितस्य अन्वीक्षणमन्वीक्षा ( तर्क ) इसप । तया प्रवर्तते इति ग्रन्वीक्षिकी न्यायविद्या - न्यायशास्त्रम् । यहाँपर भी प्रत्यक्ष मन्त्र तथा आगम ( आप्तवचन ) को ही न्यायका आधार बताया है, केवल तर्कको ज्यों नहीं । आगे श्रीवात्स्यायनमुनि स्पष्टताकी सीमातीतता करते हैं— ' यत् पुनरनुमानं ( तर्कः ) प्रत्यक्षागमविरुद्ध न्यायाभासः सः इति । कन्या अर्थात् जिस न्यायमें प्रत्यक्ष तथा श्रागम ( श्राप्तवचन ) से विरुद्धता हो; शरीर वह न्याय नहीं होता, किन्तु वह ' न्यायाभात ' होता है । तव प्रमाणन यदि विरुद्ध दयानन्दी श्री भीमसेनजी का यह न्यायाभास हुआ । त्यों क तर्कपर श्रीवात्स्यायनमुनि लिखते हैं- तर्कों न प्रमाणसंगृहीतः, बात न प्रमाणान्तरम्... सोऽयमित्थम्भूतः तर्कः प्रमाणसहितो वादे साधनाय, उपालम्भाय च अर्थस्य भवति ' ( १११1१ ) ' कथं पुनरयं ( तर्कः ) तत्त्व-मन्त्रप ज्ञानार्थो न तत्त्वज्ञानमेवेति? ( उ ) अनवधारणात् मनुजानाति श्रयम् राष्ट एकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या, न तु अवधारयति - न व्यवस्यति, न निश्चिनोति अपनी एवमेव इदमिति ( १ | १ | ४० ) मन्त्रप ( तर्क कोई प्रमाण नहीं, तर्क वाद में प्रमाण सहित ही दिया जाता विरुद्ध है । तर्क कुछ निश्चित नहीं कर सकता । ) मनुजी इसलिए उपवेद में भी लिखा -'तस्मात् तिष्ठेत्तु मतिमान् श्रागमे, न तु हेतुषु ' ( सुश्रुत सूत्र. ४०।२१ ) ( बुद्धिमान् पुरुष श्रागममें आवृत रहे, तर्क में नहीं ) दयानन्दी श्रोभीमसेनजीने ' श्रमन्त्रिका तु कार्येय ' इस प्रमानको तुल्य तो नहीं माना; किन्तु केवल तर्क ही उसमें कर दिया । अतः उनका करना ' तूष्णी स्वतः पतन हो गया । इस रहा । स ० ध ० ४४ स्मृतः '

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६६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६० नदायकी श्रीभी.से. जी लिखते हैं- ' अमन्त्रिका तु कायय यह श्लोक विचारणीय किन्तु उसमें लिखा है- ' कन्याओं के संस्कार बिना मन्त्र पढ़े करने चाहियें ( तर्कः ) है । / होती है कि ऐसा क्यों करें? यदि शरीरके संस्कारमें । प्रवर्तते इसपर शङ्का भी होता है, मन्त्रपाठ का शुद्धिकेलिए सब क्रिया क्ष तथा की त्यों करे -- यह कथन विरुद्ध पड़ता है । तर्कको ज्यों यह दयानन्दीजीकी बात गलत है । जबकि पद्य में लिखा है कि-कन्याओं का सभी पूरा कृत्य विना मन्त्र के पूरा करे, इससे कन्या के : इति । शरीरका संस्कार होगा; तव उनका यह लिखना कितना बेहूदा है कि-ता हो; यदि ' शरीरके संस्कार ' में मन्त्रपाठ भी होता है; तो सव क्रिया ज्यों की प्रमाणसे त्यों करे - यह कथन विरुद्ध पड़ता है ' । यह दयानन्दजीने कितनी गलत बात लिखी है । जब मनुका वचन कहता है कि - कन्याका संस्कारादि-संगृहीतः, कृत्य तो पूरा करो, पर मन्त्र मत पढ़ो; तभी उसकी शारीरिक शुद्धि साधनाय होगी, पर दयानन्दीजीने बनावटसे लिख दिया कि शरीरके संस्कारमें = ) तत्त्व- मन्त्रपाठ भी होता है, यह अपनी कल्पनासे कैसे लिख दिया? मनुजी ति अयम् स्पष्ट कहते हैं कि - कन्याके कृत्यमें मन्त्रपाठ नहीं होता । पर दयानन्दीजी श्चिनोति अपनी इच्छानुसार कैसे लिख रहे हैं कि- कन्याके शरीरके संस्कारमें मन्त्रपाठ भी होता है । यही दयानन्दीपनकी निशानी है कि- मूलकारसे या जाता विरुद्ध अर्थ करना । तब दयानन्दीका कथन तो स्वतः विरुद्ध हो गया; मनुजीका कथन परस्पर विरुद्ध सिद्ध न हुआ । ने घृत रहे, आगे दयानन्दीजी लिखते हैं- ' यदि कदाचित् मानते हैं कि- शूद्रके प्रमाणको तुल्य स्त्रियाँ नीच हैं; तो विवाह में भी उनका मन्त्रोंसे संस्कार नहीं न्तः उन करना चाहिये ' । क्या दयानन्दीजीने यह अपवाद - वचन कभी नहीं सुना -' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज्ञ. ११२।१३ ); तब इस ग्रपवादवचनके बलसे विवाहमें स्त्रियोंको मन्त्र सुननेका कोई दोष नहीं रहा । मनुजी भी स्वयं कहते हैं- ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ( २।६७ ) यहाँ स्त्रियोंका वैवाहिक संस्कार वेदमन्त्रोंसे माना है; स्त्रियाँ निरिन्द्रिय होनेसे ' मन्त्रहीन ' हैं [ ६६१ अतः वादीका प्रश्न ही नहीं बन सकता । हम भी स्त्रीको शूद्र नहीं कहते, किन्तु उपनयनादिके प्रभावके श्रंशमें उसे शास्त्रमें ' वति ' प्रत्ययसे सर्वसाम्य नहीं हो जाता । शूद्रवत् कहा है । वद् वर्तते ' सो उसे विवक्षित किसीको कहा जावे- " प्रयं पशु-- अंशमें पशु - जैसा माना जाता है, सर्वामें नहीं । नहीं तो फिर उस पुरुषको खली - भूसा भी खिला दिया जाया करे । पर वैसा नहीं होता । सो स्त्री, शुद्र नहीं है, शूद्रवत् है । सो वेदमन्त्रोंके सुनने में वा विशेष वचनवश कोई मन्त्र बोलनेका उसे निषेध नहीं हो जाता । जोकि आगे दयानन्दीजी कहते हैं- ' यदि वेद पढ़ने वा सुननेका स्त्रियोंको अधिकार न हो; तो वेदमें भी निषेध मिलना चाहिये; सो नहीं दीखता ' इससे मालूम होता है- दयानन्दीजीको उस समय वेदका ज्ञान भी पूरा नहीं था । देखिये वेदमें ' काष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घदमयः ' ( अं. ११।५।६ ) सो कोई भी स्त्री कृष्णमृगचमंको नहीं पहरती; उपनयनकी दीक्षा नहीं लेती; वह त्रिकालमें भी दीर्घश्मश्रु तो क्या; ' मधुमती ' भी नहीं है । इस विषय में हम पृ. ६५-७२ में स्पष्टता कर चुके हैं । श्रागे दयानन्दीजी लिखते हैं- ' यदि कोई कहे- ' स्त्रियोंको वेद पढ़ाना चाहिये ' ऐसा वेदमें विधान भी नहीं मिलता । इसपर देखिये - वे कितना लचर उत्तर देते हैं - ' जैसा विधान पुरुषों को मिलता है, वैसा ही स्त्रियोंके लिए है ' । यह बात वादीकी गलत है; तभी तो मनुजीने कहा है - ' निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियों ( 1१८ ) इन्द्रियसे यहाँ ' शुक्र ' इष्ट है, सो स्त्रियाँ शुक्रसे हीन हैं । शुक्र न होने से उनमें उनकी मूछें भी नहीं होतीं; यह अपूर्णताका चिन्ह है; अतः उनमें पूरे स्वर भी नहीं होते, किन्तु पञ्चम- स्वर ही प्रधान होता है । तब सामान्यतया स्वरंहीन मन्त्रोच्चारण कराना ' अपवादको छोड़कर उनकेलिए ' उपयोगी ' नहीं, किन्तु हानिकारक भी है । आगे दयानन्दीजी कहते हैं— ' जो - जो कर्म वेदादिशास्त्रोंमें ब्राह्मणादि-

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६ ९ २ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वर्णोंको कर्तव्य मानकर कहे गये हैं, वे वे उन उनकी स्त्रियोंको भी वैसे ही कर्तव्य हैं; क्योंकि स्त्री - पुरुषकी अर्धाङ्गी है । स्त्री - पुरुष दोनों मिलकर पूरे हैं; एक - एक अधूरे हैं, इसलिए जहाँ पुरुषको अधिकार है; वहाँ उसकी स्त्रीको अवश्य होना चाहिये '! यह वादीका स्वयं विषम-उपन्यास है । वादीने स्वयं पति - पत्नीको पृथक् - पृथक् अधूरा माना है । तब याद दोनों विद्या पढेंगे; दोनों अधूरे अधूरे कैसे रह जावेंगे, तब तो दोनों पूर्ण - पूर्ण हो जायेंगे । अतः वादीका यह विषम उपन्यास सिद्ध । दोनों समान विद्वान् हो जाएंगे; तो गुरु - शिष्यभाव नहीं रह हुआ सकेगा । ऐसा है, तो पुरुष विद्या पढ़ेगा; पर सेवा नहीं करेगा । स्त्री सेवा करेगी जब; पर विद्या नहीं पढ़ेगी । तब मिलकर स्वतः दोनोंकी पूर्णता हो जावेगी । पुरुष गर्भ कर सकता है, पर गर्भ धारण नहीं कर सकता । स्त्री गर्भधारण कर सकती है; पर किसी स्त्रीके गर्भ नहीं कर सकती । इससे हुआ कि -स्त्रीका कार्य पुरुषकी सेवा है; शेष सभी यज्ञादि कर्म स्पष्ट पुरुषके हैं । दोनोंको यदि सभी समान कर्म दे दिये जाएं; तो स्वस्वामि-भावसम्बन्ध नहीं हो सकता । पुरुष यज्ञ करेगा; स्त्री सामग्री बनावेगी, घी देखेगी । लकड़ियां काटेगी; अग्निको वुझने नहीं देगी । इसीसे मिलकर पूर्णता होगी । आगे दयानन्दीजी लिखते हैं- ' जब स्त्री - शरीरसे बने हुए बालकों का अधिकार है; तो उन वालकोंकी उपादानकारणस्वरूप स्त्रियोंका अधिकार न माना जाय, यह पक्षपातमात्र है ' । केवल - स्त्रीके दशरीरसे बच्चा नहीं बनता; पुरुषका भाग भी उसमें प्रमुख होता है । वह पुरुषके भागसे वेदादिका अधिकार लेता है, स्त्रीके भागसे नहीं । स्त्रीके भागसे तो लड़कीको गर्भ तथा प्रसवादि प्राप्त होते हैं, यह वादीके निस्सार - तर्क हैं । ' तस्मात् तिष्ठेत्तु मतिमान् ग्रागमे, नतु हेतुषु ' ( सुश्रुत सूत्र. ४०।२१ ) क्षेत्र और वीजमें बीज उत्कृष्ट होता है [ ६२३ ६६४ जोकि वादी कहता है कि स्त्री - पुरुष जैसे भोजनादि आचरणादि करते हैं, उनका पुत्र भी वैसा होता है । तथा अभिम ' आहाराचार चेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितो । स्त्रीषु सौ समुपेयातां यह वादीने निकल पुत्रोपि तादृशः सुश्रुत शारीरस्थानके पद्यका भाव दिया है, पर सूत्रों तयोः स्त्रीकेलिए वेदादिका अध्ययन तथा उपनयनादि नहीं लिखा है अविद्र । अतः सकती वादीका पक्ष कट गया । जोकि आगे वादी लिखता है - ' पुरुष ' शरीरमें जितना रस - विर योनि मांसादि धातुओंका समुदाय है, वह बाल्यावस्था में माताके शरीरसे भ्राता हैं ', यह बात ठीक नहीं । स्त्री तो उत्पादनका यन्त्र है, प्रमुख भाग पुरुषके जैसे शुक्र श्राता है । शुक्र सातों धातुप्रोंका समुदाय है, पर स्त्री में केवल तीन f-धातुका ही समुदाय है । पृथ्वी जैसे उत्पादक यन्त्र है, उसमें बीज हो योनिक सही उत्पत्ति करता है । भूमिके निकृष्ट होने पर भी वोजकी उत्तमता योनिग पदार्थ उत्तम उत्पन्न होता है, तब वादीका यह कथन कि - यदि स्त्री गुणोंक वेदादि न पढ़ने से निकृष्ट है, तो उसका बच्चा उत्तम कैसे हो सकता है? ' योजक कट गया । प्रभावI यह याद रखना चाहिये कि स्त्री क्षेत्ररूप है, और • पुरुष बीज स्त्री भI है । मनुजीने कहा है- क्षेत्रभूता स्मृता नारी वीजभूतः स्मृतः पुनान् । क्षेत्र-वीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ' ( ३३ ) । वीजन्य चैत्र योन्याव दिया; बीजमुत्कृष्टमुच्यते । सर्वभूतप्रसूतिर्हि वीजलक्षणलक्षिता ' ( १३३ ) सकती ( बीज और योनि ( क्षेत्र ) इन दोनों के बीचमें बीज उत्कृष्ट मानरा कार्यय जाता है । सब प्राणियोंकी पैदायश वीजसे ही होती है; तव बादीन भान्ति श्राक्षेप कट गया । पति वेदादिका विद्वान् हो; स्त्री यदि वेदादिको विदुषी नहीं है; तथापि पतिसे सुननेसे उसकी सन्तानपर प्रभाव पड़ता कार्येय मनुम्म है । तो सुभद्रा सैनिक - व्यूहोंके विषय में अनजान थी, अर्जुन चक्र इस प्रवेशका ढंग सुभद्राको सुना रहे थे; उसके प्रभावस्वरूप लड़न

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६१४ ] दि तपा भी चक्रव्यूह भेदन करनेवाला बना । हवादीने frey का ढंग सुभद्राको सुना रहे थे; तो उसे निकलने तांतबो: अभिमन्यु भी चक्रव्यूहसे निकल न उससे उत्पन्न सुश्रुतरं होनेपर भी पतिको विद्वत्तासे सन्तान विदुषी है । ग्रतः सकती है । दयानन्दी श्री भीमसेनजीके तर्क खण्डित जब अर्जुन चक्रव्यूह से नोन्द प्रा गई; तब सका । फलतः स्त्री भी वैसी विद्वान् बन हो गये । दयानन्दी श्री भीमसेनजी ने लिखा था- ' इयं भूमिहि भूतानां शाश्वती रस - विर. योनिरुच्यते ' इति मानववचनेन ज्ञायते अन्नस्य पृथिवीव मनुष्याणा-रसे बादा मुत्पादिका स्त्री ' परन्तु इसका उत्तरार्ध दयानन्दीजीने छिपा दिया था, पुरुषके जैसे कि प्राय सभी दयानन्दियोंकी यह दुष्प्रकृति है । उत्तरार्ध यह था केवल तीन कि - ' न च योनिगुणान्, काँश्चिद् वीजं पुष्यति पुष्टिषु ' ( १।३७ ) ( वीज-में बीज हो योनिके गुणोंको नहीं लेता । ) इसपर श्रीकुल्लू कभट्टने लिखा है- ' तस्माद् उत्तमताले योनिगुणानुवर्तनाऽभावाद् न क्षेत्रप्राधान्यम् ' ( अर्थात् सन्तानमें योनिके यदि स्त्री गुणोंका अनुवर्तन नहीं होता; अतः क्षेत्रकी प्रधानता नहीं होती; किन्तु कता है? ' वीजकी ही प्रधानता होती है । तब सन्तानपर वीज ( पुरुष ) का ही प्रभाव पड़ेगा; क्षेत्र ( स्त्री ) का उतना नहीं । इससे श्रावश्यक नहीं कि-वीजस स्त्री भी वेद पढ़ी हुई हो, पुरुषकी वेद - विद्वत्तासे सन्तान प्रभावित होगी ॥। | क्षेत्र-- इस प्रकार दयानन्दी भीमसेनजीका जव मनुजीने कचूमर निकाल ) दिया; तभी उन्हें सनातनधर्मी बनना पड़ा । तब उनकी शक्ति नहीं हो ( ३५ कृष्ट माना सकती कि इत्थं पुरुषवत् स्त्रीणामपि अधिकारे सिद्ध े ' अमन्त्रिका तु तव दादीश कायॅय ' इति ६६ पद्य प्रक्षिप्तमिति प्रतिभाति ' ( इस प्रकार पुरुषकी वेदादि भान्ति स्त्रीके भी अधिकार सिद्ध होनेसे ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' यह प्रभाव पड़ता मनुस्मृतिका पद्य प्रक्षिप्त मालूम होता है कि- मनुजी के ' अमन्त्रिका तु कार्येयें ' इन पद्यको प्रक्षिप्त कह सकें । यदि वे इस पद्यको प्रक्षिप्त मानेंगे, तो लड़कीका कोई भी संस्कार मनुस्मृतिके अनुसार हो ही नहीं सकता । रूप लड़ इस विषयकी स्पष्टता इसी पुष्पके पृ. १७४-१८३ में देखें । लड़की - सम्बन्धी अङ्गीकार्य मन्त्ररहित होते हैं [ ६ ९ ५ यद्यपि श्रायसमाजी- भीमसेनजीका मानवधर्म - मीमांसाके उपोद्घात में स्थित लेख हम माननेको बाध्य नहीं थे; परन्तु वादीने उनके इस लेखको अकाट्य समझ रखा था - यह उन्हें व्यामोह न रह जावे; श्रतः हमने उनके लेखका अक्षर - अक्षर खण्डित कर दिया । अपने अज्ञानको वे जानते थे, अतः उन्होंने प्रार्यसमाजरूप अज्ञानको छोड़कर पीछे सनातनधर्मकी शरण ले ली । अव वादी समझ गया होगा कि उनका यह लेख युक्तियुक्त तथा महत्त्वपूर्ण सिद्ध न होकर ' निकम्मा ' ही सिद्ध हुआ । पृ. ११४- १२२ वादी आगे लाचारीसे लड़कियोंके संस्कारोंमें मन्त्र न बोलना मानता है; पर होम समन्त्रक दिखलाता है । पहले वहां म.म. श्रीमित्र मिश्रके ' वीर मित्रोदय ' का मत देता है - ' अथ स्त्रीणां जात-कर्म । तत्र मनुः - ' अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणानावृद् श्रशेषतः ' गोभिलोपि-' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां मन्त्रेण तु होमः इति होमपदं स्वस्ति-वाचनादीनाम् अङ्गानामुपलक्षणम्, तेन तान्यपि समन्त्राणि भवन्ति ' ( लड़कियोंकी जातकर्मादि क्रिया तो मन्त्ररहित करें, पर होम समन्त्रक होना चाहिये । यहाँ मित्रमित्र होमसे स्वस्तिवाचनादि श्रङ्ग - क्रियाओंका उपलक्षण मानते हैं । ) वे लिखते हैं-' अमन्त्रकत्वस्य यज्ञाथर्वणे वै काम्या इष्टयः, ता उपांशु कर्तव्याः I ( पू. मी. ३।८।१६ ) प्रधानमात्रघर्मत्वात् । ततश्चात्र घृतमधुप्राशनादि-मन्त्राणामेव निवृत्तिः, न श्रङ्गमन्त्राणाम् ' । याज्ञवल्क्योपि - ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' ( संस्कारप्रकाश पृ. १०४ ) । इससे श्री मित्रमिश्रने बताया है कि - लड़कियोंके जो प्रधान - संस्कार आदि कृत्य हैं; वे तो विना मन्त्रके करावे; पर जिनका लड़कियोंने सीधा सम्बन्ध नहीं, वे अङ्गकार्य, स्वस्तिवाचन आदि समन्त्रक होने चाहियें ।

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६६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इससे भी वादीका हो पक्ष कटा । क्योंकि जो जातकर्मादि प्रधान-संस्कारकृत्य जिसमें मधु आदिका प्राशन है - वे लड़कियों के श्रमन्त्रक ही होते हैं, इससे लड़कोफी श्रमन्त्रकता स्वतः सिद्ध हो गई । होम तथा स्वस्तिवाचंन तो अङ्गकार्य हैं; यह तो सर्वत्र हुआ करते हैं. उनका लड़की से कोई सीधा सम्वन्ध नहीं; अतः उनकी समन्त्रकतामें लड़कियोंके कर्मकी समन्त्रकता सिद्ध न हुई । हां, विवाह में अपवादरूपतावश लड़कियोंका संस्कार भी समन्त्रक माना जाता है । अपवादसे व्यवस्था नहीं होती है, किन्तु उत्सगंसे ही । उसका कारण यह है कि स्त्रीका विवाह उसके द्विजत्वार्थं उसका उपनयन- स्थानीय होता है, वास्तविक उपनयन लड़कियोंका न होनेसे उपनयनमूलक सारे अधिकार तो लड़कियोंको नहीं मिलते; पर उपनयन - स्थानीयतावश उन्हें विना भी साक्षात् उपनयन के द्विजकल्पता प्राप्त हो जाती है । इससे वह विवाह तथा वैवाहिक -यज्ञार्थं कई विशेष मन्त्र पति वा पुरोहितके आश्रयसे वोल सकती है । यदि उसका वेदों में अधिकार निर्बाध होता; तो उसका जनेऊ भी साक्षात् होता; पर वह किसी भी शास्त्रसे प्रभ्यनुज्ञात नहीं; क्योंकि-जनेऊ ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भमें होता है, ब्रह्मचर्याश्रमकी समाप्ति एवं विवाहारम्भमें भला जनेऊ कैसे हो? सो स्त्रीके द्विजत्वार्थ तथा विवाह उत्पत्तिमूलक भावी सन्तानादिका विचार करके उसे कई स्वविषयक मन्त्रोंकी वर आदिकी सहायतासे बोलनेकी प्रभ्यनुज्ञा प्राप्त हो जाती है. पर साक्षात् उपनयन - संस्कार न होनेसे उसे ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) इस मनुके वचनानुसार सीधा वेदमें अधिकार नहीं हो जाता । यह है सनातनधर्मकी शास्त्रानुसारिणी प्रकाट्य व्यवस्था । अतः इससे वादीकी पक्षसिद्धि थोड़ी भी नहीं । पृ. ११५ वादी स्त्रीके चूडाकर्म में श्रीमित्रमिश्रका वचन उद्धृत करता है - प्राश्वलायनगृह्य पि - प्रावृतंव कुमार्या इति ' ( लड़कीका विना मन्त्रके लड़कियोंके मुख्य कर्म मन्त्रक होते हैं । [ ६६ चूडाकरण करो । स्मृतिरपि श्रह - ' हुतकृत्यं तु पुंवत् चूडाकृतावपि । हुत - कृत्यं होमः । पुंवत् समन्त्रकः । तेन स्यात् स्त्री । व्याख्या श्रमन्त्रकम् इत्युक्त प्राक् । इससे श्रीमित्र मिश्र ने सिद्ध किया श्राधानमात्रम् । प्रमन्त्रिक लड़कियोंका प्रधान संस्कार तो अमन्त्रक ही होता है । है कि प्रधान - क परन्तु होमकी समन्त्रकतामें हम पहले स्पष्टता कर चुके हैं । वादीको पक्षको मानना पड़ा कि स्त्रियोंके चूडाकर्म में भी हवन मन्त्र सहित भी स्वयं कह केवल कुछ प्रधानक्रिया चुपचाप कर दी जाती हैं । ) यहां वादी होता है, । प्रकाण्ड-बिल्ली ' बन गया है । यहां उसके " केवल - कुछ ' यह शब्द चित्य ' भोगी- मनुबचन हूँ, दे ही चुन प्रधानकृत्य उस लड़कीका ' केवल कुछ ' नहीं, किन्तु पूराका पूरा भ रहितही होता है । इससे वादीका पक्ष कट गया । यह पृ. ११६ आगे वादी हरिहराचार्यका भाष्य उद्धृत सहित ' एतानि जातकर्मादि - चूडाकरणान्तानि कर्माणि श्रमन्त्रकाणि करता है- इसे सि कार्याणि । रहा है । तदुक्त कारिकायाम् - जातकर्मादिकाः स्त्रीणां चूडाकर्मान्तिकाः क्रियाः । तृणां सिद्ध हो होमे तु मन्त्रः स्यात् इति गोभिल - भाषितम् ' । इससे वादीका तथा अछूतो लड़की का द्धार प्रणेता तर्क रत्नजीका स्पष्ट खण्डन हो गया, जो कहते हैं कि-' लड़कियोंके सभी संस्कार गृह्यसूत्रों में समन्त्रक लिखे हैं- ' सो यह बात भी पृ. ' श्रमन्त्रि पूर्वसदृश हुई - उसपर पूर्व स्पष्टता कर ही चुके हैं । वादीने स्वयं मान उपनयन-लिया कि - ' जातकर्मसे चूडाकर्म तक स्त्रियकी प्रधान क्रियाएं चुपचाप श्रमित्र की जाती हैं, किन्तु प्रङ्गभूत हवन तो मन्त्र सहित ही करना चाहिये । संस्कार-वाली बात मान्य होती है, अङ्गवाली नहीं । यहाँ उ प्रागे वादी प्रयोग पारिजातका वचन देता है - ' होमस्तु समन्वर! ' इससे सिद्ध हुया कि - लड़कियोंके संस्कारोंकी प्रधान क्रियाएं श्रमन्त्रक उद्योवध्व ही होती हैं । श्रङ्गहोमादि क्रियाका लड़कीसे सम्बन्ध न होनेसे केशव है- स्त्रिय देवताओंसे सम्बन्ध होनेसे समन्त्रकता होती है । इससे बेचारे वादीका । ब्रह्मवादि 0 पक्ष ही छिन्न - भिन्न हो गया । वधु आगे फिर वादी टीकाकार - राघवका ' अमन्त्रिका तु कार्येयें सेचन कर

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श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) [ fa E J उद्धरण देता है- ' श्रावृत् - जातकर्मादि क्रियाकलाप परिपाटी घानमात्रम् स्त्रीम बाल्याका । अनुपयुक्ता होमास्तु समन्त्रका एव । सो होम वहीं संस्कारका है कि- । प्रमन्त्रिका नहीं; किन्तु अङ्ग ( गौण ) कार्य है । अतः उसमें हमारे श्रङ्गपूर प्रधान कार्य ई भी क्षति नहीं पड़ती । अतः उसे ' अनुपयुक्त ' कहा है । कभी स्वयं पक्षकी कुछ वादी मन्त्रिका तु कार्येय ' इस मनुपद्यकी प्रक्षिप्तताका कहाँ होता है, - ताण्डव कर रहा था; कहाँ अव उसे अपने अनुसार प्रक्षिप्त भी दी ' भोगो- प्रकाण्ड aar को ठीक मान रहा है । हवनकी समन्त्रकताका प्रत्युत्तर हम पहले चिन्त्य देही चुके हैं । पूरा मन्त्र- यह जो वादी लिखता है - ' अन्य संस्कारोंमें भी हवनादि सव मन्त्र-माहित होते हैं, फिर वैदिक कर्मकाण्ड में इससे लड़कियोंका अनधिकार करता है- कैसे सिद्ध हुआ? ' यहाँ वादी जानता - बूझता हुआ भी मनचला - सा बन कार्याणि रहा है । अरे भाई; लड़की के जब प्रधान कार्य संस्कारमें मन्त्रवर्जितता = याः । तृणों, सिद्ध हो गई; तब हमारा पक्ष ही सिद्ध हुआ । अङ्गकार्य - हवनादिसे तथा अछूतो. लड़कीका कुछ भी सम्बन्ध नहीं । वह तो देवकार्य है । हते हैं कि- पृ. ११० -१२२ आगे वादी लिखता है - ' दूसरा प्रश्न यह है कि यह बात भी ' भ्रमन्त्रिका तु कार्येयें ' इस श्लोकको मनुजीका वचन माननेपर उसमें स्वयं भार उपनयन संस्कारका भी समावेश है या नहीं? इस विषय में म.म. एं चुपचार श्रमित्र मिश्र के ' वीरमित्रोदय ' के संस्कारप्र. में और विद्वद्वर श्रीरामकृष्णके T चाहिये । संस्कार गणपति ' में विशेष विमर्श किया गया है; जिसे उपयोगी होनेसे यहाँ उद्धृत किया जाता --समन्व ' अथ स्त्र्युपनयनम् । तत्र हारीत: - द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः एं श्रमन्त्रक महोबध्वश्च... इत्यादि । ( स्त्रियोंके उपनयनके विषय में हारीतने कहा होनेसे केव है- स्त्रियां दो प्रकारकी होती हैं । ब्रह्मवादिनी, तथा सद्योवधू । उनमें चारे वादीका ब्रह्मवादिनियोंका उपनयन, वेदाध्ययन, घरमें भिक्षादि नियम होते हैं । पोवधुओं का विवाहकाल उपस्थित होनेपर किसी प्रकार उपनयन-काय को मान कर उनका विवाह कर देना चाहिये I । यमने भी कुमारियोंका मित्रमिश्रके लेखकी आलोचना [ ६६ ९ मौजीबन्धन और वेदों का पढ़ाना सावित्रीवाचन कहा है । उसे पिता, वा चाचा वा भ्राता ही पढ़ावे, दूसरा नहीं । अपने घर में ही यह भिक्षा मांगती है । मृगचर्म न पहरे, वृक्षकी छाल न पहरे, जटा न रखे, इसका पूरा प्रत्युत्तर हम पृ. ८०-६६ में दे ही चुके हैं । यमपि - ' पुरा कल्पे कुमारीणाम्, इत्यादि । पुराकल्पेऽर्थवादविशेषे । तत्र प्रर्थवादिकविधेः सार्वकालिकत्वे शिष्ट - स्मृति - विरोधदर्शनात्-कल्पान्तरे - इति स्मृतिचन्द्रिकारः । पित्रादिरेव एनामध्यापयेद् नापरः - इति श्रन्वयः । मनुरपि - ' प्राङ् नाभिवर्धनात् पुंसः इत्युपक्रम्य नामकरणादि-केशान्तान् पुरुष - संस्कारान् विधाय अन्ते पूर्वोक्तसंस्कारेतिकर्तव्यतां स्त्रीषु प्रतिदिशति - ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' स्त्रीणामावृद श्रशेषतः इत्यादि । श्रत्र इयमिति सर्वनाम्ना बुद्धिस्थ परामशात् सप्तानां च सस्काराणां वुद्धिस्थतया उपनयनस्यापि तदन्तर्गततया प्रतिदेशात् स्त्रीणामपि अमन्त्रक-मुपनयनं सिध्यति । मनुने भी कहा है- ' नाभि काटने से पूर्व पुरुष बच्चेके संस्कार करें, फिर लड़कीके भी वे बिना मन्त्रके करे । यहाँ ' इयं ' से लात संस्कार कहे, उनमें उपनयन भी गिना गया है, अतः लड़कियोंका उपनयन भी बिना मन्त्र के सिद्ध हो जाता है 1 ) अब हम श्री मित्र मिश्र के लेखकी आलोचना करते हैं । उनसे कहा हुआ लड़कियोंको प्रमन्त्रक भी उपनयन मनुस्मृतिसे विरुद्ध ही है । मनु-स्मृति स्त्रियोंका उपनयन एवं वेदाध्ययन स्वीकृत नहीं करती - यह हम पहले सिद्ध कर ही चुके हैं । ' मन्त्रिका तु कार्येयें ' ( मनु. २२६६ ) में यद्यपि उपनयनान्त-संस्कारोंका ग्रहण प्राप्त ० था, तथापि ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' ( मनु. २।६७ ) इस अग्रिमपद्यसे स्त्रीके विवाहको वैदिक - संस्कार उपनयन के स्थानापन्न कहे होनेसे पूर्व पद्यमें उपनयनके सर्वया निवृत्त हो जाने से

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७०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पूर्वपद्य में स्त्रियोंके चूडाकरणान्त ही संस्कारोंकी श्रमन्त्रकता सिद्ध होती है । स्त्रीका प्रमन्त्रक भी उपनयन इष्ट नहीं है । मित्रमि आगे कहते हैं -- ये तु चूडान्तानामेव इदमा परामर्शो नोपनयन- केशान्तयोः इति मन्यन्ते तेषामसम्वन्धि व्यवधानेन विच्छिन्न-बुद्धीनां पराणं वदतां कथमिव लज्जा न श्राननम् आनमयति ' । इसका अर्थ वादीने यह किया है- जो चूडाकर्म पर्यन्त - संस्कारोंका ग्रहण है, उपनयन और केशान्तका नहीं, ऐसा कहते हैं, क्यों नहीं उन भ्रष्ट बुद्धिवाले लोगोंको कुछ भी लज्जा प्राती । ) यहां पर वादीने ' असम्बन्धि - व्यवधानेन विच्छिन्न - बुद्धीनां परामर्शं वदतां इस मित्र मिश्रके वाक्यका अर्थ नहीं किया । उसने स्वयं जाना होगा कि इसमें मित्र-मिश्रजीने चूडाकरण तकका ग्रहण करनेवालोंको केवल गाली ही दे दीं है, उसमें उल्लेखनीय कुछ भी उपपत्ति नहीं दी । अतः उनका पक्ष निरुपपत्तिक सिद्ध है । तब उन स्त्रियोंका उपनयन मन्त्रक भी नहीं होता । वे स्त्रियां तो मनुके अनुसार ' निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रिय: ' ( ६।५८ ) पहले से ही प्रमन्त्रिका हैं- वेदमन्त्रकी अधिकारिणी नहीं हैं; तब उनका मन्त्रहीन उपनयन भी अनर्थक ही सिद्ध होगा । हो उपनयन; पर वह मन्त्रोंका अधिकार न दिलावे, वह उपनयन हो क्या हुआ? इस प्रकार मनुके पद्योंमें स्त्रियोंके उपनयनाधिकारकी सङ्गति अन्वित नहीं होती । आगे वादी श्रीमित्रमिश्रका यह वचन उद्धृत करता है- ' अथ तूष्णी-मेताः क्रियाः स्त्रीणां इति याज्ञवल्क्यैकवाक्यतया ' चूडान्तानामेव [ संस्काराणां ] परामर्शो नोपनयनान्तानामिति; तर्हि यमहारीतैक--वाक्यतया उपनयनपरामर्शोपि कथं नाङ्गीक्रियते? ( यदि कहो कि - याज्ञवल्क्यके वचनके माथ एकवाक्यता या समन्वय करने केलिए ' इयं ' से चूडाकरणान्त संस्कारोंकी पद्धतिका ग्रहण होगा; तो यम और हारीतके साथ समन्वय करनेकेलिए क्यों नहीं ' इयं ' से उप-मित्रमिश्रके मतका खण्डन [ ७०१ ७०२ / नयनान्त संस्कार - पद्धतिका ग्रहण किया जावे? ) । यह श्री मित्र मिश्रका सन्दर्भ जिस हारीतके वचनके वलसे उ.प्र. में किया गया है, उससे विरुद्ध भी है; क्योंकि हारीत तो ब्रह्मवादिनियोंका उपन्यस्त यदि वह यावज्जीवन विवाह ही नहीं मानते, वे उन्हें सारी श्रायु कुमारी उरस्थित स्वीकृत करते हैं । तब यह सर्वसाधारण- स्त्रियोंका विषय न रहना हो करावेंगे, क्योंकि अरबों - खरबों में कोई कदाचित् एक ही स्त्री मिले जो विवाह रहा; करावेगे न करे । शेष सद्योवधु रह जाती हैं; उनका उपनयन तो वैघ कोई होता समावर्तन ही नहीं; वहाँपर उनका पतिके पास वैध ले जाना और उससे उपवस्त्र प्रन्थियां मिलना; उसे ही जनेऊकी भांति लपेट लेना - यही उपनयन होता है, सतय यह वैध - उपनयन नहीं होता । ' मन्त्रोपनीता ' ( वसिष्ठ १७ । ३४ ) ब्रह्मवादिन इत्यादि उसके ज्ञापक शब्द हैं । यहाँ यह अर्थ मित्र मिश्र भी स्वीकृत निजीक नहीं करेंगे कि वह मन्त्रसे जनेऊ की गई । किन्तु यही मानेंगे कि वह इधर मन्त्रपूर्वक पतिके पास ( उपनीता ) विधिपूर्वक ले जाई गई हुई ) । उन्होंने उन तव उन सद्योवधुनों के लिए भी ' प्राग् रजोदर्शनात् समावर्तनं, प्रागेव समावर्तन होता है । रजोदर्शनाद् विवाहश्च ' यह मित्रमिश्र के द्वारा कहा हुधा वचन निर्मूल को एकव ही है । ब्रह्मवादिनियों का तो न कहीं समावर्तन कहा गया है; और न कभी विवाह? न्यूनसे न्यून एक वेद पठनार्थं स्मृतिप्रणेता नौ वर्ष की अवधि दा वह हैं । यदि ब्रह्मवादिनियोंको श्रमन्त्रक या समन्त्रक उपनयत है, उसके वैदिक स्म विधानान्य बाद उनका वेदाध्ययन है; और रजोदर्शनसे पूर्व उनका समावर्तन वा निहित उप विवाह है, तो मित्र मिश्र के मतमें प्रसङ्गति प्रा पड़ती है । रजोदर्शन रितार्थत्व १२ वें वर्ष के बाद हो जाता है; तब वह ब्रह्मवादिनी क्या १२ वर्ष तक वेदाध्ययन पूरा कर लेगी? यह कितनी भारी प्रसङ्गति है? क्योंकि ( वैवा उनके मत में ब्रह्मवादिनी लड़कियोंका उपनयन वें वर्ष में हो, उस म उनका चूडा यह उनका वेदारम्भ तथा वेदाङ्गों का अध्ययन होगा । इस प्रकार पार अयनाभ वर्ष से अधिक इधर ही लग जायेंगे । इसपर वादी भी अपने चाचा लिए म