सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 381–390
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 381–390
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७०२ ] समुल्लास में अपने स्वामीजीकी ' पठन - पाठन विधि ' देख ले उपन्यस्त उ.प्र. में ३ य बात न माने तो । तब उन लड़कियोंका रजोदर्शन, नियोंका यदि वह हमारी जानेसे मित्रमिश्रजी कब उन लड़कियोंका वेदाध्ययन रहना हो उरस्थित हो श्रोर कब उनका समावर्तन ( शिरोमुण्डन ) और विवाह न रहा करावेंगे,? क्योंकि श्री मित्र मिश्रजी रजोदर्शनसे जो विवाह | करावेंगे चाहते हैं; सो महाराज शास्त्रविरुद्ध कोई होता समावर्तन धागे श्रा उपस्थित होती हैं; जो सुलझ नहीं उपवस्त्र ग्रन्थियां अपनी बुद्धिका दुरुपयोग मत करें । होता है | वसत प्रयमें यावज्जीवन विवाह ही नहीं करती; १७७३४ ) | महावादिनी यह अकाण्ड - ताण्डव कैसा? निजीका स्वीकृत पूर्व लड़कियों का श्रर्थं करनेसे ये ही सकतीं । सो आप हारीतके अनुसार तब उसके विरुद्ध इधर मिश्रजीने सद्योवधुओं का विवाहकालमें उपनयन कहा है । वहां कि वह " उन्होंने उनका वेदारम्भ तो माना नहीं । तब उन कन्याओं का सद्यः-समावर्तन ही कैसे होगा? समावर्तन वेद - विद्याकी समाप्तिका नाम नं, प्रागेव। होता है । जिसमें मुण्डन हुआ करता है । तब आप हारीत -यम श्रादि वन निर्मू को एकवाक्यतासे मनुके वचनमें चूडाकरणान्तके स्थान ' उपनयनान्त ' और न कभी कर ही नहीं सकते । विधि बनाते वह जो मित्र मिश्रने कहा है - ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक स्मृतः । इति अग्रेोतनवाक्येन विवाहस्य उपनयन - स्थानापत्ति-है, उनके मावर्तनवा विधानान्यथानुपपत्त्या इदमः सङ्कोच इति न वाच्यम् । तस्य स्मृत्यन्तरा-रजोदर्शन | निहित उपनयनाभावपक्षे विवाहस्य तत्स्थानापत्ति - विधायकत्वेनापि २ वर्ष तक चरितार्थत्वाद् न इदमः संकोचः ' । ? क्योंकि- ( वैवाहिको विधि: स्त्रीणां इस अगले मनुपद्यसे सङ्गत्यर्थं ' इयं ' के उस समय चूडाकरण तक संकोच करना चाहिये - यह कहना भी ठीक नहीं । अकार चा का यह अभिप्राय लिया जा सकता है कि किसी अन्य स्मृतिका स्त्रीके आचारी यनाभावका पक्ष हो; उसकी दृष्टिसे विवाह उपनयन - स्थानीय है; धतिए मनुके वाक्यमें ' इयं ' से चूडाकर्म तकका संकोच नहीं, उपनयनका सभी टीकाकार हमारे पक्षके हैं [ ७०३ भी उसमें ग्रहण है । ) T यह श्रमित्रमिश्रका वचन कितना हास्यास्पद है? महाराज याद रखो कि - ' अनन्तरस्य विधिर्वा प्रतिषेधो! यह की होती है, निषेध वा ' ( विधि भी सायवाले-कार्येयें ' से भी साथवालेका ही होता है । ) वस्तुतः ' अमन्त्रिका तु चूड़ाकरणान्त - संस्कारोंके श्रमन्त्रक श्रादेशसे फिर लड़कियोंका उपनयन भी श्रमन्त्रक प्राप्त था; उसके निषेधकेलिए मनुजीने ' अनन्तरस्य विधिर्वा प्रतिषेधो वा ' इस न्यायसे ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां बनाया है । इसे सभी प्राचीन टीकाकारोने यह पद्य भी ऐसा ही माना है । इसके-लिए पृ. १७६ - १७८ देखिये । थोड़ा - सा निर्देश यहाँपर भी देते हैं । श्रीकुल्लूक कहते हैं- ' प्रमन्त्रिका तु अनेन [ कन्यानाम् ] उपनयने प्राप्ते विशेषमाह - ' वैवाहिको विधिरिति ' ( ' अमन्त्रिका पद्यसे कन्याओंोंका प्रमन्त्रक उपनयन भी प्राप्त था; उसपर मनु विशेषता कहते हैं - ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणाम् ' । श्रीमेधातिथि कहते हैं- ' पूर्वेण आहृद् - वचनेन जातकर्मादिवद् उपनयनेपि श्रमन्त्रके प्राप्ते, तन्निवृत्त्यर्थमारभ्यते - ' वैवाहिको विधि: ' इति । ( ' मन्त्रिका ' पद्यसे जातकर्मादिकी भांति लड़कियोंका उपनयन भी मन्त्रक प्राप्त हुआ, उसके हटानेकेलिए ' वैवाहिको विधि: ' पद्य मनुजीने बनाया है । ) श्रीराघवानन्द कहते हैं- ' एवमुपनयनेपि [ स्त्रीणाम् ] अमन्त्रके प्राप्ते ग्राह- ' वैवाहिको विधि: ' इत्यादि । तब बलात् मित्रमिश्र द्वारा ' उपस्थितं परित्यज्य अनुपस्थितस्य कल्पनाऽन्याय्या ' । इस न्यायके अनुसार अन्य स्मृतियोंकी ओर दौड़ लगानी श्रीमित्र मिश्रकी अनुचित है । मनुस्मृति सृष्ट्यादिप्रणीत है, उससे पहले भला अन्य कोनसी स्मृति वादिमान्य हो सकती है? तव बलात् श्रीमित्रमित्रद्वारा उक्त - मनुवचनको अपने पक्ष में लगाना अनुचित ही है, स्वयं मनसे विरुद्ध है । तब इसी पद्यसे मनुके पूर्व पद्यमें ' इयं '
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७०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) से चूडान्तसंस्कारोंकी क्रियाका हो परामर्श है, उपनयन एवं केशान्तका नहीं । केशान्त १६-२२-२४ वर्षोंमें हुआ करता है । बादीके मतमें तो यह अवस्था कन्या विवाहकी है; तब क्या वह उस समय उन-कुमारियोंका मुण्डन ( केशान्त ) करावेगा? क्योंकि उसीका नाम रघुवंशादिमें ' गोदान ' कहा है, ' गावः केशाः खण्ड्यन्तेऽस्मिन्निति ' तब तो १६-२२-२४ वर्षकी विवाह्यमाना वादीकी लड़कियोंकी बड़ी शोभा हो जावेगी । क्या वादी रजोदर्शनसे पूर्वं लड़कीका समावर्तन मान लेगा? तव वादीके कन्या- गुरुकुल भी खण्डित हो गये । कन्याओं का विवाह भी तदनुसार उसे रजोदर्शनसे पूर्व १२ वें वर्ष करना पड़ेगा । आश्चर्य है कि - १६-२२-२४ में लड़कियोंके विवाहका हामी भी वादी श्रीमित्र मिश्र के फन्देमें कैसे या फंसा? श्री मिश्रमश्र के मतमें स्त्रियोंका केशान्त ( मुण्डन ) असम्भव है, क्योंकि वे कन्याओं का विवाह उनमें रजःकालसे पूर्व ही मानते हैं - यह उसके वादीके दिये हुए उद्धरणसे स्पष्ट है; तब १६-२२-२४ वर्षमें होनेवाला केशान्त ( मुण्डन ) अव उन लड़कियोंके ब्रह्मचर्याश्रम न होनेसे तथा विवाहिता एवं सौभाग्यवती होनेसे कैसे हो सकता हैं? तब श्री मित्र मिश्र का यह नवीन अध्यवसाय निकम्मा है । आगे वादी मित्रमित्रका उद्धरण देता है- कि च प्राश्वलायनेनापि ' मुखमग्रे ब्राह्मणमनुलिम्पेत् इति समावर्तनीयमनुलेपनं प्रस्तुत्य ' उपस्थं स्त्री, इत्यनेन स्त्रीणामनुलेपनं विदधता तासामपि उपनयनमुक्त भवति, उपनयनपूर्वकत्वात् समावर्तनस्थ ' । ( आश्वलायनने भी स्त्रियोंके समावर्तन संस्कारका ' उपस्थं स्त्री ' इत्यादि विधिद्वारा निर्देश करते हुए उपनयनका कथन किया है. क्योंकि-समावर्तन उपनयनपूर्वक ही होता है । ) जोकि ' उपस्थं स्त्री ' इस ग्राश्वलायनके वचनसे श्रीमिश्रजीको स्त्रियों-क्या स्त्रीका उपस्थ - धावन ही सभावर्तन है? [ ७०५ का समावर्तन प्रतीत हुआ है, वह श्राचार्यकुल में समावर्तनकालीन है । वादीने यहां ' उपस्थ ' का अर्थ नहीं दिया; तथ क्या नहीं उपस्थका चन्दन लगानेका नाम समावर्तन हो जाता है? स्त्री द्वारा अपने तथ सद्योवधुओंका मत जब पितृगृह में विवाहावसर में उपनयन श्री मिश्र मिश्र के मत में तथ अनुसार होता है; तब उस समय भला स्त्री आचार्यकुलमें कैसे हारीतके वस सकती है? यमस्मृतिके अनुसार तो लड़कीका पिता ही उसे भेजी वा स्वे श्राचार्यकुलका आचाय नहीं; तब तक उसका रजः काल उपस्थित पढ़ाता है उठता है; तव उसी एक दिनमें भला वह वेदविद्या कैसे समाप्त हो कर सकती है? समावर्तन विवाहसे कुछ पूर्व होता है G ब्रह्मवादिनियोंका यावज्जीवन विवाह ही नहीं मित्रमित्रानुसार समावर्तन कैसे होगा? समावर्तन हारीत अनुमार तथा प्रतिपक्षियों के अनुसार नहीं होता । तब उनकी विद्याका प्रारम्भ वा उनका समावतन भी कैसे होगा? वास्तव में कन्या के विवाहावसर में पितृगृहमें कर । जब हारीतके मत बच होता; तब उनका भी नया विवाहसे पूर्व होता है । स्त्री सद्योवधुद्योंका वेदारम्भ पति समाप्ति ही न होन ' म तब उपस्य धावनपूर्वक – तरह शायद उसे स्वा.द.के अनुसार ' इमं ते उपस्थं मधुना सौं सृजामि ' इत्यादि जब मन्त्र द्वारा वर ही करता है । पितृगृहमें पूर्वोक्त मन्त्रानुसार कन्यान्न ही स्नान होता है । जैसे कि गोभिलगृ. के प्रकृत प्रकरणमें श्रीसत्यव्रत-सामश्रमीने भी अपने व्याख्यान में स्पष्ट किया है । वादीको सं. वि. कुम स्वा.द.ने भी कन्याका वैवाहिक स्नान दिखलाया है, वही स्नान कन्यास अनु समावर्तन- स्थानीय होता है, यह विद्यासमाप्तिवाला स्नान नहीं । उसले सका मित्र मिश्र के पक्षकी कुछ भी सिद्धि नहीं । इसके अतिरिक्त प्रष्टव्य यह है कि श्री मित्र मिश्र के मत में ब्रह्मवादिनी तथा सद्यो विवाहकालमें भेद है, या अभेद? रजः कालसे पूर्व विवाह करना ही मिश्रजीका सिद्धान्त है । तब उनके मतमें ब्रह्मवादिनी ब्रह्म प्राग स ० ध ० ४५ उपन
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[ ७०५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७०६ ] जीन नहीं सद्योवधूका रजःकालसे पूर्व ही विवाह होगा । तब फिर मिश्रजी के रा अपने तथा दोनोंका परस्पर क्या भेद रहेगा? एकका विवाहसे पूर्व उपनयन वधुनोंका मतमें दूसरीका विवाह - समय में उपनयन- इसमें क्या फलविशेष है? हारोतके तथा यह मित्र मिश्रका हारीतसे तथा अन्य सभी स्मृतियोंसे विरुद्ध भेजी जा स्वेच्छाकल्पित वस्तुतः श्रतः गलत पक्ष है । पढ़ाता है नस्थित इधर श्री मिश्र मिश्र कन्या संस्कारों में स्वयं श्रमन्त्रकताको सिद्धान्तत हो मात करते हैं । तब ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' इस मनु-तके वचनकी एकवाक्यता मिश्रजीके मतमें भी हो जाती है; वह म नया श्राविष्कार मन्दफलक ही हुआ । परन्तु हारीत तथा यमको जैस उनका भी स्त्रीका उपनयन विवक्षित है, वह वास्तविक उपनयन नहीं होता, होता है । पतिके पास विवाहार्थ वैध - नयन ही उसका उपनयन होता है, जैसा कि वेदारम्भ ' मन्त्रोपनीता ' ( १७६४ ) इस वसिष्ठ - धर्मसूत्रादिके वचनोंमें स्पष्ट है । न होनेसे तव श्री मित्र मिश्रका वम और हारीतके वचनोंकी एकवाक्यतासे सब तरहकी कन्याओंकी उपनयनापत्तिका कथन भी व्यर्थ ही है । क्योंकि नपूर्वक - जब सद्योवधुओं का वेदारम्भ ही नहीं; और उनको ' ब्रह्मवादिनी ' शब्द ' इत्यादि ही प्राप्त नहीं; तव उनका उपनयन भी कैसा? कन्याश नीसत्यव्रत- सद्योवधूकी प्रतिद्वन्द्विता में ' ब्रह्मवादिनी ' हारीतानुसार यावज्जीवन कुमारी रहनेवाली इष्ट है, तो अनौत्सर्गिक होनेसे उनकी सर्वसाधारण से सं.वि. में अनुकर्तव्यता नहीं । श्रतः उनका भी इस विषय में निर्देश नहीं किया जा कन्याका । उसके सकता । उनका भी समावर्तन नहीं हो सकता । आागे प्रतिपक्षींने श्रीमित्रमिश्रका यह सन्दर्भ उद्धृत किया है -ब्रह्मवादिनी ' अतएव संन्यास - ब्रह्मजिज्ञासादिकमपि उपनीतानामेव स्त्रीणां घटते; कासे पूर्व श्राश्रमसमुच्चय विकल्पयोः उपनयनपूर्वकत्वात् । तदत्र निर्गलितोऽर्थ: -ब्रह्मवादिनीनां गर्भाष्टमादौ मन्त्रवत् तूष्णीं च उपनयनम्, ततो वेदाध्ययनं, प्राग् रजोदर्शनात् समावर्तनम् । सद्योवधूनां तु उक्त विवाहकाले एव उपनयनम्, सद्य एव समावर्तनम् । सद्य एव विवाह इति ' ( ' वीरमित्रोदय, अविवाहित ब्रह्मवादिनीका समावर्तन कैसे? [ ७०३ संस्कारप्र. खण्ड ५ पृ. ४०२-४०५ ) । ( इसीलिए संन्यास, ब्रह्मजिज्ञासा आदि उपनीत स्त्रियोंके चरितार्थ होता है । इसलिए सार यह निकला ही विषय में गर्भसे वें वर्ष में मन्त्रपूर्वक और कि ब्रह्मवादिनियों का पश्चात् वेदाध्ययन कुछ चुपचाप उपनयन संस्कार, उसके , तथा रजोदर्शन से समावर्तन होता है । सद्योवधुग्रों-का तो विवाह के समयमें ही उपनयन, उसी समय ही समावर्तन उसी समय हो विवाह होता है । ) और इसपर मिश्र मिश्र के हिमायती वादीको याद रखना चाहिये विशिष्ट - स्त्रियोंका मित्र मिश्र - प्रोक्त संन्यास कि -अपवाद ही है, उत्सर्ग नहीं । इससे एवं ब्रह्मजिज्ञासा श्रादि भी उपनयनापत्ति नहीं भी सर्वसाधारण - स्त्रियों की । संन्यास तो उपनयनाभावमें ही हुआ करता है, ब्रह्मजिज्ञासा भी विना उपनयनके ही होती है, इसपर उपनिषदें ( छान्दोग्य ५।११।७ ) तथा श्रात्मानन्दकृत ' अस्य वामीय ' सूक्तका भाष्य देखना चाहिये । जो श्रीमित्रमिश्रने ब्रह्मवादिनी तथा सद्योवप्रोंमें विवाहादिका भेद बताया है, यह भी व्ययं ही सा है; क्योंकि - रजः काल १२ वर्ष वाद लड़कियोंका उपस्थित हो जाता है; तब तक ब्रह्मवादिनी लड़की कितना वेद पढ़ लेगी? अतएव यह उनका ' निगलित अर्थ ' मनगढन्त ही है; वादीको भी यह स्वीकृत होगा नहीं; नहीं तो उनकी कन्या-विवाहावस्था ( १७-२४ ) स्वतः खण्डित हो जाती है । सद्योवचूकी प्रतिद्वन्द्विता में ' ब्रह्मवादिनी ' है, सो वहां वह यावज्जीवन ' ब्रह्मचारिणी ' ही हारीतको इष्ट है; तब उसके विवाहका प्रसङ्ग हो क्या? इस प्रकार श्रीमित्रमिश्र के मतके निराकरणसे ' गर्भिणीहूनन में गर्भ-हननवत् ' तदाश्रित वादीका भी एतद्विषयक मत खण्डित हो गया । इसके अतिरिक्त उक्त मित्रमिश्रके मतसे वादीकी फलसिद्धि भी कुछ नहीं; क्योंकि - मित्रमिश्र स्त्रियोंका यह उपनयन अमन्त्रक मानते हैं,
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७०८ ] कुछ भी नहीं; और फिर उस स्त्रीके अमन्त्रक उपनयनको जिसका फल उन्होंने अपने लेख में लिखा है-भी वे ' इस कल्प ' में नहीं चाहते । इसीलिए गम्यते ' ( पुराकल्पे कहने से ' पुराकल्पे ' इति वचनाद् ' नाऽस्मिन् कल्पे ' इति होता है, परन्तु उपनयन इस कल्पमें नहीं हुआ करता - यह प्रतीत किया है, यह वह पाठ लोकदृष्टिसे छिपाकर जनवञ्चन वादीने मिश्रजीका रही है । क्योंकि यदि वह ऐसा जैसा कि उसकी सदाकी यह दुष्प्रकृति स्पष्ट निर्बल हो जाय । कुछ छिपा न करे; तो जनदृष्टिमें उसका पक्ष देनेसे ' ढोलकी पोल ' भी छिपी रहती है । शास्त्रे ' किया था; उस अर्थ को बल्कि वादीने ' पुराकल्पे ' का अर्थ ' मिश्र ने वादीके ही मान्य ' स्मृति- चन्द्रिका ' कारका अनुसरण भी श्रीमित्र । मिश्रजीने लिखा है - ' पुराकल्पे अर्थवाद-करके खण्डित कर डाला है विशेषे । तत्र प्रार्थवादिकविधेः सार्वकालिकत्वे शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात् नहीं होती - यह ' कल्पान्तरे ' इति । अर्थात् प्रर्थवादकी वातें सर्वकालिक न होनेसे । एवं स्मृतियोंका व्यवहार है । अतः सर्वकालीन शिष्टोंक वादीका पक्ष कट जाता है । ' अर्थ भी वादीने प्रशुद्ध किया है कि - ' पुराकल्प मिश्रजी वाक्यका अर्थवादकी का ' अर्थवादविशेष ' यह अर्थ है । यद्यपि स्मृतिचन्द्रिकाकारने होती है, आधुनिक स्मृति तथा आचारके साथ उसका विधि सर्वकालीन उसका अर्थ कर दिया है । ' यद्यपि ' विरोध देखकर ' कल्पान्तरमें ' ऐसा ' के आगे शब्द वादीके ' बनावटी ' हैं । ' सर्वकालीन ' आधुनिक ' आदि ' नहीं ' शब्द वादीने छिपा दिया है । ' प्रागेव रजोदर्शनाद् विवाहश्च ' इस मित्र मिश्र के इसके अतिरिक्त दुष्प्रकृतिवश छिपा दिया है । इससे वाक्यको भी वादीने अपनी सदाको उसका ' रजस्वला - विवाह ' रूप सिद्धान्त भी कट जाता है । इधर ऐसा होनेपर वादीके मत में भी ब्रह्मवादिनियोंका भी वेदाध्ययन नहीं हो सकता; क्योंकि जब मित्रमिश्र कन्याओंोंका रजोदर्शनसे पूर्व ही अमन्त्रक उपनयन मन्त्राधिकार नहीं दे सकता [ ७०१ समावर्तन मानते हैं, अपनी पुस्तकके १२२ पृष्ठमें वादीने भी ७१० मानकर अनूदित भी किया है । उसे सम्म ' समावर्तन ' होता है ' विद्याकी समाप्ति ' । रजोदर्शन धन्तमें जाता है - यह वादी के प्राचार्य स.प्र. में मान चुके १२ वर्ष हैं । स मिश्र पृ. ४६ ' त्रीणि वर्षाणि उदीक्षेत इस मनु - पद्य के अर्थ में उनने ऐसा लिहा है । तव अष्टम वर्ष में उपनीत कन्या १२ वें वर्ष तक वेदोंको कैसे है । समान कर सकेगी? प्रत्युत उतने समयतक तो वेदपठन आरम्भ ही नहीं सकेगी । वादीके अनुसार वेदोंको समझ ही नहीं सकेगी । उपा हो करना वेदाङ्गोंका भी पूर्ण पठन भी नहीं हो सकेगा । प्रत्युत्त इधर मित्र मिश्र स्त्रियों का उपनयन ही अमन्त्रक है । इस मुख्य इति कर्तव्यता भी उनके वेदमन्त्रों में स्पष्ट ही अनधिकार तव ' भक्षितेपि लशुने न चरितार्थ हुमा, इधर वादीने दावा उपनयन अमन्त्रक मानते हैं, जब उनस प्रकार अन्य तंस्कारोंकी स्त्री - सम्ब है, मन्त्र में श्रमन्त्रक हैं; तब उन स्त्रियोंक a सिद्ध हुआ । गणप शान्तो व्याधिः ' यह न्याय श्राप दोनों प्रथ मद्यप श्रीमित्र मिश्र द्वारा किया हुआ ' वैवाहिशे आपस्त विधिः स्त्रीणाम् ' इस मनुके पद्यका अर्थ भी लोकदृष्टिसे चुरा लिया है । शूद्रोंक वह यह है- F ' पुराकल्पे इति वचनात् [ स्त्रीणाममन्त्रकमपि उपनयनं ] नाति कुमारी कल्पे, इति गम्यते । प्रतएव मनुः - ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्तरे तया वैदिकः स्मृतः, इत्यादिना विवाहस्य उपनयनस्थानापत्तिमाह । वैदिशे समन्त्र = वेदग्रह्णार्थ: संस्कार उपनयनम् । स स्त्रीणां वैवाहिको विधि: विवाहाच ( संस्कारः स्मृतः - पूर्वेरिति मेधातिथिपाठार्थः । मिताक्षर । दिपालु यहाँ व ' औपनायनिकः स्मृत ' इति । तत्र औपनापनिकः - उपनयन - कार्यकारी । डा यथा पुरुषस्य उपनयनादि, तथा स्त्रीणां विवाहादिविर ' प्रशूद्रा ततश्च प्रत्यक्ष ' निषेधाधिकार इत्यर्थः ' । होती )
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7 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७१० ' ' उसे सम्म इतना पाठ वादीने छिपा दिया था । इससे वादीका पक्ष ही खण्डित १२ वर्षक हो गया । ' पित्रादिरेव एनामध्यापयेद्, नापर: इति प्रन्वयः । इस हैं । सप मिश्र वाक्यको वादीने अपनी पुस्तक ( पृ. ११८ ) में उद्धृत किया ऐसा लिढा है । इससे वादीके प्रिय ' कन्या- गुरुकुल ' भी कट गये । कैसे समाज जोकि वादीने ‘ गोभिलगृ. ' के ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्दसे अपना पक्ष सिद्ध ही नहीं कर करना चाहा था, उसका हम पृ. ६६-१०६ में ऐसा प्रवल युक्तिप्रमाणोपेत गी । उपा प्रत्युत्तर दे चुके हैं कि - वादीकी लेखनी फिर उसपर नहीं चल सकी । हम दावा करते हैं कि अब भी उसपर चल नहीं सकती । जब उनस पृ. १२२-१२३ श्रागे वादी ' संस्कार गणपति ' का लेख उद्धृत करता स्त्री - सम्बन्धी और हम उसका प्रत्युत्तर देते हैं । उन स्त्रियों लिखता है - पृ. १२२ श्रीरामकृष्णभट्टने अपने ' संस्कार-गणपति ' में शूद्रका और स्त्रीका उपनयन स्वीकृत किया है । जैसे कि-अथ शूद्राणामुपनयनम् । श्रापस्तम्बः ' शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् । आप दोनों ' मद्यपान रहितानाम् ' इतिकल्पतरुकार ' ( शूद्रोंके उपनयन के विषयमें या ' वैवाहिशे आपस्तम्बने लिखा है - जो दुष्टकर्म मद्यपानादि न करनेवाले हों, ऐसे रा लिया है । शूद्रोंका उपनयन करे । यह कल्पतरुकारका मत है । स्त्रीका उपनयन बताते हुए यमका यह वचन मिलता है - पुराकल्पे नं ] नासिर कुमारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते ' इत्यादि । तच्च उपनयनममन्त्रकम् । जीणां संस्ततया च मिताक्षरायां याज्ञवल्क्यः - ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु ह । वैदिशे समन्त्रक: ' ( संस्का. गण. पृ. ६४२ ) । विवाहश्च ( उत्तरपक्ष ) ' खोदा पहाड़, उससे निकली चुहिया, वह भी मरी हुई ' सरा । दिपाउनु यहाँ वादीने भारी परिश्रम से ' संस्कारगणपति ' से शूद्र के उपनयनका सूत्र न - कार्यकारी ढूंढा, वह भी पाठ गलत हो है, क्योंकि - ' आपस्तम्ब धर्मसूत्र ' में ववाहादिकि ' प्रशूद्राणां हि ' पाठ मिलता है- ' शूद्राणां ' नहीं । यह तो प्रत्यक्ष है, ' प्रत्यक्षे कि प्रमाणान्तरेण ' ( प्रत्यक्षमें अन्य प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती ) 1 सर्वत्र ' अशूद्राणामुपनयनम् ' यही पाठ है [ ७११ यदि कहीं ' शूद्राणामदुष्टकर्मणां ' पाठ है भी; तो वह प्रामादिक है । क्योंकि किसी भी धर्मशास्त्र में, किसी भी धर्मसूत्र वा गृह्यसूत्र वा श्रौत-सूत्र में शूद्रका उपनयन नहीं माना गया । वादीके मान्य म.म. श्री मित्रमिश्रने भी अपने ' वीरमित्रोदय ' के उपनयन - प्रकरण ( पृ. ३८७ तथा ४०५ पृ. ) में ' अथ यनुपनेया: - ( अव उपनयनके अधिकारियोंका वर्णन चलता है ) तत्र गौतम: - ' शूद्र एक-जातिरिति । एक - जातिः - एक जन्मा, न द्विजन्मा, उपनयनाभाबाद इत्यर्थः । आपस्तम्बोपि - ' प्रशूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् ' इति वृद्र-व्यतिरिक्त वदन् शूद्रस्य तद् ( उपनयनं ) न इत्याह इस प्रकार ' आपस्तम्ब ' का ' अशूद्राणाम् ' ही पाठ उद्धृत किया है, ' शूद्राणाम् ' नहीं । ( गौतमने कहा है- शूद्र एकजाति होता है, द्विजाति नहीं, क्योंकि-उसका उपनयन नहीं होता । आपस्तम्बने भी ' शूद्रोंसे भिन्न प्रदुष्टकर्म-वाले वर्णोंका उपनयन होता है इस प्रकार शूद्रोंसे व्यतिरिक्तोंका नाम कहते हुए शूद्रोंका उपनयन नहीं माना । ) इस प्रकार वादीके मान्य म.म. श्रीमुकुन्द मिश्र ने भी अपने से व्याख्यात ' गोभिलगृ. ' के भाष्यकी भूमिकामें ' अशूद्राणां ' यही ' प्राप्तम्व ' का पाठ उद्धृत किया है, ' शूद्राणाम् ' नहीं । इसी तरह वादीके मान्य ' स्मृतिचन्द्रिकाकार ने भी ' संस्कारकाण्ड ' के संस्कारकी परिभाषाके प्रकरण में ' अशूद्राणां यही ' आपस्तम्ब ' का पाठ माना है । सब स्मृतिकार तथा गृह्यसूत्रकार इसमें एकमत ही । बहुत कहने से क्या, ' प्रापस्तम्ब धर्मसूत्र में ही ' अशुद्राणामदुष्ट कर्मणां पाठ ही मिलता है; यह वादी स्वयं ही देख ले । ' नहि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम ' ( प्रत्यक्षमें दीख रही हुई बात अनुपपन्न नहीं होती । ) वादीके मान्य टीकाकार श्रीहरदत्तमिश्र ने भी ' अशुत्राणामदुष्ट-
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७१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कर्मणाम् उपायनम् [ उपनयनम् ] वेदाध्ययनमग्न्याधेयम् ' ( १ | १ | ६ ) इस प्रा.ध.सु. के सूत्रका भाष्य इस प्रकार किया है- ' शूद्रवर्जितानां त्रयाणां वर्णानान् प्रदुष्ट कर्मणाम् उपायनादयो धर्माः । उपायनम् - उपनयनम् । न च श्रवर्णिकानाम् उपनयनं विधीयते, प्राप्तत्वात् । नहि शूद्राणां प्रतिषिध्यते, प्राप्त्यभावात् । उपनयनं तावद् गृह्य ( आप.गृ. ८२ ) ' गर्भाष्टमेषु ब्राह्मणमुपनयीत ' इत्यादिना त्रैवर्णिकानामेव विहितम्, इह [ धर्मसूत्रे ] अपि तथैव विधास्यते । अध्ययनमपि ' उपेतस्य प्राचार्यकुले ब्रह्मचारिवासः ' ( आप.ध. १।२ । ११ ) इत्यारभ्य विधानाद् अनुपनीतस्य शूद्रस्य अप्राप्तमेव । किञ्च-श्मशानवत् शूद्रपतितौ ' ( प्राप.ध. १६६ ) इति अध्ययननिषेधो वक्ष्यते । वस्य समीपे नाध्येयम्, स कथं स्वयमध्येतुमर्हति । अग्न्याधेयमपि ' वसन्ता ब्राह्मणा: ' ( तै. व्रा. ११११२ ) इत्यादि त्रैवर्णिकानामेव नियतानि । विद्याऽग्न्यभावाच्च शूद्राणाम् अप्रसक्तानि । उक्तो विद्याऽग्न्यभावः । तस्माद् [ द्विजानां ] दुष्टकमं- प्रतिषेधार्थं सूत्रम् । शूद्रप्रतिषेधस्तु प्राप्तानुवादः । ( शूद्रको छोड़कर तीन वर्ण जो दुष्ट कर्मवाले न हों; उन्हीं के उपनयन आदि धर्म हैं । यहां वर्णिकोंके उपनयनकी विधि नहीं है; क्योंकि वह उन्हें पहलेसे ही प्राप्त है । शूद्रोंके उपनयनका निषेध भी नहीं है; क्योंकि शूद्रोंको तो उपनयन प्राप्त ही नहीं । उपनयन श्रापस्तम्ब -गृ. में वर्णिक काही विहित है । इस धर्मसूत्रमें भी वैसा ही विधान हैं । अध्ययन तथा गुरुकुलवास भी उपनीतका ही है । ( प्राप.ध. ) सो वह श्रनुपनीत - शूद्रको प्राप्त ही नहीं । इसके प्रतिरिक्त प्राप.ध. ( १ ) में शुद्र एवं पतितको श्मशानकी भाँति माना गया है । इससे शूद्रका अध्ययनका निषेध है । जिसके समीप ही वेद पढ़नेका निषेध है, वह स्वयं कैसे पढ़ सकता है? श्मशान में वेदका निषेध होता है । ' शूद्राणां ' से रथकार इष्ट है, शूद्र नहीं [ of ७१४ अग्न्याधान ( यज्ञ ) भी ' वसन्ता ब्राह्मणाः ' इत्यादि वचनों को ही विहित है, विद्या तथा अग्नि न होनेसे यज्ञ से व वर्णिका य व नहीं । इस प्रकार द्विजोंको शूद्रकर्मका निषेध करनेकेलिए शूद्रोका प्राप्त है । प्रयोगव कर्मणां यह सूत्र है । शूद्रका निषेध तो प्राप्त ही निषेधका ही ' प्रशूद्राणाम. प्राधान मात्र है । ) धनुवाद-सति व आपस्तम्बने इस प्रकार इस सूत्र में तीन वर्णोंका ही स्पष्ट शब्दों में बताया है, शूद्रका नहीं । तभी ' उपनयन बड़े रयकार शुश्रूषा शूद्रस्य इतरेषां वर्णानाम् ' ( १ | १ | ७ ) में श्रापस्तम्बने शूद्रका कर्म त्रं वर्णिकोंकी सेवा बताया है । तब तदाश्रित वादीका रेतीला महल गिर पड़ा । वह रथ दोनों स अथवा यदि मान भी लिया जावे कि पारस्करगृ. में हरिहर प्राि I किसी भाष्यकारने ' शूद्राणामदुष्टकर्मणां यही पाठ उद्धृत किया है, तो केवल वादी उनकी कही हुई व्यवस्था को भी तो माने । वहां लिखा है- यदि ' शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् एतच्च रथकार विषयकम् । तस्य तु सरन्याध मातामहीद्वारकं शूद्रत्वम्, अदुष्टकर्मणां मद्यपानरहितानाम् इति कर जावेगा तरुकारः ' ( पार, हरिहर. २।५ ) । इ ( ' शूद्राणां ' यह वचन रथकारके विषयमें है । उसकी शूद्रता माता- प्रकार महोके द्वारा परम्परासे है, साक्षात् नहीं । कल्पतरुकारके अनुसार वह ' रथकार भी मद्यपानसे रहित हो । ) ' उक्ता वा ' श कि तह इससे स्पष्ट है कि यहां साक्षात् शूद्रवर्णका उपनयन नहीं; किन्तु ' माहिष् मातामहीद्वारक शूद्रता वाले रथकारका विशेषवचनसे उपनयन विहित है; माहिष्य तब इससे वादीकी इष्टसिद्धि न हुई । रथकार इस विषयपर ' कात्यायन श्रौतसूत्र ' तथा उसका ' कर्कभाग्य ' देखता हदिश्च चाहिये | योनः । ' रथकारस्य श्राधानम् ' ( १ | १ | ) ' श्र ( पूर्वपक्षः ) — ' श्रूयते हि रथकारस्य श्राधानम् । तत्र एतद् वित्रपेद्, आत्यन्त
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श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७१३ ७१४ ] वर्णिक वर्णिको रथकारः रथक्रियायोगात्, उत जात्यन्तरम् इति । उभयत्र १ प्राप्त प्रयोगदर्शनात् सन्देहः । कि तावत् प्राप्तम्? त्रैवर्णिक इति । तस्य हि प्रशूद्राणाम हो प्राप्ती सत्याम् ऋतुमात्रविधानाद् वाक्यभेदो न भवति । . का धनुवार उपनयन बड़े स्य इतरेष की सेवा ही रिहर आदि किया है, तो प्राधान श्राधानसम्बन्धो वक्तव्यः वाचिनि पुनस्तस्य भिद्यत । तस्मात् त्र वर्णिको सति वाक्यं कारको पूर्वपक्ष में वर्णिक होना माना है ( रथकारका प्रधान सुना जाता है? वर्णिक है रथ बनानेके कारण वह रयकार दोनों स्थान प्रयोग दीखनेसे सन्देह है । प्राप्त क्या है? वह वर्णिक है । उसे देवल उसकी ऋतु ही कह दी जाती है, इस ऋतुसम्बन्धश्चापि । तथा रथकार इति ' । ( यहांपर । ) उसमें यह विचार है, क्या , या भिन्न जातिवाला है? अग्न्याधानकी प्राप्ति है ही, प्रकार वाक्यभेद नहीं होता, लिखा है- यदि त्र वर्णिकसे भिन्न जातिका माना जाबे रथकारको, तब उसका । तस्य तु श्वग्न्याधानसे तथा ऋतुसे सम्बन्ध बताना पड़ेगा । तब वाक्यभेद दोष हो - इति कल जायेगा । श्रुतः रथकार त्र वर्णिक ही है । ) इसपर कहते हैं - " नियतं च ' ( १ | १ | १० ) इसपर कर्कभाष्य इस शूद्रता माता प्रकार है - ' प्रत्र ' च ' शब्दो ' वा ' शब्दस्य प्रथ, निपातानामनेकार्थता अनुसार वह उक्ता ' ' उच्चावचेषु प्रर्थेषु निपतन्तीति निपाता इति । अतः ' च ' शब्दो ' वा ' शब्दस्य प्रर्थे । ' वा ' शब्दश्च पक्ष - व्यावृत्तौ । न वर्णिको रथकारः । नहीं; किंतु कि तर्हि? जात्यन्तरमेव । तस्मिन् हि ' रथकार ' शब्दो रूढः स्मर्यते । विहित है; ' माहिष्येण करण्यां तु रथकारः प्रजायते ' इति । क्षत्रियाद् वैश्यायां जातो माहिष्यः । वैश्येन शूद्रायां जाता करणी । माहिष्येण करण्यां जातो ' देखना स्वकारः । श्रानुलोम्येन सङ्करजातः । रथकारशब्दश्च अत्र रूढः । रूढिश्च योगाद् बलीयसी । सा हि श्रुतिपक्षनिक्षिप्ता । वाक्यपक्षनिक्षिप्तो योनः । ' अपि च वर्णिकस्य शिल्पोपजीवनं प्रतिषिद्धम् । तस्मादपि विचारयन्तरम् । तथा च मन्त्रलिङ्गम् - ऋभूणां त्वा इति रथकार आदवीत रथकारकी मीमांसा [ ७१५ इति । सौबत्वना ऋभवश्च? इति सौधन्वन् शब्देन स्पष्टमेव मभिधीयते 1 अथ यदुक्तम्- ' जात्यन्तरवाचिनि रयकारशब्दे जात्यन्तर-भिद्यत इति, तदुद्विशिष्ट विधानेन ' वाक्यं परिह्रियते इति ' । पूर्वपक्ष: - श्रय कस्मात् क एव न प्रीतेि । सोपि रयकरणात् रथकारो भवति, तस्य इष्टमाधानम् । एवं च सति ऋतुमात्र-विधान- लाघवं भवति । जात्यन्तरे तु विशिष्ट विधानाङ्गीकरणेगौरव-स्यात् । एत्रमाशङ्किते उत्तरसूत्रम् — ( उ. ) ' नाऽभावाद् इति वात्स्य: ' ( १ | १ | ११ ) अत्र कर्क: – ' न त्र ' वर्णिको रथकारः शक्यते वक्तुम् । यो निमित्तशब्दः, यावदेव योगः, तावदेव प्रवर्तते । अतो न रथकाराख्याया रथकरणनिमित्तता । तत्रं तद् - विचार्यते - ‘ स्थपतीष्ट्यां किम् श्राचानसंस्कृतोऽग्निः, उत लौकिक इति? ग्राह- ' लौकिके ' ( १ | १ | १४ ) लौकिके अग्नी एतत् स्याद् [ न तु संस्कृते इति ] | ( इसमें ' च ' शब्द ' वा ' शब्दके प्रथमें है; क्योंकि - निपातोंके अनेक अर्थ ' हुआ करते हैं । निरुक्त में लिखा है - निपातों का कई प्रकार के ग्रंथोंमें निपतन हुआ करता है । इसलिए च ' शब्द ' वा ' के अर्थ है, और ' वा ' शब्द पूर्वपक्षके हटाने में है । रथकार त्रैवर्णिक नहीं, बल्कि भिन्न जाति है । स्मृतियोंमें उसीमें ' रथकार ' शब्द प्राता है । ' माहिष्यसे करणीमें रयकार पैदा होता है । क्षत्रियसे वैश्य स्त्री में पैदा हुआ ' माहिष्य ' होता है । वैश्यसे शूद्रास्त्री में पैदा हुई लड़की ' करणी ' कही जाती है । माहिष्यते करणीमें पैदा हुया रथकार कहा जाता है । यह अनुलोम - सङ्कर होता है । ' रथकार ' शब्द इसी अर्थमें रूढ है । रुढि व्युत्पत्त्यर्थसे बलवती होती है । वही श्रुतिपक्ष में इष्ट है । व्युत्पत्ति वाक्यपक्ष में निक्षिप्त होती है ।
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७१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) और फिर वर्णिका शिल्पपर रथकार भिन्न जाति । जैसे कि ' ऋभूणां त्वा ' इससे रथकार अग्निका यहाँपर ' सौधन्वन ' शब्दसे स्पष्ट ही रहा है । जात्यन्तरवाची रथकार में यह ठीक नहीं । विशेष- विधान होनेसे है । ( प्र. ) रथकारको वर्णिक क्यों रथ बनानेसे रथकार हो जाता है । निर्वाह निषिद्ध है । इसलिए भी इसमें मन्त्रका लिङ्ग भी है । आधान करे । ' सौधन्वना ऋभवः ' रथकार भिन्न जातिवाला कहा जा वाक्यभेद दोष बताया जाता है । उसका परिहार स्वतः हो जाता नहीं मान लिया जाता? वह भी उसीका अग्न्याधान मान लिया जावे? इस प्रकार होनेपर केवल ऋतु के विधान में लाघव होगा । यदि उसे अन्य जाति मान लिया जावे, तत्र विशेष विधान माननेपर गौरव हो जावेगा । ( उ. ) ' नाभावाद् इति वात्स्य: ' ( १ | १ | ११ ) इसपर करूँ कहते हैं-' नत्र वर्णिको रथकारः शक्यते वक्तुम् । यो निमित्तशब्दः, यावदेव योगः तावदेव प्रवर्तते; अतो न रथकाराख्याया रथकरणनिमित्तता ' । ( रथकार-को यहाँ वर्णिक नहीं कहा जा सकता । जो निमित्तशब्द होता है, जब तक योग ( व्युत्पत्ति ) है, तक तक ही प्रवृत्त होता है । अतः ' रथकार ' यह नाम रथ बनानेके निमित्तसे नहीं । ) ' तत्र तद् विचार्यते – ' स्थपतीष्ट्यां किम् प्राधान - संस्कृतोऽग्निः, उत लौकिक इति? आह् ' लौकिके ' ( १११।१४ ) लौकिके अग्नौ एतत् स्याद् [ न तु संस्कृते ] इति । ( इसपर यह विचार उपस्थित है कि-स्थपति प्रादिकी इष्टि क्या प्रधानमन्त्र से संस्कृत अग्नि में होती या लौकिक साधारण अग्नि में? इसपर सिद्धान्त है कि रथकार आदि मन्त्र संस्कृत - उपनीत नहीं; अतः उनकी इष्टि प्राधान - संस्कृत - अग्निमें न होकर साधारण - अग्निमें होती है । ) इससे बहुत ही स्पष्ट हो रहा है कि यह साक्षात् शूद्रवर्णकी इष्टि मन्त्रक उपनयनसे स्त्री - शूद्रका उपनयन निषिद्धहै [ ७१७ ७१८ वा उपनयन नहीं, किन्तु अनुलोम वर्णिक सङ्करका जिसके लिए श्रीमनुजीने भी कहा है- ' सजातिजानन्तरजाः यह वर्णन है जाच द्विधर्मिण ' ( १०/४१ ) | ( सजातिज एवं अनन्तर छः पट् सुना धर्मवाले हैं । इसपर कुल्लूकभट्टने स्पष्ट लिखा है- ' लड़के द्विके निरिनि जातीयासु जाताः, तथा अनुलोम्येन उत्पन्नाः, ब्राह्मणेन क्षत्रिया द्विजातिसमान. बादी क्षत्रियेण वैश्यायाम्, एवं षट् पुत्रा द्विजधर्मिण उपनेयाः ' । वैश्ययोः कैसे हो ' इन्द्रिय यही श्रीरामकृष्णभट्टको विवक्षित है । इन ( रथकारों ) का यात्र भी ( २ / २ = मन्त्र - संस्कृत अग्निमें नहीं; किन्तु लोकिक असंस्कृत साधारण श्रग्मिएँ पुरुषों सूत्रविहिन है । यह दिखलाया ही जा चुका है । तब स्पष्ट है कि - इनञ्च वेदावि उपनयन भी द्विजों - जैसा संस्कृत नहीं, किन्तु असंस्कृत एवम् श्रमन्त्रक हो वचन द है । इससे शूद्रका उपनयन जो वादीको इष्ट था, सिद्ध न हो सका । अन्यत्र यदि वादी उन लोगोंका उद्धरण देता है, तो वादीको व्यवस्था भी उन्हीं- अ की माननी पड़ेगी । अर्धजरनीय न्यायका आश्रयण करना वादीके पक्षको इन्द्रिय निर्बलताका प्रकाशन होगा ।. वह वेद = इसके अतिरिक्त ' शूद्राणामदुष्टकर्मणाम् उपनयनम् ' इस पाठसे है, प्रत वादी साम्प्रदायिक- सिद्धान्तका भी खण्डन हो जाता है । दुष्टकमेलि इस वि वादी के सम्प्रदाय में पुरुषकी ' शूद्र ' संज्ञा होती है । तव ' प्रदुष्टकर्मा ' शूद्र वा ही कैसे होगा? ' दुष्टकम के शूद्र माननेपर फिर ' वर्णव्यवस्था ' वादीके कृष्णयज मतमें भी ' जन्मना ' सिद्ध हो जायगी; गुणकर्म से वर्णव्यवस्था कट इत्यादि जायगी । क्या वादीको अपने साम्प्रदायिक - सिद्धान्तका भङ्ग इष्ट है? निबन्धों यदि नहीं; तो वादीने इस वेदविरुद्ध प्रमाणको कैसे दिया । ' प्रालोक ' पृ. पाठक इसपर स्वयं विचार कर लें । प्रक्षिप्त इधर जब श्रीरामकृष्ण भट्ट स्त्रीका उपनयन श्रमन्त्रक मानते हैं, तब राय स्त्रीके उपनयनकी पुरुषके उपनयनसे भिन्नता सुस्पष्ट है । तब समता प्रक्षिप्त होनेसे इससे स्त्रियोंका वेदाधिकार भी सिद्ध न हुआ । इससे वादीका प्रजापति सारा परिश्रम व्यर्थका सिद्ध हुआा । ' हुतकृत्यं पुवत् ' का उत्तर पूर्व कि नहीं होत
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७१७ ७१८ / वर्णन है. जा चुका है । १२४ ' नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्र रिति धर्मों व्यवस्थितः के पृ. मन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति ' इस हमारे । द्विजके निरिन्द्रिया मनुवचनपर तिसमान- वादी कहना है - ' स्त्रियोंकी इन्द्रियाँ नहीं होतीं; वे ' मन्त्ररहिता: ' है यह , कैसे हो सकता है; वादीको इस विषयमें ज्ञान मालूम नहीं होता । यहाँ मुन्द्रिय ' का अर्थ ' शुक्र ' है । जैसे कि मनुस्मृतिमें ‘ पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् ’ याग भी ( २/२२० ) वहाँ कुल्लूकभट्टने लिखा है- ' इन्दियं शुक्रम् ' शुक्र होनेसे अग्नि पुरुषों की मूछें होती हैं; इसी कारण शुक्रहीन होनेसे नपुंसकको भी के इनका बेदाधिकार नहीं दिया जाता । इसपर श्रात्मानन्दके भाष्यमें उ मन्त्रक वचन देखो - ' क्लीवानां नैव काणानां वेदवियाधिकारिता ' इस विषय में हम हो सका हो अन्यत्र स्पष्टता कर चुके हैं ( पृ. ६८-७२ ) ॥ भी उन्हों अब वादीने समझ लिया होगा कि - ' निरिन्द्रियाः ' का ' स्त्रीकी के पक्षी इन्द्रिय नहीं होती ' यह अर्थ नहीं है. किन्तु शुक्रहीन अर्थ है । शुक्रहीन होनेसे वह बेदी अधिकारिणी नहीं होती । शुक्रसंयमसे ही तो ब्रह्मचर्य होता स पाठले है, अत: उनमें शुक्र न होनेसे उनका ब्रह्मचयं भी उपस्थसंयममात्र होगा । दुष्टकमेस इस विषय में हम पहले पर्याप्त स्पष्टता कर चुके हैं । क वादीका ऐसे पद्योंको अमान्य कहना अनुचित है, यह वात तो चा ' वादीके कृष्णयजुर्वेद भी कहता है, ' तस्मात् स्त्रियो निरिन्द्रियाः ' ( तेसं. ६५८२ ) वस्या कट इत्यादि । कृष्णयजुर्वेद की वेदता हम ' वेदस्वरूप - निरूपण ' में बहुतसे इष्ट है? निबन्धों में स्पष्ट कर चुके हैं । ' मालोक ' ' पृ. १२५ आगे वादी ' नैता रूपं परीक्षन्ते ' इत्यादि मनुपद्योंको प्रक्षिप्त बताता है । पर स्वाभाविक बात प्रक्षिप्त नहीं हो सकती । हते हैं, तब ' शय्यासनमलङ्कार... स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत् ' प्रादि पद्योंको भी वादी समता प्रक्षिप्त बताता है, परन्तु मनुस्मृतिके अन्त में ( १२।१२३ ) देखो; वह मनु बादीका प्रजापतिका एवं परमात्माका नाम लिखा है; अतः इसमें कोई अनुपपत्ति पूर्व दिया नहीं होती । ' शुद्धाः पूता योषितः ' का वास्तविक अर्थ [ ७१६ पृ. १२६ वादी हमारे लिए लिखता है कि - ' प्रापमें स्त्रियोंके अत्यन्त निन्दित भावना भरी हुई है, जो प्रापके विषय में वात गलत है । स्त्रीके विषयमें लेखोंमें स्पष्ट है ' यह निर्देश करते है । हमारा जो शास्त्रोंमें लिखा है, हम उसीका उनसे वैयक्तिक राग - द्वेष कुछ भी नहीं । ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' ग्रादिमें स्त्रीको ' भूषणाच्छादनाशन सम्मानित करना इष्ट है । अतएव इनके उपसंहारमें ' से स्पष्ट लिखा हैं-' तस्माद् एताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनं उनका सम्मान ' ( ३।५ ९ ) यही होता है, अन्य कोई पूजा उनकी विवक्षित नहीं । इस विषयमें भी हम अन्यत्र ( ५७५-५७६ पू. में ) स्पष्टता कर चुकेहैं । पृ. १२६ आगे वादी लिखता है - ' ये भावनाएं ' बुद्धाः पूता योषितो यज्ञियाः इमाः ' ( अथवं. ६।१२२२५, ११।१।२७ ) इत्यादि मन्त्रोंने विरुद्ध है । ' सर्वथा " शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा: " पर विचार । इस वादीने अपनी एक नोट - वुक बना रखी है, जहाँ अनुसन्धान-विरहित जनताको धोखा देनेकेलिए कई मन्त्र उनका पूर्वापर छिपाकर रख रखे हैं । इस विषगमें हम ४८६ ४६० पृ ० में स्पष्टता कर चुके हैं । महाशय, यह मन्त्र जलोंकेलिए है, स्त्रियोंके लिए नहीं; तभी तो ' शुद्धाः पता योषितो यज्ञिया इमा: ' के बाद ' आप ' पाठ था; वादीने उसे छिपा दिया । यहाँ ' आप ' का विशेषण या ' योषितः ' । विशेषण सदा यौगिक होते हैं; इसे वादीको कभी भूलना नहीं चाहिये । वादीके मत में वेदमें ' रूह ' शब्द नहीं होते, किन्तु ' यौगिक ' हुआ करते हैं; तब उसने अपने सिद्धान्त के विरुद्ध ' घोषितः ' का रूढ अर्थ ' स्त्री ' कैसे कर दिया? कौशिकसूत्र ( ६११३४/३५, २१८ ) के अनुसार
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७२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इस मन्त्रका विनियोग वटलोई में जल डालने के लिए है । तभी इसके साथके मन्त्रमें ' अपः प्रविशत तण्डुलाः ' ( अथर्व ११।१।१८ ) जलोंमें चावल डाले जाते हैं । स्त्रियोंमें चावल नहीं डाले जाते । जलोंको ' योषित् ' कहनेका रहस्य ' योषा वा प्रापः, वृषाग्निः मिथुनेनैव एवमेतत् प्रजनेन समर्धयति । श्रद्भिर्वे इद सर्वमाप्तम, तस्माद् ग्रपः सम्भरति ' ( शत. २।१1१1४ ) में बताया गया है । यहाँपर ' तस्माद् अप: ' इस उपसंहारसे जलोंका वर्णन इष्ट है, न कि स्त्रियोंका । वादीको अपने छल - कपट छोड़ देने चाहियें । इन छल-कपटोंसे वह अनुसन्धानहीन जनताको गुमराह किया करता है । श्राजकल अनुसन्धानका समय है; अतएव वादीके छल - कपट अब सफल नहीं हो सकते । हमने वादीके पूर्वापर छिपानेके बीसों उदाहरण उपस्थित कर दिये हैं; अतः अब वादीको चाहिये कि अब वह सम्भल जावे 1 छलके परिणाम उसे भोगने पड़ेंगे । अन्तमें बड़ी दुदशा होगी - जैसे कि झूठे दयानन्दियोंकी भव तक हो चुकी है । पृ. १२६ ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' यहां वादीने जो स्त्री- पूजा बताई है, यहाँ भी उसने पूर्वापर छिपाया है । यहां तो विवाहादियोंमें स्त्रियों केलिए भोजनाच्छादन तथा अच्छे भोजनादिसे सम्मानित करना कहा है; तभी इसके उपसंहारमें मनुजीने कहा है- ' तस्माद् एताः सदा पूज्या ' भूषणाच्छादनाऽशनै: ' ( ३।५६ ); परस्पर प्रीति यहां लक्ष्य है, जिससे सन्तान ठीक होवे, तभी वहाँ कहा गया है- ' सन्तुष्टो भार्यया भर्ता ' प्रादि ( ३।६० ) यहां स्त्रियोंकी वह पूजा नहीं कि भर्ता स्त्रीके पांव पड़ा करे, वा उन्हें ' नमस्ते ' कहा करे । इस विषय में ५७५-७६ में देखो | पृ १२७ न वै कन्या न युवति: ' इसपर पृ. ४१ ९ -४२६ में हमने इतना प्रबल लिखा है कि - वादीकी लेखनी उसपर चल नहीं सकी, और न अब चल सकती है । यह उसमें बड़ा दुस्साहस है कि- स. घ. के वाला और वृद्धाकी परिभाषा [ ७२१ ७२२ ही सिद्धान्तको बदलनेकी दुश्चेष्टा करता है । अब वह बेचारा
श्लोक में श्रायुर्वेद पद्यको ला पटकता है, जो आयुकी दृष्टिसे स्मृतिके होतृत्व
वह ' ज्ञानवृद्धा ' अर्थं कैसे करता है? है, फिर उनको उससे दिया पद्य यह है कि- ' आ षोडशाद् भवेद् वाला चाहिये तरुणी मता । पञ्चपञ्चाशता प्रोढा, वृद्धा स्यात् तदनन्तरम् ' विचा हवन १६ से कम आयु तक ' बाला ' लिखा है, ' कन्या ' नहीं लिखा यहाँ वादीने हवन क इतना भी पता नहीं कि- ' कन्या ' से क्वारी इष्ट होता है कि है । बादीको ज न विवाही हुई । वादीने ' श्री ' पत्रिकामें कई ऐसे प्रमाण उद्धृत किये थे कि— जाता ' कन्या ' शब्दो विवाहरहित स्त्रीमात्रमाचष्टे ' । हो वन फिर १६ से ३० तक ' तरुणी ' बताता है, पर मनुके पद्यमें ' तरुणों ' वृद्धावस नहीं है, वहाँ ' युवति ' लिखा है; क्वारीके मुकाबले में कहा हुआ ' युवति ' स्त्रीकेल पुरुषोंक शब्द साहचर्यवश ' विवाहिता ' वाचक है - यह स्पष्ट है । मनुजीको ' न वै कन्या न युवतिः ' में यहाँ यदि वादीके अनुसार कन्या - युवतिके संगणित पृ. निषेधसे उक्त मनुके मतमें वृद्धा इष्ट होती; तब वे ' प्रोढा ' स्त्रीका भी बतलाय निषेध करते; क्योंकि वृद्धा तो यह ५५ वर्षके बाद कही गई है । ग्रतः कथन वादीका खण्डन हो गया । क्योंकि मनुको होतृत्व में स्त्रीमात्रका निषेध ( ६४ ९-इष्ट है | देखिये - ' स्त्रिया क्लीवेन च हुते [ न ] भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् । प्रक्षिप अश्लीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वति श्रमी [ स्त्री - प्रभृतयः ] हविः । प्रतीपमेतद् पृ. देवानां ' ( ४।२०५- २०६ ) भले ही यहाँ वादी श्रीतुलसीरामजीका पर्य मूला ' भी देख ले | की घृष्ट सो ' न वै कन्या न युवति: ' में ' वृद्धा स्त्री ' अर्थ मनुजीको विवक्षित इसका प्र नहीं है; वे तो ' तस्माद्वैतान - कुशलो होता स्यात् वेदपारगः ' ( ११।३७ ) ब्राह्मणवू इस उपसंहारके पद्यमें स्त्री आदिको सर्वथा निषिद्ध करके होतृकर्म- ' फलो य प्रवीण - पुरुषको ही चाहते हैं; तब वादीका अभिप्राय कट गया । फिर तो श्राम प्रतिपक्षी लोग वादीके अनुसार ५५ वर्षसे छोटी लड़कियों वा युवतियोंको प्रन्तरित स ०० ४६ अनुत्सन्ना