सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 391–400

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 391–400

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७२१ ७२२ / ति कराते हुए ' नरके हि पतन्त्येत जुह्वतः स च यस्य तत् ( ११।३७ ) होतृत्व ree में गिरानेवाले बने । यह घोषणा श्रव श्रार्यसमाजमें कर देनी फिर dasi कि - ५५ सालसे कमकी श्रायुवाली स्त्रियोंसे ' जुह्वतः ' के G चाहिये होने से उन बेचारियोंको नरकगामिनी अनुसार त्रिचता करानेवाली तथा जिसका हवन उन सबको नरक भिजवानेवाले मत वनें । बादीने हवन करती वादीको कोई प्रमाण देते है तो वादी उसे ' पौराणिक कहकर टाल विवाही जब हम जब वह कोई निकम्मे से निकम्मा वचन दे; तो वह वैदिक कि- जाता है; जाता है, बलिहारी? वादीसे प्रष्टव्य है कि - हवनादिकी ही वन केवल वह स्त्रीकेलिए कहता है - या पुरुषकेलिए भी? यदि " तरुणों ' वृद्धावस्था स्त्रीकेलिए; तो पुरुषके लिए अनुभवकी श्रावश्यकता न रही; तब स्त्री-' युवति ' पुरुषोंका वा दिसम्मत साम्यवाद भी खण्डित हो गया । जी को पृ. १२८-१२६ आगे वादीसे ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' पद्यके मनुपद्योंमें युवतिके संगणित तथा टीकाकारोंसे व्याख्यात न होनेसे हमने उसे ' प्रक्षिप्त ' का भी बतलाया था; इसपर उसने प्रसन्नता प्रकट की है; वस्तुतः यह उसका कपन अनर्गल है; हमने तो उसका भी प्रत्युत्तर दे दिया है । देखो पृ. । निषेध ग्रतः ( ६४१-६५८ ) यह तो वादीकी धींगाधींगी है कि वह प्रक्षिप्त पद्योंको बचित् । अप्रक्षिप्त; और अप्रक्षिप्त पद्योंको प्रक्षिप्त मानता है । गोपमेतद् पृ. १२६ आगे वादी महाभारतमें गरुडपुराणके ' दैत्याः सर्वे विप्रकुलेषु कार्य वा ' इस पद्यसे स्त्रियोंके निन्दा - श्लोकोंको प्रक्षिप्त वा ऊंटपटांग कहने की घृष्टता करता है । वस्तुत: यह उसकी ' पाकिस्तानी ' नीति है । ववक्षित इसका प्रत्युत्तर हमने ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २०८ - २०६ में दिया है, ऐसे १1३७ ) ब्राह्मणत्रुव - देत्यलोग वादी- जैसे ही हैं । ' कृते युगे ' के स्थान वादीने ोतृकर्म लौ युगे ' पाठ करके अपनी दैत्यताका परिचय दे ही दिया है । फिर वो श्रागे वादीने श्रीमध्वाचार्यका वचन ' क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिद् तियोंको प्रन्तरितानपि । कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा । नापि ग्रन्थ व्याकुला इति सर्वशः ' उनके ' महाभारत -तात्पर्य - निर्णय ' वादीने मध्वाचार्यका वाक्य छिपा दिया [ ७२३ ( २ श्रध्याय ) से दिया है कि - ( ' स्वार्थी लोग कहीं ग्रन्थों में वचनों को कर देते हैं, कहीं निकाल देते हैं, कहीं प्रमादसे प्रक्षिप्त हैं । इस प्रकार प्राचीन ग्रन्थ या जानबूझकर बदल देते ग्रस्त - व्यस्त हो गये हैं । ) महाशय, सम्भल जाइये, ऐसे स्वार्थी श्राप लोग हैं, श्रीमध्वाचार्यके वचनमें ' प्रमादात् ' था । और आपने उसका ' जानबूझ कर भी दिया, यह प्रत्यक्ष उदाहरण है । हमने वादीके इस प्रकारके अर्थ कर उदाहरण प्रस्तुत किये हैं - वादीने इस पद्यमें ' क्वचिदन्तरितान्यपि बहुत से ' का ठीक अर्थ नहीं किया, इसका अर्थ है कि कहीं ग्रन्थोंके वचनोंको छिपा देते है । श्रीमध्वाचार्य - स्वामीने लिखा था - ' स्त्रीभिव दान् विनाऽखिलम् ' स्त्रियोंको वेद नहीं पढ़ने चाहिये. पर वादीने उनके इस वचनको छिपा दिया । इस प्रकार हम वादीके बहुतसे उदाहरण दे सकते हैं । ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' में अग्निस्थानकी सेवा इष्ट है । जैसे कि-रामायणमें कौशल्याको कहा गया था - अग्न्यगारपरा भव ' ( २२५८३१८ ) अर्थात् अग्निस्थानका खयाल रखना । हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि - यज्ञमें स्त्रीका क्या स्थान है, लकड़ियां काट देनीं, घी देख देना, साथ बैठी रहना आदि । तभी उनका ग्रन्थिबन्धन किया जाता है कि जब वह वहाँ कार्यवश बैठ न सके; तो अपना ग्रन्थिबन्धन वाला वस्त्र अपना प्रतिनिधि रख दे । पुरुषको वहां से उठना नहीं पड़ता; यह उठने - बैठने प्रादिका काम स्त्रीको करना पड़ता है । ' वेदं पत्न्यं प्रदाय ' यह वचन वादीको बड़ा प्रिय लगता है कि-यह सायणने लिखा है । श्रीसायणने स्पष्ट लिखा है - ' अध्ययनाभावेपि ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' सो वादीकी स्थूलबुद्धिमें यह नहीं आता कि-स्त्रीका यहाँ जब अध्ययनका प्रभाव लिखा है; फिर उसे वेदपुस्तक कैसे दिलवाते हैं, वस्तुतः वादीको इस विषयमें ज्ञान ही नहीं है । वह याद रखे कि-

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७२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यहाँ ' वेद ' का अर्थ ' वेदपुस्तक ' नहीं है, जैसे कि वह उसका वैसा अर्थं सदा किया करता है, किन्तु ' दर्भमुष्टि - प्रणीत पदार्थ ' यहाँ इष्ट है । वादीको यदि इसका ज्ञान नहीं है; तो हम क्या कर सकते हैं? इसके ज्ञानकेलिए वह इसी पुष्पके पृ. १८३-१८९ में देखे । पृ. १८५ में हमने उसमें श्रीसायणके ' काण्वयजुः ' का प्रमाण भी दिया है । अतः इस विषय में श्रीसायणको उपालम्भ देना भी वादीकी धींगाधोंगी है । पृ. १३२ ' अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला ' का अर्थ वादीने गलत किया है, उसका प्रमाण यह है कि उसके साथ वाले तदनुवादक ' हावयन्ती ' वाले पद्यको उसने छिपा दिया है । ' सन्ध्या-कालमना ' पर भी पूरा विचार हम पृ. १४०-१४३ में दे चुके हैं । पृ. १३३ प्रागे वादी एक गलत बात देते हुए एक पद्य देता है-' मान्या कापि मनुस्मृतिः, तदुचिता व्याख्यापि मेघातिथेः, सा लुप्तव विधेवंशात् क्वचिदपि प्राप्यं न तत्पुस्तकम् । क्षौणीन्द्रो मदनः, सहाङ्गण-सुतो देशान्तराद् आहृतैः जीर्णोद्धारमचीकरत् तत इतस्तत्पुस्तकोल्लेखने ' । इससे वादी सिद्ध करना चाहता है कि- मनुस्मृति और उसके मेधातिथि भाष्य में कितने अधिक परिवर्तन हुए हैं, यह अवतरणिका लिखकर उक्त पद्यका वादी अर्थ करता है – ' कोई मान्य मनुस्मृति थी; उसकी मेधातिथिकी व्याख्या सहित यह मनुस्मृति भाग्यवश लुप्त हो गई; और कहीं मिलती न थी । तब मदन - राजाने इधर - उधर लिखवाई कई पुस्तकोंसे उसका जीर्णोद्धार करवाया ' । वादीको पद्योंका अर्थ करना या तो प्राता नहीं; या लोगोंको गलत अर्थ करके धोखा देता है । यह पद्य मनुस्मृतिकेलिए नहीं है; किन्तु उसकी मेधातिथि - टीका केलिए है । उक्त पद्यका यह अर्थ है कि - मनुस्मृति एक मान्य स्मृति है, उसीकी योग्य टीका भी उसपर मेधातिथिकी है । वह लुप्त हो गई । दैववश उसकी पुस्तक नहीं मिलती थी । तब देश-विदेशसे लाई पुस्तकोंसे उस टीकाको इधर - उधरसे लिखवाकर मदननरेशने वादीने अर्थका अनर्थ कर दिया [ ७२५ ७२६ उसका जीर्णोद्धार कराया । इसमें परिवर्तनकी बात तो कुछ भी नहीं लिखी । नया संस्करण १३ करानेकेलिए उसकी टीकाकी पुस्तक श्रीगङ्गानाथजी भाको अपने देश में भी दिया नहीं मिली; तब विदेशोंसे उनने इधर - उधरसे लिखवाकर उसका काल नि सम्पादन किया । भुगान्त क इससे वादीका क्या सिद्ध हुआ? यहाँ मनुस्मृतिकी कोई बात नहीं । ' स ' कोई मनुस्मृति थी ' यहाँ ' थी ' यह किस पदका अर्थ वादीने कियां है? का अन्य धर्व नही अथर्ववेदको पैप्पलादसंहिता इधर - उघरसे न मिलती थी; तथा कश्मीरसे अर्थ करत शारदा लिपिमें लिखी हुई कापी डाक्टर रघुवीरने सम्पादित करके प्रकाशित की । इससे यह थोड़ा सिद्ध हो जाता है कि कर दिया गया । यह वादीकी बड़ी दुष्प्रकृति हैं कि गलत कर दिया करता है । कोई पाठ किसी टीकाका पूरा पाठ न मिला हो, जैसे कि - रावणार्जुनीय काव्य है संस्कर्ता सम्पादक उसका यथाशक्ति संस्करण करता है, डरानेवाली कोई भी बात नहीं है । उसमें परिवर्तन स्वा.द.ने वह पद्योंके श्रयं कहीं भी कहीं त्रुटित हो, है । पं ० ; उसका प्रति- पं ० शिव इसमें लोगोंको पृ. १४१-परमेश्वरा पुरायुगेषु श्रीमेधातिथिका भाष्य सचमुच बहुत सुन्दर है । पर वादी लोगोंको है वह पुस्तक तब तक मान्य रहती है; जब तक उससे उनका पक्ष त्रि शब्द रहा हैं । नहीं हो जाता । जब भी उससे उनका पक्ष छिन्न हुआ; तब वह पर उसे ' पौराणिक ' हो जाती है, प्रक्षिप्त हो जाती है; उससे आँख फेर लेते श्रीवासुदेव हैं; तब वह अमान्य हो जाती है । यह तो है इन लोगोंका हाल । शास्त्रो पृ. १३४- १३८ वादी जिसे ' हारीतस्मृति ' लिखा करता था; पर्याप्त स्प हमारे समझानेपर अब उसे ' हारीत - धर्मसूत्र ' कहने लग गया है, उससे पृ.१ ब्रह्मवादिनी तथा सद्योवधूका वर्णन लिखता है, तथा हारीतके ' नहि का भवत शूद्रसमा: ' इस वचनका भी उद्धरण देता है, हम इनका अकाट्य उत्तर शिरोमन्त्रक पृ. ८०-८६, ८६-६६, में दे चुके हैं, वादीकी त्रिकालमें भी शक्ति नहीं त्रिपदा कि इनका उत्तर दे सके । को सारे म

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७२५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७२६ ] १३८-१३६ इस प्रकार यमस्मृतिके ' पुराकल्पेषु नारीणां ' का उत्तर संस्करण दिया जा चुका है पृ. ८६ ८१ यहाँ वादीका - ' पुराकल्पेषु ' का पूर्व-देशमें भी कालनिर्मित ग्रन्थों में अर्थ करना गलत है । इसीका पर्यायवाचक उसका ' युगान्तरेषु ' तथा ' सर्गादिसमये ' मिलता है - यह हम वहाँ स्पष्ट कर चुके हैं । ' सकल्पं सरहस्यं च ' आदि में ' कल्प ' शब्द अन्य है ' पुराकल्पं ' के ' कल्प ' नहीं । अन्य अर्थ है । एक शब्द अनेकार्थक होता है; सब स्थान एक ही यां है? अर्थ नहीं हो जाया करता है, जोकि - वादी पूर्वकालनिर्मित ग्रन्थोंमें यह कश्मीरसे अयं करता है; तो मनुस्मृतिसे प्राचीन और ग्रन्थ कौन हो सकता है । करके स्वा.द.ने मनुस्मृतिको सृष्टिको आदिमें बनी हुई माना है; सो उसमें नरिवर्तन कहीं भी स्त्रीके उपनयनका वर्णन नहीं आया है; बल्कि खण्डन ही श्राया क है । पं ० शिवदत्तजीके कथनपर पहले विचार किया जा चुका है । म.म. टित हो, पं ० शिवदत्तजीने शूद्रका तो याज्ञिक वेदानधिकार माना ही था, केवल का प्रति-१.१४१-१४२ वादी लिखता है - म.म. पं ० गिरिधरशर्मा और पं ० लोगों को परमेश्वरानन्द - कृत व्याख्या संहित कौमुदीमें इस यमस्मृतिका पाठ ही ' पुरायुगेषु नारीणां यह दिया है । इस वादीकी कलमसे यहाँ सिद्ध हो लोगोंको छत्र रहा है कि – ' पुराकल्पेषु ' तथा ' पुरा युगेषु नारीणां ये पर्यायवाचक याद हैं । वादीने पं. गिरिधरशर्माकी व्याख्या में यह उद्धरण दिखाया है, तब वह फेर लेते पर उसे ज्ञान ही नहीं, उन्होंने कहीं ऐसी व्याख्या नहीं की; यह तो श्रीवासुदेव दीक्षित - कृत वालमनोरमा में पाठ है । जिन्हें यह भी पता नहीं, । शास्त्रोंकी मीमांसा करते हैं । वाह! अस्तु, इस विषय में हम पूर्व नाथा प्त स्पष्टता कर चुके हैं । उससे नहि पृ. १४२ ' मनसा भर्तु रतिचारे सावित्र्याऽष्टशतेन शिरोभिजुहुयात् के पूता भवति ' यहां गायत्री के शिरोमन्त्र के लिए कहा है, गायत्रीकेलिए नहीं । उत्तर विरोमन्त्रका विनियोग स.ध. की सन्ध्या में देखिये - शिरसः प्रजापतिऋषि-कि नहीं पदा गायत्री छन्दो ब्रह्माग्निवायसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः ' को सारे मन्त्रसे पृथक् होनेसे वह वेदमन्त्र नहीं रहा । वादीकी चारों वेद-' शिरोभिर्जुहुयात् ' का वास्तविक श्रयं [ ७२७ संहिताओं में तो वह शिरोमन्त्र है ही नहीं । वसिष्ठस्मृतिका ( २१।७ ) वचन वादीने स्त्रीके हवन के लिए दिया है, इनपर हम पृ. १३६ में विवेचना दे चुके हैं । यहाँ सावित्रीमन्त्र इष्ट नहीं; जैसा कि वादीने लिखा है; किन्तु उसका शिरोमन्त्र ' आपो ज्योती सामृत ' इष्ट है । वादीने " त्रिरात्राद् ग्रप्सु निमग्नायाः सावित्र्यष्टशतेन शिरोभिजुहुयात् ' के अर्थ में ' शिरोभिः ' का प्रर्थ छोड़ दिया है; क्योंकि - वादी बेवारे को पता नहीं है कि उसका शिरोमन्त्र क्या है, ' आपो ज्योती रसोऽमृत ' है । इसलिए स.ब. की सन्ध्या में उसका विनियोग लिखा गया है । जिसे हम पहले लिख चुके हैं । वादीकी सन्ध्यामें भी यह मन्त्र है, पर शिरोमन्त्र उसके साथ नहीं है; तब क्या स्त्री रावग है, जो कि -'शिरोभिजुं हुयात् ' बहुतसे शिरोंसे हवन करेगी? और फिर जलमें डुबकी लगाना लिखा है; तब क्या वह डुबकी लगाती हुई जलकी श्रग्निमें हवन करेगी? वस्तुत: यहां ' शिरोभि: ' इस सावित्रीके ' शिरोमन्त्र जुहुयात् ' में अन्तभावितण्यर्थ होनेसे क्योंकि वसिष्ठके स्त्रीकेलिए ' अनग्निः ' ( अग्नि-होत्रसे हीन. ५1१ ) कहनेसे स्त्री स्वयं स्वतन्त्र अग्निहोत्र नहीं कर सकती; इसमें मनुस्मृतिके पद्य हम पृ. १५२-१५३ में दिखला चुके हैं; सो यहाँ अन्तर्भावितण्यर्थतावश ' किसी ब्राह्मणसे यज्ञ करवा ले ' यह अर्थ है । विशेष विवेचन पं. शिवदत्तजीके पक्ष के खण्डनमें हम लिख चुके हैं । वादी जो किसी वचनका अर्थ देता है, यह नहीं देखता कि कहीं ऐसे अर्थ में पूर्वापर विरोध तो नहीं श्रा रहा? यदि है; तो इसका तात्पयं क्या है, यह समझना पड़ता है; सो स्पष्टतया यहाँ अन्तभावितण्यर्थं का तात्पर्य निकला । जैसे निषादस्थपतियाजन विशेषवचनके बलसे आता है; पर उसके स्वयं उसमें अनधिकारी होनेसे वह वही कार्य ऋत्विक्से करा लेता है; तब वह कृत्य तत्स्वामिक हो जाता है; इस प्रकार स्त्री भी अपनी

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७२८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्वतन्त्रतासे अग्निहोत्र वर्जित होनेसे वह विशेष - विहित कार्यको जब ऋत्विक्सेकरा लिया करती है, तब वह कृत्य भी तत्स्वामिक हो जाता है । ऋत्विक कर्म भी यही है कि यः परार्थं यजति ' । ' जो दूसरेका यज्ञ करे ' मनुस्मृतिमें भी स्पष्ट लिखा है - ' अग्न्याधेयं पाकयज्ञान् अग्निष्टोमादिकान् मखान् । यः करोति वृतो यस्य स तस्य ऋत्विग् इह उच्यते ' ( २।१४३ ) जैसे कि - कौशल्या के लिए रामायण में लिखा है- ' प्रग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला ' ( २/२०१५ ) यहाँ कौशल्याका हवन दीख रहा है, पर स्वयं स्वतन्त्र उसमें स्त्रीत्यवश अधिकृत न होनेसे उसने वह ऋत्विग् - द्वारा कराया; अतएव रामाभिराम - टीकाकारको वहाँ लिखन । पड़ा, ' अग्निहोत्रं मन्त्रबद् जुहोति स्म ' ज्येष्ठपत्नीत्वाद् ऋत्विजा इति शेषः ' । तदाह ' हावयन्तीम् ' इति । अर्थात् कौशल्या ऋत्विकद्वारा हवन करा रही थी । तभी उक्त पद्यके साथके पद्यमें रामायण में स्पष्ट लिखा है - ' ददर्श मातरं तत्र हावयन्तों हुताशनम् ' ( २/२०१६ ) इस रामायणके प्रमाणसे ही हमारी बात सिद्ध हो रही है । इसी कारण ही शिरोमणि - टीका में भी लिखा है - ' हावयन्तीं ब्राह्मणैरिति शेषः । एतदनुरोघेन पूर्वत्र ' जुहोति ' इत्यस्य ' हावयन्ती ' इत्यर्थ: । भूषण- टीकामें भी लिखा है- ' जुहोति -हावयति कौशल्या, अतएव ' हावयन्तीम् ' ( २/२०१६ ) इति वक्ष्यति, ब्राह्मणैरिति शेष: ' । यह अर्थ कृत्रिम नहीं है, वास्तविक है । यहाँ रामायणकी अन्य भी साक्षी दी जाती है— ' ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेनमहात्मना । ह्रावयामास विधिना राममङ्गलकारणात् ' ( २।२५।२७ ) इस विषय में स्पष्टताकेलिए इस पुष्पमें १४६ - १५४ पृ. देखें । रामायणकी उपजीव्य मनुस्मृति में भी स्त्रीके हवनकेलिए निषेध लिखा है-' न... स्त्रिया क्लीवेन च हुत भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् । ग्रश्लीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वति श्रमी ( स्त्रीप्रभृतयः ) हविः । प्रतीपमेतद् देवानां तस्मात् तत्परिवर्जयेत् ' ( ४/२०५ - २०६ ) यहांपर दयानन्दी - वादीका यदि उसमें हमपर विश्वास नहीं; तो दयानन्दी श्रीतुलसीरामका किया अर्थ तुलसीरामस्वामी के प्रशंसे भी वादी कट गया. [ ७२६ ७३० ] भी देख ले-' जिस यज्ञमें प्राचार्य वेदपाठी न हो; श्रीर जिसमें इत्यादि भरका अध्वर्यु तथा स्त्री वा नपुंसक होता हो, ऐसे यज्ञमें समस्त ग्राम श्रीदयान भोजन न करे । जिस यज्ञमें पूर्वोक्त [ स्त्री आदि ] होता आदि ब्राह्मण कभी हरिप्रसाद्र हैं; वह सज्जनोंको बुरा लगनेवाला और विद्वानोंको अप्रिय काम करते है, इस वादीकी त्रिकाल में भी शक्ति नहीं कि इससे अपना है । ' श्र कि उनक वादी स्वयं भी ' स्तुता पक्ष सिद्ध कर सके । 1 का यह जब मया वरदा वेदमाता... पावमा प्राचीन वै द्विजानाम् ' ( १ ९ ।७१।१ ) इत्यादि वेदमन्त्र से सावित्री ( गायत्री ) स्त्रियों का ' द्विजोंको पवित्र करनेवाली ( पृ. १४३ में ) मानता है; तब ' शूद्राणाम- दोनों प्र दुष्टकर्मणामुपनयनम् ' यह वेदविरुद्ध शूद्रोंका उपनयन घृष्टता कैसे होता है '. सकता है? तब उस वेदविरुद्ध वचनको उपस्थित करनेवाले श्रीरामकृष्ण-भट्टको वह ' विद्वद्वर ' कैसे कहता है- ' अतः स्ववचनविरोधाद् वादी अपास्त; यह व खण्डित हो गया । वैसे हम ' शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् ' इस वचनका दे चुके हैं ७ म पुष्प पू. ८६६-७४ में समाधान कर चुके हैं । चुके हैं । इस ' वेदमाता द्विजानाम् ' मन्त्रपर यह याद रखना चाहिये कि यहाँ उसने ' प्रा वेदमाता ' के दो अर्थ हैं - एक गायत्री दूसरा वेद । इसलिए इस मन्त्रको पंसनेसे प्रण वेदपाठ वा गायत्री जपके अनन्तर पढ़ने में विनियुक्त माना गया है; जब ऐसा है; तो वेदमें अधिकार द्विजोंका होने से उस वेदमें शूद्रोंका अब ह खण्डन श्रधिकार निषिद्ध हो गया । गायत्री प्रथं भी यहाँ माना जावे; तब वेदके लिखते हैं-एक प्रमुख सारभूत गायत्री मन्त्र में जब द्विजसे इतरका अनधिकार सिद्ध बताया है । हुआ, स्त्रीका साक्षात् उपनयन न होनेसे वह भी मुख्य द्विज नहीं । तब सारे वेदमें तो शूद्रका स्वतः अनधिकार सिद्ध हुआ । श्रीशिवदत्तजी भी इस स वेदोंमें शूद्राधिकार नहीं मानते थे । तव स्त्री - शूद्रों को जो बादीका समाज ने स्त्री-वेद अधिकृत मानता है, यह मत तथा स्वाद का ' यथेमां वाच ' मत्यका | ३? यदि अर्थं खण्डित हो गया । तब आर्यसमाजका एतद्विषयक पक्ष सर्वथा वे ब्राह निराकृत हो गया । सा.द.ने ' उ पृ. १४४ वादी लिखता है— ' यथेमां वाचं कल्याणीं ' यजुः ( २६१२ ) न किय

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७२६ ७३० ] वैदिक प्रदेश जिसकी मनुष्यमात्र के वेदाधिकार विषयक व्याख्या इत्यादि अतिरिक्त श्रीसत्यव्रतसामश्रमीने, वैदिकमुनि स्त ग्राम श्रीदयानन्दजीसे ऐतरेयालोचन स्वा. हरिप्रसादजी श्रादिने पृ. १७, स्वाध्यायसं पृ. ८२ में की कभी विषय में स्पष्ट है, यह कहकर वादी इनमें मेरा नाम भी लेता है म करते है, इस विषयके विचार भी अत्यन्त संकुचित है जिनकी आलोचना- । कि उनके इस, - सके प । का यह उपयुक्त एवसर नहीं, उपनयनके बिना गायत्रीमन्त्रका जप नमानी प्राचीन वैदिक परम्पराके सर्वथा विरुद्ध होनेके कारण इस विधानसे भी बी ) को स्त्रियों का यज्ञोपवीत ( जिसका हारीतने ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू शुद्राणाम. दोनों प्रकारकी स्त्रियोंके लिए विधान किया हैं- स्पष्टतया सूचित कैसे कह होता हैं ' । ामकृष्ण- यह वादीकी व्यर्थको वातें हैं । इन सबका हम कई बार प्रत्युत्तर अपास्त; दे चुके हैं । ' यथेमाँ बाच ' का हम प्रारम्भिक ५५ पृष्ठोंमें प्रत्युत्तर दे वचनका चुके हैं । इसका वादी त्रिकाल में भी उद्धार कि यहाँ उबने ' प्रालोचना ' का उपयुक्त अवसर नहीं, मन्त्रको पंसनेसे अपनी जान छुड़ा ली है । गया है; अब हम वादीके परम - मान्य ' अछूतोद्धार खण्डन दिखलाते हैं - वादी ध्यानपूर्वक सुने वेदके सिखते हैं- स्वाद. सरस्वतीने ' यथेमां ' कार सिद्ध लाया है ।...... । तब तजी भी इस स्वाद के अर्थ में भी अनेक शङ्काएं नहीं कर सकता । अब यहां यह लिखकर इस दलदलमें - निर्णय ' से भी उक्त मन्त्रार्थ-। उसके प्रणेता श्रीतकरत्नजी मन्त्रको परमात्माकी उक्ति होती हैं । ' स्वाय ' का अर्थ का समाज अपने स्त्री- पुत्र ' प्रादि किया है । तो क्या ईश्वरके भी स्त्री - पुत्रादि होते मन्त्रका ||? यदि ' मनुष्य के स्त्री - पुत्र'का खैच - खाँचकर अभिप्राय निकालो, तो सर्वग्रा आवे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रमें नहीं आ गये? धरण शब्दका मा. ' उत्तमलक्षण - प्रन्त्यज ' अर्थ करके अपने सिद्धान्तका अर्थ २६२ ) न किया है । श्राप हो ' मां ' के दयानन्दार्थका खण्डन [ ७३१ जो अन्त्यज उत्तम लक्षणवाला हो गया, वह ब्राह्मण श्रादि क्यों नहीं बना? इसके अतिरिक्त श्रार्यसमाजमें शूद्रसे भिन्न श्रन्त्यज कोई वर्ण नहीं है । ' दातु: ' एक वचन और ' देवानां ' बहुवचनका विशेष्य - विशेषणभाव नहीं बन सकता । ' विद्वानोंकी दक्षिणा देनेकेलिए ईश्वर कैसे मनोहर प्यारा होगा - यह अद्भुत मुहावरा है! मेरी यह कामना बढ़े और मुझे वह परोक्षसुख प्राप्त हो - यह ईश्वर नहीं कह सकता; क्योंकि- ईश्वर को कोई कामना अप्राप्य नहीं है । और क्या वह [ परमात्मा ] भी दुःखी है, जो परोक्ष सुख मांगता है? इसके अतिरिक्त मनुष्य भी वही कामना और वही सुख कैसे प्राप्त कर सकता है, जैसा ईश्वरको है- इत्यादि कथनसे यह स्वा.द. का श्रयं भी विद्वानोंके कण्ठमें नहीं उतरता है ' ( पृ. ३१-३२ ) पृ. ५ में ' तर्करत्नजी ' लिखते हैं- ' प्रायंसमाज के इस कथनसे पूर्वोक्त श्राक्षेपका कोई समाधान नहीं होता है । क्योंकि यहाँ यह प्रश्न होता है । कि- जब मनुष्य शूद्रके काम करता है; तो उसको यज्ञ करना, वेद पढ़ना, ' पढ़ाना, अध्ययन करना - कराना आदिका अधिकार है - या नहीं? यदि है । तो वह ब्राह्मण हो गया, या शूद्र ही रहा? यदि शूद्र ही रहा; तो “ कर्मसे ब्राह्मण बनता है ' यह प्रार्यसमाजका सिद्धान्त कहाँ बना? और यदि [ वह शूद्र, कर्म करनेसे ] ब्राह्मण बन गया, तो वे अधिकार ब्राह्मणको मिले, शूद्रको कहां मिले? शूद्र तो अधिकारोंसे वञ्चित ही रहा । श्रयं विद्वान् श्रार्यमुनिने अपने मीमांसादर्शनके ६।११२५ सूत्रके भाष्यमें शुद्रको यज्ञाधिकारका निषेध ही किया है । इसके प्रतिरिक्त प्रत्येक शूद्र अपने कर्म शिल्प वा सेवाका परित्याग कर नहीं सकता-ऐसी दशा में द्विजोंके अधिकार वेदाध्ययनादि उसे प्राप्त हो नहीं सकेंगे । दूसरे, शूद्र भी वेद पढे, यह बन ही नहीं सकेगा, क्योंकि श्रार्य-[ समाजी ] सिद्धान्त में मूर्खका नाम शूद्र है, और इस प्रकार सामर्थ्यभावके

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७३२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कारण तो शूद्रको वेदसे अवश्य ही वञ्चित रहना पड़ेगा । ' यथेमां वाचं ' मन्त्र से शुद्रको जो वेदाध्ययनाधिकार [ कहा जाता ] है, वह कैसे बन पड़ेगा? यदि शूद्र नाम मूर्खका ही है; तो क्यों कोई अपना नाम शूद्र ही रखना चाहेगा? और इस प्रकार तो एक वर्णका ही प्रभाव हो जावेगा । इसके अतिरिक्त प्रार्यसमाजमें भी शूद्र उसी प्रकार अपमानित रहा, जिस प्रकार आजकल स.ध. में बताया जाता है । यदि सब शूद्र अपने कर्मो को छोड़कर ब्राह्मण बनने चल दिये, तो शिल्पके नाशसे देशका नाश अवश्यम्भावी है । श्राज शूद्र - कर्म छोड़ा, कल वैश्य वन, समय - समयपर कुछ क्षत्रिय और ब्राह्मणादि बननेके कर्म किये, ऐसी दशामें उस मनुष्यकी क्या वर्णं कहाएगा? हमारी समझमें कुछ नहीं बनेगा । अतः कर्मसे वर्णव्यवस्था मानना - वर्णव्यवस्थाका नाश करना ही माना जावेगा । सनातनधर्मानुसार जन्मसे वर्ण मानना एक महत्त्वकी वस्तु है । यदि समस्त क्षत्रिय, ब्राह्मण बननेकी धुन में अपने कर्म राष्ट्र रक्षाका परित्याग कर दें; तो राष्ट्र नष्ट - भ्रष्ट होकर चकनाचूर हो सकता है । ऐसी दशा में उस राष्ट्रनाशका जिम्मेदार कौन होगा? यदि क्षत्रियोंसे उसका जबाब तलब किया जावे, तो कर नहीं सकते । क्योंकि वे कह सकते है कि हम तो ब्राह्मण वनने चल दिये थे । इसी प्रकार यदि शूद्र वा वैश्यसे शिल्प और वाणिज्यंके नाशका उत्तर मांगा जावे, तो वे भी कह सकते हैं कि हम तो ब्राह्मण वा क्षत्रिय बननेमें लगे थे । हमें शिल्प और वाणिज्यकी क्या पड़ी? सचमुच कर्मसे वर्णं माननेमें उनका कोई भी दोष नहीं रह जाता; प्रत्युत वे पुरस्कारके भागी बनने चाहियें । परन्तु स.घ.में ऐसा नहीं है । गोतामें लिखा है — ' श्रेयान् स्वघर्मो ' यथेमा वाचं ' के अर्थकी प्रालोचना III [ ७३३ विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो इनका ( ३।३५ ) ( अपने - अपने ब्राह्मणादि - बर्णधर्मका थोड़ा पालन भयावह दूसरी ' है परन्तु अन्य वर्णों के उत्तम धर्मोका पालन करना भी ' खिल उत्तम करना भी अच्छा विवा नहीं | अपने वर्णधर्मका निर्वाह करते मर जाना अच्छा है, परन्तु पर. प्रोक्त: ऐ वर्णधर्मका स्वीकार करना अच्छा नहीं । ) यत्रिस्मृति में लिखा है- कहते हैं ‘ ये व्यपेताः स्वधर्माच्च परधर्मे व्यवस्थिताः । तेषां शास्तिकरो राजा ' थे स्वर्गे लोके महीयते ' ( १७ ) ( जो मनुष्य अपने वर्ण- श्राश्रमके घर म विरुद्ध आचरण करके दूसरे वर्ण वा श्राश्रमके कर्म करते हैं; उन इसक दण्ड देनेवाला राजा स्वर्गका अधिकारी होता है । ) यहो कारण या कि- पदसे केव समस्त - संसारका त्याग करके ब्राह्मण बनने चलते हुए अर्जुनका श्रीकृष् नहीं ] श्र निग्रह किया था । मन्त्र ऋग्व कर्मानुसार वर्ण माननेपर न तो आप राष्ट्रकी परतन्त्रताका प्रस नहीं मिल क्षत्रियोंसे पूछ सकते हैं, और न वाणिज्यके नाशका वैश्यसे, घोर वचन नहीं शिल्पनाशका शूद्रोंसे ही कुछ पूछा जा सकता है । इस कर्मसे वर्ण मानने- यह वाले समाजके उच्छृङ्खलताके साम्राज्य में नियम पूर्वक समाजस्थिति नहीं में यज्ञ चल सकती; प्रतएव वर्णव्यवस्था जन्मसे ही मानी जानी चाहिये । जिनने चातुर्मास्य- = राष्ट्ररक्षा भली प्रकार हो सके । इत्यादि ( १, ५-७ ) मबद्ध मन्त्र ' यथेमां वाचं ' पर कुछ दिङ्मात्र प्रालोचना वादीके परमभान बिल है । श्रीभगवदाचार्यस्वामीने भी की है । उसका भी हम कुछ उद्धरण देते है । प्रार्थना= ' ईशादयो दशोपनिषदः ' की भूमिका पू. ६-१० में संस्कृत में लिखने है, यह स्प वे यह है - ' वेद ईश्वरका ग्रन्थ है - यह बात वेद नहीं श्रीर हैं - जिसका अनुवाद कल्याणीम् ' यह याजुष - श्रुति भी उक्त इष्ट अर्थको | है । यहाँ ' अ कहता । ‘ यथेमां वाचं · नहीं बताती । यजुर्वेदके २६ वें अध्याय में यह मन्त्र पढ़ा जाता है । नहीं है यदि स्मृति श्रध्यायके श्रारम्भमें उवटने लिखा है- खिलमन्त्रोचे शतिस्तु ' श्रथ इदानीं खिलानि अनुक्रमिष्यामः ' ( अब हम कहेंगे, क्योंकि । दिखलाते हैं ) महीघरने भी यही कहा है- ' प्रव इम खिल

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७३४ ] [ ७३३ कहीं नहीं कहा गया है ' । ' खिल का स्वरूप इनका विनियोग अपनी शाखा में श्रावश्यकतावश जो यह है-शाखा मन्त्र पढ़े जावें, उन्हें भयावहः दूसरी ' जाता है । यह महा. शान्ति ( ३२३।१० ) में श्रीनीलकण्ठने करना भी ' खिल कहा हरिवंशमें भी उस नीलकण्ठने यही कहा है । ' खिलो नारायणः भी प्रा तिला है ॥ महीधरानुसार कि- ' परन्तु पर- प्रोक्तः ऐपवः तद्गुणाः स्मृताः अव हम ' खिलों ' को हैं । इनका विनियोग कहीं नहीं मिलता; अतः यह ' खिल ' मन्त्र हैं । करो कहते वाचं कल्याणों ' के खिल होनेसे कहीं अन्य शाखा से श्रानेसे राज्ञ तब ' यथेमां यह के घरने मौलिक नहीं सिद्ध होता । सारा मन्त्र यह है- ' यथेमां वाचं ' ×× मन्त्र उनको इसके अतिरिक्त इस मन्त्रके शुक्लयजुर्वेदमें पढ़े होनेसे ' इमां वाचं ' या हि- पहले केवल यजुर्वेदका ही ग्रहण उचित है [ सारे वेदोंका ग्रहण उचित - श्रीकृष्ण दहीं ] और फिर यजुर्वेदमें ब्राह्मणभाग बहुत है; और बहुतसे यजुर्वेदके मन्त्र वेदसे लिये एव भरे गये हैं । इस मन्त्रकी सत्ता, ऋग्वेदमें ताकात नहीं मिलने से इस मन्त्र से इष्टसिद्धि नहीं हो सकती । अर्थात् यह ईश्वरका प्रोरन वचन नहीं हो सकता ) । वर्णमान- यह २६ वें अध्यायका २ य मन्त्र है । प्रथम मन्त्र ' अग्निश्च पृथिवी स्थिति नहीं में यज्ञका विषय नहीं है । २५ श्रध्यायोंके दर्शपूर्णमास - प्रग्निहोत्र - पशु-ये वितुर्मास्य - प्रग्निष्टोम वाजपेय - राजसूयादि सौत्रामणि -अश्वमेध इन यज्ञोंसे । सम्बद्ध मन्त्र समाप्त हो गये । तव उनसे बचा हुआ यह अध्याय स्पष्ट परममाथ बिज है । यह मन्त्र यहाँ प्रकृत नहीं है, अतः स्पष्ट है कि यह खिल है । ण देते है । यह प्रार्थनामन्त्र है, अतः प्रकृत विनियोगमें न आने से यह प्रार्थना विषयक त में लिखने है, यह स्पष्ट है । अत: इसे परमात्माकी वाणी नहीं माना जा सकता । वेद नहीं और फिर इस मन्त्र में ' शूद्राय च अर्याय च ' यह [ व्युत्क्रमसे इष्ट है । वहाँ ' अर्याय च शूद्राय च ' इस प्रसिद्ध क्रमसे नहीं ] कहा है । इस नहीं है कि भागेका पीछे और कहा । यहाँ समास पीछेका आगे कर दिया जावे । मनु-पद स्मृतियोंमें ‘ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थ ख स्वातिस्तु शूद्रो, नास्ति तु पञ्चमः ' ( १०।४ ) ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि हेंगे, क्योंकि महादेवशास्त्रीके मतका खण्डन वृद्धि नैव प्रयोजयेत् ' ( मनु. १०१११७ ) इस प्रकरणमें ' रक्षित्वा ' यहाँ क्रमप्राप्त वैश्योंका नाम कहकर अन्तमें शूद्राः ( १०११३० ) कमीं लोग शूद्रोंका नाम अपने क्रममें इस प्रकार मनु. १।३१, ७५ में भी ब्राह्मणादियोंका हैं । अन्य ग्रन्थोंमें भी ब्राह्मणादिके क्रमकी रक्षा की गई है । ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ३१।११ ) में भी ब्राह्मणादिका [ ७३५ शस्त्रेण वैदयान् ' कर्मोपकरणाः रखा गया है । क्रम रखा गया इसी यजुर्वेद में क्रम सुरक्षित है । ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं क्षत्राय राजन्यं, मरुदुद्भ्यो वैश्यम्, तपसे ३०१५ ) यहाँ भी ब्राह्मणादिका क्रम शूद्र " ( यजुः रक्षित है, पर प्रस्तुत मन्त्रमें ' शूद्राय च अर्याय च ' ( २६।२ ) क्रम में विपरीतता की गई है; अतः यह चिन्तनीय है ' । सो ' इमां वाचं ' से ' यह वेद ईश्वरका ग्रन्थ भी है यह यजुर्वेदकी वाणी सिद्ध नहीं करती । ( पृ. ६-११ ) पृ. १३७ यह लिखना श्रोमहादेवशास्त्रीका गलत है कि हारीत हमें इस बात की कोई सूचना नहीं देताकि वह किसी पूर्वकल्प वा युगकी लुप्त प्रथाका उल्लेख कर रहा हैं । उसका उल्लेख करनेवाले सभी विद्वानोंने- केबल एकने ही नहीं उसका पूर्वापर देखकर ही ऐसी बात लिखी थी? यह बात स्वयं भी उस सूत्रसे सूचित हो रही है कि- हारीत यावज्जीवन कुमारियों ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं का वर्णन कर रहा है । ऋषिकाल वेदके आविर्भावका काल है; और वह समय कल्पारम्भका है । इस विषयमें हारीतके वचनकी व्यवस्था में हम पूर्ण प्रकाश डाल चुके हैं । बेचारा वादी उस हमारी मीमांसाका उत्तर तो दे नहीं सकता? केवल हममें हठका आरोप लगाता है । यह लोग समझते हैं कि - इन्होंने जो जो कुछ समझ रखा है, वही सब कुछ है । पर इन बेचारोंसे प्रभी ' दिल्ली ' बहुत दूर है ' । पृ. १४५-१४७ आगे वादी ' न वं कन्या न युवति: ' इस पद्यमें प्राये

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७३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' पुंलिङ्गान्त ' प्रसंस्कृत ः ' का अर्थ ' अनुपनीत ' देखकर स्त्रीलिङ्गान्त ' असंस्कृता ' पदका भी अर्थ वही करना चाहता है, तब ' रजस्वल: पुरुष: ' तथा ' रजस्वला स्त्री ' का अर्थ क्या समान मानेगा? वादीको याद रखना चाहिये कि - पुंलिङ्गान्त ' असंस्कृतः ' का अर्थ तो अनुपनीतः होता है, पर स्त्रीलिङ्गान्त ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अविवाहिता ' होता है, क्योंकि-स्त्रीका विवाह ही उपनयनस्थानापन्न होता है; यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । इसलिए अन्य स्मृतिमें ' प्रसंस्कृता ' के स्थान ' यदि स्याद् अविवाहिता ' यह पाठ प्राया है । यह हम आगे कहने वाले हैं । तब जो ' पितुर्गे हे तु या कन्या रजः पश्यति असंस्कृता । सा कन्या वृषली ज्ञेया तत्पतिवृषलीपतिः ' ( प्रजापतिस्मृ. ८५ ) तथा यमस्मृति-वृहद्यमस्मृतिका ' पितुर्गेहे तु - या कन्या रजः पश्यति असंस्कृता । भ्रूण-हत्या पितुः तस्या: सा कन्या वृषली स्मृता । यस्तां विवाहयेत् कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । सं विप्रो वृषलीपतिः ' ( ३।१८ १७ ) इस प्रकार देवलका यह वचन है - वादीने इन पद्यों में ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अनुपनीता ' का किया है । अर्थात् पिता के घर लड़की यदि प्रसंस्कृता - विना जनेऊ के रजस्वला हो जावे; तो वह वृषली ( शुद्रा ) मानी जाती है, उसका पति वृषली-पति होता है । इस के अशुद्ध होने में उपपत्ति यह है कि यज्ञोपवीत शास्त्रानुसार श्राचार्यकुलमें होता है, पितृकुल में नहीं; जिससे पितृगृह में कन्याका उपनयन रजः कालसे पूर्व होना - यह वादीकी बात ही कट जाती है । यह वात विशेष ध्यान देने योग्य है । वादीके अनुसार जो लड़की ७-८ वर्षसे प्राचार्यकुलमें होगी, २४ वर्षतक वहीं रहेगी । तब उसका रजोदशा में पितृगृहमें निवास कैसे होगा? रजःकाल तो उसका वादी अनुसार प्राचार्यकुलमें ही होगा । तब यह स्मृतिपद्य निर्विषय होकर व्यर्थ हो जाएंगे! ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अविवाहिता YE / ' है [ ७३ अ पर जब वादी इसे मानता है, तब इन्होंसे वादीका नःकाल यही व श्राचार्यकुलवास खण्डित हो गया । श्राचार्यकुलमें रजोदशायें लड़कियों का वेदाध्ययन भी खण्डित हो गया । ' वास न होनेसे उ । नामसे: बोले ' । कट गया वादीका पक्ष । उक्त पद्य विवाहसे जादू वह जो सिर वितु: तस्था च रजस्वला होनेकी निन्दाके हैं । इसमें लिङ्ग है- ' पूर्व पितृसमें परिशिष्ट, वा भ्र णहत्या पितुः ( पाई इस कथन में उपनयन न होनेपर रजस्वला हो जाने से तस्वा पराशर भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु रजस्वला होनेसे पूर्व विवाह म्रणहत्याका कु न होनेसे ॉ | रते हुए को हत्याका सम्बन्ध पितासे स्फुट है ।. रजस्वलां अन्य प्रमाण हमारे अर्थकी सिद्धि तथा वादीके पक्षको । स्कृता । यह है कि - ' पितु तु या कन्या रजः पश्यति प्रसंस्कृता । अशुद्धता सा कन्य वृषली ज्ञेया तत्पति षलीपतिः ' ( प्रजा.स्मृ. ८५ ) इन स्मृतिपदा | त्यहाँ उ ' असंस्कृता ' का पर्यायवाचक ' अविवाहित । ' दिया गया है । देखिये- द; तो बाद ' रजस्वला च या कन्या यदि स्याद् अविवाहिता । वृपली वापर परा स्याद् जातः तस्यां तथैव हि ( लघु प्राश्वला. स्मृ. २११५ ) यहाँपर श्रीमाध ऋतुद ' असंस्कृता ' का ही स्पष्ट पर्यायवाचक ' अविवाहिता ' दिया गया है । वमपि स पितृगृहमें उपनयन होनेपर भी ऋतुमती होनेपर विवाह न होनेसे प्रूप नाशादयस्त्र हत्याका स्पष्ट सम्वन्ध है । इसलिए ' हेमाद्रि ' में उद्धृत ' या कपा प्रदान पितृवेश्मस्था यदि पुष्पवती भवेत् । असंस्कृता परित्याज्या न पदयेत् तां समुद्ध कदाचन ' यह वचन भी हमारी पक्षसिद्धिका ज्ञापक है । ( जो कन्धा पिता साइक्त य के घर में पुष्पवती ( ऋतुमती ) हो जाय, उसे बिना विवाहे छोड़ दे; विवाह 1 से कभी न देखे ) 1 वः पश्य श्रन्य देखिये वादिमान्य ' श्रीशङ्कर - दिग्विजय ' की साक्षी - सर्वात्मना ' दबूत श्लो दुहितरो न गृहे निधेयाः, ताः चेत् पुरा परिणयाद रज उद्गतं स्थान, संस्कृता ' पश्येयुः आत्मपितरौ, वऩ! पातयन्ति दुःखेषु घोरनरकेषु इति धर्मशास्त्र ' व ' बाद ( ३।४० ) ( पिता लड़कियोंको घर में न रखे, यदि विवाहसे पहले उनका सब्ध ० ४७

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७१० जाय; तो इससे माता - पिता घोर नरकमें गिरते हैं । ) | विकालमा वादी मान्य निबन्ध ' स्मृति- चन्द्रिका ' में भी ' मनुस्मृति ' रजोदशाने यही बात है- ' कन्या द्वादशवर्षे या न प्रदत्ता गृहे वसेत् । म्रणहत्याः होनेसे नामसे कही कन्या वरयेत् स्वयम् ' ( देखे वादी अपने मान्य मनुस्मृति-नो सिर उन वितुः तस्याः सा संस्करण काशी पृ. ७ में ) । इसमें पितृगृहमें बिना दान पर ष्ट चौखम्भा ) रजोदर्शनसे पिताको भ्रूणहत्या मानी गई है । ( नाई, वा विवाह पतुः तस्या स्मृतिको ' विद्वन्मनोहरा ' टीकामें भी ७७ पद्यकी व्याख्या हत्याका कुछ पराशर लिखा है - ' यो ब्राह्मणो मदेन - कामातिशयेन प्राक्रान्तचित्तः तां नेसे पों. करते हुए कन्यां समुद्वहति सा पितुर्ग हे तु या कन्या रजः पश्यति | रावलां संस्कृता । सा कन्या वृषली ज्ञया तत्पत्तिवृषलीपतिरिति मनुस्मरणात् । 7 श्रता वहाँ भी ' असंस्कृत ' का अर्थ ' अविवाहिता ' है, ' अनुपनौता ' नहीं । सा कन्या न यहाँ उक्त पद्य में ' अनुपनीता ' ग्रर्थ कट गया । इसमें हम अन्य प्रमाण स्मृतिपद्या; तो वादी देखता देखता थक जावेगा । पर ' श्री ' में वादीके बहुत ही खिये- मान्य ' पराशरमाधव ' का हम प्रमाण देते हैं । ७८ पद्यकी व्याख्या करते नी वापतेय श्रीमाधव लिखते हैं-८ ) महापर " ऋतुदर्शने सति श्रदाता न केवलं पितृनेव नरके पातयति, किन्तु गया है । पमपि सकुटुम्बः पतेद् इत्याह - माता चैव इति । श्रागे लिखते हैं-नसे भ्रूप मादयस्त्रयः कन्याप्रदानाधिकारिणः सर्वान् उपलक्षयन्ति । रजोदर्शनात् " या का प्रदानं यथा नरकहेतु:, तथा रजस्वलोद्वाहोपि नरकहेतुः - इत्याह-पदतां समुद्वहेत् कन्याम् ' ( ७12 ) इत्यादि, तां दृष्टरजसम् । असम्भाष्यत्व-कन्या पिता पात यत्वयोः हेतुः वृषली - पतित्वम् । छोड़ दे बिवाहात् पूर्वं दृष्टरजस्का वृषली । तथा च - ' पितुर्गेहे तु या कन्या वः पश्यति श्रसंस्कृता । सा कन्या वृषली ज्ञेया ' । यही वह वादी = ' सर्वात्मना दमृत श्लोक है । इससे श्रीमाधवचार्यने स्पष्ट बता दिया है कि यहाँ गतं स्था, संस्कृता ' का अर्थ ' विवाहरहिता ' है, पर अब पहले के मान्य ' पराशर-र्मशास्त्र ' न ' वादीके मत में ' वेदानभिज्ञ ' हो जाएंगे । यह है वादीकी उनका मदान्धता । ' असंस्कृता ' का प्रथं ' अविवाहिता ' है [ ७३ ९ · श्रीमतॄं हरिने वादी- जैसे केलिए ठीक ही कहा है - ' यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं इव मदान्धः समचरम्; तदा सर्वज्ञोऽस्मीति द्विप यदा किञ्चित् किञ्चिद् वुधजन- प्रभवदवलिप्तं ममं मनः । इव मदो मे व्यपगतः सकाशाद् ग्रवगतं, तदा मूर्खोस्मीति ज्वर ' । यह स.घ.का सैद्धान्तिक प्रसिद्ध पद्य है कि - लड़कीका ऋतुकालसे हो विवाह कर दो । उसमें भी वादी दुःसाहस करके अर्थपरिवर्तनमें पूर्व शोर लगाता है, खेद है वादीके इस दुस्साहसपर जोर-प्रयास तथा साहस है भी व्यर्थ ही, यज्ञोपवीतसे । वस्तुतः वादीका यह पर यज्ञोपवीतकी होनतासे हीन शूद्रसहा भले ही हो; शूद्र हो जानेका ' पितृगृह ' से कुछ भी सम्बन्ध नहीं; बल्कि उसका कथन हो व्यर्थ है? परन्तु पितृगृहसे विना ऋतुमती हो जानेका वृषलतासे सम्बन्ध तो स्पष्ट है । यज्ञोपवीतसे विवाह ब्राह्मणादि ' व्रात्य ' तो कहा जाता है, परन्तु शूद्र नहीं । होन आगे देखिये कि यह वादीका कितना दुस्साहस है- ' या कन्या पितृ-वेश्मस्था यदि पुष्पवती भवेत् । प्रसंस्कृता परित्याज्या ' इस पद्यको वादी ' श्री ' में अपने मान्य- ' विवाहकाल - विमर्श ' ( मैलापुर, मद्रास ) के पृ. ७६ से उद्धृत करता है, उसे कन्या- विवाहकालमें न लगाकर ' उपनयन - काल ' में लगाता है, और वहां ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अनुपनीता करता है । यही बात पूर्व - पद्योंकी है । ' विवाहकाल - विमर्श ' ' उपनयन ' का कोई प्रकरण न होनेसे वहां भी ' अविवाहिता ' ही है । ' असंस्कृता ' का अर्थ है पिताके घरमें रहकर पुष्पवती ' ऋतुमती ' हो जावे; छोड़ दिया जाय । उसका समन्त्रक- विवाह निन्द्य है यह तात्पर्य ' विवाहे च न योग्या स्यात् ' इस अग्रिम पद्य में होनेसे उक्त पद्यमें ' असंस्कृता ' का अर्थ कि - वैसी कन्या जो तो उसे बिना व्याहे है । इसकी स्पष्टता है । नहीं तो यहाँ पर ' विवाहे च न योग्या स्यात् ' यह न लिखकर ' उपनेतु न योग्या स्यात् ' यह लिखा होता, पर ऐसा नहीं लिखा । अतः यहाँ ' असंस्कृता ' का अर्थ

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७४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अविवाहिता ' है ७४२ ' अविवाहिता ' ही है । जैसेकि - ' मन्त्रैर्यदि न संस्कृता ' ( १।७।६५ ) ' केवलं मन्त्रसंस्कृता ' ( १७।६६ ) इत्यादि वसिष्ठ - धर्मसूत्र ( स्मृति ) के प्रमाण में है । क्या वादी यहाँ ' संस्कृता ' का अर्थ ' उपनीता ' कर सकता है? बल्कि ' न च मन्त्रोपनीता ' ( वसिष्ठ १७।६४ ) का भी ' मन्त्रैः अविवाहिता ' ही अर्थ है | क्या वादी हमारे वा अपने दिये पद्योंमें ' असंस्कृता ' का अर्थ ' प्रयज्ञोपवीतिनी ' यह अर्थ किसी प्रामाणिक एवं प्राचीन टीकाकारसे किया हुमा वा अनुमोदित हुआ दिखला सकता है? ' कुल्लूकभट्ट ' के ' असंस्कृत: ' का ' अनुपनीतः ' का अर्थ उक्त पद्योंमें वादी घटा भी नहीं सकता; क्योंकि यह पुंलिङ्गान्त है; और पूर्वोक्त पद्योंमें ‘ असंस्कृता ' यह स्त्रीलिङ्गान्त है । लिङ्ग - वैषम्य होनेपर विशेष-शब्दों में वड़ा अर्थभेद हो जाता है । ' रजस्वलः पुरुषः ' श्रा जावे, जैसेकि -मनुस्मृतिमें ' रजस्वलमनित्यं च ' ( ६।७७ ) तथा ' रजस्वला स्त्री ' श्रा जाय; तो क्या वादीकी शक्ति है कि उनका अर्थ समान कर सके? यह वादीका बड़ा दुस्साहस है कि - सनातनधर्मके पक्ष ( रजस्वला लड़कीका विवाह निन्द्य है - इस पक्षको ) बतानेवाले पद्योंका अपने दुस्साहससे ' उपनयन-हीना ऋतुमती हो जाय; तो वह वृषली है, यह वादी गलत अर्थ कर रहा है । यह अक्षम्य छल है । यमके राज्य में जानेके समय वादीको इसका भयङ्कर दुष्फल भोगना पड़ेगा - यह हम उसे चेतावनी देते हैं कि वह दयानन्दियोंकी मृत्युसे सबक सीख ले । हम अन्यत्र कह चुके हैं कि जहाँ ' असंस्कृत: ' यह पुंलिङ्गान्त पद श्रा जावे; वहाँ ' अनुपनीत: - ' पुरुषः ' यह प्रथं होता है, परन्तु जहाँ ' असंस्कृता ' यह स्त्री - लिङ्गान्त पद या जावे; तो वहीं ' प्रविवाहिता स्त्री ' यह अर्थ हुआ करता है । ' उपनयन संस्कारके बिना यदि लड़की ऋतुमती हो जाय ' यदि यह वादी माननीय मानेगा, तो उपनीताको ' ऋतु ' श्रानेपर भी यज्ञोपवीत उतारना पड़ेगा; क्योंकि तब पराशरस्मृति ( ७/२० ) प्रादिके अनुसार ' वृषली ' से भी अधिक ' चाण्डाली, ब्रह्मघातिनी तथा वादी यज्ञोपवीत नहीं पहर सकेगी । क्योंकि जब स्त्री ' शूद्र ' रजका होनेसे ब उसका श्रवर्ण चाण्डाली, रजकी, प्रादि यज्ञोपवीतकी अधिकारिणी है; तत्र साक्षात् देखा सकेगी? इस विषयमें हम अन्यत्र स्पष्टता कर चुके हैं । ' कैसे हो । सिद्धान को ' नित्य - यज्ञोपवीतिता ' ( शान्ति १४१।३६ ) यज्ञोपवीत पर यज्ञोपोठी ' । are एक पल भी नहीं रहना पड़ता । इस प्रकार स्त्रीको प्रयज्ञोपवोतिता के बिना स्पष्ट है । क्योंकि किसी भी प्राचीन पुस्तक में ' प्रसंस्कृता ' का वाहिवह जव सम्मत प्रर्थं नहीं माना गया है । विवाह: ‘ असंस्कृता ' कन्याका तो पितृकुलसे सम्बन्ध हुआ; उसी प्रसंस्कृत, यज्ञोपव उसी पितृकुल - सम्बन्घवालीका पितृकुलमें रजोदर्शन हो जाय; तो उसे है । वा वृषली बताया गया है । रजः कालमें पति न दिलवानेसे भ्रूणोंकी हल बताया हो जानेसे उसके पिताको भ्रूणहत्याका पाप वतलाया गया है । इसा दिखला-भाव यह हुआ कि - लड़कीका रजोदर्शन असंस्कृतात्व ( अविवाहितास ) इधर में न हो, अनुपनीतात्व में न हो, किन्तु संस्कृतात्वमें हो, उपनीतात्वमें हो । भी ' ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः ( औपनायनिकः ) स्मृतः लड़की ( मनु. २/६७ ) स्त्रियों का विवाह ही उपनयन - जैसा होता है । रजोदर्शन अनुसार का उपनयन अर्थात् यज्ञोपवीतसे कुछ भी सम्वन्ध नहीं; किन्तु परि ' वेदमात समीप नयनात्मक उपनयनसे सम्बन्ध है । तव ' प्रसंस्कृता ' वा अनुपनीताश अनधिक ' अविवाहिता ' अर्थ हुआ, यज्ञोपवीतिनी नहीं । ' प्रसंस्क व्याही तो उसका संस्कृतात्व - उपनीतात्व पतिकुलमें होनेपर हो सकता है । रज्जुसे पति के अतिरिक्त कन्याका श्राचार्य कहीं कहा ही नहीं गया । फलतः यह पतिकुल में उपनीत ( विवाहित ) होकर जानेपर लड़कीका रजोदर्शन ही लिख पतिकुल में हो, तब वह कन्या ' वृषली ' न कही जायगी । क्योंकि उमस । पक्षमें ' अ शुद्धावस्था ( ऋतुमतीत्वसे पूर्व ) में दान हो जानेसे वह फिर अशुद्ध सिद्ध मानी जाय? रजःकालमें पति निकट होनेसे फिर भ्रूणहत्या भी नहीं होती । तव लड़की के पिताको भ्रूणहत्या कैसे लगे?