सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 401–410

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 401–410

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७४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ur यही उक्त स्मृतिपद्यों का तात्पर्य है । जिसके तत्त्वको न समझ कर वादी स्मृतियोंसे अपनी नई एवं निर्मूल विधियां ही निकालने लगा होनेसे बह उसका परिणाम- पतन उसने प्राप्त कर लिया । यह विज्ञ पाठकोंने । तब साझा देखा ही है । इसे उल्टा बादी रजोदर्शनके बाद कन्याका कैसे हो सिद्धान्त भी खण्डित करवा बैठा । ' चौबेजी गये थे छब्वे वनने विवाहव्य: -यज्ञोपवीती कर आये ' । यह बात है भी ठोक ।, दुवे ही तके बिना चोपयोतिला वादी लड़की का विवाहावसरपर ही यज्ञोपवीत मानता है; क्योंकि का वादि वह जो हारीतका ' सद्योवधू ' का प्रमाण देता है, वहाँ ' उपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः ' यह स्पष्ट ही है । वादी जो ' गोभिल ' का ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' प्रमाण देता है, वह भी वहाँपर ' विवाहप्रकरण ' का हों - प्रसंस्कृत तो उसे है । वादीके मान्य म.म. पं शिवदत्तजी भी यही मानते हैं - यह पहले बताया हो जा चुका है । वादीने पार्वतीका उपनयन भी विवाहमें ही पोंकी हल दिखलाया है । इधर वादी कन्याका विवाह १७-२४ वर्षमें है । इस मानता है, चाहिताल ) इधर पितुर्गे हेतु या कन्या रजः पश्यति असंस्कृता ' में ' असंस्कृता ' का अर्थ त्वमें हो । भी ' अनुपनीता ' ही लेता है; तब वह पिताके घर में रहती हुई दृष्टरजस्त्रा :) स्मृतः लड़की १७-२४ वर्ष तक तथा विवाहिता तथा उपनीता न होने से वादी के रजोदर्शन- अनुसार भी वृषली ( शूद्रा ) हो गई । तब विवाहमें वह शूद्रा होनेसे ही किन्तु पति- ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १ ९ ७१ १ ) उपनयन तथा वेदक पत ग्रनधिकारिणी सिद्ध हो गई । यदि बादी इससे डरकर उक्त स्मृतिपद्य में ' प्रसंस्कृता ' का अर्थ ' विवाहिता ' स्वीकार करे, तो वह रजोदर्शन में ब्याही हुई होनेसे ' बृषली ' हो गई । इस प्रकार वादी ' उभयतस्पाशा-सकता है । रज्जुसे निगृहीत होकर बन्ध गया; अब हिल । फलतः यह सब हमने ' असंस्कृता ' के वादिसम्मत नहीं सकता । - रजोदर्शन हो लिखा है । यद्यपि इतना ' अनुपनीता ' अर्थको लेकर कि उस | पब ' प्रसंस्कृता ' का लिखना ही पर्याप्त है. तथापि उक्त स्मृति-सिद्ध अर्थ ' अविवाहिता ' ही है, इसे हम युक्ति - प्रमाणोंसे अशुद्ध करते हैं । उक्त पद्यका यह अर्थ है कि लड़की विवाहसे या भी नहीं पूर्व ' असंस्कृता ' का अर्थ ' अविवाहिता ' है [ ७४३ ही पिताके घरमें रज देखे; वह वृषली ( धर्मपतित ) होती है । उसके पिताको भ्रूणहत्याका दोष लगता है । उसका पति भी ' वृषलीपति ' होता है । कन्याका ऋतुकालसे पूर्व विवाह करना ' शास्त्रीय ' है । ' गौतम-धर्मसूत्र ' में लिखा है— ' प्रदानं प्राग् ऋतोः, श्रप्रयच्छन् दोषी ' ( २२६२१-२२ ) ( ऋतुकालसे पूर्व कन्याका दान कर दे; जो नहीं करता है, वह दोषी होता है ) । इसपर वादीके प्यारे टीकाकार श्रीहरदत्ताचार्यंने अपनी मिताक्षरावृत्तिमें लिखा है— ' ऋतुदर्शनात् प्रागेव देवा कन्या, तस्मिन् काले श्रप्रयच्छन् पित्रादिर्दोषवान् भवति । अत्र याज्ञवल्क्यः- पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा । कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः, श्रप्रयच्छन् समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतौ ऋती ' ( माचाराघ्या. ३।६३-६४ ) । इसी वादीके प्रमाणको ' परागरस्मृ ' के ७।७ माघवभाष्यमें भी दिया गया है । अन्य निबन्ध - ग्रन्थों में भी उद्धृत किया गया है । यहाँ स्पष्ट ही ऋतुकालसे पूर्व कन्या विवाह न करनेपर कन्याके पिताको भ्रूणहत्याका दोष माना गया है । ऋतुकालसे पूर्व अनुपनयनमें भ्रूणहत्या की कोई बात ही नहीं कही गई । बल्कि विवाहसे पूर्व पितृगृहमें भ्रूणहत्याका दोष व्यासस्मृति में भी कहा गया है— ' यदि सा दातृवैकल्याद् ( पिताकी उपेक्षासे ) रजः पश्येत् कुमारिका । भ्रूणहत्याश्च तावत्यः पतितः स्यात् तदप्रदः ( २1७ ) यही भाव यहांपर भी है । इसी प्रकार प्रङ्गिरः - स्मृतिमें भी लिखा है - ' पितुर्वेश्मनि या कन्या रजस्तु समुपस्पृशेत् । भ्रूणहत्या पितुस्तस्याः कन्या सा वृषली स्मृता ' ( १२६ ) ( यहाँ भी विवाहसे पूर्व कन्याके ऋतुमतीत्वमें पिताको दोष बताया गया है । प्रमाण इतने हैं कि - वादी सुनते - सुनते वा देखते-देखते थक जावेगा । इन्हीं हमसे दिये हुए स्मार्त - पद्योंका यही अर्थ है कि - पिता कन्याका रजस्वला होनेसे पहले ही विवाह कर दे । इन प्रमाणोंसे वादीसे सिद्धान्तित कन्याविवाहवय कट जाता है । यही लक्षण उस

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७४४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लड़की में भी वादी घटा ले, जिसके लिए वादीने यह ' पापड़ वेले थे ' वा फिर अपने अर्थ के अनुसार भी शूद्रा उस लड़कीको वेदका अधिकार देकर ' वेदमाता द्विजानाम् ' ( अ. १६७१।१ ) इस वेदके आदेश से भी विरुद्ध कर रहा है । वादी मान ले, तो उदयनारायणसिंह की टीका भी वेद बन जाती है । न माने; तो वेदमन्त्र भी स्वयं अवैदिक बन जाता है । अब हमसे उक्त पद्यके प्रथमें वादी उपपत्ति भी सुने । बादीसे दिये उक्त स्मार्त - पद्यों में भ्रूणहत्या तथा वृषलीपति यह जो दो पद हैं; वे हमारे पक्षके प्रबल पोषक हैं । क्योंकि कन्याका, विना उपनयन पितृगृहमें रजोदर्शन हो जानेसे पिताका भ्रूणहत्यासे कुछ भी सम्बन्ध नहीं, विशेष-कर तर्कप्रधान वादीके सम्प्रदाय में । अतः वादीका अर्थ ' निरुपपत्तिक ' है । ' अविवाहिता ' अर्थं करनेपर तो ' भ्रूणहत्या ' का ठीक ' समन्वय ' हो जाता है । विवाहसे पूर्व कन्या पिताके ही घरमें रजस्वला हो; तो उसका पति न होनेके कारण संयोग न होनेसे रजः कालके, ऋतुकालके उस समय वैयर्थ्यवश लड़की रजःकालर्के समय ' कामुकी ' हो जानेसे, जैसेकि वेद भी कहता है- ' जायेव पत्ये उशती ( कामुकी ) सुवासाः ' ( ऋतुस्नाता ) ' ( ऋ. १ ९ / ७१ / ४ ) ( स्त्री ऋतुस्नाता होनेपर पतिकी कामना करती है ) स्त्रीकी कामेच्छा पूरी न होनेसे भ्रूण मर जाते हैं; तब उस निमित्तसे उत्पन्न भ्रूण ( गर्भनिष्पादक प्ररोह ) मर जाते हैं; तब उसके निमित्त-कारण ( कन्या- विवाह न करनेवाले ) पिताको भ्रूणहत्याका दोष लगना स्वाभाविक होता है । इसी प्रकार उक्त पद्यमें ' वृषलीपति ' शब्द भी ' असंस्कृता ' का ' अविवाहिता ' ही अयं सिद्ध करता हैं । क्योंकि -पूर्व द्विजत्वाघायक -संस्कार विवाह न होनेसे वह वृषली ( शूद्रा ) और उसका पति ' वृषलीपति ' होगा ही । वादीका इष्ट अर्थ ' अनुपनीता ' होनेपर तो समयपर उपनयन न होनेसे ब्राह्मणादि शूद्र कहीं न कहा जाता । यदि वादी भी यही अर्थ करेगा; तो फिर इस अर्थसे शूद्रोंका यज्ञोपवीत खण्डित करवा ' वैदिक: ' वा ' प्रोपनायनिक: '? LOVE / [ ७ ९ ५ बैठेगा । फिर शूद्रोंको वेदाधिकार देना वादीके मतमें दोषनाथ निक जावेगा । भी खण्डित हो वादी क | वस्तुतः समयपर यज्ञोपवीतहीन ब्राह्मणादि ' शूद्र ' नहीं होता वि ' व्रात्य ' ( मनु. २।३ ९ ) तो कहा जाता है ।; किन् इंडिये न्यायदर्शन ( १ २ ।१३ ) में ' व्रात्योपि ब्राह्मण: ' व्रात्य उत्कार इति रहित ) को भी ' ब्राह्मण ' कहा गया है । मनुस्मृति में ' व्रात्य ( उपनयनादि । वेदाध्ययनमप्र व्रात्यक्षत्रिय ब्राह्मण ' ( १०१२१ ) | प्रादीनां ( १०।२२ ) व्रात्य वैश्य ( १०१२३ ) कहा गया है, पर धवन - प्रति ' व्रात्य शूद्र ' कहीं भी नहीं कहा गया । शूद्रको जब यज्ञोपवीत प्राप्त हो । स्त्रिया नहीं; तो फिर उसकी व्रात्यता कैसी? स्त्री भी यज्ञोपवीतहीन होने ईडिषेधात् ॥ शूद्र नहीं हो सकती । नहीं तो फिर यज्ञोपवीतहीन वादीके स्वामीको भी । तिवाच्च वादीके अनुसार शूद्र मानना पड़ेगा । यद्यपि फिर स्त्रीके ' व्रात्य ' हो जाने दक्ष तथा उससे यौनसम्बन्ध मनु २1४० पद्यानुसार निषिद्ध होनेसे उसमें दोष पर दिया उपस्थित होगा; तथापि ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः सनो इष्ट ( २।६७ ) अथवा ' औपनायनिक: पर: ' इस मनुपद्य के अनुसार विवाह ही है; इसलि उसका उपनयन होनेसे स्त्रीका व्रात्यत्व प्रसक्त ही नहीं होगा । १०० पैसे, पूर्वपक्ष - श्राश्चर्य तो यह होता है - आपको स्वयं इस बातका निश्चयवाही नहीं कि - ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां इस पद्यका जिसे अपने पक्षका फ्तायनि प्रबलतम समर्थक मानते हैं - ठीक पाठ क्या है? ' संस्कारो वैदिकः स्मृतः '? स्वानमें स्त्री श्रथवा ' औपनायनिकः स्मृतः? आपको स्वयं पहले शुद्ध पाठका निश्चय को उपन कर लेना चाहिये । ( जून १ ९ ४६ सार्वदेशिक ) ' संस्का उत्तरपक्ष - यह भी कोई श्राक्षेप है? मनुस्मृतिमें पाठ तो ' संस्कारी जाता वैदिकः स्मृतः ' यह है, पर कई लोग जिनमें वादिमान्य म.म. पं. शिवदत • स्त्रियों जी आदि भी हैं- ' प्रोपनायनिकः स्मृतः ' भी पढ़ते हैं । इसी भांति किगृहा ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणामीपनायनिकः स्मृतः ' ( १ | १२ | १६ ) यह पाठ - फलक ' बोधायनगृह्यशेषसूत्र ' में भी मिलता है । ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह ' पृ. ११२ तब जो ११३ में श्रीभट्टोजिदीक्षितने भी लिखा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीपान

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) OYE / ७४५ मतः ' । दोपनायनिको खण्डित वादीके प्यारे टीकाकार श्रीमातृदत्तने भी ' हिरण्यकेशीय - सत्याषाढ-हो में स्त्री - शूद्रोंके वेदोपनयनका निषेध करते हुए उक्त पाठ दिया है । ET; / रेखये- ' विद्यार्थिन प्राचार्यसमीपमुपगमनम् उपनयनम् । विद्यार्थस्य श्रुतितः इति वचनात् । तत् त्रैवर्णिकानामेव स्यात्, न तु शूद्राणामुपनयनम् / कार शूद्रादीनां प्रतिषेधात् । तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यमिति पनयनादिये वेदाध्ययनमिति ( १०/२१ / द्रादीनां प्रतिषेधात् । तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यमित्यादिना तत्समीपेऽ-) | भवन- प्रतिपेधाच्च । पुंसामेव क्रियते [ उपनयनादिकम् ], न स्त्रियाः ' । है, पर प्राप्त ' स्त्रिया नाध्येयम्, न स्त्री - शूद्रसमीपे ब्रह्म श्रावयेद् इति स्त्रीणामध्ययन-हो हीन होरे इतिषेधात् । पाणिग्रहों विधिः स्त्रीणामीपनायनिकः परः ' इति उपनयन-नामीको भीतित्वाच्च विवाहस्य ' ( १६ | १ | १ ) श्रीमातृदत्त के इस कथनसे वादीका - हो जाने तथा प्राक्षेप भी खण्डित हो गया । श्राप लोगों में भी बहुतसे यह उसमें दोष एक दिया करते हैं, क्योंकि - प्राप लोग ' अपनायतिकः परः ' में कुछ कः स्मृतः सनो इष्टपूर्ति समझते हैं; तब आप लोगोंको इस पाठका भी मोह न विवाह ही है; इसलिए हमने दोनों पाठ दे दिये । अर्थं दोनोंका ही समान है— १०० पैसे, वा एक रुपया । ' संस्कारो वैदिकः स्मृतः, श्रपनायनिकः स्मृतः ' का निश्चय बाद ही स्त्रियोंका वेद - सम्वन्धी संस्कार उपनयन तथा वेदारम्भ है । नेपा नायनिक भी वही है - उपनयन तथा वेदारम्भ - संस्कार । तब उनके : स्मृतः? सनमें स्त्री का विवाह होनेसे जैसे कि मातृदत्तने भी लिखा है - पृथक् का निश्चय इको उपनयनादिकी निवृत्ति हो जातीहै । ' संस्कारी ' संस्कारो वैदिक: स्मृतः ' यह पाठ प्रायः है । इसका यह अर्थ भी जाता है - स्त्रीणां वैवाहिको विधिः, वेदमन्त्रकृत: संस्कार: ' इससे - शिवरतन भाँति स्त्रियों वा लड़कियोंके विवाहसे भिन्न संस्कार मन्त्रहीन हो जाते हैं; पा कि गृह्यसूत्रों में वैसा माना है । तव वादीका यह आक्षेप समयनाश-यह फलक है । ः पृ.११- स्त्रोपान तब जो वादीने ' पितुर्गे हे तु या कन्या रजः पश्यति प्रसंस्कृता । सा ' प्रसंस्कृता ' अर्थात् अविवाहिता लड़की [ ७४७ कन्या वृषली ज्ञेया तत्पतिवृषलीपतिः ' ( प्रजापतिस्मृति ( ८५ ) तथा वृहद्यमस्मृतिका - - ' पितुर्गे है तु या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । भ्रूण-हत्या पितुस्तस्याः कन्या सा वृषली स्मृता । यस्ता विवाहयेत् कन्यां ब्राह्मो मदमोहितः । स विप्रो वृषलीपतिः ' ( ३।१८-१६ ) इस प्रकार ' देव ' का यह वचन श्रविवाहिता लड़कीके पितृगृहमें रजस्वला होनेकी निन्दाके हैं । इसमें लिङ्ग है- ' भ्रणहत्या पितुस्तस्याः इस पाठ में उपनयन न होने से ' भ्रूणहत्या ' का कोई सम्बन्ध नहीं । विवाह न होने से तो भ्रूणोंकी हत्याका सम्बन्ध स्फुट है । मार्कण्डेयका जो हेमाद्रिमें उद्धृत वचन – ' या कन्या पितृवेश्मस्था यदि पुष्पवती भवेद् । असंस्कृता परित्याज्या न पश्येत् ताँ कदाचन ' यह वचन भी ज्ञापक है । इसमें कहा है - यदि पिता के घरमें लड़की रजस्वला हो जावे; तो उसे ' असंस्कृता ' अर्थात् बिना विवाह छोड दे । यहाँ अनुपनीता ' ' प्रय॑से कुछ भी सम्बन्ध नहीं । इसलिए अगले पद्यमें भी स्पष्ट किया है - ' विवाहे च न योग्या स्यात् लोकत्रय - विगर्हिता । एतां परिणयन् विप्रो न योग्यो हव्यकव्ययोः । मैलापुरके ' विवाहकालविमर्श ' पृ. ७६ में उद्धृत पद्य हमारे ही पक्षके पोषक हैं । वादीका यहाँ ' अनुपनीता ' अर्थ करना शास्त्रविरुद्ध है, गलत है । इन पद्योंसे तो यह सिद्ध होता है कि- रजःकालसे पूर्व ही लड़कीका विवाह कर देना चाहिये । पृ. १४७-१४६ प्रागे वादी द्विजका द्विजानोंसे विवाह कहता है, पर ऐसा किसी भी शास्त्रमें नहीं लिखा, किन्तु ' उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ' ( मनु. ३।४ ) द्विजका सवर्णासे तो विवाह कहा है, द्विजासे नहीं । इस विषय में पृ. २०६ २०८ देखो । ' पत्युरनुव्रता भूत्वा ' आदि मन्त्र पतिके जो स्त्रीके अनुकूल धर्म हैं, उन्हींको करनेका नाम पतिव्रतधर्म है, अपने अनधिकृत कर्म करनेका नाम पतिव्रत धर्म नहीं । नहीं तो पति यदि किसी लड़कीको व्याहने जाता है; तो लड़की भी क्या किसी लड़कीको व्याहने जावेगी? पति यदि स्त्रीको

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७४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्त्रीनो ' ऋ ' क्यों कहा गया? गर्भ करता है; तो पत्नी भी क्या किसीको गर्भ करने जायगी? ' सहशीं भार्यां ' में भी यज्ञोपवीतादिका कुछ भी सम्बन्ध नहीं । लड़कीका विवाह हो जाना ही अनायास उसका उपनयन - स्थानीय हो जाता है, यह हम कई वार स्पष्ट कर चुके हैं । पृ. १४२-१४६ हिरण्यकेशीके ' भार्यामुपयच्छेत सजातां नग्निकां ब्रह्मचारिणीम् ' ( १६२ ) के ' ब्रह्मचारिणी ' का ही पर्यायवाचक वसिष्ठ-घर्मसूत्र में ' अस्पृष्टमंथुनाम् ' यह आया है । ' नग्निका ' का अर्थ ऋतुकालसे पूर्व कालवाली है, इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. २१८ - २२८ में देखो । इसलिए वेदमें ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( श्र. ११।५।१८ ) में कन्याका ब्रह्मचर्य ' उपस्थ- संयम ' ही है, यह हम पृ. ५५-७२ में स्पष्ट कर चुके हैं । अतः स्त्रीके पक्षमें ' ब्रह्मचारिणी ' का अर्थ ' वेदाध्ययन ' इष्ट नहीं है । अर्वाचीन-पुस्तक ' प्रणववाद ' में भी ब्रह्मचारिणीका वही अर्थ लेना चाहिये । ' प्रत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार- ब्रह्मचारिणी ' ( महा. शल्य ५४।६ ) ' सुतो घृतब्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ' ( ७ ) ' श्रुतावती नाम कुमारी ब्रह्मचारिणी ' ( ४८१२ ) इन सभी पद्योंमें ' कुमारावस्था में ही उपस्थ - संयमवती ' मैथुनके ' स्मरणं कीर्तनं केलि, ' हन आठ प्रङ्गों का आचरण न करनेवाली ' प्रथं है ) जैसे कि कहा जाता है- प्रमुक व्यक्ति ' बालब्रह्मचारी ' थे । आप अपने स्वामीकेलिए भी कहते हैं कि वे ' बालब्रह्मचारी ' थे । इससे उनका बाल्यावस्थासे ही ' मैथुनाङ्गोंका व्यवहारवर्जन तथा अन्त तक अविवाहितत्व सूचित होता है, यही बात उक्त स्त्रियोंकेलिए ' कौमार - ब्रह्मचारिणी, नियता ब्रह्मचारिणी, कुमारी ब्रह्मचारिणी ' आदिका इष्ट है । तव वादीका ‘ वेदज्ञानसम्पन्नता ' का अर्थ महाभारतको इष्ट न होने से खण्डित हो गया, यदि वादी चाहे तो महाभारतके वैसे वचन उद्धृत किये जा सकते हैं । दिङ्मात्र देखिये – ' न च स्त्रीणां क्रिया: काश्चिद् इति नर्मो व्यवस्थितः । निरिन्द्रिया ह्यशास्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः ' ( श्रनुशासनपर्व ४०।११ ) यह बात यहां ' प्रशास्त्राश्च हनें नहीं तब वादी ग्रन्थकर्ताके श्रभिप्रायसे विरुद्ध अर्थोको ' से सिद्ध है । ' सहस्र करता है? क्यों ठूस दिया पर्य है पृ. १५४ वादी कहता है- ' विवाहके अवसरपर लेका पो सामाऽहमस्मि ऋक् त्व कहता है, उसे वेदज्ञानका अधिकार वर, व को पिता ' ऋग्वेद - स्वरूपिणी ' कहना प्रसङ्गत होता है ' । न हो / २ / २२७ प वेदनात वादीके इस उल्लेखपर सचमुच प्राश्चर्य होता है । जहाँने नहीं निकल सकती; वहाँ भी वादी भगवती श्रुतिसे बलात्कार वहाकाव है । मालूम होता है कि वादीके उसकी समझमें जोरदार कोररक्षण पित, शस्त्राको हो गये । तब कमजोर शस्त्र भी ' फणाटोप ' रूपमें दिखलाने पड़ते हैं । यदि ि ' ऋक् ' का वादी - द्वारा ' ऋग्वेदस्वरूपिणी ' श्रयं कहना उपहासास्प लोग है । इसका भाव क्या यह होगा कि स्त्री तो ऋग्वेदस्वरूपिणी है, हो; तो तो ऋग्वेद न पढ़े, पर पति ऋग्वेदस्वरूपी नहीं; अतः वह नहीं क न पढ़े? महाशय! यह तो पुलिङ्ग स्त्रीलिङ्गका जोड़ा बनाया गया है । शेष रह देखो शतपथब्रा. में ' ऋक् च वा इदमग्र साम च श्रास्ताम् । ' मे - महाभ नाम ऋग् ग्रासीत्, अमो नाम साम । सा वा ऋक् साम उपावदन्- महाभारतादि मिथुनं सम्भवाव प्रजात्या इति । साम वा ऋचः पतिः ' ( ८१३११ ) रहा है - स्त्री ऋक् और साम ये दो थे । ऋक्ने सामको कहा कि हम दोनों सा मुनिन जावें, इससे हम वढ़ जावेंगे । साम ऋक्का पति हुआ । सो इसी काम शिक्षा क वैवाहिकमन्त्र में पतिको ' साम ' कहा गया है, श्रीर पत्नीको ऋक् । वादि श्रादिव प्रोक्त कारण कि पत्नी ऋग्वेदस्वरूपिणी है - यह उपहासास्पद है । हम भी पाठकोंने देखा होगा कि - यह लोग साधारण जनताको वरगलाने केलिए दम उसक बिना सिर - परके कितने गलत हथकण्डे अपनाया करते हैं । जैसे बाल मन्त्रमें द्यौ श्रौर पृथ्वीका जोड़ा बताया गया है, वैसे ही पति - पलीका के भी आ भी दार्यार्थ जोड़ा बताया गया है । वादिप्रोक्त कुछ भी काम

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नहीं है । पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते ( मनु. २।१४५ ) का यह सिद्ध है । सहस्र ं तु काम केवल थोड़ेसे मिनटोंका है शेष गर्भधारण है कि - पुरुषका,, साप स्तन पिलाना आदि कठिन काम स्त्रीके जिम्मे होने से पोषण, उज्बेका भी अधिक दर्जा दिया गया है । इसलिए श्रीकुल्लूकभट्ट वरको पितासे टीकामें लिखा है- ' मातुः तावत् कुक्षौ धारणदुःख र न हो: २२७ पद्यकी रक्षणवर्धन- कष्टं च पितुरधिकानि, वेदनातिशयः, जातस्य एव बच्चेको गर्भ में धारण करनेका दुःख, प्रसवकी भारी वेदना, हां वह यताका वर्धनका कष्ट पितासे अधिक ही हुआ करता है । ) इसी से रकार कल होर रक्षण, जाता है । शस्त्र समाप् को पितासे बढ़ाया पड़ते हैं । यदि विद्या के पढ़नेके लिए माताको पितासे बढ़ाना इष्ट होता; तो उपहासास्ट लोग भी पिताको १२ वर्ष पढ़ाते, और माताको १०० साल न पेणी है, नहीं तो ५० वर्ष तो कमसे कम पढ़ाते ही; पर आप लोग भी जब वह ऋषेः सा नहीं करते; तब आप लोगोंका अभिप्राय भी सिद्ध नहीं हो सकता । या गया है । शेष रहा स्त्रीको वेद पढ़ाना, उसका उसको अधिकार नहीं । हाँ, नाम् । पुराण - महाभारतादिसे वही वेदका अभिप्राय सुन सकती हैं । क्या - उपावदन- महाभारतादिमें वेदका ज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान नहीं? तभी तो ( ८११३१ ) रह है - स्त्री शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमाख्यानं हम दोनों कुखा मुनिना कृतम् । ( श्रीमद्भा. १।४।२५ ) इसी का शिक्षा वेदाध्ययनपर अवलम्बित नहीं, किन्तु बिना पढ़े भी पिता-दृक् । बादि धा श्रादिके उपदेश - द्वारा लड़की शिक्षित हो सकती है | स्त्री - शिक्षाके सास्पद द है । हम भी विरोधी नहीं । केवल अनधिकृत वेदाध्ययनके प्रतिरिक्त शेष गला नेकेलिएवम उसके लिए पिता श्रादि द्वारा निषिद्ध नहीं । वेदज्ञान सम्पन्नता । जैसे उम्र मात्र बालकोंपर प्रभाव डालनेवाली होती; तो वेदके विद्वान् रावणके पति - पलीका के भी अच्छे बनते । वह स्वयं भी अच्छा होता । यह वादीका भी काल ऐतिहासिक दृष्टि [ ७५१ हेत्वाभास है । पृ. १५१-१५२ ' उपाध्याया, प्राचार्या श्रादि पर हम पृ. १७५-१८२ में स्पष्टता कर चुके हैं । प्राजकल भी स्कूलोंके वेदज्ञानहीन प्रिसिपलोंको मी ' आचार्य ' कहा जाता है । निरुक्तमें प्राचार्य में उपनयनका सम्बन्ध नहीं बताया गया | व्याकरणमें भी ' आचार्य'का कुछ भी ' व्याख्यात्री ' कहा है, उसमें भी उपनयनका वा वेदका कुछ अर्थ भी अर्थ नहीं । पञ्चम अध्याय ( ऐतिहासिक - दृष्टि ) पृ. १५६-१५९ ब्रह्मवादिनी एवं ऋषिकाग्रोंके विषयमें हम पहले पृ. ७२-८९ में वादीको अकाट्य उत्तर दे चुके हैं । वादी लिखता है— ' आप ही अकेले विद्वान् हैं, जो इस वातसे इन्कार यह कहकरकरना चाहते हैं कि - ' ऋषिकाओं और देवियों [ देवताओं ] की योनि मनुष्योंसे पृथक् है ', तथा ऋषिकाएं पढ़ती नहीं थीं । उन्हें स्वयं ही वेदमन्त्रोंका भान हो जाता था । हम क्या; वल्कि सभी प्राचीन वेदादिशास्त्र, सिवाय दयानन्दियोंके, इसपर सहमत हैं कि ऋषि देवता श्रादि मनुष्ययोनिसे भिन्न थे, हम वेदादिशास्त्रोंके पचासों प्रमाण ' आलोक ' ( ४ ) पृ. ४०५ से ४२० पृ. तक लिख चुके हैं । जोकि विद्वान् पुरुषों का ही नाम देवता एवं ऋषि मानते हैं, इसका भी पूरा समाधान हम ' आलोक ' ( ४ ) पृ. ४२१ से ४३७ पृ. तक कर चुके हैं । शेष हैं - देवता तथा ऋषियोंका बिना पढ़े ही मन्त्रका दर्शन, इसमें सभी वेदादिशास्त्र सहमत हैं । देखिये निरुक्तमें ब्राह्मणभागका प्रमाण लिखा है – ' ऋषिदर्शनात् । स्तोमान् ददर्श इति श्रौपमन्यवः । तद् यद् एनान् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु प्रम्यानर्षत्; ते ऋषयोऽभवन्; तद् ऋषीणामृषित्वम् इति विज्ञायते ' ( २।११।१ ) अर्थात् तपस्या करते हुए जिनको वेदमन्त्र स्वयं हृष्ट हो गये, वे ही ऋषि बने । इससे स्पष्ट है कि ऋषियोंने वेद नहीं पढ़ा । स्वयं उन्हें वेद प्रतिभात हो गये ।

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७५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इसलिए श्रीदुर्गाचार्यंने अपने भाष्यमें स्पष्ट लिखा है - प्रनधीतमेव तत्त्वतो ददृशुः तपोविशेषेण ' ( २।११।१ ) । अर्थात् बिना पढ़े ही उन ऋषि ऋषिकाद्योंको वे वेदमन्त्र प्रतिभात हो गये । यही ' ऋषि ' शब्दका मुख्य अर्थ ' ऋषि - दर्शनात् ' ( २।११।१ ) यह निरुक्तका ' ऋषि ' शब्दका मुख्यार्थ है । इसलिए ऋषि, मनुष्ययोनिसे भिन्न माने गये हैं, और वे. प्रायः प्रयोनिज होते हैं । ' तत्र प्रयोनिजम् श्रनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देव-ऋषीणां शरीरं धर्मसंहितेम्योऽणुभ्यो जायते ' ( प्रशस्तपादभाष्य द्रव्यग्रन्थ पृथिवीनिरूपण ) इसलिए विश्वामित्र वसिष्ठादि ऋषियोंकी उत्पत्ति इतिहास में प्रयोनिज प्रसिद्ध है । इसलिए महायज्ञोंमें देव अलग हैं, ऋषि अलग हैं, मनुष्य अलग कहे गये हैं ( मनु. ४।२१ ) वेदमें भी ' देवान् मनुष्यान् प्रसुरान् उत ऋषीन् ' ( अथवं. ८२४ ) देवता, मनुष्यों तथा ऋषियों को अलग - अलग माना गया है । इस विषयमें विशेष ' ग्रालोक ' ( ४ ) पूर्वोक्त लेखोंमें देखो । इसलिए मन्त्रोंमें उन - उन ऋषियोंका नाम भी श्राता है । इसके लिए कुछ सूची स्वा. भगवदाचार्यने ' दशोपनिषदः ' के ' उपनिषदां सृष्टिः ' के २१-२२ पृष्ठमें प्रत्रि, श्यावाश्व, त्रित, पुरुहन्मा, गोपवन, विरूप प्रादि नाम वताये हैं । ' मन्त्रद्रष्टारः ' की स्पष्टता हम अभी - अभी कर ही चुके हैं । आगे वादीने धूर्ततासे साधारणजनोंकी दृष्टिमें धूलिनिक्षेप करके सायणादिके कुछ क्वाचित्क वचन देकर उनसे सिद्ध करना चाहा है कि-ऋषि प्राजकल सभी मनुष्य हो सकते हैं ' । क्या वादीमें यह शक्ति है कि-ऋषि मनुष्य है - वह श्रीसायणादिका कहीं ऐसा सिद्धान्त दिखला सके, कहीं - कहीं जो सायणादिने ऋत्विग् श्रादिके विशेषण होनेसे श्रीरविशेषण के यौगिक होने से कहीं उनसे ऋत्विजोंका ग्रहण किया हो, यह श्रौर बात है, पर इससे उनको मुख्य - ऋषि नहीं माना जा सकता । ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः, स्तोमान् ददर्श ' इस निरुक्तका वचन लिखा है, वहाँ अर्थं वादीने अपना घुसेड़ दिया है, वहाँ लुप्त मन्त्रों तथा सूक्तोंका ऋषियोंको मन्त्र प्रतिभात हुए, अर्थ नहीं [ ७५३ ऋषियोंको दर्शन हुआ, वहाँ मन्त्रोंका रहस्य वा अयका यह मंत्र । श्र गया । क्या मन्त्रोंके रहस्य वा प्रर्थीको वादी ' मन्त्र ' दर्शन नहीं साते हैं । क तब वादी ब्राह्मणभागको जोकि मन्त्रोंका भाष्य ( वेद ) मानता है! है उन्हें वेद मान लेता? ( रहस्य ) है, क्यों नहीं हीनतासे दादिका हम जिस प्रकार उन उन ऋषियोंको वे वे वेदमन्त्र स्वयं प्रतिभात नाम उनको उनसे पूर्व कभी अन्यने नहीं देखा था; तव ' ऋषयो हो गये; हार्दिका हैं, क का अर्थ ' मन्त्रोंकी द्रष्ट्री ' लिखकर फिर उसमें अथवा उनके मन्त्रद्रष्टार ' । डाली और प्रचारके कारण ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः ' ' ऋषिका के रहस्यके दर्शन लिख । गौरवसूचक शब्दसे श्रीसाया भी पुकारा जाता है इस प्रकार वादी अपने प्रथको भी पदा मूल पुस्तक प्रत्यक्ष प्रथमें घुसेड़कर जनवञ्चन बहुत किया करता है । अनुसन्धानसे - दर्श जनता इसीलिए उसकी बातोंसे मोहमें पड़ जाती है । विरहित आगे वादीने वृहद्देवताकी श्रार्षानुक्रमणीसे जो ऋषियोंकी पृ. १६ सूची हलिजः दी है. उसमें केवल ' सूक्तस्य, संवादस्य ऋषि ' ( ११३० ) लिखकर लिखी ह हमारा पक्ष सिद्ध कर दिया है । यहां कहीं भी ' मन्त्रोंके अर्थंका पढ़नेवाली ऋषिका होती है ' - यह नहीं कहा गया है । ' आयं गौरिति सूक्तस्य हृत्विक श्र सार्पराज्ञी मुनिः स्मृता ' ( १०१६८ ) एतदादि - पद्योंमें सूक्तस्य कहा है, साचित्कता सूतके ' अर्थ ' का नाम नहीं लिखा । तब बादीको यह लिखना कि इसके से करता ह होते हुए कोई भी निष्पक्षपात विद्वान् इस बात से इन्कार नहीं कर सकता, इस प्रक कि वैदिककालमें स्त्रियां न केवल वेदोंको पढ़ती - पढ़ाती थी; किन्तु उनका लेना मनन करने में प्रवृत्त भी थीं । उनक दाब यही यह वादीका अनुसन्धानसे विरहित जनता की आंखों में धूल झोंकना बोधायन | अपना बहुमत दिखलानेकेलिए आधुनिक भारतीय सुधारक विद्वानोंके | यह तो एक द्वारा वादीने लार्ड मैकाले के मानसिक दास श्री रमेशचन्द्रदत्त, भगवतशरण सवारी र उपाध्याय एम.ए., वामनपाण्डुरङ्ग काणे; श्रीमहादेव शास्त्री, मि. रागोजिन, धर्यसमाज में डा. गोथरसमीज एम.ए., आदिका नाम भी जनवञ्चन के लिए ही लिया साप्त होते स ० ध ० ४८

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७५३ पढ़े व्यक्ति तो ऋषिकाओंको वेदमन्त्रोंको बनानेवाली यह मंत्र जी भी अपने निरुक्तालोचनमें इनको मन्त्र बनानेवाले 1 । श्रीसामश्रमी भी यह मानता है? यदि नता राजते है । क्या वादी बातोंको क्यों मानें? विरुद्ध गलत क्यों नहीं चीनतासे समाधान सम्यक्तया कर चुके हादिका हम भी वादीने गलत ही लिखा है । हो गये हादिका नाम में उनका नाम ऋषिका है ऋद्रष्टार मानते हैं, वेदमन्त्रों व्यके ' जख डाली हैं । नहीं, तब हम भी उनकी शेष म.म. पं. शिवदत्तजी हैं । जैमिनि न्यायमाला हम मन्त्रद्रष्ट्री तो उनको — यह वादीने गलत बातें दर्शन णाचार्य ने ऋषिका ' श्रतीन्द्रियार्थद्रष्टा ' अर्थ तो लिखा है कि वे कान्द tara को भी देख लिया करते थे, ' मन्त्रकृत् ' में करोतिस्तत्र पुस्तको प्रत्यक्ष पदार्थों: ' तो माना है, पर वादीका इष्ट अथं कहीं नहीं माना i । विरहित मन्त्र ) दर्शनार्थ १. १६१ में जो वादीने ' ऋषीणां पुत्रः ' ( काण्बसं. ५२४ ) में की सूची विज: ' देदविदश्च श्रत्र ऋषय इत्युच्यन्ते ' सायणके नामसे जो गलत लिखकर पर लिखी है, यह जनवञ्चन है । इसका भाव तो यह है कि - ' अनं ' इस पढ़नेवाली में ही केवल वैसा है, सर्वत्र ऐसा नहीं । तव वादी यज्ञ करनेवाले सूता और वेद जाननेवाले को यहाँ ऋषि कहा गया है, इससे उसकी कहा है, साचित्कता बतानेवाले सायणाचार्यके वचनको सार्वत्रिक कहनेकी धृष्टता क- इसके ले करता है? सकता इस प्रकार ' ऋषिभिः ऋत्विग् यजमानं: ' ( काण्व. १३ ) आदि में भी न्तु उनका क लेना चाहिये । शतपथ ( ४ । ३ । ५१६ ) में भी ' अनूचानः ऋषिः यहाँ ' आर्षेय ' का अर्थ लिखा है - ' ऋषि ' का नहीं । झोंकना वोघायनगृ में जोकि वादी ' चतुर्वेदाद् ऋषिः ' ( ११७/७ ) यह लिखता विद्वानों वह तो एक पारिभाषिक शब्द है, जोकि विवाह हो जानेपर छः महीना बावतराल हचारी रहे; उसकी सन्तानका नाम ऋषि ' कहा गया है । तब रागोजिन, एसमाज में कोई भी ' ऋषि ' नहीं बन सकेगा; क्योंकि वहाँ तो विवाह लिना साठ होते ही ' आँख से प्रांख ' तथा शुक्रका स्थापनादि शुरू हो जाता . देव मनुष्य - भिन्न योनि हैं [ ७५५ है; तब स्वा. द. भी ऋषि न हुए; क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं कि-उनके पिताजी व्याहके बाद छः मास ब्रह्मचारी रहे हों; तभी दयानन्द पैदा हुए हैं । वहीं भ्रूण ( ११११४६ ) की परिभाषा भी लिखी है— ' सूत्रप्रवचनाध्यायी '; तब क्या ' भ्रूणहत्या पितुः तस्या: ' उसी ' सूत्र - प्रवचना-ध्यायी ' की हत्याका निर्देश है? वादीने एक नोटबुक बना रखी है; उसमें जहाँ उसे अपने पक्षकी सिद्धिका प्राभास हो जाता है, वहाँ वह उसका पूर्वापर छिपाकर पाठ नोट कर लिया करता है और फिर अनुसन्धान - विरहित जनताके वही सामने उन्हें रख देता है । वहीं जनता भी उसे वेदका बड़ा विद्वान् मान लिया करती है । पर महाशय; यहाँ आपकी दाल नहीं गलनी है । हमने तो पूर्वापरको उपस्थित करके वादीका ' पर्दाफाश ' कर देना है । अब क्या वादी ' यव ऋषयो जग्मु ' ( यजु: १८५८ ) श्राजकलके मन्त्रार्थ-लेखक श्रीजयदेव श्रादिको ऋषि मान लेगा? पृ. १६२-१६६ में अपनी ' नोटबुक ' का पाठ देवी - देवताओंके विषयमें देकर जनवञ्चन करता है । फिर कहता है - ' देवके विषय में विस्तृत विचार करनेके लिए यहाँ अवसर नहीं, किन्तु एक ग्रन्थकी आवश्यकता रखता है । तब वादीने वैसा ग्रन्थ क्यों नहीं बनाया? केवल इसलिए कि वह बन नहीं सकता; वह तो ' बिना दीवारका चित्र ' बन जाता । पर अपनी ' नोटबुक ' से कुछ वचन देता है । हम भी उसपर प्रत्युत्तर देते हैं । लिखता है-' द्वया वे देवा: ' ' अहेव देवा ' । अथ वै ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचानाः, ते मनुष्य देवाः... यज्ञ आहुतयएव देवानां, दक्षिणा मनुष्यदेवानां ब्राह्मणानाम् । आहुतिभिरेव देवान् प्रीणाति, दक्षिणाभिर्मनुष्यदेवान् ब्राह्मणान् ' ( शत. ४ | ३ | ४४ ) यहाँ वादीने ' मनुष्यदेव ' ब्राह्मणोंका लक्षण लिखा है, इससे उसका मत स्वयं खण्डित हो गया । यहाँ पाठ था- ' द्वया वै देवा देवाः, अहेव देवा: । ' यहाँ तात्पर्य यह था कि- एक होते हैं- ' देवादेवा: ' दूसरे

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७५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) होते हैं, ' मनुष्य - देवाः ' वादीने यहाँ ' देवा देवा: ' में एक ' देवा ' को छिपाकर जनवञ्चन किया है । जो देवादेवा हैं, उन्हें तो ' देवा ' कहा जाता है, पर ' मनुष्यदेवाः ' को शतपथने कहीं ' देवा ' नहीं लिखा । जो ' मनुष्यदेवा: ' में वाचक - लुप्ता उपमा है- ' मनुष्येपु देवा इव ' । तभी उनको ' भूदेव ' भी कहा जाता है, भूसुर भी; पर उन्हें ' देव ' नहीं कहा जाता हैं । इससे ' देवा देवा: ' तो ' देव ' सिद्ध हो गये, पर ' मनुष्यदेवाः ' ब्राह्मण ' देव ' सिद्ध न हुए । यदि कहा जाता; तो उन्हें भी ' देवा देवाः ' कहते । यदि कहीं उनकेलिए भी ' देवा ' पद आ जाय, तो वहां उनकी स्तुतिकेलिए या विशेषणतामें वह प्रयोग होता है, वास्तविकतासे नहीं । यदि ब्राह्मण भी वस्तुतः देवता होते; तो उन्हें भी शतपथ यज्ञमें प्राहुतियां दिलवाता, उन्हें दक्षिणा न दिलवाता । यह इतना स्पष्ट भेद है कि - वादी विचारेके मुंहमें इससे ताला लग गया । ' उभये देवा: ' में ' देवा ' शब्द संक्षेपार्थ है, जैसेकि हम ' सनातनधर्मालोक ' को ' आलोक ' लिख दिया करते हैं । जो कि - वादी कहता है कि- ' यहाँ स्पष्ट वेदाध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंको ' मनुष्यदेव ' कहा गया है, वह अग्नि सूर्य आदि प्राकृतिक जड देव उनके भेदकेलिए है, यह भी वाढीकी बात गलत है । ' यज्ञ ' श्राहुतयो देवानाम्, ग्राहुतिभिरेव देवान् प्रीणाति ' इसमें वादी जो देवताओंको आहुतियोंसे प्रसन्न होना मानता है- ( प्रीणाति )? जब वे प्रसन्न हो जाते हैं; तो वे चेतन हुए, जड़ कहां हुए? क्या जड़ोंकी प्रसन्नता मानते हो, यदि नहीं; तो स्वा. द. का तथा दयानन्दियोंका खण्डन हो गया । -' एते वै देवाः प्रत्यक्षं यद् ब्राह्मणाः ' ( कृ.तै.सं. ११७१३ ) यहां प्रशंसार्थं ब्राह्मणोंको ' देवा ' कहा गया है, इसका ज्ञापक है साथका ' प्रत्यक्ष ' शब्द | यहाँ ' विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तर- पदलोप: ' इस वार्तिक से ' मनुष्य ' का लोप हो गया । सौ ' देवा देवा: ' तथा ' मनुष्य देवाः ' कहनेसे स्पष्टतया देवों और मनुष्योंका भेद देवोंकी मनुष्यता तथा मनुष्यों का देवत्व खण्डित होकर ' उदुत्वा योनि भी सिद्ध हो गई 1 । इससे वादीका पूर्ण खण्डन दोनोंको देवता कृ.य.तै.सं. में भी वादीने अपनी सदाकी हो गया । देवाः भी वस्तुतः दुष्प्रकृतिसे की तरह छिपा लिया है, हम वह पाठ प्रकट करते हैं । वह यह है- कुछ पर पर्या बले ' परोक्षं वा अन्ये देवा इज्यन्ते, प्रत्यक्षमन्ये । सहित अर्थ देवाः परोक्षमिज्यन्ते - तानेव तद् यजति ' । यद् श्रन्वाहार्यमाहरति यद् यजते । कारी देव देवाः प्रत्यक्ष यद् ब्राह्मणाः, तानेव तान् प्रीणाति । ग्रथो एवं से ॐ प्रमाणो दक्षिणा एषा ' ( १ । ७ । ३ । १ ) यहाँ दो देवता बताये गये हैं- हा है । प्रत्यक्ष । सो मनुष्यदेव ब्राह्मण यहाँ प्रत्यक्ष ( मनुष्य ) वताये एक परोक्ष गये हैं ।, दु जोकि वा परोक्षदेव स्वर्गादिमें बताये गये हैं । चारगाचार्य इससे वादीका पक्ष सिद्ध न हो सका । तात्पर्य बही निकला वि. ' देवा - देवाः, मनुष्य - देवाः ' उसीको वहाँ ' प्रत्यक्ष परोक्ष ' शब्दले लिखा है । नहीं होत अतः वादीका पक्ष सिद्ध न हो सका । वादी इस प्रकार की बहुत सो छिपाकर जनवञ्चन किया करता है । पर उसका हम पर्दाफाश कर देते! ' इन्द्रो वे इसलिए वह हमें गाली देता है । इसी अपने खण्डन हो जाने के कासके कि अथ हमारे लेखोंको दुराग्रहसूचक और सारशून्य ' ( पृ. १३८ ) कहता है- ( श ' अशक्ताः तत्पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' । वैसे तो पृ. १६५ इसी प्रकार गोपथके ' अन्ये हुतादोऽन्येऽहुतादः । एते वै देश गया है, अतादो यद् ब्राह्मणा: ( उ. ११६ ) का भी समाधान हो गया । पर लाक्षणि ' यज्ञो वो [ देवान् ] अन्नम्, श्रमृतत्वं वः ' ( २४/२/१ ) देवताओंका राणी ' नहीं यज्ञ वताया गया है— ' सायं प्रातर्वोऽशनम् ' [ वः - मनुष्याणाम् ] ( २० ) श्रा २।३ ) यहाँ मनुष्योंका अभ्न यज्ञको न बताकर सायं प्रातः प्रशन ( भोक्य ) - राज्ञो माना है । यहाँ ' हुताद ' देवता मुख्य हुए । मनुष्योंको ' ताई ' बहाली देवता ' बताया गया । सो यहाँ भी ब्राह्मणोंकेलिए ' अताद ' का पुछल्ला ' प्रादिको पक्षको काट रहा है ।

पृष्ठ 409

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देवा: ' ( काठ.सं. ) में ' मनुष्या ' वे विश्वे देवा ' में ' व ' विश्वे ' उदुत्वा मनुष्यवाचकता नहीं हो सकती है । वहां पर ' प्राणा वै नोकी शिक नं देवताओंकी लिखा है । सो ' प्रायुर्वे घृतम् ' ( कृ.य.तं.सं. २३२२ ) के । देवा: ' भी पर्यायवाचकता नहीं रहती । कार्यकारणभावादि-तसे कुछ पर की तरह इनकी नहीं हो जाती । वल्कि ' मनुष्येभ्यो हितः ' इस से पर्यायवाचकता में ' यत् ' प्रत्यय होकर ' हलो यमां ' से यलोप होकर मनुष्यों के हित अर्थ यजते; प देवता हैं, यह अर्थ भी हो जाता है । कारण यह है कि-हरति कारी देवता मनुष्योंसे भिन्न होते हैं यह सिद्ध किया जा दक्षिणा प्रमाणोंसे परोक्ष का है । , दु ' जोकि बादी कहता है -- ' पत्र देवासो अजुषन्त विश्वे ( यजुः ४।१ ) गये हैं । महापगाचार्यजीको भी लिखना पड़ा है कि- ' अस्मिन् मन्त्रे देवशब्देन विज ब्राह्मणाः विवक्षिताः ' सो ' अस्मिन् मन्त्र ' कहनेसे ग्रन्य मन्त्रों में निकला हि नहीं होता, यह सिद्ध हो गया । तब इससे वादीका पक्ष प्रसिद्ध दसे लिखा है बहुत - सी कर देते ' इन्द्रो वै यजमानः ' ( शत. ५ | १ | ३ | ४ ) यहाँ इन्द्रका अर्थ क्षत्रिय है । जाने के काल कि प्रथां राजन्य ( क्षत्रिय ) स्य यज्ञः, यत एतेन इन्द्रोऽयजत क्षत्र कहता है- इन्द्रः ' ( शत. ५।१।१।११ ) । वैसे तो ' यूपो वै यजमानः ' ( शत ) में यूपको भी यजमान । एते वै वह गया है, इससे यूप यजमान वा यजमान यूप नहीं हो जाता । ऐसे । दांत पदे - गेर लाक्षणिक होते हैं । उस लाक्षणिक इन्द्रकी पत्नी ' इन्द्री ' कहावेगी; ताओं का ही नहीं । गाम् ) ( २ रानी श्रादिके लिए जो ' देवी ' शब्दका प्रयोग आता है, उसमें कारण शान ( भय ) - राज्ञो विश्वजनीनस्य यो देवो मर्त्या प्रति ' ( अ. २०।१२७।७ ) वादी तो देवता ह्यषा नररूपेण तिष्ठति ' ( मनु. ७/८ ) अतः राजाकी छला " प्रादिको ' देवी ' कहा जाता है । और फिर राजाको देवांश माना ब्रह्मचयंका अर्थ ' उपस्थसंयम ' है [ ७५ जाता है । जैसे कि - मनुमें- ' इन्द्रानिलयमा कांणामग्नेश्च वरुणस्य चन्द्रवित्तेशयोश्चैव च । माता ग्रादिका मात्रा निर्हृत्य शाश्वती: ' ( ७४ ) तब उसकी स्त्री वा नाम भी ' देवी ' कहा जाता है । पृ. १६७ - १६६ ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इस मन्त्रको वादीने फिर व्यर्थं ला पटका है । हमने पृ. ५५-७२ में स्पष्ट सिद्ध किया था कि- ' ब्रह्मचयं-सूक्तमें ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' उपस्य संयम ' में ही प्राता है, वेदाध्ययनार्थ में नहीं । इसमें इस सूक्तके मन्त्र देखिये – “ प्रोषधयो भूतभव्यम् वनस्पतिः । संवत्सरः सह ऋतुभिः ते जाता ब्रह्मचारिणः ग्रहोरात्रि: पार्थिवा दिव्याः पशव मारण्या ' ( प्र. १११५२० ) ग्राम्याश्च ये । अपक्षाः पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः ' ( २१ ) तब इन पशु - पक्षियोंका ब्रह्मचयं क्या वादी वेदाध्ययनार्थंक कहेगा? पृ. १६६-१७० ' ब्रह्म ' का प्रयं केवल वैद नहीं होता, अन्य अर्थ भी होते हैं - ब्रह्मचयंका जो श्रीनीलकण्ठने लिखा है - ' ब्रह्मार्थः वेदार्थः कर्म-ब्रह्मणी । तपोयोगेन ब्रह्मचयं फलतीत्यर्थः ' । सो यह पुरुषोंकेलिए अधिकृत है, स्त्रीकेलिए नहीं । यह हम इस पुष्पमें सम्यक् व्याख्यात कर चुके हैं । ' ' वैदिककाल ' का अर्थ यही है कि वेदप्राक्टधकाल । सो यह सृष्टि के श्रादिमें फलित होता है । वेदमन्त्रोंपर जो ऋषि लिखे हैं - यह सब सृष्ट्यादिके होते हैं । पृ. १७१-१७२ धागे वादी रामायणकालमें स्त्रियोंका वेदाध्ययन सन्ध्या - हवनादि दिखलाता हुआ ' अग्नि जुहोति स्म तदा मन्त्रवित् कृत-मङ्गला ' यह पद्य देता है । इसका पूरा प्रत्युत्तर हम पृ. १४६-१५४ में दे चुके हैं । आगे वह तारादेवीका स्वस्तिवाचनादि दिखलाता है - ' ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी ' इसका भी पूरा एवं प्रकाट्य उत्तर हम पृ. १५७-१५८ में दे चुके हैं ।

पृष्ठ 410

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७६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पृ. १७३ ' वाग्यतास्ते त्रयः सन्ध्यां समुपासत संहिताः ' का वादी सीताकी सन्ध्याका अर्थ बताता है । इसका अर्थ हम पू. १५८ में स्पष्ट दे चुके हैं | इस प्रकार ' सन्ध्याकालमना ध्र ुवमेष्यति जानकी । सन्ध्याय ' इसका भी पूरा प्रकाट्य प्रत्युत्तर पृ. १४०-१४३ में दिया जा चुका है । इस प्रकार ' कुन्दमाला ' में सीताकी सन्ध्या में भी जान लें । पृ. १७४ आगे वादीने ' कुन्दमाला ' नाटिकाका प्रमाण भी लिख दिया । उसपर पं. नृसिंहदेव शास्त्रीका मत भी लिख दिया; तो क्या नाटक - नाटिका भी प्रमाणभूत वेद हैं; जो वादीने उसका उद्धरण दे दिया? फिर वैसे तो वादी सनातनधर्मी कुछ लिखे, तो ' अवैदिक ' कहकर उसे ' घृणित ' करता है । पर जब वह कोई दयानन्दी मत दे दे; तब वह ' सुप्रसिद्ध सनातनधर्मी ' शब्दसे सत्कृत कर दिया जाता है । तब वह बात वेदानुकूल (? ) हो जाती है । जब वादी भी मानता है कि पति के बिना पत्नीका स्वतन्त्र हवनादि नहीं हो सकता; तब श्रीसीता द्वारा वनवासमें बिना पतिके ' हुतो हुतवहः ' कहना क्या वेदविरुद्ध नहीं? शेष रही नृसि. की टीका, उसमें लिखा है- ' सर्वथा निमूं लतामपि च न प्रतीमः ' इसका वादीने भाषार्थं भी नहीं किया । इसे छिपा दिया, इसका अर्थ है । कि हम स्मार्त एवं पौराणिक व्यवहारको सर्वथा निर्मूल भी नहीं मानते, पर वह व्यवहार पतिविरहमें निर्मूल है । इससे वादी कट गया । तब वादीने इस वेदविरुद्ध प्रमाणपर अपनी स्वीकृतिकी मुहर कैसे लगा दी? पृ. १७५-१७६ ‘ यज्ञोपवीतमार्गेण ' में वादी सीताका निर्मूल यज्ञोपवीत बताता है, इसका भी प्रत्युत्तर हम पृ. ११६-११ में दे चुके हैं । पृ. १७६ ' वैदेही शोकसन्तप्ता हुताशनमुपागमत् ' इसका प्रत्युत्तर पृ. १५४-१५६ में देखो । ' मन्त्रज्ञा कैकेयी ' इसका प्रत्युत्तर १५४ - १५८ में देखो । श्रागे वादी शङ्कराचार्यके वचनोंका समाधान ६२ ] [ ७६१ मैत्रेयीको ' ब्रह्मवादिनी ' बताता है । सो ' ब्रह्मवदनशीला पू. १ शङ्करके अर्थ में ब्रह्म परमात्मविषयक संवाद वाली ' ' इस श्राचाद. सतपथी, चाहिये । जो सृष्ट्यादिस्थित पुराणादिसे भी हो सकता यह है अर्थ । समझना कास्त्रिय व पृ. १७८-१७६ में गार्गीके विषयमें भी वादीने कुछ चर्चा प्रत्युत्तर पं. है । पर गार्गीने शास्त्रार्थ नहीं किया, किन्तु केवल कई प्रश्न ही किये चलाई धर्य किया मातृभाषा जब संस्कृत हो; तो ऐसे प्रश्न सभी कर सकते हैं थे । पृ. १७६ १५० में वादी गार्गी श्रादिका उपनयन संस्कार कठीम उसका उत्तर पूर्व दिया जा चुका है कि यह तो मृतकतर्पण है, बताता तो बारी है ॥ नहीं । उ भी मृतकका श्राद्धतर्पण मान ले । पृ. १८० फिर ' अथ य इच्छेद- दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ए. पृ. १ पर वादीको कभी - कभी स्फूर्ति श्रा जाती है, उसपर अपनी नोटबु लेख प ' आत्मज्ञानं समारम्भ: ' महाभारतका यह पद्य देता है; और ' नावे कुछ कह ि विदुमनुते तं वृहन्तम् ' यह तै. व्रा.का उद्धरण देता है, इसका भी पूरा उतर पृ. १ पृ. ११ ९ -१२४ में तथा पृ. ४१७-४१८ में दिया जा चुका है । बादी में ि स्वयं बतावे कि दुहिताके वाक्य में ' पण्डित ' का यदि श्रात्मज्ञानवाली चुके हैं । है, और ग्रात्मज्ञान वेदके बिना नहीं होता; तो पुत्रवाले वाक्यमें शतपवते ' पुत्रो मे पण्डितो जायेत ' यह तो लिख ही दिया था; तब वहाँ ' सर्वान् वेदान् । पृ. १-वीत ' को पृथक् क्यों लिखा? इससे स्पष्ट है कि महाभारत तथा | पुटिकादि-: शतपथको वहाँ ' प्रात्मज्ञान ' श्रादि अर्थ इष्ट नहीं । वादीका खण्डन हो बादी में उस गया । पृ. पृ. १८० ' विश्वासपात्र न किमस्ति? नारी, द्वारं किमेकं नरकस्य पासोत् ' में नारी | विज्ञान्महाविज्ञतमोस्ति को वा? नार्या पिशाच्या न च वञ्किो एवं किया य: ' इन श्रीशङ्कराचार्यके वचनोंको वादीने श्राक्षेपयोग्य माना है, इससे लकल्पित स्पष्ट है कि वादी प्राक्षेपमात्रशूर है, उसपर अपनी बुद्धि कुछ व्यापाति नेता ' लिख नहीं करता । हम इसपर अकाट्य उत्तर पृ. २२७, २८८, ४८८-४६६ में हो गायक नायपने ग चुके हैं ।