सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 411–420

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 411–420

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२ ] [ ७६१ श्रागे वादीने म.म. पं. शि. द. जीके ' ' प्राचार्या उपाध्याया १. १८१, ची प्रादिके उदाहरण उद्धृत किये हैं । आगे वेदाध्ययनादि-स आचार्य. । शतपथी, बह्व अधिकार कात्यायन श्री.सू. से दिखलाया है । इन सबका सममता । का स्त्रियोंका १८१-१८२ में देखे । तर वह पू. चर्चा पं. शिवदत्तजीने जो कात्यायन श्रौ.सू. के सूत्रोंका चलाई सर्व किया है - इसपर पृ. १४५-१४६ देखो । किये थे । कलीमें कठशाखाकी द्रष्ट्री - ऋषिका इष्ट है, बताता है । नहीं । उपाध्यायासे कपड़े सीना सिखलानेवालीका - तो बादी स्त्रीके वेदाधिकार में सर्वसाधारण स्त्री नाम भी उपाध्याया १. १८३ में ( दीर्घश्मश्रु ) ' पुमान् ' श्रादिपर हमारे पृ. ६५-७२ में ति ' इस नोट | उल्लेख पर वादी कुछ भी नहीं लिख सका, केवल नाम करने के लिए और ' नावेर कुछ कह दिया, उसका कुछ भी महत्त्व नहीं । पूरा उत्तर पृ. १८४-१८७ में ' वेदके सरस्वती ' प्रतिपादक मन्त्रोंमें स्त्रियोंका । बादी ही वेदमें अधिकार बताता है, इसका हम प्रत्युत्तर पृ.४३१-४१ में दे नवाली पर्व के हैं । वादी उसपर कुछ भी महत्त्वपूर्ण बात नहीं लिख सका । में शतपयने पृ. १८७-१८८ ‘ त्रीन् वेदान् प्रददी ' का ' वेदमन्त्रलाच्छितं किञ्चिद् सर्वान् वेदान् पुष्टिकादि द्रव्यं दत्तवान् ' पर हमने पृ. १८३-१६८ में मीमांसा की हैं, भारत या शादी में उसके प्रत्युत्तर देनेकी शक्ति सर्वथा नहीं है । खण्डन हो पृ. १८८ - १८६ में तै. प्रा. ' इडा वै मानवी यज्ञानूकाशिनी - नरकस्य प्रासोत् ' में मनुकी पुत्री इडाकेलिए ' यज्ञतत्त्वप्रकाशन समर्था ' यह सायणने चवञ्चित किया है, इससे स्त्रियोंका वेदाधिकार सिद्ध है, यह वादीका तात्पर्य भी T है, इसने लकल्पित ही है, जबकि उसी सायणने ' इडा नाम गोरूपा काचिद् व्यापारितखना ' लिखकर उसे एक ' देवता ' बताकर वादीके पक्षको काट दिया है । ४ में हो गायका नाम नहीं लिखा है कि - वादी इसे प्रसङ्गत बता रहा है, नायणने गायरूप वाली एक देवताका नाम जब स्पष्ट लिखा है, तो देव पशुरूप भी होते हैं । [ ७६३ असङ्गति कट गई । देते हैं यह लोग दूसरेका उद्धरण, पर प्रथं अपनी मर्जीका करते हैं - यह स्वार्थी वादियोंकी शैली बहुत गलत है । छान्दोग्य में सत्यकाम - जावालको मद्गुग्रादि हंसोंने तथा ऋषभ ( बैल ) प्रादिने उपदेश दिया है । भाष्यकारोंने इन्हें देवविशेष बताया है । देवताओं में अणिमा आदि सिद्धि होनेसे वे सब प्रकारके रूप धारण कर सकते हैं, पशुरूपमें भी वोल सकते हैं; प्रत: इसमें कुछ भी प्रसङ्गति नहीं पड़ती । वादियोंकी वृद्धि तो संकुचित होनेसे उनमें यह विषय नहीं समा सकते । पृ. १६०-१९ १ में ' प्रार्त्विज्यमेव तत् पत्न्यः कुर्वन्ति ' इस ताण्ड्य प्रमाणसे बादी स्त्रियोंका वेदाधिकार बताता है; और उनकी दासियोंका ' मधु, मधु, मधु ' इस मन्त्रका गान बताता है पर हम पृ. २२०, तथा पृ. ७६५ में बता चुके हैं कि - ' पली ' से वेदमें देव - स्त्रियोंका निरूपण है । श्रतः वादीका पक्ष कट गया । पृ. १ ९ १ ' अष्टादशी दीक्षिती दीक्षितानां ' ( गोपय. ५१२०-१४-१५ ) में वादी एक श्रार्यसमाजी त्रिवेदीका अयं बताता है कि ' प्राप्तदीक्षा ' । इसे हम क्या करेंगे । हम स्थान - स्थान पर दिखा चुके हैं कि - यज्ञमें स्त्री पति के साथ वठती है, पतिकी दीक्षाके साथ पत्नीकी दीक्षा भी स्वत: हो जाती है । उसका विवाह ही उपनयन - स्थानापन्न है, अतः उसमें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं प्राती । इससे वादीकी कुछ भी इष्ट - सिद्धि नहीं । पृ. १६२ ' वि त्वा ततस्र ' के सायणभाष्यसे वादी ' जायापती श्रग्नि-यादवीयताम् ' से अपनी इष्ट - सिद्धि देखता है, हम उसका पृ. ६८३-८६ में समाधान कर चुके हैं । इसी प्रकार ' प्राधानं च भार्या संयुक्तम् ' ( मी. ६।८।१३ ) में पत्नीसंपृक्त - अग्न्याधान भी समझ लेना चाहिये । बल्कि — स्थपत्यादिवद् ' लोकिके ' ( ६ादा १२ ) सूत्रके अनुसार वह प्राधान स्वपतिकी इष्टिकी तरह लौकिक प्रग्निमें की जाती है, संस्कृत - अग्निमें नहीं । जैसे कि- ' अपि वा लौकिकेऽग्नौ स्याद् ' ( मी. २१ ) के अनुसार प्रपि वा

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७६४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इतिपक्षव्यावृत्तिः । लौकिकेषु श्रग्निषु स्याद् न संस्कृतेषु ' कहकर मन्त्र-संस्कृत मग्नि में उसका निषेध कर दिया गया है । पृ. १६२ आगे वादी ' जैमिनिन्यायमाला ' से ' प्रधानं विदुषो विद्या-नुपनीतस्य नास्त्यतः । न सम्भवो वैदिकाग्नेर्होमोऽग्नौ लौकिके ततः ' यह बचन देकर उसपर वहाँकी वृत्ति लिखता है- ' बिद्वानेव श्राधाने अधिकारी, न च प्रनुपनीतस्य विद्याऽस्ति । तत आहवनीयासम्भवा लौकिकेऽग्नो अनुपनयनहोमः कर्तव्य: ' इससे वादीका ही पक्ष कटता है, क्योंकि-मीमांसाऽनुसार स्त्री अविद्या है, एवं अनुपनीता है । अतः वैदिक - ग्निमें प्रधान उपनीत पुरुष करेगा; स्त्री की तो केवल सहायता रहती है, वह केवल हाथ लगा देती है, मन्त्र भी वही उपनीत पुरुष ही पढ़ता है । तब इससे स्त्रियोंका उपनयन भला वादी कैसे सिद्ध करता है? तब यह जो बादी लिखता है कि- ' इसके विरुद्ध शबरस्वामी अथवा माघवके कहीं छपाये जानेवाले लेख सर्वथा अमान्य हैं '? देख लिया पाठकोंने बादीका स्वार्थ, जैमिनि न्यायमाला माधवकी है, उसका प्रमाण देते हैं; जब उससे इनका पक्षविघात होता है; तब उसे श्रमान्य कर देते हैं- यह है इनकी दुर्नीति । इसपर पृ. १३०-३१-३२ देखो | जैमिनि - न्यायमालामें स्पष्ट कहा है- ' विद्वत्त्वात् पुंस एब तत् ' ( ६।१।२४ ( १० ) तब वादीने उसको छिपाकर क्या जनवञ्चन नहीं किया? यह निषेध शूद्रकेलिए है । स्त्रीका कर्मनिर्वाहक तो पति होता ही है - यह मीमांसामें स्पष्ट है - ' सापि श्रन्यथानुपपत्ति: यजमान विद्वत्तयैव क्षीणा । तदीयेनेव ( यजमानीयेनैव ) अध्ययनेन निराकाङ्क्षत्वान्न प्रतिषिद्ध-मध्ययनं करिष्यति ' इसकी स्पष्टता हम १३०-१३१ पृ. में कर चुके हैं । पू. १६३ श्रागे ' तस्या यावदुक्तमाशी ह्मचर्यम् अतुल्यत्वात् ' संहिता में विशेषस्थलपर ' पत्नी ' देवपत्नियां होती ] हैं [ ७६५ > इस सूत्र का अर्थ ' जैमिनिन्यायमाला ' में श्रीसायणने ठीक ही लिखा १,४३१-है, वही || ज्ञानवती श्रीशबराचार्यने लिखा है, वही श्रीकुमारिलभट्टने भी लिखा है । पत्नी बता आगे जो वादीने पं. शिवदत्तजीकी इसपर टिप्पणी लिखी है- ' इदं स्वाहा ' से य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत इतिवृहदारण्यकोपान्त्य श्रुति- विरुद्धम् च उसका ' इन सबका अकाट्य प्रत्युत्तर हम पृ. ११६- १२४ में लिख चुके हैं; वादो अर्थ इसपर सात जन्म पाकर भी प्रत्युत्तर नहीं लिख सकता । इसपर कर रजत रखी ह पृ. १३१-१३२ में भी लिख चुके हैं । हम ऋ.१०1 पृ. १६४-१९ ६ श्रागे बादी म.म. पं. शिवदत्तजीका मत पुनः ला दर्यात् स्वा पटकता है, उसका अकाट्य उत्तर पृ. ११६-१४६ में हम दे चुके हैं, वादी लिखा है- ' इसका कभी भी प्रत्युत्तर नहीं दे सकता । मायके भाष पृ. १६५ में ' कुमार ' से पं. शिवदत्तजीके अनुसार वादीने जातिपरकता वादीन मानी है, और उसमें हमारी शङ्काओं का मुंहतोड़ उत्तर बताया है, कि होता है कि-' कुमारा विशिखा इव ' से कुमारियोंका भी चौलकर्म बताया है । हम अग्नि इसका भी मुंहतोड़ प्रत्युत्तर पृ. १४७- १४८ में दे चुके हैं कि यहाँ एकशेष रहते हैं, ए है । जातिपक्षकी मुंहतोड़ प्रालोचना भी हम पृ. १६४-१७३ में कर ह है कि-चुके हैं । वादी इसपर कुछ फड़फड़ा नहीं सका । पर त्रेण भा पृ. १६३ - १ ९ ४ में वादी मैत्रायणी - संहिता ( १।४।३।२७ ) ' पलि यहाँ देवता पत्नि एष ते लोका ' वचन देकर अपना गलत पक्ष सिद्ध करना चाहता है, का तात्पर्य पर उसे याद रखना चाहिये कि - यह देवपत्नीकेलिए प्राता है, मानुपी के लिए निर्वाचन यह नहीं । वैसे श्राप. श्री. ( २।५ / ७ ) में ' देवानां पत्नीरुपमाह्वयध्वं, पलि करते हैं-पनि...। नमस्तेस्तु मा मा हि सीः ' इति देवपत्नी रुपतिष्ठेत ' । | [ वाहापदेन यहाँ रुद्रस्कन्दने वृत्तिमें लिखा है- ' प्रपरेण गार्हपत्यं देवपत्नीनां इविः प्रधान लोकः; तत्र ता उपतिष्ठते ' इसे हम अन्यत्र भी पृ. २२० में स्पष्ट कर चुके हैं । मैत्रायणीसं. में भी श्रापस्तम्बने ' सरस्वतीं वेशयमनी तस् द है । स्वाहा ' लिखा है । सरस्वती देवपत्नी है, इस विषयपर हम स्पष्टता

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६ ] ७६५ में लिख चुके हैं । यहाँ घूर्त वादीने लिख दिया है, सरस्वती ६,४३१-४१ मेरी पत्नी हो, कितनी धूर्तता है कि सरस्वतीको अपनी है, वही ( ज्ञानवती ) दिया । यहां ' मम ' शब्द वादीने स्वयं गढ़ लिया । ' तस्य ते पत्नी बता है कि - सरस्वतीदेवीका प्रयोग अग्नि में आहुति देनेमें आता - इदं न स्वाहा से स्पष्ट ' मेरी पत्नी हो; तुम्हारे लिए मैं उत्तम वचन बोलूंगा विरुदम् है; उसका तुम लोगोंने वैदिकसाहित्यमें, यह अर्थ कर दिया है । इन भी ' ब्लैक मार्केट ' - वादी दलत है निरुक्त ( ८-२१।१-१-३० ) में भी ' स्वाहाकृतमदन्तु देवाः ' पर हम कर रखी, ( ऋ. १० ११०।११ ) इस मन्त्रानुसार ' स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः ” स्वाहा करके दी हुई हविको देवता खाते हैं । यही शतपथमें पुनः ला | दिखा है - ' यज्ञो हि देवानामन्नम् ' ( २।४।२।१ ) तभी दुर्गाचार्यने भी उस ई, वादी| बनके भाष्य में यही लिखा है - ' स्वाहाकार- बलात् मन्त्रेण प्रक्षिप्तं हविः ” बादीने लिखा है – ' तुम्हारेलिए मैं यह उत्तम वचन बोलूंगा ' मालूम नपरकता होता है कि यह उसने ' स्वाहा ' का अर्थ किया है - यह ठीक नहीं । ' स्वाहा ' , fa- । दा श्रग्निमें देवताओंके लिए हवि डालनेपर आता है । ' स्वाहा ' क्यों है । हम * एकशेप रहते हैं, एतदर्थं निरुक्तने निर्वचन किया है कि- ' सु श्राह इति ' इसका अर्थ में कर है कि मन्त्र में स्वाहाको जोरसे बोला जाता है । इसीसे दुर्गाचार्यने सपर लिखा है- ' यदेव सम्प्रदान- देवतायै किञ्चिद् प्राज्यस्य इत्यनेन स्वेण ग्राह तुभ्यमिदमिति तदेव सु - आह तदेब शोभनमाह ( २१ १ ) - पलि यही देवताओंको स्वाहा शब्द में हवि देना - यही शोभनने बताया है, शोभन-हता है, पीके लिए तात्पर्य है - अच्छी तरहसे ' स्वाहा ' को बोलो । ' स्वा वागाह ' यह भी बं, पलि निवेचन यही अर्थ रखता है- इसपर प्रागे निरुक्तकार अन्य भी स्पष्ट ठे हैं - स्वाहुतं हविजुहोति ' इसपर दुर्गाचार्यने लिखा है- ' अनेनैव [ [ वाहापदेन ] हविजु होति, तदेव सुष्ठु आपाद्य यथाभिधानमग्नौ जुहोति । स्पष्ट कर | इविः प्रधानोऽत्र निर्देशः ' अर्थात् उस देवताके नामसे स्वाहा कहकर हवि नी तस् ( २१ ( १ ) श्रतः स्पष्ट है कि- स्वाहा शब्द हवि देनेमें योगरूढ द है । स्पष्टतवा स्वाहा देवस्त्रियोंकेलिए याता है, मानुषियोंकेलिए नहीं [ ७६७ इसलिए स्वा.द.को भी वेदाङ्गप्रकाश ( अव्ययार्थ ) में कहना पड़ा-' स्वाहा, स्वधा, वाक्यार्थयोगे ' यह कहकर उसका उनने उदाहरण दिया कि- ' अग्नये स्वाहा, पितृभ्यः स्वधा ' अर्थात् श्रग्नि ग्रादिमें देवताओंकेलिए है । तो ' स्वाहा ' इस वाक्यका प्रयोग होता है । और ' स्वधा ' इससे पितरोंमें वाक्यार्थं योग क्रियाका । शतपथमें - ' देवतानों केलिए ' यज्ञो वोऽन्नम् ' ( २/४/२१ ) कहा है- देवोंको हवि ' स्वाहा ' कहकर दिया जाता है, पितरोंकेलिए ' स्वघा व: ' ( रा ४ रार ) कहा जाता है । सो ' स्वाहा स्वधा ' यह शब्दप्रयोग देवता एवं पितरोंका क्रमसे होता है । मानुष वा मानुषीके-लिए कभी ' स्वाहा ' नहीं याता । आशा है अव वादीको लज्जा श्रा जायगी, जोकि वह शास्त्रविरुद्ध अर्थ लिखता है । आगे वादी काठकसंहिताका वचन देता है- ' सं पत्नी पत्या ' यहां भी उसने पूर्वका पाठ छिपा दिया है । ' देवानां पत्नीरग्निग्रहपतिः ' ( ५/१७ ) यहाँ भी उसने ' देवानां पत्नी ' को छिपा दिया है । आप.श्री.सू. ३।५।७ में देवानां पत्नीरुप माह्वयध्वं पत्नि! पत्नि! एष ते लोको नमस्तेस्तु मा मा हि, सी: - इति देवपत्नीरुपतिष्ठेत ' यहाँ ' पत्नी ' से देवपत्नियाँ इष्ट हैं, अपनी पत्नी नहीं । यहाँ रुद्रदत्तने भी लिखा है - गार्हपत्यके उत्तर ओर देवपत्नियोंका स्थान होता है । वहाँ भी ' स्वाहा ' लिखा है - ' स्वाहा वेशभगिन्यै स्वाहा सा सरस्वती वेशभगिनी ' - वेदोसि वित्तिरसि ' इत्यादि । यहाँ ' वेद ' का अर्थं कुशवण्डल है । उसीकेलिए कहा है - ' वेदो वीर ददातु में ' इस विषय में पू. १८३ - १८६ में हम बहुत स्पष्टता कर चुके हैं । ' तू ' वेद है ' यह वादीने पतिके प्रति गलत कहलवाया है- ' वृषा वृषण्वतीभ्यो वेद! पत्नीभ्यो भव ' ( ५/४१२५ ) इन लोगोंने इधर - उधरके पाठ छिपाकर ऐसी धूर्ततासे जनवञ्चना की है; इन्हें क्या कहा जावे? पू. १६६ में वादी महाभारतकी साक्षी देता है; कभी महाभारत वेदविरुद्ध बन जाता है, कभी साक्षात् वेद बन जाता है । लिखता है-' अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेदपारगा । अधीत्य सकलान् वेदान्

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७६८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लेभेऽसन्देहमक्षयम् ' इसमें सर्ववेदनिष्णाता शिवा नाम ब्राह्मणीका वर्णन है ' । यह पाठ गलत है । इसमें पुनरुक्ति है - इधर ' वेदपारगा ' जब उस ब्राह्मणीको कहा है, तब ' अधीत्य सकलान् वेदान् ' यह पुनरुक्ति है । यह पाठ ठीक भी हो; तब यहां महाभारतमें तो यह पाठ मिलता है - ' अत्र सिद्धा: शिवा नाम ब्राह्मणा वेदपारगाः ' इसे श्रीसातवलेकरसे व्याख्यात महाभारतमें देखो । वादीने इस पुस्तकमें बहुतसी पुनरुक्तियाँ दी हैं । इसपर हम पहले पृ. ६५ तथा २३६-२३८ लिख चुके हैं । यह वादीकी पुनरुक्ति है । पृ. २०० में वादी ' अत्रव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार ब्रह्मचारिणी ' ( शल्यपर्व ५४।६ ) यह वचन महाभारतसे देता है । इस पद्यका देना व्यर्थ है - यहाँ तो लिखा है कि वह कुमारावस्थासे ही उपस्थसंयम वाली थी । वादीने ' वेद - विदुषी ' अथं प्रक्षिप्त कर दिया है । ' ब्राह्मणी ' का ' वेदविदुषी ' अर्थ वादीका प्रक्षेप है । यहाँ ' ब्राह्मणी ' में जाति अर्थ में ङीन् प्रत्यय है; ब्राह्मणजाति प्रथंवाली है । जैसेकि व्याकरण में लिखा है- ' ब्राह्मोऽजातो ' ( अष्टा. ६।४।१७१ ) सो जाति तथा अपत्य अर्थ में ब्राह्मणी बनता है, वेदविदुषी अर्थ होता; तो ' ब्राह्मी ' बनता । अजाति अर्थ में ब्रह्मन् शब्दकी ' टि ' का लोप हो जाता है । आगे ' सुता घृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ' ( शल्यपर्व ५४।९ ) में वादीने इसका दिनरात वेदाध्ययनमें तत्पर यह अर्थ गलत दिया है । यहां ' ब्रह्मचारिणी ' का नियमपूर्वक उपस्थसंयमवती ' अर्थ है - ' श्रवणं कीर्तन केलि: प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् । एतन्मैथुनमष्टाङ्ग प्रवदन्ति मनीषिणः । विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम् ' इस श्रवण - कीर्तनादि मैथुनके भ्रष्टाङ्गोंसे रहित थी - यह वास्तविक अर्थ है । पृ. २०१ ' श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी ' ( शल्यपर्व. ४८२ ) में भी पूर्ववाला ही अर्थ है । इसपर वादी कहता है कि यदि यहां } ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' उपस्थसंयम ' [ ७६२ घड़ियाल ' उपस्थसंयमवती ' अर्थ माना जावे, तो वह ' कुमारी करते थे, सकता था, वादीकी यह प्रपत्ति व्यर्थ को हैं । ववारी शब्दसे भी लड़कियाँ उपस्थसंयमवाली हों यह प्रावश्यक नहीं है होनेपर भी दन अल्मारियोंसे भी बहुत वार लैदर मिले हैं, उससे वे । कन्या - गुरुकु मशन मानी जा सकतीं । उपस्यस्य भवती नहीं पृ । इमा:! ' पृ. २०१ आगे वादी सुलभाका वृत्त बताता है- ' दिया था द्विधे । विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनि - व्रतम् ' भर्तारि श्रि उसपर वा यहां भी सुलभाका नैष्ठिक ब्रह्मचर्यं पूर्ण उपस्थसंयम ( महा. ३२२८२ ) | करता हु ही है; वेदका कोई मतलब नहीं । संन्यासमें तो उल्टा वेदकी आवश्यकता ही नहीं रहती यहाँ, । उबकि य तभी तो उनमें उपनयनसूत्र भी नहीं रखना पड़ता । यह श्रागे " प्रिया च दर्शनीया च पण्डिता च पतिव्रता जब उक्त २७२ ) यहाँ द्रौपदीका ' पण्डिता ' विशेषण ' ( वना ग आने से वादी गद्गद हो गया आप उ है । महाशय! पण्डा बुद्धिको कहते हैं । सो पण्डिताका अर्थ ' बुद्धिमतों ' है । इसमें वेदकी कोई बात नहीं; तभी तो शतपथ तथा वृहदारण्यकमें- वह अर्थ ' पुत्रो में पण्डितः... सर्वान् वेदान् अनुबुवीत ' ( १४१६ | ४ | १७ ) ' डि ' बनवञ्चन शब्द आता है; यदि यहाँ वेदवक्ता भी ' पण्डित ' का अर्थ होता; तो इरा करो ' सर्वान् वेदान् अनुबुवीत ' यह पृथक् वाक्य व्यर्थ होता । इसीसे स्पष्ट है ही अर्थ ह कि- पण्डित शब्दसे वेदाध्ययन अर्थ नहीं आता । इस विषय में पूर्व देखो । है । अब उपमेय तो फिर वादी एक फवती कसता है कि उन द्वारा समर्थित ' पर्दा वह विशेष पद्धति ' का भी स्पष्ट खण्डन होता है ' । तब क्या वादी पर्दा प्रथाको ' शुद्ध अवैदिक मानता है? क्या उसे वह मुसलमानोंसे आई हुई मानता है? तो ' इमा महाशय, पदप्रिया वैदिक है, शास्त्रीय है । इसपर देखो ' प्रालोक ' ( १० ) पूरा मन्त पृ. ८६३-६३७ । पृर्वक साथ पृ. २०५ ' भर्त्रा परमपूजिता ' यहाँ पूजाका अर्थ उनके धाने घटी देता हूं । स ० ध ० ४६

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७६१ बजाना, न ' नमस्ते ' करना है, किन्तु भर्ता मेरा बड़ा सम्मान घडियाल थे सो ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते... तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छाद-भो / करते, ( मनु. ३।५६-५९ ) इस उपसंहारसे उन्हें भूषण, आच्छादन र होनेपर नाशनं यही उनकी पूजा बताई गई है — यह वादी समझ रखे । भी मशन दना आगे वादी लिखता है — ' यही ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया मवती नहीं पृ.! ' २०५ इन वैदिक - प्रदेशोंका तात्पर्य है । पर वादीको हमने लज्जित इरा. कि इन मन्त्रके श्रागे जो ' आप ' था, उसे आपने छिपा लिया; तरि श्रमति दिया था वादीको लज्जा ग्रानी उचित थी, पर वादी लज्जा न करके घष्टता - ३२८२ ) ऊपर करता हुफ़ा कहता है, जिनको जलपरक मानकर शास्त्रीजी भ्रममें पड़े हैं, वेदका यही कि यह जलके समान शान्तिशीला विदुषियोंके विषय में हैं । ' नहीं रहती; यह बात वादीकी सर्वथा गलत है । यह उसकी बात तव ठीक हो; जब उक्त मन्त्र में ' योषितः ' यह विशेष्य हो, पर महाशय, आपकी बात ( वनपरं बंधा गलत है — यहां ' योषितः ' विशेष्य नहीं, किन्तु विशेषण है - और गद हो गया प्राप: उसका विशेष्य है- सो युध्यन्ते- सेव्यन्ते इति योषित प्रापः जलानि ' ' बुद्धिमती वह अर्थ है, जब प्रत्युत्तर न दे सके; तो ' आप ' का ' आप इव ' यह दारण्यकमें- नवचन के लिए श्रर्थं कर दिया, अरे भाई, कुछ तो परमात्मा के दण्डसे ) ' पण्डित ' इरा करो । महाशय, वहाँ ' इमा प्राप: ' इस सर्वनामको कहकर यह ' जल ' होता तो हो प्रर्य है, ' अप् ' का शायद वादीको पता न हो; उसे स्त्रीलिङ्ग होता से स्पष्ट है | पूर्व देखो । है । अव अर्थ हुआ ' इमा आप: ' ( यह जल ) सो जल विशेष्य होनेसे उपमेय तो हो सकता है, उपमान नहीं । तब, जलकी तरह शान्त स्त्रियाँ नति पर्दा वह विशेष्य जलको उपमानपरक वादीने कैसे बताया? पर्दा प्रथाको ' शुद्धाः पूता योषितो यजिया इमा: ' ( श्र. ६६ । १२२।५ ) इस मन्त्रमें मानता है! तो ' इमा ' के आगे ' श्राप: ' नहीं, पर यह भी जलोंकेलिए है । जैसा कि बीफ ( १ ) मन्त्र यह है- ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमाः ब्रह्मणां हस्तेषु प्र पूय सादयामि ' अर्थात् इन जलोंको ब्राह्मणों के हाथमें मैं अलग - अलग देता हूं । ' शुद्धाः पूताः ' मन्त्र जलार्थक है, स्त्रीकेलिए नहीं । [ ७७१ श्रव श्रागे इस मन्त्रका उत्तराधं देखिये- ' यत्काम इदमभिषिञ्चामि वोऽहम् ' यहाँ उन जलोंका सींचना कहा है; तब क्या ब्राह्मणोंके हाथों में स्त्रियों को डालोगे, और उन्हीं स्त्रियोंको उनपर सींचोगे? वादीकी वेदाभिज्ञता (? ) । यह है-इसलिए श्री राजारामशास्त्रीने कौशिक- सूत्रानुसार इसके विनियोगमें लिखा है— ऋचा ५ ( प्रस्तुत मन्त्र ) से सब यज्ञोंमें ऋत्विजों-के हाथ धोनेकेलिए जल देवे ' अब कितनी स्पष्ट वादीकी धूर्तता प्रकाशित हो गई । वादी लोग वेदमें यौगिक शब्द मानते हैं; तब ' योपित: ' भी यौगिक - जलवाचक हुआ; तव वादी उसका रूढ अर्थ स्त्री कैसे लेता है? अब अन्य मन्त्र, देखिये - ' शुद्धा ' पूता योषितो यज्ञिया इमा श्रापः ' ( अ. ११।१।१७ ) इसमें ' आप ' प्रत्यक्ष है । यहाँ श्रार्यसमाजी श्रीराजाम-शास्त्री कौशिकसूत्र ६१।३४,३५,२१८ ) के अनुसार लिखते हैं कि - ' इस [ ' शुद्धाः पूता योषितः ' ] ऋचासे बटलोईमें पानी डालता है । इस विनियोग के अनुसार उक्त मन्त्रमें जलोंका वर्णन सिद्ध हुआ, स्त्रियोंका नहीं । पाठकोंको वेदमें तोड़ - फाड़ करनेवाले ऐसे दयानन्दी लोगोंसे सावधान रहना चाहिये । पृ. २०६-२०७ आगे वादी श्रीमद्भागवतसे ' तेभ्यो दधार कन्ये द्व े वयुनां धारिणीं स्वधा । उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे ( ४१११ ६४ ) पद्य यह ' स्वधा ' की लड़कियोंके देता है । श्रीमद्भागवतमें ' नासां द्विजाति - संस्कारो न निवासो गुरावपि ( १०१५३।५२ ) स्त्रियोंका सामान्य आचार तो यह बताया गया है कि स्त्रियोंका उपनयन तथा गुरुकुलवास नहीं होता । तव यह दो ब्रह्मवादिनियाँ वहाँ अपवादरूपसे बताई गई हैं । अपवादसे उत्सर्गका बाघ नहीं होता । देखो महाभाष्य — ' नैव ईश्वर आज्ञापयति, नापि च धर्मसूत्रकाराः पठन्ति, अपवादैरुत्सर्गा बाध्यन्ताम् ' ( ' मिदचोन्त्यात् ' सूत्रमें ) अर्थात् अपवादसे उत्सगं वाधित नहीं होता । व्यवस्था सदा उत्सर्गसे हुआ करती है । सो ब्रह्मवादिनी यदि हारीतवाली

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r ७७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तो उन्हें सारी आयु ब्रह्मचारिणी ( क्वांरी ) रहना पड़ता है; सो यह सर्वसाधारणका विषय नहीं रहा । तब इससे सिद्ध हुआ कि शेष स्त्रियाँ सद्योवधू होती हैं, सद्योवधुत्रोंको वेदका अधिकार नहीं दिया जाता । इस विषय में हम पृ. ८६ - ९ ६ में स्पष्टता कर चुके हैं । यही विष्णुपुराण ( १।१०।१८ - १६ ) की वयुना और घारिणीका उत्तर है । यही मार्कण्डेय पुराणकी प्र. ५२ की मेना और धारिणीका प्रत्युत्तर है । देखो उसका ३३ पद्य, वादीने देखा होगा कि यही उसकी विरलतरताका प्रमाण है कि ने दो ही लड़कियाँ ब्रह्मवादिनी बताई गई हैं, अन्य नहीं । तब इससे वादीकी पक्षसिद्धि क्या है? वस्तुतः यहाँ जो वेदोंमें ' देवेभ्यः स्वाहा, पितृभ्य स्वधा ' यह स्वाहा स्वधा शब्द श्राये हैं; उनको अलङ्कार - रूपसे स्त्रीरूप बताया गया है । देखिये वहाँ ' स्वाहा ' के वाचक ' अग्नि ' आदि लड़के बताये गये हैं । देखो वहीं ४ । १ । ६१-६३ । बादी पुस्तकों के पूर्वापर छिपाकर साधारण जनताको धोखा देता है । यह उसकी शायद पठनकालसे प्रकृति रही हो । आगे वादी ब्रह्मवंवर्तपुराण प्रकृतिखण्ड ( १४ । ६५ ) से ' वेदवती ' का उदाहरण देता है, इसका प्रत्युत्तर दिया जा चुका है पृ. २३७-३८ । यह तो जन्मते ही वेद बोलने लग गई थी? तब वादीकी पक्षसिद्धि कुछ भी नहीं । वादी भी लड़कियोंको बिना पढ़े ही ' वेदवती ' बनने दे । यह वादी साहबकी ' नोटबुक ' चल रही है । पृ. २०७ आगे वादी शिवपुराण पार्वतीखण्ड ४७ अध्यायमें पार्वतीका यज्ञोपवीत बताता है, यह तो एक देवता थी; देवताका मानुषियोंमें वह असङ्गत ब्रह्मचर्य कैसे दिखला रहा है । वस्तुतः यहाँ महादेवका दुर्गोपवीत नामक परिधेय वस्त्र बताया गया है । इसमें पार्वतीका यज्ञोपवीत ' कुछ नहीं । देखो ' प्रालोक ' ( ७ ) पृ. ( पृ. १३२-१६६, २०७ ) ' सार्वदेशिक ' अगस्त १ ९ ४ ६ के श्रङ्कमें ऋषि और मनुष्यों का भेद II II III [ ७७३ वादी लिखता है - पं. दीनानाथजीके अनेक पत्रोंमें निकलनेवाले प्रतीत होता है - वे इस योनिवादको सव प्रश्नोंका लेना वयम्भुव हैं - वे लिख देते हैं - देव, मनुष्योंसे पृथक योनिके हैं अचूक नुसखा समझते , ऋषि ऋषिकाओंकी मनुष्योंसे पृथक योनि है, अतः उन विषयक बातें मनुष्योंपर है । वे होतीं । लागू नहीं विशेष हैं ( प्रत्युत्तर ) वादि - महाशय! यह आपसे प्रक्षिप्त ' निजकल्पित ' नहीं है, किन्तु शास्त्रीय है 1 । देखिये शतपथ में - ' देवयोनिरन्यः हमारी बात ' देव मनुष्ययोनिरन्य: ' ( ७१४/२/४० ) यहाँपर देवयोनि तथा मनुष्ययोनिको ऋषि भिन्न - भिन्न योनि माना गया है । पर मनुष्यान ' [ मनुष्य - जातिः- ] पशून् उद्दिश्य श्रेयसी । देवान् ऋषींश्च अधिकृस्व तथा देवो न [ श्रेयसी ] ( ४।३३ ) ' योगदर्शन ' के इस वादीके स्वामीसे सम्मत सृष्टि, दे व्यासभाष्य में देवताओं तथा ऋषियोंको मनुष्य जाति से भिन्न जाति कहीं है । बताया गया है । कही ' प्रशस्तपादभाष्य ' में भी स्पष्ट लिखा है - ' तत्र प्रयोनिजम् अन्य बात अनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देव ऋषीणां शरीरं धर्मसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते कर ( द्रव्यग्रन्थ पृथिवीनिरूपण ) यहाँ ऋषि तथा देवताओं को अयोनिज कह देखकर ' द कर स्पष्ट योनिज - मनुष्योंसे भिन्न बताया गया है । ' ऋषीणां च स्तुतीरुप- निन्दार्यवा यज्ञं च मानुषाणाम् ' ( ऋ. ११८४२ ) यहाँ भी ऋषि और मनुष्यों को करना । पृथक् - पृथक् कहा गया है । जब देखकर म ' निरुक्तमें श्रीयास्कने कहा है- ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः ' । ' ऋषिदर्शनात्, स्तोमान् ( वैदिकसूक्तानि ) ददर्श इति श्रीपमन्यवः । तद् यद् एतान् होनेसे नहीं, तब दो तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु अभ्यानर्षत्, तद् ऋषीणामृषित्वम् ' ( २११११ ) वादीका यहाँ लुप्त - मन्त्रोंके द्रष्टानोंका नाम ' ऋषि ' कहा गया है । श्रीसाव आगे भी ऋसं. के प्रारम्भिक मन्त्रके भाष्य में लिखा है— ' प्रतीन्द्रिय - वेदस्य विस्तृत हो परमेश्वरानुग्रहेण प्रथमतो दर्शनात् ऋषित्वम् इति श्रभिप्रेत्य स्मर्थते-

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७७४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) युगान्तेन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वम् अनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ' यहाँपर प्रलयमें लुप्त वेदमन्त्र जिनको समाधि में वा अतर्कित ही, बिना पढ़े ही तपस्यासे उपस्थित हो गये हों, उनका नाम ' ऋषि ' कहा है । वे सर्वसाधारण नहीं हो सकते । वे मनुष्यादिसे भिन्न विविध योनि-सुखास विशेष हैं । जैसेकि - ' प्रशस्तपादभाष्य ' के ' सृष्टिसंहारविधिनिरूपण ' में कहा है- ' मनुष्य- देव ऋषि - पितृगणाः प्रजापतेर्मानसा प्राख्याता: ' यहां देव, श्री मनुष्य तथा ऋषियोंको भिन्न - भिन्न योनि कहा है । ' देवा मनुष्या, असुराः, पितरः, ऋषय: ' ( अथर्व. १०।१०।२६ ) यहाँ-नि उपायों पर ऋषि तथा देव मनुष्योंसे भिन्न कहे गये हैं । इस प्रकार ' देवान्, मनुष्यान् श्रसुरान् उत ऋषीन् ' ( अधवं. ८ || २४ ) यहाँ भी ऋषियों उपा देवोंको मनुष्यादिसे पृथक् माना है । मनुस्मृति ( १1३६ ) में देव-देवानी सृष्टि, देवलोक सृष्टि, ऋषिसृष्टि पृथक् कही है । मनुष्यसृष्टि इससे भिन्न काही ही है । जाहि ि कहीं स्तुतिकेलिए मनुष्योंको ' देव ' शब्दसे कह दिया गया हो, यह बात है, वहाँ कहीं विशेषणता - आदिवश भी ' देव ' शब्दका यौगिक पूर्व कर दिया हो - यह भी अन्य बात है, पर इस श्रर्थवाद वा अपवादको | देखकर ' देवयोनिको उडाना ' वैसा ' साहस ' है, जैसेकि कहीं मनुष्य को देवजी | निन्दार्थवादसे ' पशु ' शब्द से वर्णित देखकर पशुयोनिको उडानेका प्रयत्न है । करना । क क है, तब क्या उन अर्थवादों को देखकर मनुष्यविषयक बातें पशुत्रोंपर भी लागू कर दी जावेंगी? यदि नहीं, तब पूर्वोक्त प्रकारसे ' देव ' तथा ' मनुष्यों के भी भिन्न - भिन्न दवि होनेसे दोनोंके सभी अधिकार समान नहीं हो जाते - यह स्पष्ट है । तब । शटीका उपालम्भ मन्यवः कसा? श्रागे वादी इस विषयको टालनेकेलिए लिखता है कि- ' यह विषय माहूत होनेसे स्वतन्त्र निबन्ध वा पुस्तककी अपेक्षा रखता हैं । बोधा. का ऋषि और देव ग्रन्य है [ ७७५ पर वादी कब तक वह पुस्तक बनावेगा? जितना प्राचीन साहित्य मिला है, जिसको वादी कदाचित् इस जन्म तक पूरा भी न कर सके । सभी में तो देवता और मनुष्य भिन्न - भिन्न योनि बताये गये है, वादी किस - किसका खण्डन करेगा? किस - किसका अर्थपरिवर्तन करेगा? हाँ, वादी यह कहे कि हम इस विषय में असत्य - व्यवहार या तोड़ - मोड़ वा छलको महत्त्व देंगे । आप लोग ग्रन्थोंके वाक्योंके कान पूछ ऐंठकर, किसी वाक्यके पूर्व प्रकरणको छिपाकर, किसीका उत्तर ग्रंश छिपाकर, किसीका अर्थं वलात् बदल, किसीका कोई वचन छिपाकर, किसीको प्रक्षिप्त कहकर अपना निर्वाह करेंगे । वादीके वैसे ग्रन्थ बननेसे असत्य वा छलको प्रोत्साहन अवश्य मिलेगा । आगे वादी जिस ' बोधायन ' को ' न स्त्री जुहुयात् ' से वेदविरुद्ध मानता है, उसीको अब स्वतः प्रमाण करके बताता है — ' यदि शास्त्रीजीके कथनानुसार देव और ऋषि पृथक्-योनि होते, तो मनुष्योंसे उनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं थी, किन्तु शास्त्रं में ऋषियों और देवोंका लक्षण करते हुए उनको उत्पन्न करनेके साधनों का स्पष्ट निर्देश किया है । उदाहरणार्थ – ' बोधायनगृह्यसूत्र ' में ' चतुर्वेदाद् ऋषिः ' ( १।७।७ ) ' अत ऊर्ध्वं देव: ' ( ८ ) ( चारों वेदोंका अध्ययन करनेसे मनुष्य ' ऋषि ' बनता है, और इनके अतिरिक्त अन्य भी शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञाता बनने से ' देव ' बनता है ' । यहाँ वादी अनुसन्धान- विरहित लोगोंको भयङ्कर धोखा दे रहा है । वादीके प्रमाणोंको देखकर अबहुश्रुत तथा अननुसन्धाता पुरुष धोखा खा सकते हैं, और स्वयं ज्ञात न होनेसे परप्रत्ययनय बुद्धिता के कारण कुछ प्रभावित भी हो सकते हैं, पर जिसने वादीसे बताई पुस्तकें तथा उनका पूर्वापर देख रखा है, वह वादीके प्रमाणोंके उपस्थापनमें वादीकी धूर्तता तत्काल समझ जाता है, उस पुस्तकका वादीसे छिपाया हुआ पूर्वापर-प्रकरण ही वादीके पक्षको काट दिया करता है । वस्तुतः उक्त गृह्यसूत्रमें ‘ ऋषि ' तथा ' देव ' आदि शब्द उक्त गृह्यसूत्र-

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I ७७६ । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) के ' पारिभाषिक ' तथा उसीमें सीमित एवं अव्यापक शब्द है । यहां देव-योनि तथा ऋषियोनि इष्ट नहीं है । यहाँ तो केवल ऋषि और देव ही क्या, यहाँ तो श्रोत्रिय, अनूचान, ऋषिकल्प, भ्रूण आदिकी परिभाषा भी बताई गई है । उनमें ' श्रोत्रिय ' की परिभाषा ' वेदकी एक शाखा पढ़ा हुआ ', ' अनूचान ' की परिभाषा ' वेदका एक अङ्ग पढ़ा हुआ, ' ऋषिकल्प ' की परिभाषा ' कल्पसूत्र ' पढ़ा हुआ, ' भ्रूण ' की परिभाषा सूत्रप्रवचना-ध्यायी बताई गई है । इसी प्रकार वहीं ' ऋषि ' की परिभाषा चतुर्वेद पढ़ा हुआ, तथा ' देव ' की परिभाषा इससे ऊपरके अन्य शास्त्रोंके पढ़े हुएकी बताई गई है । यह उस गृह्यसूत्रका अपना संकेत होनेसे उसीमें उक्त परिभाषाएं प्रवृत्त होंगी, सब शास्त्रोंमें नहीं । ' नदी ' संज्ञा पाणिनीय अष्टाध्यायीमें स्त्रीलिङ्गान्त-ई - ऊकेलिए है, पर यह परिभाषा वा संज्ञा भूगोल में वा श्रष्टाध्यायी से भिन्न ग्रन्थ में कभी नहीं होती । यदि वादी इन बोघायनोक्त- परिभाषात्रोंको सर्वशास्त्रों में प्रवृत्त मानता है, तो ' सार्वदेशिक ' ( अगस्त १ ९ ४६ ) पृ. २७३ में ' अथ ये ब्राह्मणा अनूचानाः, ते मनुष्यदेवा: ' ( शत. रारारा ६ ) इस कण्डिकाका वादीका किया अर्थ अशुद्ध सिद्ध होता है, तथा शतपथकी वादीसे अनुमोदित उक्त कण्डिका भी खण्डित होती है । यह कैसे? यदि वह यह जानना चाहता हो, तो वह जरा समझने की चेष्टा करे । वादीने इस कण्डिकामें ' अनूचानः ' का अर्थ ' वेदों को जाननेवाला ' माना है । देखो ' सिद्धान्त ' ( १६ ) पृ. १२५ का दूसरा कालम ) परन्तु बोधायन के उसी वादिसम्मत स्थल में कही हुई ' ब्राह्मणो ब्राह्मण्यामुत्पन्नः प्राग् उपनयनाद् जातः ' ( १।७२१ ) उपनीतमात्र व्रतानुचारी वेदानां किञ्चिद् अधीत्य ब्राह्मण: ' ( २ ) ' एकां शाखामधीत्य ' श्रोत्रियः ' ( ३ ) ' अङ्गाव्यायी अनूचानः ' ( ४ ) ' कल्पाध्यायी ऋषिकल्प: ' ( ५ ) - सूत्रप्रवचनाध्यायी भ्रूण: ' ( ६ ) ' चतुर्वेदाद ऋषिः ' ( ७ ) ' अत ऊर्ध्वं देवः ' बोधा की परिभाषाएं व्यापक नहीं ( १७१६ ) इस बोधायनकी परिभाषाओं के अनुसार ' बड़े हु वादीको ' वेदका ग्रङ्ग पढ़नेवाला ' यह लिखना चाहिये अनूचानः ' का पर हो ' ' वेदोंको जाननेवाला ' । था, न कि सभी मान उसी शतपथ- कण्डिका में स्थित ' ब्राह्मण शब्दका ' पौरा उक्त परिभाषा के अनुसार वादीको ' वेदका भी ' वोधायन ' यदि वा कुछ पढ़नेवाला ब्राह्मणीमें उत्पन्न उपनीतमात्र यह अर्थ लिखना चाहिये, ब्राह्मपता है, त ' किञ्चिद् - अध्येता ' यह ' ब्राह्मण ' शब्दका अर्थ स्वीकार था, क्या वादी हमारे हो, तो अपनी ' गुणकर्मकृत वर्णव्यवस्था है? यदि ऐसा जित हो ' वह काटे । यहाँ ' थोड़ा पढ़े - लिखे महाशय, भी ब्राह्मण - ब्राह्मणीके कुमारको ' ब्राह्मण ' कहा गया है । ‘ अनूचान ' ( चारों वेदोंको पढ़े हुए ) को आपके अनुसार ' ऋषि ' न ब्रह्म कहकर ' ब्राह्मण ' कहा गया है । उसी शतपथ- कण्डिका में स्थित ' देव ' शब्दका ' वेदोंको जाननेवाला ' योनिका हत्या बत वादीको न लिखकर ' चतुर्वेदोंसे अधिक ज्ञान रखनेवाला ' यह श्रयं लिखता है । बाद चाहिये था । अव वादी बतावे कि आप इस परिभाषाको मानते हुए भी वे ' भ्रूण ' जव शतपथकी कण्डिकामें वोधायनके विरुद्ध अर्थ कर रहे हैं; तब ग्राफे ददाह्मणेभ्य अनुसार ही सिद्ध हो गया, कि श्रर्थं करनेवाले होनेसे श्रापके जाने से आपका पक्ष सर्वथा कट केवल बोधायनके उक्त स्थलमें सर्वथा नहीं; तब भी वादीका रज्जुः ' । वादीने यह जो लिखा है आप अशुद्ध अर्थ कर रहे हैं । तब श्रीपूज अन्य प्रमाणोंके भी अर्थ अशुद्ध सिद्ध हो पाह्मण गया । यदि वादी कहे कि उक्त परिभाषा वर्णव्यवस ही ( सर्वत्र नहीं ) प्रवृत्त होती है; प्रन्यत्र विजयपत्र ' यहाँका पक्ष कट गया । ' सेयमुभयतस्थाका र पराज वनको भ न कर कि चारों वेदोंका अध्ययन करनेसे मनुष मागे वा ऋषि बनता है, और इनके अतिरिक्त अन्य भी शास्त्रोंका पूर्ण - शाना कान् एत बननेसे ' देव ' बनता है; क्या वादी इस बातको ठीक मानता है? यदि म संवर ठीक मानता है, तो उत्तम कोटिका यहाँपर ' देव ' ही है, तो वेदसेल

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ; क्योंकि वेद पढ़ने से ' देव ' न बना, किन्तु अन्य शास्त्रों के बड़े हुए काही ' देव ' बना; फिर क्या वादी वेदोंको अन्य शास्त्रोंसे घटिया है? यदि ऐसा हो; तो वादी ' वैदिकधर्म ' को समाप्त " सभी का मानता ' धर्मको स्वीकार कर ' देव ' बननेकी चेष्टा करे ' पौराणिक । धायन से यदि वादी अन्य शास्त्रोंको अन्तिम न मानकर वेदोंको ही अन्तिम ब्राह्मण है, तब उसे यह ऐकदेशिक लक्षण व्यापक न मानने पड़ेंगे । तव या वादीले हमारे पक्षको काटनेकी चेष्टा करता हुआ वादी ही यहाँ बुरी तरह यदि ऐसा साबित हो गया । इसीका नाम होता है- " भयङ्कर भूलें ' । ड़ा पढ़े - लि महाशय, ' पारिभाषिक ' तो ' पशु ' शब्द भी होता है । देखो अत्रि--- ब्रह्मतत्त्वं न जानाति ब्रह्मसूत्रेण गर्वितः । तेनैव च स पापेन विप्रः ' ऋषि ' राहत: ' ( ३७ ९ ) यहाँ ब्राह्मणको ' पशु ' कहा गया है । पर इससे योनिका प्रभाव नहीं हो जाता । वादी लोग विधवाविवाहाऽभावसे निवाला ' हत्या बताया करते हैं । पर यहाँ ' भ्रूण ' की विचित्र परिभाषा की = प्रथं लिखना है । वादी भी सूत्र - प्रवचनाध्यायी हो सकता है, तब अपने नाम नते हुए भी वे ' भ्रूण ' लिखा करे । ' ब्राह्मणान् सम्पूज्य ' ( बोधा. गृ. २।५।५४ ) तब प्राफे व बाह्मणेभ्योऽन्नं ददाति ' ( बोधा. शहा ६ ) इत्यादि वहत स्थलों पर तब अशुद्ध रणको पूजा कही है । तब क्या वादी वोधायनके इन वाक्योंके अनुसार सिद्ध होग्राह्मणी के किञ्चिदध्येता पुत्रकी पूजा करेंगे? तव गुणकर्म-परिभाषा व्यवस्था के शास्त्रार्थों में श्राप सनातनधर्मी शास्त्रार्थियोंको अभीसे है; अन्य विजयपत्र ' दिलवा दीजिये । यदि यह नहीं मानते; तो वादीका उभयतस्याश र पराजय हो गया । क्यों उसने अपनी समझसे वेदानभिज्ञ वनको अपनाया? वादीने स्वयं अपनी अनुमोदित उक्त परिभाषाएं तन करके निग्रहस्थान प्राप्त कर लिया । नेले मनु प्रावादी लिखता है - ' अथ यदि कामयेत ऋषि जनयेयम् पूर्ण-, है? जान् एतद् व्रतं चरेत् ' ( बोधा.गृ. १७१८ ) यदि कामयेत - देवं वेदसे अन्य लम्, संवत्सरमेतद् व्रतं चरेत् ' ( २० ) ( यदि कोई चाहे कि – मैं ' ऋषि ' वोधा. के ऋषि प्रादि शब्द व्यापक नहीं [ ७७६ को पैदा करू, तो विवाहके पश्चात् ६ मास तक ब्रह्मचर्य करे, यदि ' देव ' पैदा करना चाहे, तो एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य करे । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ऋषि और देव उच्चकोटिके मनुष्य हैं । इस पूर्वपक्षका उत्तर पहले दिया जा चुका है कि यह ' ऋषि ' वा ' देव ' शब्द ' अत्रिस्मृति ' के ' पशु ' ( ६७८ ) शव्दकी भाँति ' अन्य ' हैं; जोकि बोधायनकी परिभाषा में इसी स्थलकेलिए सीमित हैं, तथापि इससे भी वादीके ही पक्षकी अभी - अभी पराजय होती है, वह देखे प्रोर सम्भल जावे । आप लोग अपने सम्प्रदाय के प्रवर्तक के अनुसार विवाहवाले दिन ( देखो सत्यार्थ तथा संस्का. विवाहारम्भ अथवा उसके चौथे दिन ( देखो विवाह - संस्कारके अन्तमें ) गर्भाधान करते हैं, इसको वैदिक सिद्ध करनेके-लिए ' श्री ' पत्रिकामें वादीने बडी चेष्टा की है, यद्यपि हमने उसका सर्वाङ्गीण उत्तर दे रखा है, वादीके उक्त कथनानुसार वादी के सम्प्रदाय में द्वादशरात्र ब्रह्मचर्यं न करनेसे कोई भी ' अनूचान ' न होगा । विवाहसे मास तक ब्रह्मचर्यं न करनेसे दयानन्द- समाजमें कोई भी ' ऋषिकल्प ' न होगा । छः मास तक ब्रह्मचर्यं न करने से दयानन्दसमाजमें कोई ऋषि ' न होगा । विवाहोत्तर संवत्सर ब्रह्मचयं न करनेसे तथा मन्त्रोंके प्रथमें छलादि अवलम्वन करनेसे दयानन्दसमाजमें कोई ' देव ' न होगा । तब वादीके सम्प्रदाय में देवोंका प्रत्यन्ताभाव होनेसे वादीका पक्ष भी खण्डित हो गया । यह हुआ पहले गर्भका वृत्त, दूसरे गर्भोमें तो इन नामों का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहेगा । तव वादीको हारकर वेद तथा पुराणसे प्रोक्त देवयोनि अवश्य माननी पड़ेगी । तब वादीका ' यावन्तो देवाः तविषा मादयन्ताम् ' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी कट गया । इसीसे यह भी सिद्ध होता है कि-' गोधा आदि ऋषिकाएं वोधायनके अनुसार चारों घेदोंको जाननेवाली नहीं

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७८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) थीं, ' चतुर्वेदाद् ऋषिः ' ( बोधा, ) यह वादीका कथन भी कटकर वादी सारे परिश्रम पर पानी पड़ गया । वस्तुतः गोधा प्रादि ऋषिकाएं नियत मन्त्रोंकी द्रष्ट्रियां हुई, चारों वेदोंकी नहीं । देख लीजिये अनुक्रमणिकाएं । तभी तो दयानन्द- सम्प्रदाय में भी वेदके प्राप्तकर्ता चार ऋषियोंमें न कोई स्त्री रखी गई, और न शूद्र । ऋषि तो एक मन्त्र के द्रष्ट्री होने से भी वे हो जातीं । इधर वोधायनके अनुसार तो ऋषि उत्पन्न होगा, बनेगा नहीं, अर्थात् वैसा पुरुष जन्मसे ही उस वेदादिको जाननेवाला होगा; उसको अध्ययनकी आवश्यकता नहीं होगी? तब वादी भी ऐसी वोधायनप्रोक्त - ऋषिकानों को पैदा करे, उन्हें वेद मत पढ़ावे । जब इस प्रकार वे जन्मसे ऋषि होंगी, तब वादी उन्हें वेदाध्ययनाधिकार दिलानेकेलिए क्यों सिरसे एड़ी तकका पसीना बहा रहा है । यदि वादीको वोधायनपर सचमुच श्रद्धा है, तो उसके धर्मसूत्रानुसार सर्वसाधारण- स्त्रियों को ' यद् अमन्त्राः स्त्रियो मताः ' ( १ | ११ | ५ ) इस सूत्र के अनुसार मन्त्रभागकी प्रनधिकारिणी मान ले । अन्य बात यह है कि - बोधायनको अपने गृह्यसूत्रमें जातिपक्ष इष्ट नहीं है, यह हम अन्यत्र बता चुके हैं; तव पुंलिङ्ग शब्दसे उसको स्त्री इष्ट न होनेसे वादीका पक्ष मूलसे ही कट गया । देववाद में भी वादीकी भयङ्कर भूल सिद्ध हुई । तब ' इमं यज्ञ ' सह पत्नीभिरेत्य यावन्तो देवाः ' इत्यादि मन्त्रमें ' देवाः पत्नीभि: ' यहाँ ' देव ' शब्दसे ' विद्वान् मनुष्य ' नहीं, किन्तु निरुक्त- ( १२।४४-४५-४६ ) प्रोक्त इन्द्राणी, श्रग्नायी, आश्विनी, रुद्रपत्नी आदि ' देवपत्नियां ' इष्ट है । जैसा कि श्रीसायणाचार्यने ' देवाः स्वस्य स्त्रीभिः इन्द्राण्यादिभिः सह ' ( अथवं. १६ / ५८।६ ) इन शब्दों में लिखा है । क्योंकि - वेदमें उनकी हविसे तृप्ति वताई गई है । मानुषी स्त्रियोंको हवि नहीं दी जाती, किन्तु देवताओंोंको ही अग्नि द्वारा हवि दी जाती है । जैसे कि- ' यज्ञे प्राहुतय एव देवान, दक्षिणा मनुष्यदेवानाम् ' देव द्यस्थानी होते हैं । ( शत. ४ | ३ | ४ | ४ ) ' यज्ञो वो [ देवानाम् ] श्रन्नम् विषय वादीका पक्ष कट गया । ( रामश २ ) का । तभ मा । देवता द्यस्थानी होते हैं, जैसे कि वेदमें ( अ. ११७ २३ ) मनुष्य तो द्यस्थानी न होकर कहा है- दिवि दे पूजन हवि पृथिवीस्थानी निमें ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमयो स्वः ' ( ऋ. १०११६०१३ होते हैं । यदि तथा पृथिवीलोक भिन्न - भिन्न बताये गये हैं । ) मन्त्रमें नो इसलिए निरक्तका ( ७/१४ ) नरुक्तों का मत देते हुए स्पष्ट लिखा है- ' द्य स्थानो देवगण ( १२।४१।१ ) इस प्रकार वेदादिशास्त्रोंको भी इति नैरा हमें पुन भिन्न इष्ट हैं । इसीको पुराणेतिहास, स्मृति देवता मनुष्य- ११/१२ ) , दर्शन ' सारा श्रार्ष - सा बताय वा साहित्य एकस्वरसे कह रहा है । परन्तु वादी अपनी साम्प्रदायवाचक प्रकृतिवश वस्तुस्थितिको छिपाना चाहता है, यह विद्वानो वर्ष हो जाता असह्य है । इसलिए वादी के दिये हुए निरुक्तस्थित ' देवो दानाद् वा ' ( ७ | १५ ) तूं ' देवता सम्पूज्य इस पाठ में भी दानादि श्रर्थ भिन्न - भिन्न इष्ट नहीं, किन्तु ' च स्थानिकों के अनुसा सति दानादिकत्वं देवत्वम् ' यही अर्थ इष्ट है, जैसेकि नैरुक्तोंका उद्वारा क्षेत्र होकर हम पूर्व दे चुके हैं । दानका अर्थ ' इष्ट वर श्रादि देना ' जैसाकि शास्त्र रूपा बादी क प्रसिद्ध है— दीपन तथा द्योतन आदि सूर्यादि देवताओंका प्रत्यक्ष ही है । शब्द होन कहीं किसीका विशेषण हो जाने से ' देव ' शब्द भले ही यौगिक है संसार है । जावे; क्योंकि - विशेषण सदा यौगिक हुआ करता है; पर ' देव ' विशेष्य होनेपर रूढ या योगरूढ ही होता है, और देवयोनिको बतलाना प्रागे जो है । विद्यादान आदि करनेसे ' देव ' नहीं कहा जा सकता भी नहीं । नहीं तो गुरु वा प्राचार्यको भी ' देवयोनि ' ऐसा किसी भी स्थानमें नहीं प्राता । कहीं ‘ देव ' शब्द वाचकलुप्तोपमात्वके कारण किसी सम्भवत: प्रयुक्त हो जावे; पर वह वहीं गौणशब्द होता देवतावाद - प्रसारक पहले बेद हैं, पीछे उनके भाष्य पुराण -। विद्वान् होने शः । सा ह तो हैव स कहा जाता, यह तो मनुष्यकेसिए में यह बादी में तात्य है, मुख्य नहीं । इतिहास प्रादि । महाँ देवत