सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 51–60

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 51–60

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४५ ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) णीका भी ' भुज्यताम, दीयताम् ' कहा जाता, क्योंकि याज्ञिक - भोजनमें शत्रु - मित्र रिणी वा तटस्थकी दृष्टि नहीं रखनी पड़ती । इसी कारण अगस्त्य ऋषि की णंका यज्ञकी दीक्षा में ' अगस्त्यो यजमानोमी ददात्यन्नं विमत्सरः ' ( महाभारत १४।२।१३ ) विना मत्सर [ भेदभाव ] के अन्नदान कहा है । ऐसा व्यक्ति उसे भी उस समय अपने वश हो जाता है । ' नारायणोपनिषद् ' में भी कहा है-पेय, ' यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति ( ७ ९ ) इसलिए तो इस वाणीको इससे द्रका पूर्वं मन्त्रमें स्मरण करते हुए उसे भूतसाधनी - भूतत्रशीकारिणी ' कहा है । सर्वत्र इन्हीं यज्ञोंमें शत्रुताएं मिटती हैं, अपने परायेका भेद हटता है नमें । ( छ ) ( प्र ० ) ' यजमान स्वयं यज्ञकर्ता और दक्षिणाका देनेवाला है, थक- फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि मैं दक्षिणा देनेवालेका प्रिय होऊं । तो ( उत्तर ) हम पूर्व कह चुके हैं कि यह यजमान [ यज्ञकर्ता ] ऋषि-परक लौगाक्षिकी उक्ति है । इसलिए उसे यज्ञार्थ धनकेलिए ईश्वर - परमात्मा वा नहीं राजाको प्रार्थना करनी पड़ती है, क्योंकि ऋषियोंके पास धन कहाँ? बदक श्रतः याज्ञिक - दक्षिणा राजाको देनी पड़ती है, सो यहाँ यजमान [ याज्ञिक ] होना ऋषिका अभिप्राय यह है कि मैं दक्षिणा दाता राजा वा परमात्माका मार प्यारा बनूं, जिसमे मुझे इतना ऋतुमत् - यज्ञोपकारक ( २६।३ ) धन प्राप्त गाय ' हो कि मैं उसे यज्ञके होत्रकर्म तथा अन्न - दान, दक्षिणादानादि कर्म में व्दा- विनियुक्त कर सकूं । वादीके प्राक्षेप समाप्त हो गये । या । ( ज ) आगे तर्करत्नजीने ' यथेमां ' मन्त्रके स्वा. द. जीके किये अर्थकी इष्ट आलोचना ३१-३२ पृष्ठमें की है वह वस्तुतः बहुत युक्तियुक्त है । प्रागे नान- श्राप अपना अर्थ रखते हैं कि प्राचार्य अपने शिष्यको वेदाध्ययन कराता हुआ कहता हूं कि - ' हे शिष्यो! ` जिस प्रकार मैं इस वेदवाणीको सबके फिर लिए कहता है ' इत्यादि, इसका खण्डन एक सिद्धान्तालङ्कारजीने अपने जा पूर्वोक्त पुस्तकमें किया है कि ' म ० दयानन्दजीने इसे ईश्वरकी उक्ति उसे माना है, उसके लिए उन्होंने ' बृहस्पते प्रति ' इस अगले मन्त्रका प्रमाण दिया है जहाँ परमात्माको बृहस्पति नामसे स्मरण किया है ' इससे वादीने प्रक्षेपोंका परिहार [ ४७ तर्क रत्नजीका तथा अपना भी खण्डन किया है । इससे सिद्ध हो गया कि-' यथेमां वाचं ' में प्राचार्य - शिष्यका संवाद भी नहीं, और परमात्मा दोनों ही मन्त्रों में प्रतिपाद्य है, अथवा दोनोंका प्रतिपादक ही है । पर ' प्रतिपादक ' श्रर्थं दोनों ही मन्त्रों में न घटनेसे और ' प्रतिपाद्य ' प्रथं दोनों ही में समन्वित हो जानेसे यही अर्थ ठीक बैठता है । वेदमन्त्रोंका अर्थ ऋषिवाद एवं देवतावादके प्रधीन होनेसे तथा उक्त मन्त्रका गुरू - शिष्य ऋषि - देवता न होनेसे यह तर्कग्लजीसे प्रोक्त संवाद ठीक नहीं । गुरु - शिष्य संवाद वेदकी शैली भी नहीं । यदि ऐसा होता, तो यह बात वेदके अन्तमें कही जाती । ' प्रावदानि ' का प्रयं ' कहता हूँ ' करना भी ठीक नहीं, ' कहूं ' यह करना चाहिये । ' वैमा तुम भी करो ' कहना प्रक्षिप्त है । ( झ ) पूर्वपक्ष - यहो उपदेश चारों वर्णोंको वेद पढ़ाना महाभारत शान्तिपर्व ३२७ अध्याय में व्यासजीने वैशम्पायन आदि शिष्योंको दिया है, ( पृ. ३२ ) ' कुछ विद्वानोंने भ्रमवश ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मण-मग्रतः ' ( ३२७/४६ ) इमी वचनके प्रमाण पर यह मत प्रकट किया है कि, स्त्री - शूद्रोंको न केवल वेद सुनानेका अधिकार नहीं, किन्तु यह भी कि-बिना ब्राह्मणको आगे बैठाये स्त्री - शूद्रोंको इतिहास - पुराण भी नहीं सुनाना चाहिये । यह सर्वथा भूल है । वेदव्यासजीने तो यह उपदेश दिया था कि-वेदोंको चारों वर्णोंक प्राणियोंको सुनाओ ब्राह्मणको आगे बिठाकर; बह वचन वेदके विषयमें कहा गया है, ऐसा ' भवन्तो बहुलाः सन्तु वेदो विस्तार्यतामयम् ' । वेदस्याध्ययनं हीदं तच्च कार्य महत् स्मृतम् ' इस प्रकरणसे स्पष्ट है । ( पृ. १०८-१०६-११२ ) ( उत्तर ) किसी ग्रन्थस्थ वचनका अर्थ उस ग्रन्थकारके हृदयके अनुसार ही लगा हुआ ठीक माना जाता है, अन्यथा किया हुप्रा ठीक नहीं माना जा सकता । ' मन्त्रः शूद्र े न विद्यते ( महाभा. शान्तिपर्व ६०/३७ ) ' नच तां प्राप्तवान् मूढः ( शिशुपालः ) शूद्रो वेदश्रुमिव ( सभापर्व ४५ ।

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४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६ ) ' नाधीयीत प्रतिषिद्धोऽस्य यज्ञः... एव स्मृत. शूद्रधर्मः पुराणः ' ( उद्योगपर्व २६।१६ ) इत्यादि महाभारत के बहुत से प्रमाण हैं, जिनसे शूद्रको वेदाधिकार निषिद्ध सिद्ध होता है । तब यहाँ श्रीव्यासजी शूद्रको साक्षात् वेदका अधिकार कैसे दे सकते हैं? इसी ' श्रावयेच्चतरो वर्णान् ' की स्वामी शंकराचार्यंने यह व्यवस्था पुराणेतिहासपरक लगाई है । १।३।३८ ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें उन्होंने लिखा है- ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् ' इति च इतिहासपुराणाधिममे चातुर्वर्ण्यस्याधिकारस्मरणात् । वेदपूर्वकस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणाम् ' इसका भाव यह है कि शूद्र वेदको सीधा नहीं सुन सकता, किन्तु पुरार्णेतिहासके द्वारा वेदको सुन सकता है । इसलिए पुराणेतिहामको भी पञ्चम वेद ही कहा जाता है, जैसेकि छान्दोग्योपनिषद् में ' इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् ' ( ७।१।२ ) न्यायदर्शन ४।१।६२ सूत्रके वात्स्यायनभाष्यमें भी यही कहा गया है— ' ते वा खल्वेते अथर्वा -ङ्गिरसः एतद् इतिहास - पुराणमभ्यवदन् - इतिहास - पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् ' । इसलिए शतपथमें भी ' पुराणवेद, इतिहासवेद ' श्राया हैं । प्रकृत-पद्य में भी इसीलिए ' अयं ' आया है । महाभारतमें भी ' महाभारत ' को ' काणं वेदमिमं सर्वं शृणुयाद्यः समाहितः ' ( १५/५/४१ ) काष्णं वेद कृष्ण- पायन ' वेदव्यास ' का वेद ' ' कहा गया है । ' इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेद - संमितम् ' । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ( ५।५७ ) ' य इमां संहितां पुण्यां पुत्रमध्यापयत् शुकम् ( ५।५३ ) यहाँपर उसे वेदसम्मत एवं संहिता कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण में भी ' तान् ( मत्स्यध्नः ) उपदिशति इतिहासो वेदः ' ( १३१ ४३१२ ) ' तानुपदिशति पुराणं वेद: ' ( १३ ) यहाँपर पुराण- इतिहासको भी वेद कहा गया है, सो यहाँ शूद्रोंकेलिए वही पुराणेतिहासात्मक वेद, काष्णं वेद - कृष्ण द्वीपायन व्यासका इतिहास - वेद महाभारत मुनाना ही इष्ट है । वह भी ब्राह्मणको आगे करके । कौटलीय अर्थशास्त्रमें भी ' अथर्व-वेदेतिहासवेदौ च वेदाः ' ( १।३।२ ) तथा ' इतिहासवेधनुर्वेद ' ( राजशेखर-प्रक्षेपोंका परिहार [ ४ ९ की काव्यमीमांसा २ श्रध्याय ) यहाँ इतिहासको भी वेद कहा है । ऐसा वेद, पुराण - महाभारतादि ही इष्ट है । स्वा. शंकराचार्यंकी साक्षी इसपर दी जा चुकी ही है । ' इतिहास ' से पुराणका भी ग्रहण हो जाता है, जैसेकि कौटल्यने लिखा है - ' पुराणेति वृत्तम्... धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं च इति इतिहास: ' ( ११५१४ ) श्रीतकरत्नजा ' कौटल्य अर्थशास्त्र ' पर इस विषय में अपनी टीका भी देख सकते हैं । वास्तविक वेद तो उसी प्रकरणमें ' ब्राह्मणाय सदा देयं ब्रह्म शुश्रूषवे तथा ( शान्ति. ३२७/४३ ) ब्राह्मणको देना कहा है । ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः । वेदस्याध्ययनं हीदं तच्च कार्यं महत् स्मृतम् ' ( ३२७१४६ ) यहाँ भी ब्राह्मणको ही साक्षात् सभी वेदोंका देना कहा है, फिर ब्राह्मण शेष - वर्णों को सुनावे - सो वह वेदका शब्द वहाँ इष्ट नहीं, किन्तु अर्थ ही इष्ट है । वह भी वेद होता है, ऐसा वेद, पुराण - इतिहास ही है । तब ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् ' श्लोक भी पुराणे-तिहासात्मक - वेद के लिए प्रतिफलित हुआ, तभी तो सभी निबन्धकारोंने उसे वैसा ही व्यवस्थापित किया है । वेदका भी इसी पक्षपर अनुग्रह है, यह पूर्वं सिद्ध किया जा चुका है । तर्करत्नजीकी ' वैश्य ' से शुद्रका ग्रहण हो जाना, और शूद्रका पतित - पर्यायवाची सिद्ध करना - यह कल्पना प्रापात -मनोहर तो है, पर शास्त्रानुगृहीत नहीं, शास्त्रका वैसा अभिप्राय नहीं, जैसा कि उन्होंने वैसा सिद्ध करनेकी चेष्टा की है । इसपर हमने ' आलोक ' ( e ) पृ. ३६४-३६५ में संक्षेपसे लिखा है । ( श्री शाण्डिल्य जी ) ( ४ ) ' भारतीय धर्मशास्त्र ' के ८३ पृष्ठमें श्रीशाण्डिल्यजीने ' यथेमां चाचं ' का अर्थ करते हुए लिखा है- वेदमें लिखा है— ' जैसे मैं इस कल्याणी चाणीको सभी मनुष्योंके लिए कहता हूँ यह मन्त्रद्रष्टा ऋषिकी उक्ति है जो भगवान् की वाणीका प्रचारक है । इस मन्त्रकी प्रज्ञासे मनुष्यमात्र वेदका अधिकारी है । ' . स ० घ ० ४.

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YE ५० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ). प्राक्षपका परिहार [ ५१ क्षी जब श्रीशाण्डिल्यजी इस वाक्य ( यथेमां ) को ऋषिकी उक्ति कहते ठा हैं, तो यह परमात्माकी प्राज्ञा कहाँ रही? यह तो एक जीवका - लोगाक्षि-बं ऋषिका वैयक्तिक कथन सिद्ध हुआ । वाणी भी उसी जीवकी हो गई, इस परमात्माकी वाणी न रही । यदि ' इमां वाचं ' से परमात्माकी ' वेदवाणी ' इष्ट होती, तो यह मन्त्र वेदके अन्त वा श्रादिमें होता, तभी वेद उसके सामने रहने से ' इदं ' शब्दका प्रयोग सार्थक होता । अब तो ' इमां वाचं ' से यही मन्त्र गृहीत होगा, सम्पूर्ण वेद नहीं, ' इदम् ' सन्निकृष्टका बोध कराता है— इस विषय में पहले बहुत स्पष्टता की जा चुकी है । ' आवदानि ' इस लोट्का ' कहता हूँ ' यह लट्लकारका अर्थ भी ठीक नहीं । ' आवदानि, भूयासम्, समृध्यताम्, उपनमतु ' यह मन्त्रस्य सभी क्रियाएं समानार्थक हैं । उस लौगाक्ष- ऋपिने सभीको कव वेदोपदेश किया – इसमें इतिहासकी साक्षी बतानी पड़ेगी, क्योंकि ऐसा अर्थ ऐतिहासिक हो जायगा, तब . फिर वेद प्रनित्य जायगा । लोगाक्षि ऋषिका तो केवल एक यही मन्त्र है, सारा वेद तो उसका दृष्ट है नहीं, नहीं तो सब वेदोंका द्रष्टा उसे कहा जाता, पर ऐसा नहीं है । तब वह ऋषि सारे वेदोंको कैसे विवक्षित कर हृीं, सकता है? श्रतः श्रीशाण्डिल्यजीका पक्ष ही प्रसिद्ध हो गया । ' वैसे तुम क ' भी सबको कहो ' यह वाक्यार्थं शाण्डिल्यजीने वेदार्थ में स्वयं प्रक्षिप्त किया है, वह मन्त्रमें नहीं । अस्तुः शाण्डिल्यजीने इसे ऋषिकी उक्ति बताकर जहाँ ' ईश्वर कहता है इस अपनी भावनाके नायक स्वामीजीकी उक्ति को मां खण्डित कर दिया, वहाँ शुद्रादिका जीवकी वाणीमें अधिकार बताकर अपना पक्ष भी खण्डित कर दिया; क्योंकि यह ऋषिकी वाणा रही-धरमात्माकी नहीं । वेदप्रचारक ऋषिकी वाणी पृथक् हो सकती हैं, वह उसे है वेदमें नहीं घुसेड़ सकता । वस्तुतः यहाँ भूतवशकारिणी ' दीयताम्, त्रि भुज्यताम् ' यही याज्ञिक - वाणी ही यजमान - ऋषिको इष्ट है, वेदवाणी नहीं ( एक विद्यालङ्कार ) ( ५ ) ( क ) हमारे ' यथेमां वाचं ' के अर्थपर एक विद्यालङ्कार जी ' सार्वदेशिक ( सितम्बर १ ९ ४६ के ग्र ) में लिखते हैं- ' यथेमां वाचं ' का ईश्वरपरक अर्थ माननेसे स्वामीजीके मतानुसार अनेक दोष आते हैं-ऐसा शास्त्रीजीने बड़े गर्जन - तर्जन पूर्वक फर्माया है, किन्तु उनके सम्पूर्ण दोषोंका इतनेसे ही समाधान हो जाता है कि परमात्मा भक्तोंसे कहता है - मैं तुम्हारे द्वारा अपनी वेदवाणीको सब तक पहुंचाऊं - यही मेरी कामना है ' । यहाँ विद्यालङ्कारजी वेदमें प्रक्षेप कर रहे है । ' ययेमां वाचं ' में कहीं ' भक्त ' का नाम है ही नहीं । उक्त के २६३ पृष्ठमें ग्रापने लिखा है-' परमात्मा निराकार होनेके कारण स्वयं बोल नहीं सकता, इसलिए भक्तों-द्वारा बुलवाता है । ' केवल दो - तीन पत्रोंमें ही वादीने परमात्मामें स्मृति-विकार सिद्ध कर दिया । जब परमात्मा स्वयं बोल नहीं सकता; तब फिर भक्तोंसे कैसे कहता है? जब वह बोल नहीं सकता, तब उसकी वाणी क्या? जब उसकी वाणी नहीं, तब ' यथेमां वाचं ' का अर्थ ' परमात्माको वाणी या ' वेदवाणी ' न हुआ । वादीने यहाँ जहाँ ' देखो परमेश्वर स्वयं कहता है ' इस अपने श्राचार्य स्वा.द.के वाक्यका खण्डन कर दिया, वहां ' यावज्जीवमहं मोनी ' की तरह अपना भी खण्डन साथ ही कर दिया । इससे आप दोनों गुरु - चेलोंका ही पक्ष परस्पर विरुद्ध होनेसे खण्डित हो गया । स्वामीजी परमात्माका ' स्वयं कहना ' मानते हैं, ' स्वयं ' शब्द मैंने नहीं डाला, स्वामीजीका है । पर बादी लिखता है- ' परमात्मा निराकार होनेके कारण स्वयं बोल नहीं सकता । यह परस्पर - विरोध है । आप दोनों ही ने ' स्वयं ' शब्द परस्पर विरुद्ध डाला है । जब ऐसा है; और ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका ' ईश्वर देवता ' है, और देवता प्रतिपाद्यको कहते है - यह पहले सिद्ध किया जा चुका तब यहाँ ईश्वर प्रतिपाद्य है - यह हमारा ही पक्ष वादीने सिद्ध कर दिया । निराकार होनेसे बोल न सकनेके कारण वह वादीके मत में भी ' प्रतिपादक ' नहीं हो सकता । तब यहाँ वाणी यज्ञ करनेवाले भक्तकी ' दीयतां भुज्यताम् ' आदि

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५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ही सिद्ध हुई, ' वेदवाणी ' नहीं । क्योंकि वैसा होता, तो यह बात वेद प्रादि वा अन्तमें कही जाती । तब इस मन्त्रसे स्त्री - शूद्रादिको वेदाधिकार सिद्ध न हुआ । ' प्रियो देवानां भूयासम्, दक्षिणाया दातुश्च प्रियो भूयासम् ' का ' हे भक्त! ऐसा उद्योग कर जिससे देवोंमें मेरा प्रेम बढ़े, यज्ञ करने वालों तथा दक्षिणा देनेवालोंमें मेरा प्रेम बढे, ' प्रयं मे कामः समृध्यताम् ' का हे भक्त! तेरे उद्योगसे मेरी यह कामना पूर्ण हो ' यह अर्थ करके वादीने परमात्माको जहाँ अशक्त सिद्ध कर दिया, वहाँ ' अपूर्ण कहनेवाला ' भी सिद्ध कर दिया, इसलिए वादी वीच - बीचमें उसकी न्यूनताको पूर्ण करनेके लिए ' ऐसा उद्योग कर ' ' तेरे उद्योग ' प्रादि शब्द उसके वाक्यमें प्रक्षिप्त भी करता गया है । साथ ही साथ परमात्माको वादीने ' यावज्जावमहं मौनी ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु मम वन्ध्यामीद् अपुत्रश्च पितामहः ' का उदाहरण भी बना दिया । इधर वह अपने आपको निराकार कहकर अपनेको बोलनेमें असमर्थ बताता है, इधर भक्तसे बोलता भी जाता है । इस प्रकार वादीके पक्षका तो समूलोन्मूलन ही हो गया । वेद उसके मतमें ' भक्तकी वाणी ' सिद्ध हो गये, परमात्माकी नहीं, क्योंकि वादीके मतमें निराकारकी वाणी नहीं होती । ( ख ) हमने लिखा था कि- ' वेदके विद्वान् श्रीशंकराचार्य आदि क्या वेद नहीं जानते थे, या उन्होंने ' यथेमां वाचं ' मन्त्रको नहीं देखा; और वेदान्तसूत्रोंमें शुद्रको वेदानधिकार लिख गये, इसपर विद्यालङ्कारजीका स्वा. शङ्कराचार्यकेलिए ' सार्वदेशिक ' ( २२/७ पृष्ठ २६५ ) में यह कहना कि— “ शंकराचार्यजीने वेदान्तसूत्र ( श्रवणाध्ययन - प्रतिषेधात् ) का अर्थ ही नहीं समझा । दूसरे वे सदा उपनिषत् पढ़नेमें लगे रहे, वेदका उन्होंने स्वाध्याय ही नहीं किया, तो ' यथेमां वाचं [ मन्त्र ] उनकी दृष्टिमें कहाँसे याता? " ऐसा धृप्ट लिखते हुए वादीको लज्जा ग्रानी चाहिए । समय होता है — आप लोग ' भारती ' को वेदज्ञ सिद्ध करनेकेलिए यही उक्ति दिया -प्रक्षेपोंका परिहार [ ५३ करते हैं कि- ' भला श्रीशङ्कराचार्य - जसेके साथ बिना वेद पढ़े शास्त्रार्थ कैसे हो सकता था? ' तब फिर प्राचार्य शंकरको वादी वेदका स्वाध्याय न करने वाला कैसे कहता है? वादीके बाबा स्वा. द. जी स्वा. श्रीशङ्करा-चार्य केलिए कहते हैं कि- ' शंकराचार्यजी उज्जैनमें आकर वेदका उपदेश करने लगे, उनमें शंकराचार्यका वेदमत था, अर्थात् उनका पक्ष वेदमतका स्थापन था ' ( स.प्र. ११ समु. १८१ पृष्ठ ) तो क्या स्वा. द. जी उपनिषदों को चेद मानते थे, जो उन्होंने स्वा. शंकराचार्यंकेलिए ऐसा लिख दिया? क्या बिना वेदका स्वाध्याय किये वेदका उपदेश हो सकता है? आपके श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीनरदेवजी शास्त्री ' आर्यसमाजका इतिहास ' प्रथम भागमें लिखते हैं – ' शंकर भगवान् चारों वेद पढ़े थे, सब शास्त्र देख चुके थे, वर्णाश्रमधर्म- मर्यादा के पक्षपाती थे, संन्यासी थे, तत्त्ववेत्ता थे, वैदिकधर्मके प्रबल रक्षक थे ' ( पृष्ठ १४४ ) । अन्य आर्यसमाजी विद्वान् भी ऐसा ही मानते हैं, तब क्या वादी अन्य सभी विद्वानोंको झूठा मानेगा? स्वामी शंकराचार्यने १।१।२२-२३-२४, २६, १/३/२६, ११४।२७ घादि वेदान्तसूत्रोंमें तथा अन्यत्र भी ऋग्वेदसंहिताके बहुन प्रमाण दिये हैं । अन्यत्र यजुर्वेदसंहिता ( माध्यं. ) तथा वाजसनेयक ( शतपथ ) का प्रमाण आदि भी दिया करते है, ' वाजसनेयिनश्च एनमधीयते तैत्तिरीयारण्यक ' ( ११२२६ ) । , ऐतरेयारण्यक, षड्विंशव्रा. ऐतरेयब्रा. तैत्तिरीयब्रा. ताण्ड्यं -ब्राह्मण आदिको उदाहृत करते है । ई परोपनिषत् को उन्होंने बहुत उदाहृत किया है, वह यजुर्वेद ही तो है । १।३।३४ में ' तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ( ७ । १ । ११६ ) यह कृष्णयजुर्वेद ( तै. संहिता ) का प्रमाण दिया है । ' न तस्य ' प्रतिमा अस्ति, वेदाहमेतं पुरुषम्, ३२३, ५६ में ' छागस्य वपाया मेदसोनुब्रूहि इत्यादि याजुष मन्त्रोंको वे उदाहृत करते हैं । ३।३।१ के भाष्य में ' तैत्तिरीय- ' कम्, वाजसनेयकम्, कौथुमकम्, शाठ्यायनकम् - इन संहिताओं स्मरण किया है । ३।३।५५ में वेदोंके शाखाभेदोंको को उनने वेद नहीं जानते थे ' यह विद्यालङ्कारका स्मरण किया है, तब ' वे कहना केवल ' यथेमां ' के स्वामी

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५३ वार्य ५४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) व्याय करा. दयानन्दजीके किये अर्थकी रक्षार्थ ही है । उक्त श्रारोप उनका सर्वथा नदेश सत्य ही है । का वेदान्त - सूत्रका आशय भी आचार्य शङ्करका लिखा ठीक ही है । स्वा. रामानुजाचार्य, स्वामी मध्वाचार्य, गोस्वामी वल्लभाचार्य, यतिपण्डित I भगवदाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य, वैयासिक न्यायमालाकार आदि सभीने उस पके सूत्रका वही अर्थ लिखा है जो स्वा. शंकराचार्यने । हमारा इस विषय में श्रम ' ब्रह्मसूत्रका अपशूद्राधिकरण ' निबन्ब ' दैनिक सन्मार्ग ' देहली ( ६।५२४-देख ५३३ ) में प्रकाशित हो चुका है । इस प्रकार विद्यालङ्कारजी के प्रक्षेप भी परिहृत हो गए । हम उनके प्रत्युत्तरमें विस्तीर्ण निबन्ध ' सिद्धान्त, भी काशी ( ८-४७।४८।४६ ) में प्रकाशित कर चुके हैं । 7 इस प्रकार वादियोंके पक्षके निराकृत होनेसे हमारा पक्ष पुष्ट हो गया कि - ' यथेमां वाचं कल्याणीं मन्त्र शुद्रादिको वेदाधिकार नहीं देता, २७ किन्तु यज्ञमें ब्राह्मण - शूद्रादि सभी को ' दीयताम्, भुज्यताम् ' वाली कल्याणी वाणी हलवा रहा है । इसमें अन्य मन्त्रकी साक्षी भी है- ' ऊर्जादः उत T ण यज्ञियासः पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' ( ऋ. १०१५-१४ ) यहाँ पर " ब्राह्मणादि - निषादान्त पञ्चजनोंको यज्ञातका अन्न खाकर यज्ञको सफल यं- बनानेवाला कहकर उनका आह्वान किया गया है कि - ' हे अन्नादः प्रतएव हुत यज्ञ, सम्पन्नता ( पूर्ति ) कर्तारः पञ्चजनाः! मम होत्रं हवम् ' दीयतां T: ' भुज्यताम् ' इत्यादिकमाह्वानं शृणुत । इसकी स्पष्टता आगे की जावेगी । स्य इस मन्त्रसे भी यही सिद्ध हो रहा है कि- ' दीयतां भुज्यताम् ' आदि वाणी के विषय चार वर्ण र पञ्चम निषाद हैं, वेदवाणीके नहीं । अपना पक्ष य- सिद्ध हो जानेसे यह निबन्ध उपसंहृत किया जाता है । तभी ' मीमांसा-ने न्यायप्रकाश ' पूर्वार्धमें ' न स्त्री - शूद्रौ वेदमधीयाताम् ' यह प्राचीन वचन वे उद्धृत किया गया है, जिससे स्त्री एवं शूद्रोंके वेदाध्ययनका निषेध श्राया नी है । अब ' ब्रह्मचर्येण कन्या, प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' प्रादिसे स्त्री - शूद्रोंका ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' [ 22 जो उपनयन वा वेदाधिकार सिद्ध किया जाता है, उनपर विचार प्रदर्शित किया जाता है । विद्वान् पाठक प्रादिसे अन्त तक इन निबन्धोंको देखते चलें, और मनन करते चलें । इनके अशुद्ध प्रयं करके वादी प्राज जनता को शास्त्रविरुद्ध मार्ग प्रदर्शित किया करते हैं, यह इस निबन्धसे जनताको • मालूम हो जायगा । ' वेदका अधिकार स्त्री - शूद्रादि सभीको है ' इस विषय में ' यथेमा वाच ' कल्याणीम् ' यह जो वादियों की प्रोरसे मुख्य वेदमन्त्र दिया जाता है; इसका तो हम समाधान कर हो चुके हैं । इसी विषयमें ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' ( प्रयवेदसं. ) वेदको ऋषिकाएं, हारीत: -द्विविधा हि स्त्रियः ब्रह्मवादिन्यः, सद्योवध्वञ्च ' ( हारीत व. ) ' प्रावृतां यज्ञोपवीति-नीम् ' ( गोभिलगृ. ) ' मीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ( ऋग्वेद सं. ) स्त्रिय उपनीता अनुपनीताश्च, ' यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना तेन तपस्विनी ' ( वाल्मी ) * अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( शत. ) म.म. पं. शिवदत्तजीके एतद्विषयक विचार, रामायणके प्रमाण, तथा पञ्चजना मम होत्रं षध्वम् ( ऋ. ) । जानिपक्ष, श्रमन्त्रिका तु कार्येय, वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' ( २।६६-६७ ) इन मनु - वचनोंकी प्रक्षिप्तता; ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम् ' ( निरु. ) पतिको अन्त्येष्टि आदि विषयके कई प्रश्न, ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ( प्राश्व. श्री. ) यवनोंका छेद पढ़ना ( भविष्य पुराण ) इत्यादि प्रमाणवादियोंकी प्रोरसे दिए जाते हैं, इस विषयका यही बल उनके पास है । इन प्रमाणोंका समाधान करनेसे उनका पक्ष स्वयं निर्बल होकर विच्छिन्न हो जायगा एतदर्थं यह प्रयत्न है । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के पाठकगण इधर प्रवहित हों । ( २ ) ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' पूर्वपक्ष- ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ( अथर्व. ११ || १८ ) में स्पष्ट विधान है कि कन्या वेदाध्ययनादि रूप ब्रह्मचयंका पालन करके

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५६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) युवक पतिका वरण करती है । ' ब्रह्मचर्य ' शब्दका मुख्य अर्थ वेदका अध्ययन और तदर्थं व्रत धारण करना है । ( ख ) श्रीसायणाचार्यने इस सूक्तमें आये ' ब्रह्मचर्य ' और ' ब्रह्मचारी ' पदोंकी ऐसी ही व्याख्या की है । जैसेकि - ' ब्रह्मचारीष्णश्चरति ब्रह्मणि - वेदात्मके अध्येतव्ये चरितु ' शीलं यस्य स ब्रह्मचारी ' १७ मन्त्रकी व्यास्यामें ' ब्रह्म वेदः, तदध्ययनार्थ-माचर्यं कर्म ब्रह्मचर्यम् ' । कोई कारण नहीं कि - ' ब्रह्मचर्यं ' के इस अर्थको कन्याके ब्रह्मचर्यं प्रतिपादक उक्त मन्त्रमें न माना जाए । ( ग ) ' मुख्या-मुख्ययोर्मुख्ये कार्य - मम्प्रत्ययः ' यह सर्वज्ञास्त्रसम्मत- सिद्धान्त है । ( घ ) ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाऽश्वो घासं - जिगीषंति ' का अर्थ अनेक विद्वानोंने वात्स्यायन - कामशास्त्र आादिके अनुसार वृषभ और अश्वसंज्ञक पुरुष किया है, जो ब्रह्मचर्यके बलसे ही भोज्य पदार्थोंका भोग कर सकते हैं ' ( एक सिद्धान्तालङ्कार, ' सार्वदेशिक ' जून १ ९ ४६ ) । उत्तरपक्ष — ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इस मन्त्रसे वादी लोग कन्याका बेदा-ध्ययन सिद्ध करना चाहते हैं, पर उन्हें इसमें सफलता नहीं मिल सकती । कारण यह है कि इस मन्त्रमें उपस्थसंयमार्थक ब्रह्मचर्यका ही निरूपण है, वेदाध्ययनका नहीं । ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' यह उक्त मन्त्र का पूर्वार्ध है, उसका उत्तराधं है- ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो घासं जिगीषंति ' । दोनों स्थानोंमें ' ब्रह्मचर्य ' शब्द भी समान हैं, विभक्ति भी दोनोंमें समान है, हेत्वर्थमें तृतीया भी दोनों स्थानोंमें समान है, दृष्टान्त-दान्तिकता भी समान है, अतः पूर्वार्ध - उत्तरार्धं दोनों स्थानोंमें अर्थ भी समान होगा, क्योंकि एक ही मन्त्र वा पद्यके उपक्रम तथा उपसंहारमें निपुण - प्रन्थकारको समान ही अर्थ इष्ट होता है । जब उद्दिष्ट शब्दका प्रतिनिर्देश विवक्षित हो, तो कवि भग्नप्रक्रम-दोषकी उपस्थितिकी प्राशङ्कासे उसका पर्यायवाचक भी नहीं दे सकता, भिन्नार्थक शब्दका रखना तो दूरकी बात रही । ' उदये सविता रक्तो रक्त-इचास्तमये भवेत् ' में ' उदये सविता रक्तस्ताम्रश्चास्तमये भवेत् ' इस प्रकार ब्रह्मचर्यण कन्या [ ५७ ' रक्त ' का पर्यायवाचक ' ताम्र ' शब्द भी जब नहीं रखा जा मकता, क्योंकि - वैसा करने पर भग्नप्रक्रम दोष उपस्थित हो जाता है, तब उससे भिन्नार्थंक ‘ उदये सविता रक्तः पीतश्चास्तमये भवेत् ' इस प्रकार भिन्नार्थक ' पीत ' शब्द कैसे रखा जा सकता है, क्योंकि - ' सम्पत्तौ च विपत्तौ च ज महतामेकरूपता ' इस उत्तरार्धके कारण ही विवक्षित होती है । इससे सिद्ध हुआ शब्दका अर्थ समान ही हुआ करता है, जाता है । इसी प्रकार उक्त मन्त्रके पूर्वार्ध उसकी उदयास्त समयमें समानता क कि उद्दिष्ट और फिर प्रतिनिर्दिष्ट प तभी दोनों स्थान वही शब्द रखा भ्र क स और उत्तरार्ध में भी जान लेना हा चाहिए । पूर्वार्ध में ही उद्दिष्ट ' ब्रह्मचर्य ' शब्दको उत्तरार्ध में प्रतिनिर्दिष्ट f ( पुननिर्दिष्ट ) किया जाता है, तब उद्देश प्रतिनिर्देशवश दोनों शब्दों का अर्थ स भी समान ही हुआ करता है । यह न्याय भी प्रसिद्ध है - ' येनोपक्रम्यते येन चोपसंह्रियते, स एव वाक्यार्थः । यदि पूर्वार्धमें उद्दिष्ट ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' वेदाध्ययन ' किया जाय, और उत्तरार्ध में भी प्रतिनिदिष्ट ' ब्रह्मचर्य ' शब्दका ' उपस्थसंयम ' अर्थ किया जाए, तो दोनों स्थलोंमें संगति नहीं पड़ती, क्योंकि - उत्तरार्धका अर्थ है कि- वैल तथा घोड़ा भी ब्रह्मचर्यंके बलसे ही घासको पचा सकते हैं, तब क्या यहाँ वादी ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' वेदाध्ययनं ' कर सकता है? क्या कभी घाम पचाने में कारण वेदाध्ययन हो सकता क हैं? क्या वैल तथा घोड़ा कभी वेद पढ़ सकते हैं? ' प्रालोक ' - पाठक देख प रहे हैं कि यह लोग जनताको किस प्रकार ठगा करते हैं । ' कन्या ' इ ' वेदाध्ययन ' से युवक पतिको लेती है, और घोड़ा - वेल ' उपस्थसंयम ' से fa घासको पचाता है, क्या इस अर्थ में पूर्वार्ध उत्तरार्धका अर्थसामञ्जस्य पर है? मानना पड़ेगा कि नहीं । क जैसे उत्तरार्धमें घास पचानेमें कारण ब्रह्मचर्य उपस्थसंयम ही है, नेदाध्ययन नहीं, वैसे ही पूर्वार्ध में भी पतिवेदनमें कारण ब्रह्मचर्य - उपस्थ-संयम ही हो सकता है; वेदाध्ययन नहीं । इसी एक अर्थ में ही पूर्वाध नव स्व

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८७ ५ = ]. श्रीमनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ET, क एवं उत्तरार्धका सामञ्जस्य हो जाता है; और भग्नप्रक्रमदोष नहीं रहता । च जो स्त्रियाँ वेदाध्ययन नहीं करतीं, क्या उनको युवक पति नहीं मिला ज करते? फिर तो मुसलमानिन तथा ईसाइन स्त्रियाँ तो गईं, उनको युवक ष्ट पति हो न मिलेगा । सनातनधर्मी स्त्रियोंको भी युवक पति नहीं मिलेगा । खा श्रार्यसमाज में भी वेदाध्ययन करने वाली हजारमें एक - श्राघ मिलेगी, शेष को युवक पति न मिलेगा, प्रत्युन वादिसम्मत हारीत वचनके अनुसार सद्योवधुएं ब्रह्मवादिनी न होनेसे वेदाध्ययन नहीं करतीं, तब उनको ना हारीतका विना वेदाध्ययनके पतिप्रदान वादीके अनुसार भी वेद- विरुद्ध ष्ट सिद्ध होगा; नर्य सूचित होगा न है । नर्थI वास्तवमें युवा पतिको ही उत्तरार्ध में तव वादी हारीत वचन देनेका अधिकारी कैसे है - यह आगे । इस प्रकार वादीके अर्थ में स्पष्ट असामन्जस्य एवं प्रयुक्तता पूर्वार्ध में कही हुई बात की कि कन्या उपस्थसंयमसे ही वेदन करनेमें समर्थ हो सकती है - इस बातकी सिद्धिकेलिए दृष्टान्त दिया गया है । दृष्टान्तसे बैल तथा घोड़ेकी घास-परिपाक क्रियामें वेदाध्ययनसे कोई प्रयोजन नहीं, किन्तु वहाँ उपस्थसंयम प्रयोजनीय हुआ करता है, क्योंकि उसी उपस्थसंयमसे प्राम्यन्तरिक शक्ति-ता की स्थिरता के कारण घास ठीक - ठीक पच जाता है, नहीं तो बैल आदि दिख पशुको दस्त लग जाया करते हैं, इसी प्रकार ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं ' या ' इस पूर्वार्ध में भी पतिवेदनको शक्यतामें वे ध्ययनसे कोई सम्बन्ध नहीं, से बिना भी वेदाध्ययन किये हिन्दु लड़कियाँ पतिको ले सका ही तो करती हैं, स्य परन्तु यदि वे गुप्तेन्द्रियका सयम न करेंगी, कच्ची प्रायुमें उससे छेड़ - छाड़ करेंगी, तो वे युवा - पतिके वेदनमें समर्थ न हो सकेंगी । ' योगदर्शन ' व्यासभाष्य में कहा है- ' ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियोपस्थस्य सयम: ' ( २० ) । थ- एक तब इसका आशय यह हुआ कि यदि लड़की अपनी इन्द्रियका संयम ब. नहीं करेगी, कई वस्तुओंोंसे उसे छेड़ेगी, जैसे कि- प्राजकलके गुरुकुल वा स्कूलोंके छात्रावासकी लड़कियोंमें यह अपवाद सुना जाता है, तब प्रदर ब्रह्मचर्येण कन्या [ ५१ आदि प्रारम्भ होनेसे अशक्ति हो जानेके कारण वह युवा पनि समागम को न सह सकेगी । तव पीड़ावश पतिके साथ सदा उसका कलह होता रहेगा । इस प्रकारकी कन्या युवा पतिवेदनके प्रयोग्य होती है - यही लक्ष्य करके वेदादि - शास्त्रोंने कन्याके लिए उपस्थसंयमरूप ब्रह्मचर्य निर्दिष्ट किया । इसलिए दृष्टान्त भी घोड़े यादिके घास - परिपाकादिका दिया गया कि- घोड़ा - बैल घासके पचानेमें जैसे उपस्थसंयमका उपयोग पा सकते हैं, वैसे ही कन्या भी युवा पतिको उपस्थसंयमके उपयोगसे ही प्राप्त कर सकेगी, अन्यथा नहीं । पहले तो कन्याके असंयमका अपवाद अथवा • व्यभिचारादिकी प्रकृति सुनकर पति ही उसको न लेना चाहेगा, तथा वह भी पतिको लेने वा उसके उपयोग में सक्षम न होगी यह आशय है । यह ग्रामीण बालिकाएं भी जानती हैं । माता - पिता भी अपनी सन्तानको इस विषयमें संकेतसे शिक्षा दे ही देते हैं । इस प्रकार उक्त मन्त्रके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध तथा उपक्रम एवं उपसंहारके सामजस्य हो जानेसे वेदको इस मन्त्रमें ' ब्रह्मचर्य ' का ' उपस्थसंयम ' ही अर्थ इष्ट है, वेदाध्ययन नहीं । ११ | ५ | २०-२१ मन्त्रमें प्रोषधियों, पशु, पक्षियों तथा वनस्पतियोंका भी ' ब्रह्मचारी ' होना बताया है । प्रथम ' संस्कारविधि ' में स्वा.द.जीने भी ऐसा ही अयं माना है, तब इस सूक्तमें ' ब्रह्मचारी ' तथा ' ब्रह्मचर्य ' का ' उपस्थसंयम ' ही अर्थ इष्ट हुआ, क्योंकि - पशु - पक्षियोंका ' बेदाध्ययन ' श्रयं कभी घट नहीं सकता । वेदाध्ययनात्मक - ब्रह्मचर्यका तो उक्त सूक्तके प्रादिम एक - प्राध मन्त्र-में वर्णन है, वहां ' ब्रह्मचारी दीर्घश्मश्रु: ( प्रथर्व १२।५।६-३ ) इत्यादि-लिङ्गसे पुरुषका ही ग्रहण इष्ट है, वन्याका नहीं, क्योंकि ' दीर्घश्मश्रु ' ( बड़ी दाढ़ी मूछोंवाला ) पुरुष ही होगा: स्त्री नहीं । इस विषयमें स्पष्टता श्रागे होगी । ब्रह्मचारी - रेतोनिरोधक भी पुरुष ही होगा: स्त्री नहीं । क्योंकि स्त्रीमें वीर्य नामक धातू होती ही नहीं । यदि रजको ही उसका वीर्य माना जाए, तो रजका निग्रह भी वह कर नहीं सकती । प्रतिमास उसका स्राव हुआ ही करता है, जिसके कारण पराशरस्मृतिके ( ७।२० )

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६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अनुसार वह चाण्डाली, ब्रह्मघातिनी, रजकी प्रादिम तीन दिनोंकेलिए मानी जाती है । तब क्या चाण्डाल आदिका उपनयन वा वेदारम्भ शास्त्र-के मत में होता है? रजोनिग्रहमें तो कन्याको सिरदर्द आदि कष्ट होंगे । शरीरमें दुर्बलता होगी । पुरुष यदि शुक्रनिरोध करेगा; तो उसकी पुष्टि होगी । यदि रज शुक्र होता, तो शुक्र वाले पुरुषके समान रजवाली स्त्रीके भी बाढ़ी पूछें होतीं । इसके अतिरिक्त उपनयन - व्रतमें स्वा. द. जीने भी ' क्षुरकृत्यं वर्जय ' ( १४ ) स्त्रयमिन्द्रिय- स्पर्शेन वीर्यस्खलनं विहाय, वीर्यं शरीरे संरक्ष्य ऊर्ध्वरेताः सततं भव ( १५ ) ( सं.वि. पृ. ९ ३ ) इत्यादि जो नियम लिखे हैं, यह बालकों में ही समन्वित होते हैं - बालिकाओं में नहीं । तब स्त्रीका उसनयनमे अधिकार न होनेसे उसे क्रमिक वेदाध्ययनमें भी अधिकार नहीं । वैवाहिक क्वाचित्क मन्त्रोंको ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज्ञ. १ ९ १२।१३ ) ' नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः । विवाहो मन्त्रतस्तस्या: ' ( व्यासस्मृति १।१५-१६ ) ' स्त्रीणाम-मन्त्रतस्तानि विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( अग्निपुराण १५३।११ ) ' अमन्त्रिका तुं कार्येयं स्त्रीणामा वृदशेषतः । ' ( मनु. २२६६ ) ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( २२६७ ) ' एताः क्रियाः स्त्रीणाममन्त्रकाः, तासां समन्त्रको विवाह ' ( वृहद् - विष्णुम् मृति २६।१३-१४ ) इत्यादि अवाद-वचनों से वह ऋत्विग् प्रादिके प्रावयसे भले ही वोल ले, परन्तु उसका क्रमिक एवं बंध वेदाध्ययनमें कोई अधिकार नहीं । तब वादीका पक्ष निरस्त हो गया । ( ख ) ब्रह्मचर्ये शब्दको जो श्रीसायणका ' वेदाध्ययन ' अर्थ दिया जाता है, इमपर यह जानना चाहिए कि- श्रीसायणको भी ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' में कन्याका ' उपस्थसंयम ' ग्रथं ही इष्ट है । उक्त मन्त्र के उत्तरार्धमें उसने लिखा है कि बहुना, पशुजातिरपि ब्रह्मचर्येण स्वाभिलपितं फलं लभते इत्याह — धनवानिति । श्रनो वहन् पुङ्गवः ब्रह्मचर्येण - ऊर्ध्वरेतस्क-ब्रह्मचर्येण कन्या [ ६१ त्वादिना धर्मेण अनोवहनादिकं स्वकार्यं निर्वर्तयन् उत्कृष्टं पति लभते तथा अश्वो ब्रह्मचर्येण घासं भक्षणीयं तृणादिकं जिगीषेनि भक्षितुमिच्छति ॥ इस प्रकार १७ मन्त्रमें भी श्रीसायणको ब्रह्मचर्य - ' ऊर्ध्वरेनस्कत्वादिकम् ' ॥ इष्ट है । यदि श्रीसायण कन्याओं का इस मन्त्रसे वेदाध्ययन मानते, तो सर्ववेद - भाष्यकार होते हुए वे अपने वेदभाष्यकी भूमिकाओं में स्त्री - शूद्रोंको वेदाधिकारका निषेध सिद्धान्तित न करते, देखिये ऋग्वेदभाष्योपोद्घातमें श्रीसायणके शब्द ' तदुभय ( धर्म- ब्रह्म ) ज्ञानार्थी वेदेधिकारी, सच त्रैवर्णिक पुरुषः । स्त्री - शूद्रयोस्तु सत्यामपि ज्ञानापेक्षायाम् उपनयनाभाबेन अध्ययन-राहित्याद् वेदेधिकारः प्रतिबद्धः ( अवरुद्ध: ) । [ यहाँ पाठान्तर ' प्रतिषिद्धः ’ भी है । धर्म - ब्रह्मज्ञानं तु पुराणादिमुखेन उत्पद्यते । तस्मात् त्रैणि-पुरुषाणां वेदमुखेन प्रर्थज्ञानाधिकारः ' । इसी प्रकार श्रीसायणने तैत्तिरीयसंहिता तथा ऐतरेय ब्राह्मणकी भाष्य-भूमिकामें भी लिखा है- ' ननु एवं सति स्त्री - शुद्र संहिताः सर्वेपि वेदा-धिकारिणः स्युः इष्टं मे स्याद् ग्रनिष्टं मा भूदिति प्राशिषः सार्वजनीन-त्वात्? मंत्रम् - स्त्री - शूद्रयोः मत्यपि उपायबोधार्थित्वे हेत्वन्तरेण वेदाधि-कारस्य प्रतिब [ षि ] द्धत्वाद् उपनीतस्यैव अध्ययनाधिकारं ब्रुवत् शास्त्रम् श्रनुपनीतयो: स्त्री - शूद्रयोर्वेदाध्ययनम निष्टप्राप्तिरिनि बोधयति । कथं तर्हि तयोः [ स्त्री शूद्रयोः ] तदुपायावगम:? पुराणादिभिरिति ब्रूमः । श्रत एवोक्तम् — ' स्त्रीशूद्र द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमा रुपानं कृपया मुनिना कृतम् ' इति । तस्माद् उपनीतैरेव त्रैवर्णिकैः [ त्रैवणिक- पुरुषः ] वेदस्य सम्बन्ध इति ' । इससे स्पष्ट है कि - ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्रमें श्रीसायणको कन्याओं का ब्रह्मचर्यं वेदाध्ययन इष्ट नहीं, किन्तु उपस्थसंयम ही इष्ट है । ( ग ) यहाँपर ' मुख्या मुख्ययोर्मुख्ये कार्य - सम्प्रत्ययः ' यह व्याकरणकी परिभाषा भी नहीं घटती । स्वा. द. जीने पारिभाषिकके १० पृष्ठमें इसका अर्थ यह किया है— गौण और मुख्य दोनोंमें एक कालमें एक कार्य प्राप्त

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[ ६१ ६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लभते । ' छति । हो; तो मुख्य कार्य होवे, और गौणमें नहीं इस अर्थका समन्वय ही नहीं । किम् नहीं तो फिर कन्या के ब्रह्मचर्यं मे ' उपस्थसंयम ' अर्थ कभी हो भी नहीं, ते, तो - असम्भव हो जाय, पर ऐसा नहीं बल्कि कन्याओं केलिए ' उपस्थसंयम ' शूद्रोंको अर्थ ही मुख्य है । वेदाध्ययनकी कोई बात भी नहीं । दधातमें अन्य यह बात है कि — वेदाध्ययनकेलिए शुक्र- निग्रह करना मुख्य वर्णिकः ब्रह्मचर्य होता है, पर स्त्रीमें तो शुक्र ही नहीं होता । इसका ज्ञापक है कि-ध्ययन- वह ' दीर्घश्मश्रु ' नहीं । श्मश्रुहीनतासे स्पष्ट है कि वह शुक्र हीन है । नषिद resta ता शुक्रनिग्रह कैसे? जब शुक्रनिग्रह नहीं, तव उसका ब्रह्मचर्यं ' वेदाध्ययन कैसा? तव स्त्रीका ' ब्रह्मचर्यं ' उपस्थनिग्रहमें पर्यवसित हो - जानेसे वही मुख्य रहता है, वेदाध्ययन मुख्य नहीं । तब उपस्थापित परिभाषा भी हमारे ही पक्षकी अनुग्राहक है । वेदको भी यही इष्ट है । भाष्य- इसलिए वेदको ब्रह्मचारी भी ' दीर्घश्मधु ' ( अ. ११।५।६ ) ही इष्ट है । वेदा- " वह स्त्री में नहीं घट सकता, पुरुषमें ही घटता है, इसीलिए ' ब्रह्मचारिणम् ' जनी - ( अ. ११।५।३ ) ' ब्रह्मचारी ( प्र. ११ ५/६ ) यह पुंल्लिङ्ग शब्द आया है, विदाधि स्त्रीलिङ्गान्त नहीं । यदि यहाँपर जातिपक्षसे कन्याका ग्रहण वेदको इष्ट वस्त्रम् होता, तो ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( ११।५।१८ ) में उसका पुनर्ग्रहण वा पृथक ' ग्रहण न होता । पृथक् - ग्रहणसे उक्त सूक्तमें जातिपक्ष बाधित है, और यहाँ । ग्रत कन्याका पशुपक्षियों श्रादिकी तरह पृथक् - प्रोक्त ' ब्रह्मचर्य ' शब्द उपस्थमंयम-रुपानं अर्थ वाला ही है, वेदाध्ययन ग्रथं वाला नहीं - वह स्पष्ट है । पुरुषैः ] तव ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' इस उत्तरार्धके अनुरोधसे ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्रमें इस पूर्वार्ध में भी कन्याके ब्रह्मचर्यका अर्थ ' उपस्थसंयम ' ही । तभी यसंयम दृष्टान्तसे साम्य हो सकता है । ' वेदाध्ययन ' अर्थ करनेपर तो ' विषम-उपन्यास ' हो जायगा । कन्याके वेदाध्ययन अर्थमें यहाँ कोई उपपत्ति भी की तो नहीं, क्योंकि - बिना वेद पढ़े श्री कन्या उपस्थसंयममात्रसे युवा पतिको इसका प्राप्त कर सकती है । उपस्थसंयम अर्थ में सोपपत्तिकना तो प्रत्यक्ष है प्राप्त ही; क्योंकि - उपस्थनिग्रहके बिना वह युवकपतिवेदनके योग्य हो न सकेगी । जो लड़कियां कच्ची आयुमें कृत्रिम साधनोंसे उपस्थको छेड़ती है, ब्रह्मचर्येण कन्या । ६० पीछे उनकी दुर्दशा होती है, वे युवा पतिके योग्य नहीं रहतीं, यही यहाँ निष्कर्ष है । वेद पढ़नेकी यहाँ कोई बात ही नहीं । जब यहाँ वादीका अर्थ ' सिद्ध ' ही नहीं, तब इस प्रकारके स्त्रीवेदान-धिकारसम्बन्धी, स्मृतिवचन वेदविरुद्ध भी नहीं कहे जा सकते । हमने वैद हृदय खोलकर रख दिया है । जैसे ' ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्र विरक्षति ' ( अ. ११।५।१७ ) इस मन्त्रका अनुवाद ' मनुस्मृति ' में ' जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ' ( ७/४४ ) इस रूपमें आया है, वैसे ही ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' ( प्र. ११।५।१८ ) का भी अनुवाद शास्त्रों में ' सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकमंण्यमैथुनी ' ( मनु. ३१५ ) ' कन्याम-स्पृष्टमैथुनामुपयच्छेत ' ( मानवगृ. १७१८ ) ' अस्पृष्टमैथुनां भार्यां विन्देत ' ( वसिष्ठ ८१ ) ' नग्निकां ब्रह्मचारिणीम् ( प्रकृतमैथनाम् - इनि मातृदन: ) भार्यामुपयच्छेन ( हिरण्यकेशीगृ. १३/३१ ) ' अक्षतयोनिः ' इत्यादिरूपमें मिलता है । तब इस मन्त्रका लक्ष्य उपस्थसंयमवाली कन्याका विवाह है । इसलिए श्रीपाददामोदर सातवलेकरजीने अपने अथर्ववेदभाष्यके इस सूक्न में कहा है — ' ब्रह्मचर्यका तात्पर्य यहाँ संयमसे हैं ' ( पृ १५१ ) ' इस मन्त्र में स्त्री जाति के ब्रह्मचर्यकी भी सूचना हो गई है ' ( पृ. १५२ ) । ( घ ) जो कि वादीने ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' इस उत्तरार्धमें काम-शास्त्र के अनुसार ग्रश्व - वृषभ संज्ञक मनुष्य यह अर्थ करनेकी चेष्टा की है; यह क्यों? क्या पाठुकोंने इसका रहस्य समझा! वह रहस्य यह है कि-' ब्रह्मचर्येण ' कन्या ' का उत्तरावं ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' है । यह उत्तरार्ध ऐमा प्रबल प्रमाण है, जिससे कोई पूर्वार्धके ' ब्रह्मचर्य ' का श्रयं ' वेदाध्ययन ' कर ही नहीं सकता, क्योंकि बैल वा घोड़े को वेद पढ़ाना अनुपपत्र है, अतः यहाँ उपस्थसंयम ही अर्थ है; इसी दृष्टान्तके अनुरोधसे पूर्वार्धमें भी कन्याका ब्रह्मचर्यं वादियोंको भी वैवश्यसे ' उपस्थसंयम ' ही मानना पड़ता है तभी स्वा. द. जीने भी जहां - जहां यह मन्त्र दिया, वहाँ वहाँ इस मन्त्रका उत्तराधं लोकदृष्टिसे छिपा दिया । तत्र ' उपस्थस्यम ' अर्थ हो जानेसे यह

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६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ब्रह्मचर्यण कन्या [ ६५ प्रमाणवादियोंके कामका नहीं रहता, अन्य भी कोई प्रमाण इस विषयका मिलता नहीं, अतः वादीने सोचा कि अनड्वान् तथा अश्वका ' पुरुष ' अर्थ कर दिया जाय, पशु अर्थ ही न रहे; न वेदाध्ययनकी असम्भवताकी झंझट प्राये, तब पुरुष अर्थ करनेपर तो ' ब्रह्मचर्य ' का ' वेदाध्ययन ' यह अर्थ कोई भी निषिद्ध वा असम्भव सिद्ध न कर सकेगा । इसलिए वे कामशास्त्रकी ओर दौड़े, और वेदमें यौगिकताके अपने सिद्धान्तसे गिर कर यहां उनको पारिभाषिक वा संज्ञारूप वा रूढि शब्द माना । अनेक विद्वान् तो क्या, एक भी प्राचीन विद्वान्ने उत्त ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' मन्त्रमें ऐसा अर्थ नहीं माना, पर ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' यह न्याय यहां सार्थक हुआ; हमारा ष्ट अर्थ स्वयं वादीके मुखसे निकल पड़ा । अब वादीसे प्रष्टव्य है कि- ' वृषभ तथा अश्वसंज्ञक पुरुष ब्रह्मचर्यके बलसे भोग्यको पचा सकते हैं, इस वादीके अर्थ में ' ब्रह्मचर्य ' शब्दका अर्थ ' उपस्थसंयम है, या वेदाध्ययन? ' वम इसीसे शास्त्रार्थंका निर्णय हो जायगा । यदि यहाँ ' ब्रह्मचर्य के बलमे ' का अर्थ ' वेदाध्ययन ' है, तब भोज्य पदार्थको पचानेमें वेदाध्ययनको हेतु रखना हेत्वाभास है, क्योंकि वहाँ निरुपपत्तिकता है । हां, उपस्थमयम अर्थ करनेसे सोपपत्तिकता है, क्योंकि-अश्व तथा वृषभ - संज्ञक पुरुष भी यदि उपस्थसंयम न करेंगे, तो भाज्य - पदार्थ न पचा सकेंगे । कामशास्त्रमें उपस्थसंयमका सम्बन्ध तो हो सकता है, वेदाध्ययनका नहीं । इस प्रकारके प्रथानुसार भी जब उक्त मन्त्रके उत्तरार्धमें उपम्थसंयम अर्थ है, तो इस दृष्टान्तके अनुरोधसे पूर्वार्धमें भी कन्याके ' ब्रह्मचर्य ' का ' उपस्थसंयम ' अर्थ होगा । भोज्यपदार्थंकी पाक-क्रियामें भी हेतु ब्रह्मचर्य उपस्थसंयमका बल होता है, न कि वेदाध्ययन का बल । कन्याके युवकपति - वेदनकी क्रियामें भी हेतु ब्रह्मचर्य - उपस्थसंयम का ही बल होता है, न कि वेदाध्ययनका बल - इम प्रकार वादियोंकी वालुकाभित्ति सर्वथा गिर गई- जिसे वे कभी खड़ा कर ही नहीं सकते । यह ' आलोक ' पाठकोंने देख लिया । द्विज - पुरुषोंका ब्रह्मचर्यं यदि वेदाध्ययन अर्थ रखता हो, तो स्त्रीके ब्रह्मचर्यका भी वही अर्थ हो – यह श्रावश्यक नहीं है । क्या रजस्वलः पुरुषः, रजस्वला स्त्रीका अर्थ बराबर हो जाता है? प्रथम संस्कार - विधिमें स्वा. दयानन्दजीने ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' का अर्थ करते हुए लिखा है- ' बैल श्रीर घोड़ा पशु हैं, तथापि ब्रह्मचर्याश्रम करके युवावस्था में मैथुनासक्त होते हैं, पूर्व नहीं! जब पशु भी ब्रह्मचर्याश्रम करते हैं, सूर्य, श्रोषधि, रात्रि, दिवस, वनस्पति, संवत्सर और ऋतु आदि भी ब्रह्मचर्याश्रम करते हैं, तो मनुष्योंको क्यों न करना ' ( ७०-७१ पृष्ठ ) यहाँ ब्रह्मचर्याश्रमका अर्थं स्पष्टतया उपस्थसंयम ही है, वेदाध्ययन नहीं, नहीं तो पशु, वनस्पति श्रादिमें वह कैसे घट सके? इस सूक्तमें प्राये हुए ' दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः ' ( ११।५।६-३ ) इस ' दीर्घश्मश्रुः ' लिङ्गसे ' स्त्रीका वेदाध्ययन ' इष्ट नहीं । इससे स्पष्ट है कि - ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्र से स्त्रियोंका वेदाध्ययनाधिकार किसी भी रूपसे सिद्ध नहीं हो सकता ' कौमार, कुमारी, ब्रह्मचारिणी ' - ( शल्यपर्व. ५४१६, ४८।२ ) आदिमें भी कुमारावस्थासे ही उपस्थसंयमवती अर्थ है, जैसे कि कहते हैं कि ' वे वाल ब्रह्मचारी थे तब इससे वादीकी कोई इष्टसिद्धि नहीं । ( ख ) ' दीर्घश्मश्रु ' को स्पष्टता । कई व्यक्ति कहा करते हैं कि - ' मन्त्रभागका ऐसा कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं; जहाँ स्त्री एवं शूद्रोंके उपनयन एवं वेदाधिकारका स्पष्ट निषेध हो '; इसपर उत्तर यह है कि- ' आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं ' ( ११।५।३ ) यह प्रथर्ववेदका मन्त्र स्त्रियोंके उपनयन एवं वेदाधिकारका स्पष्ट निषेधक है । इस सूक्तमें ब्रह्मचर्यं वेदाध्ययन तथा उपस्थसंयमरूपसे दो प्रकारका बताया गया है । इस मन्त्रमें तो वेदाध्ययन जिसका मूल उपनयन है-स ० ध ० ५