सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 421–430

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 421 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ 1: 2 ] यज्ञ है । यज्ञ यज धातुसे निष्पन्न है, जिसका अर्थ होता है ४२ दिका विषय तो वेदोंमें देवतावाद है । देवताओंका अग्निद्वारा । ) । तभी आह्वान अर्थात् उनके नामसे अग्निमें हवि डाली जाती है । तो क् दिवि देव का पूजन डालने से विद्वान् मनुष्यकी पूजा तथा तृप्ति हो जावेगी? यानी होते है निमें हवि विद्वानको ' देव ' कहा जावे; तब ' देव द्विज - गुरु- प्राज्ञ - पूजन ' मन्त्र में नो यदि ' भगवद्गीता ' के इस पद्य में देव तथा प्राज्ञके पृथक् निक्लनारंग २/७/१४ ) - पृथक् हमें पुनरुक्ति हो जावे I । ' विद्वा " सो ये शतक्रतु देवाः ' ( शत. ११ इति ३१२ ) यहाँपर भी पुनरुक्ति दोष हो जावे । यहाँ इन्द्रादि - देवोंको मनुष्य-- श्रापं बताया गया है, पर वादीकी भाँति ' देव ' शब्दको ' विद्वान ' का साम्प्रदायिक नहीं बताया गया । नहीं तो अन्यतर ( दोनें एक ) शब्द विद्वानो पर्व हो जाता । ' सम्पूज्य देवताम् श्रश्विनौ गां ब्राह्मणांश्च ' ( चरकसं. कल्प. १।१२ ) ( ७११ ) देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा कही गई है । यहाँ यदि ' देवता ' ' च स्थानिकले के अनुसार ' विद्वान् ' का नाम है; तो ' ब्राह्मण ' से ' अविद्वान् ब्राह्मण ' क्तोंका उहा सत होकर उसकी पूजासे ' जन्मना वर्णव्यवस्था ' सिद्ध हो जावेगी । साकि शादियाबादी के अनुसार दोनों शब्द समान ( विद्वान् ) अर्थ होनेसे उनमें त्यक्ष ही है । हद होना चाहिये, दोनों नहीं । वस्तुतः वादीका यह पक्ष सर्वथा ही यौगिक है नराधार है । परदेव निकोब प्रागे जो वादीने ' श्रानन्द एवास्य विज्ञानम्, श्रानन्दात्मानो ह वै सर्वे विद्वान् होते । साह एषैव देवानाम् अद्धा श्रद्धा । स ह स न मनुष्यो य एवंविद् हा जाता, हैव स एक: ' ( १०1३1५। १३ ) यह शतपथ ब्राह्मणका वचन दिया यह तो ' स न मनुष्यः, देवानां स एक: ' इस वाक्य में स्पष्ट अर्थवाद नुष्य के लिए भी यह वादी नहीं जानता । इसपर ' न्यायदर्शन ' देखे । अर्थंवादका मुल्य नहीं । तात्पर्य नहीं रहता, किन्तु उसके भावमें तात्पर्यं रहता है । तिहास प्रावि यहाँ देवताओंको श्रानन्दात्मा जाननेमें ही तात्पर्य है । इसीलिए ' मनुष्यः ' का ' साधारण मनुष्य ' अर्थ नहीं [ ७८३ अग्रिम कण्डिकामें भी ' तस्माद् यां देवेषु श्राशिषम् इच्छेत्, उपतिष्ठेद् । प्रायन्दो वै श्रात्मा, असौ मे काम:, स मे समृध्यताम् एतेनैव सहैव अस्मै स काम ऋष्यते । सत्कामो भवति, एता, हैव तृप्तिमेतां । इति गतिम् । एतम् आनन्दात्मानम् श्रभिसम्भवति य एवं वेद ' ( १४ ) यह वादीने पूर्व कण्डिकामें ' स ह स न मनुष्यः ' का वह ' साधारण मनुष्य ' नहीं रहता; यह श्रयं करके उसमें ' साधारण ' शब्दका अर्थ में प्रक्षेप कर दिया । आप लोग तो श्रन्य पुस्तकोंमें प्रक्षेप - प्रक्षेप चिल्लाया करते हैं, और उस प्रक्षिप्तताको माननेमें नकार कर दिया करते हैं । पर श्रापं वचनोंका श्रर्थ करते समय उसमें प्रक्षिप्तताएं कर देते हैं । क्या यह साधारण जनोंका वञ्चन नहीं है, ऐसी प्रवृत्ति में बादीको लज्जा करनी उचित है । वहीं जब ' स साधारण मनुष्यो न भवति ' यह पाठ ही नहीं है, किन्तु ' स न मनुष्यः ' यह पाठ है, तव वादी तदनुसारी ही अथ करे, उसमें ' साधारण ' शब्दका प्रक्षेप न करे । अव इसका यह अर्थ हुआ कि - ' वह मनुष्य नहीं है, किन्तु देवता है? इस प्रर्थवादसे हो देवता तथा मनुष्यकी भिन्नता प्रतिफलित हा गई । शेष यहाँ मनुष्यको ' मनुष्य ' न कहकर, बल्कि उसके मनुष्यत्वका निषेध करके उसे देवता कहना - यह प्रयंवादसे है, वास्तविकतासे नहीं । ' ताद्धर्म्यात् ताच्छन्दयम् ' यह उपचार बहुत प्रसिद्ध है । ' झांसी रानी श्रौरत नहीं थी, मदं थी ' ' विष विष नहीं; दुर्जनका वचन विष है ' यह इसके उदाहरण हैं । पर इससे उस स्त्रीका स्त्री न होना, मदं होना, विषका विष न होना, दुर्जनके वचनका विष होना वास्तविक नहीं हो जाता । यह बात यहाँपर भी घटा लीजिये । यदि वादीकी सचमुच ' शतपयब्रा ' में आस्था है; तो शतपथ तो देवता और मनुष्यों में स्वष्ट भेद मानता है । यों तो उसके अनेक उद्धरण हमने

पृष्ठ 422

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 422 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' आलोक ' के ४ थं पुष्पमें दे रखे हैं, पर यहाँ दिङ्मात्र उद्धरण देते हैं -- । ' देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा उपासीदन्, तान् [ प्रजापतिः ] श्रब्रवीद् -यज्ञो वो अन्नम्, अमृतत्वं वः, सूर्यो वो ज्योतिरिति ( २/४/२१ ) यहाँ पर देवताओं को यज्ञोपवीती बताया है । उनका अन्न यज्ञ बताया गया है । उन्हें अमर बताया गया है । उनकी ज्योति सूर्यको बताया है । बे सूर्यलोक में रहते हैं । ' पितरः प्राचीनावीतिनः... उपासीदन् । तान् प्रब्रवीत् - मासि मासि प्रशनं वः, मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिरिति ( २ ) यहाँ पितरोंका जनेऊ दाहिने कन्धेपर बताया है, महीने - महीने ( प्रति - श्रमावास्या में ) तुम लोगोंको स्वधाते प्रन्न प्राप्त होगा । तुम लोगोंकी ज्योति चन्द्रमा होगा । चन्द्रपृष्ठ में निवास होगा । ‘ अथैनं मनुष्याः प्रावृता उपासीदन् । तान् प्रब्रवीत् - ' सायं प्रातर्वोऽ-शनम् । प्रजा वः, मृत्युर्व:, श्रग्निर्वो ज्योतिः ' ( ३ ) यहां मनुष्योंका सायं प्रातः भोजन कहा है, उनकी सन्तान कही गई है, उनकी मृत्यु कही गई है । उनकी ज्योति प्रग्नि बताई गई है । ' अथैनं पशव उपासीदन्, तेभ्यः स्वषमेव चकार । यदा कदा च लभावै, यदि काले यदि अनाकाले प्रर्थव प्रश्नाथ ( ४ ) यहाँ पशयोंके -लिए स्वतन्त्रता कर दी । जब भी तुम लोगोंको कुछ मिलेगा, चाहे समयपर चाहे असमयपर; तुम खाने लग जाभोगे । ' प्रथैनम् असुरा उपसेदुः तेभ्यः तमश्च, मायां च प्रददौ । ता इमाः प्रजाः तथैव उपजीवन्ति, यथैव ग्राम्यः प्रजापतिर्व्यदधात् ' ( ५ ) उसके बाद असुरोंको अन्धकार तथा माया दी । यह सब प्रजाएं वैसा ही अपने धर्मका अनुसरण करती हैं, जैसा प्रजापतिने उनके जिम्मे लगाया है । ' नैव देवा अतिक्रामन्तिा न पितरः, न पशवः, मनुष्या एव एक यतिक्रामन्ति ' ( २४२२६ ) ( न तो देवता अपना नियम तोड़ते हैं, देवता और मधुष्यों का प्रन्तर ७८५ पितर और न पशु; कई मनुष्य ही अपने नियम तोड़ देते हैं स्थान पाँच वार भोजन करते हैं । यहाँ देवताओं तथा । दो समय के मात्रा में स भारी भेद बताया गया है । देवताओंका खाना यज्ञकी मनुष्यों का कितना दरकर fo है; अन्न नहीं । उनकी मृत्यु नहीं बताई गई है; पर हवि बताया गया दिर भी सायं भोजन बताया गया है, उनकी मृत्यु भी बताई गई मनुष्यों का प्रातः- अथ प्रतिमासं भोजन बताया गया है । ) है । पितरोंका सर्व - देव वादी अपने प्रापको विद्वान् मानता है, तो देवता भी अपनेको येश होगा । तब क्या वह द्यलोकमे रहता है? या पृथिवीलोकमें? यदि मानता देवमभिस लोकमें रहनेवाला है; तो वादी देवता न हुआ । देवता पृथिवी है । हैं — यह हम पहले बता चुके हैं । ऋ. १०१११०१३ में द्यलोक द्य लोकमें पृथिवीलोक- रहते हमसे देव से भिन्न माना गया है । ' प्रथ देवताओं की मृत्यु नहीं बताई गई; तव प्रापके देव दयानन्द क्यों मारे ( बृहदारण्य देवोंसे भ गये? वे क्या खाना नहीं खाते थे? क्या उनकी यज्ञकी ह्रविसे तृप्ति देता; तो हो जाती थी? यदि वादी शतपथकी इन कण्डिकाओं के अनुसार मनुष्योंसे मिल इसीलि कर के देवयोनि न मानेगा, मनुष्य में ही विद्वानों में ' देव ' मान लेगा, तो फिर उद्धरण देखि ' पशु ' भी मनुष्यों में मान लेने पड़ेंगे, फिर पशुयोनिको भी भिन्न योनि थोड़ा, मत मानो । उन पशु- मनुष्यों को खली - भूसा यादि खिलाइये । यदि वादो देता है । पशुयोनिको स्वतन्त्र मानता है; तो उसे देवयोनि भी पृथक् स्वतन्त्र माननी पड़ेगी । जब उस क्षेत्र है । ज पथमें मनुष्य तथा मोंके प्रानन्दकी मात्रा भी पृथक् पृयरिकोंका मानी गई है | देखिये - फल * स मनुष्याणां परम आनन्दः । श्रथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स मनुष्य का एकः पितृणां जितलोकानामानन्दः ' ( यहाँ मनुष्य तथा पितरोंके प्रानन्दको प्रववाद स ० ध ० ५० कर दिय

पृष्ठ 423

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 423 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मांलोकः ( ३-२ ) I ७८५ भेद बताकर दोनोंका योनिभेद बताया गया है । इस लोक में समयक में - गत चन्द्रलोकके जीव पितर विवक्षित हैं । कितना दरकर पितृलोक भिन्न सिद्ध हो गये । ) इस प्रकार या गया दिवर भी मनुष्ययोनिसे प्रातः अथ ये शतं पितृणामानन्दाः स एको गन्धर्वलोके श्रानन्दः ' ( यहाँ पितरोंका सर्व देवविशेषोंके श्रानन्दकी मात्रा पितरोंसे भी अधिक बताई गई है । ) ये शतं गन्धर्वलोकानामानन्दाः; स एकः कर्मदेवानामानन्दः, ये कर्मणा. मानता | देवमभिसम्प्रपद्यन्ते ' ( यहां कर्मदेवोंका उनसे भी अधिक आनन्द बताया पृथिवी है । कर्मदेवसे अभीष्ट वे मनुष्य हैं, जो इस लोकसे मरकर अपने कमें रहते मॉले देवलोक में देव बने हैं । ) नवीलोक- ' ग्रंथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक प्राजानदेवानामानन्दः ’ ( वृहदारण्यक ६।३।३३ ) यहाँ जन्मसिद्ध - देवताओं के आनन्दकी मात्रा क्यों मारे देवोंसे भी अधिक बताई गई है । यदि देवता तथा मनुष्यों में भेद न से तृप्ति हेोता; तो यह वाक्यभेद व्यर्थ हो जाते । इसीलिए वादीके स्वा.द.जीने भी आदिम स.प्र. में उक्त श्रुतियोंका सिभिल करके मनुष्य - देवता आदिका स्पष्ट भेद माना है । उनके कुछ तो फिर हरण देखिये – ' जव मनुष्य शरीर में जीव अधिक पाप करता है, और नन्न योनि थोड़ा तब नरकादि - लोक और पशु प्रादिके शरीरोंको प्राप्त यदि वादी ता है । स्वतन्त्र जब उसके पाप और पुण्य तुल्य होते हैं, तब मनुष्यका शरीर प्राप्त है । जब पुण्य अधिकतर हो, और पाप थोड़ा; तब देवलोक श्रीर थप तरिकोंका शरीर उस जीवको मिलता है । उसमें जितना अधिकपुण्य, का फल जो सुख उसको भोगके पाप - पुण्य तुल्य रह जाते हैं; तब नन्दाः श्रानन्दको मनुष्यका शरीर धारण करता है ' ( नवम समु. पृ. २८४ ) । ववादी बोले कि हमारा पक्ष वादीके स्वामीने भी किस खूबी से कर दिया है । वादी सूर्यादिको तो देवता श्रव भी मानताही है । देवों और मनुष्योंका तिल - तालका अन्तर [ ७८७ शतपथके ' अनुसार उनको श्रानन्दमय मानता तव ' श्रानन्दात्मानो ह है या नहीं? यदि नहीं, वै सर्वे देवा: ' इस वादीसे उद्धृत शतपथकी कण्डिका अनुसार वे ' देवता ' न सिद्ध हो सके । उसके ' सर्वे देवा शब्दको याद कीजिये । यदि उनके अधिष्ठाता: ' श्रानन्दमय माने; तव हमारा, देवताओंोंको चेतन तथा पक्ष वादीने ही सिद्ध कर दिया । ' अग्ने! वह हविरद्याय देवान् ' ( ऋ. ७।११।५ ) यहाँ अग्निमें डालनेसे देवताओंकी ' तृप्ति दिखलाई है । इस प्रकारके ग्रन्य वेदमन्त्र हवि बहुतसे मिलते हैं । क्या अग्नि में हवि डालनेसे विद्वान् तृप्त भी फिर खाना तो नहीं खाते होंगे हो जाते हैं? ? क्या वादीने भी खाना बन्द कर डाला है? क्योंकि - ' सार्वदेशिक ' कार्यालय में अथवा ' ग्रानन्दकुटीर प्रतिदिन होता ही होगा, और वादी अपनेको ' में हवन तो विद्वान् तथा देवता मानता ही होगा? यदि वादीने खाना बन्द नहीं किया, तो मानना पड़ेगा कि-देवता मनुष्यों से भिन्न हुआ करते हैं । देवता विद्वानोंसे भी भिन्न हुआ करते हैं । क्योंकि - विद्वान् मनुष्य तो खाना खाते हैं; पर देवता नहीं । ' न देवा अश्नन्ति न पिबन्ति एतदेव प्रमृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छान्दो. ३।६।१ ) ' स येन देवेन ऋणं जायते, तद् एतान् तद् अवदयते, यद् यजते, प्रय यद् अग्नौ जुहोति ' ( शत. ११७ २२६ ) यहां देवताओंका ऋण वजनसे उतर जाना माना है । आर्यसमाजी विद्वान् ( देवता ) अपना सारा धन निर्धनोंको दे-दें, और वे निर्धन अग्निमें प्राहुति डाल देंगे, उनका ऋण उतर जावेगा । फिर वे मांगेंगे; तो नहीं? यदि मांगेंगे; तो विद्वानोंका नाम देवता सिद्ध न हो सका । फलतः ' देवता विद्वान् मनुष्य ही हैं, यह वादियोंका पक्ष सर्वथा अशास्त्रीय एवं निराधार सिद्ध हो गया । किसी भी निघण्टु वा कोष में विद्वानोंके पर्यायवाचकोंमें ' देव ' शब्द नहीं प्राया । आगे बादी लिखता है— ' अथ ये ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचानाः, ते

पृष्ठ 424

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 424 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८८ ] श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) मनुष्य- देवाः ' ( शत. ४ | ३ | ४ | ४ ) में स्पष्ट कहा है - जो वेदोंको जानने-वाले, जनताकी सेवा करनेवाले ब्राह्मण होते वही मनुष्यों में ' देव ' कहलाते हैं । ' वहां वादी धोखा देता है । यहां द्युस्थानी देवताओं को ही केवल ' देवता ' कहा गया है । ब्राह्मणोंको साक्षात् देवता नहीं, किन्तु ' मनुष्यदेव ' कहा गया है - ' मनुष्येषु देवा इव ' । तब देवयोनि द्यस्थानी ही सिद्ध हुए । वादीका ' शुश्रुवांसः ' का ' जनताकी सेवा करना ' अर्थ भी अशुद्ध है । सेवा ' शूद्र ' का कर्म है, ' ब्राह्मण ' का नहीं । यहाँपर उसका ' बहुश्रुत ' अर्थं है । ' श्रु ' धातुसे क्वसु प्रत्यय करनेपर उक्त रूप बनता है । मनुष्य द्यस्थानी नहीं, किन्तु पृथिवीलोक निवासी हैं । द्युलोक तथा पृथिवीलोक भिन्न - भिन्न होते हैं ( ऋ. १०।१६०1३ ) । तब देवता तथा मनुष्य भिन्न - भिन्न योनि सिद्ध हुए । जैसा कि शतपथमें कहा है— ' देवयोनिरन्यो मनुष्ययोनिरन्त्यः ' ( ७ । ४ । २ । ४० ) । ' जब ऐसा है; तब स्पष्ट है कि - ब्राह्मण जोकि मनुष्य हैं; उनको ' देव ' कहना वाचकलुप्ता - उपमा वा प्रशंसासे है, वास्तविकतासे नहीं । ' मनुष्येषु ' देवा इव ' यह यहाँ वाचकलुप्ता - उपमा है । प्रथवा ' प्रधानशब्देन अनुपपत्तेः, गुणशब्देन अनुवादः, निन्दा - प्रशंसापपत्तेः ' ( न्यायदर्शन ४ | १ | ६० ) इस प्रकार प्रशंसार्थक अनुवादरूप श्रथंवाद है । वादीके अनुसार तो ' मनुष्यदेव ' तथा ' अनृतदेव ' ( ऋ. ७ १०४ १४ ) अर्थ तो ' झूठ तथा सत्य बोलनेवाला ' होगा; क्योंकि - वादी ' सत्यसंहिता वै देवा धनृतं मनुष्याः ' का यही अर्थ मानता है? तो जब ब्राह्मण ' मनुष्यदेव ' हुए; तो वे सत्य वा असत्य दोनों बोलनेवाले हुए | क्योंकि वादी ' असत्य बोलनेवाले ' को अपने दिये हुए ऐतरेयब्रा. के वचनानुसार ' मनुष्य ' मानते हैं । तब वादीके अनुसार सच - झूठ दोनों बोलनेवाले ' मनुष्यदेव ' ब्राह्मण ' केवल देवता ' सिद्ध नहीं हो सके । तब वादीका पक्ष गिर गया । ' जादू वह जो सिरपर चढ़कर देवों और भूदेवोंका अन्तर [ ७८६ बोले ' | मनुष्यों में उच्च ब्राह्मण भी जब देवता न हुए, तब तो वह पत्नी वैश्य तो देवता वन ही न सकेंगे । तब वादीके द्वारा ही विद्वान् क्षत्रिय, वाचक म सिद्ध हो गया । इससे भिन्न वादीपर ' निग्रहस्थान ' अन्य क्या हमारा हो पक्ष ? भी प्रसन्न वा यहाँ वादीने ' वेदोंके जाननेवाले ब्राह्मण ' यह शब्द फिर वे सि जाननेवाले ब्राह्मण ' भी स्वीकृत करके वर्णव्यवस्था जन्मसे कहकर ' वेदोंके न मनुष्य नहीं तो ‘ शुश्रुवांसोऽनूचाना: ' यह ब्राह्मणके विशेषण व्यर्थं होते मान । क्योंकि- लो है; महा विशेषणकी सार्थकता व्यभिचारमें ही होती है । ' सम्भवव्यभिचाराभ्यां करने के लि स्याद् विशेषणमर्थंवत् ' । श्रव्यभिचारमें कभी विशेषण हुना ही नहीं छोडकर करता । तव वादीका पक्ष वादीके माने हुए ही प्रमाणसे कट गया । संस्कार वि नक्षत्रों के उसी स्थलपर जिसे बादीने छिपा लिया है- लिखा है - ' प ' हुति ड श्राहुतय एव देवानाम्, दक्षिणा मनुष्यदेवानाम्... ते एनमुभये देवाः प्रीताः यदि को स्वर्गलोकमभिवहन्ति ' ( शत. ४ । ३ । ४१४ ) यहाँ देवताओं तथा मनुष्योंरें । स्पष्ट भेद कहा है । यदि ब्राह्मण वास्तविक देवता होते; तो ग्राहृति इसी अग्नि में डालनेसे ही वे तृप्त हो जाते; वहांपर भेदग्राहक ' उभये ' शब्द न वंश्वदेव होता । पर वैसा न कहकर वहाँ उनकी दक्षिणासे ही प्रसन्नता बताई है; दिशाओं में तब उनमें तिल - तालकी तरह भेद सिद्ध हो गया । जसले वा वृप्ति वा इसी तरह ब्राह्मणके पर्यायवाचक ' भूदेव, महीसुर ' शब्दमें भी समझ तत्तद् - दिश लेना चाहिए कि वास्तव में ' द्य स्थानो भवति देवः ' ( निरुक्त ७ | १५ | १ ) बादि - महा तथा ' दिवि देवाः ' ( श्रथर्ववेद ११।७।२३ ) के अनुसार देवता च स्थानी पुराणेतिह होते हैं । द्युलोक, अन्तरिक्ष, और पृथिवीलोक ' वेदानुसार भिन्न - भिन्न स्वीकृत न लोक होते हैं । जैसे कि - ' दिवे स्वाहा, पृथिव्यै स्वाहा, अन्तरिक्षाय स्वाहा ' शेष ( अथर्व ५६१-२-३, ४-५-६ ) दीप्यमाना' ब्राह्मण ' भूदेव ' हैं, ' भुवि देवा इव ' । ' भू ' शब्द होनेसे उनको ही बता च वास्तविक - देवोंसे पृथक् कर दिया गया । श्रव वादीके अनुसार ' इमं यज्ञ ' लजावे;

पृष्ठ 425

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 425 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ७८१ νIο 1 यावन्तो देवा: ' इस मन्त्र में भी ' देव ' शब्द ' ब्राह्मण'-रह पत्नीभिरेत्य जावे, तो क्या वादी अग्नि में श्राहुतियोंसे ब्राह्मण - दम्पतिको न - क्षत्रिय, बाचक माना कर लेगा? फिर वादी उनको दक्षिणा तो नहीं पक्ष भी प्रसन्न वा तृप्त ? वे अन्य भोजन तो नहीं करेंगे? दक्षिणा फिर सिद्ध हो जायेंगे, देवता नहीं । ' वेदक न मनुष्य ली है; महाशय, आप कृत्रिमताको छोड़िये क्योंकि- करनेकेलिए आपको सैकड़ों असत्य बोलने नचाराभ्यां छोडकर प्रसत्य के गर्त में क्यों गिरना चाहते हैं देगा? आदि देनेसे वे शतपथानुसार । एक असत्यको सत्य सिद्ध पड़े गे । आप लोग सत्यको ? आपके स्वा.द.जीने अपनी ही नहीं संस्कारविधि ' नामकरणमें जो तिथियोंके देवता ब्रह्मा त्वष्टा आदि, तथा या । नक्षत्रोंके देवता अश्वी यम आदि बताकर उन - उनके नामसे अग्निमें है – ' यज्ञे द्राट्ठति डालकर ' देवपूजा ' मानी है । तब क्या यम, ब्रह्मा, विष्णु, वरुण वाः प्रीताः पादि कोई विद्वान् मनुष्य हैं? मनुष्योंनें ' इसी प्रकार ' सानुगाय इन्द्राय नमः, यमाय नमः, वरुणाय नमः ' प्रादि तो ग्राहृति वंश्वदेव - चलिमें अनुगों सहित देवताओंके लिए एक - एक ग्रास भिन्न - भिन्न शब्द न बताई है; दिशा में रखवाया है; तब क्या यह सब विद्वान् मनुष्य हैं? क्या एक जससे वा उसकी भी अग्नि में आहुति डालनेसे इन विद्वान् मनुष्योंकी वृप्ति वा पूजा हो जाती है? क्या आप लोग उन विद्वान् मन्ष्योंका भी जमक तत्तद् - दिशा से उस उस तिथि वा नक्षत्र से सम्बन्ध सिद्ध कर सकते हैं? - ७। १५१ ) वादि - महाशय! निराधार कल्पनाओं को छोड़ो । वादियोंको वेदसे लेकर - स्वानी पुराणेतिहास तकका कोई ग्रन्थ न मिलेगा, जिसमें परोक्ष - देवयोनिको भिन्न - भिन स्वीकृत न किया गया हो? स्वाहा ' शेष जो महीधर, सायण प्रादिने कहीं - कहीं ' देवाः ' का अर्थ क्षेप्यमाना ऋत्विजः ' आदि अर्थ किया है; तो उसका कारण हम पहले से उनको है बता चुके हैं कि जहाँ रूढ भी शब्द किसी यजमान आदिकाविशेषण इमं यज्ञ ल जावे; तो वहाँ वह यौगिकरूपसे प्रयुक्त हो जाता है । जैसाकि -देवों और मनुष्यों में अन्तर [ vê? ' धर्मदेव ' रूढ शब्द है, यदि यह स्वाद का विशेषण हो जावे यौगिक हो जावेगा । इसीलिए श्रीमायणको, तब यह एक स्थान लिखना पड़ा कि -' स्वरानुसारेण रूढि त्यागेनापि च ' देव ' शब्दस्य गोस्वीकारी युक्त एवं ' इसीलिए वैसे स्थलपर ' देवा ' का ' दीव्यन्ति ' इस प्रकार यौगिकता में ' रश्मि ' श्रादि श्रयं भी करना पड़ जाता है । पर उक्त विशेष्य - स्थल के अतिरिक्त अन्यत्र सायण वा महीधरादि मनुष्ययोनिसे भिन्न देवयोनिको देव नहीं मानते? यदि वादी ऐसा करनेका साहस करेगा; तो मुंहके वल गिरेगा; तब पुराण - इतिहास से लेकर वेद तकके समूचे साहित्यते देवयोनिको उडानेका प्रयत्न सर्वथा असम्भव हो जायगा । ' सत्यसंहिता वै देवा अनृतं मनुष्याः ( ऐ.बा. ) जो कि देवों और मनुष्योंका यह भेद वादीने बताया है; इनमें ' वै ' का प्रयोग निश्चयार्थ में भले ही हो; पर ' व ' के प्रयोगसे पर्यायवाचकता नहीं हो जाती । क्या ' प्रायुर्वे घृतम् ' ( कृ.य. तैसं. २।३।२।२ ) में ' व ' देखकर वादी प्रायु और घृतको पर्यायवाचक मान लेगा? ' अयं वै वादी स्वा. दयानन्दः इस वाक्यमें वादी अपनेको क्या स्वा.द.का पर्यायवाचक मान लेगा? ' मध्य-संहिता ' का भाव यह है कि देवता लोग निश्चयसे मत्यसे मिले होते हैं, पर यह अर्थ नहीं कि जो सत्य बोले, वही देवता हो जावे? यहाँ वादीका पक्ष जहाँ असत्य है, वहां अत्यन्त निर्वल भी है । यदि सत्य बोलनेसे ' देव ' होता है, ता ' अस्वतन्त्रा स्त्री अनृतमिति विज्ञायते ' ( वसिष्ठस्मृ. ५1१ ) ' श्रनृतं साहसं माया स्त्रीणां दोषा: -स्वभावजा: ' ( वादी के स्वामीजीकी मान्य चाणक्यनीति २1१ ) में ' असत्य-वचना नार्यः ' ( महा. प्रादि ७४।७४ ) इस प्रकार स्त्रियोंके अनृत-प्रकृतिकत्व होनेसे कोई भी स्त्री वादीके अनुसार देवता न बन सकेगी । सत्य बोलनेवाले भी महाराज हरिश्चन्द्र आदि कहीं भी देवता नहीं माने गये । वादी युधिष्ठिरको ' देवता ' मानता है - या मनुष्य? या दोनोंका सङ्कर? अन्यतर बातमें प्रमाण बतावे? ऋ. ७।१०४।१४ में

पृष्ठ 426

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 426 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' अनृतदेव ' शब्द भी भाता है, जिससे वादीका पक्ष कट जाता है । क्या वादी ' तुरीयस्ते मनुष्यजा: ' ( ऋ. १० / ८५।४० ) इस वधू कहे जानेवाले वरके मन्त्रका यह अर्थ करेगा कि पहले तो तेरे तीन विद्वान् तथा सत्यवक्ता पति हैं, चौथा तेरा अबका पति ' मनुष्यजा: ' झूटेका लड़का है? वा स्वाद के अनुसार यह बहुवचन है; तो क्या यह अर्थ होगा कि तेरे चौथेसे लेकर ग्यारह तक पति झूठोंके लड़के हैं? द वादी ऐसा श्रर्थं नहीं करता; तब उसका पक्ष कट गया । जोकि वादीने ' ओमासः ' मन्त्रका उद्धरण दिया है कि ' स्वरानुसारेण च रूड़ित्यागेनापि ' देव ' शब्दस्य योगस्वीकारो युक्त एव ' इससे वादी ' देव ' शब्दका रूटि अर्थ छोड़कर उसे यौगिक स्वीकृत करना बताता है, इसपर यथार्थता यह है कि अपनी गुरुपरम्परावश आई हुई दुष्प्रकृति आप लोगोंमें विद्यमान है । आप लोग पूर्वोत्तर - ग्रंश छिपाकर बीचका अंश दे देते हैं; इससे अर्थका अनर्थ हो जाता हैं; और साधारण लोगोंको भ्रम पड़ जाता है । यहाँ श्रीसायणका अपेक्षित अंश उद्धृत किया जा रहा है । वादी देखे— ' हे विश्वे देवासः, एतन्नामका देवविशेषाः!... ' अश्विनौ इत्यादिषु एकत्रिंशत्संख्याकेषु देवविशेषनामसु दिश्वे देवाः, साध्या इति पठितम् ।... ग्रत्र विश्व - शब्द: सर्व - पर्याय इति यास्कस्य मतम् । देवविशेषस्यैव लिङ्गम् इति शाकपूणेमंतम् ' ( १/३/७ ) यहाँपर श्रीसायणाचार्यने स्पष्टतया देवयोनि ही अर्थ किया है, वादीको भाँति ' विद्वान् ' अथ नहीं किया । आगे श्रीसायण लिखते हैं- ' विश्वे इत्यस्य विशेषणं देवास इति । दीव्यन्तीति देवा: प्रकाशवन्तः । विश्वे देवास इति ' । यही वही हमारी कही हुई बात श्रीसायणने भी कही है कि- ' देव ' शब्द यहां ' विश्वे ' का विशेषण है; श्रतः योगिक है, इसलिए ' प्रकाशवन्तः ' अर्थ है । स्वर भी विशेषणका है । श्रीसायण के वाक्यका प्राशय [ ७१३ तब यहाँ श्रीसायण पूवपक्ष करते हैं- ' ननु अवयव प्रसिद्ध: ७६४ प्रसिद्धिर्बलीयसी, इति रूढ्यर्थो देवशब्दस्य ग्राह्यः प्रश्न विल्कुल ठीक है कि यौगिक अर्थसे अर्थ तब ' देव ' शब्दका रूढ ही अर्थ किया जाना चाहिये, जाता है? ' योगिकत्वे हि श्रवयवार्थानुसन्धान व्यवधानेन समुदाय-न यौगिक किया । यह बलवान होता है; श्री अर्थ यौगिक क्यों किया या तब ' देव प्रतिपत्तिव्यंवहिता स्यात् । समुदाय प्रसिद्ध तु न विक्षेप इति ' ( यह मो ठीक है । क्योंकि देव ' ' श यौगिक अर्थ होनेसे अर्थकी कोई सीमा न होनेसे अर्थका ठीक ज्ञान ही है, और रात न नहीं होता । अब इसपर श्रीसायण उत्तरपक्ष देते हैं - ) इति चेन्न समुदायप्रसिद्धौ हि देवशब्दस्य सामान्यपरतया विशेषवचनत्वाभावाद् ही अर्थ " विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम् ' ( पा. ८।१।७४ ) इत्यनेन प्रतिषिद्ध- बादी के त्वाद् विश्वे इत्यस्य अविद्यमानवत्त्वेन ' शुभस्पती ' इति पदवद् देवास बाद इत्यस्य श्रद्यदात्तत्वं स्यात् । स्वरानुसारेण रूढित्यागेनापि ' देव ' शब्दस्य विशेष्य योगस्वीकारो युक्त एव ' ( १।३।७ ) वो सायण बात साफ हो गई । वादीने इसका पाठ भी किया । इसे अपनी नहीं होग ' नोटबुक ' में नोट भी किया, पर ग्राश्चर्य है कि - इसके समझनेकी चेष्टा विशेषण । नहीं की । श्रीसायणका तात्पर्य यह है कि - ' विश्वे ' शब्द ही यहाँ देव- पर्व नह बाचक है, क्योंकि श्रीशाकपूणिके अनुसार देवविशेषका लिङ्ग होनेसे किया है संज्ञाशब्द है; अतः विशेष्य है, यहाँ ' देवा ' शब्द उसका विशेष्य नहीं, है तब कि इसमें किन्तु उसका ' विशेषण ' है! स्वर भी वैसा है । इसलिए व्याकरणानुसार ढो हम भ स्वरके कारण विशेषण होनेसे ' देव ' शब्दका यहाँ ' यौगिक ' प्रथं करना चाहिये, विश्वेका रूढ देवविशेष अर्थ करना युक्त है । यह यहाँ श्री- ' पर सायणका आशय है । विधेय - वि श्रीसायण ने केवल यहाँ, न कि सर्वत्र नैरुक्त विशिष्ट विद्वान् स्वा.द.को श्रीशाकपूणिके अनुसार स्वर ले लिया । उसके कारण ही ' देव ' शब्दका सिद्ध होन यौगिक - अर्थं किया । सब जगहकेलिए उसने वैसा सिद्धान्त नहीं प्रदर्शित खा रहे ॠ.

पृष्ठ 427

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 427 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७१३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७ ९ ४ ] दाय- । वादीने श्रीसायणके उद्धरणका अर्थ करते हुए ' स्वरानुसारेण ' यह किया छिपा लिया, जैसेकि उसकी सदाकी दुष्प्रकृति रही है । का भी अर्थ किया यदि श्रीसायणाचार्य श्रीयास्कके अनुसार ' विश्वे ' का अर्थ ' सर्व ' करते; ' देवा: ' के विशेष्य होनेसे उसे रूढ बनाना पड़ता । तव श्रीसायणाचार्य वहिता ' ' तब देव ' शब्दका यौगिक अर्थ न करते । क्योंकि- विशेषण सदा यौगिक होता. योंकि है मौर विशेष्य रूढ या योगरूढ होता है । अन्य सहस्रों स्थलोंमें स्वरकी नही ज्ञात, न होनेसे श्रीसायणचार्यने ' देव ' शब्दका प्रकरणानुसार रूढ वा योगरूढ न- ही श्रबं किया है? तब यहाँ विशेषणता स्थल में यौगिक - अर्थं करनेसे भावादु वादीके पक्षकी श्रीसायणाचार्य - द्वारा कभी सिद्धि हो ही नहीं सकती । पिद्ध देवाल वादीको यह कई बार बताया जा चुका है कि - जहाँ ' देव ' शब्द विशेष्य हो, वहां तो उसका रूढार्थ देवयोनिका होगा । जैसाकि —--उब्दस्य श्रीसायणादिने स्थान - स्थानपर किया ही है । वहां यौगिक अर्थं कभी अपनी नहीं होगा, किन्तु सदा रूढ वा योगरूढ ही प्रथं होगा । पर जब वह चेष्टा विशेषण हो जाय, वा स्वरविशेषवश विशेषण हो जाय; तो उसका रूढ देव- यं न होकर केवल यौगिक ही अर्थ होगा । यहां श्रीसायणाचार्यने स्पष्ट होनेसे किया है कि स्वरके अनुसार ' देव ' शब्द ' विश्वे देवा: ' में ' विधेय ' विशेषण नहीं, है; तब विशेषणता में यौगिकता स्वाभाविक ही होती है । अव वादी बतावे कि इसमें हमारे पक्षकी क्या क्षति है? विशेषणता में यौगिकता होना अनुसार हम भी यत्र - तत्र बता ही चुके हैं । करना ' परमात्मा स्वामी दयानन्दोस्ति ' इस वाक्यमें ' दयानन्द ' परमात्माका विधेय - विशेषण है; तब यहां वादीके रूढि वा भारतधर्ममहामण्डलके रूढ विद्वान् वा. द. को नहीं लिया जावेगा । प्रकृत - स्थल में ' विश्वे ' शब्दसे देव विशेष | सिद्ध होनेपर ' देव ' शब्दका श्रीसायणाचार्य ' प्रकाशमान ' यह यौगिक अर्थं दर्शित सा रहे हैं । ऋ. १०।१५६।४ में श्रीसायणने ' यद्वा हे यष्टव्या देवाः ' यह देव-स्त्रियोंका वेदाधिकार नहीं [ ७६५ योनिका अर्थ माना ही है, जिसे वादीने प्रपनी सदाकी ' दुष्प्रकृति ' - वश छिपा दिया है । हां, ऋत्विगादिकी विशेषणताकी विवक्षा में श्रीसायणाचार्य भले ही ' देव ' शब्दका ' योगिक ' प्रथं कर डालें, इससे हमारे पक्षकी थोड़ी - सी भी क्षति नहीं: देवयोनि वेदसे सिद्ध ही है । श्रीसायण वादियोंकी तरह ' देव ' शब्दकी विशेष्यतामें कहीं ' विद्वान् ' श्रथं नहीं किया । तव वादीके पक्षका मूल ही उन्मूलित हो गया । अब पहले के प्रकरणपर चलिये । पृ. २०८ भविष्यपुराणका वचन वादी देता है- ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये शुचयोऽमलाः । तेषां मन्त्राः प्रदेया वं न तु संक्रीगंधर्मिणाम् ' ( उत्तरपर्व ४।१३।६२-६३ ) यहाँ पौराणिक मन्त्र बताये गये हैं । देखो पृ. २०-२१० में । वहीं भविष्यपुराणके पौराणिक मन्त्र भी हमने दिखलाये हैं । यह है इस वादीका जनवञ्चन । पूर्वापर छिपाकर यह लोगोंको धोखा देता है । तब ' सा च मन्त्रान् प्रगृह्णातु स भर्त्री तदनुज्ञया ' इस ६३ पद्यका समाधान भी गया । पुराणके पद्योंको स्त्रीको पढ़ाकर यदि वादी उन्हें वेदके कह देता है; तव उसका पक्ष अवश्य सिद्ध हो गया । तब अब वह पुराणोंको भी वेद मान ले, हम पौराणिक मन्त्रोंका निषेध कभी सिद्धान्तित नहीं करते । पृ. २०६ स्त्रियोंका वादीं अग्निपुराणसे परिव्रजन ( संन्यास ) बताता हैं । इससे उसकी कुछ भी पक्षसिद्धि नहीं । संन्यासियोंको तो यज्ञोपवीत-का भी जलमें प्रवाह कर देना पड़ता है । शिखाका भी मुण्डन करना पड़ता है । तब क्या वादीकी कुमारियाँ शिरोमुण्डन कराकर संन्यासिनियों बनेंगी? आगे ' स्त्रियोपि विद्याध्ययनाध्यापनाधिकारिण्यो भवन्ति यह वादीने लिखा है- यह कोई वहाँ प्रमाण नहीं है । यह तो काशीशेष-0 वेङ्कटाचल शास्त्रीने ' लघुत्रिमुनिकल्पतरुमें ' पूर्वपक्षका शीर्षक दिया है । उसीने वहाँपर उत्तरपक्षमें वह पद्य दिया है— ' अश्मारोहणमारम्य स्त्रीणां

पृष्ठ 428

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 428 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) गौर्यर्चनं परम् । पुराण- पठनं श्रेयो न वेदाध्ययनादिक म ' इससे क्षेत्रयोंको वहाँ वेदाध्ययनका निषेध किया है । देखो उसका पृ. ( १४ ) । पृ. २१० श्रीमित्र मिश्र के ' श्रत एव संन्यास - ब्रह्मजिज्ञासादिकमपि उपनीतानामेव स्त्रीणां घटते ' इस वाक्यका हम पूर्व उत्तर दे चुके हैं कि-संन्यासियों का तो उपवीत नहीं होता, शिखा भी नहीं । उनको मुण्डित होकर रहना पड़ता है । तब क्या वादी श्रार्यसमाजिन स्त्रियोंका रुण्ड-मुण्ह करावेगा? पृ. २१० २११ आगे वादी ' अर्यमणं नु देवं कन्या अग्निमयक्षत ' साममन्त्र ब्राह्मण १-३ से कन्यानोंका अग्निहोत्र बताता | वादीको जानना चाहिये कि यह वादीके अनुसार वेदका मन्त्र नहीं है । प्रग्नि भी स्मार्त है, श्रौत नहीं । श्रतः इससे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । ' स्वयं सा मित्र वनुते जनेचित् ' ( ऋ. १०।२७।१२ ) यहाँ भी वादी यदि स्वयंवर मानता है; तो श्रीसायणने वहाँ लिखा ही है- दौपदी-दमयन्ती आदि क्षत्रियाओं का यह बताया है, सर्व साधारणका नहीं । यदि वह अपनी लड़कियोंका स्वयंवर ठीक नहीं मानता, तो ' इन्द्र े मित्र ' ( ११६४१४६ ) इस मन्त्र के अनुसार इन्द्र तथा मित्र ( सूर्य ) देवता यहाँ इष्ट हैं । इससे वादीकी कुछ भी पक्षसिद्धि नहीं । देवी - देवताओंकी पूजा वैदिक है और वह वेदसम्मत है । इसपर ' आलोक ' ( ११ ) पृ.२८८-३०७ में अथवा ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ५६६-६०३ में देखो । जो कि वादीने पृ. २११ में लिखा है- ' वेदाध्ययनादि धार्मिक और यज्ञादि सामाजिक अधिकारोंसे स्त्रियोंको वञ्चित करके उन्हें पर्दे में बन्द कर दिया गया; और वे वेचारी स्त्रियाँ पुराणोंकी प्रसङ्गत कथाओंको सुनने और सहस्रों देवी - देवताओं की पूजा में दिन व्यतीत करने लगीं, यह देवनिन्दक वादी ऐसा कहता हुआ वेदानभिज्ञ मालूम पड़ता है । वेदमें स्पष्ट लिखा है- ' उत त्वा स्त्री शशीयसी - पुसो भवति वस्यसी । प्रदेव-देवयोनि के विषय में दयानन्दीका मत [ ७ ९ ७ 1 बाद् अराधसः '... देवत्रा कृणुते मनः ' ( ऋ. ५।६२।६-७ ) ( उस देवनिन्दक 25 वादी जैसे पुरुषसे देवताओं में मन लगानेवाली स्त्री बहुत अच्छी पृ. देवताओं में श्रद्धा रखनेवालोंसे वेद बहुत प्रसन्न रहता है घोर है ) । ४३७; " यः श्रद्दधाति ' सन्ति देवा इति ' चतुष्पदे द्विपदेऽस्य मृड ', ( प्रथ कहता है- वाहते . १११२/२८ ) कर्या इस मन्त्रका प्रर्थं आर्यसमाजी श्रीराजाराम शास्त्री लिखते हैं-- ' जो जो अ विश्वास रखता है कि- देवता हैं, इसके दौपाये और चौपायेकेलिए दे तो ऐसे दयावान् हो । इस देवनिन्दक वादीने अपने आत्माका हनन करके देव- दिवाले की पूजाको उडाया है, इससे उसको अपगति प्राप्त होगी । देवी - द आर्यसमाजी श्रीगङ्गाप्रसादजी एम. ए. कार्यंनिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जैविक अर ( टिहरी ) ने ' वैदिकधर्म ' ( श्रप्र ेल १ ९ ५० ) में ' क्या मनुष्यसे उच्च इरानन्दियों श्रेणी की देवयोनियोंका मानना श्रार्यसमाजके सिद्धान्तसे विरुद्ध है? ' हो जावेगा; इस लेखमें ठीक ही लिखा था कि - ' वेदमन्त्रों में केवल मनुष्यों में ही देव- १३ पुप्प शब्दका प्रयोग सीमित रखकर थोर मनुष्येतर कोई देवयोनि देव पितर, ३ श ३ ) व गन्धर्व आदि न मानकर अर्थ करनेमें बहुधा कठिनाई पड़ती है । चुरता स्वा इस प्रकार उन्होंने ' सार्वदेशिक ' ( सित. अक्टू. १ ९ ४ ९ ) में पितृ- यौगिक विषयक लेख लिखकर सिद्ध किया था कि - मृत्यु के पश्चात् जीवका जन्म ॥ रूढिमें एकदम नहीं हो जाता, उस समय तक जीव, परलोक और लोकान्तरोंमें पृ. २१ [ देवादि - योनियों में ] रहकर फिर इस मनुष्यलोक में प्राता है । ' सरस्वती उसमें न यह लेख श्रीन्यायाधीशजीका प्रायः ठीक था । यदि वेदमें पितृ - मने कुछ भी देवयोनि वास्तविक विषय मान लिये जावें; तो शास्त्रों में वादी जैसे पके काम में लोगों द्वारा पूर्वापरको छिपाकर जो प्रक्षिप्तता के अडङ्ग लगाये जाते हैं, की पराज वे बहुत कुछ दूर हो जावें । मन्त्रों ग्रादिके अर्थों में जो श्राजकल खींचा- नेवादी तानी की जाती है, वह भी दूर हो जावे । फिर सनातनधर्म और धार्य-समाजमें जो चौड़ी खाई दीखती है, उसका भी अन्त हो जावे | -भारती पृ. २१४ दो इस विषय में हमने ' आलोक ' के ४ थं पुष्पमें ४०५ पृ. से १ मास

पृष्ठ 429

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 429 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) 65 1 निन्दक तक स्पष्ट किया है । पर वादी जसे कट्टर दयानन्दी नहीं है ) । / ४३७ पृ. वे असत्य - व्यवहारमें लगे हुए दयानन्दी रेतीली दीवारके ता है वाहते; श्रतः खड़ा करनेमें ही अपना अस्तित्व मानते हैं । कथञ्चित् २८ ) पद्य पुराणोंमें वादी अपनी खराव दृष्टिवश - ' जो जो प्रसङ्गत कहता है; के लिए तो ऐसे हैं; जैसे कि कई लाख गेहूं के दामों में १०० दानें किसी विकृत-देव दिवालेकी दृष्टि में खराब हों, उनका ढूंढना भी कठिन हो जावे । देवी - देवताओं की तो वेद में भी कई सहस्र संख्या मिलती है । उनका याधीश वैगिक अर्य करके परमात्मा अर्थ करते जानो; तव तो कई लाख सानन्दियोंके भी यौगिक अर्थ करते जाओ; तव एक परमात्मा श्रथं उच्च है? " वावेगा; तब उन सब व्यक्तियोंकी सत्ता भी मत मानो - इस विषय में ही देव ॥ पुष्प पृ. २८८-३०७ में देखो । ' देवानां नामधा एव एवं ' ( १० ) पितर, २०१३ ) वह परमात्मा देवताओंके नाम वाला है; इससे देवताओंकी सुरता स्वाभाविक सिद्ध हुई । वेदमें केवल यौगिकता नहीं; किन्तु उसमें यौगिक, रूढ, यौगिक, यौगिक रूढ – यह चार प्रकारके शब्द पितृ- ॥ रूढिमें भी तो धातु होती ही है । जन्म न्तिरों में पृ. २१२ आगे वादी ' भारती ' का उदाहरण देता है, वह तो -लती देवताका अवतार थी - इस विषयमें पृ. ४१४-४१६ में देखो । उसमें नवीनता क्या रही? शेष रही शास्त्रार्थ की मध्यस्थता; सो में पितृले कुछ भी मध्यस्थता नहीं की । वह तो दोनोंको माला पहराकर -जैसे के काम में लग गई, और कह गई कि जिसकी माला म्लान हो जाय-जाते हैं अंगे पराजय समझ लेनी होगी । इस विषय में पू. २२७-२३३ देखो । खींचा- कवादी पिस गया, उसकी हड्डी पसली तक साबित नहीं बची । रा-१. २१४ आगे वादी लोगोंकी प्रांखों में धूल झोंकता हुआ कहता है से -भारती देवीने एक विशेष - शास्त्रविषयक ऐसे प्रश्न कर डाले कि-ई १ मासका अवकाश उत्तर देनेकेलिए मांगना पड़ा, कोई विशेष-' भारती ' की चालाकी [ ७६ शास्त्रका प्रश्न भारतीने नहीं किया, किन्तु कामशास्त्रका संन्यासी के प्रागे कर डाला । वह जानती थी कि - शंकराचार्य प्रश्न एक हैं; इधर संन्यासी हैं; अतः कामशास्त्र सम्बन्धी वालब्रह्मचारी इस विषयपर वादी प्रश्न उनपर कर दिया । उसने लोकदृष्टिसे श्रीमतृशङ्कर -दिग्विजय के एक - दो पद्य देखे, जिन्हें छिपाकर जनवञ्चन किया है । वह यह हैं-' अथ शारदा कृतकवाक् प्रमुखेष्वखिलेषु तमजय्यमात्मनि शास्त्रनिचयेषु परम् । विचिन्त्य मुनि पुनरप्यभिदधे तरसा ' ( ६६ ) ( भारतीने सोचा कि प्राचार्य शङ्कर बहुत बड़े विद्वान् हैं, मैं इनको कभी जीत नहीं सकती । ) ' अतिबाल्य एव कृतसंन्यसनो नियमैः परैरविधुरश्च सदा । मदनागमेष्वकृत बुद्धिरसौ तदनेन सम्प्रति जयेयमहम् ' ( ११६७ ) ( प्राचार्य शङ्करने वाल्यावस्थामें संन्यास ले लिया था; दूसरे नियम भी पूरे किये हुए हैं । इसलिए इनको कामशास्त्रका ज्ञान तो होगा नहीं, अतः कामदेव-सम्वन्धी प्रश्न पूछकर इन्हें जीतू । ) पाठकगणने देख लिया भारतीको तथा वादीकी चालाको । भारतीकी चालाकी ता स्पष्ट है ही । वादीकी चालाकी यह है कि उसने इन पद्योंको छिपा दिया । यह वादीके प्राचार्य थोड़े ये कि प्राचार्य शङ्करको कामके श्राकर्षण - विकर्षण श्रादिका ज्ञान होता; तत्र यदि इस विषय में उन्होंने मोहलत मांगी, इससे न प्राचार्य शङ्करका कुछ लाघव था, और न ही भारतीका कुछ गौरव था । वल्कि यहां तो यह समझना चाहिये कि-ऐसा करनेसे भारतीका लाघव था, और आचार्य शङ्करका पूरा महत्त्व था । S अब जोकि वादीने शास्त्रार्थमें भारतीको मध्यस्थता के लिए तथा शङ्कराचार्यको अवकाश मांगनेकेलिए भारतीका महत्त्व बताया है । इसपर वादीको याद रखना चाहिये कि वे जानते थे कि -भारती सरस्वती-

पृष्ठ 430

सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 430 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देवताका अवतार है । देखिये निम्न पद्यको जिसे वादीने लोकदृष्टिसे छिपाकर जनवञ्चन किया है - वह यह है - ' विधाय भार्या विदुषों सदस्यां विधीयतां वादकथा सुधीर! इत्थं सरस्वत्यवतारताशी तद्धर्मपत्या: तमभाषिषाताम् ' ( ८ ) ( ५१ ) वहीं कहा है कि दोनों जानते थे कि— भारती सरस्वती देवताका प्रवतार है; तभी यह प्रस्ताव रखा गया था । पर भारतीने मध्यस्थता कुछ नहीं की; वह तो दोनोंको माला पहराकर मालाको म्लानताको हो पराजयका चिन्ह बताकर घरके कामों में लग गई । देखिये इस विषयके एक पद्यको जिसे वादीने छिपाकर जनवञ्चन किया है । वह यह है-' एवं विजेतुमन सोरुपविष्टयोः तां माला गले न्यधित सोभयभारतीयम् ' ( ८६७ ) ' माला यदा मलिनभावमुपैति कण्ठे यस्यापि तस्य विजयेतर -निश्चय: ( पराजयः ) स्यात् । उक्त्वा गृहे गतवती गृहकर्मसक्ता ' ( ८६८ ) इसका भाव पहले बताया जा चुका है । अतः बादीका भारती मध्यस्थता के प्रश्नका भारतीका गौरव व्यर्थ हो गया । जोकि वादीने भारतीका ' सर्वाणि शास्त्राणि षडङ्ग - वेदान् काव्या-दिकान् वेत्ति परं च सर्वम् । तन्नास्ति नो वेत्ति यदव वाला । तस्माद् प्रभूच्चित्रपदं जनानाम् ' ( ३।१६ ) इस पद्यसे गौरव गाया है —३ य पद्यका अन्तिम दो पादोंका अर्थ वादीने छिपा दिया । इसका अर्थ है कि भारती जब वाला बच्ची थी; तो उसे सब शास्त्रोंका ज्ञान था; श्रतः लोग चकित हो रहे थे । तब क्या वादी बता सकता है कि -- बच्चीको सव शास्त्रों, सभी वेदवेदाङ्गों पाङ्ग, यादि वचपन में स्वत: कैसे आ गये; तभी तो लोग हैरान होते थे । स्पष्ट है कि भारती सरस्वती - देवताका अवतार थीं । थारूढपतित थी । विदुरनीतिके ' आत्मज्ञानं समारम्भ: ' इस पण्डितके लक्षणमें वादीने ' मक्खीको नलमल कर भैंसा ' बनानेकी चेष्टा की है; अतः उससे वादीकी विदुलाके विषयमें समाधान [ ८०१ इष्टसिद्धि नहीं । यह हम श्रीमध्वाचार्यके वचनों में २०२ प्रागे ' वेदके बिना श्रात्मज्ञान ' नहीं मिलता ' । यह स्पष्टता कर चुके है । व्यर्थ है । तो वादीका कपन a? टीका ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' में ' वेद ' के शब्द इष्ट नहीं बात की अर्थ इष्ट है । वह अर्थ ' अनादि प्रचलित सृष्ट्यादिजात; किन्तु उसका जाते स्त्री - शूद्रादिको मिल सकता है । द्रौपदीको ' सर्वधर्मविशेषज्ञा - पुराणोंसे भा विरुद्ध ' कहने से भी कुछ इष्टसिद्धि नहीं । पतिव्रता पति श्रादिसे सब धर्मविशेषोंका लेते ह ज्ञान प्राप्त कर सकती है । पृ. २०४ ' वेदा श्रप्युत्तम स्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिहा खिला: ' इस कथं मध्वाचार्य के प्रमाणका अकाट्य प्रत्युत्तर पृ. २४७-२५२ में दिया जा लिखा चुका है । स्वा. श्रानन्दतीर्थ ' स्त्रीभिर्वेदान् विना ' यह कहते हैं । पृ. २०४ ' क्षत्रवर्णरता दान्ता विदुला दीर्घदर्शिनी । विश्रुता राज १६ ) संसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता ' इस पद्यको देकर वादी क्या सिद्ध करना वादी गमिति चाहता है? जिस समयका यह वर्णन है, उस समय द्विजोंकी भाषा हो १७ संस्कृत थी । तब यदि विदुला संस्कृतभाषामें बोलती थी; तो इसमें चलग उसकी क्या विशेषता हुई? उसने पिता के पीछे आलसी बनकर बैठे हुए ह भ अपने क्षत्रियकुमारको अपना राज्यपद पानेकेलिए प्रोत्साहित किया था; इन्हीं बातोंके कारण वह राजसभानों में प्रसिद्ध हो गई थी - यह नहीं कि-होता वह राजसभाग्रोंमें लैक्चर करने जाती रहती थी । किसी राजाकी माता यदि लड़के पुत्रको इस त्रिषयकेलिए प्रेरित करती है; इसी बात से वह राजसभाग्र प्रवचन प्रसिद्ध हो गई हो; इसमें कुछ भी प्राश्चर्य नहीं । ' कथं नाम स्त्री सभायां इससे साध्वी स्यात् ' इस महाभाष्यकारके मतको वादीने शायद आक्षेप लिए ग्र उदधृत किया हो; तब क्या ऐसा लिखने वाले महाभाष्यकारको वादीके नेवा अनुसार कुछ भी ज्ञान न था? वे क्या वेद - वेदाङ्गोंको जाननेवाले नहीं सभाओ टिम स ० ध ० ५१