सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 431–440

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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[ ८०१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) = ०२ ] चुके हैं । दयानन्दीपना होता है, किसीके आगे चाहे वह कोई निकम्मा - सा का कचन? यह जरा कोई ऐसी बात लिख दे; जिससे कोई दयानन्दी-टीकाकार हो; मिलती हो । उसे तो अपनी प्रांखोंपर बिछानेको तैयार हो की झलक तु उसका हैं पर यदि कोई भारी भी वेदविद्वान् हो; जब दयानन्द - सिद्धान्तसे जाते; विरुद्ध लिख दे; तो उसे वेदानभिज्ञ तक कहकर उससे अपनी आँखें फेर कहने से भी लेते हैं । यह है इन दयानन्दियोंकी काली करतूत!!! विशेयोंका महाशय; समझ जानो- —यह जो महाभाष्यकारने लिखा है कि-कथं नाम स्त्री सभायां साध्वी स्यात् ' यह तो उन्होंने वेदानुकूल ही लाइस लिखा है । देखो प्रापकी प्यारी वृहदारण्यकोपनिषद्की श्रापको प्यारी दिया जा कण्डिका- ' अथ य इच्छेद दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( शत. १४ । ६ । ४ । १६ ) यह कण्डिका लड़कीकेलिए ब्राह्मणभागात्मक वेदने लिखी है । ता राज. मादी वहाँ लड़के के लिए कण्डिका देखे – ' पुत्रो में पण्डितो विजिगीयः, द्ध करना गमितिङ्गमः, भाषिता जायेत, सर्वान् वेदान् अनुबुवीत ' ( शन. १४ । ६ । भाषा ठो १७ ) यहां लड़के के लिए पण्डित होना अलग लिखा वेदों का पढ़ना तो इसमें लग लिखा है, समितिङ्गमः -सभा - सोसायटियों में जानेवाला अलग कहा बैठे हुए; भाषिता ( व्याख्याता ) अलग कहा है । कया था; अव वादी बोले कि - लड़की - लड़केको ' पण्डित ' जिसका अर्थ बुद्धिमान् नहीं कि होता है, कहा है - यह तो दोनोंके लिए धरावर हो । अव भेद देखिये माता यदि केके लिए एक वेद, फिर दो वेद, फिर तीन वेद, फिर सारे वेदका सभाग्रोंमें प्रवचन करनेवाला कहा है, लड़कीकेलिए वेदका एक अंश भी नहीं कहा; सभायां इससे सिद्ध हुप्रा कि - लड़की को वेद पढ़ाना वेदविरुद्ध है? पके लिए व आगे चलिये - लड़के केलिए समितिङ्गमः, भाषिता ( सभाओं में बांदीक उगनेवाला और व्याख्याता ) होना कहा है, लड़कीकेलिए ' समितिङ्गमा ' वाले नहीं नभाओंमें जानेवाली क्यों नहीं कहा? इसलिए ब्राह्मणभागात्मक वैदकी लड़कीका सभा - सोसायटियों में जाना - यह वेदविरुद्ध सिद्ध है; 15 यदि वेदविद्वान् महाभाष्यकारने ' कथं च स्त्री नाम सभायां साब्बी विदुलाके विषयमें ठोस समाधान [ ८०३ स्वात् '? यह लिखा है—- यह वेदानुकूल फथतियोंके कसने का अवकाश ही है, फिर उनमें वादीके द्वारा कहा है - लड़कियों क्या रहा? ' भापिता ' भी लड़के के लिए कैसे दिखलाता के लिए नहीं; तव विदुलाका वादी समानों में लैक्चर है? [ कम्पोजीटरने हमारी मूलप्रतिके कई कागजों का खो जाना किया था; हमने उसपर कुछ धीर लिख सूचित सामने नहीं था । यदि इससे डाला था । पिछला फर्मा उसका कहीं पुनरुक्ति प्रतीत हो रही हो; पाठक कारण समझ लें । परन्तु पूर्वकी अपेक्षा पुनरुक्तिमें भी कुछ विशेषता ही मिलेगी ] पाठकों को विदुलाके विषय में वादीने महाभारतसे उसका इतिहास और ' कथं नाम स्त्री सभायां साध्वी स्यात् ' इस भाष्यकार दिया । उसका विरोध दिखलाया के विधिशास्त्र से है, यह व्यर्थ है । इतिहास हज़ार भी हों, उन्हें एक भी विधिशास्त्र विध्वस्त कर दिया करता है । उसी महाभारतमें लिखा है— पहले स्त्रियां विवाह नहीं किया करती थीं; और नङ्गी रहती थीं । तब क्या वादी इसे वैध मान लेगा? केवल भाष्यकारने ही नहीं, बल्कि मन्त्रभागात्मक वेदने भी ' सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् ' ( यजुः २२।२२ ) यह कहकर पुरुषके लिए ' सभायां साधुः कहा है, स्त्रीकेलिए नहीं । ब्राह्मणभागात्मक वेदने भी ' समितिङ्गमः ' ( शत. १४१६४१७ ) पुत्र-वाले वाक्यमें उसका सभामें गमन प्रदिष्ट किया है, दुहितावाले वाक्य में ऐसा प्रदेश नहीं । सो जो अपवाद - इतिहास वेदविरुद्ध हो; और फिर धर्म--शास्त्र के अनुकूल भी न हो; वह उदाहर्तव्य नहीं होता । ' कथं हि स्त्री नाम सभायां साध्वी स्यात् ' इस महाभाष्यकारके विधिवाक्यपर छिपे छिपे आक्षेप करनेवाले, भाष्यकारको अपेक्षा अल्पश्रुत वादीने कभी सोचा है कि- महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलि केवल व्याकरण के

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८०४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ही शुष्क पण्डित नहीं थे; बल्कि वेद एवं धर्मशास्त्र तथा दर्शनादि सभी शास्त्रोंके वे प्रकाण्ड पण्डित थे । भाष्यकार स्त्रीका सभामें जाना धर्मसे विरुद्ध समझते थे । देखिये – वादिप्रतिवादिमान्य महाभारत में वादीके शब्दों में ' पण्डिता ' द्रौपदीने यह शब्द कहे थे । - ' न दृष्टपूर्वा वाऽन्यत्र साऽहमद्य सभाँ गता! ' ( ९ ६ / ६ ) ( मैं घर के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं देखी जाती थी; पर आज मुझे सभा में ले जाया गया है? ) ' किन्वतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेद्य दृश्यास्मि जन - संसदि ( सभापर्व ६६।६ ) ( इससे बढ़कर क्या दुःख होगा कि आज मैं सभामें दीख रही हूं ) । ' किन्वतः कृपणं भृयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेऽद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम्? ' ( ) ( यह कितनी बुरी बात है कि- मुझ सती - स्त्रीको सभामें लाया गया है! राजानोंका धर्म कहीं गया? ' धर्म्या स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति नः श्रुतम् । स नष्टः कौरवेयेषु पूर्वो धर्मः सनातनः ' ( १० ) ( धार्मिक स्त्रीको पूर्वके लोग सभी सभा में नहीं लाते थे । कौरवों में यह सनातनधर्मं कैसे नष्ट हो गया? इससे वादीका पक्ष कट गया । ) ' भर्त्रा परम - पूजिता ' का अर्थ ' तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादना-शनैः ' ( मनु. ३१५६ ) के अनुसार भूषणादि - दानसे उनका सम्मान आदिष्ट है; इसमें अन्य कुछ भी अभिप्राय नहीं होता; कि भर्ता उसके पैरों पड़ा करते थे । पृ. २०५ धांगे वादीकी प्रतारणनीति देखिये । वह लिखता है -' यहां ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा: ' इन वैदिक - प्रदेशोंका तात्पर्य है, जिनको जलपरक मानकर शास्त्रीजी भ्रम में पड़े हैं; जबकि वहाँ-जलके समान शान्तिशीला विदुषियोंके लिए हैं ' । हम इस मन्त्रके किये वादीके अर्थकी प्रयुक्तता विनियोग तथा देवता पार्वतीके जनेऊपर ऊहापोह श्रादिके अनुसार पृ. ७१६-२० में बता चुके हैं, जिसपर वादी हाथ - पैर नहीं मार सका है । जब उक्त मन्त्रमें वादीने ' जल ' का अर्थ भ्रान्त बताया उससे लज्जित न होते हुए उसने अर्थ बदलनेकी चेष्टा की । [ ८०५ २०६ ] कुछ भी महाराज फेर दी तब स्वयं दादीने महाशय; करतूत उक्त मन्त्र में जल विशेष्य है; तब उसे उपमान वना देना कितना गलत उपमान कभी विशेष्य नहीं होता; किन्तु विशेषण हुधा करता है है? । अब आश्चर्य तो यह है कि यह लोग कभी तो उदयनारायण सिंहकी टीका- ज्ञोपवी तकको वेदसे भी बढ़ा दिया करते हैं; और कभी वेदके मन शि अङ्ग - भङ्ग यज्ञो करनेपर भी नहीं चूकते । यही इनकी वेदभक्ति है । षह वैदिकता नहीं है, किन्तु स्पष्ट वेदको अपने गलत सिद्धान्तों के पीछे चलाना है । वाद वयुना, तथा धारिणी ब्रह्मवादिनियोंपर हम पूर्व बता चुके हैं । दृश्यते । भागवत, विष्णुपुराण, मार्कण्डेयपुराण में भी उन्हीं दोका नाम है; वादीने ( जहाँ उनकी संख्या बढ़ानेकेलिए उन दोको भिन्न - भिन्न गिन डाला है । वेदको वेदवतीपर भी हम पहले ( पृ. २३७-३८ ) लिख चुके हैं; वह बिना स्मृति की पढ़े ही जन्मते ही मन्त्र बोलने लग गई थी; वादी भी ऐसी वेदवतियोंको ४ ॥ पैदा करे । कन्या - गुरुकुलों पर व्यर्थका खवं न करे । कहा है-पार्वतीके जनेऊपर विचार | प्रसङ्गः ' । सिद्धता पार्वतीके यज्ञोपवीतपर भी हम पूर्व लिख चुके हैं । अब यहाँ कुछ विशेष लिखते हैं । वादीने यह श्लोक दिया है - ' ततः शैलवर: सोपि व्यवहारव प्रीत्या दुर्गोपवीतकम् । कारयामास सोत्साह वेदमन्त्रः शिवस्य च ' ( रुद्रसं. ' यज्ञ लोकव्यव पार्वतीखं. ४७।१ ) और उसने अर्थ भी एक टीकाकारका लिख डाला; ( शैलराजने वेदमन्त्रोंसे शंकर और पार्वतीका यज्ञोपवीत - संस्कार कराया ' ) ' ज्ञ ' ह, विषय है चूंकि इसमें वादीको कुछ अपने पक्षकी गन्ध आ गई, उ का विषय ' श्री १०८ ब्रह्मचारी इन्द्रजी महाराज ' यह शब्द लिख डाले । जब अपना ' तत्र पक्ष दीखे; तो अर्थ लिखनेवाले श्री १०८ भी बन जाते हैं; और इन्द्रियाद

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[ ८०५ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८०६ कुछ भी भी; यदि अपना पक्ष बिगड़ता दीखे; तो वेदमन्त्रपर भी छुरी महाराज ' जाती है; जैसे कि- ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमाः ' फेर दी चला दी थी । यह सभी दयानन्दियोंकी मन्त्रपर तब स्वयं वादी छु जन्मसिद्ध महाशय करतुत है । है? अब हम वादीके दिये प्रथपर ऊहापोह करते हैं । वह बतावे क्रि— करता है । जोपवीत ब्रह्मचर्याश्रम के प्रारम्भमें होता है; वा गृहस्थाश्रममें? उस टोका- नमन शिव तथा पार्वतीकी कितनी श्रायु थी? तव क्या वे इतनी श्रायु अङ्ग भङ्ग | तक यज्ञोपवीतसे हीन थे? उन्हें ' व्रात्य ' माना गया, या नहीं? कता नहीं बादीको याद रखना चाहिये कि - श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यंत्र चुके हैं । दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा ' ( व्यास. ११४ ) वादोने ( जहाँ वेद तथा धर्मशास्त्र एवं पुराणोंका परस्पर विरोध दीखे; वहाँ 1 वेदको ही प्रमाण मानो । जहाँ स्मृति तथा पुराण में विरोध दीखे; वहाँ स्मृतिकी बात माननी चाहिये, पुराणकी नहीं । ) वह विना वतियोंको ४।१।६२ न्यायसूत्रके भाष्यमें वादिप्रतिवादिमान्य श्रीवात्स्यायनमुनिने कहा है- ' अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य, प्राणभृतां व्यवहारलोपाद् लोकोच्छेद-प्रसङ्गः । ( धर्मशास्त्रकी इतनी प्रमाणता है कि उससे लोकव्यवहार की सिद्धता होती है । यदि धर्मशास्त्रको अप्रमाण माना जावे; तो प्राणियों के यहाँ कुछ रः सोपि व्यबहारके लोपवश लोकों का उच्छेद हो सकता है । ) ( रुद्र.सं. ' यज्ञो मन्त्र - ब्राह्मणस्य [ वेदस्य ]; लोकवृत्तम् इतिहासपुराणस्य, डाला; तोकव्यवहार व्यवस्थापनें धर्मशास्त्रस्य विषयः ' अर्थात् वेदका विषय कराया ) ' ज्ञ ' है, लोकवृत्त बताना कि किसने क्या किया, यह पुराण- इतिहासका जतः उसने विषय है; और लोक व्यवहार क्या होना चाहिये यह बताना धर्मशास्त्र-का विषय है । ) जब अपना हैं; और ' तत्र एकेन सर्वं न व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयम् एतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवत् ' ( एकसे सव व्यवस्थाएं नहीं हो सकतीं; अतः पुराण तथा पार्वतीके जनेऊपर विचार [ ८०७ धर्मशास्त्र अपने - अपने विषय में अधिक प्रमाण हैं । ) इससे स्पष्ट हुआ कि पौराणिक इतिहासमें जो इतिहास है; का लोकसे व्यवहर्तव्य नहीं होता । लोक व्यवहारकी व्यवस्था करना तो धर्मशास्त्र ( स्मृति ) का विषय होता है; तव वादीके इस पौराणिक इतिहासकी अनुकर्तव्यता नहीं हो जाती । ग्राप लोग कई पुराणोंम आक्षेप - स्थल दिखलाते रहते हैं; वे क्या अनुकर्तव्य हो जाते हैं? इसके अतिरिक्त वादीके दिये उक्त पद्यसे भी उसका अर्थ सिद्ध नही होता । क्योंकि- विवाह जो गृहाश्रमका एक ग्रङ्ग है; उसमें भला ब्रह्मचर्याश्रम के उपनयन संस्कारकी कर्तव्यता श्रा ही कैसे सकती है? क्या उनको उस समय व्रात्य नहीं मानोगे? व्रात्यके साथ भला मनुस्मृति से विरुद्ध योनि सम्बन्ध ही कैसे हो सकता है- ' नैतैरपूतैर्विधिवद् श्रापद्यपि हि कर्हिचिद् | ब्राह्मान् योनांश्च सम्वन्धान् नाचरेद् ब्राह्मणः सह ( मनु. २ ३६-४० ) जिनका ब्रह्मचर्याश्रममें जनेऊ नहीं होता; वे ब्रा होते हैं; उनसे ब्राह्म - सम्वन्ध तथा योनि - सम्बन्ध प्रापत्तिकाल में भी नही करना चाहिये । ) उस उपनयनमें मुण्डन भी होता है; तब क्या उस समय शिव एक पार्वतीका मुण्डन भी कराया गया? जब नहीं; तव स्पष्ट है कि-विवाह में यह शिव - पार्वतीका जनेऊ नहीं; किन्तु वास्तविकता यह है कि- हिमालयने शिवको ' दुर्गोपवीत ' नामक वैवाहिक वस्त्र पहराया । यहाँ पार्वतीको जनेऊ पहराया - पद्यमें कहीं लिखा भी नहीं है । पदोंकी विभक्त्यादिके अनुसार ही अर्थ - योजना हुआ करती है । अपनी इच्छानुसार नहीं । और यहां सबसे बड़ी बात है कि - शिव और पार्वतीका देवता होना । देवताओं में कई मनुष्य - व्यवहारसे विरुद्ध भी कर्म देखे जाते हैं; वे मनुष्योंसे अनुकर्तव्य नहीं हो जाते । स्वा.द.ने विवाह - संस्कार विधि में

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ] ८०८ लिखा है कि- वर वधूको उपवस्त्र दे; और वह वधू उसको जनेऊ की नरह लपेट ले । इसी प्रकार शैलने भी शिवको दुर्गोपवीत एक वस्त्र-विशेष दिया; और उन्होंने उसे उपवीतकी तरह लपेट लिया; यह नहीं कि उनका उपनयन ही न रहा हो; बह तो उनका ' प्रजापतेर्यंत् सहजं ' स्वाभाविक हुआ करता है; अतः इससे वादीका पक्ष छिन्न - भिन्न हो गया । पृ. २०८ आगे वादी पार्वतीदेवीका पुत्रका यज्ञोपवीतसं कराना दिखलाता है । ' ततो घृतस्नानं कृत्वा पुत्रस्य गिरिजा स्वयम् । त्रिरा-वृत्तोपवीतं च ग्रन्थिनैकेन संयुतम् । ( ४२ ) सुदर्शनाय पुत्राय ददौ प्रीत्या तदम्बिका । उद्दिश्य शिवगायत्री षोडशाक्षर - संयुताम् ' ( ४३ ) यह उसका पक्ष विरुद्ध है । उस अध्यायमें यह पद्य है ही नहीं; अभी विवाह हो रहा है, अभी पार्वतीका लड़का कैसे पैदा हो गया? अन्य यह बात है कि यज्ञोपवीतमें २४ अक्षरोंवाली ब्रह्मगायत्री श्री जाती है । १६ अक्षरोंवाली शिव गायत्री नहीं । कोई भी गायत्री -मन्त्र १६ अक्षरों का नहीं होता । प्रत: यह पौराणिक उपवीत- विशेष है । सो पौराणिक - उपवीतमें कुछ प्रतिबन्ध नहीं होता । यज्ञोपवीत सदा प्राचार्य ही देता है, माता नहीं । अतः वादीके इन पद्योंसे वादीकी पक्षसिद्धि नर्वथा नहीं । फिर पार्वती एक देवता है । उसका जो भी कृत्य हो; वह मनुष्योंसे अनुकर्तव्य नहीं हो जाता । इससे हमारी पक्षहानि कुछ भी नहीं । सबसे बड़ी बात यह कि यह यज्ञोपवीत नहीं; इसलिए यहां . उपवीत ' शब्द लिखा है; ' यज्ञोपवीत ' शब्द नहीं । वादीका पक्ष सभी प्रकारसे विध्वस्त हो गया । पृ. २०८ आगे वादी भविष्यपुराणके वचन देता है - ' ब्राह्मणाः त्रिया वैश्याः शूद्रा येशुचयोऽमलाः । तेषां मन्त्राः प्रदेया वै न तु संकीर्ण-धर्मिणाम् । स्त्री भर्त्रा वियुक्तापि... सा च मन्त्रान् प्रगृह्णातु सभर्त्री-तदनुज्ञया ' यहाँ बादी धोखा देता है । उक्त स्थलपर वैदिकमन्त्र नहीं उत्तरपक्ष छिपा लिया [ ८०१ बतलाये गये; किन्तु पौराणिक मन्त्र हो है । इस विषय में हम ८१० में स्पष्ट कर चुके हैं । पौराणिक मन्त्रोंका स्त्री - शूद्रादिकेलिए पृ. निषेध २० ९ -१० कन्याएं है । फिर भी भविष्य पुराणके वचन में ' न तु संकीर्णधर्मिणाम ' नहीं है; अन्त्यजोंका निषेध किया है । इससे वादीका पक्ष कट गया । उसका कहकर नहीं; य वेद सर्वाधिकारवान् न रहा । नहीं कर पृ. २०६ अग्निपुराणमें स्त्रियोंका संन्यास कहकर वादीने उसका यत्र निष ' स्त्रीणां प्रव्रजितानां तु ' यह बिना सङ्ख्याका आधा पद्य संन्यासमें तो उपनयन हुआ ही नहीं करता । इससे स्त्रियोंके सिद्धि नही । कुछ स्त्रियां त्यागरूप अवैध संन्यास ले लेती हमारे पक्षकी कुछ भी क्षति नहीं । आगे वादी म.म. पं. शिवदत्तजीकी ' सिद्धान्तकौमुदी ' की ' स्त्रियो s पि विद्याध्ययनाध्यापनयोरधिकारिण्यो भवन्ति ' एक हैं, यह पं. शिवदत्तजीका नहीं है, किन्तु ' काशीशेष - वेङ्कटाचल ' लघुत्रिमुनिकल्पतरु ' के पूर्वपक्षका वाक्य है । वहाँ दिया है । दब वादी उपनयनको हैं; इससे नास्ति है । यह भूमिका से तिच पाठ देता रहा है; - शास्त्रिकृत ' फिर उत्तरपक्षमें उपनयन इसे काटा गया है, वहां लिखा है- ' अश्मारोहणमारभ्य स्त्रीणां गौर्यचैनं रम है । परम् । पुराणपठनं श्रेयो न वेदाध्ययनादिकम् ' ( पृ. १४ ) इससे वादीका भाग पक्ष कट गया, क्योंकि - उसने पूर्वपक्षका पद्य तो दे दिया; उसके उत्तरपक्षको २७।१२ ) छिपा लिया - यह उसकी सदाकी दुष्प्रकृति रही है । श्रीमित्रमिश्रके आदर्श था विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । यह जो वादीने प्रमाण दिये हैं; इसपर वह लिखता है कि इन पत्रिका में पुस्तकों में वेदविरुद्ध प्रक्षेप भी हैं, वस्तुतः वादीका पक्ष ही वेदविरुद्ध है । दिया । उसका श्राधारभूत वेदवचन ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' यह मन्त्र कहा गया है, इसमें ब्रह्मचर्य का अर्थ वेदाध्ययन नहीं; किन्तु उपस्थसंयम है । इस साबण भाष विषय में हम पृ. ५५ से पृ. ७२ तक लिख चुके हैं । स्त्री एवं पृ. २१०-११ आगे वादी साममन्त्राका ' अर्यमणं नु देवं कन्य यह मग्निमयक्षत ' मन्त्र देकर लिखता है - इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि- दर्यमें अप

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८१०, ] DE - 10 स्वयं भी अग्निहोत्र किया करती थीं, यह तो लाजाहोमका मन्त्र घनहीं कन्याएं वेदमन्त्र भी नहीं है, किन्तु सोत्रमन्त्र है । यह अग्निहोत्रके लिए यह कहकर यह तो स्मार्तकर्म है । स्मार्तकर्ममें स.ध. भी स्त्री के लिए विधि - निषेध का वेद नहीं; करता है । वह तो वैदिक वैधकर्म में स्वतन्त्रतासे उनका पतिसे पृथक् नहीं यज्ञ निषेध करता है- यह सिद्ध बात है; अतः वादीका पक्ष खण्डित है । उसका वादीका ' य: कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना सम्प्रकीर्तितः । स सर्वोऽभि-या है । तब जयमको हिलो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः, ( मनु. २२७ ) इस प्रकार बेदानुवादक इससे नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो ' ( ५११५५ ) इस मनुपद्यको प्रक्षिप्त बात है । यह उसकी श्राहोपुरुषिकतामात्र है । हम इनपर पहले बहुत - कुछ तिल चुके हैं । जब उक्त मनुपच पति के साथ स्त्रीका यज्ञःधिकार कह मिका से रहा है; तब वह इसे प्रक्षिप्त कैसे कह सकता है? देता स्त्रकृत फिर कहता है – ' इसके पश्चात् वाल्यविवाह शुरू करके स्त्रियोंसे रपक्ष में उपनयन और वेदाध्ययनाधिकार छीन लिया गया ', यह वादीकी अपनी गौचनं रूप है । वेदाध्ययनाधिकार स्त्रियोंका शुरूसे ही निषिद्ध था । वादीका आगे वादी लिखता है— ' स्वयं सा मित्रं वनुते जनेचित् ' ( ऋ. १० । पक्षको २३११२ ) तथा ' सन्वायो इह सचाव है ' अथर्व ( ६ | ४ | २ | १ ) यह जो वैदिक नमिश्रके प्रादर्श था, उसे भुला दिया गया, स्त्रियां पतियोंकी दासियां समझी जाने सीं । यह वादीकी अपनी गप्पें हैं । पहले मन्त्रको वादीने ' श्री ' के - इन | पत्रिका में स्त्रीके स्वयंवरमें लगाया था, अब उसका अर्थ उसने वदल है । दिया । वस्तुतः इस मन्त्र में स्त्रीकी इन्द्र - मित्र प्रादि देवताओं की पूजार्थ हमन्त्र कहा गया है; यह ' इन्द्र ' मित्र ' यह मन्त्र वादिसमाज में प्रसिद्ध हैं-। इस | पणभाष्यका भी यही प्राशय है । दूसरे मन्त्र में कौशिकविनियोगानुकूल स्त्री एवं पतिके क्रोधोपशमनार्थं कहा गया था । वं कल्प यह लोग जनताको वरगलाने के लिए वेदको तो सामने रखते हैं; पर है कि- । में अपनी ' आल्हा ' गातेहैं । भारतीके विषय में उत्तर [ = ११ ' स्त्रियां पैरोंकी जूतियां हो गई, उन्हें पर्दे में बन्द कर दिया गया । पुराणोंकी वेदविरुद्ध प्रसङ्गत कमानोंके सुनने और सहत्रों देवी - देवताओं की पूजा में वे दिन व्यतीत करने लगों । ' महाशय, यह तो वैदिकव्यवहार परम्परासे चला आता रहा है । ग्राप लोग यौगिकताका बहाना बनाकर विल्लोका अर्थ चूहा; तथा घुहेका अयं गंधा करके वेदानभिज्ञ जनताको अपने काबू कर रहे हैं । देवताओंकी पूजा तो वैदिककालसे आ रही है । देखो वेदमें लिखा है- ' उन त्वा स्त्री शशीयमी पुंसो भवति वस्यसी । श्रदेवत्राद् अराधस. ' ( ऋ. ५१२३१ ) ' देवत्रा कृणुते मनः ' ( ७ ) देवताओंकी पूजासे हीन वादी जैसे पुरुषोंसे वह स्त्री अच्छी है; जो देवताओं की पूजामें मन लगाती है । अत्र यह बात वैदिक सिद्ध हो गई, वादीका पक्ष कट गया । वेद कहता है - य: श्रद्धाति ' सन्ति देवा इति ' चतुष्पदे द्विपदेऽस्य मृड ' ( अथर्व. ११।२।२६ ) प्रार्थ-समाज के श्रीराजाराम शास्त्रीने इसका यह श्रयं किया है- ' जो विश्वास रखता है कि- ' देवता हैं, उसके दो पाये और चौपायेकेलिए दयावान् हो । ( जो देवताओंकी सत्ता मानता है, वह उत्तम पुरुष है 1 ) पृ. २१२ आगे वादी लिखता है - ' वीच - बीच में अनेक सुधारकोंका जन्म होता रहा, जो इन अवैदिक प्रथाओं को दूर करनेका प्रयत्न करते रहे । यह कहकर वादी मण्डनमिश्रकी सुयोग्य धर्मपत्नी भारती देवी-जैसी महिलायों का भी जन्म इस पवित्र प्रायविर्त में हुआ, यह लिखकर बताता है, जिसके विषयमें शङ्कर - दिग्विजयने कहा है-' सर्वाणि शास्त्राणि पडङ्ग - वेदान्, काव्यादिकान् वेत्ति परं च सर्वन् । तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र बाला तस्मादभूच्चित्रपद जनानाम् ' ( ३११६ ) ( भारतीदेवी सर्वशास्त्र तथा अङ्गों सहित मत्र वेदों और काव्यों को जानती थी । ) वादीने अर्थ करते समय फिर उत्तरार्धके अर्थको जनदृष्टिसे छिपाकर

पृष्ठ 436

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८१२ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जनबञ्चन किया, अर्थात् भारती अभी बच्ची ही थी कि वेदादि सभी शास्त्रोंका उसे ज्ञान था । यह देखकर लोग चकित हो जाते थे । तब क्या वादी बता सकता है कि बच्चीको सभी शास्त्रों तथा षडङ्ग वेदादि सभी-का ज्ञान था । सभी लोगोंके प्राश्चर्यका विषय थी ' । बच्चीको भला इतना भारी ज्ञान कैसे हो सकता था कि बिना -गुरुके वह सभी कुछ जान जावे; वस्तुतः वह सरस्वतीदेवताका अवतार थी । और दुवासाके शापसे इस लोकमें आई आरूढपतित थी, पर वादीने इस प्रारम्भिक इतिहासको जनदृष्टिसे छिपाकर जनताको वञ्चित किया । इसीको स्पष्ट करनेवाले इसके पूर्वके प्रकरणको देखिये – ' शशाप तां दुर्विनयेऽवनीतले, जायस्व मर्त्येषु प्रविभेत् सरस्वती ' ( ३।१२ ) ( दुर्वासाने सरस्वतीको शाप दिया कि तू मनुष्यलोकमें जा ) । दुर्वासाको सबने प्रसन्न किया; तब उसने शाप - मोक्ष दिया कि - ' ददी, यदा मानुषशङ्करस्य संदर्शनं स्याद् भवितासि - अमर्त्या ' ( ३।१४ ) ( जब हे सरस्वती; तेरा शङ्कराचार्य से संवाद होगा; तव तू फिर मानुषीत्वसे हटकर देवता वन जावेगी । -सा शोणतीरेऽजनि विप्रकन्या, सर्वार्थवित् सर्वगुणोपपन्ना । यस्या बभूवुः सहजाश्च विद्याः, शिरोगतं के परिहर्तुं मीशा: ' ( ३।१५ ) ( वह दुर्वासा के शापसे सरस्वती देवी ब्राह्मण कुमारी बनी । सभी बातोंको वह जानने वाली थी । जिसको सभी वेदादि - विद्याएं सहज ( जन्मसे ही उत्पन्न ) थीं । फिर ४ थं पादमें लिखा है - जैसे सिरसे उत्पन्न वाल हटाये नहीं हट सकते; वैसे सभी वेदादि विद्याएं भी उसकी जन्मसिद्ध थीं । ) तभी शङ्करदिग्विजयकी ' धनपतिसूरिकृत डिण्डिमटीका में लिखा है- ' यथा शिरोरुहादिकं शरीरस्य श्रवयवजातं सहज ( जन्मसिद्ध ) मेव; तथा तस्याः [ भारत्याः ] सर्वविद्याद्य, पलक्षित- यावच्छन्द ब्रह्मरूपमङ्गजातं स्वभाव-सिद्धमेवेति ' अब वादी बतावे कि भारती में क्या विशेषता रही? इसीको स्पष्ट करनेवाला इससे पूर्वका पद्य एक है, जिसे वादीने ' पुरन्धि ' का अर्थ [ ८१३ छिपाकर जनवञ्चन किया । वह यह है- ' यस्या वभूवुः १४ शिरोगतं के परिहर्त मीशा: ' ( ३।१५ ) इसका तात्पर्य वादी सहजाश्च विद्याः में देखे । छोटी लड़की इतना साहित्य षडङ्ग वेद सभी दर्शन पृ. ४१४-४१५ है । साहित्य विना गुरुके नहीं पढ़ सकती जब तक वह श्रारूढपतित , काव्यादि- अर्थ नहीं तो वादी सब लड़कियोंको विना गुरुके इस सारे साहित्य न हो । बनने दे; फिर गुरुकुलोंकी क्या श्रावश्यकता में विदुषी पृथिवीर ? वादीका पक्ष पूराका पूरा शब्द दी कट गया । जो पूर्वापर छिपानेसे वादीको लज्जा श्रानी उचित थी; पर नाम नहीं ‘ उल्टा चोर कोतवालको डांटे ' वह हमें ही पृ. २१४ में डॉट रहा है । अब बल अब उस पाप से उसका पतन हो गया । वर्ष स्था स्त्रियों की बुद्धि कम होती है - यह हमने वेदमन्त्रकी विशेषतासे कहा इस मन्त्र था । जैसे ' बालानां सुखबोधाय ' में तर्कसंग्रहादिमें उस विषयका ज्ञान न किया है, रखनेवाले वाल इष्ट होते हैं; वैसे वेदको भी स्त्रियोंकी वेदोक्त बुद्धिष्ट वादीकी होनेसे वे निर्बुद्धि इष्ट हैं । इस विषयपर हम अन्यत्र स्पष्टता कर चुके हैं । श्री बाबी - महाशय यह हमें न ङाँटकर वेदादि - शास्त्रोंको ही डाँट रहे हैं । स्त्रीका ग्रन्थोंके पूर्वापर छिपाकर वह जनताको गुमराह कर रहे हैं । ( ५१ ) पृ. २१५ अव प्रागे प्रार्थनामन्त्र देकर स्वयं भी वञ्चन करता है । महाशय किन्तु साध्य हुआ करती है । उक्त मन्त्रमें यह नहीं उसकी ' गलत बयानी ' है । होवें, तो क्या ऐसी प्रार्थनासे वादी ' पुरन्धिर्योषा ' ( यजुः २२।२२ ) यह किया है । इसे प्रार्थनामन्त्र मानकर हमें डांटकर जन- ' बहुकर्म ! प्रार्थना सिद्ध वस्तु नहीं हुआ करती, बहुधा ' स्त्रीके लि इधर यह लिखा है कि स्त्रियां ऐसी होती हैं - यह तो वाले बच यहां तो ऐसी प्रार्थना हैं कि- स्त्रियां ऐसी लडके के स्त्री ' पुरन्धि ' हो जावेगी । प्रार्थना से स्त्रियां बैठा नही बुद्धिमती हो जातीं; तब आपके कन्या - गुरुकुल व्यर्थ थे । बुद्धिष अब वादी ' पुरन्धि: ' पर विचार सुने? ' निघण्टु ' के भाष्यमें दुर्गाचार्यने पुर' इसका अर्थ लिखा है- ' बहूनि धारयित्र्य: ' सर्वस्यास्य भूतग्रामस्य धारयित्र्य बुद्धि प ( ३।२१।७ ) यहाँ यह अर्थ किया है, यह धीका पृथिबीके नामका उत्ता- जो है । तब

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८१३ १४ ] विद्याः ८.४१५ व्यादि- धर्म है । विवाह में न हो । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' द्यौः श्रहं पृथिवी त्वम् ' ( पा. गया है, सो वहाँ बुद्धिका अर्थ नहीं विदुषी पृथिवीरूपा माना है; वहाँ ' पुरन्धि ' में तो ह्रस्व है, का पूरा शब्द दीर्घ होता ' धा ' धातुका रूप है, जिसका अर्थ है ; पर नाम नहीं, किन्तु वादी लोगोंको धोखा दे रहा है । करके, १1३1 ९ ) स्त्रीको है । वुद्धिवाचक ' धी ' अतः यह ' बुद्धि ' का ' धारयित्री ' | ' बुद्धि ' श्रीसायणने ' घी ' का हा है । बलात् में प्राय: ' कर्म ' किया है ' । ' सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या धर्म स्थान - स्थान मन्त्रधी पृथक् है, पुरन्धि अलग है । श्रीयास्कने बुद्धिका अर्थ नहीं से कहा ' किया इस है, बल्कि ' पुरन्धि ' का अर्थ स्तुति किया है, ( १२ | ३० | १ ). अव · ज्ञान न वादीकी बुद्धि गिर गई । इष्ट न श्रीउवटने ' पुरं शरीरं रूपादि - गुणसमन्वित धारयतीति पुरन्धिः ’ चुके हैं । ' स्त्रीका रूप धारण करनेवाली यह अर्थ किया है । निघण्टुमें ' पुरन्धि ' रहे हैं । ( ५१ ) शब्द श्राया है, उसका अर्थ यास्कने ' इन्द्र ' अथवा भग देवता श्रर्थ किया है; और ' धी ' का अर्थ वहाँ ' बुद्धि ' न करके ' कर्म ' अर्थ किया है-) यह बहुकर्म ( ६।१३।१ ) तम: ' । ' पुरन्धि ' इस मन्त्रमें श्रीदुर्गाचार्यने रजन ' बहुधा घनस्य ' दाता अर्थ किया है, बुद्धिका अर्थ नहीं ( ११/२/१ ), सो करती, स्त्रीकेलिए याम्कने कहीं भी ' बड़ी बुद्धिवाली ' यह अर्थ नहीं किया । श्रीर इधर यह प्रार्थना - मन्त्र है कि - स्त्री ऐसी होवे, और फिर ' पण्डिता जायेत ' - यह तो वाले वचन में शतपथने लड़की के लिए ' वेदकी बुद्धि ' अर्थ नहीं किया, किन्तु ऐसी केलिए पण्डितसे भिन्न वेदका नाम भी कहा है - लड़की के लिए बैसा नहीं कहा, यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं; अतः वेदको स्त्रीकी 171 बुद्धि इष्ट नहीं । चार्यने ' पुरन्धियोंषा ' यह प्रार्थना है कि स्त्री ऐसी होवे; यहाँ ' धी ' का पित्र्यः ' बुद्धि अर्थ करनेपर भी यद्यपि वेदको वहीं ऐसा इष्ट नहीं, ' घी ' की नामका ता - जोकि गृहविषयक है - प्रार्थित है, सो वह सिद्ध नहीं, किन्तु साध्य है । तब इससे वादीकी इष्टसिद्धि सिकताभित्ति हो गई । ' बहुत कर्मवाली ' परिशिष्टपर विचार [ ८१५ का ' शक्तिशाली ' श्रयं कर देना वेदविरुद्ध है, जबकि वह शुक्रकी अल्पताने उत्पन्न है; तब सबल कैसे हो सकती है? पृ. २१५-२१६ में वादीने जो ' कर्णाटी ' विजयाङ्का, शीला, विज्जा श्रादि स्त्रियाँ वताई हैं; उन्हें ' काव्यं कर्तुं सन्ति विज्ञा: ' काव्य बनाने-वाली तो कहा है, पर वेदमें अधिकृत नहीं बताया अतः वादीका पक्ष कट गया । पृ. २१६ आगे वादीने जो ' उतो ग्रह ऋतु रघु ' स्त्रीकी बुद्धिको वेदने ( रघु लघु ) छोटा होना बताया है; पर वादी उस वेदपर जोर - जुल्म करता है; उनकी वातको भी काटता है । ' रघु ' ' लघु ' ( ३६ ) अर्थ करके अपनी पक्षसिद्धि कराना चाहता है, इस विषय में हम पृ. १६७-१६६ में विचार कर चुके हैं । वादी उसे देख ले । रघुवशमें तो ' रघु ' यह नाम था; पर उक्त मन्त्र में ' रघु ' यह नाम नहीं है; किन्तु विशेषण शब्द जिसका अयं वेदको ' लघु ' इष्ट है । इस विषयमें हम पहले बहुत स्पष्ट कर चुके हैं । पृ. २१७-२२२ मागे वादीने स्त्रियोंके वेदाध्ययन के कई स्वा.द. के निजी साध्यवचन लिख डाले हैं, यदि स्वाद को ऐसा इष्ट होता; तो वे उपनयन संस्कार में लड़कीका नाम लिख डालते । पर उनने लड़केका नाम १६ बार लिखा है, पर लड़कीका नाम एक बार भी नहीं लिखा । लड़कों का तो उपनयन संस्कार उनने लिखा है । पर लड़कीका सर्वथा नहीं । शेष जो वादीने उनके वेदभाष्य के कई वैसे उद्धरण दिखाये हैं; यह उनकी मृत्युसे पीछे उनके अनुयायियोंने वीचमें प्रक्षिप्त कर दिये । क्योंकि - वेदभाष्य उनके सामने पूरे प्रकाशित नहीं हुए थे; उनकी मृत्युके बहुत बाद तक छपते रहे । अतः उनके चेलोंको उसमें प्रक्षिप्तताका अवसर मिल गया । इस प्रकार पूनाके व्याख्यानों में स्वा. द. के नामसे बहुत - सी बातें

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८१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) उनके शिष्योंने उनके नामसे प्रक्षिप्त कर डाली हैं । यहाँ वादीकी पुस्तक समाप्त हो गई; हमने इसका अक्षर - अक्षर खण्डन कर दिया है । अब आगे वादी ' परिशिष्ट ' लिखता है; क्या हम यह परिशिष्ट उसीका मानें; या किसी अन्यका? यदि उसका; तब ऋपरिशिष्ट प्रादिको भी उसे ऋग्वेदादि मानना पड़ेगा; जिसके मन्त्रों को श्रीयास्कने भी अपने निरुक्तमें उद्धृत किया है यह हम ' वेदस्वरूपनिरूपण ' निबन्धों में दिखला चुके हैं । निरुक्तके परिशिष्टके वचनोंको स्वा.द.जीने भी श्रीयास्कके नामसे लिख डाला है । पृ. २२२-२२४ अव वादीके परिशिष्टपर भी विचार किया जाता है - वादी शतपथ ( १1३।१।२ ९ ) के अनुसार ' अथ पत्नीं संनह्यति, प्रथ पत्नी प्राज्यमवेक्षते ' ' प्रदव्येन त्वा ' ( यजुः ११३० ) का पत्नीसे उच्चारण दिखलाता है । वादी मोटी बुद्धिका मालूम होता है । कई बार हम कह चुके हैं— जिसे शायद वादी भूल जाता है कि- " वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( मनु. २६७ ) प्रर्थात् स्त्रीका विवाह संस्कार उसका कुछ उपनयन- जैसा होता है; इससे वह द्विजकल्प हो जानी है । ' पत्युन यज्ञसंयोगे ' ( पा. ४।१।३३ ) इस वेदाङ्गके सूत्र के अनुसार स्त्री ' पत्नी ' यज्ञके संयोगमें वनती है । अतः वह अपने योग्य विशेष मन्त्र ऋत्विक्-यादिके सहारे बोल सकती है । इससे उसका क्रमिक तथा वैध वेदा-ध्याधिकार सिद्ध नहीं होता । कई वार टीकाकारोंका उद्धरण दिया जा चुका है – ' को वचनस्य प्रतिभारः ' अर्थात् कोई मन्त्र वुलवा लेने में कोई भारी काम नहीं हो जाता; पर वादी व्यर्थका परिश्रम बहुत किया करता है । स ध का यह प्रकट सिद्धान्त है कि - स्त्री, शूद्र नहीं है कि उसे वेदमन्त्र शूद्रकी भांति सुननेका अनधिकार हो; और उनके कानमें सीसा वा लाख घोला जावे ' ऐसा कभी किसी प्राचीन प्राचार्यने नहीं लिखा है; पर ' वेदे पत्नीं वाचयति ' का वास्तविक अर्थ [ 5.80 उसे यज्ञका स्वतन्त्रतासे कोई अधिकार नहीं । हाँ, उसे ८१६ ' ज्यावेक्षण ' आदि करने पड़ते हैं; जो उसमें यदि वचनबल अपने योग्य से यज्ञादिमें कोई अपने योग्य मन्त्र बोलना पड़ता है तो ( अपवाद ) ' स्त्री पक्षहानि नहीं है । अतः वादीकी यह छोटी - मोटी; इससे हमारी होग वात व्यर्थ की है इससे उसे उपनयन संस्कारका अधिकार नहीं जाता ॥ द्विजकल्प हो जाती है; ग्रतः उसके उस विशेष मन्त्रसे कोई वह विवाह से स्त्रीव हानि नहीं । किसी तत्र वादी के उस प्रकारके मन्त्रोंपर वार - बार समय खराब क्यों जाय? क्योंकि जब वह मनुके अनुसार द्विजकल्प हो चुकी है; और किया यज्ञ- तो संयोगसे ' पत्नी ' भी ' हो चुकी हैं, तो वह ऋत्विक् श्रादिके सहारे कई गलत मन्त्र ( सब नहीं ) जो उससे सम्बन्ध रखते हैं- बोल सकती है । सकत पृ. २२५-२६– ‘ इसी प्रकार ' वाचयति ' से भी स्पष्ट हो रहा है कि ऋत्विक्के सहारे वह बोलती है । यदि पुरुषको भी कई मन्त्र बना ऋत्विक् आदि बुलवाता है, इससे हमारी कुछ भी पक्षहानि नहीं है । कई १८३ ब्राह्मणादि होते हुए भी उन्होंने वेदमन्त्रादिका ज्ञान ही नहीं किया होता, सो उन्हें भी वे मन्त्र पुरुष होते हुए भी बुलवाये जाते हैं; आप जहां याद विवाह पढ़ने जाते हैं, क्या वहाँ सभीको वे मन्त्र याद होते हैं? यदि नहीं, मान तब क्या श्राप उन मन्त्रोंको उनसे नहीं कहलवाते । ग्रापको प्रत्युत्तर वेदा दे दिया गया; इससे हमारी कुछ भी पक्षहानि नहीं । पृ. २२७ वादी लिखता ' वेदे पत्नीं वाचयति ' इत्यादि प्रयोगों मन्यर भी स्पष्ट है कि वेद स्त्रीके हाथमें देकर उससे मन्त्र उच्चारण कराये ब्रह्मा जाते हैं । ' यदि ' यमन यह वादीका कथन अज्ञानपूर्ण है । यहाँ ' वेद ' का अर्थ ' वेदपुस्तक ' लिखे नहीं; किन्तु ' दर्भमुष्टि'का बना हुआ पदार्थ यहाँ इष्ट इसे हम कारण पृ. १८३- १८ ९ में बहुतसे प्रमाणोंसे स्पष्ट कर चुके हैं । तब वादीका उन स ० ध ० ५२ स्पष्ट

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८१७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८१८ ] पवाद योग्य ' स्त्री ' को वेदपुस्तक देकर उससे मन्त्र बुलवाते हैं, यह कथन खण्डित ) हमारी हो गया । की है । आगे कुमारी ' गन्धर्वगृहीता ' का वादीने फिर उल्लेख किया है । यह विवाहसे स्त्रीका नाम नहीं है । किन्तु गन्धर्वग्रह से वह गृहीत श्री; जैसे कि-नहीं । किसीको भूत - प्रेत चिपटा हुआ हो; उससे पूछा जाता है, तुम कौन हो; किया तो उसमें जो प्र ेत होता है, वही बोलता है । श्रीसामश्रमीने इसका यज्ञ- गलत अर्थ किया है । ' आयुर्वेद में गन्धर्वग्रहगृहीत ' का लक्षण देखा जा कई सकता है--पृ. २२८ ' वृषा वै वेदो योषा पत्नी ' यहाँ भी वेदका अर्थ कुशमुष्टिका रहा है बना हुआ पदार्थ है, जिसे पत्नीको पहराया जाता है । यह हम पूर्व कई मन्त्र १८३-१८६ पृष्ठोंमें स्पष्ट कर चुके हैं । है । कई आगे वादीने श्रीमात्मानन्दभाष्यका उद्धरण दिया है । वादीको T होता, याद रखना चाहिये कि – आत्मानन्द भी स्त्रियोंका वेदाधिकार नहीं जहाँ ' मानते । उन्होंने लिखा है— ' स्त्रीणां शूद्रान्धकाणानां... पङ्गनां नैव दि नहीं, वेदाधिकारिता ' । प्रत्युत्तर प्रागे जो ' यथाधिकारः श्रीतेषु योषितां कर्मसु श्रुतः । एवमेवानु-योगों मन्यस्व ब्रह्मणि ब्रह्मवादिताम् ' इति यमस्मृतिः । तस्मात् स्त्रीणामप्यस्ति कराये ब्रह्मादिविद्याधिकारः ' ब्रह्मविद्या में उपनयनकी आवश्यकता नहीं होती । यदि यमस्मृति में वचन नहीं मिलता; तो इसका यह तात्पर्य नहीं कि-' यमस्मृति ' से यह वचन निकाल दिया गया । निबन्धग्रन्थों में वहुतसे वचन पुस्तक ' लिखे हुए भी उस - उसमें नहीं मिलते; सो वहाँ प्रनष्टता सम्भव है, वादिप्रोक्त इसे हम कारण उसमें नहीं । कल्पारम्भवाली बात भी गलत नहीं । वादीने ही उन ब्रह्मवादिनियोंको अपने निबन्धमें ' ऋषिका ' लिखा था; सो वेदकी ऋषिकाएं कल्पके आरम्भमें हो तो होंगी । इसे हम ब्रह्मवादिनी - प्रकरणपें स्पष्ट कर चुके हैं । वेदोंका स्वरूप [ ८१ ९ ' तस्मात् स्त्री ब्रह्मविद् भवेत् ' यह जो वादीने श्रात्मानन्दके भाष्यसे उद्धृत किया है, यह भी व्यर्थ ही है । श्रीश्रात्मानन्द स्त्रियोंका वेदाधिकार नहीं मानते । सो ब्रह्मवादिनियाँ ब्रह्मवाद अनादि- सिद्ध पुराणोंसे भी प्राप्त कर सकती है । पृ. २३०-२३१ आगे वादी अपनी पुस्तकका उपसंहार करता हुआ लिखता है - ' सरस्वती ' के नामसे वेदोंके अनेक सूत्रोंमें उनके वेद पढ़ने, यज्ञ करने आदिका स्पष्ट वर्णन है । ' सरस्वती ' वहाँ एक देवता है, न कि मानुषी । निरुक्तकारने यह स्पष्ट लिखा है कि- ' सरस्वती इत्यस्य नदीवद् देवतावच्च निगमा भवन्ति, तद् यद् देवतावत् तदुपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ' ( २-२३1३-४ ) इसमें मानुषीका गन्धमात्र भी नहीं है । सरस्वतीके विषयमें हम पहले पृ. ४३१-४४१ में स्पष्ट कर चुके हैं, उससे वादीके पक्षका खण्डन हो जाता है । पृ. २३०-२३१ में वादी बताता है— ' वेदोंसे तात्पयं ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इत नामोंसे प्रसिद्ध मन्त्र सहिता प्रोंसे है । यह बात ठीक नहीं । आपको इस विषयका ज्ञान मालूम नहीं होता । आप अपने अजमेर - वंदिक यन्त्रालयकी छपी पुस्तकें ही देख लें; उनका नाम आपको ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और प्रथर्ववेद नहीं मिलेगा, किन्तु ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेदसहिता और अथर्ववेदसंहिता ही मिलेगा । इसका तात्पर्य यह हुआ कि यह यजुर्व की संहिताएं हैं । सो महाभाष्यानुसार ऋग्वेदको २१ संहिता है, सभी को ऋग्वेदसंहिता कहा जाता । यजुर्वेद दो प्रकारका होता है, कृष्णयजुर्वेद तथा शुक्लयजुर्वेद, इसमें कृष्णकी ८६ संहिताएं होती हैं, और शुक्लकी १५ । दोनों मिलकर यजुर्वेदी १०१ संहिताएं हैं । सभीको यजुर्वेद संहिताएं कहा जावेगा । परन्तु भेदकत्वार्थं कृणयजुर्वेद तैत्तिरीयसंहिता, कृ.य. मंत्रायणीसं., कृ.य.

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८२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) काठकसहिता, कृ.य. कठकपिष्ठलसं., तथा शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिनसं., तथा शु. य. काण्वसं. प्रादि लिखा जावेगा । इसी प्रकार सामवेदकी १००० सहिताएं होती हैं । सभीको सामवेदसं. कहा जावेगा, परन्तु भेदकतार्थं सा.वे. कौथुमीसं., सा. जैमिनिसं. आदि कहा जावेगा । प्रथर्ववेदको सहिता होती हैं । सभीका नाम अथर्ववेदसं ही कहा जावेगा; पर 2 भेदकत्वार्थं अथर्ववेद पैप्पलादसं., प्रथर्व. शौनकसं., श्रादि कहा जावेगा । चार वेदोंके प्रारम्भिक मन्त्र वादिप्रतिवादिमान्य महाभाष्यकारने लिखे हैं- इसमें सबसे पहला भाष्यकारने प्रथर्ववेदका मन्त्र दिया है -' शं नो देवी: ' यह प्रारम्भ में प्रथर्ववेद- पैप्पलादसं में प्राया है । शौनकसं. में तो सर्वप्रथममन्त्र ' ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः ' है । गोपथब्रा. में भी अथर्वका प्रादिममन्त्र ' शं नो देवी ' ही दिया है, और यह पप्पलादसं. में ही है, न कि शौनकसं. में । यह उडिया भाषा में प्रकाशित प्र.पं.सं. में प्रत्यक्ष है । महाभाष्य में यजुर्वेदका प्रारम्भिक मन्त्र ' इषे त्वा, ऊर्जे त्वा ' यही दिया है । इससे कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्लयजुर्वेद दोनों ही वेदत्वेन गृहीत इष्ट हैं । यदि केवल भाष्यकारको शुक्लयजुर्वेद वेद इष्ट होता; तो ' इषे त्वा ऊर्जे त्वा वायवस्थ ' इसका पाठ रखते; जिससे ' वायवस्थ उपायवस्थ ' पाठवाली कृष्णयजुर्वेदसं. की व्यावृत्ति हो जावे । अथवा यदि कृष्णयजुर्वेद ही वेद इष्ट होता; तो ' इषे त्वा ऊर्जे त्वा भाष्यकारको वायवस्थ उपायवस्थ ' इतना उद्धरण देते; जिससे शुक्लयजुर्वेद की व्यावृत्ति हो जावे । पर व्यावृत्तिकारक पद साथ न रखने से स्पष्ट है कि - भाष्यकार शुक्ल- कृष्ण दोनों ही संहिताओं को वेद मानते हैं, तभी तो उन्होंने ' एकशत-मध्वर्यु शाखा: ' यजुर्वेदकी १०१ संहिताए लिखी हैं । इनमें ८६ कृष्ण-यजुर्वेदसं. हैं; और १५ शुक्लयजुर्वेदसं । इससे यह भी सिद्ध होता है कि- कृष्णयजुर्वेदका साहित्य बहुत बड़ा कृष्णयजुर्वेद वेदता [ ८२१ = २२ ] था, पुष्ट था; सुव्यवस्थित था, प्राचीन था, और सर्वथा चालू शुक्लयजुर्वेदका साहित्य बहुत छोटा था; और कृष्णसे अर्वाचीन था । पर डीने मूल और बहुत चालू नहीं था । इसके उदाहरण तो बहुत मात्रामें या हिन्दी म सकते हैं, पर इतना स्थान नहीं है; अतः दिङ्मात्र उदाहरण देते दिये हैं।— जा कहते हैं ि -महाभाष्य में ' शृणोत ग्रावाणः ' आया है; अष्टाध्यायीके आरम्भ एक सूत्रका प्रब उदाहरण भी यही प्राया है । महाभाष्यमें भी यही प्राया है । मीमांसा-दर्शनके शावरभाष्यमें भी आया है । सायण ऋग्वेदभाष्योपोद्घातमें भी हिन्दी भाष श्राया है । अन्यत्र भी बहुशः यह उदाहरण श्राया है यह कृष्णयजुर्वेदका किन्तु अनु है: पर शुक्लयजुर्वेदमें ' श्रोता ग्रावाणः ' यह पाठ श्राया है; इसका उद्धरण हैं? कहते कहीं भी सर्वसाधारणता से नहीं था । द्वाप लोग व दूसरा उदाहरण देखिये- ' प्रोषधे त्रायस्वनम् ' यह उद्धरण अन्य वाह्या निरुक्तमें भी आया है, सायण, तथा मीमांसादर्शनके शावर भाष्य में भी आाया है, सायण के ऋग्वेदभाष्योपोद्घातमें भी प्राया है, एवम् अन्यत्र भी बहुशः | दोनों ही यही उद्धरण श्राया है, पर शुक्लयजुर्वेद में ' प्रोषधे त्रायस्व ' यही पाठ वचनमें को आया है, उसके साथ ' एन ' नहीं है; और ऐसा उद्धरण अन्य पुस्तकोंमें हो भी अ नहीं दीखता । -एकयो इससे हम शुक्लयजुर्वेद की वेदता काट नहीं रहे; किन्तु कृष्ण - शुक्ल ग्राप दोनों यजुर्वेदोंकी वेदता सिद्ध कर रहे हैं । जव कृष्णयजुर्वेद की भी वेदता पुन भा सिद्ध हो गई; तब सिद्ध हो गया कि - सभी ११३१ संहिता, उतने ही रही? य हो? उस ब्राह्मण, क्योंकि शब्दार्थ - सम्बन्ध नित्य हुआ करता है, उतने ही श्रारण्यक और उतनी ही उपनिषदें यह साहित्य मिलाकर ही ' चार वेद ' तब वे गुज यन गल बनते हैं । कोस शेष रहा ब्राह्मणभागका मन्त्रभागका व्याख्यान होना; तब इस हिन्दी अन क्या हुआ? इससे उसका वेदत्व अक्षुण्ण ही रहा है । वादी लोग हिन्दी स.प्र ‘ सत्यार्थप्रकाश ' को स्वा.द. का मूल ग्रन्थ मानते हैं । वे बतावें कि स्वा.द. |ी व्याकर