सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 441–450
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 441–450
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२१ = २२ ] 71 सत्यार्थ प्रकाश संस्कृतभाषामें लिखा - लिखाया था; वा बोला था; पर / दौने मूल? यदि हिन्दी में; तो यह बात गलत है; क्योंकि दयानन्दी ही न या हिन्दी में स्वाद. गुजराती थे; उन्हें हिन्दीभाषाका ज्ञान नहीं था । दये जा कहते हैं कि- में बोलते एवं लिखवाते थे । दे प्रारम्भमें सव संस्कृत 1- वादी बोले कि - स. प्र. संस्कृतभाषानिबद्ध मूल ग्रन्थ था; या सूत्रका अव स.प्र. मूलग्रन्थ? यदि संस्कृतभाषानिबद्ध ही स.प्र मांसा- हिन्दीभाषानिवद्ध. तभी था; तव वर्तमान हिन्दी सत्यार्थप्रकाश मूलग्रन्थ सिद्ध न हुआ; जुर्वेदका सत्रन्य सिद्ध हुआ । तब आप लोग उसे दयानन्दका स.प्र. क्यों उद्धरण किन्तु रहते हैं अनुवादग्रन्थ ? स.प्र.का अनुवाद कहिये, उसका व्याख्या प्रन्य कहिये । पर यदि | द्वार लोग उस व्याख्याग्रन्थको भी स.प्र. कहते हैं; तब मन्त्रभागका व्याख्यान-| न्य वाह्मणभाग भी वेद ही कहा जावेगा । हाँ ' ब्राह्मण ' को ' मन्त्र ' नहीं उद्धरण 7 हो: घोर ' मन्त्र ' को ब्राह्मण नहीं कहेंगे यह तो ठीक है, पर वेद छाया दोनों ही रहेंगे । क्योकि - ' मन्त्र - ब्राह्मणयोर्वेद - नामधेयम् ' । यदि श्राप इस बहुशः ही पाठ वचनमें कहे ' ब्राह्मण ' को वेद नहीं मानेंगे, तो इसी वचनमें कहे ' मन्त्र ' स्तकों में से भी प्रापको वेद नहीं कहना पड़ेगा, क्योंकि यह स्वाभाविक नियम - एकयोग - निर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः सह वा निवृत्तिः ' । श्राप लोग स्वाद की बनी हुई संस्कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाका - शुक्ल 7 वेदता नून ऋभाभू. कहेंगे, उसके हिन्दी रूपान्तरको भी ऋभाभू. कहेंगे या उतने ही नहीं? यदि हाँ, तो मन्त्रभागका व्याख्यान ब्राह्मणभाग भी वेद क्यों न हो? उसकी भाषा स्वाद ने बनाई है, वा पण्डितोंने? यदि स्वामीने; नारण्यक वेद ' | वे गुजराती वा संस्कृतभाषा ही जानते थे; हिन्दी नहीं, यह प्रापका च्पन गलत सिद्ध हुआ । यदि अन्य पण्डितोंने वह हिन्दी बनाई है; तब । लाको स्वाद की ऋॠभाभू. मत कहिये । यदि आप कहें कि हम उत इससे हिन्दी अनुवादको स्वामीकी ऋभाभू. नहीं कहेंगे । तब उसी न्यायसे न्दी लोग [ हन्दी स.प्र. को भी स्वा.द.का ' स.प्र. ' मत कहो । व्याकरणके महाभाष्यको - स्वा.द. व्याकरण मत कहिये । यदि फिर भी कहते हो; तब वेदके व्याख्यान वेदका स्वरूप [ ८२३ ब्राह्मणको भी वेद स्वयं कहना पड़ेगा । जैसे मूलका नाम ग्राप अष्टाध्यायी कहते हो; और व्याख्यानका नाम महाभाष्य; पर दोनोंको ही ' व्याकरण, कहते हो; वैसे ही आप लोग मूलको मन्त्रभाग कहते हो और व्याख्यानको ब्राह्मण कहते हो; पर वेद दोनों ही रहेंगे । मन्त्रभाग भी एक भाग है, तभी उसे ' भाग ' शब्द वाच्य कहा जाता है; और ब्राह्मणभाग भी भाग, वह भी ' भाग ' शब्द वाच्य पर ' मन्त्र-ब्राह्मणयोवेदनामधेयम् ' वेद दोनों ही रहेगे । वस्तुतः मन्त्रभाग भी वेदका व्याख्यान है; और ब्राह्मणमाग भी वेदका ही व्याख्यान । श्रतः दोनों ' वेद ' हैं | आप लोग पण्डितोंके हिन्दी - संस्करण स. प्र. को स.प्र. ही मानते हो; तब प्रापके शब्दों में ऋषियोंके मन्त्रभागके उपवृ हक संस्करण ब्राह्मणभागको भी वेद क्यों नहीं कहते? हमारा और श्रापका भेद यह है कि हम ब्राह्मण-भागको ऋषिकृत नहीं कहते, किन्तु जैसे ऋषियोंने मन्त्रभागका समाधि-दर्शन द्वारा प्रवचन किया; वैसे ही ऋषियोंने ब्राह्मणभागका भी प्रवचन किया, निर्माण नहीं । वेद दोनों ही सिद्ध हुए । आप संस्कृत निबद्ध स.प्र. के हिन्दीनिवद्ध स.प्र. को स.प्र. कहते हो; तों क्या मन्त्रभाग को भी संस्कृत तथा ब्राह्मणभागको हिन्दी अनुवादकी तरह मानते हो? ऐसा कभी नहीं हो सकता । यह प्रत्यक्षका अपाकरण हो सकता है । वस्तुतः मन्त्रभाग भी अधूरा है, और ब्राह्मणभाग भी अधूरा । दोनों एक - दूसरेकी शेषपूर्ति करनेवाले हैं; श्रतः दोनों हीं वेद हैं । हम आपको मन्त्रों में मन्त्रोंका व्याख्यान दिखला सकते हैं; तब G आप भी उन मन्त्रोंको अन्य मन्त्रोंका व्याख्यान मानोगे? यदि ऐसा है; तब उन मन्त्रोंको भी आप ब्राह्मण कहेंगे, वेद नहीं कहेंगे? तात्पर्य है कि - प्राप लोगोंका पक्ष पूराका पूरा तहस - नहस हो गया । वह निराधार
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८०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) है; उसका आधार कुछ भी नहीं । अभी यह भिन्न बात है कि- प्रथमावृत्ति स.प्र. को आर्यसमाजका मूल-सूत्र माना जावे; या द्वितीयावृत्तिवाले स. प्र. को? यदि प्रथमावृत्तिवालेमें प्रक्षिप्त प्रश बहुत हैं, वह द्वितीयावृत्तिवाले में भी हो सकता है । ' उताहमस्मि संजया पत्यौ मे श्लोक उत्तमः, अरिष्टाऽहं सह पत्या भूयासम् ' इसपर हम कब कहते हैं कि इन मन्त्रोंको पति वा पुरोहित पढ़ लेगा; किन्तु पति वा पुरोहितकी सहायतासे वह स्त्री स्वविषयक मन्त्र बोलेगी । इसमें अनुपपत्ति कुछ भी नहीं आती । वादी स्वयं ही सोच ले कि यह मन्त्र किसी स्त्रीने बनाये हैं; वा पुरुषने ही? यदि सहस्रशीर्ष पुरुषने तव स्त्रीका अपना वाक्य यह कहाँ हुआ? जब जैसे यहाँ प्रतिनिधि- वाद है, वैसे उन मन्त्रों में भी समझ लेना चाहिये । संस्कारविधिमें कई मन्त्र बच्चोंके भी बोलनेके उनके संस्कारोंमें आते है; तब उसकी असामर्थ्यवश पुरोहित वा पिता ही उन मन्त्रोंको बोल देता है, वैसे लड़की भी तो वहां प्रसमर्थ - लड़की ही समझ लेनी चाहिये, तब उसकी भी पति - पुरोहितादि सहायता कर लेंगे, जिसका तात्पर्य यह निकलता है कि यह उक्त लडकी वा स्त्रीकी इच्छा है । पहले कहा जा चुका है कि इन मन्त्रोंको उस लड़कीने तो बनाया नहीं; बनाया किसी दूसरेने, प्रकाशित किया किसी ऋषि प्रादिने । उसे छपवाया किसी अन्यने, उसका प्रयोग करवाया श्राचार्यने; तो यह सव प्रतिनिधिवाद है । इसपर बादी कुछ भी चीं - चपड़ नहीं कर सकता । वह स्वयं बहुत स्थान कह चुका है कि वेदपुस्तक हाथ में देकर उससे विशेष मन्त्र बुलवा ले । यदि वह स्वयं वंसी वेदकी विदुषी होती; तो उसके हाथमें वैदपुस्तक देनेकी जरूरत क्या होती? तो फिर वहाँ आचार्य वा ऋत्विजों की भी क्या आवश्यकता थी? महाशय, थोथे तर्कवादोंको छोड़ो, इससे प्रापका कुछ भी नहीं वन सकता । यज्ञकर्म म प्रयोगका नियम होता ह ] [ ८२५ [ १६ शेष है कि वह उस सहस्रों मन्त्रोंका प्रत्येक सस्कारों में जिनमें सम्बोधित किया गया है । वेदज्ञानके बिना कैसे ज्ञान करेगी? उसे दरानन्दी क्या आप नहीं जानते ' याश ' कर्मणि प्रयोगनियमः ' यज्ञकर्म में तो महाशयः रहीं बन है । प्रयोग- बनती का नियम होता है, ज्ञानका नहीं; अतः आपका यह तर्क पिस गया एकदेश संस्कारोंमें बच्चेको कहा जा रहा होता है कि- ' अश्मा भव । लाया है,। , पराभव इत्यादि; क्या बच्चा उनके समान हो रहा होता है? श्राप भी जब किसी के दिया है । विवाह - संस्कारके ग्राचार्यं वनकर जाते हैं; तब वह सस्करणीय पुरुष प्रागेव क्या उनके मन्त्रोंको समझ सकता है? वा समझता है? कभी नहीं; रखवादिनि आप लोग ही तो मन्त्रोंको वोलते हो; वा उससे बुलवाते हो तब स्त्रीके नेक प्रमा विषय में भी क्यों नहीं समझ सकते? आप लोग फिर हिन्दीमें व्याख्यान नहीं केवल क्यों करते हो -- इसीसे तो स्पष्ट हो रहा है कि - संस्करणीयोंको उनका है उसमें ज्ञान नहीं है । सो जिस न्यायसे श्राप उन पुरुषोंसे ' गृभ्णामि ते सौभगत्वाय ' यज्ञोप हस्त ' आदि मन्त्र बुलवाते हो; वैसे ही स्त्रीके विषय में भी क्यों नहीं विरहित ज समझ सकते? क्यों अपने वा दूसरोंकी सिर- खप्पन करते हो? सो दफाश वेदका ज्ञान भी शब्दों द्वारा होगा । तब वह उपालम्भ कैसा? सो यहाँ हम अ इससे क्या सिद्ध करना चाहते हो? अपवाद वचनोंसे स्त्री भी यदि, पाप जा ऋत्विक् आदिको सहायतासे स्वविषयक मन्त्र बोलती जाने; तो इससे भ ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' प्रादिके कारण हमारे पक्षकी कुछ भी क्षति नहीं । धान क मन्त्र तो वेदमें पशु - संम्बन्धी भी प्राते हैं, सो पशु तो उक्त मन्त्रोंको न बोल इससे सकता है, और न जान सकता है, उसका स्वामी उससे उन कर्तव्योंका ना है कि पालन करा लेगा; वैसे स्त्रीके विषय में भी जान ले । इससे तुम्हारा पक्ष कभी स कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता । ही वा उ यह जो बादी लिखता है कि -- स्मृतियों में उनके वेदविरुद्ध वचन शालाका समय - समय पर प्रक्षिप्त होते रहे हैं; यह तो आपका कथनमात्र है । यते इ आपने वेद उसे समझ रखा है, जो दयानन्दी अर्थ होता है । सो महाशय, आगे क
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८१५ [ ८२६ ] श्रयं भले ही दयानन्दी सम्प्रदायका; पर उससे सिद्धान्त नमें उसे दानन्दी वह तो वैयक्तिक वात वा साम्प्रदायिक बात ही केवल हाशय नहीं बन पाता, वह ' साध्य ' वात होती है, ' सिद्ध ' नहीं; तब हम भी प्रयोग- सती है । अतएव बातको कैसे मानें? आपने जिन स्मृतिपद्योंको एकदेशकी प्रक्षिप्त गया । व है हमने उसका पूरा समाधान करके आपके पक्षको काट शुभव छाया, किसी के दिया है । धागे बादी लिखता है - ' गोधा, घोषा श्रादि सैकड़ों ऋषिकाएं एवं य पुरुष थीं । रामायण - महाभारत में भी स्त्रियोंके वेदाध्ययन आदि के नहीं; स्वादिनियाँ वस्त्रीके नेक प्रमाण प्राप्त होते हैं, हम उन सबका समाधान कर चुके हैं । व्याख्यान रद्दी केवल जनवचन करके जनताकी दृष्टिमें धूल झोंकनेका प्रादती उनका उसमें अन्य कुछ सार नहीं । भगत्वाय ' धज्ञोपवीत - मार्गेण ' आदि के झूठे बनावटी प्रयं करके वादी अनुसन्धान-क्यों नहीं रहत जनताको प्रभावित करता रहता है, पर अन्तमें असत्यका ? सो शंकाश ही तो होगा । वादी समझता है कि- मैं ही सब कुछ हूं, विद्वान् सो यहां हम अप्रतिम हैं - यह सब कहने की भी यदि पाप जो कुछ कहते जाओगे; वह तो इससे हल्ली प्रभी आपसे बहुत दूर है ' । नहीं । वाधान कर चुके हैं । ऋषिकाओं को न बोल बातें हैं; आप यह न समझ रखे वेदवाक्य हो जावेगा । महाशय; वेदवती, भारती प्रादिका हम पूरा प्रतर्कित मन्त्रविशेष प्रतिभात हो इससे यह सर्वसाधारणका अधिकार नहीं हो सकता । वेदवनीका जो तंव्योंका लिखा है कि वह जन्मते समय स्वयं वेदमन्त्र बोलने लग गई थी; तव द्वारा पक्ष भी सब लड़कियोंको बिना पढ़ाये ' वेदवती ' बनने दीजिये । क्या दीवा उनके सम्प्रदायी उनके लिए जनतासे घन - संग्रह करके उसे अपनी वचन ' शालाका चन्दा ' बनाने में लगे हुए हैं । ' निरस्त - पादपे देशे एरण्डोपि मात्र है । मायते ' इस न्याय के पात्र मत बनें । महाशय, श्रागे वादीने ' सनातनधर्यं दिग्दर्शन ' पृ. १८६ से एक दादूपन्थी साधुका सिद्धान्तका प्रतिपादन [ ८२७ वचन दिया है कि- ' स्त्रियोंकेलिए केवल चार वेदोंका निषेध है; अन्य शास्त्रोंके पढ़नेका अधिकार शास्त्रोंने दिया है । तव वादी भी स.व.का यह सिद्धान्त यदि मान लेता; तो हमें क्यों इतना परिश्रम करना पड़ता । पं. ज्वालाप्रसादजीकी भी बात दयानन्द - तिमिर-भास्कर में लिखी मान लो कि पतिके संनिधिमें विवाह - संस्कारके अर्थ ( लिए ) तथा कहीं यज्ञमें मन्त्र बोलनेकी विधि है; तो ऋत्विक् कहला देते हैं, कुछ पढ़ने की विधि नहीं ' ( पृ. ४२ ) यह बात वादी उनकी भी मान लेता; तो हमें यह परिश्रम करनेकी श्रावश्यकता न पड़ती । श्रागेवादी पं. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी की उक्ति देता है - ' युगान्तरे ब्रह्मवादित्र्यः स्त्रियः सन्ति ' वादीको पता ही नहीं, वह किसका वाक्य है । यह तो वालमनोरमाकी टीका है । वे उस टीकाके निर्माता नहीं, किन्तु सम्पादक हैं । सो यहाँ युगान्तरसे कल्पारम्भका तात्पर्य है; सो इस समय उसकी कर्तव्यता सिद्ध नहीं हो जाती । अन्त में वादीने पं. मदनमोहन मालवीयकी अध्यक्षतामें एक दयानन्दन - लड़कीको वेदमव्यमामें हिन्दु- विश्वविद्यालय में प्रविष्ट करनेमें उनकी उदारता बताई है । यह श्रीमालवीयजी उन दिनों अन्तिम शय्यापर पड़े थे; तव दानन्दियों द्वारा प्रान्दोलन की धमकी दिखलाकर उनसे वचन ले लिया गया; वह यह था - यह शास्त्रज्ञा थोड़े ही हो जावेगी! वहां अंग्रेजी पढ़े - लिखे ही तो भरे हुए हैं; जिन्हें शास्त्रीय ज्ञान उतना नहीं । और यह परीक्षाविशेष में लड़कियोंका कई विशेष शब्द की तैयारी कर लेना यह ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. २११७३ ) न होने से वैध - वेदाध्ययन नहीं हो जाता । फलतः स्त्रियोंको शास्त्रानुसार क्रमिक एवं वेदाध्ययनका अधिकार नहीं; यह हमने प्राचीन शास्त्रोंके वचनोंसे सिद्ध कर दिया है, और वादीकी जनवञ्चनाएं तथा छल दिखलाकर जहाँ उसने पूर्वापर
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८२८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रकरणों को छिपाकर अपना पक्ष सिद्ध करना चाहा था, हमने उसका पूरा रहस्यभेद ( पर्दाफाश ) कर दिया है । आशा है- ' आलोक ' के विद्वान् पाठकोंने वह स्वयं अनुभव किया है । यहां हमने प्रतिपक्षीका अक्षर-अक्षर युक्ति एव प्रमाणोंसे निराकरण कर दिया है । प्रतिपक्षोंको पुस्तक समाप्त हो जानेसे हम भी इस युक्ति - प्रमाणोंसे युक्त अपने महानिबन्धको समाप्त करते हैं । हम विद्वान्- पाठकोंको प्रेरित करते हैं कि वे इस पुस्तकका सम्यक्तया अवगाहन करके स.ध. के पक्षका पूरा ज्ञान कर लें । सूचना - आर्यसमाज में इस विषयकी यही २३६ पृष्ठकी प्रमुख पुस्तक है; जिसमें २०-२५ ट्रॅक्टोंका सङ्कलन है, सो उसका निराकरण हो जानेसे ' गर्भिणीहनने गर्भहननवत् ' उसके पिछलगुआन- दयानन्दियोंके छोटे - मोटे सभी ट्रैक्टोंका भी निराकरण हो गया । इस पुस्तकमें वादीने पुनरुक्ति बहुत की हैं; अतः हमें भी उसका प्रत्युत्तर देने के लिए ही कई बाते फिर पुनरुक्त करनी पड़ीं; पर आगे किसीको इससे अधिक नई सामग्री अन्य पुस्तक से नहीं मिल सकेगी । क्योंकि इसमें उक्त पुस्तक प्रणेताने छोटे - मोटे बीसों - ट्रैक्टों का सग्रह अपने ढग से किया था । म.म, पं. शिवदत्तजी, तथा तर्करत्नजी आदि विशेष तथाकथित सनातनधर्मी विद्वानोंने जो भ्रमसे कई गलत बातें लिखी थीं; हमने उनका भी पूरा समाधान इसमें कर दिया है । हम पाठकों को प्र ेरित करते हैं- इस पुस्तकको पूरा पढ़ें; इसे आपततः न देखें; ऐसा करनेपर उन्हें इस विषयकी कोई भी शङ्का तथा कोई भी भ्रम प्रवशिष्ट नहीं रह जावेगा । इसमें हमारा वैयक्तिक मत कुछ नहीं; सब शास्त्रका मत ही दिया है, केवल उन शास्त्रीय वचनोंको हमने यथास्थान फिट अवश्य किया है, यदि इस विषयकी कोई वादियोंकी अन्य पुस्तक पाठकों को मिले; तो उसे वह हमारे पास भेज दें; हम उसपर भी समीक्षा कर अन्तिम वक्तव्य [ ८२६ ८३० देंगे । यहाँपर हमने प्रतिपक्षीके पूर्वापर छिपाने के सन्दर्भ किये हैं, इससे अनुभवी समझ जायेंगे कि यह लोग कितने पानी बहुत प्रस्तु में हैं । स्त्रियोंके विषयमें हमारी निजी कोई हीन भावना नहीं है, शास्त्रोंने जो कुछ लिखा है; हमने उन वचनों को यथास्थान फिट कर दिया है । स्वाभाविक बातमें किसीके विषय में हीन भावना नहीं होती । जो प्रा यदि इस विषयकी प्रतिपक्षियों की कोई अन्य पुस्तक मिले तो वि वह उसे हमारे पास भेज दें । हम उसका समाधान कर देंगे, क्योंकि यह लोग पूर्वापर छिपाकर अपना पक्ष रखते हैं; अतः उनका निराकरण और कुछ महाशय कठिन नहीं होता । इस पुस्तकमें इस विषयकी दयानन्दी २०-२५ गर्दभ - म पुस्तकों की हमने पूरी आलोचना युक्ति - प्रमाणसे कर दी है । थी, पर इस विषयका पूरा विस्तीर्ण शास्त्रार्थं हमने ' सिद्धान्त ' ( साप्ताहिक वाराणसी चैत्र कृ. ८ सं. २००२ से सं. २००५ तक ) में दिया था । य बाते हैं प्रतिपक्षीने अपनी वही बातें जिनको हमने अच्छी तरह काट दिया था इस पुस्तक में भी बिना काटे रखदी हैं, सो प्रतिपक्षियों को मोह न रहे कि हमारी मेरी भा पुस्तकका उत्तर नहीं दिया गया- हमने उसका पुनः सस्कार कर दिया हुए लि है । वह ' सिद्धान्त ' का पूरा शास्त्रार्थ सनातनधर्मी शास्त्रार्थं - महारथियोंको जो संस भी इतना पसन्द आया कि उन्होंने अपनी पुस्तकोंमें संक्षेपते उसे उद्धृत कर लिया था । इससे हमें प्रसन्नता हो हुई, कोई नाराजगी नहीं प्रकाश धोर कि उसमें हमारा नाम नहीं दिया गया । हम नाम नहीं चाहते हैं; काम सम्मिलि चाहते हैं । अस्तु! हम विद्वान - पाठकों का भी धन्यवाद करते हैं कि-हमारी ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - ग्रन्थमाला को बहुत पसन्द करते हैं । स्वतः इन आई, विना प्रेरणाके भेजी हुई सम्मतियों ( हार्दिक भावों ) के प्रेषकोंको कृतज्ञता तथा ‘ ग्रालोक ’ ग्रन्थमालाके प्रकाशनमें सहायता देनेवालोंको भी प्रतिशक्ति पण्डित ; जो यह करके स.ध. के प्रचार में सहायक सिद्ध होते रहे हैं । भी किया धन्यवाद वे बीका लिखा ग
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[ ८२ ९ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८३० ] प्रस्तुत अन्तमें सम्मति शास्त्रोने Paratfare वेदाध्ययन ' इस अपनी पुस्तककेलिए कई पुरुषोंकी दिया है । दयानन्दी हैं- सम्मति भी छापी हैं । इसमें उन्होंने– ' उष्ट्राणां जो प्राय: गीतं गायन्ति गर्दभाः । परस्परं प्रशंसन्ति ग्रहो रूप-विवाहेषु तो वह ध्वनि! ' ( ऊंटों के विवाहों में गधा महाशय अपना गाना गाते हैं, यह लोग और परस्परकी प्रशंसा भी करते हैं - गधा साहव कहते हैं कि - ऊंट-करण कुछ का कैसा बढिया रूप है? और ऊंट साहब कहते हैं कि – वाह!! महाशय २०-२५ गर्दभ - महाशय का कैसा सुरीला गाना है! यह नीति उनने अपनानी हो थी, पर उसपर श्रीशाण्डिल्यजीकी भी सम्मति छापी गई है । नाप्ताहिक यद्यपि वे भी कन्याओंके उपनयनके पक्ष वाले तथा सुधारक- विचारों-या था । बाते हैं- दयानन्दियों के पक्षपाती हैं उन्होंने स्वयं " श्रीस्वा.द.जीके प्रति ा था इन मेरी भावना " यह निबन्ध ' सार्वदेशिक ' ( ३८ १० ) पृ. ४७२ में लिखते क - हमारी हुए लिखा है – ' जब में विद्याके योग्य बना, तव मुलतानके प्रायसमाजने कर दिया जो संस्कृत विद्यालय खोल रखा था, उसमें मैं प्रविष्ट हुआ । समाजने रथियोंको उदधृत मुझे शास्त्री तक पढ़ाया- कोई फीस नहीं ली विद्याध्ययनसे मुझे भी जगी नहीं प्रकाश मिला । सनातनधर्मी होते हुए भी मेरी सद्भावना श्रार्यसमाजकी हैं; काम घोर झुकी । तब मैं शास्त्राथोंमें इन्हीं [ श्रार्यसमाजियों ] के पक्ष में हैं कि वे सम्मिलित होता था । हैं । स्वतः इनसे स्पष्ट है कि - श्रीशाण्डिल्यजी सनातनधर्मी होते हुए भी - प्रेयकोंको कृतज्ञता के नाते श्रार्यसमाजी- पक्षके हो गये, ( यद्यपि वहाँपर पढ़ानेवाले. प्रतिशक्ति पण्डित सनातनधर्मी ही थे । ) तथापि श्रीशाण्डिल्यजीकी सम्मतिपर विचार रहे हैं । भी किया जाता है । वे लिखते हैं — मैंने ' स्त्रियोंका वेदाधिकार ' नामक सिद्धान्तालङ्कार-वीका ग्रन्थ पढ़ा । यह ग्रन्थ एक देवाको वेद पढ़ानेपर रोक लगानेपर लिखा गया है ' । अन्तिम सम्मतिकी श्रालोचना [ ८३१ दूसरा - भारतविख्यात पं. दीनानाथजी शास्त्री विद्यावागीश - द्वारा प्रदर्शित प्रौढ़ - प्रतिपक्ष युक्तियोंकी कसौटीके संघर्षसे मजकर तैयार है । अतः इस सोनेके खरा होने में कोई सन्देह नहीं । केवल एक स्थानमें हुआ थोड़ा प्रौढिवादसे काम लिया है ' । इसपर मैं श्रीशाण्डिल्यजीको सूचित करता हूं कि प्रापकी इस सम्मतिका कुछ भी महत्त्व नहीं है, जबकि आपने मेरे महालेखका एक अक्षर भी ' सिद्धान्त ' में प्रवधान से नहीं देखा । इधर प्राप स्वयं भी उस पक्षके हैं, और वादी- महाशय आपके गुरुकुली शिष्य भी हैं; तब आपकी सम्मति और भी अपना महत्त्व खो देती है । पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ- यदि आप मेरा सम्पूर्ण महालेख तटस्य दृष्टिसे देखते; तथा अपने पक्षको पक्षपातिनी दृष्टि न रखकर निष्पक्ष दृष्टिसे देखते; दोनों पुस्तकों की तुलना करते; तब आपको प्रतिपक्षीका प्रौढिवाद स्थान - स्थानपर दीखता; और उसका सोना ' खोटा ' मालूम होता, और उसमें आपको पता लगता कि प्रतिपक्षीकी पुस्तक में स्थान - स्थान पर पूर्वोत्तर - प्रकरणका अपलाप तथा प्रथमें छल स्पष्ट दीखता । प्रागे शाण्डिल्यजी लिखते हैं- मैं पं. दीनानाथजी की विद्वत्ताका भी कायल हूं, परन्तु ईश्वरीय ज्ञान वेदपर परिगणित द्विजों और उनमें भी केवल पुरुषोंके ही अधिकारको स्थिर करना मैं कदापि न्यायसङ्गत नहीं मानता हूँ । अतः मैं भी इस ग्रन्थका पोषक हूं । मेरे विचारमें तो ईश्वरीय-ज्ञान वेदपर प्रतिबन्ध लगाना कि - पुरुष पढ़े, स्त्री न पढ़े, मानो सूर्यके प्रकाशपर प्रतिवन्ध लगाना है कि वह अमुक घर में प्रकाश दे, और अमुक न दे ' । ' आलोक'- पाठकोंने देख लिया होगा कि पं. जीने उक्त बात वेद एवं धर्मशास्त्रोंके प्रमाणसे नहीं लिखी, किन्तु वेदशास्त्रविरुद्ध तर्कका अवलम्बन किया है । यही तर्क पं. जीके हृदय में उत्कीर्ण है; जिससे वे वेद तथा
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८३२ ] श्रीसनातनधमालोकः ( ३-२ ) धर्मशास्त्रोंके वचनोंकी पर्वाह नहीं करते हैं । प्रतीत होता है कि वे इस तर्कको अकाट्य समझे हुए हैं । केवल तर्कपर निर्भर रहना विद्वानों के लिए समुचित नहीं । तभी उन्होंने उक्त पुस्तकपर अनुमोदक सम्मति दी है । वास्तव में यह उनका तर्क ' यत् पुनरनुमानं ( तर्क ) प्रत्यक्ष- आगम-विरुद्धम् न्यायाभासः सः ' ( न्यायद. वात्स्या. भा. १।१।१ ) श्रागमसे विरुद्ध होनेसे ' तर्काभास ' ही है । जब तर्कशास्त्र भी न्याय, आगम - विरुद्ध तर्कको प्रमाण नहीं मानता; जैसेकि – ' प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्य अन्वीक्षणम् अन्वीक्षा । तया प्रवर्तते-इति आन्वीक्षिकी- न्यायविद्या- न्यायशास्त्रम् ' ( १११११ ) ( जो तर्क प्रत्यक्ष-और भागमसे विरुद्ध है, वह न्याय न होकर न्यायाभास ही होता है । तब आपने इसमें निष्प्रमाण तर्क कैसे दे डाला? जबकि ' वेदमाता प्रचोदवन्तां पावमानी द्विजानाम् ' ( श्र. १ ९ / ७१ १ ) इस प्रकार वेद अपना अधिकार द्विज - पुरुषोंको देता है । तब स्त्री - शूद्रादिको प्राप वेदका अधिकार कैसे दे सकते हैं? औौर जोकि आपने इस मन्त्रके अर्थ वदलनेकी चेष्टा की है-यह भी ठीक नहीं । इस विषय में पृ. ५७६-५६२ में देखिये । आप ' योनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्व-माक्षु गच्छति मान्वयः ' ( मनु. २।१६८ ) ' न तिष्ठति तु यः पूर्वं नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवद् वहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ' ( मनु. २।१०३ ) ' शूद्रेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ' ( मनु. २।१७२ ) इन वादिप्रतिवादिमान्य मनुपद्योंको प्रक्षिप्त मानते हैं । इनमें कहा है कि- जो द्विज होकर वेदको नहीं पढ़ता, वह जीता हुआ ही शूद्र - जैसा है । जो द्विज प्रातः - सायंकी सन्ध्या नहीं करता; उसे शूद्रकी भाति सब द्विज - कर्मोंसे बाहर कर दो, जब तक वह जनेऊ नहीं प्राप्त करता; तब तक वह शूद्रके समान है । इन्हीं वेदानुसारी वादिप्रतिवादिमान्य स्मार्त-पद्योंसे ही सिद्ध हो रहा है कि - शूद्रोंको द्विजकर्म वेदादिका अधिकार नहीं है । तव आप मनु आदि स्मृतिकारोंको- जिन्होंने उक्त वेदमन्त्रका ही वेदाधिकार सूर्यसे उपमित नहीं हो सकता [ ८३३ ८३४ ] भाष्य किया -क्या वेदानभिज्ञ मानते हैं, जिन्होंने शूद्रको माना है? इसी प्रकार स्त्रियोंका भी द्विजत्वापादक उपनयन वेदानधिकृत श्री धूम होनेसे मुख्य द्विजत्व न होनेसे उनका भी सर्वसाधारणता से साक्षात् न सदोष क वैध अधिकार नहीं है । क्रमिक एवं नाप्नोति ब्राह्मणा श्रीशाण्डिल्यजीने वेदके अधिकारको सूर्यप्रकाश के अधिकारसे को पढ़ने किया है; यह हृष्टान्त भी उनका विषम है । सूर्यके प्रकाश के उपमित इध यज्ञोपवीत अनिवार्य नहीं होता; श्रध्ययन तथा श्राचार्यकरण भी अनिवार्य प्राप्त्यर्थ पक्षियोंक नहीं होता । परन्तु बेदकी प्राप्ति के लिए प्राचार्यकरण तथा उपनयन एवं अधिकार वेदका अध्ययन अनिवार्य होता है । शास्त्र स्त्री एवं शूद्रको तो अपने स्वामीको प्राप्त्यर्थ सेवासे अतिरिक्त अध्ययनादिकी श्राजा नहीं देते । उनका साक्षात् उपनयन श्रीसूर्य एवं ब्रह्मचर्याश्रम भी नहीं होता । तब उनका वेदाधिकार कैसे हो नहीं है । सकता है? है । पर शास्त्रोंमें अपने वर्णधर्मका प्राचरण करनेपर बहुत बल दिया गया तब उन्हें है । मनुजीने कहा है- ' वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः यदि ( १०/१७ ) ( ( 1 पता धर्म अन्य धर्मसे हीन होनेपर भी श्रेष्ठ है । प्रकाश भ दूसरेका उन्नत भी धर्म अपने लिए उचित नहीं । श्रायुका उसका ' भगवद्गीता ' में भी इसीपर बल दिया गया है । ' परिचर्यात्मकं कर्म नहीं कर शूद्रस्यापि स्वभावजम् ' ( १८१४४ ) ' स्वे- स्वे कर्मण्यभिरतः तंसिद्धि लभते नहीं पा नर: ' ( ४५ ) ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ' ( ४६ ) बल्कि इस जन्म भगवान् ने सहजधर्म के सदोष होनेपर भी उसका त्याग दृष्टान्त सहित निषिद्ध किया है । देखिये- आप देता । जी ( ' सहजं कर्म कौन्तेय! सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवादृताः ' ( १८।४८ ) ( स्वाभाविक कर्मो के दोषयुक्त होनेपर पत्यु ' श श्रापको भी उसे नहीं छोड़ना चाहिये । दोष किस कर्म में नहीं होता? अग्निमें खा.द.जी स ० घ ० ५३ समाज श्र
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८३३ २३४ ] होता ही है । इसलिए भगवान्ने यहाँतक कहा है कि- स्वाभाविक. धिकृत श्री घूम करते हुए भी पाप नहीं होता । - ' स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् आतून दोष कर्म किल्विषम् ' ( १८७४ ) तब शूद्रको स्वधर्म ' सेवा ' ही कर्तव्य है नक एवं नाप्नोति वेदाध्ययनादि उसका कर्तव्य नहीं । तब वेदका मनुष्य, | ब्राह्मणादिवर्णधर्म दृष्टान्त ' विषम उपन्यास ' सिद्ध हुआ । मात्र-को पढ़ने में सूर्यका उपमित इधर सूर्यादिका प्रकाश पशु - पक्षियोंकेलिए भी है, परन्तु वेद पशु-नाप्त्यर्थ लिए नहीं । जब ऐसा है, तब मनुष्यमात्रकेलिए वेदाध्ययन के निवार्य पक्षियोंके देनेमें सूर्यका दृष्टान्त विषम सिद्ध हुआ । इधर सूर्यप्रकाश-एवं प्राप्त्यर्थं अधिकार यज्ञोपवीत सर्वथा अनावश्यक होता है; अन्यथा पशु - पक्षियों को चामीकी | श्री सूर्यप्रकाश प्राप्त करने के लिए यज्ञोपवीत पहनना पड़े; परन्तु ऐसा उपनयन नहीं है । वेदके अधिकार प्राप्त्यर्थं तो यज्ञोपवीत सर्वथा अनिवार्य होता है । परन्तु कोई भी शास्त्र स्त्री - शूद्रोंको उपनयनका अधिकार नहीं देता; तब उन्हें वेद देने के लिए सूर्यका दृष्टान्त भी ठीक नहीं । ना गया यदि आप सूर्यका दृष्टान्त यहां ठीक मानते हैं; तव क्या उसका पुष्ठितः प्रकाश भी सबको तुल्यता से मिलता हैं? कालकोठरीमें रहनेवाला सारी ष्ठ है । श्रायुका कैदी सूर्यके प्रकाशको प्राप्त नहीं कर सकता । जन्मान्ध भी उतका उपयोग नहीं कर सकता । उल्लू भी सारी आयु उसका उपयोग कर्म नहीं कर सकता । सदा हिमाच्छन्न प्रदेशका रहनेवाला भी उसका प्रकाश लभते नहीं पा सकता । यदि ऐसा है; तो पूर्वजन्मोंके दुष्कर्मोसे अपराधी शूद्र भी बल्कि इस जन्म में वेदका अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता । सहित आप लोग तो शूद्रको द्विजत्वाधिकार भी देते हैं; परन्तु वेद नहीं दोषेण देता । जैसा कि - ' न यो ररे श्रार्यं नाम दस्यवे ' ( ऋः १०।४६।३ ) यहाँपर होनेपर ' दत्यु ' शब्द त्रैवर्णिकेतरकेलिए है । उसे परमात्मा ' आर्य ' नाम नहीं देता । अग्निमें धापको यह मत सौंपनेवाले ( जैसा कि - ' सार्वदेशिक ' ( ३८।१० ) में ' श्री | स्वा.द.जीके प्रति मेरी भावना ' में श्रीशाण्डिल्यजी ने अपना झुकाव आर्य-समाज श्रीस्वा.द. जीके मिशन की ओर होना - स्वयं माना है ) स्वा. द. जीने शूद्र- शरीर वैदिक - अधिकारमें प्रतिबन्धक है [ ८३५ भी स. प्र. में लिखा है- ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विजोंका शूद्रका नाम श्रनायं है । जब वेद ऐसे कहता नाम श्रायं और कपोलकल्पितको है, तो दूसरे विदेशियोंके वुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते ' ( अष्टम समु. १४० ) यहाँ स्वा.द.जीने ब्राह्मणादिको द्विज एव श्रार्य ' द्विज ' न कहकर अनायं ही लिखा है कहा है, पर शूद्रको ' दस्यु ' है ' ( स.प्र. ११ समु. पृ. १७२ । प्रायोंसे भिन्न मनुष्यों का नाम ) । श्रथर्ववेदसं. में लिखा है — ' यो दासं वर्णमघरं गुहाकः ' वहाँपर वेदने शूद्र ( दास ) को गुहा ( २० | ३४ | ४ ) ( निम्नता ) में डालना कहा है । यह पक्षपात भी नहीं है । मुख्याध्यापक यदि उच्च श्रेणीवालोंको स्वयं है. निम्न श्रेणीवालोंको स्वयं नहीं पढ़ाता, किन्तु उच्च पढ़ाता प्राज्ञा देता है कि तुम लोग मेरी ही बात अपने सुगम - शब्दोंमें श्रेणीवालोंको ही श्रेणीवालोंको समझा दो, तो यह स्वाभाविकता इन निम्न-है, पक्षपात नहीं । इसीलिए निम्न श्रेणी शूद्रोंका पुराण श्रवणमें ही अधिकार है, सीधा वेदाध्ययनमें नहीं । परमात्माने एक कश्मीर देश भी बनाया है, मारवाड़ भी । एकमें सघन छाया होती है, सुन्दर जल प्रचुरमात्रामें होता है, दूसरेमें छाया-जलादि नहीं होता, वा न्यूनमात्रामें होता है । किसी देशमें तीव्र शीत होता है, और अन्यत्र भीष्म - ग्रीष्म । तब क्या यहाँ परमात्माका पक्षपात माना जावेगा? ऐसा नहीं, हमारे देशमें सघन पर्वत नहीं दिये, कहीं हिमाच्छन्न भूमिमें पशु - पक्षी नहीं दिये । जब देश, काल तथा ऋतुस्रोंमें तथा परमात्मरचित सृष्टिमें सर्वत्र पूर्वजन्म के कर्मके अनुसार वैषम्य है, कोई वस्तु किसीको मिली है; किसीको कोई नहीं मिली हुई है । इसमें कारण पूर्वजन्म के कर्मोंका है; तव वेद - विषय में भी पूर्वजन्मके निकृष्ट-कर्मों के कारण शूद्र भी अधिकृत नही किया गया । शूद्र - शरीर वैदिक-अधिकारमें प्रतिबन्धक हुआ करता है ।
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८३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्त्रीको भी विवाह तथा यज्ञादिमें स्वमात्रनियत कई मन्त्रविशेषों को जिनमें स्त्रीलिङ्गका निर्देश होता है, पति आदिकी सहायतासे उच्चारण कहा है, पर क्रमिक एवं वंघ सम्पूर्ण स्वाध्यायविधिमें उसके भी मुख्य द्विजत्व न होनेसे उपनयनाऽभाववश पूर्ण - वेदमें उनका वैध अधिकार नहीं होता । उसको तो अपने पतिकी सेवा में अधिकृत किया गया है । फलतः इस सम्मति से भी प्रतिपक्षीका पक्ष सिद्ध न हो सका । एतदर्थं हमें उससे सहानुभूति है । शिवपुराणादिमें भी ' नाधिकारः स्वतो नार्या, नियोगाद् भर्तुरस्ति हि ' पतिकी आज्ञासे स्त्रीको कई कार्य करने पड़ते हैं । जोकि दुर्वासा मुनिने कई मन्त्र कुन्तीको दिये थे; उसका कारण उसमें आपद्धर्म है । जैसेकि महाभारतमें ही स्वयं कहा है- ' तस्यै वे प्रददौ मन्त्रम् श्रापद्धमांन्ववेक्षया 1 अभिचाराभिसंयुक्तम् अब्रवीच्चैव तां मुनिः । यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणा-वाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रभावेण तव पुत्रो भविष्यति ' ( महा. १।१११ । ६-७ ) अर्थात् पाण्डुके शापवश सन्तान प्रतिबन्धवाली दशा में विचार करके दुर्वासा मुनिने वशीकरणादि अभिचारोंसे युक्त मन्त्रविशेष दिये । सर्वसाधारणता से नहीं । इस प्रकार हमने इस विषयका सर्वाङ्गीण पुस्तक ' आलोक ' पाठकोंको समर्पित किया है, इससे उनकी एतद्विषयक प्रान्तियाँ दूर होंगी । यह हमें पूर्ण विश्वास है । इतना परिश्रम करनेपर भी कई प्रावश्यक बातें छूट गई हैं, हम उनमें कुछका संग्रह करते हैं । ' आलोक ' पाठक इधर ध्यान दें । निघण्टु ( १११४ ) में ' ब्रघ्न ' का अर्थ ' अश्व ' है, देखो स्वा.द.से प्रकाशित ' निघं. ' की ' शब्दानुक्रमणिका ' ( पृ. ४८ ) परन्तु वादीके स्वामीने स.प्र. के म समु ( पृ. १४३ ) में इसका अर्थ ' सूर्य ' तथा ' परमात्मा ' किया है, बल्कि ऋभाभू. के १०० वें पृष्ठ में ' ब्रघ्न ' का निघष्ठुके अनुसार इन्द्राणी की वेदमें उपमा [ ८३७ ८३५ ' अश्व ' अर्थ करनेवाले ' मैक्समूलर ' को डांट बताई है, देखो ' ( ८ ) पृ. १७२-७३ में ) इससे सिद्ध है कि यह निघण्टु अनुसारी आलोक'- प्रपोलो ग्राह्य है । इस प्रकार यहाँ भी समझें कि ' निघण्टु ' केवल ' शची भी ' श्र प्रातःक अथ बताता है, उसका तो बहुवचनमें भी प्रयोग होता है । पर ' पौलोमी का इष्ट ह शची ' का नहीं है । श्श्रुतः वादीकी की हुई सफाईने ही वादी पक्ष प्रसाम काट दिया । फिर वादी लिखता है - ' यदि इन्द्राणीका हो; तो भी उसकी बुध्यमाना उषसः प्रतिजागरासि ' इन्द्राणी बननेका उपदेश है । ( उत्तर ) वादी एक विचित्र देवता इन्द्राणीका भी वर्णन अपने इन्द्राणीको प्रसिद्ध उपमा वादीके स्त्री इन्द्राणी देवता ' वैदिक ' सिद्ध पत्नी प्रकरण में व्याख्यात किया है मन्त्र म शास्त्रीजीका आग्रह पौराणिक देवता कि तरह प्रत्येक स्त्रीको ' इन्द्राणीव सुबुधा उ ( अथर्व. १ ९ / २ / ३१ ) इस प्रकार उषःकाल बादी व्यक्ति है । यहाँपर वादीने पौराणिक उनमें ब वेदमें मान लिया । जब ' इन्द्राणी ' इस इनके फ मतमें वेद दे रहा है, तो वह इन्द्रकी हम हो गई, जिसे निरुक्तकार ने भी देव-सिद्ध कि । तव वादी उसे ' पौराणिक ' देवी कैसे बोले कह रहा है? कदाचित् वादी पुराणोंको स.ध. की भान्ति वेदसे पूर्व कि इस मानता हो; क्योंकि - वेद में ' धर्म पुराणमनुपालयन्ती ' ( श्र. १ ८ | ३ | १ ) ' पुराणं यजुषा सह ' ( प्र. ११।७।२४ ) श्रादिमें वेदको भी पौराणिकता इसपर व है । यदि ऐसा है; तो आइये पुराणोंकी शरण में । वादी सदा वहाँ वध ' पौराणिक ' कहता है । तब आप ' अर्वाचीन विचारवाले ' तथा प्रवेदिक उसका सिद्ध हो गये । पाठ महाशय! उपमामें उपमान के सारे धर्म इष्ट नहीं होते । शची जिस गो श्रादि देवता तो जन्मसे विदुषी होती हैं । जैसे भैंसका शिशु जन्मसे ही फेंकता ह नदी में तैरने वाला होता है, पर मानुषियों में यह विषम है । ' वादीका चन्द्रको स्वार्थप्रव भान्ति मुख है ' में मुखकी चन्द्रमामें श्राह्लादकतामात्रमें समानता है । यह कर रहे नहीं कि - वादीका मुख भी चन्द्रमा इतना बड़ा हो; श्रौर उसके मुखमें स्वविषय | ऋत्विक्
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८३७ ८३८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लोक- प्रपोलोपान के यात्री भी चढ़े हों । मन्त्रानुसार इन्द्राणी की तरह बघूका उठना इष्ट है- अन्य कुछ नहीं । यह मन्त्र भी सूर्या - देवता के लिए बीका प्रातःकाल है । इन्द्राणी तथा सूर्या देवता के उपमानोपमेयत्वमें कोई लोमी इष्ट नहीं उपस्थित होता । थोड़ी देरकेलिए मानुषी के लिए का पक्ष प्रसामञ्जस्य जावे; तो भी समझदारी मानुषीकी अपने अधिकारकी होगी उक्त मन्त्र माना, कि देवताके अधिकारकी । देवता सुवुधा उक्त मन्त्रमें तो ' इन्द्राणीव सुबुधा बुध्यमाना उषसः प्रति जागरासि ' प्रकार उप: काल ( प्रातः ) जाग जाना कहा है; इस अर्थ में हमारी हानि नहीं । वादी वेद प्रथमें प्रक्षेप बहुत करता है; अपने साम्प्रदायिक सिद्धान्तोंको राणिक उनमें बलात् स देता है । बेचारी संस्कृतानभिज्ञ जनता इस प्रकार इनके फदेमें जा फमनी है । इस इन्द्रकी हमने गोभिलके सुत्रका तथा स्वाद प्रादि तथा मनु के वचन देकर देव- सिद्ध किया था कि- ' स्वयं जपेद् अजपन्त्याम् ' ( गोभि. ) अर्थात् स्त्री न बी कैसे बोले; तो वर उक्त मन्त्रको पढ़े - इससे हमारा ही पक्ष सिद्ध होता था से पूर्व कि इस अवसर पर प्रतिनिधिवादसे काम लिया जा सकता है । पर ३ । १ ) इनपर वादी लिखता है - ' वस्तुतः ऐसा संस्कार विधिहीन हो जायगा । णिकता हमें वहाँ वधू द्वारा उच्चारणीय मन्त्रोंका वह स्वयं पाठ न करेगी; तो वैदिक उसका वह महत्त्व भी न रहेगा, यह स्पष्ट है ' । पाठकगण! ' यज्ञोपवीतिनीम् ' के अशुद्ध अर्थ करने के समय वादी शची जिस गोभिलको हृदयसे लगाये हुए था; अब उसी गोभिलको बह परे मह फेंकता है, उसे वेदानभिज्ञ सूचित करता है । इसीका नाम होता है । चन्द्रकी स्वार्थप्रवणता वा कृतघ्नता । महाशय! आचार्य गोभिल इसीसे तो सिद्ध । यह कर रहे हैं कि - स्त्रीको वेदका स्वतः अधिकार तो है नहीं, केवल मुखमें विविषयक उसके दो - चार क्वाचित्क मन्त्र यदि आ जाते हैं; तो उन्हें ऋत्विक् वा वर आदिके श्राश्रयसे बोल सकती है । वह न भी बोले, तो एकका कार्य दूसरा कर सकता है [ ८३६ इससे विधिभ्रंश कुछ भी नहीं । उसका कार्यनिर्वाहक विद्वान् पतितो बैठा ही हुआ है; उन मन्त्रोंको बोल देगा । स्त्रियोंमें लज्जा पुरुषसे चौगुनी होती है, देखिये प्रापके स्वा.द.से भी प्रमाणित ' चाणक्य - नीति ' । उसमें कहा है- ' स्त्रीणां द्विगुण प्राहारः लज्जा चापि चतुर्गुणा । साहसं षड्गुण चैव कामदचाप्ट - गुणः स्मृतः ' ( ३।१७ ) । निरुक्तकारने भी लिखा है - स्त्रियः " स्यायते रपत्र पण कर्मणः ' ( ३।२१।२ ) यहाँपर ' स्त्री ' यह नाम लज्जाके कारण माना गया है । ऐसी लज्जासे बहुत कामवाली भी वह एकान्तमें पतिसे कामसम्बन्धिनी बात नहीं कहती | तब विवाहके समारोहमें परपुरुषोंके सामने मुंह खोलकर बोलनेमें भला उसे संकोच क्यों न होगा? तब उसके मन्त्रको उसका प्रतिनिधि वर वा पुरोहित कह देगा । इसमें प्रयुक्तता क्या हुई? इसके अतिरिक्त प्रतिनिधि कर लेना है भी शास्त्रीय | देखिये वादी के स्वामी ही संस्कारविधि में यज्ञ के समय स्त्रीको पतिकी प्रोरसे श्राहुति डालना लिख गये हैं । देखिये उसके १० पृष्ठकी टिप्पणी । ' न्यायदर्शन ' में गुरुके बीमार आदि हो जानेपर गुरुका होम शिष्यको करना कहा है । देखिये- ' अशक्तो विप्रमुच्यते इति एतदपि नोपपद्यते । स्वयम् अशक्तस्य बाह्यां शक्तिमाह - ' प्रन्तेवासी वा जुहुयाद् ब्रह्मणा स परिक्रीतः श्रीरहोता वा जुहुयाद् धनेन स परिक्रीतः ( ४ | ११६० ) इसी कारण पुत्र भी मृतक-पिताका प्रतिनिधि बनकर उसका श्रौव्र्वदेहिक कर्म करता है । इस प्रकार यह समझ लेना चाहिये । इनसे प्रतिनिधिवाद शास्त्रीय है, वादीका पक्ष समाहित हो गया । ' प्रयज्ञो वा एष यद् प्रपत्नीकः ' ( तं. शरा ६ ) यह वादीसे उद्धृत कृष्णयजुर्वेदका वाक्य है । इसमें प्रष्टव्य है कि क्या वादी इस वाक्यको मानता है? यदि हां, तो बताइये कि स्त्री प्रतिमास रजस्वला होती है । तीन - चार दिन वह अशुद्ध वा अस्पृश्य रहती है । यह वादीके
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८४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्वामीजी भी मानते हैं । उन चार दिनों में वह यज्ञमें सम्मिलित नहीं होगी । यदि उसका यज्ञकी सभी विधियों में होना अनिवार्य है, तब प्रतिमास नियमपूर्वक ५-६ दिन यज्ञमें सर्वथा सम्मिलित न होनेसे विधि-व्यतिक्रमवश वह क्या पापभागिनी न होगी? इसी प्रकार गर्भिणी होने-पर, प्रसवके प्रासन्न समय में तथा प्रसवके ४० दिन तक स्राव श्रादिके कारण हानिकी प्राशङ्कासे स्नानादि न कर सकनेसे अशुद्ध होनेसे उसे यज्ञमें कोई विधि न करनी पड़ेगी । अब बादी कहे कि यह विधि-व्यतिक्रम होनेसे प्रत्यवायभागिनी होगी या नहीं? स.ध. के मत में इस अवसरपर कोई अव्यवस्था नहीं होती । स.ध. पतिका बहुस्त्रीविवाह भी मानता है । वेदका भी इसमें अनुग्रह है । हम दिङ्मात्र संकेत देते हैं— ' तत्र वयस्व यतमा प्रिया हे ' ( अथर्व १२ | ३ | १ ) यहाँपर ' यतमा ' में ' यद् ' शब्दसे उतमच् - प्रत्यय है, जो बहुतों में एकके निर्धारणमें होता है । अर्थात् - तू यजमान यज्ञमें बैठनेकेलिए बहुत - सी स्त्रियोंमें जो तुम्हें बहुत प्यारी हो, उस स्त्रीको बुला ले । कौशिकसूत्र ( ६०/३२ ) के अनुसार यज्ञके श्रासनमें बैठने के लिए अपनी प्रिय पत्नीको बुलाता है । मीमांसाद. ( ६।१।१७ ) के शाबरभाष्य में कहा है- ' यस्य हि द्वितीया पत्नी प्रस्ति । तत्र ऋत्वर्थान् एका करिष्यति ' ( जिसकी दूसरी स्त्री है, वहाँ यज्ञका कार्य एक स्त्री करेगी । ) इससे पतिका यज्ञ तो पूर्ण हो जावेगा, पर पत्नीको पतिसे पृथक् यज्ञका अधिकार न होनेसे जिस पत्नीको उस यज्ञमें नहीं बुलाया गया; वा प्रसवादिमें लगी हुई वा रजस्वला आदि स्त्रियां पृथक् यज्ञ कर ही नहीं सकेंगी । जैसाकि कुल्लूकभट्टने कहा है – ' यथा भर्तुः कस्याश्चित् पत्न्या रजोयोगादिना अनुपस्थितावपि पत्न्यन्तरेण यज्ञनिष्पत्तिः, तथा न स्त्रीणां भर्त्रा विना यज्ञसिद्धि: ' ( मनु. ५।१५५ ) ( भर्ताके किसी पत्नीके रजस्वला श्रादि होनेपर अनुपस्थित होनेपर भी उस भर्ताकी दूसरी अरजस्का स्त्रीसे यज्ञ सिद्ध हो जाता है ) परन्तु स्त्रियोंकी भर्ताके विना यज्ञसिद्धि नहीं होती । ) पत्नी के वियोग में भी पत्नीकी प्रतिमासे इसीसे सिद्ध पुरोहित वा ब्रह्मा कि- बह उपनीता न पतिकी अधीनता में भी वह कर सकती यज्ञ हो | ६४१ ४२ ] होता है कि - स्त्री किसी अन्य पुरुषके नहीं हो सकती । इससे यह भी सिद्ध यज्ञमें कभी होनसे अधीता नहीं होती हो जाता है । ( यज्ञ - य । यदि श्रधीता होती तो यत उसे यज्ञविधान न कहा जाता; किन्तु, थी । पर वैसा निषिद्ध होनेसे पतिकी स्वतन्त्रता से किया? ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो ' ( मनु. ५।१५५ ) उसका निर्वाह विद्वत्तासे हो बकार हो जाने से उपस्थित वह वेदादिकी स्पष्ट अधिकारिणी सिद्ध हो जाती है । वादी लोग बहुस्त्रीविवाहपक्ष मानते ही नहीं; तव पतिका यज्ञ विशेष-मरणमा वादियोंके मतमें कैसे पूर्ण होगा? या तो फिर वादीको ' अयज्ञो वा एप यद् अपत्नीक: ' इस अपने प्रिय प्रमाणको प्रमाण मानना पड़ेगा । अन्यको अप्रमाण मानने से पत्नीके बिना भी यज्ञ पूर्ण हो जाना माननेसे वादीके त मतसे रहा - सहा भी स्त्रीका यज्ञाधिकार भी खण्डित हो जायगा । तब यदि वे हारकर वादीको स्वयं स्त्रीका वेदानध्ययन ही स्वीकृत करना पड़ेगा । कार्यस थवा उक्त प्रमाणको माननेपर भी पूर्व रीतिसे वादीका पक्ष पीडि पत्नीकी होगा । तब गृह सनातनधर्म स्त्रीके प्रतिनिधिस्वरूप स्त्रीकी प्रतिमा भी रख सकता पाप लो है | देखिये ' कात्यायन - स्मृति- ' मृतायामपि भार्यायां वैदिकानि नह दिलाना त्यजेत् । उपाधिना ( कुश - धातु प्रणीत - स्त्रीप्रतिमया ) ऽपि तत्कर्म यावज्जीवं पाप लो समापयेत् ' ( २०१ ९ ) । इसमें प्रसिद्ध उदाहरण बताते हैं - ' रामोपि फल तो कृत्वा सौवर्णी सीतां पत्नीं यशस्विनीम् । ईजे यज्ञैर्बहुविधैः सह भ्रातृभिर-च्युतः ' ( २०१० ) देखिये कितनी स्पष्टता है? उत्तरकाण्ड में सीता- चरितार्थ निर्वासनमें सीताकी सोनेकी प्रतिमा यज्ञमें रखना स्पष्ट है ( ७६६७ ) ही ' न सीताया: परां भार्यां व े स रघुनन्दनः ' ( श्रीरामने सीताके प्रतिरिक्त चीजों किसी पत्नीका वरण नहीं किया । ) फिर प्रश्न होता है कि सीता के देवताओ वनवास में श्रीरामने फिर विना स्त्रीके यज्ञ कैसे किया? इसका उत्तर भोजन देते है – ' यज्ञयज्ञे च पत्त्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ' ( ७/१७ ) । देवाप्सर