सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 451–460

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 451–460

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६४१ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४२ ] कभी में पत्नी के प्रभावमें सीताकी प्रतिकृति रखी जाती थी ) । नाता है ( यज्ञ- यज्ञ ती, तो यदि कोई कहे कि - रावणद्वारा सीतापहार में श्रीरामने यज्ञ कैसे न्त्रतासे? इसार आनन्दरामायण देवो पूर्वत्र अग्निहोत्रं स ( रामः ) किया कुशभायंत्रा ' ( ११७ १३७ ) यहाँ श्रीरामने कुश की भा जानेसे ही कार यज्ञ किया । या पति ही स्त्रीका प्रतिनिधि बनकर स्त्रीके उपस्थितिमें विशेष- विशेष कार्य पूरे कर सकता है । अथवा पुत्र भी जैसाकि -'भार्या का यज्ञ । मरणमापन्ना देशान्तरगतापि वा । अधिकारी भवेत् पुत्रो महापातकिन द्विजे ' ( कात्या. २०।१२ ) । परन्तु वादी लोग एकके किये का एव ड़ेगा । सत्यको होना नहीं मानते, अन्यथा उन्हें मृतकश्राद्ध भी मानना पड़ बादीके सकता है । इस प्रकार उनके मतमें पतिका यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता । | तब यदि वे लोग उतने दिनोंमें पतिकर्तृक - प्राहुतिके द्वारा पत्नीका भी होम-ड़ेगा । कार्य सम्पन्न मान लें, तब तो वे हमारा ही पक्ष सिद्ध कर देंगे । क्योंकि-पीडित पत्नीकी अस्वस्थावस्था में भी उसका पति ही कार्यनिर्वाह कर सकता है । तव गृहकर्मव्यापृत पत्नीका वेदाधिकार निष्फल सिद्ध हुआ । वस्तुतः सकता प्राप लोग यज्ञका हल्ला मचाकर उससे स्त्रीको जोकि वेदका अधिकार नह दिलाना चाहते हैं, यह आप लोगोंका हल्ला है भी व्यर्थ ही; क्योंकि ज्जीवं आप लोग यज्ञका प्रयोजन केवल वायुशुद्धि ही मानते हैं, प्रदृष्ट ग्रन्य मोपि फल तो मानते ही नहीं । तव वायुशुद्धिकेलिए वेदका प्रयास भी व्यर्थं भिर- है । ' खोदा पहाड़ निकला चूहा, वह भी मरा हुआ ' वाली कहावत सीता- चरितार्थ हो रही है । वायुशुद्धिकेलिए आप लोगों का छटांकभर वनस्पति ७ ) श्री ही पर्याप्त हो जायगा । वस्तुतः वह तो वहीं व्यर्थ है, उससे भी सस्ती तिरिक्त जोंसे वायुकी शुद्धि हो सकती है । घृतका तो विशेष प्रयोजन वह है ताके देवताओंका प्रसन्न करना, उसे हमने अन्यत्र स्पष्ट किया है । देवताओंका उत्तर भोजन घृत होता है । जब देवाप्सरा उर्वशी स्वर्गसे पुरूरवाके पास आई ७ ) । बी; उससे पूछा गया था, कि तुम्हारा भोजन क्या होगा? तब उस देवाप्सराने बताया था - " घृतं मे वीर! भोज्यं स्यात् ' ( श्रीमद्भाग. प्रतिनिधित्व से भी कार्य हो जाता है । [ ८४३ १४:२२ ) ( मेरा भोजन घृत रहेगा ) । फलतः वह स्त्री भाग में घी डालकर बिना भी वेदमन्त्र के वायु शुद्ध कर ही लेगो । तब वादीके मतले भी यज्ञसे स्त्रीके वेद पढ़नेका अनुमान भी प्रसिद्ध सिद्ध हुआ । पहले हम कह चुके हैं कि बहुत पत्नियोंमें यज्ञका काम एक ही पत्नी करती है । तव शेष पत्नियोंका जव यज्ञमें सम्बन्धित होना श्रावश्यक न हुआ, तब इससे भी सिद्ध हो गया कि स्त्रियोंको उपनयन तथा वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ । श्रथवा सभी स्त्रियोंको सभी श्रावश्यकताओं में यज्ञका अनधिकार होना सिद्ध हुआ । पतिके मरनेपर तो स्त्रीकेलिए कहा गया है — ' नहि अस्या प्रपतित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते । विज्ञायते च ' तस्मान्नैका द्वौ पती विन्दते ' ( बोघायनीयपितृमेघसू. २ | ४ | ४ ) परन्तु पुरुषकेलिए कहा है – ' मृतपत्नीकः क्रतून् ग्राहरिष्यन् जायामुपयम्य ग्रग्नीन् आदध्यात् । विज्ञायते च तस्माद् एको द्व े जाये विन्दते । तस्माद् एको बह्वीया विन्दते इति च ' ( बोधा. पितृमेधसूत्र २१४४२ ) जिसकी पत्नी मर जावे; वह और यज्ञोंको करना चाहे; तो पत्नी व्याहकर अग्निका प्रधान करे । इसलिए कहा गया है- ' एक पुरुष दो स्त्री वा बहुत स्त्रियों करे । यहां विषमता होनेसे जहाँ वादिसम्मत ' जातिपक्ष ' कट गया; वहाँ स्त्रियोंका वेदाध्ययनाधिकार भी हट गया । जब ऐसा है, जब बहुत स्त्रियोंके एकके अतिरिक्त अन्य स्त्रियोंको यज्ञमें सम्बन्ध न होनेपर भी प्रत्यवाय नहीं; और उस एकके प्रभाव या अनुपस्थितिमें भी प्रतिनिधि कल्पनासे भी जब कार्य हो जाता है; तव श्रीरामका सीताको वनवास देनेके समय उसकी अनुपस्थितिमें यज्ञ की पूर्णताकेलिए सीताको सुवर्ण या कुशकी प्रतिमाका रखना उसका अनुपस्थित होने जैसा हुम्रा । तब फिर वही हमारा पक्ष सिद्ध हुआ कि-स्त्रीको उपनयन तथा वेदादिका अधिकार नहीं, अन्यथा स्त्रीकी

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८४४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अनुपस्थिति कभी सह्य नहीं होती । भीष्म प्रादि अविवाहित होते हुए भी क्या यज्ञ न करते होंगे? तब फिर वादीका पक्ष कट गया । अर्थात् स्त्रीको यज्ञमें बैठनामात्र पडता है । एक प्राध मन्त्र के अतिरिक्त जो ऋत्विगादिके सहारे उसे बोलना पड़ता है । ऋत्विक् ही उसे उसकी ओरसे बोल देता है । शेष यहाँ उसे वेदका कोई काम नहीं । इसलिए उसको वेदका अधिकार भी नहीं । इस प्रकार वादीका पक्ष पिस गया । शेष वादीके यह शब्द थे कि इम मन्त्रपठनके अधिकारसे ' गृहार्थोऽ-ग्नि - परिक्रिया ' ( घरका काम ही स्त्रियोंकेलिए अग्निहोत्र है ) इस भाव -की प्रवैदिकता स्पष्ट की जाती है । इसपर वादी याद रखे कि -' अग्निपरिक्रिया ' भी घरमें होती है, इसलिए उसे ' गृह्याग्नि ' कहते हैं, उसका स्त्री जो भी काम करेगी, हवन सामग्री साफ करेगीं, स्थान घोएगी, तो यह भी गृहकार्य में अन्तर्भूत हो जाता है । तव ' गृहार्थोऽग्नि-परिक्रिया ' इत्यादि मनुवचन वेदानुकूल ही सिद्ध हुआ । ( ६१ ) क्या स्त्रीके मन्त्र पति बोल सकता है? हम कई बार लिख चुके हैं कि कई मन्त्र स्त्रीके हों भी सही; पर उसके प्रतिनिधित्वसे पति वा पुरोहित भी इसपर पूर्वपक्षी ' ग्रहं केतुरहं मूर्धा ' स्त्रीलिङ्गान्त मन्त्र बताकर और उनका पतिदेव अथवा पुरोहित इस मन्त्रको जीतने वाली हूं ' मेरे पतिदेवको उत्तम होगा? इसका प्रत्युत्तर भी कई बार हम होनेपर प्रथवा अन्यके वाक्यका अनुवाद उन मन्त्रोंको पढ़ सकते हैं । ' उताहमस्मि सञ्जया ' इत्यादि अर्थ करके लिखता है - ' यदि पढ़ने लगें कि ' मैं अच्छी तरह यश मिले; तो कितना भद्दा दे चुके हैं कि- प्रतिनिधित्व होनेपर कि यह स्त्री कहती है कि- ' मैं सञ्जया हूं, मेरी पतिमें मेरी उत्तम स्तुति हो ' इस प्रकार पति-क्या स्त्रीके मन्त्र पति बोल सकता है? [ ८४५ ४६ ] द्वारा प्रयुक्त यह वाक्य सङ्गत हो जाता है । जैसे कि मैं वादीके ही वाक्यका अनुवाद करनेवाला इन्द्रपत्नीहवि जानता हूं कि श्रीपं. दीना. जी कह देंगे कि यह हूं कि - " में इन्द्रो ) मन्त्र शचीकी प्रोरसे १५६/४ बोले गये हैं, मानुषी - स्त्रीकी ओरसे नहीं " । श्रब बादी बोले, मैं वादी देव नहीं वाक्यको बोलकर उपहास कर रहा हूं कि ' मैं तो यहाँ वादी त नहीं । फिर मैं पं.दी.ना.जी अपने नामके साथ कैसे कह सकता हैं, में इन्द्रका निस हूँ? पर एव सब जान लेते हैं कि यह वादीका अर्थ अनूदित कर रहे हैं, अपनी निघण्टु के श्रोरसे अपने आपको नहीं कर रहे हैं, और न उन्हीं के ' मैं ' पर अपना क्योंकि-अधिकार ही जमाते हैं । इसमें ' भद्दापन क्या रहा? नहीं हो वस्तुतः यह मन्त्र मानुषीकेलिए है भी नहीं, क्योंकि इनका देवता स्वात्मान ' शची- पौलोमी ' । पुलोमकी लड़की इन्द्रकी पत्नी । ' केतु ' का वादीने ' तुष्टार ' ' वेदोपदेश ' के सुनानेवाली ' यह अर्थ बनावटी किया शब्द स्वयं प्रक्षिप्त किया है । उसमें स्वा. द. जीने घुमकेतु, उत्पात अथं किया है । वादीने यहाँ लिया? पहले वादी महाशय बिना ' देवतावाद ' ग्रादिके देख है । इसमें ' वेदोपदेश ' बनताको ' केतु ' का अर्थ ' पताका ' निघण्टु ह ' पताका ' प्रर्थ क्यों नहीं नेटके देव एक - दो देखे अपनी निरक्षरों प्रभिमत की मण्डली में एतदादिक मन्त्र दे दिया करते थे, और वह मण्डली-' नि ' जी हजूर ' कर दिया करती थी, अब जबसे उनका हमसे वादका अवसर प्रकाशित पड़ा है, जानते हैं कि हमारी पकड़ हो जायगी । वह लिखता है; पं.दी. ना. जी कह देंगे कि यह मन्त्र ' शची ' की प्रोरसे कहे जा रहे हैं । विशेषणों मानुषी स्त्री द्वारा नहीं; तब अपने वचावकेलिए वादी अपने मागे ढाल रखता है कि प्रत्येक बुद्धिमती स्त्रीको ' शची ' कह सकते हैं, पर वादीने ' निघण्टु ' से ' शची ' का अर्थ तो किया, पर अपत्य - प्रत्ययान्त ' पौलोमो ' के अर्थको वादीने क्यों छिपा लिया? I ( महाशय! ' पुलोम ' की लड़की प्रसिद्ध देवता है, जिसे ' इन्द्राणी ' पति - पत्नी

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ८४५ [ ४६ ] ' कहा जाता है; उसीका उक्त मन्त्रमें ग्रहण है । उसीने ' येन इन्द्रपत्नी इदं तदकि देवा असपत्ना किल प्रभुवम् ' ( ऋ.सं. १०१ कि- " म इन्द्रो हविषा अपने... पति इन्द्रका, क्योंकि - शचीका पति ' इन्द्र ' ही है, न्य र ( १५६/४ ) जैसे कि - ' शग्ध्यषु शचीपते! इन्द्र! ' ( सामवेदसं. पू. ३/२ ) वादी के देव नहीं । उसकी प्रजा देवताओंका इसमें स्मरण किया है । जब निघण्टु दी है, में इन्द्रका तथा ' पोलोमी ' शब्द ही नहीं, तब वहां ' पोलोमी शची ' का E? पर एव ' निरुक्तमें अपना मनमाना अर्थ करना जनवञ्चन करना है । श्ररखे निघण्टुके शची ' अनुसार पौलोमी ' यहाँ इष्ट होनेसे ' निघण्टु ' का अर्थ यहाँ इष्ट अधिकार | क्योंकि- नहीं हो सकता है । इसलिए सायणभाष्य में भी कहा है- ' पुलोमजा शची स्वात्मानमनेन अस्तौत् । तथा चानुक्रान्तम् - पौलोमी शची श्रात्मानमेतेन का देवता तुष्टाव । वादीने देखिये कितनी स्पष्टता है । तब वादी उसे मानुषी- स्त्री कहकर दोपदेश वनताको क्यों ठगता है? यह भी वादी याद रखे कि वेदके अधीन ' पताका ' निघण्टु होता है, निघण्टुके अधीन वेद नहीं । अतः यदि निघण्टु - प्रोक्त प्र क्यों नहीं देदके देवतात्मक प्रकरणसे विरुद्ध है; तो वह ग्राह्य नहीं होता । इसके एक - दो उदाहरण वादी देखे; तथा इसमें अपने आचार्य स्वामीका भी निरक्षरों प्रभिमत देख ले । मण्डली - ' निघण्टु ' ( २३ ) में विश ' का अर्थ मनुष्य है ( देखो स्वा.द. T अवसर प्रकाशित ' निघण्टु ' की शब्दानुक्रमणिका पृ. ५६ ) परन्नु वेदमें ता है ' मानुषीणां विशाँ देवीनामुत ' ( अथर्व २०।११।२ ) इत्यादि मन्त्रोंमें ना रहे हैं । | विशेषणों के अनुरोधसे यहाँ ' मनुष्य ' अर्थ न होकर ' प्रजा ' प्रथं होता है । आगे डाल रवादीने पोलोमो ' ' ( ६२ ) अवशिष्ट विचार । ( प्र. ) ‘ सं वां मनाँसि संव्रता ' ( यजुः १२।५८ ) यहाँ परमेश्वर - द्वारा ' इन्द्राणी ' पति - पत्नीको सम्बोधित किया गया है । इसी प्रकार ' भवतं नः ' ( १२ ) ६० ) इस मन्त्र में भी पति - पत्नीको सम्बोधित किया गया है । अत: अवशिष्ट विचार [ ८४७ दोनोंका वेदाधिकार सिद्ध है । ( उ. ) मालूम होता है कि वादीने यहां अपने स्वा.द.के भाष्यको आधारभूत रखा है । पर यह गलत है । स्वा.द.ने अपनी इच्छानुसार कई गलत देवता लिख डाले हैं; परम्परासे लिखित देवतावादके विरुद्ध कई मन्त्रोंके अर्थ कर डाले हैं । इन ( १२।५७-५६-५१-६० ) मन्त्रोंके देवता ' द्वग्नी ' ( दो अग्नियां, एक चित्याग्नि दूसरी उल्याग्नि ) हैं, अतः वे ही सम्बोधनीय हैं । इसलिए इन चार मन्त्रोंके मध्य अन्तिम मन्त्रमें साक्षात् ' जात-वेदसौ! ' यह सम्बोध्यमान पद है । इसी कारण श्रायसमाजके हवन-मन्त्रमें भी ' भवतं नः ' इस मन्त्रको ' इदं जातवेदोस्यां स्वाहा ' यह ' त्याग ' लिखा गया है । ' दम्पतिभ्यां स्वाहा ' यह त्याग नहीं लिखा गया । और ' जातवेदा: ' ' अग्नि ' को कहते । देखो निरुक्त ( ७/२०१२७ ) । ब स्वा.द.का वेदभाष्य देवतावाद एवं निरुक्तादिसे विरुद्ध है । जब गुरुका यह हाल है; तो उनके चेले - चांटे वेदके मन्त्रोंकी क्यों हत्या नहीं करेंगे? पञ्जाबीमें कहावत है— ' गुरु जिन्हीं दे प्रन्धड़े, चेले चोर - चपट्ट ' । यजुर्वेदकी ' सर्वानुक्रमणी ' ( २६ ) में भी यही लिखा है- ' समितं चतस्रो द्वग्नि देवत्याः ' श्रर्थात् ' ममितं ' ( १२/५७ ) ' सं वां मनांसि ' ( यादीसे दिया मन्त्र १२ ।५८ ), ' श्रग्ने! त्वं पुरीष्यः ' ( १२।५ ९ ) ' भवतं नः ' ( १२६० ) इन चार मन्त्रोंके ' दो अग्नि ' देवता हैं, और अन्तिम ६० मन्त्र में प्रार्थना है - ' मा यज्ञ हिसिप्ट ' मा यज्ञपति, शिवो भवतम् श्रद्य नः ' यह प्रार्थना परमेश्वर पति - पत्नीसे नहीं कर रहा क्या परमात्मा पति - पत्नीको ' मेरे यज्ञकी हिंसा न करो ' यह प्रार्थना करेगा? कभी नहीं । किन्तु यजमान ही दो प्रग्नियोंको ( क्योंकि वे ही यहाँ ' देवता ' होनेसे प्रतिपाद्य हैं ) प्रार्थना कर रहा है कि मेरे यज्ञ तथा मुझ यज्ञ - पतिकी हिंसा न करो । देखिये स्वा. द. की ऐसी हिमाकत -४ यं मन्त्र में ' दम्पती- देवता ' भी अपनी कपोल - कल्पनासे लिख डाला । यह स्पष्ट

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८४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वेदकी हिंसा है । अनुक्रमणिकाकार मुनियोंकी हिंसा है । इसी स्वा.द.की लज्जा रखनेकेलिए श्रोजिज्ञासुजीने इस अनुक्रमणिकाको कृत्रिम बताया है । ' प्रशक्ताः तत् पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' । ( प्र. ) ' य इच्छेद दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( शतपथ. ) में लड़की का ' पण्डित ' होना कहा है । विदुरप्रजागर में ' पण्डित ' का लक्षण यह किया है – ' प्रात्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता । यम् ग्रर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ' यहाँ कहा गया है— जो प्रात्मा - परमात्माका जानने-वाला हो; जो वेदादिशास्त्रोंका वक्ता तथा कथा करनेवाला हो, नित्य ( प्रतिक्षण ) वेदादिके धर्म में लगा हुआ हो; वह पण्डित कहलाता है । इससे लड़कीका वेदादिशास्त्रों में प्रावीण्य सिद्ध होता है । क्योंकि— * नावेदविद् मनुते त वृहन्तम् ' उस परमात्माका ज्ञान वेदवित् ही कर तकता है, दूसरा नहीं । ( उ. ) देखा पाठकगण; हम मनुजीका तथा स्वय वेदका भी इस विषयमें प्रमाण दे चुके हैं कि यदि शतपथ. ( वेद ) को ' पण्डित ' शब्दसे वेदादिका ग्रहण इष्ट होता; तो ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो विजिगीथः, समितिङ्गमः, भाषिता जायेत, सर्वांन् वेदाननुब्र बीत ' ( शत. १४ | ६ | ४ | १७ ) इस पुत्रवाले वाक्य में वेदानुवचन पण्डित होनेसे पृथक् कहा है, न कहा जाता । यदि ब्राह्मणभागात्मक वेद ( शतपथ ) को पण्डितत्व ' में ही वेदाध्ययन अनिवार्य अन्तर्गत इष्ट होता; तो उसको पुत्रवाले वाक्य में ' पण्डितत्व ' से ' वेदानुवचन ' पृथक् कहने की आवश्यकता नहीं घी; परन्तु वहाँ वेदा-नुवचनको पण्डितत्वसे पृथक् कहा है, पर उसी शतपथने दुहिता वाले वाक्यमें ' अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( १४ | ३ | ४ | १६ ) दुहिताकेलिए केवल ' पण्डिता ' हो जाना तो कहा है, पर श्रागे उस दुहिता-केलिए वेदादिका रास्ता अंशतः भी न कहकर उसको बिल्कुल बन्द कर दिया । श्रवशिष्ट विचार [ are जो शतपथ १४ | ६ | ४ | १३ में ' पुत्र ' के लिए ' पुत्रो मे वेदमनुबुवीत एक वेदका अध्ययन अधिकृत करता है, ' पुत्रो मे द्वौ वेदों ', उसे ( १४ ) यहाँ पर पुत्रको दो वेदोंका अधिकार दे रहा है । ' पुत्रो धनुववीत वेदान् अनुब्रुवीत ' ( १५ ) यहाँ पुत्रको तीन वेदोंका अधिकार दे मे श्री पर्य इस प्रकार शतपथ पुत्रके लिए भिन्न - भिन्न कण्डिकायोंमें वेदका रहा है । ' तदस नाम लेकर भी नहीं डरता, ‘ पुत्रो मे पण्डितः... सर्वान् वेदान् श्रनुबुवीत ' ( १७ ) यहां होकर पर पुत्रको पण्डित होने तथा पण्डितत्व से पृथक् सव वेदों का अधिकार अक्षर देता है, वही ' शतपथ ' लड़कीकेलिए ' दुहिता में पण्डिता जायेत ' I ( १६ ) तोकि कहकर चुप हो जाता है. लड़कीको वेदके कुछ श्रंशकेलिए भी सर्वथा नहीं कहता; यह क्यों? होती इससे स्पष्ट है कि - शतपथको जो ब्राह्मणभागात्मक वेद है, वह मूर्खत अधी लड़कियोंको वेदका अधिकार नहीं देता, और वह पण्डितत्वसे ' वेदाधिकार ' पृथक् वस्तु मानता है; और फिर लड़केसे लड़कीका ग्रहण न मानकर वेदा वेदके अनुवचनमें ' जातिपक्ष ' का भी सर्वथा बाध कर देता है; तब उसी शतपथको ' पण्डिता ' शब्दसे दुहिता ( लड़की ) को वेदाधिकार देना भी श्रुतिव इष्ट है ', यह कथन वादीकी कितनी ' भयङ्कर भूल ' बता रहा है । देखिये विषय यहाँ हो न गया वादीका पतन । अव वह यहां उठ नहीं सकता । वेदका श्रधिक श्रागे जो वादीका अभिप्राय है कि- ' पण्डिता ' कहने से ' शतपथ ' को लड़कीको वेदाधिकार देना न सही, अर्थात् यदि हमारा ( वादीका ) पक्ष भीती गिरता है, तो आपका भी पक्ष गिरता है; क्योंकि आप लड़कीको ' अविद्या ' बताते हैं, इसपर हम कहते हैं— कभी नहीं । उल्टा हमारा ' बना पक्ष तो सिद्ध होता है । यह कैसे? सो देखिये - पुत्रको ' समितिङ्गम ' ( सभाओं में जानेवाला ) तथा ' भाषिता ' ( व्याख्याता ) कहा है, पर लड़कीको कहना नहीं । मन्त्रभाग तथा व्याकरण - महाभाष्यकार स्त्रीको ' सभेय ' नहीं मानते, यह हम अन्यत्र लिख चुके हैं । तब वह ' विद्या ' सिद्ध हो गई; नहीं तो प्राचा स ० ध ० ५४

पृष्ठ 455

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६४६ ८५० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) त ', उसे सभाका तथा व्याख्यातृत्वका अधिकार क्यों न दिया जाता? जिस ' पण्डिता ' शब्दकेलिए वादी कूद रहा है, कदाचित् वह इसका अर्थ नहीं जानता । सुनिये - ' पण्डा सञ्जाता अस्य इति पण्डितः । ' तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच् ' ( ५।२।३६ ) इस पाणिनिसूत्रसे लिकर इतव् होकर यह शब्द स्त्रीत्वमें टामें बना है । ' पण्डा ' बुद्धिको कहते हैं, यहाँ अक्षर - शिक्षणात्मक ' विद्या ' को नहीं । ' धीर्विद्या सत्यमक्रोधो ' ( कार ह २ ) में घी और विद्याको पृथक - पृथक कहा है । सो बुद्धिमत्ता मनु. १६ ) तो बिना अध्ययनके भी हो सकती है; क्योंकि वृद्धि जन्मसे ही उत्पन्न नहीं होती है, वहाँ विद्याध्ययनकी आवश्यकता नहीं । बुद्धिकी विपरीत - कोटि मूर्खता तो अध्ययनसे भी सम्भव है । क्या वादीने नहीं सुना - ' शास्त्राणि वह श्रधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः ' ( हितोपदेश ) कार ' तब लड़की की बुद्धिमत्ता घरके कार्यों में शतपथको विवक्षित है, नकर वेदाध्ययनमें नहीं । जैसाकि - श्रीस्वा शङ्कराचार्यने भी कहा है- उक्त उसी श्रुतिकी व्याख्या में – ' दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्रविषयकमेव, न तु वेद-नाभी विषयकम्, वेदेऽनधिकारात् इति ' । तभी तो बहुत वार लड़केकेलिए देखिये वेदका नाम कहकर भी लड़की के लिए एक वेद तो दूर रहा, वेदका श्रधिकार भी नहीं दिया गया । को बुद्धिमत्ताका तो जन्मसे सम्बन्ध है, विद्यासे नहीं । विद्या पढ़े हुए ) पक्ष भी तीन ब्राह्मण बुद्धिमान् नहीं थे, देखो पञ्चतन्त्र -‘अपरीक्षितकारक ' । कोको पण्डिता बनानेका निर्देश ' यह शब्द भी वादीके ठीक नहीं । ' पण्डिता हमारा ' बनाने ' का नहीं, किन्तु पण्डिता हो जानेका निर्देश है - यह वादीको नङ्गम ' कीको कहना चाहिये था । इससे वादीका पक्ष निस्पिष्ट हो गया । मानते, हम लड़कीके शिक्षिता वननेके विरोधी नहीं कि माता - पिता उनको हीं तो प्राचार - शिक्षा न दें । श्रागे जो वादी शतपथके ' पण्डिता ' शब्दको छोड़कर विदुरनीति में . अवशिष्ट विचार [ ८५१ जा पड़ता है- ' आत्मज्ञानं समारम्भ: ' इति जो आत्मा जाननेवाला हो, वह पण्डित है । - परमात्माको देखा पाठकगण हम मनुजीका तथा स्वयं वेदका वचन भी वादी उसे भी प्रमाण नहीं मानता । पर वह दें; जाता है । विदुरनीति में ' पण्डित ' का लक्षण स्वयं नीतिशास्त्र में पहुंच लक्षण पण्डितपुत्रमें है, ' पण्डित ' का नहीं । वे चरितार्थ हो जायंगे, पुत्रीमें नहीं । पण्डिताके लक्षण वहाँ न होनेसे यह वादीका प्रयास निर्मूल हुआ नीतिशास्त्रमें वहाँ वेदका क्या प्रकरण है? । विदुरजी विषयक चर्चा नहीं करते थे । विदुरजी शूद्र होनेसे वेद-होते हुए भी अब जन्मना शुद्र शरीर यमका प्रवतार होनेसे सर्वज्ञ होनेसे झूद्रकी मर्यादासे बहिर्भूत वैदिक - चर्चा नहीं करते थे । जैसेकि - ' शूद्रयोनी अह जातो वक्तुमुत्सहे ' ( ४११५ ) ( मैं शूद्रयोनिमें पैदा हुआ हूँ; श्रतः इससे नातोऽन्यद् अधिक नहीं कह सकता ); तव उनने वैसा उपदेश देनेकेलिए ' ब्राह्मीं हि योनि-मापन्नः सुगुह्यमपि यो वदेत् ' ( ४११६ ) ब्राह्मण श्रीसनत्सुजातको वुलवाया था । जो कि वादी कहता है- ' नाऽवेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( वेद जाने विना कोई उस परमेश्वरका यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर ही नहीं सकता । ) इसका वह उत्तर सुने । ' वेदविद् ' में प्रश्न है कि यहाँ वेदके शब्द जाननेवाला इष्ट है, वा वेदके अयं जाननेवाला? यदि वेदके शब्द जाननेवाला इष्ट है; तो वह व्यर्थ है, क्योंकि - ' यदवीतमविज्ञात निगदेनैव शब्दयते । अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् के अनुसार ज्ञान-काण्डमें शब्द काम नहीं दे सकता । यदि वेदका अर्थ ही उक्त स्थान इष्ट है, वेदका शब्द नहीं; तो स्त्री - शूद्रादिका वेदके नियतानुपूर्वीक- शब्दमें अधिकार न होनेसे, वेदके भाष्यभूत अनादि - प्रवृत्त पुराणों तथा दर्शनादिके श्रवणसे भी वेदार्थ - ज्ञानका निर्वाह हो जाता है ।

पृष्ठ 456

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८५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वेद नियतानुपूर्वीक तथा नियतपदप्रयोग - परिपाटीक हुआ करता है; तो उसका अधिकार भी अनियतोंको नहीं । उसके शूद्रादि सबका अधिकार है नहीं; किन्तु उपबृंहक है, सार्वत्रिक नहीं । उसपर ४७ ) । पर वह भयं उस वेदके नियत वर्णों वा नियत व्यक्तियोंको होता है, अर्थके साक्षात् वेद न होनेसे उस प्रर्थ में स्त्री-। ( ब्राह्मणभाग भी मन्त्रभागका अनुवादमात्र वह भी वेद है । अनुवाद भी प्रासङ्गिक है, देखो श्रीब्रह्मदत्त जिज्ञासुकी य. भा. वि.भू. पू. शब्दों द्वारा अधिकारी पुरुषोंको मिलता है । अनधिकारी स्त्री - शूद्रादिको पुराण- इतिहासके श्रवणसे अर्थं मिल जाता है । इसलिए कहा है – ' स्त्री - शूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमाख्यानं मुनिना कृपया कृतम् ' ( श्रीमद्भा. १।४।२५ ) । स्त्रियोंको तो पतिकी सेवा श्रादिसे भी ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है । वादीके स्वामीजी भी स.प्र. ११ समुल्लास में पञ्चायतनपूजाप्रकरणमें पृ. २०० में मान गये हैं- ' स्त्रीका पति [ देववत् ] पूजनीय है ।... यही [ पतिकी पूजा श्रादि ] ब्रह्मकी प्राप्त होनेकी सीढ़ियाँ हैं ' । मार्कण्डेय पुराण में भी लिखा है कि- ' यद् देवेभ्यः यच्चा अभ्यागतेभ्यः कुर्याद्भर्ताऽभ्यर्चनं सत्क्रियातः । अनन्यचित्ता नारी भुङ्क्त े भर्तृशुश्रूष-यैव ' ( १६।६३ ) अर्थात् पति देवताओं पितरों तथा प्रतिथियोंकी पूजा करता है, उसके पुण्यका आधा भाग स्त्री पतिकी सेवामात्र करनेसे प्राप्त कर लेती है । जब इस थोड़े कामसे उस अनधिकारीको ब्रह्मप्राप्ति हो जाती हो; तो ' धक्के चेद् मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् ' फिर यह अनधिकारिणी भारी प्रयास वेदाध्ययनादिका करेगी भी कैसे? ‘ प्रव्रज्या मन्त्रसाधनम् ।... स्त्री - शूद्रपतनानि षट् ' ( ग्रत्रिस्मृ. १३३ ) ( संन्यास लेना, मन्त्र -ग्रहण करना वा उसको साधना आदि - यह छः कार्य स्त्री भौर शूद्रके पतनके कारण हैं ) ' न व्रर्तनपवासैश्च धर्मेण अवशिष्ट विचार [ ८५३ -विविधेन च । नारी स्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोति पति - पूजनात् ( शङ्खस्मृ अनुस्मृत्ति ५।८ ) ( नारीको विशेष व्रतों वा उपवासोंसे तथा विविध धर्म, स्वयं. निषेकादि नहीं मिलता; जितना कि उसे पतिपूजनसे स्वर्ग मिलता है ) इत्या धर्माधाना धर्मशास्त्रों के वचन भी हमारा पक्ष पुष्ट करते हैं ) । वहींका शेष है जो वादीने ‘ धर्मं, जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( २।१३ ) संस्कारो में यह मनुस्मृतिका वचन देकर अपनी श्रद्धा ' मनुस्मृति ' पर प्रकट की है; वेदमन्त्रों के तो यह जानिये कि- मनुस्मृति स्त्री एवं शूद्रको वेदका अधिकार नहीं विकार देती । मनुजी मन्त्र एवं ब्राह्मण दोनोंको मिलाकर श्रुति कहते हैं; तभी इधर ‘ वेदोखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ' ( २६ ) इस मनुवचनमें इसने स्वार ' अखिलो वेद: ' का कथन है, अतएव श्रीकुल्लूकभट्टने भी ' अखिलो वेद ' कता है का ‘ ऋग्यजुः - सामाथर्वलक्षणो वेद:, स सर्वो विधि प्रर्थवाद - ( ब्राह्मण ) - लिए नहीं मन्त्रात्मा धर्मे मूलं - प्रमाणम् ' कहकर ब्राह्मणभागको वेद माना है; श्रौर सकता है । तभी शतपथब्राह्मण में पुत्रको तो वेदका पढ़ना कहा है; पर दुहिताकेलिए दही मेवा वेदका नाम नहीं रखा गया— यह हम पहले बहुत बार स्पष्ट कर बाबा वा चुके हैं । इसके फिर आगे मनुजी कहते हैं - ' स्मृतिशीले च तद्विदाम् ' इससे स्मृत्तिको में प्रि भी धर्मका मूल कहा गया है; सो स्मृतिमें तो स्त्रीका वेदानधिकार स्पष्ट कठिन कार्य ही है । इसी प्रकार वादीसे प्रमाणार्थ उद्धृत की हुई उपनिषद् भी स्त्री- फिर उनस शूद्रादिको वेदादिका अधिकार नहीं देती, देखो बृहदारण्यकोपनिषद् -- ~ । ' म इच्छेद दुहिता मे पण्डिता जायेत ' इसपर भी हम स्पष्टता पूर्व कर स्त्री-चुके हैं । तव स्त्री - शूद्रादिको धर्मका ज्ञान भी वेदसे नहीं करना पड़ेगा । उले भावी तब वेद उत्तमकोटिके द्विज - पुरुषोंके लिए हैं, न कि निम्नकोटिके स्त्री- है । तब व शूद्रादिकेलिए । प्रन्यया - सि स्त्री पुरुषकी अपेक्षा निम्नजासिक है, शूद्र त्रैवर्णिकों की अपेक्षा चरितायंत निम्न हैं; अत: उन्हें ' परम प्रमाण ' की आवश्यकता भी नहीं । बल्लि श्राव नावश्य

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ५४ ] तो अपना अधिकार भी स्त्री - शूद्रादिको नहीं देती । देखिये-खस्मृ. | स्मृति मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ' ( २।१६ ) ( जिनके स्वयं निषेकादिश्मशानान्तो दिसे लेकर अन्त्येष्टि तक वेदमन्त्रोंसे संस्कार कहे गये हैं इत्यादि वर्भावाना; अधिकार मनुस्मृति में है । सो यह सभी जानते हैं कि - स्त्रीके / उन्हींका ( विवाहके तथा कुछ याज्ञिक विरल मग्त्रोंके अतिरिक्त ) भी संस्कारोंमें 1१३ ) मन्त्रों के पढ़नेका आदेश नहीं है; सो जब मनुस्मृतिमें भी उन लोगों का की है; अधिकार नहीं, तब वेदमें स्त्री - शुद्रादिका अधिकार कैसे हो सकता है? नहीं तभी इधर अपने कर्तव्य - धर्मका ज्ञान स्त्रीको अपने पतिसे और शूद्रको स्वामी वर्णिक बिना अध्ययनादिके प्रयास वा विना गुरुके हो वेदः नुकता है । श्रायास करना तो द्विज - पुरुष के लिए है, स्त्री - शूद्रादि सेवककै-ह्मण ) - लिए नहीं । सेवक अपने सेव्यकी सेवाते वह मेवा प्रकारान्तरसे प्राप्त कर - और कता है । स्त्री अपने गुरु वा सेव्य पतिसे, शूद्र अपने पति त्र वर्णिकसे केिलिए दही मेवा श्रवणद्वारा प्राप्त कर सकता है । इसमें कोई व्यावहारिक ष्ट कर । बाधा वा प्राचीन मर्यादाका भङ्ग भी नहीं होता । इसके अतिरिक्त स्त्री - शूद्रादिको अपने स्वामियोंकी कृच्छ्रसेवा प्रदि मृतिको में प्रतिक्षण लगे रहने से उतना अवकाश भी नहीं होता कि - वेदके स्पष्ट कठिन कार्यों को पूरा कर सकें । बल्कि उनसे सब सेवादिके कार्य लेकर 7 स्त्री- फिर उनसे पुरुषोंवाले कठिन कार्य भी लेना उनपर अत्याचार करना नपद है । पूर्व कर स्त्री - प्रकृति कोमल होने से उनपर वेदादिका भारी गट्ठर रख देना नड़ेगा । भावी प्रसवादिमें हानि पहुंचाना तथा उसके स्वास्थ्यका विगाड़ना स्त्री है । तब वादीका यह कहना कि - ' वेदज्ञान अनिवार्य है, अन्यथा बेदज्ञानको या सिद्ध तथा अनावश्यक मानना पड़ेगा ' कट गया । क्योंकि उसकी अपेक्षा परितार्थता द्विज - पुरुष में ही है । वह द्विज - पुरुषोंके लिए तो अनिवार्य बल्कि श्रावश्यक है, पर स्त्री - शूद्राद्रिकेलिए तो वह अन्यथा सिद्ध तथा लावश्यक ही है । अवशिष्ट विचार [ ८५५ इधर वेदके ज्ञानको निषिद्ध हम भी नहीं करते; हां, वही ज्ञान वेदके शब्दोंसे न होकर पुराण - इतिहासादिके श्रवण द्वारा होगा । वह अनधिकारियोंकेलिए अनावश्यक वा अन्यथा सिद्ध है हो । वेद तो अक्षर-ज्ञानके प्रभाववालेकेलिए भी अन्यथासिद्ध ही रहेगा । सेवककेलिए ' एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।... शुश्रूषामन-सूयया ' ( मनु. ११६१ ) ' यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद् भवत्यस्य निष्फलम् ' ( मनु. १०।१२३ ) ' परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ' ( गीता १८।४७ ) ( सेवकके लिए निश्छल होकर सेवा करना ही ठीक है; उससे भिन्न वह जो कार्य करता है, वह उसका निष्फल होता है ) इत्यादि-वचनों द्वारा सेवाके अतिरिक्त वेदादि अध्ययन विहित नहीं है । यही बात सेविका स्त्रीकेलिए भी शास्त्र सम्मत है | देखिये- ' उपचयः स्त्रिया साध्या सततं देववत् पतिः । नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । पति शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ' ( मनु. ५३१५४-१५५ ) ( पतिकी सेवासे ही स्त्री स्वर्ग में पूजित होती है । ) वादीकी मान्य दक्षस्मृति भी कहती है- ' बुधास्त्वाभरणं भावं मलयालेपनं तथा । मन्यन्ते स्त्री च मूर्खश्च तदेव वहु मन्यते ( ७२७ ) ( यहांपर विद्वानोंका आभूषणादि - धारण, तथा पाउडर आदि लगाना निषिद्ध माना गया है, पर धर्मशास्त्रों तथा वेदादिमें ' तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ' ( मनु. ३१५१ ) ' पूज्या भूषयितव्याश्च ' ( ३।५५ ) ' सुकृतो: प्रन्य ऋत्वन् ' ( ऋ. ३।३११२ ) कन्याको भूषणादि पहरा कर दूसरेको दिया जाता है, स्त्रियोंका भूषित होना वर्णित होनेसे स्त्रियोंकी अविद्वत्ता शास्त्रीय हो गई । शेष रहा उन स्त्रियोंके कर्तव्योंका बोध; वह उन्हें उनके पति बतावेंगे । कर्तव्य तो वेदमें ' दोग्ध्री धेनुः, वोढाऽनड्वान्, आशुः सप्तिः ' ( यजुः माध्यं. २२।२२ ) ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो घास जिगीपति '

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८५६ ] श्रीसनातनधमालोकः ( ३-२ ) ( अ. ११/५/१८ ) गाय, बैल, घोड़े आदि पशुओं को भी बताया गया है; पर इससे वे वेदके अधिकारी नहीं हो जाते । किन्तु उनके वे कर्तव्य जैसे उनके स्वामी द्विज ( पशुरक्षक वैश्य आदि ) उनसे करा लेते हैं; वैसे ही स्त्री - शूद्रादिके विषय में भी जान लेना चाहिये । ' ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ' ( श्रीमद्भा. ११११८ ) इस नियम के अनुसार कन्याका गुरु पिता, तथा पत्नीका गुरु पति उन्हें यथासमय यथायोग्य रहस्य बता देते हैं; जिन्हें वर्षों पढ़नेपर भी पता नहीं लगता । ( प्र. ) ' पत्युरनुव्रता भूत्वा ' के अनुसार स्त्रीका पतिके अनुकूल वेद पढ़ना भी अनुव्रतत्व है ' । ( उ. ) ' अनुव्रता ' से ' पतिव्रता ' गृहीत है कि- ' पतिके सुख में सुखिनी हो; और दुःख में दुःखिनी, पूर्णं श्राज्ञाकारिणी हो. उसकी सेवा करनेवाली हो - ' प्रातर्ता मुदिता हृष्टे सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता ' । पर इससे उस स्त्रीका वेदाध्ययन सिद्ध नहीं हो जाता । पतिव्रत विवाहके समय लेना पड़ता है । सो विवाह के समय पतिका वेदारम्भ नहीं होता कि जिससे पतिकी अनुव्रता स्त्री भी तब वेदारम्भ करे । जब पुरुष वेदारम्भ करता है पाठ वर्षकी अवस्थामें, तब भी लड़की उसका बह व्रत नहीं ले सकती; क्योंकि तब वह उसका पति नहीं होता । पतिव्रत पति होने के समय चलता है; क्या वादी भी लड़कीका विवाह आठ वर्षसे मानता है? यदि नहीं; तव वादीकी यह युक्ति अपने आप कट गई । स्वा.द. की माता वेद नहीं पढ़ी थी, गान्धीजीकी माता भी वेद नहीं पढ़ी थी, वादीकी माता भी वेद नहीं पढ़ी थी; फिर क्या वादीके अनुसार उनकी सुसन्तान नहीं हुई? स्त्रियोंकेलिए अक्षरात्मक शिक्षा अनिवार्य नहीं । उसमें बड़ी - बड़ी हानियां हैं । उन्हें तो चाहिये - अनुभवी माता-पिता तथा योग्य पतिकी शिक्षा । इसमें वेतनादिलुब्ध तथा तरह - तरहके विद्यार्थियोंके शिक्षण में लगे हुए अन्य अध्यापक लोग लाभके स्थान में. क्या ‘ देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक है? [ ८५७ 5 ] हानि ही दे सकते हैं । उनसे बहुत - सी हानियां हो रही हैं । स्त्रियां पढ़ानेवाली विश्वसनीय नहीं हो सकतीं । वे भी पुरुषोंसे भी इस लड़कियों को हानि पहुंचवा देती हैं, यह समाचार - पत्रके घूस लेकर खा.द.जी तिरोहित नहीं है । रजस्वलात्वमें लड़कियोंको अपने घरमें कमरेमें पाठकों शब्द भावे बैठना देव शब्द पड़ता है, पर आजकल वे अध्यापिकाएं खटपट करती हुईं प इससे सिद्ध पढ़ाने जा रही होती हैं । परीक्षाएं भी इसी प्रकार दे रही होती हैं । विद्वान् - मन इसका दुष्प्रभाव गर्भाशय पर पड़ सकता है । इसके कारण हूँ- दया वादी लोग | ( एक ' उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ' ( मनु. ३।४ ) ‘ सदृशी भायाँ ’ उत्तर शब्द भी जहां ना जाय; वहाँ भी वादीकी इष्टसिद्धि नहीं । विद्याकी सदृशता मनुष्ययो दोनों में सम्भव नहीं । पति २५ वर्षका होगा, स्त्री वादीके अनुसार बैंकड़ों प्रम नुष्यसे, १६ वर्षकी । पति ४८ वर्षका होगा, स्त्री वादीके अनुसार २४ वर्षकी । तो क्या दोनोंकी विद्या संदृश हो सकती है? अतः स्पष्ट है कि वहां फिर | तिवन्ध हम कुलादि- सम्पत्ति ही इष्ट है । जैसे कि - ' थयोरेव समं वित्तं ययोरेव समं पर दयानन कुलम् । तयो: मैत्री विवाहश्च ' ( पञ्चतन्त्र ) । धनुष्यों को एवं गलत रेखा इति, ( ६४ ) क्या ' देव ' शब्द विद्वान्‌का पर्यायवाचक है? करता है प्रश्न – आपने गत ७८६ पृष्ठमें देवताओंका और मनुष्योंका भेद चक्तियों ) बताते हुए स्वाद के प्रथम स.प्र. का उद्धरण दिया था; पर हम दयानन्दी श्रदाय लोग प्रथम स. प्र. को प्रमाणित नहीं करते । स्वामीजीने उसका संशोधन एवं विद्वान करके द्वितीय स.प्र. तैयार किया था । उसके ४ र्थं समुल्लास ६० पृष्ठमें संसार में वि स्वामीजी ने लिखा था- ही है ' विद्वा ं, सो हि देवा: ' यह ' शतपथब्राह्मण ' का वचन है, जो विज्ञान हो उसे न हैं, उन्हींको ' देव ' कहते हैं ' । प्रकरण

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८५७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नयां भी इसलिए जहाँ - जहाँ किसी वेदादिशास्त्रमें लेकर जीने उसका अर्थ ' विद्वान् ' मनुष्य किया है ' देव ' शब्द आया है, / वा. द. । तब तो जहाँ ' मनुष्य ' T ठकस शब्द भावे; वहाँ साधारण मनुष्यका नाम समझना चाहिये बैठना देव ' शब्द श्रा जावे; वहाँपर विद्वान् ' मनुष्य ' अर्थ समझना, पर जहाँ चढ़ने या इससे सिद्ध होता है कि कोई भी स्वर्गीय देवयोनि नहीं है, मत्र्त्यलोकमें चाहिये 1 ती हैं । विद्वान - मनुष्य ही ' देव ' हैं, पृथक् मनुष्यसे भिन्न देवयोनि नहीं है । हूँ- ( एक दयानन्दी ) । उत्तर- हमने आलोक ' ' ( ४ ) के पृ. ४०५ से ४२० भाषां । मनुष्ययोनिसे देवयोनिकी भिन्नता ' निवन्ध दिया था । उसमें हमने पृ. तक सदृशता बैंकड़ों प्रमाणोंसे दिङ्मात्र ३१ प्रसिद्ध वेदवचन वेदके दिखलाकर देवताओंकी अनुसार मनुष्यसे, वा मनुष्यकी देवताओं से भिन्नता दिखलाई थी । वर्षकी । किं - वहां फिर ४२१ पृ. से ४३७ पृ. तक ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं ' यह रेव समं निबन्ध हमने दिया था । यह हमारा स.ध. के मुख्य सिद्धान्तका प्रश्न है, पर दयानन्दी विद्वान् भी दयानन्दजीका अनुसरण करते हुए विद्वान् लुप्योंको ही देवता सिद्ध करनेपर तुले हुए हैं; पर उनका यह बनावटी एवं गलत सिद्धान्त है । वेद स्पष्ट कहता है कि - यः श्रद्दधाति - ' सन्ति रेग इति चतुष्पदे द्विपदेऽस्य मृड ' ( अथर्व ११ २ २८ ) ( जा श्रद्धा करता है कि देवता हैं; उसके चौपाये ( पशु ) तथा दी पाये ( घरके का भेद चक्तियों ) को सुखी कर । ) इससे देवयोनिको न माननेवाला वैदिकम्मत्य-दयानन्द प्रदाय पूरा अवैदिक सिद्ध हो रहा है । क्योंकि यहाँ यदि ' देव ' का संशोधन ' विद्वान् ' किया जावे, तो उसमें स्पष्ट प्रसङ्गति • पृष्ठ, पड़ती है । क्योंकि न नहीं मानता? उनकेलिए श्रद्धा करना ही है । पर परोक्ष देवयोनिको नास्तिक लोग नहीं मानते । श्रतः विद्वान हो उसे न माननेवाले वैदिकम्मन्योंका यह खण्डन है । प्रकरणवश यहाँ भी हम स्पष्टता करते हैं । जबकि स्वा.द. तथा क्या ' देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचकहै? [ ८५६ उनके अनुयायी शतपथत्रा से ' देव ' शब्दको ' विद्वान् ' का पर्यायवाचक करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले शतपथब्राह्मणका सिद्ध पड़ेगा कि क्या वह देवता और मनुष्योंको मूल विचार देखना शतपथ ( २।४।२ प्रभिन्न मानता है, वा भिन्न? असुर, इन ) में प्रजापतिके पास देव, पितर, मनुष्य, पशु, पांच प्रकारकी प्रजाओंका उपस्थित होना और अपनी जीवन-वृत्ति मांगना कहा है । इनमें क्रमसे १ से ५ कण्डिका निरूपण किया है । तक उनका इनमें मनुष्य तथा पशु तो इस लोकके बताये गये है; परन्तु देव पितर और असुर अन्य लोकके सूचित किये, भाई प्रतीत होते हैं । देवताओंका गये हैं । देव और असुर गया है; सो असुर भी सूर्यलोककी सूर्यलोकमें निवास सूचित किया प्रजा होगी । इसीलिए ही शतपथमें देवताओं एवं असुरोंका बहुत स्थलोंमें युद्ध बताया गया चन्द्रलोककी प्रजा सूचित की गई है । मनुष्यों एवं है । पितर चन्द्रसे सम्बन्ध न बताकर शेष पृथिवीसे पशुयोंका सूर्य और सम्बन्ध सूचित किया गया है । जब ऐसा है; तो देवता ' दिवि देवा: ' ( प्र. ११४७१२३ ) द्यलोक-वासी सिद्ध हुए, पृथिवीलोक - निवासी नहीं । ' दिव् ' शब्दका अर्थ चाहे सूर्यलोक करो, चाहे स्वर्ग; इससे देवयोनि स्वर्गीय सिद्ध होती हैं । और मनुष्य वा विद्वान् मनुष्य पृथिवीलोक निवासी सिद्ध हुए, सूर्य - चन्द्रादि-लोक - निवासी नहीं । जब ऐसा है; तो ' देव ' शब्दका अर्थ ' विद्वान् मनुष्य ' कर देना शतपयरूप ब्राह्मणभाग तथा मन्त्रभाग - संहिता श्रादिसे विरुद्ध ही है, अत: यह वादियोंका पक्ष भी निर्मूल ही है । अव ' देव ' का जोकि वादी लोग ' विद्वासो हि देवा: ' से ' विद्वान्-मनुष्य ' अर्थ सिद्ध करना चाहते हैं, यह सर्वथा निर्मूल पक्ष है । वादी लोग ' विद्वा ँसो हि देवाः ' यह शतपथका पाठ तो अपनी पक्षसिद्धिके लिए देते हैं, पर पूर्वोत्तर पाठ छिपा देने की तो उनकी सदाकी

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८६० 1 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) साम्प्रदायिक दुष्प्रकृति है । ' देव ' शब्द ' विद्वान् मनुष्य ' का पर्यायवाचक सिद्ध नहीं होता । यह पूर्वोत्तर अंशसे स्पष्ट हो जाता है । शतपथका पूर्वोत्तर पाठ हम लिखते हैं; विद्वान् लोग इसपर विचार करें | वह पाठ यह है— ' उशिजो बह्नितमान् इति, विद्वा ँ सो हि देवाः, तस्माद् ग्राह-उशिजो वह्नितमान् इति ' ( ३७८३ १० ) इसपर अभिप्राय यह है कि उक्त शतपथकी कण्डिका ' देवान् देवीविंशः प्रागुः उशिजो वह्नितमान् ' ( यजुः माध्यं. ६।७ ) इस याजुषश्रुतिकी स्पष्टतार्थ है । उक्त याजुष - मन्त्रमें “ देवान् " यह पद " विशेष्य " है, और उसी मन्त्र में " उशिजः " यह पद उसी मन्त्र स्थित ' देव ' शब्दका विशेषण है । विशेषण सदा गुण - शब्द होनेसे ' यौगिक ' हुआ करता है, और विशेष्य प्राकरणिक होनेसे सदा रूढ वा योगरूढ हुआ करता है । यह वात विद्वान् लोग जानते ही हैं । साधारण लोगोंको भी यह समझ रखना चाहिये । उक्त याजुष - मन्त्र में ' उशिज् ' का अर्थ विद्वान् वा बुद्धिमान् है । निघण्टु ( ३।१५ ) में ' विप्रः, धीरः, कविः, मनीषी, विपश्चित्, उशिजः ' प्रादि २४ नाम मेधावी ( विद्वान् ) के है । जैसे कि - श्रीयास्कने लिखा है— ' मेघाविनामानि उत्तराणि चतुर्विंशतिः ' ( ३१६२ ) उसमें १६ वां नाम ' उशिज् ' है । स्वा.द.ने भी अपने ' निघण्टु वैदिक - कोष ' की शब्दानु-क्रमणिकाके ३३ पृष्ठमें ' उशिज: - मेघाविनाम ' यह लिखा है । यजुर्वेद माध्यं.सं. की उक्त ६।७ कण्डिकामें देवान् देवतानोंका विशेषण ' उशिजः ' ' मेधाविन: - विद्वांसः ' क्यों हैं? यह एक प्रश्न उपस्थित होता है । इसके उत्तर में शतपथने उक्त मन्त्रके विवरण में कहा है— ' विद्वा " सो हि देवाः, तस्माद् ग्राह उशिजो वह्नितमान् इति ' ( ३ | ७ | ३ | १० ) श्रर्थात् “ हि = चूंकि देवाः = देवता लोग विद्वांसः = -क्या ' देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक है? [ ८६१ ८६२ जाननेवाले होते हैं, सभी कुछ जान जाते है; तस्मात् = इसी कारण उक्त मन्त्रभागका मन्त्र उन देवताओंको ' उशिजो वह्नितमान् मन्त्र- देव नाह = ' उशिज: ' इस विशेषणसे युक्त करता है । " इति मनुष्या ' विद्वांसः ' का अर्थ ' जानने वाले ' होता है; जैसेकि ( जो म ( ८/२०११ ) में ' वयुनानि विद्वान् ' मन्त्रके ' विद्वान् ' पदका अथं ' निरुक्त- प्रत्यक्ष ( जान जानेवाला ) कहा 1 प्रजानन ' ( देवता जान ‘ विद्वांमो हि देवाः, तस्माद् श्राह - उशिजो वह्नितमान् ' इति । यहाँपर इह ये ' हि ' शब्द ' हेतु ' ( जिस कारण ) प्रर्थं वाला है क्योंकि उसकी पूर्ति करने- सोकों में बाला ' तस्मात् ' शब्द साथ दिया हुआ है । ' यत्तदोनिंत्यः सम्बन्धः ' ( यद् कभी व और तदुका सम्बन्ध नित्य हुआ करता है ) यह एक प्रसिद्ध न्याय है । ' य सो जबकि उक्त कण्डिकाके उपसंहारमें " तस्माद् " यह ' तद् ' शब्द ३१ ) है; तब उसके उपक्रममें उक्त श्रुतिमें " यस्माद् " शब्द भी प्रवश्य साथ ही पहुंच ज होना चाहिये । तभी उपक्रम एवं उपसंहारकी एकतासे सिद्धान्त बनता ' तदाहु: -है । यहाँ अन्वेषण करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वह ' शब्द ' यहाँपर प्राणम हैं, वह है " हि " शब्द | " हिं शब्द " हेतु " अर्थ में प्रसिद्ध है ' हि हेतों ( ३४ ) श्रवधारणे ' ( अमर. ३।३।२५७ ) यहाँ ' हि ' के दो अर्थ बताये गये हैं । करता एक तो हेतु और दूसरा निश्चय । जब उत्तर - वाक्य में पञ्चम्यत वायुदेव ' तस्मात् ' मा जावे; तब उसके पूर्व वाक्य में " यस्माद् " यह हेत्वर्थक यह शब्द भी श्रावश्यक होता है । वह यहाँ है उसका पर्यायवाचक ' हि ' शब्द । ( यही सो ‘ तस्माद् ' के अनुरोधसे ' हि ' शब्द यहाँ " यतः यस्माद् ” इस प्रर्यमें वातो दे है । इसी ' हेतु ' अर्थके कारण ' तस्माद् ' में पञ्चमी है; तब ' हि - यत: ' पूर्व - जैस इस शब्दके भी ‘ हेतु ' अर्थवाला होनेसे पूर्वपक्षियोंसे अभिमत देव - विद्वत् मन नही सर्वज्ञता शब्दोंकी पर्यायवाचकता भी खण्डित हो गई । इसमें यह बताया गया है, चूंकि देवता सभी कुछ जाननेवाले होते ज हैं, इसी कारण मन्त्रने देवतानोंको ' उशिजः ' कहा है । अमुक