सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 461–470

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 461–470

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८६१ ८६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मन्त्र- देवता सर्वज्ञ हुआ करते हैं, इस विषयमें यह प्रमाण देखिये- ' इति मनुष्याणां परोक्षम्, तद् देवानां प्रत्यक्षम् ' ( ताण्ड्य महाव्रा. २२ | १० | यद् ( जो मनुष्योंसे परोक्ष है, वह देवताओंसे परोक्ष नहीं किन्तु देवताओं ३ ) , निरुक्तः प्रत्यक्ष है । ) ' मनो देवा मनुष्यस्य श्राजानन्ति ' ( शत. ३।४।२।६ ) जानन ' देवता ( लोग मनुष्यका मन जान जाते हैं; अर्थात् वे मनुष्यकी बात भी जान लिया करते हैं ) । ' न तिष्ठन्ति न निमिषन्ति एते देवानां स्पश यहाँपर इह ये चरन्ति ' ( ऋ. १०1१०1८ ) जो देवताओंके सूक्ष्म जासूस सभी करले तोकोंमें घूमा करते हैं; वे कहीं ठहर नहीं जाते, श्रोर न अपनी आंखें ( यह कमी वन्द रखते हैं । है । ' यद् मनसा सङ्कल्पयति तद् देवां प्रभिगच्छति ' ( अथर्व. १२ । ४ । द् ' शब्द ३१ ) ( मनुष्य मनसे जो संकल्प ( विचार ) करता है; वह देवताओं में पहुंच जाता है । यजुर्वेद माव्यसं. ३।४।२१६ के शत. में भी कहा है-न्त बनता ' तदाहु: - मनो देवा मनुष्यस्य श्राजानन्ति इति । मनसा सङ्कल्पयति, तत् यहाँपर प्राणमभिपद्यते । प्राणो वातं वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुषस्य मनः ' ' हि ( ३।४।२।६ ) देवता मनुष्यके मनको जान जाते हैं । मनुष्य मनसे विचार गये हैं । करता है, वह विचार प्राणों में पहुंचता है । प्राण उसे वायुमें पहुंचाता है । ञ्चम्पन्त वायुदेव देवताओंको कहता है । यह कहकर शतपथ कहता है- ' तस्माद् एतद् ऋषिणा प्रम्यनूक्तम् ' हि शब्द । ( यही मन्त्रभाग में कहा है – ) मनसा सङ्कल्पयति, तद् वातमभिगच्छति । इस अर्थ वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष! ते मनः ' ( ३४१२।७ ) इसका अर्थ ' हि - यत: ' पूर्व - जैसा है । इससे सूचित होता है कि - विद्वान् भी मनुष्य, मनुष्यका देव - विद्वत् मन नहीं जान पाते, पर देवता जान जाते हैं!.. इससे देवताओंकी सर्वज्ञता सिद्ध होती है । बाले होते जब इस प्रकार इन्द्र आदि देवता. परोक्ष भी जान जाते हैं कि— प्रमुक व्यक्ति द्वारा हमें आहुति दी जा रही है; इसी कारण वे तत्क्षण क्या ' देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक है? [ ८६३ वहाँ पहुंच जाते हैं । तब उन्हें ' उशिजः ' ( वुद्धिमन्तः ) कहना ठीक है । तभी तो देवता लोग उली क्षण श्रर्थात् यज्ञमें देवताके ही जैसे कि ' निरुक्त ' में कहा है- ' यस्यै देवतायै ध्यान के समय मनसा ध्यायेद् वपट् - करिष्यन् ' ( ८३२१११ हविगृहीतं स्यात्; तां इसी कारण व्याकरण ) यज्ञोंमें पहुंच जाते हैं । - महाभाष्य में भी कहा है-' एक इन्द्रोऽनेकस्मिन् क्रतुशते ग्राहृतो युगपत् सर्वत्र भवति ' ( १२२ ६४ ) एक इन्द्र अनेक सैकड़े यज्ञोंमें बुलाया गया एकदम सर्वत्रपहुंच जाता है । विद्वान् मनुष्य इस प्रकार एकदम नहीं पहुंच सकता । तव विद्वान् एवं देवताका कितना महान् अन्तर सिद्ध हुप्रा!!! जब इस प्रकारकी बात है; तब देवता विद्वान् मनुष्यति भिन्न सिद्ध हुए । क्योंकि - देवता तो परोक्षज्ञाता होनेसे, वातशः यज्ञोंमें बुलाये युगपत् ( एक - दम ) सब यज्ञों में प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु विद्वान् मनुष्य हुए अल्पज्ञ एवं सीमित मतिवाला होने से वातदा: यज्ञों में बुलाया हुआ भी युगपत् ( एक - साथ ) सर्वत्र नहीं पहुंच पाता । इधर उक्त शतपथ की कण्डिकामें ' विद्वांसः ' के साथ ' देवा ' शब्द था, ' मनुष्याः ' नहीं । तब उक्त श्रुति में विद्वान् मनुष्योंका ग्रहण हो ही कैसे सकता है? यहांपर ' मनुष्याः ' शब्द न कहनेसे विद्वान् पशुके ग्रहण में भी कोई बाया नहीं पड़ती; तब क्या पूर्वपक्षी लोग विद्वान् ( समझदार ) पशुको भी ' देवता ' कहते हैं? यदि देवयोनि नहीं माना जा सकता । अन्य त्रुटि वांदियों के मत में यह या के मन्त्रमें शतपथको उक्त कण्डिकाके ' देव ' शब्दको विद्वान्का पर्यायवाचक न मानें, तो ' उशिजः ' यह विशेषण यह शब्द व्यर्थ होता है, क्योंकि जब नहीं, तब विद्वान् मनुष्यको भी पड़ती है कि उक्त यजुर्वेदमाध्यं. वादिजनमे इष्ट अर्थके अनुसार मान ले, उसे योनिविशेष - वाचक व्ययं जाता है; अथवा ' देवान् ' उक्त ( ६७ ) यजुर्वेदके मन्त्रमें

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८६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) उशिज: ' यह विद्वान्का वाचक अनुसार ' विद्वान् ' का वाचक व्यर्थ हो जाता है । अन्य इस पक्ष में हानि शब्द भी विशेषण हो जाता जाता है, विशेष्य उक्त याजुष इघर विद्वान् - मनुष्यके घटता । क्योंकि- दैवी प्रजा है; वैसे ही ' देवा ' शब्दको भी वादियों के मान लिया जाय, तब इन दोनों में एक शब्द यह आती है कि उक्त याजुष - मन्त्र में ' देव ' है, और ' उशिज् ' शब्द भी विशेषण रह - मन्त्रमैं कोई भी नहीं रह जाता । पास ' देवीर्विशः प्रागुः ' यह अर्थ भी नहीं भिन्न हुम्रा करती है, और मानुषी प्रजा भिन्न । जैसेकि - ' दैवीश्च विशो मानुषीश्च ' ( यजुः माध्यं. १७/८६ ) मानुषीणां विशां देवीनामुत ' ( अथर्व २०१११।२ ) । ' मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति गावश्च गोभिः तुरगाः तुरङ्ग: ' ( पञ्च. ) के अनुसार देवी प्रजाका देवताओंके पास ही जाना स्वाभाविक है, मनुष्योंके पास नहीं । हाँ, बुलाये जागेपर वे देव वरदानकेलिए मनुष्य के पास जावें, यह अन्य बात है, पर सङ्गति उनकी मनुष्योंके साथ नहीं हो सकती । निष्कर्ष यह है कि- शतपथके अनुसार देवता जन्मसे ही विद्वान् हुआ करते हैं; वे अविद्वान् नहीं हुआ करते । विद्वान् श्रविद्वान् यह दो प्रकारके मनुष्य तो हुआ करते हैं; परन्तु देवता विद्वान् तथा प्रविद्वान् इस प्रकार दो तरह के नहीं होते, केवल विद्वान् ही होते हैं । इस प्रकार उक्त शतपथकी श्रुतिमें ' देव ' शब्द ' विशेष्य ' है, ' विद्वान् ’ ( उशिजः ) यह उसका विशेषण है, उनकी अविद्वत्ताका व्यावर्तक है । जैसे भैंसा श्रादि पशु जन्मसे ही नदियोंमें तैरते हैं, मुझी जन्मसे ही बिना सिखलाये आकाशमें तैरते ( उडते ) हैं, वैसे देव निकी प्राप्ति में ही देवताओं को प्रणिमा श्रादि सिद्धियाँ तथा विद्वत्ता, विना ही अध्ययन वा अभ्यासके प्राप्त हो जाती हैं, परन्तु मनुष्योंमें तो विद्वत्ता तथा अणिमा आदि योगसिद्धियाँ अध्ययन तथा अभ्यासके बाद ही प्राप्त होती हैं; देवता विद्वानोंका नाम नहीं [ ६५ ] ८६६ देवताओंकी भान्ति जन्मसे नहीं । इसके अतिरिक्त उक्त शतपथकी कण्डिकामें ' देवा ' ही विशेष्य ' विद्वांस ' यहाँपर विशेष्य नहीं है । ' विद्वांसः ' पद तो वहां हैं, पर ' देव विशेष्यभूत देवताका विधेय - विशेषण है, पर्यायवाचक नहीं । विद्वान् तव देवता तो स्वभावसे विद्वान् ( ज्ञाता ) सिद्ध हुए; विद्वान् कैसे हो तो देवता सिद्ध न हुए 1 । क्योंकि उक्त कण्डिका में ' विद्वांसः ' विशेष्य मनुष्य-नहीं यहाँ पर है । जिस यजुर्वेद ( ६।७ ) के मन्त्रका शतपथसे प्रोक्त यह उक्त विवरण है. उस याजुष - मन्त्र में विद्वान् मनुष्य शब्दका कहीं गन्धमात्र भी नहीं है, गया all जिससे विद्वान् मनुष्य ही विशेष्य मान लिया जावे । वहाँ तो ' देव ' वा गया है । शब्द है । वहीं ( देव ) उक्त मन्त्र तथा उक्त ब्राह्मणमें विशेष्य है, यह प्रमरक बात सूक्ष्मरूपसे समझ लेनी चाहिये । इधर उक्त शतपथको कण्डिका पड़ा ग देव तथा विद्वानकी परस्पर- पर्यायवाचकता भी इष्ट नहीं है । श्रन्यथा कभी वहाँके हेतु अर्थवाले ' हि ' शब्दका व्याकोप होता है, जिसका ' तस्मात् ' शब्द सहायक ( प्राकाङ्क्षा पूरक ) है । इससे शतपथब्रा के मत में देवता सर्वथा तथा मनुष्यकी भिन्न - भिन्नता सिद्ध हो जाती है । पृ. ४३ देव ' - विषय में ध्यान देने योग्य तर्क । समाप्त ( क ) यदि शतपथको देव एवं विद्वान्की पर्यायवाचकता इष्ट होती; f तब फिर ' विद्वासो ये शतक्रतु देवाः सत्रमतन्वत ' ( शत. ११।५।५।१२ ) फिर -यहाँपर ' विद्वान् ' तथा ' देव ' शब्दकी पुनरुक्ति न होती ( ख ) उक्त यजुर्वेदमाध्यं. सं. के मन्त्रमें भी ' देवान् ' ( विदुषः ), वाचक उशिजः ( विदुषः ) अंतिपक्षीके अनुसार इस प्रकार दोनोंकी पुनरुक्ति न किया होती । ' उशिज तो निघण्टुके अनुसार ' विद्वान् ' का पर्याय है ही । शृण्व ' देवा: ' भी यदि वादीके अनुसार ' विद्वान ' का पर्याय हो जावे; तो स्वतः यह पुनरुक्ति दोष उपस्थित हो जावेगा । ' वा पर स ० घ ० ५५ यह

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= ६५ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) · ८६६ ] ( ग ) ' यो देवस्य प्रियो विद्वान् ' ( बोधा.गृ.शे.सू. १।२२।१५ ) यहां यहैं, ' ' तथा ' विद्वान् ' इनके परस्पर विभक्तिभेदसे भी देवता तथा पर देवस्थ भिन्नता स्पष्ट है | पर्यायवाचकों में भला विभक्ति - भेद न्यभूत विद्वान् मनुष्यकी कैसे हो सकता है? नुष्य- ( घ ) ' देव - द्विज - गुरु - प्राज्ञ पूजनं तप उच्यते ' ( भगवद्गीता १७।१४ ) नहीं यहाँपर तो स्पष्ट ही ' देव ' शब्दसे ' विद्वान् ' -वाचक प्राज्ञ ' ' शब्द पृथक् रखा है, गया है, नही तो न रखा जाता । इसी कारण किसी भी वैदिक - निघण्टु हीं है, वा लौकिक - कोषमें ' विद्वान् ' के पर्यायवाचकों में ' देव ' शब्द कहीं नहीं पढ़ा ' देव ' गया है । भाष्यकार श्रीयास्कने भी ' देव ' का अर्थ ' विद्वान् ' कहीं नहीं किया । यह प्रमरकोष आदि कोषोंमें भी विद्वान‌के नामोंमें कहीं भी ' देव ' शब्द नहीं कामें पढ़ा गया हैं । किसी भी प्राचीन भाष्यकर्तानि ' देव ' का अर्थ ' विद्वान् ' न्यथा कमी एवं कहीं भी नहीं किया । = मात् इस प्रकार हम शतश: प्रमाण दे सकते हैं, जिससे प्रतिपक्षियोंका मत देवता सर्वथा निराकृत हो जाता है । इस विषयमें ' आलोक ' के चतुर्थ पुष्पके पू. ४३१-४३३ में भी हमने स्पष्टता की है । पर इस समय वह पुष्प समाप्त है । मालूम नहीं कि उसकी द्वितीयावृत्ति कव हो? होती; दिङ् मात्र यहाँ एक अन्य प्रमाण भी उपस्थित किया जाता है । १२ ) फिर यह निबन्ध समाप्त जावेगा । ( ङ ) ' विश्वे देवास उत सूरयः ' ( ऋसं. दुषः ), वाचक ' सूरि ' पदसे ' देव ' शब्द पृथक् है । यहां क्ति न किया हैं— ' उत अपि च सूरयः प्राज्ञाः विश्वे ही ।, शृण्वन्तु ' । यहाँ ' देवाः ' यह विशेष्य है, सूरयः स्वतः यह विद्वानोंका पर्यायवाचक होता है । ' देवा ' ' वा पर्यायवाचक हो; तो उक्त मन्त्र में व्यर्थकी २०६६।११ ) यहाँ ' विद्वद् ' श्रीसायणने इस प्रकार भाष्य देवास: - देवाः मम स्तोत्राणि - यह विशेषण है । ' स्रयः ’ भी यदि ' विद्वान ' का नाम पुनरुक्ति हो जावे । स्वा.द.ने ' सूरिभि: ' ( यजुः ८।१५ ) का श्रर्थं ' मेधाविभिः विद्वद्भिः ' यह लिखा है | और ' सूरिः ' ( यजुः १२१४३ ) में भी स्वा.द.ने ' सूरिः ' का देवता ' विद्वान ' का पर्याय नहीं [ ८.६७ ' मेधावी ' अर्थ किया है । ' सूरिः ' ( यजुः १७२२ ) में भी स्वाद ने ' सूरिः ' का अर्थ ' विद्वान ' ' किया है । तव त्रिशेष्य ' देव ' ' विद्वान् ' का पर्याय न हुआ । ( ङ ) ' अग्ने! वर्चस्विन्! वर्चस्वान् त्वं देवेषु प्रसि । वर्चस्वान् अहं मनुष्येषु भूयासम् ( यजुः ७१३८ ) यहाँ श्रग्यिको देव बताकर देवोंमें उसे तेजस्वी बताया है; श्रोर मनुष्योंमें अपनेको अग्निकी भांति तेजस्वी होना प्रार्थित किया गया है । यहाँ देवता और मनुष्यका अन्तर स्पष्ट बता दिया गया है । स्वा.द.ने यहाँ चालाकी करके ' अग्नि ' का श्रयं ' सभापति-' राजा ' अर्थ करके ' देवेषु ' का अर्थ ' विद्वानोंमें ' करके घोर ' मनुष्येषु ' का श्रर्थं ' विचारशील - पुरुषोंमें यह करके स्वकपोलकल्पना कर दो है । कितनी यह नासमझी है! ' देव ' का प्रयं ' विद्वान् ' कर दिया, और ' मनुष्य ' का ' विचारशील पुरुष ' यह प्रयं करके पुनरुक्ति कर दी । कमी तो वे ' मनुष्य ' का ' साधारण मनुष्य ' अर्थ कर देते हैं; और कभी ' विचारशील - पुरुष ' प्रथं कर देते हैं । यह कृत्रिमताका फल है । निघण्टुमें ' सूरि ' यह स्तोताका नाम है, तथापि इसपर भाष्यकार श्रीदुर्गाचार्यने लिखा है— ' एवं मेधाविनः, त एव स्तोतुं शक्नुवन्ति इति मेघाविनामस्य उत्तराणि स्तोतृनामानि ' ( मेधावी लोग ही वैदिक स्तुति कर सकते है; इसलिए मेधावियोंके नामोंके बाद ही स्तोताओंके नाम रखे गये हैं । भो ' उन नामोंमें आया हुआ ' सूरि ' शब्द भी ' विद्वान् स्तोता ' का नाम हुआ । श्रतः टीकाकार वा: भाष्यकार ' सूरि ' का भी ' विद्वान ' ही अर्थ किया करते हैं । फलतः ' देव ' शब्दका स्वाद के द्वारा विद्वान् मनुष्य अर्थ करना वैदिक एवं लौकिक शास्त्रोंसे विरुद्ध है, आशा है ' आलोक ' पाठकोंने इस विषयपर जो सध का श्रावश्यक विषय है - मीमांसा देख ली होगी ।

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८६८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) एक प्रक्षेपपर विचार उपसंहार ( निष्कर्ष ) यदि ' देव ' शब्द ' विद्वान् ' का पर्यायवाचक होता, तो ' देवान्... उशिजः ' ( यजुः माध्यं.सं. ६/७ ) इस मन्त्र में ' उशिज ' शब्द कहने की आवश्यकता ही नहीं थी; क्योंकि वह भी ' विद्वान ' का वाचक है । तब वेदका न्यायद. ( २।१।६७ ) के अनुसार अप्रामाण्यापादक ' पुनरुक्ति ' दोष हो जाता । तब तो मेधावीके निघण्टु ( ३।१५ ) प्रतिपादित नामों में ' उशिज: ' की भान्ति ' देवा ' शब्द भी होना चाहिये था, पर नहीं है । तब वादीका पक्ष निराधार ही है । ' देवाः ' के विद्वत्पर्याय होनेपर उक्त शेष मन्त्रमें ' देवा ' भी विशेषण हो जानेसे, फिर मन्त्रमें ' विशेष्य ' कोई भी नहीं रह जाता, अतः वादीका पक्ष बिल्कुल ' ' बेबुनियाद ' हैं । इस विषय में ' आलोक ' - पाठक यदि पूरी स्पष्टता जानना चाहें; तो वे ' आलोक ' के चतुर्थ पुष्पमें इस विषय में देखें. जो अब समाप्त हो चुका । इस हमारे मतको एक शास्त्रार्थ महारथीजीने भी अपने वेदविषयक पुस्तकमें अनूदित किया है । ( ६५ ) एक प्रक्षेपपर विचार । पूर्वपक्ष- मुझे खेद है कि श्री शास्त्रीजी विद्वान् पण्डित होते हुए भी ऐसा लेख लिख रहे हैं जो कि स्त्री जातिको ही नहीं, समस्त समाजको ही अवनति गर्तमें गिरानेवाले हैं । स्त्रियोंको वैदिक - विद्यासे वञ्चित करना उनको तथा समाजको अवनत करना है । उत्तरपक्ष - हम तो कहते हैं कि - शास्त्रानुसार स्त्रीको वेदका वैध-अधिकार नहीं है । श्रतएव उसे तो वह पढ़ नहीं सकती । शेष रही वेद-की शिक्षा; सो वह पुराण- इतिहासके द्वारा वा परम्परासे आ रही हुई श्राचार - शिक्षा द्वारा सुन्दर वा सुगम प्रकारसे स्त्री - शूद्रादिको मिल सकती है । ' अक्के चेद् मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् ' घरके कोनेमें ही यदि शहद मिल जावे; तो पहाड़के ऊपर चढ़नेके परिश्रम की भला क्या है? आवश्यकता ( प्र. ६ ) स्त्रियों के लिए वेदकी आवश्यकता नहीं । वेदकेलिए किये हैं यज्ञोपवीतिता ' ( महा. अनुशा. १४१।३६ ) नित्य यज्ञोपवीत तो ' नित्य- इस आवश्यकता होती है, परन्तु स्त्रियोंसे वह नहीं निभ सकता रखनेको प्र. ३।१ पूर्वज जानते थे । वे उनका रजःकाल तथा प्रसवादि कष्ट यह जानते हमारे थे, को ला जिसमें अपवित्रतावश ‘ नित्य- यज्ञोपवीतिता ' सम्भव नहीं हो सकती थी । १४२६ हाँ, उनकेलिए वेदके अर्थकी श्रावश्यकता हम भी भानते हैं । ' सती भव ' उत्पादन वेदका शब्द उनको वह नहीं सिखला सकता; जो उन्हें अर्थरूप सीता- मुल्य उ सावित्रीका पौराणिक इतिहास सिंखला सकता है । यह पिता वा पति- हम का कर्तव्य है कि -- कन्याको प्राचारादिकी शिक्षासे शिक्षित यह प्राप होनेके लिए वेदका अध्ययन अनधिकारीकेलिए नहीं है । वेदाध्येता- तथा स्त्री रावणादि क्या बुरे नहीं हो चुके? ' शास्त्राणि प्रधीत्यापि भवन्ति मूलः स्वरूप ( ' शास्त्रोंको पढ़कर भी लोग मूर्ख वा दुराचारी ' हो सकते हैं ) ' ' प्राचार सन्तानों हीनं न पुनन्ति वेदाः, यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्ग: ' ( श्राचारहीनको स्वास्थ्य ङ्गों सहित पढ़े हुए भी वेद पवित्र नहीं कर सकते ) । बुरा प्रभ इव वादीके स्वामी भी कह गये हैं कि - ' मूर्ख - स्त्री - पुरुषादि द्वारा हुई फिर पाकादि - सेवा कराई जाय ' ( स.प्र. १० समु. पृ. १६६ ) । ' अन्न- पवस्यां योग्यता च ' ( ε । ११ ). मनुजीने ' महानसस्य पात्राणि बहिः प्रक्षाल्य सर्वथा । नौका, मृद्भिश्च शोधयेत् चुल्लीं तत्राग्निं विन्यसेत् तथा । ततोऽन्नसाधनं कृत्वा कपड़े सीन पतये विनिवेद्य तत् ' ( २।२३ - २८ ) में श्रीव्यासने तथा ' उपचर्थः स्त्रिया उज्योंके साध्व्या सततं देववत् पतिः ' ( ५। १५४ ) मनुजीने स्त्रीको पाकादि सेवा, पाल सक चुल्ला लीपना, सुलगाना, पतिको खिलाना आदि सेवाको प्राज्ञा दी है । रहे । तत्र वादीके स्वामीके अनुसार भी स्त्रियोंका अविद्यात्व सिद्ध हो टिप्प गया । इसलिए वेदने भी. ' यथा नडं कशिपुवे स्त्रियो भिन्दन्ति ग्रश्मनाः III-

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६६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ] वश्यकता / १३८।५ ) इत्यादि द्वारा स्त्रियोंके लिए अविद्यामूलक कार्य श्रादिष्ट | ( प्र. ६ किये हैं । ' नित्य- इसी भान्ति अथर्व. १४१२२५१ में ' स्त्रियोंके लिए कपड़े का बुनना ' रखनेको ३।१२१८ में घड़ेका भरना, अ. ११।२।१३ में प्रोदन बनाने या पानी-ह हमारे प्र को. लानेकेलिए स्त्रीका भेजना, अ. ११।१।१४ में घड़ेका उठाना अ ,. नते १४/२/१३ आदि मन्त्रोंके अनुसार स्त्रियोंको गृहक्षेत्र देना, सन्तान ती थी । । उत्पादन आदि कार्य देना, इससे वेदानुसार स्त्रियोंको सेवाका कार्य देना ती भव उद्देश्य है, वेद आदिका अध्ययन मुख्य नहीं । | मुख्य सीता. हम कहते हैं कि — स्त्रीको जो आप अक्षर- शिक्षा दिलाना चाहते हैं, पति- । यह प्राप उनपर भारी भार रखना चाहते हैं । पुरुषके शुक्रके थोड़े अश " शिक्षित तया स्त्रीके अधिक रजसे लड़कीकी पैदायश होती है । इसके परिणाम-बाध्येता- स्वरूप उस निबंलाके गर्भाशय पर उसका दुष्प्रभाव पड़ता है । उसकी मूर्खा सन्तानोंके मस्तिष्कपर हानि पड़ती है । उसके निमित्त वह अपना प्राचार स्वास्थ्य खो बैठती है । उसी कारण उसके शिशुओंोंके स्वास्थ्यपर भी रहीनको बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे समाजकी हानि होती है । इधर वादीकी मनचाही शिक्षासे शिक्षित हुई हुई वे पति - समान बनी दि - द्वारा हुई फिर पति सेवा नहीं करना चाहतीं, क्योंकि - सेव्य - सेवकता, असमान--पक्त्यां | योग्यता तथा स्वस्वामिभावमें होती है, साम्यवादमें नहीं । तब उन्हें सर्वथा । चौका, चक्की, चूल्हा, कपड़े घोना, घड़े भरना, घरके क्षेत्रमें रहना, - अड़े सीना, बुनना, कसीदा काढना आदि कार्य बुरे मालूम होते हैं । वे : स्त्रिया के मलमुत्र शोधनादिकार्य भी नहीं कर सकतीं, वे बच्चोंको भी नहीं दि सेवा, राल सकतीं । नहीं तो वे यज्ञमें लगी वंठी रहें; और बच्चा बैठा रोता दी है । है । मना टिप्पणी- पृ. ७७२ में उपान्तिम पङ्क्ति देखो ' आलोक ' ( ७ ) । १४२६-४२८ । -उपाध्याया श्राचार्या श्रादिपर विचार [ = 9? इस प्रकार वादीकी इष्ट स्त्रिय गृहकृत्यमें अयोग्य सिद्ध होती हैं । जितनी अधिक प्रयुनें उन लड़कियोंका व्याह होता है, गर्भाशय में कठोरता श्रा जानेसे उन्हें सन्तत्युत्पादनकी अनिच्छा हो जाती है । इसलिए वे विवाह ही नहीं करना चाहतीं । पर विलास - सम्बन्धी चिन्तन-शीलताके कारण नारीत्व तया मातृत्व उनसे लुप्त होता जा रहा है । वच्चे उनके चिरजीवी नहीं होते; वा श्राचारहीन वा गुण्डे होते हैं । बच्चोंकी पढ़ाई माता पर अवलम्बित नहीं, किन्तु पिता तथा श्राचार्यपर ही अवलम्बित होती है । इसी अक्षरशिक्षाके फलस्वरूप स्त्रियोंके भी श्राचारका पतन होता जा रहा है । इस विषय में हम पृ. २५२-२१७ में लिख चुके हैं । फलतः श्राप लोग इन्हें हानि पहुंचा रहे हैं । इसी कारण उनके लड़के कमजोर होते हैं; समयपर उनके लड़के कम होते हैं, लड़कियां अधिक होती है । श्राचारशिक्षा लड़कियोंको जो पिता वा पति दे सकता है; उसे ग्रन्य पुरुष वा स्त्रियाँ कैसे दे सकती हैं? वे तो ' रक्षक ' के स्थान नक ' ' हो सकते हैं, जिससे समाजको भी भयङ्कर हानि पहुंचनी स्वाभाविक है; जिसकेलिए वे तैयारियां कर रहे हैं । शाब्दिक शिक्षाते स्त्रियोंको क्या लाभ? ' स्वल्पं तथाऽयुर्वहवश्च विघ्नाः ' ( आयु थोड़ी है, और विघ्न बहुत हैं ) । हां, हम उनको पति वा पिता द्वारा दी जानेवाली कर्तव्यबोधक-शिक्षाका विरोध नहीं करते । वेदके अतिरिक्त साधारण शास्त्रोंके ज्ञानसे भी हम उन्हें नहीं रोकते; पर वह भी उन्हें ' पिता पितृव्य त्राता वा नैनामध्यापयेत् परः ' के अनुसार पिता यदि द्वारा होनी चाहिये, याचार्य-द्वारा, कन्या गुरुकुलों वा कन्याविद्यालय - महाविद्यालयों द्वारा नहीं । ( क ) पूर्वपक्ष - महाभाष्यादिनें स्त्रियंकि उपाध्याया, प्राचार्या दया व्याकरण - मीमांसादि शास्त्रोंके पण्डिता होनेका निर्देश है । उत्तरपक्ष - हम अन्यत्र लिख चुके हैं कि- महाभाष्य स्त्रीका वेदा-

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६७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ध्ययन वैध नहीं मानता । बादीने उसका कुछ भी प्रत्युत्तर नहीं दिया । शेष रहे उसमें उपाध्याया, प्राचार्या आदि शब्द, सो वहां यह जानना चाहिये कि - व्याकरण शब्दशास्त्र है; धर्मशास्त्र नहीं । व्यवहार में शास्त्रविहित वा शास्त्रनिषिद्ध सब शब्दोंकी आवश्यकता कभी पड़ ही जाती है । उसी व्याकरणमें स्त्री - प्रत्यय में ' चौरी ' उदाहरण ' ताच्छीलिके णेऽपि ' का है । तब क्या स्त्रियोंकी चोरीकी प्रकृति रखना शास्त्रीय हो जायगा? कट गई वादीकी यह बात । सो उन पुराकल्पवाली कई स्त्रियों ( ऋषिकाओं ) की इन शब्दोंसे सिद्धि हो जाती है । जैसे ' हरिश्चन्द्र ' शब्दकी सिद्धि राजर्षि विशेषवाच्तता होने पर होती है । इस ' हरिश्चन्द्र ' शब्दका श्राजकल नाम श्रादिमें वेदाङ्गके अनुसार उपयोग नहीं हो सकता, इसकी चरितार्थता केवल पूर्व - शब्दके दिखलानेसे ही हो जाती है; इसी प्रकार यहाँ भी समझ लें । वर्तमानकालमें वैसी प्रज्ञा सिद्ध नहीं हो जाती । पूर्वकल्प में स्त्रियोंकी विवाह विधि नहीं होती थी । देखिये इसपर महाभारत ( श्रादिपर्व १२२।४ ) । पर ऐसा व्ववहार व आचरणीय नहीं होता । इस प्रकार यहां भी समझ लें । ( ख ) ' लोगाक्षिको भी ' षट्त्रिशतं वा श्रष्टचत्वारिशतं वा ब्रह्मचर्यम् ' ( २५ ) में जातिपक्षसे कन्या ब्रह्मचर्य भी यदि इष्ट होता; तो फिर वह कन्याओंका ब्रह्मचर्यं पृथक् क्यों बताता? वह भी विवाह कण्डिकामें । इससे स्पष्ट है कि - लौगाक्षिको वहां कन्यानोंका ब्रह्मचर्यं वादीके अनुसार वेदाध्ययन इष्ट नहीं; किन्तु १० वा १२ वर्षकी श्रासे पूर्वतक कन्यानोंका ब्रह्मचर्य ' ( अविवाह ) इष्ट है । प्रर्थात् १० - १२ वर्षतक संयमवती रहकर फिर उसका विवाह हो, वादीके श्रद्धय श्रीदेवपालने वहाँ भाष्य किया है— ' वर्ष- दशकाद् ऊर्ध्वं कुमारी न स्थापयितव्या पित्रा, अगत्या वा द्वादश वर्षाणि नातिक्रमणीयानि ' यहाँपर स.ध.का पक्ष कितना स्पष्टरूपसे पुष्ट किया गया है । इससे तो उल्टा वादीकी मानी कन्या-ब्रह्मवाद स्त्रीप्रज्ञासे वहिर्भूत है विवाहावस्था ( १७-२४ ) ही कट गई । ' दुब्वे बनकर श्राये ' । वादीने अपनी पुस्तक ( पृ. १७७ ) - ( वेद जाननेवाली ) बताया है; वस्तुतः ' ब्रह्मवदनशीला ' अर्थ है, जो वेदसे भिन्न इसमें शतपथकी ही एक साक्षी देखें ।— [ ८७३ ' चौवेजी गये थे छब्बे बनने, में ' मैत्रेयी ' को ब्रह्मवादिनी वहाँ यह अर्थ नहीं किन्तु ग्रन्थोंसे भी हो जाता, ज्येष्ठ है । उसमें शतपथमें ब्रह्मवादिनी ' मैत्रेयी ' की सपत्नी ' कात्यायनी ' के लिए लिखा प्रभाव है- ' स्त्रीप्रज्ञैव कात्यायनी ' ( १४ | ७ | ३१ ) अर्थात् कात्यायनी स्त्रियों - जैसी बहुत से बुद्धिवाली थी; उसमें ब्रह्मज्ञान नहीं था । सो यहाँ ' ब्रह्मवादिनीत्व ' उन्हें स्त्रीप्रज्ञात्वके अधिकारसे वहिर्भूत हुआ । अतः म.म. पं. शिवदत्तजीने बताया ' आर्यविद्यासुधाकर ' की टिप्पणीमें ' ब्रह्मवादिनी ' के पतिको ' पति ' न वह लेख मानकर उसका ' रक्षक ' अर्थ माना है । क्योंकि -'ब्रह्मवादिनी ' होनेवर पर हम हारीतादि धर्मशास्त्रोंके अनुसार उसको ' यावज्जीवन ब्रह्मचारिथी- पक्ष सम उपस्थसंयमवती ' होने से वह ( याज्ञवल्क्य ) उसका वैवाहिक पति कैसे कट्टर -विषयों हो सकता था? सो जहां किसी स्त्रीकेलिए ' ब्रह्मवादिनी ' शब्द या जावे; उसे ' विवाहित स्त्री ' न मानकर ' यावज्जीवन ब्रह्मचारिणी ' ( उपस्थ पर उन संयमवती ) होकर केवल ज्ञानर्संचयकेलिए उस पुरुषके पास रहना पड़ता शास्त्रा प्रेरित है, अतः वह ' पति ' उसका ' वैवाहिक पति ' न होकर केबल रक्षक ही हुआ करता | इसलिए स्त्रीकेलिए जहाँ ब्रह्मवाद था- जावे; वहाँ वेदसे तर . अभिप्राय न होकर अन्य शास्त्रों में प्रोक्त ब्रह्मवाद ही समझना चाहिये । १ ९ ४७ अथवा वादीके श्रभिभत हारीतानुसार उस ब्रह्मवादिनीको यावज्जीवन है । ) इ ' सिद्धान्त श्रविवाहित या उपस्थसंयमवती रहकर निर्दिष्ट नियम पालने चाहियें । संक्षेपसे पर यह सर्वसाधारण स्त्रियोंका विषय न होनेसे अपवाद होता है; इसमें संस्करण सर्वसाधारण स्त्रियोंका परिगणित न होनेसे वादीका पक्ष कट जाता है । स्पष्ट क वि

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८७३ बनने एक विद्यालंकारके प्रक्षेपका प्रत्युत्तर ( पृ. ६१-६२ का परिशिष्ट ) वादिनी ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' शीर्षक मेरा लेख ' सिद्धान्त ' ( ७ | ७-८ ) किन्तु ज्येष्ठ कृष्ण २००३ काशी में जब में मुलतानमें था, प्रकाशित हुआ था । है । उसमें मैंने स्वा.द.जीके उक्त मन्त्रके अर्थका निराकरण किया था । उसका प्रभाव पण्डित - समाजपर बहुत अच्छा पड़ा था । इसके लिए मेरे पास -लिखा बहुतसे पण्डितोंके पत्र आये, जिनमें उन्होंने ' यथेमां ' के अर्थके विषयमें -जैसी उन्हें जो स्त्री - शूद्रोंको वेदाधिकारविषयक भ्रम था; उसका दूर होना दिनीत्व ' बताया था । एक डी. ए. वी. स्कूलके रिटायर्ड हेडमास्टर के लिए हमें दत्तजीने वह लेख विशेष रूपसे लिखना पड़ा था । उनने भी अन्य लेख लिखे; तिन पर हमारे उक्त निबन्ध पर कुछ नहीं लिखा, इसलिए उन्हें भी हमारा होनेपर पक्ष सम्मत हुआ ' परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम् ' । ' सार्वदेशिक ' के सम्पादक परियो कट्टर - आर्यसमाजी स्नातकने भी हमारे लेखको ' सिद्धान्त ' में देखा; अन्य ति कैसे बिपयोंपर तो कुछ उन्होंने लिखा भी, पर मुझसे लिखे हुए उक्त मन्त्रार्थं जावे; पर उनकी लेखनी भी न चल सकी । उपस्थ शास्त्रार्थ महारथी एक विद्यालङ्कारको -पड़ता प्रेरित किया । कही वेदसे तथाकथित उन शास्त्रार्थ - महारथी हिये । १ ९ ४७ ) में मेरे लेखपर ' वेदोंका उपदेश ' तब उनने अपनी समाजके इस विषयपर लिखने केलिए ने भी ' सार्वदेशिक ' ( सितम्बर ( वेद पढ़नेका अधिकार सबको ज्जीवन है । ) इस शीषंकसे समीक्षा लिखनेकी चेष्टा की । उसका निराकरण मैंने हियें । ' सिद्धान्त ' पत्र ( फाल्गुन शुक्ल ६ सं ० २००४ ) में दिया था, जिसे इसमें संक्षेपसे मैंने ' आलोक ' के तृतीय पुष्पके प्रथम तथा अब इस द्वितीय है । संस्करण में इस पृष्ठसे संक्षेपसे दिया है । अब मैं यहां उक्त निबन्धको स्पष्ट करता हूं ।. विद्यालङ्कारजीने अपनी पारम्परिक प्रकृतिवश मुझसे लिखी बहुत-विद्यालंकार के प्रक्षेपका उत्तर [ ८७५ सी वातोंका प्रत्युत्तर नहीं दिया; और मन्त्रार्थमें खूब तोड़ - मोड़की चेष्टा की । यह लोग हमारे दिये हुए प्रमाणोंको ' प्रक्षिप्त ' कहकर माननेसे इन्कार कर दिया करते हैं । पर वेदमन्त्र के अर्थ करनेके समय वे स्वयं कई शब्द उसमें ' प्रक्षिप्त ' कर दिया करते हैं । यदि वे ऐसा न करें, तो फिर इनकी रेतीली दीवार उसी समय ढह जावे; श्रौर जनतापर रहा-सहा उनका झूठा रोव भी नष्ट हो जाय । विद्यालंकारजी लिखते हैं- ' शङ्कराचार्यजीके अतिरिक्त वेदव्यास, जैमिनि मुनि, पारस्कर आदि गृह्यसूत्रकार, मन्वादि स्मृतिकार, रामायण-एवं महाभारतकार किसीने भी स्त्री - शूद्रको वेदका श्रनधिकारी नहीं माना । हाँ, शङ्कराचार्य महाराजने अवश्य लिखा है कि- ' प्रस्य हि शूद्रस्य वेद मुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम्, उदाहरणे जिल्ह्वाच्छेदः, धारणे शरीरभेद: ' । ' शूद्र यदि वेदको सुन रहा हो, तो सीसा श्रौर लाख से उसका कान राजा भरवा दे । यदि शूद्र वेद बोल रहा हो; तो उसकी जीभ काट दी जावे । यदि वेदको अपने अन्दर धारण कर रहा हो, तो उस शूद्रकी छाती फड़वा दे ) ' । देखिये पाठकगण! विद्यालङ्कारजीने प्रारम्भमें ही ' प्रथमग्रासे मक्षिकापात: ' यह न्याय चरितार्थ किया है । हम दिखलाते हैं कि - इन सभीने स्त्री - शूद्रको वेदका अनधिकारी बताया हैं । विद्यालङ्कारजी देखें । पहले मनुस्मृतिके प्रमाण इस पुष्पके ५-६ पृष्ठमें देखें । ' भगवद्गीता ' में भी कहा है- ' परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ' ( १८४४ ) ( शूद्रोंका स्वाभाविक कर्म सेवा करना है ) ' अत्रिस्मृति ' में भी लिखा है - ' प्रात्मीये सस्थितो धर्मे शूद्रोपि स्वर्गमश्नुते । परघर्मो भवेत् त्याज्यः सुरूपपरदारवत् ' ( १८ ) ( अपने सेवाधर्ममें स्थित शूद्र भी स्वर्गको प्राप्त करता है । उसे दूसरेका धर्म छोड़ देना चाहिये; जैसे सुन्दरी भी दूसरेकी

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८७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्त्रीको छोड़ दिया जाता है ) । गीता में भी कहा है- ' स्व - कर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ' ( १६/४६ ) ( मानव अपने कर्म करनेसे भगवान् की पूजा कर रहा होता है । ) अपने विगुण - कर्मपर भी गीता कहती है- ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वभाव- नियतं कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( १८ ।४७ ) ( अपना विगुण भी धर्म दूसरे के अच्छे धर्मसे भी अच्छा होता है, स्वभावसे नियत कर्मको करता हुआ पुरुष पापको नहीं पाता ) । ' सहजं कमं कौन्तेय! सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ' ( १८४८ ) ( श्रीकृष्ण भगवान् श्रर्जुनसे कहते हैं-अपना स्वाभाविक कर्म दोषयुक्त हो; तब भी उसे न छोड़े । क्योंकि सभी कर्मोमें कोई न कोई दोष रहा ही करता है, जैसे अग्निमें घूम रहता है ) । मनुजीको वैदिकता देखिये – ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना सम्प्रकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( २७ ) ( मनुजीने जो जिसका धर्म बताया है; वह सारा वेदमें ही कहा गया है । क्योंकि— मनुजीको वेदका सारा ज्ञान है ) । जब ऐसा है; तो वादीका पक्ष कट गया कि - श्री शङ्कराचार्यके अतिरिक्त किसीने भी शूद्रादिको वेदका ' अनधिकार नहीं बताया ' । जिस कड़े दण्डको वादी श्रीशङ्कराचार्यका मत बताता है, वैसा कड़ा दण्डवादिप्रतिवादिमान्य मनुजीको भी अभिमत है । देखिये- ' धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य [ शूद्रस्य ] कुर्वतः । तप्तम सेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ' ( ८।२७२ ) ( यदि शूद्र अभिमानसे ब्राह्मणोंको धर्मोपदेश देने लग पड़े; तो राजा उस ( शूद्र ) के कानमें तथा मुखमें गर्म तेल डलवाये ) । और भी देखिये-' एकजातिद्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् । जिह्वायाः प्राप्नुयात् विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर ८७७ 585 छेदं जघन्यप्रभवो हि सः ' ( मनु. ८।२७० ) ( यदि शूद्र द्विजों को गाली दे तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए ) । ' नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण; कि वेदा कुर्वतः । निक्षेप्योऽयोमयः शंक्रुर्ज्वलन् श्रास्ये दशाङ्गुलः ' ( ८।२७१ ) ( यदि समान है शूद्र द्रोहसे नाम वा जातिका नाम लेकर द्विजोंकी निन्दा करे, यह शूद्रके मुखमें राजा जलता हुआ दस अंगुलिका कील डाले ) यह इनसे वेद ' गौतमधर्मसूत्र ' की भान्ति कड़ा दण्ड नहीं? तब वादीका वेदका अ गया । अधिक कड़े दण्डके विषयमें स्वा.द.जी भी लिख गये हैं- ' जो इसको कड़ा दण्ड श्री वेदा जानते हैं; वे राजनीतिको नहीं जानते । क्योंकि एक पुरुषको इस प्रकार यह घा- ' मन्व [ कड़ा ] दण्ड होनेसे सत्र लोग बुरे [ शास्त्रविरुद्ध ] कामको छोड़कर भी स्त्री-धर्म - मार्ग में स्थिर रहेंगे, ( स.प्र. ६ ठे समुल्लास की समाप्ति पृ. १०६ में ) मनुस्मृतिके अन्य भी बहुतसे पद्य हैं, जिनसे स्त्री एवं शूद्रका वेदाधिकार भी गलत ध्यासस्ट कटता है, पर विस्तारभयसे नहीं लिखे । दिङ्मात्र एक - दो पद्य और भी स्वाहा - वर्ष हम लिख देते हैं, जिन्हें वादी मान्य मानता है । वे यह हैं-निषिद्ध ' योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु श्रव गच्छति सान्वयः ' ( २।१६८ ) यहां पर वेदका अध्ययन न करनेवाले प्रसंस्काय द्विजको ' साहित्य सङ्गीत- कलाविहीनः साक्षात् पशुः पुच्छ - विषाणहीन छन्दसे उत की भान्ति अर्थवादसे शूद्र कहा गया है । जब वेद न पढ़े हुए द्विजको वब ऐसा शूद्र कहा गया है, तब इससे भी शूद्रको वेदका अनधिकार सिद्ध हो रहा देखिये- ' अ है । इसी प्रकार ' न तिष्ठति तु यः पूर्वी नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स वह प्रयंव शूद्रवद् वहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ' ( मनु. २११०३ ) यहां पर दो डिसीने काल वैदिक सन्ध्या न करनेवाले द्विजको शूद्रकी भान्ति द्विजकर्मसे कलियुग के वहिष्कृत करना कहा है । मनुजीका अन्य वचन भी देखिये – ' नाभि गृह न व्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद ऋते । शूद्र ेण हि समस्तावद् यावद् वेदेन मुद्रा द्वि जायते ' ( २।१७२ ) ( तब तक द्विज वेदमग्त्रोंका उच्चारण न करे, जब तक ( शूद्र यदि वह नरक

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-७७ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ८७८ दे; । कि वेदारम्भ - संस्कारको प्राप्त नहीं करता । क्योंकि तब तक वह शूद्र के हिण है ) इससे भी शूद्रका वेदमें श्रनधिकार सिद्ध हो रहा है । समान यदि यह तीन पद्य मनुस्मृति में अप्रक्षिप्त एवं वादिप्रतिवादिमान्य हैं! उस इनसे वेद न पढ़नेवाले द्विजको शूद्र कहा है । तब इससे भी शूद्रको क्या अनधिकार सिद्ध हो रहा है । श्राशा है- विद्यालङ्कारजीकेलिए यहां कट | वेदका करनी उनकी पदवीका गौरव घटाना होगा अधिक स्पष्टता । स्त्रीकेलिए श्री वेदाधिकार वर्जित है - यह पृ. ५ में देखें 1 दण्ड यह बात हुई मनुस्मृति की; उसके आगे हमने ' आदि ' शब्द दिया कार पा- मन्वादि स्मृतिकार ' । विद्यालङ्कारजी कहते हैं कि- ' उन स्मृतिकारोंने बेड़कर श्री स्त्री - शूद्रका कहीं वेदानधिकार नहीं माना, पर उनकी यह बात में ) भी गलत है । एक प्राध उनका भी उद्धरण देख लीजिये । देखो विकार यासस्कृति- ' शूद्रो वर्णश्चतुर्थोपि वर्णत्वाद् धर्ममर्हति । वेदमन्त्र - स्वधा-र भी | लाहा वषट्कारादिभिर्विना ' ( १६ ) यह पर शुद्रको वेदमन्त्रोंका प्रयोग निषिद्ध किया गया है । वमाशु अव ' वसिष्ठ - धर्मसूत्र ' देखिये- ' न केनचित् छन्दसा शूद्रम् - इतिं नेवाले प्रसंस्कार्यो विज्ञायते ' ( ४ | ३ ) यहां पर बताया गया है कि - ( शूद्र किसी हीन ' इन्दसे उत्पन्न नहीं हुआ । अतः उसका उपनयन संस्कार नहीं हो सकता । ) द्विजको दब ऐसा है; तो वह वेदमें अनधिकारी रहा । अव ' गौतमधर्मसूत्र ' हो रहा देखिये- ' अथास्य वेदमुपशृण्वत: त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् ' ( २।३।४ ) सह प्रर्थवाद- वाक्य शूद्रके वेदानधिकारमें पर्यवसित होता है । इनमें दो किमीने भी स्त्री एवं शूद्रका उपनयन तथा वेदारम्भ नहीं माना! कमसे कलियुग के लिए नियत ' पराशरस्मृति ' में लिखा है- ' वेदाक्षर - विचारेण - नाभि नरकं ध्रुवम ( शूद्रश्चाण्डालतां व्रजेत् ) ( १।७४ ) ' विकर्म कुर्वत वेदेन मुद्रा द्विजशुश्रूषयोज्झिताः । निरयं यान्त्यसंशयम् ' ( परा. २।१६ ) तब तक ( शूद्र यदि वेदाक्षरों का विचार करे, और द्विजोंकी सेवा छोड़ दे; तो वह नरकको जाता है । ) , विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर ] ८७ श्रव महाभारतकारको लीजिये- ' मन्यः शूद्रे न विद्यते ' ( शान्तिपर्व ६०।३७ ) ( मन्त्रात्मक बेद शूद्रमें नहीं होता ) । ' न च तां ( रुक्मिणी ) प्राप्तवान् मूढः ( शिशुपालः ) शूद्रो वेदश्रुती मिब ' ( सभापर्व ४५११६ ) ( शूद्र वेदमन्त्रोंको प्राप्त नहीं कर सकता ) । ' नाधीयीत प्रतिषिद्धोऽस्य ( शूद्रस्य यज्ञः ' ।एवं स्मृतः शूद्रधर्मः पुराणः ' ( उद्योगपर्व २६।२६ ) यहाँ पर श्रीसातवलेकरजीने श्रर्थं लिखा है- ' शूद्रको वेद पढने और यज्ञ करनेका अधिकार नहीं है; यह शुद्रका पारम्परिक ( प्राचीन ) घर्म है । और देखिये-' सा वेदिः वेदसम्पन्न ': देव द्विज - महर्षिभिः । श्रवभासे समाकीर्णा नक्षत्र: द्यौरिवायता ' ( महां. सभापर्व २६८ ) ( वह यज्ञवेदी वेदज्ञ द्विज श्रादिसे युक्त थी ) न तस्याः [ यज्ञ वेद्याः ) सन्निधौ शूद्रः कश्चिदासीद् न चाऽव्रती । अन्तर्वेद्यां तथा राजन्! युधिष्ठिरनिवेशने ' ( ३६१६ ) ( युधिष्ठिरकी वेदी के पास कोई शूद्र वा व्रतहीन नहीं था । ) अब पारस्करादि गृह्यसूत्रोंका मत भी देख लीजिये । उन्होंने तीन वर्णों को ही यज्ञोपवीत दिया है । शूद्रको उन्होंने उपनयन एवं वेदाध्ययन नहीं दिया । देखिये- ' प्रष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत गर्भाष्टमे वा; एकादशवर्षं राजन्यं, द्वादशवर्षं वैश्यम् ' ( पार. २।२1१-३ ), इसी प्रकार ब्राह्यायण-गृह्यसूत्र ३।४।१-३-५ ), जै.गृ.सू. १1१२ ) में, आप.गृ. ( ४।१-३ ) में, गोभि.गृ. ( २1१०1१-३ ) श्रग्निवे. गु. १1१1१ ) में, काठ.गृ. ४१1१-३ ) में, खा.गृ. २1३ ) में; इस प्रकार प्रायः सभी गृह्यसूत्रोंमें है । इनमें शूद्रको यज्ञोपवीतका अधिकार नहीं दिया गया । इस प्रकार स्त्रीको भी वैसा अधिकार नहीं दिया गया । ' लाट्यायन श्रौतसूत्र ' में भी लिखा है-' प्रर्थोऽन्तर्वेदि दक्षिणमुखस्तिष्ठेद् बहिर्वेदि शूद्र उदङ्मुखः ' ( ४।३।५ ) इस प्रकार श्रौतसूत्रोंमें भी शूद्रका यज्ञवेदिमें अधिकार नहीं माना गया । जब ऐसा है; तो विद्यालङ्कारजी किस मुहसे कहते हैं कि - श्री-शङ्कराचार्यके अतिरिक्त किसीने भी स्त्री - शूद्रको वेदका अनधिकार नहीं दिया ।

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८८० ] श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) अब श्रीजैमिनि मुनिका भी मत सुन लीजिये – ' प्रपि वा वेदनिर्देशाद् अपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( मीमांसा. ३।१।३३ ) यहाँपर श्रीजैमिनिमुनिको ' वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत, ग्रीष्मे राजन्यम्, वर्षासु वैश्यम् ' यही वेदनिर्देश अभीष्ट है । यहाँ शूद्रका उपनयन इष्ट न होनेसे श्रीजैमिनिमुनिको भी शूद्रका वेदाधिकार इष्ट नहीं । इधर जबकि — श्रीजैमिनिमुनिने ' मीमांसादर्शन ' के छठे अध्यायके प्रथमपादमें प्रथम प्रधिकरण ही ' योगे शूद्रस्य अनधिकाराधिकरणम् ' रखा है; तब उनके मतमें शूद्रका वेदाधिकार सिद्ध हो ही गया, क्योंकि - यज्ञ वेदका विषय है । जैसे कि ' आलोक ' ( ६ ) में देखिये पृ. १४२-१४६ । ' यज्ञो मन्त्र- ब्राह्मणस्य ' ( वेदस्य ) ( न्यायदर्शन ४ | १ | ६२ ) ' वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः ' ( ' सिद्धान्तशिरोमणि गणिताध्याय 8 ) इत्यादि । इसलिए यज्ञविषयवाले वेदकेलिए श्रधिकारपट्ट भी ' यज्ञोपवीत ' रखा जाता है; तब शूद्र तथा स्त्रीके स्वतन्त्र यज्ञ तथा यज्ञोपवीत न होनेसे श्रीजैमिनिके मत में भी शूद्रका वेद में अनधिकार सिद्ध हो गया । अब रहा ' वेदान्तदर्शन ' । जब वादी मानता है कि इस दर्शन में

शूद्रको वेदका अधिकार नहीं लिखा । उसका अपशूद्राधिकरण ( १1३ ॥

३४-३८ ) बहुत ही प्रसिद्ध है । इससे सभी प्राचीन भाष्यकारोंने शूद्रको वेद तथा यज्ञका अनधिकारी माना है । इस विषय में ' सन्मार्ग ' दैनिक दिल्ली ( ६।५२४- ५३३ ) में हमारी लेखमाला प्रकाशित हो चुकी है । इस तृतीय पुष्पके पृ. ४६१ से ५७० पृष्ठ तक उस लेखमालाको उद्धृत किया जा चुका है । जब वेदके मर्मज्ञ उन प्राचीन आचार्योंने ऐसा माना है, और यथेमां वाच ' मन्त्र भी इनकी दृष्टिसे दूर नहीं था, तब स्पष्ट है कि - स्वाद से किया हुग्रा उक्त मन्त्रका अर्थं ठीक नहीं । यह जो वादीने ' अस्य हि वेदमुपशृण्वतः, त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् इसे शङ्कराचार्यका मत लिखा है; तो उसका अनुसन्धान अवश्य स्तुत्य (? ) विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ 553 ८८२ है । वादि- महाशय! यह तो स्वा. शङ्कराचार्यने ' गौतमधर्मसूत्र प्रमाण देकर अपना पक्ष पुष्ट किया है । तव इसमें आपका ' का स्मृति गया । पक्ष कट परलोक श्रागे जो वादीने श्रोशङ्कराचार्यजीकी यह वात ( उक्त अधिकरणसे होगी, स्त्री - शूद्रका वेद में अनधिकार ) लिखनेसे स्वा. शं. जीका देदान्तसूत्रका आशय न समझना, वेदविषयक परिश्रमका अभाव, जगत्को उपनिष समझना - यह तीन कारण बतानेकी धृष्टता की है, इसमें वादीने स्वप्न मां ही अज्ञान सिद्ध किया है । ' वेदान्तदर्शन ' के उन सूत्रोंका सभी भाष्यकारों अपना.. जहां धूप ने समान ही ( शूद्रादिके वेदानधिकारका ) भाष्य किया है । देखिये-यह है भी ठीक | जब कोई वेद, कोई भी धर्मशास्त्र वा पुराणेति-- भाग में हासका वचन स्त्री एवं शुद्रका उपनयन ( ब्रह्मसूत्र ) ही नहीं कहता; होते हैं तब ब्रह्म - सूत्र न होने से उनका ब्रह्म ( वेद ) में अधिकार हो कैसे हो? सब वेद जव ब्रह्म तथा ब्रह्मसूत्रमें ही शूद्रादिका अधिकार नहीं; तव ब्रह्मसूत्र- सहमत ( वेदान्तदर्शन ) ने अपने उपजीव्य वेदमें उन स्त्री - शूद्रोंका अनधिकार पा ठीक ही उद्घष्ट कर दिया । इधर ब्रह्मका ठीक ज्ञान वेदसे होता है- शषाया यह वादी भी कहते हैं— ' नावेदविद् मनुते तं वृहन्तम् ' ( तद् ब्रह्म ) ' ' भाषा ' ( तै. व्रा. ३।२२६ ) तव वेदमें स्त्री - शूद्रोंका अनधिकार सिद्ध होनेसे ही गया । वैदिक ब्रह्मविद्या में उनका अधिकार न रहा । निगमे ' ' ' ' श्रवणाध्ययन प्रतिषेधात् ' का वादीका किया अर्थ ठीक नहीं । भागों का ' श्रवणाध्ययन - प्रतिषेधात् ' सूत्रमें ' स्मृतेश्च ' में स्मृतिका वही वाक्य श्रभीष्ट जन है, जिसे स्वामी शङ्कराचार्यने उद्धृत किया है । वह ' गौतम- धर्मसूत्र'- होता है का सूत्र है । वादियों में यह बहुत बुरा मर्ज है कि प्रशुद्ध अर्थ कर डालते केवल व्र कि- ' उस शूद्रको वेद सुनाते थे, वा पढ़ाते थे, तो वह सुनने - पढ़ने से ( २।३।९ इनकार कर देता था ' । ऐसा वादीने सूत्र के किन पदोंका अर्थ किया है? वैदिक - क ‘ वेदके श्रवण तथा श्रध्ययनका शूद्रकेलिए शास्त्रानुसार निषेध है । ' जुपि विशिष्ट स ० ध ० ५६