सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 471–480
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 471–480
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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६१ ६८२ भी यही कहती है ' । यही उक्त सूत्रका इष्ट अर्थ है । वया वादीको का • स्मृति परलोक से भी डर नहीं है कि उसकी परलोक जाने के समय कितनी दुर्दशा कटु जो कि ग्रन्थकारसे अनिष्ट कृत्रिम अर्थ कर दिया करता है । होगी, रणसे दूसरा जो वादीने श्रीशङ्कराचार्यके लिए यह कहा है कि- ' वे सदा त्रका उपनिषद् पढ़ने में लगे रहे; वेदका उन्होंने स्वाध्याय ही नहीं किया तो स्वप्न ' मां वाचं ' मन्त्र उनकी दृष्टिमें कहांसे प्राता? " यह कहकर वादीने , नपना जहाँ घृष्टता की है, वहीं अपना वेदविषयक - अज्ञान भी प्रकट कर दिया । कारों-. देखिये वेद दो भागों में विभक्त है - मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग । मन्त्र-भागमें ११३१ संहिताएं आ जाती हैं । उन संहिताओंके उतने ही ब्राह्मण गति-होते हैं । ब्राह्मणभागमें उपनिषद् तथा श्रारण्यक भी श्रा जाते हैं । यह हता; सब वेद है । पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि, यास्क आदि सभी इसमें हो? सहमत हैं । हम उनके इस विषयमें कुछ उद्धरण देते हैं । — मूत्र-नकार पाणिनि जहाँ लौकिक प्रयोग बताते हैं; वहाँ ' प्रथमायाश्च द्विवचने है भाषायाम् ' ( ७२६८ ) लिखते हैं । यहाँ पर पाणिनिने ' युवा ' प्रयोगको ' भाषा ' ( लौकिक ) बताया है । अव ' युवम् ' यह प्रयोग ' वैदिक ' सिद्ध हो ह्म ) ' गया । जहाँ श्रीपाणिनि अष्टाध्यायी में ' छन्दसि ' ( २६२ ) अथवा ' निगमे ' ( ७२।६४ ) लिखते हैं, वहाँ उन्हें मन्त्र तथा ब्राह्मण इन दोनों ह्रीं । भागों का प्रयोग इष्ट होता है । भीष्ट जहां केवल मन्त्रभाग ( संहिताभाग ) में श्रीपाणिनिको कार्य कर्तव्य सूत्र- होता है; वहाँ वे ' मन्त्रे ' ( ३।२।७१ ) लिखते हैं । जहाँ श्रीपाणिनिको केवल ब्राह्मणभाग में वैदिक - कार्य इष्ट होता है, वहाँ श्रीपाणिनि ' ब्राह्मणे ' ( २ । ३ । ६० ) पढ़ते हैं । जहाँ मन्त्रभाग में भी किसी एक वेदमें उन्हें है? वैदिक - कार्य इष्ट होता है, वहाँ श्रीपाणिनि ' ऋचि ' ( ६ | ३ | १३३ ) है । ' धनुष ' ( ६।१।११७ ) इत्यादि पढ़ते हैं । जहां यजुर्वेदादिकी किसी विशिष्ट संहिता में श्रीपाणिनिको कोई वैदिक कार्यं इष्ट होता है, वहाँ विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ६८३ श्रीपाणिनि ' काठके ' ( ७४१३८ ) इत्यादि पढ़ते है | किसी अन्य सहिता श्रीपाणिनिको अपने कहे हुए कार्यसे भिन्नता अनुमित होती में ' व्यत्ययो वहुलम् ' ( ३११२८५ ) इत्यादि व्यत्यय है, वहाँ वे मानते हैं । वेदमें तीन काण्ड वादी भी मानता होगा - कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड और ज्ञानकाण्ड । सो ज्ञानकाण्ड विशेषरूपसे आरण्यक एवं उपनिषदों में है । कर्म तथा उपासना विशेषरूपसे मन्त्रभाग तथा ब्राह्मण-भाग में हैं । ब्राह्मणभाग में उपासना विशेष करके है । ब्रह्मचर्य से गृहस्थ-तक कर्मकाण्ड, उपासना - काण्ड अपेक्षित होते हैं । तो उन्हें ब्राह्मणभाग तथा मन्त्रभाग अपेक्षित होता है । वानप्रस्थमें प्रायः श्रारण्यक अपेक्षित होता है । संन्यास में प्रायः ज्ञानकाण्ड होनेसे उपनिषदे अपेक्षित होती हैं । पर यह तो नहीं कि उनको सारे वेदोंका ज्ञान ही न रहे । उन्हीं श्रीशङ्कराचार्यके वेदान्तदर्शनादिके भाष्यमें देखिये । उन्होंने निम्नसूत्रोंके भाष्योंमें ' ऋग्वेदसंहिता ' के प्रमाण दिये हैं- ११२१२३-२४, २६; ११३१२२; ११४ २७ । इस प्रकार अन्य भी बहुत स्थलोंमें स्थान - स्थानपर उन्होंने यजुर्वेद - भाध्यन्दिनी - संहिताके ब्राह्मण तथा आरण्यकको भी स्मृत किया हैं । कृष्ण - यजुर्वेद की तंत्तिरीय - सहिताको बहुत स्थलों में उद्धृत किया है । शुक्ल यजुर्वेदकी ईशोपनिषद्को भी स्मृत किया है | ' श्रीशङ्कराचार्य वेदको नहीं जानते थे ' यह कहते हुए वादीको लज्जा आनी चाहिए | समय होता है - वादी लोग ' भारती ' को वेदज्ञ-सिद्ध करने केलिए यही युक्ति दिया करते हैं कि भला श्रीशङ्कराचार्य-जैसे के साथ विना वेद पढ़े भारतीका शास्त्रार्थ कैसे हो सकता था? ' तब फिर श्रीशङ्कराचार्यको वादी वेदसे अनभिज्ञ बताने का साहस कैसे करता है? वादीके बाबा दयानन्दजो स्वा. श्रीशङ्कराचार्य केलिए कहते हैं कि-
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८८४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' शङ्कराचार्यजी उज्जैन में आकर वेदका उपदेश करने लगे । उनमें शङ्कराचार्यका वेदमत था, अर्थात् उनका पक्ष वेदमतका स्थापन था । ' ( स.प्र. १० समु. पृ. १८१ ) । वाटीके गुरु बाबाजी तो श्रीशङ्कराचार्यकी वेदी विद्वत्ता कहते हैं, और वादी कहता है कि उन्हों ( श्रीशङ्कराचार्य ) ने वेदका स्वाध्याय ही नहीं किया था । खेद!!! वादी जनताको कितना गुमराह कर रहा है? वादीके आर्यसमाजी विद्वान् श्रीनरदेवजी शास्त्रीने ' आर्यसमाजका इतिहास ' प्रथमभागमें लिखा है- ' शङ्करभगवान् ( शङ्कराचार्य ) चारों वेद पढ़े थे । सब शास्त्र देख चुके थे । वर्णाश्रम धर्ममर्यादाके पक्षपाती थे । संन्यासी थे । तत्त्ववेत्ता थे । वैदिकधर्मके प्रबल रक्षक थे ' ( पृ. १४४ ) अब वादी झूठा, या दूसरे विद्वान् झूठे? यह हम पहले कह चुके हैं कि- मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग उपनिषद्-प्रारण्यक समेत यह सारा ही साहित्य वेद । इसपर वादी अपने प्रमाण-भूत श्रीयास्क तथा श्रीपाणिनि प्रादिके उद्धरण देखे । वादीके स्वामी भी मान गये हैं कि जहाँ श्रीयास्काचार्य ' इत्यपि निगमो भवति ' लिखते हैं, वहाँ उन्हें ' वेदका प्रमाण ' इष्ट होता है । जैसे कि श्रीसायणने भी अपने ' ऋग्वेदभाष्योपोद्घात ' में लिखा है- ' निगमशब्दो वेदवाची । यास्केन तत्र तव ' अपि निगमो भवति ' इत्येवं वेदवाक्यानामवतारितत्वात् ' । स्वा. द. जीने भी लिखा है- ' इत्यपि निगमो भवति । इति ब्राह्मणम् ' इससे स्पष्ट विदित होता है कि वेद मन्त्रभाग और ब्राह्मण व्याख्या भाग है ' ( स.प्र. ७ पृ. १२७ ) । अब ' निरुक्त ' में देखिये- ' यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्... तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ' इत्यपि निगमो भवति ' ( २ | ३ | १ ) यह ' श्वेता-श्वतरोपनिषद् ' की कण्डिका है । तब उपनिषद् भी निगम ( वेद ) हुई । ' व्यवहिताश्च ' ( ११४/८२ ) जैसे यह पाणिनिका वैदिकसूत्र ' श्रा विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ८८५ ८५६ रिन्द्र! हरिभिर्याहि ' ( ऋशास. ३ | ४ | १ ) इस मन्त्रभागको लगा है, वैसे ही ' उप त्वा नेष्ये ' ( छान्दो. ४/४१५ ) कण्डिका इस उपनिषद्को afusar में भी लगा है । यहाँ ' उप ' और ' नेष्ये ' में ' त्वा ' का उदाहर है । उपसर्गं और धातुमें व्यवधान लोकमें नहीं हुआ करता; किन्तु व्यवधान वेदमें भाख्या ही होता है । परन्तु उपनिषदोंमें भी वह व्यवधान दीख संहिता उपनिषद् भी वेद हुए । तब कृष एवं रु ' सुपां सुलुक् ' ( पा. ७।१।३ ) यह वैदिक सूत्र जैसे ' सविता प्रथमेऽह. उदाहर ( यजुः माध्यं. ३ ।६ ) इस मन्त्रभागमें लगा है, वैसे ' यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् गोता ल पुरुष: ' ( शत. १४ | ६ | ८ | ३ ) इस वृहदारण्यकोपनिषद्की कण्डिकामें भी कारने लगा है । ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( ३ । १ । ८५ ) यह वैदिकसूत्र ' सत्यमेव जयते व । नानृतम् ' ( मुण्डक ३।१।६ ) में इस उपनिषत्कण्डिकाके उपग्रह ( पद ) वादीको के व्यत्ययमें भी लगा है । ' मतुवसो रु सम्बुद्धा छन्दसि ' ( ८ । ३ । १ ) यह जायगा है; तब वैदिक सूत्र ' भगवः ' ( छान्दो. ४ | ५ | १ ) इस उपनिषद् - वाक्य में भी स्वामीप लगा उपनिषद् भी वेद सिद्ध हुए 1 ' यथेमां ' छन्दसि निष्टवर्य ' ( ३ | १ | १२३ ) यह पाणिनिका वैदिक सूत्र है, दुस्साहस इसका उदाहरण ' निष्टक्यं चिन्वीत पशुकाम: ' है । यही उदाहरण में मान स्वा. द. जीने अपने ' प्राख्यातिक ' में रखा है, पर वादीको यह अपने माने नियम य हुए चार वेदग्रन्थोंमें नहीं मिलेगा । इससे स्पष्ट है कि वादीकी मानी सकता । हुई यह चार संहिताएं ही वेदकी परम अवधि नहीं हैं । वादीके अव चारों वेदोंमें ' निष्टवयं ' शब्द ही नहीं है; तब इससे प्रकट है कि- वेदकी समाला करनेवा सीमा इन वर्तमान चार संहिताओंसे अधिक है । ' निष्टवयं ' कृष्णयजुर्वेद ‘ ऐतरेयारण्यक ' ( ५।१।३ ) में है । कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयसं. ' ( ६ | १ | ७१२ ) कहा गय कर्म में भी है । तब ' अरण्यक ' तथा सब शाखाएं ( संहिता ) भी ' वेद ' सिद्ध यहाँपर हुई ं । ‘ शं नो देवीः ’ को वादीके स्वामीजीने ( ऋभाभू. ) में अथर्ववेदका शब्द वा ' प्रथममन्त्रप्रतीक ' माना है, पर वह श्रथर्ववेद - पैप्पलादसं. ' में है । प्रक्षेप कर
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८६५ ८८६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इका में ' भावलक्षणे तोमुन् ' ( ३ | ४ | १६ ) इस पाणिनिके वैदिकसूत्रका पद्की उदाहरण वादीके स्वामीने भी ' काममा बिजनितोः सम्भवाम ' अपने नवधान ' माख्यातिक ' में दिया है । पर यह वादीकी मानी हुई चारों वेद-वेद संहिताओं में नहीं, किन्तु कृष्णयजुर्वेद ' तैत्तिरीयसं ' ( २।५।१।५ ) में है ॥ तब तव कृष्णयजुर्वेद भी वेद हा । श्रीयास्कने मन्त्रभागके सार्थक्य में ' एक एव रुद्रवतस्थे न द्वितीय, अग्नये समिध्यमानाय धनुब्रूहि ' यह जो मेह ' उदाहरण | दिये हैं; वे वादीकी मानी हुई चार वेद - संहितानों में नहीं हैं, क्ष गोता लगाइये । तब वेदको सीमा इनसे अधिक सिद्ध हुई । महामाष्य-में भी कारने भी वेदके उदाहरणमें ब्राह्मणभागके बहुतसे उद्धरण दिये हैं । जयते वादिमहाशय! अभी हमने दिङ्मात्र उद्धरण दिये हैं । यदि मैं ( पद ) वादीको श्रीपतञ्जलि आदिके सभी उद्धरण दूँ; तो वादीको चक्कर आ २ ) यह जायगा । तब वादी अपने अज्ञानपर विक्षुब्ध न होकर श्रीशङ्कराचार्य -में भी स्वामीपर दोष क्यों देता है कि- " उनने वेद ही नहीं देखे थे; तब उन्हें ' यथेमां वाचं ' मन्त्र कहाँसे मिलता? " वस्तुतः ऐसा कहनेमें वादीका न है, दुस्साहस ही है । शेष जगत्को मिथ्या वा स्वप्नवत् उन्होंने पारमार्थिकता दाहरण माना है । यह बात ठीक है । पर व्यावहारिकतामें उन्होंने वेदोंके सब नेमाने नियम यथाधिकार विहित किये ही हैं; तव उनपर यह दोष नहीं श्रा मानी सकता । वादी के अव वादीके ' वेदमाता... पावमानी द्विजानाम् ' मन्त्र के अर्थकत्र - वेदकी समालोचना दी जाती है । इसका स्पष्ट अर्थ है कि वेद द्विजोंको पवा । करनेवाला है । वेदको द्विजोंका माताकी भाँति हितकारी होनेसे ' वेदमात 1912 ) कहा गया है, इस मन्त्र में शूद्रका कहीं गन्ध भी नहीं । " सो जिस ' सिद्ध | कर्मसे ब्राह्मण लोग शूद्रोंको वेद पढ़ाकर अथवा सुनाकर पवित्र करते हैं " वेदका यहाँपर वादीने ' द्विज ' का अर्थ ' ब्राह्मण ' दिया है, पर ' शूद्रों ' को यह 1 चन्द्रवादीने कहाँसे निकाला? इतना अन्धेर कि - वादी वेदमन्त्र में भी प्रक्षेप कर रहा है? विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ८८७ " इसीके द्वारा वे शूद्रों तकको वेद पढ़ाकर अथवा सुनाकर कर लेते हैं " यह वादीके शब्द हैं । पहले शूद्रोंको लिखा, फिर पवित्र इस वाक्यमें ' शूद्रों तकको ' लिखा । यह अयं वादीने किस पदका किया है? फिर यहाँ दादीने चाण्डालका नाम नहीं लिखा, वे प्रवर्ष होनेसे शूद्र-वर्णान्तर्गत नहीं । तब वे भी पवित्र न हो सके । तो फिर वेद पढ़नेका सवको अधिकार कैसे हुआ? लोग व्यापारोंमें ब्लैकमार्केट करते हैं; पर वादी वेदके अर्थमें ब्लैकमार्केट कर रहे हैं । हा खेद!!! वस्तुतः वादी के पास इस मन्त्रका कोई प्रत्युत्तर है ही नहीं । वादी-लोग अव तक भोली - भाली जनताको ठगते रहे हैं, पर विद्वानोंके सामने आकर वादी - लोगोंको घाटे दालका भाव पता लगना है । पहले महाशयजीने ' शूद्र ' शब्द लिखा, फिर ' शूद्रों तक ' लिखा । अब लिखते हैं कि- ' द्विजोंका परम कर्तव्य है कि - शूद्र, चाण्डाल, म्लेच्छादि सबको वेद पढ़ाकर शुद्ध पवित्र करें । " बलिहारी है विद्यालंकारजीके वेदपाण्डित्यकी । यह अयं वादीने कहाँसे निकाला? कल श्राप इसमें मद्य, नालीका पानी, पुरीष आदि भी प्रक्षिप्त कर देंगे कि - द्विज उन्हें भी वेदसे शुद्ध कर लेंगे । महाशय! ' द्विजोंको पवित्र करनेवाला ' कहनेसे एकज - शूद्र तथा अवर्ण अन्त्यजादिका वेदमें अधिकार हट गया । इसीका भाष्य सव धर्मशास्त्रोंके वचन हैं, जिनमें शूद्रादिकेलिए अध्ययन ही नहीं लिखा । अव वादी आगे लिखता है - ' यहां तक तो हुई शूद्रकी बात, अब स्त्रीका नाम शास्त्रीजीने चुपकेसे वीचमें कैसे शामिल कर लिया, यह वे ही बता सकेंगे " । इसपर प्रत्युत्तर यह है कि इससे यह तो सिद्ध हो गया कि - शूद्रको उक्त मन्त्रसे वेदका अनधिकार सिद्ध है; तब ' यथैमां वाचं ' का अर्थ भी आप लोगोंका अशुद्ध सिद्ध हुआ । शेष रहा स्त्रीका नाम चुपके से बीच में डालना, तो ऐसी दुष्प्रकृति हम लोगोंमें तो है नहीं कि- विना प्रमाणापपत्ति हम कोई शब्द बीच में प्रक्षिप्त कर दें । यह तो
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SSS ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) श्राप ही लोग गुरुपरम्परासे कर रहे हैं । यदि वादीको मेरी बातपर विश्वास न हो; तो वे अपने स्वा.द. जीका ( जिनकी मूर्तिका वादीने अपने पांवकी ठोकरसे हैदराबाद- दक्षिण में सम्मान (? ) किया था, उनका ) ' यथेमां वाचं कल्याणी ' का अर्थ ही देख लें ' | ' स्वाय ' पदका अर्थ करते हुए स्वामीने चुपकेसे बीच में ' स्त्री - सेवक ' शब्द कैसे प्रक्षिप्त कर दिये? वादीने अपने उन स्वामीजी से जो वादीका पाद- प्रहार -पाकर वादीपर बहुत प्रसन्न हो रहे थे - पूछा नहीं कि - ' स्वाय के अर्थमें आपने ' स्त्री - सेवक ' अर्थ कैसे चुपकेसे डाल दिया? पूछते हमसे हैं? यदि हमसे ' पावमानी द्विजानाम् ' में स्त्रीकी व्यावृत्ति केलिए पूछते हैं; तो लीजिये हम वादीको उत्तर देते हैं. ' द्विज ' का अर्थ क्या वादी जानता है? अवश्य जानता होगा । क्योंकि विद्यालङ्कार स्नातक- महाशयको यह ज्ञात न हो, इसकी हमें आशा नहीं करनी चाहिये । अस्तु । सुनिये - मुख्य - द्विजत्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुरुषोंका यज्ञोपवीत धारण करनेपर होता है । पर शूद्र तथा स्त्रीका उपनयन किसी भी गृह्यसूत्र वा धर्मसूत्र के अनुसार नहीं होता । उपनयन संस्कार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कुमारका वर्णन होता है । कुमारसे कुमारीका ग्रहण नहीं होता । तभी तो वेदमें ' मम पुत्राः शत्रु-हणोऽथो मे दुहिता विराट् ' ( ऋ.शा.सं. १०।१५६ / ३ ) ' त्वं स्त्री, पुमान् असि त्वं कुमार उत वा कुमारी ' ( अथर्व. शौ. सं. २०१८।२७ ) इत्यादि बहुत मन्त्रों में कुमारसे भिन्न कुमारीका नाम रखा गया है । इससे कुमारसे कुमारी तथा पुमान् से स्त्रीका नाम नहीं गृहीत होता; इससे जातिपक्ष खण्डित हो जाता है । इस विषयमें हम ' सिद्धान्त ' ( ७।४३-४७ ) में तथा ' आलोक ' इस तृतीय पुष्प ( ३।२ ) के ( १६४-१७३ ) पृष्ठों में स्पष्टता कर चुके हैं । इस कारण स्त्री मुख्य - द्विजत्वमें गृहीत भी नहीं होती । तब ' द्विजानां पावमानी ' कहनेसे स्त्री मुख्य - द्विज न होनेसे वेदाधिकारसे पृथक् हो जाती है । वह एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होती है, द्विज ब्राह्मणादि नहीं । -विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर ८६० तब स्त्री एवं शूद्रका स्वयं वेदमें अनधिकार सिद्ध हो गया । अब वादीको हमने प्रत्युत्तर दे ही दिया है । स्वाद द्वारा ' यमां नरहे वाचं ' के ' स्वाय ' में चुपकेसे वीचमें ' स्त्री - सेवक ' शब्द डाल देनेका उत्तर छ वादीके जिम्मे रहा । वादी श्रीनरदेव शास्त्री, तथा डा ० मङ्गलदेव आदि- T आर्यसमाजी विद्वानोंका मानना तो दूर रहा, वादी किसी परमा मानता । वादी स्वा.द.जीको भी नहीं मानता । समयपर आप लोग यह ' यावज स्पष्ट कह देते हैं । आप लोग वेदको भी तो नहीं मानते । तभी सकता वेदके अर्थके अवसर पर उसमें प्रक्षेप कर रहे होते हैं । कहता क्या? आगे वादी मेरे लिए लिखता है - ' यथेमां वाचं ' का ईश्वर - परक- का अथ अर्थ माननेमें स्वामीजीके मतानुसार अनेक दोष आते हैं — ऐसा खण्डन शास्त्रीजीने बड़े गर्जन- तर्जनपूर्वक फर्माया है, किन्तु उनके सम्पूर्ण दोषों- यह स का समाधान इतनेसे हो जाता है कि- परमात्मा भक्तोंसे कहता है, मैं वारण म तुम्हारे द्वारा अपनी वेदवाणीको सब तक पहुँचाऊं, यह मेरी ज कामना है ' । ' महर्षि देखिये — वादी यहाँ फिर वेदमें प्रक्षेप कर रहा है । ' यथेमां वाचं ' वाचं ' में कहीं भक्तका नाम है भी? और फिर ' श्रावदानि जनेभ्यः ' का अर्थ ' लोगोंको कहूँ ' है ' भक्तों द्वारा सब तक पहुंचाऊ ' अर्थ नहीं है । स्पष्ट उपदेश है कि- मन्त्रार्थ करनेमें वादी लोग नास्तिकोंके भी कान काटते सकना हैं । ' सितम्बर ' के ' सार्वदेशिक ' के २६३ पृष्ठ में वादीने लिखा था- बल्कि ' परमात्मा निराकार होनेकेकारण स्वयं नहीं बोल सकता, इसलिए भक्तों- है । य द्वारा बुलवाता है और २ ९ ६ पृष्ठमें वादीने लिखा- ' परमात्मा भक्तो मैंने नही कहता है ' । केवल दो - तीन पृष्ठों में ही वादीने परमात्मा में स्मृतिविकार निराका सिद्ध कर दिया । जब परमात्मा स्वयं बोल नहीं सकता; तब फिर शब्द र भक्तोंसे कैसे कह सकता है? वाह स्नातक साहव! आप तो सचमुच अव वो ' दिद्ववर ' हैं । जब परमात्मा वोल ही नहीं सकता, तब वेद ' भगवाणी ' डाक्टर कही ।
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८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न रहे । क्या ' प्रावदानि ' का अर्थ ' बोलना ' नहीं है? वाह! ' चौषे गये यमां छब्बे बनने, दुबे बनकर आये ' । उत्तर गये थे आप भगवदृद्वाणी - वेदका सवको अधिकार देने, उल्टा वेदको दि. ' परमात्माकी वाणी ' होना भी छिनवा बैठे । यह ' व्याघात ' तो आपने नहीं ' थावज्जीवमहं मौनी ' जैसा किया है । जब परमात्मा स्वयं बोल नहीं यह सकता, तव भक्तोंसे कैसे बोल लेता है? ' अपनी वेदवाणी ' शब्द ही कैसे तो कहता है? जब परमात्मा बोल नहीं सकता; तब परमात्माको बाणी क्या? जब रिराकार होनेसे भगवानकी वाणी नहीं, तब ' यथैमां वाचं ' रक- का अर्थ ' परमात्माकी वाणी ' वा वेदवाणी भी न हुआ । तव वादीने अपना - ause स्वयं ही कर दिया । हम पृथक् खण्डन क्या करें? महाशय! दोषों- यह सब वनावटी अर्थ करनेका फल है । आप लोग सनातनधर्मकी मैं शरण में आ जाएं, तो सब समाधान प्राप्त हो जाए । मेरी जहाँ वादीने अपना खण्डन श्राप किया- वहाँ अपने तथाकथित ' मह ' (? ) का भी खण्डन कर दिया । ' सत्यार्थप्रकाश ' में ' यथेमां चाचं ' वाच ' का अर्थ किया है- ' जैसे मैं ईश्वर वेदरूप वाणीका उपदेश करता अर्थ हूँ । यहाँपर स्वा. द. जीने परमात्माके द्वारा अपनी वाणी वेदवाणीका स्पष्ट उपदेश कराया है । पर वादिमहाशय तो परमात्माका निराकार होनेसे बोल काटते सकना ही नहीं मानते । ' भक्तों द्वारा ' यह शब्द मन्त्रार्थमें प्रक्षिप्त करते हैं । TI- बल्कि वादीके स्वामीजी यहां लिखते हैं कि देखो, परमेश्वर स्वयं कहता नक्तों- हैं । यहाँ स्वा. द. जी परमेश्वरका ' स्वयं कहना ' मानते हैं । ' स्वयं ' शब्द क्तोंसे मैंने नहीं डाला, स्वामीजीका है । पर वादी लिखता है कि- ' परमात्मा चकार निराकार होनेके कारण स्वयं नहीं बोल सकता ' । वादीने भी ‘ स्वयं ’ फिर शब्द रखा है, वादीके स्वामीने भी परमात्माका ' स्वयं कहना ' नहीं माना, -चमुच श्रव वोलिये - यहाँ हमने न पं. नरदेव शास्त्री की दुहाई दी, और न ही चाणी ' डावर मङ्गलदेवकी । यह तो वादीके तथाकथित ' महर्षि ' की बात कही । अब स्वामीजी यदि ठीक कहते हैं, तो बादी गलत कहता है । विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर - [ ८१ यदि बादी ठीक कहता है; तो स्वामीजी गलत कहते हैं । तब दोनों परस्पर- विरुद्ध होनेसे खण्डित हो गये । पक्ष हमारा ही प्रबल रहा । यदि वादी कहे कि ' जहाँ वेदमें ' में ' शब्द ना जावे, वहां परमात्माका ग्रहण होता है । यदि ऐसा है, तो इससे अग्रिम मन्त्र ' वृहस्पते!... तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ' ( २६।३ ) में क्या वादी यही अर्थ करेगा कि- परमात्मा कहता है- हे भक्त! मुझे विचित्र घन दे '? एक बात पर और ध्यान दीजिये । आपके स्वामीजीने ' ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका ' में अधिकाराधिकरणमें ' यथेमां वाचं ' मन्त्रकेलिए संस्कृत तथा हिन्दीमें लिखा है- ' अस्य [ यथेमां ] मन्त्रस्य अयमेव [ ईश्वर सम्वन्धी ] अर्थोऽस्ति । कुतः? ' वृहस्पते ' इति उत्तरस्मिन् मन्त्रे हि ईश्वरार्थस्यैत्र प्रतिपादनात् ' ( पृ. ३३१ ) यही बात वे हिन्दीमें लिखते हैं— ' यही इस ' यथेमां ' मन्त्रका अयं ठीक है, क्योंकि इससे अगले मन्त्र-' वृहस्पते! अति यदर्य ' में भी परमेश्वरका ही ग्रहण किया है ' ( पृ. ३३२ ) । क्या वादी स्वामीजीकी यह बात मानते हैं कि चूंकि ' वृहस्पते! इस अग्रिम मन्त्र में ईश्वरका प्रतिपादन है तो फिर उससे पूर्वक ' यथेमां वाचं ' में भी ईश्वरार्थका प्रतिपादन है? यदि ऐसा है, तो सम्भलिये-वाटीके स्वामीजीका तथा वादीका भी अभी पतन होता है । देखिये-' वृहस्पते! ' इस साथके ' मन्त्रका जब ईश्वर देवता है, इसीलिए ही ‘ यथेमां ' इस साथके मन्त्रका भी ईश्वर देवता है, तव वादी बतलावे कि-' वृहस्पते! ' इस अग्रिम मन्त्र के अनुरोवसे ही स्वामीने ' यथेमां ' में ' ईश्वर देवता ' माना है; तब ' यथेमां ' का ' बृहस्पते! ' मन्त्र के अनुरोधसे हो अर्थ होगा । तो अब ' वृहस्पते! ' मन्त्रमें यदि परमात्मा प्रतिपाद्य है, तो ' घयेमां वाचं ' में भी परमात्मा प्रतिपाद्य ही होगा । यदि ' बृहस्पते! ' मन्त्रमें परमात्मा प्रतिपादक है, तो ' यथेमां वाचं ' में भी वह प्रतिपादक ही होगा ।
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८६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अब इसपर यदि किसी अन्य दयानन्दीका अर्थ दिया जाय, तो वादी उसके माननेसे नकार कर दिया करता है । इसलिए हम वादीके तथाकथित ' महर्षि ' का ही ' बृहस्पते प्रति ' मन्त्रका अर्थ दिखलाते हैं । निकाले वह उनका यजुर्वेद भाष्य-' वृहस्पते! अति यदर्यो... तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम्, उपयाम-गृहीतोऽसि ' ( २६।३ ) इसका अर्थ स्वा.द.जी इस प्रकार करते हैं - ' हे बृहस्पते! बड़े - बड़े प्रकृति आदि पदार्थों और जीवोंके पालनेहारे ईश्वर! जो ग्राप ( उपयामगृहीतः ) प्राप्त हुए यमनियमादि - योग - साधनोंसे जाने गये ( असि ) हैं, उन प्रापको ( बृहस्पतये ) बड़ी वेदवाणीको पालने के लिए तथा जिन ( ते ) आपका ( एषः ) यह ( योनिः ) प्रमाण है, उन बड़े - बड़े प्राप्त विद्वानोंकी पालना करनेकेलिए ग्रापको हम स्वीकार करते हैं ।... ( तत् ) उस ( चित्र ) ग्राश्चर्यरूप ज्ञान ( द्रविणं ) धन और यशको ( अस्मासु ) हम लोगों में ( घेहि ) धारण - स्थापन कीजिये ' । यहां पर जब ' ईश्वर देवता ' होनेसे ईश्वरको माना है, तब इससे पूर्व स्थित ' यथेमां ' मन्त्र में भी ' ईश्वर - देवता ' होनेसे वहां पर भी ईश्वर प्रतिपाद्य नहीं । जब ऐसा है, तब हमसे लगाये हुए सभी मन्त्रार्थ पर रह गये । वादीकी ' भक्त ' अध्याहार असफल होगई । भक्त प्रतिपाद्य तब होता, यदि उक्त मन्त्रका स्वामीजीने प्रतिपाद्य ' बृहस्पते ' के अनुसार ही होगा, प्रतिपादक दोष स्वाद के उक्त करनेकी बहानेबाज़ी ' भक्त - देवता ' होता । परन्तु ' ईश्वर देवता ' होनेसे ईश्वर ' प्रतिपाद्य ' ही हुआ । भक्त वा ऋषि उसका ' प्रतिपादक ' ही हुआ । ' वृहद्देवता ' में लिखा है – ' संवादेष्वाह वाक्यं यः स तु तस्मिन् भवेद्-ऋषिः । यत् तेनोच्येत वाक्येन देवता तत्र सा भवेत् ' ( २० ) ( सूक्तों वा मन्त्र के संवादोंमें जो वाक्यका वक्ता हो; वह तो वहाँ ऋषि होता है, पर जो उस वाक्यसे कहा जा रहा हो; वह वहाँ देवता होता है । ) इनके उदाहरण ( १०/१० ) प्रसिद्ध है वहाँ यम ' ऋषि ' होता ' देवता ' हुमा करता है यम प्रतिपाद्य होता है; विद्यालङ्कारकॊ प्रत्युत्तर [ ८६३ ८६४ भी देखिये - ऋग्वेद ( शा.सं. ) में ' यमयमीसूक्त । वहां जिस मन्त्रका यम ' प्रतिपादक ' ' होता है, है । यम जहां ' प्रतिपाद्य ' होता है, ' यम ' वह । पर जब यमी किसी मन्त्रकी प्रतिपादक तथा वहाँपर यमी ' ऋषि ' तथा यम ' देवता ' होता है । " निरनु नहीं योज्या तो दोपों को इस प्रकार ऋग्वेदसं. के १०/६५ सूक्त ( ' उर्वशी - पुरूरवा ' के सूक्त ) मेरे पक्ष में जिस मन्त्रका पुरूरवाः प्रतिपादक और उर्वशी प्रतिपाद्य होती है; पर आ वहां पुरूरवाः ऋषि, और उर्वशी देवता होती है । जहाँ पर उर्वशी उल्टा प्रतिपादक तथा पुरूरवाः प्रतिपाद्य होता है; वहाँ उर्वशी ऋषि और प्राप्त जन्म ह पुरूरवाः देबता होता है । जब ऐसा है; तब ' यथेमां वाचं ' तथा ' बृहस्पते जब उ श्रति ' इन दोनों ही मन्त्रों में ' ईश्वर - देवता ' होनेसे ईश्वर ' प्रतिपाद्य ' ही ' स्वा.द. होगा; और भक्त ऋषि ' प्रतिपादक ' ही होगा । तब स्वा. द. जीका ईश्वर-देवतावाले ‘ यथेमां वाचं ' मन्त्रमें ईश्वर के प्रतिपादक रखनेका अर्थ अशुद्ध स्वा.द. वाता सिद्ध हुआ; श्रर वादी विद्यालङ्कार वु. दे. जीका पक्ष भी प्रसिद्ध सिद्ध मानकर हुआ; और हमसे लगाये हुए दोष वादी पर सवार रहे । सकता ' आगे वादी लिखता है - ' ग्रापने इसी ' यथेमां ' मन्त्र से जन्म की वर्ण- गया व्यवस्था सिद्ध करनेका उपहसनीय प्रयत्न किया है । मैं पण्डितजी ' य पूछता हूं कि जब आप भी वेदवाणीको अनादि - निधना मानते हैं; तव उत्तम व उभयवादिसम्मत बातमें शङ्का उठाना ' मतानुज्ञा ' निग्रहस्थान ही होता है, शुद्र- यह इसपर प्रत्युत्तर यह है कि जव प्रापका तथा स्वा. द. जीका उक्त मन्त्रका हो गई ही शुद्ध है, हमें अनुज्ञात नहीं, हमने उसे माना नहीं, तब उस मन्त्र गलत अर्थ पर शङ्का उठाने से हमपर ' मतानुज्ञा ' निग्रहस्थान या ही कैसे लिखा सकता है? पुरुषों को वस्तुतः वादीने ' न्यायदर्शन ' के लक्षणके विरुद्ध हमपर उक्त निग्रह- देख लिय स्थान लगाया है, जो हमपर समन्वित नहीं होता । अतः वह स्वयं उल्टा व
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८६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३३ ' निरनुयोज्यानुयोग ' ( न्या. ५।२।२२ ) नामक निग्रहस्थान में आ गया जहाँ जो निग्रहस्थान लगाया न जा सकता हो, उसे वहां लगाना ' निरनु- । है मोज्यानुयोग ' निग्रहस्थान हुआ करता है । बल्कि ' मतानुज्ञा ' निग्रहस्थान तो श्राप पर लागू होता है । कारण यह है कि - श्रापने अपने पक्षमें उन या दोषों को स्वीकार करके ( क्योंकि आपने उनका प्रत्युत्तर नहीं दिया ) । मेरे पक्ष में दोष लगानेकी चेष्टा की है । दोष तो उल्टा स्वामीजीके अर्थ क ) - पर आते हैं । आपको उनका समाधान करना चाहिये था । पर आपने उल्टा उनका समाधान न करके ' अप्रतिभा ' निग्रहस्थान भी अनायास ही शी प्राप्त कर लिया है । तभी तो आपने ' उसमें पहले ब्राह्मण अथवा शुद्रका र जन्म होना कैसी हास्यास्पद बात है ' बस यही कहकर बात टाल दी । पते जब उसमें ब्राह्मण - शूद्रादि रखे गये, और उनका पढ़ानेका इतिहास स्वा. द. जीने वताया, तब अवश्य उक्त प्रश्न वन सकते हैं । क्योंकि -वर- स्वा. द. जी मानते हैं कि - ' जिसका जहां इतिहास हो, वह उसके बाद बनाया शुद्ध जाता है ' ( स.प्र. ) । वादीने स्वामीजीके उक्त मन्त्रार्थरूप - सिद्धान्तको सद्ध मानकर भी उससे विरुद्ध जो बातें कही हैं कि - परमात्मा स्वयं नहीं कह सकता ' इत्यादि; इनसे वादी ' अपसिद्धान्त ' नामक निग्रहस्थानमें भी फंस णं.. गया 1 तीसे ' ब्राह्मणको उत्कृष्ट ब्राह्मण बनानेकेलिए तथा शूद्रको ब्राह्मणोंसे तव उत्तम वर्णकी प्राप्ति के लिए ' यह वादीके शब्द हैं । इससे ब्राह्मण तथा है, शूद्र- यह तो जन्मसे सिद्ध हो ही गये; तब वर्णव्यवस्था भी जन्मसे सिद्ध का हो गई । यदि शूद्र ब्राह्मण बन गया, तो तीन वर्ण रह गये । फिर उस मन्त्रमें ' शूद्र ' का नाम कैसे सुनाई दे रहा है? और फिर इस मन्त्रमें कैसे लिखा कहाँ है कि - शूद्र ब्राह्मण वन गया है । देखिये आप भोले - भाले पुरुषोंको ठगने के लिए ही क्या बद्धपरिकर नहीं हैं? ' आलोक ' - पाठकोंने यह देख लिया है कि हमारे प्रश्नोंका उत्तर तो वादी कुछ दे न सका । स्वयं स्टा वर्णव्यवस्था स्वयं जन्मकी सिद्ध करवा बैठा । नहीं तो ब्राह्मणको विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ८५ ' उत्कृष्टतर ब्राह्मण तथा शूद्रको ब्राह्मणत्वादिकी ' बात ' प्रभित्तिचित्र ' होगी । अव वादी हमपर प्रश्न करता | कल्पित पूर्वपक्ष भी उसने बना दिया, कल्पित उत्तरपक्ष भी । वादी लिखता है - ' प्रथम ब्राह्मण तथा क्षत्रिय तो मुख तथा भुजासे उत्पन्न होनेसे श्रेष्ठ हुए, परन्तु उसके पश्चात् उनके सन्तान तो मुख तथा भुजासे उत्पन्न हुए नहीं । तब वे ब्राह्मण एवं क्षत्रिय कैसे कहलाये? " मालूम होता है कि - वादी यह एक बड़ी भारी बात मान बैठा है । कदाचित् शास्त्रार्थोंमें उसे यह एक अचूक युक्ति प्रतीत हुई होगी । हम भी इसका अचूक उत्तर देते हैं । जब वादीने ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' में पञ्चमी श्रयं मान लिया, और परमात्माके मुख प्रादिसे ब्राह्मण श्रादिकी उत्पत्ति भी मान ली; तब श्रागे कोई कठिन बात नहीं रही । जब आगे वादी स्वयं मानता है कि- ' ब्रह्म हि ब्राह्मण, क्षत्रं राजन्य: ' इस शतपथके अनुसार उक्त वेदमन्त्रमें ब्राह्मण और राजन्य शब्द स्वार्थवाचक हैं; तव ' परमात्मा के मुखमें क्या ब्राह्मण - ब्राह्मणीका जोड़ा बैठा था? ' यह वादीका उपहास स्वयं कट गया । इसीका नाम होता है ' उष्ट्रलगुड ' - न्याय । अव शेष प्रश्न रहा कि उन ब्राह्मण, क्षत्रियोंके सन्तान परमात्मा के मुख तथा भुजासे उत्पत्तिके बिना ब्राह्मण, क्षत्रिय कैसे हुए? इस विषय में वादी वेदाङ्ग - व्याकरणको जरा याद कर ले । यहां ' ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः, राज्ञोऽपत्यम्, राजन्यस्य वा प्रपत्यं राजन्यः ' यह अपत्यप्रत्ययार्थक अर्थ होगा । पूर्व अर्थ में ' ब्राह्मोऽजाती ' ( पा. ६।४।१७१ ) राजश्वशुराद् यत् ४ | १ | १३७ ) ' राज्ञोऽपत्यग्रहणं जातावेव कर्तव्यम् ' ( वा. ) ' क्षत्राद् घः ' ( ४/१/१३८ ) जाति - प्रर्थ में ब्राह्मणादि शब्दों की सिद्धि होती है । दूसरे पक्ष में ' तस्याऽपत्यम् ' ( ४ । १/६२ ) से सिद्धि होती है । अथवा ' जातेरस्त्रीविषयाद् अधोपघात् ' ( ४ | १ | ६३ ) सूत्रमें ' सकृदा-
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८६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ख्यात - निर्ग्राह्या ' यह ब्राह्मणादि जातिलक्षण करनेवाला वार्तिक ग्राया है । उसका अर्थ है कि- ' सकृद् एकस्यां व्यक्ती कथनाद् ( मुखभुजाद्य त्पत्त्या ब्राह्मणोऽयम्, क्षत्रियोऽयम् ' इति उपदिष्टे ) व्यक्त्यन्तरे ( तदपत्य-सहोदरादौ तदुपदेशं विनापि सा जातिर्भवति ' ( एक बार एक व्यक्तिमें यह कहनेपर कि यह मुख से उत्पन्न है, यह भुजासे उत्पन्न हुआ है, अत: यह ब्राह्मण - क्षत्रियादि है; उसके दूसरे व्यक्ति उसकी सन्तान तथा भ्राता आदिमें - यह ब्राह्मणादि है - यह न कहनेपर भी वही जाति हुआ करती है ' ) यह महाभाष्यका प्राशय है । तब जब परमात्माके मुखसे ब्राह्मभ उत्पन्न हुए; तब उनकेलिए ' ब्राह्मण ' यह कथन होनेसे उक्त जाति-लक्षणानुसार उसके सन्तान तथा भ्राता - प्रादिको भी उसी जातिका ही कहा जाता है । इसी प्रकार वाहुन - क्षत्रिय, ऊरुज - वैश्य तथा पादज-शूद्रकी सन्ततियों में भी उसी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इस जन्मसिद्ध जातिका व्यवहार ' सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या ' इस वेदाङ्गके वार्तिकके कथनसे होता है । हो गया वेदाङ्ग - द्वारा वादीके उसकी समझमें समाधान । आगे बादी लिखता है - ' पण्डितजी! श्राप रहिये, तर्क में घुसना आपका काम नहीं । वादीके वे ( वादी ) ही रहे, और शास्त्रवादी हम रहे । खण्डन करनेवाले वादीकेलिए देखिये श्रीमनुजीने ' योऽवमन्येत ते मूले ( श्रुतिस्मृती ) हेतुशास्त्राश्रयात् स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ' ( २।११ भारी (? ) प्रक्षेपका शास्त्र- प्रमाण तक ही इस वाक्यसे तर्कवादी तव तर्कसे शास्त्रका क्या प्राज्ञा दी है— ( तर्काश्रयाद् ) द्विजः । ) ( जो व्यक्ति धर्मके मूलभूत श्रुति एवं स्मृतिका तर्क शास्त्र द्वारा अपमान ( खण्डन ) करता है, उस श्रुति स्मृतिनिन्दक नास्तिकका सत्पुरुषोंको बहिष्कार कर देना चाहिये ) इसी बात से डरकर तर्कवादी - वादीके स्वा.द.ने ' हेतुशास्त्राश्रयात्'-. शब्दका श्रर्थं छिपा दिया है, उसका अर्थ नहीं किया । आगे वादी ब्राह्मणका ' मुखसे जन्म ' थपने विलक्षण- तर्कसे बताता विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ८ ९ ७ है - ' बात तो सच यह है कि - ब्राह्मणका जन्म अर्थात् प्रादुर्भाव मुखसे होता है । हज़ार - मनुष्य सभा में चुपचाप हों, कौन आज भी कौन मूर्ख - यह पता नहीं चलता । परन्तु जब शास्त्रचर्चा चलती ब्राह्मण है, वा ब्राह्मणके वचनोंको सुनकर सब उसका लोहा मान लेते हैं है ।, यही तब ब्राह्मणका मुखसे प्रादुर्भाव है । वादी साहब गज़ब के विद्वान् (? ) हैं । तो जो क्षत्रिय वैश्य बैठे हुए • हैं, वे शास्त्रचर्चा में वादी के अनुसार कुछ भी बोल नहीं सकते सभा हों में; तब कदाचित् वादी क्षत्रिय तथा वैश्यका ब्राह्मण इतनी बिद्या पढ़ना कर न मानता होगा । वादी धन्य है, कहाँ वह शूद्रको वेद पढ़ाना चाहता था.. अप कहाँ उसने क्षत्रिय, वैश्यको भी शास्त्र पढ़ाने बन्द कर दिये । जनक, में अजातशत्रु आदि क्षत्रियोंका उपनिषदोंमें निरूपण किया गया है । ब्राह उन्होंने वहाँ ब्राह्मणों को भी ब्रह्मविद्या सिखलाई थी । पर यदि वादीका क्य किया गया ' ब्राह्मणोस्य ' मन्त्रका अर्थ ठीक है; तो उपनिषदों में उनको चा क्षत्रिय न कहकर ब्राह्मण कहा जाता । उनके शिष्यों ब्राह्मणों को ब्राह्मण- द्रा न कहकर ' शूद्र ' कहा जाता । जब नहीं कहा गया, तव वादीका श्रयं धन स्वतः मनगढन्त श्रतएव श्रशुद्ध सिद्ध हो गया । वादीके अनुसार कई पुरुष सभामें बैठे हों; कोई पुरुष ज़ोर - ज़ोरसे चि किसीको गाली वकता जाय, तव वादीके ' वैदिक ' (? ) - मतानुसार वह ब्राह्मण होगा । क्योंकि - उसकी उस समय मुखसे उत्पत्ति हो रही है । हों, जो चुप बैठे हैं, वे मुखसे उत्पन्न न होनेसे शूद्र हो जायंगे । वादी धन्य पर है । इस अपने बनावटी - अर्थ में वादीने मन्त्र में ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' के ' अस्य ' को कहां छिपा दिया? और फिर जो वक्ता न हो; लेखसे ही द्रोप बादीको चुप करा दे, तब तो वह वादी भी ब्राह्मण न रहेगा; क्योंकि वह न मुखसे उत्पन्न नहीं हुआ, और वादी उस समय शुद्र हो जायगा । उत्प क्षत्र स ० ध ० ५७ मन्त्र
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८६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इधर यदि बादी शास्त्र चर्चा में परास्त होकर चुप हो जाय, तव वादी ब्राह्मण रहेगा, वा अब्राह्मण? इसका निर्णय भी वादी करे । जो विद्वान् सभामें चुप किये बैठे हैं, वे वादीके अनुसार मुखसे इवर न हो रहे होनेसे क्या शूद्र हैं? वादी धन्य है । क्या ' मूर्ख ' भी उत्पन्न कोई वर्ण है, जिसे वादीने ' ब्राह्मणवर्ण ' की प्रतियोगिता में रखा है? रातको शयन के समय वादी अपनी स्त्रीके साथ शास्त्रचर्चा तो करता न होगा; तव वादी ब्राह्मण भी न रहता होगा । तब वादी अपनी ब्राह्मण स्त्रीका परिवर्तन भी करेगा, या नहीं? श्रथवा शास्त्रचर्चा-में वादीकी पत्नी वादीसे पराजित होकर चुप हो जाय; तब वादी तो ब्राह्मण होगा, और उसकी स्त्री शूद्रा । तब वादीका उसके साथ संयोग क्या शास्त्रीय होगा? क्या वह साङ्कर्योत्पादक नहीं होगा? इधर वादीका वच्चा वादीको भान्ति मुखसे उत्पन्न तो होगा नहीं, तब वह ब्राह्मण भी न होगा । तब क्या वादी उस बच्चेको अपने स्वाद के अनुसार किसी शूद्रको देनेकेलिए तैयार हो जायगा? अथवा वादी रोनेसे ही मुखसे उस बच्चे की उत्पत्ति माने; तब तो संसार भरके रोने-चिल्लानेवाले लड़के ब्राह्मण हो जाएंगे? श्रागे वादी लिखता है - ' इसी प्रकार भीरु तथा क्षत्रिय इकट्ठे बैठे हों, तो कुछ पता नहीं लगता कि कोन भीरु है तथा कौन क्षत्रिय? परन्तु सङ्कट पड़ने पर भुजवलसे क्षत्रियका प्रादुर्भाव हो जाता है । " वाह! वादी पूरा बुद्ध है । वादीके हिसावसे युद्ध में कर्ण तथा द्रोणाचार्य यादिके मुकाबले में भाग जानेवाले युधिष्ठिर तो अव क्षत्रिय न रहे, और द्रोणाचार्य आदि क्षत्रिय हो गये, क्योंकि उनकी भुजवलसे उत्पत्ति हुई । परन्तु महाभारत में द्रोणाचार्यको ब्राह्मण तथा युधिष्ठिरको क्षत्रिय बतलाया गया है | यह क्यों? क्या यह वात वादीके उक्त मन्त्रार्थकी अशुद्धताकी परिचायक नहीं? विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ = ea क्या भीरु भी कोई वर्ण होता है, जिसे वादीने क्षत्रियकी प्रतियोगिता में रखा है? वादी भीरुको कौनसा वर्ण देगा यह उसने नहीं लिखा । यह भी बादी बतावे कि - श्रीभीष्मको शास्त्रज्ञ होनेसे ( देखिये उसका आदर्श शान्तिपवं एवं अनुशासनपर्व में ), तथा भुजवलयुक्त होनेसे ( देखिये उसका आदर्श ' भीष्मपर्व ' में ) क्या ब्राह्मण - क्षत्रियका सङ्कर मान लेगा? फिर तो वादी कुश्ती खेलनेवालोंकी भुजदलसे उत्पत्ति होने से उन्हें क्षत्रिय कह देगा! वादी जब गुरुकुलमें भुजबल दिखलाता था, भुजवलसे भारी-मुद्गरोंको घुमाता था; तव वादी क्षत्रिय, तथा विद्याध्ययन - व्यापृत होनेसे ब्राह्मण - इस प्रकार क्या वर्णसङ्कर था? तब जो क्षत्रिय भुजबल न होनेसे क्षत्रिय न रहेंगे, उनका कौनसा वर्ण होगा? स्त्रियां स्वभावतः अवला होती हैं, क्योंकि वे शुक्रकी अल्पता और रजकी अधिकता से उत्पन्न होती हैं । रज, शुक्र धातुकी अपेक्षा बहुत निर्वल होता है; तब स्त्रियाँ तो नहीं । तव क्षत्रिय वेचारे क्वारे ही रहे । स्त्रियां होती हैं; तब वादीके अनुसार मुखसे उत्पत्ति मतमें वे ब्राह्मणी हो जायंगी; तब क्या सभी करें? वैश्य - स्त्रियां क्या व्यापार करने जाएंगी? चल सकेंगे । तव उनका ऊरुसे जन्म न होनेसे वे क्षत्रिया नया होंगी-मुखसे गालिप्रदानदक्ष होनेके कारण वादीके स्त्रियां ब्राह्मणोंसे व्या पर उनके ऊरु शीघ्र न वैश्य भी न हो सकेंगी । बया सेवामें लगी हुई सभी स्त्रियोंको वादी शास्त्रानुसार शूद्र मानेगा? तव तो स्त्रीमात्र शूद्र हो जाएंगी! तब बादी उनको उपनयन न होनेसे वेदाधिकार ही कैसे दे सकेंगे? तब क्या सभी सेविका - स्त्रियां शूद्रोंसे व्याही जाया करेंगी? तब तो ' जन्मना जायते शूद्रः ' यह दयानन्दियों का इष्ट वचन भी अशुद्ध हो जायगा; क्योंकि उत्पन्न होते हुए सभी सेवा नहीं कर रहे होते, किन्तु माता - पिता द्वारा सेवा करवा रहे होते हैं ।
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१०० ] श्रीसनातनधर्मालोका ( ३-२ ) फिर तो माता - पिता ही सेवाकर्ता होनेसे शूद्र हो जाया करेंगे! लंगड़े-पुरुषोंको तो वादी पैरसे उत्पत्ति न होनेसे प्रवर्णं ही मान लेगा! वादी केवल ब्राह्मण और क्षत्रियकी ही मुख और बाहुसे उत्पत्ति बताकर चुप हो गया । न तो आगे उसने वैश्यको ऊरुसे उत्पादित किया, न शूद्रको पैरोंसे उत्पन्न कराया । कदाचित् इस विचारसे कि हैदराबाद-आदिमें ऊरु तथा पैरके बलसे शास्त्रार्थ करनेके लिए जानेवाला वह स्वयं वैश्य तथा शूद्रका सङ्कर न बन जाए! महाशय! बनावटी अर्थ करनेसे ऐसे बहुतसे दोष स्वतः उपस्थित हो ही जाया करते हैं । वादी इन बनावटोंके ब्लेकमार्केटिङ्गको प्राशा है, बन्द कर देगा । नहीं तो निगृहीत होकर वह बहुत हानि उठा बैठेगा । अभी जनता प्रायः प्रशिक्षित है, इधर अनुसन्धान नहीं कर सकती । इसलिए वादियोंका निर्वाह चल रहा है । जनताके संस्कृत - शिक्षित तथा अनुसन्धाता हो जानेपर वादियोंकी सिकताभित्तियां शीघ्र ढह जायेंगी । वे अभीसे सम्भल जावें । आगे वादी ऋषिवादमें उवटको स्वतः प्रमाण मानता हुआ उसका ' गुरुतः ततश्चैव तथा शातपथश्रुतेः । ऋषीन् वक्ष्यामि मन्त्राणां देवताः छान्दसं च यत् ' यह पद्य उद्धृत करता है । वादियोंकी नीति बहुत विचित्र है । समय पड़ने पर किसी ऋषि - मुनिके वचनको भी वे लोग नहीं मानते । कभी कहीं एक साधारण पुरुषको भी स्वतः प्रमाण मान लेने को तैयार हो जाते हैं । जिन उवट - महीधरको वादी लोग " वाममार्गी ” कहने में भी नहीं सकुचाते, समयपर उनका निजी वैयक्तिक - वचन भी प्रमाण मान लेते हैं । उवटके ' तर्क ' का अर्थ है ' विचार ' । सो वही विचार छन्द वतानेमें भी हो सकता है । पर उसने यदि ' शतपथ ' के कहे विनियोगका परिवर्तन कर दिया हो; तब तो वादीकी बात कुछ सङ्गत हो सकती है; पर यह वादीका प्रयास व्यर्थ है । गुरु आदि द्वारा सुनकर फिर उसपर विचार करना विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ६०१ १०२ ] ही पड़ता है; यह स्वाभाविक है, क्योंकि - ' कहीं ऋषियोंके नामभेद शेष जाते हैं । वहाँ सोचना पड़ता है कि वह नामभेद कल्पभेदकृत है; श्रा ही अशुद्ध उसका उपनाम है? तो इससे ऋषि तथा देवताके वेदोंके साथ अनादि- या लिख सम्बन्धमें कोई क्षति नहीं प्राती । ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः ' यह ऋषिका प्रतिपाद्य तथा ' या तन उच्यते सा देवता ' यह देवताका लक्षण होनेसे, देवता उस बोल नहीं मन्त्रका प्रतिपाद्य होनेसे इनका वेदोंके साथ सम्बन्ध स्वतः सिद्ध है । प्रतिपादक इससे वेदकी अपौरुषेयतामें कोई क्षति नहीं प्राती; क्योंकि – वंह पर आश्रित . मन्त्र उस ऋषिसे बनाया हुआ नहीं होता; किन्तु उससे दृष्ट वा प्रोक्त ' स्व ' होता है । यद्यपि वेदादिशास्त्रों में ही कहीं ऋषियों द्वारा मन्त्रोंका ' करण ' । कहा गया है । जैसे कि- ' सूर्य ऋषिमंन्त्रकृत् ' ( ऐतरेय ब्रा. ६।१ ) ' ' यत्र दोनों गुरु-धीरा मनसा वाचमऋत ' ( ऋ.सं. १०/७११२ ) ' ऋषिः कुत्सो भवति आगे कर्ता स्तोमानाम् ' ( निरुक्त ३१२१५ ) ' ऋषे! मन्त्रकृतां स्तोमं ( ऋ. ह्न करनेवा ६।११४ । २ ) ' यामृषयो मन्त्रकृत: ' ( कृ.य. तै. ब्रा. २८८४ ) इत्यादि; हदीने पर तथापि हमारे अनुसार ' कृ ' घातु अनेकार्थक होनेसे वहाँ दर्शन वा प्रवचन ज्ञानां भूया वाला होता है । भू, दक्षिण शेष रहा उस - उस मन्त्र में कहीं - कहीं उस - उस ऋषिका नाम या ही बद जाना, सो यह परमात्माकी सर्वज्ञतासे होता है, इससे दोष नहीं पड़ता । न्याय में प्रत्येक - कल्पमें जैसे मन्त्रोंका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही उसी मन्त्र! ' हे ऋषिका प्रादुर्भाव भी होता है । प्रवाहरूपसे ऋषि भी नित्य हैं, और श्रमना पूर्ण उनकी संख्या नियत ही होती है । श्रतः प्रागेका वादीका उपहास देखिये व्यर्थ है । वेदमन प्रत्युत वादीके मत में परमात्मा के निराकार होनेसे वेद उसकी वाणी रामेश्वरकी नहीं; क्योंकि वह बोल नहीं सकता । तब वेद, भक्त - जीवकी ही वाणी हैं । सिद्ध हुई । तव वेद वादीके ही मतमें पौरुषेय बन जायगा! ' चौबे गये थे यही छब्बे बनने, दुब्बे बनकर आये ' । वादी के