सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 481–490

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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EOR ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शेष रहा वादीका ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका अर्थ; सो वह तो सर्वथा ही प्रशुद्ध है । जब वादीके स्वा.द.ने ही उसमें भक्तके द्वारा बुलवाना नहीं लिखा; इधर जब ईश्वर ' देवता ' होनेसे प्रतिपादक नहीं, किन्तु प्रतिपाद्य है, बादीके भी अनुसार निराकार होने से जब परमात्मा स्वयं बोल नहीं सकता, तब भक्तके द्वारा वह प्रतिपाद्य ही रहेगा, स्वयं प्रतिपादक नहीं | तब वादीके अर्थके अशुद्ध सिद्ध होनेसे उस सिकताभित्ति पर ग्राश्रित वादीका पक्षरूपी महल भी स्वयं धराशायी हो गया । ' स्व ' का अर्थ वादी करता है कि ऐ भक्त! क्या तेरे अपने, क्या प । स्वा.द.ने इससे अपनी स्त्री, सेवक तथा अन्त्यज, लिये हैं; तब दोनों गुरु - चेलों में किसका अर्थ ठीक और किसका गलत है? श्रागे जो ' हे भक्त! ऐसा उद्योग कर, जिससे देवोंमें मेरा प्रेम बढ़े, यज्ञ करनेवाले तथा दक्षिणा देनेवालोंमें मेरा प्रेम बढ़े '? इस अर्थसे वादीने परमात्माको अशक्त सिद्ध कर दिया । मन्त्र कहता है -- ' प्रियो देवानां भूयासम् ' ' दक्षिणाया दातुश्च प्रियो भूयासम् ' ( मैं देवताओं का प्यारा में, दक्षिणा देनेवालोंका प्यारा बनू ) पर वादीने ' इनमें प्रेम बढ़े ' यह । प ही बदल दिया है । ' ऐसा उद्योग कर यह शब्द भी वादीने स्वयं मन्त्रार्थ में प्रक्षिप्त कर दिये, जो शायद परमात्माकी गलतीसे छूट गये हो! हे ' भक्त! तेरे उद्योगसे ' अयं मे काम: समृध्यताम् ' ( मेरी यह है । कामना पूर्ण हो ) । भी | देखिये पाठकगण! वादीने ' हे भक्त.! तेरे उद्योगसे ' इतने शब्द उक्त परमेश्वरकी वेदमन्त्र के अर्थ में प्रक्षिप्त कर दिये हैं । हा खेद! यह लोग देते हैं वाणी में शायद त्रुटि देखते हैं. तब मनगढ़न्त प्रक्षेप उसमें कर । यहाँ यही दशा इस ' यथेमां ' से पूर्व मन्त्रकी भी वादीने की है । वस्तुतः वादी के अनुसार भी ईश्वरके निराकार होनेसे प्रतिपादक न हो-विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ९ ०३ सकने के कारण ' यह परमात्माने भक्तको कहा है ' यह व्याघात हो जानेसे उसका पक्ष मूलसे ही कट गया । क्योंकि - कभी कहते हैं- ' परमात्मा निराकार होनेके कारण स्वयं बोल नहीं सकता, इसलिए भक्तों द्वारा बुलवाता है ' ( पृ. २६३ ) कभी कहते हैं कि - परमात्मा भक्तोंसे कहता है ' ( पृ. २६६ ), तब ' यावज्जीवमहं मोती ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु मम वन्ध्यासीद् प्रपुत्रश्च पितामहः ' की तरह वादीका लेख स्वयं ही व्याघात ग्रस्त होनेके कारण खण्डित हो गया । वादीने हमसे दिखलाये हुए दोषोंका न तो क्रमसे उद्धरण दिया है; न उनका कोई समाधान ही किया है । केवल कुछ लिख देनेसे काम नहीं चल सकता । ' हे भक्त! ये अग्नि और पृथिवी मेरे सामने सिर झुकाते हैं, मेरी आज्ञा है - सदा झुकाते रहें । यह अर्थ भी गलत है । एक तो भक्तका अध्याहार करना निर्मूल है । दूसरा जब प्रग्नि और पृथिवी उसके सामने सिर झुका रहे हैं; तब यह प्राज्ञा देना कि - सदा सिर झुकाते रहें - यह कथन व्यर्थ हो जाता है ॥ और ' मेरी आज्ञा है ' यह किस पदका अर्थ है? वादी मन्त्रार्थ में प्रक्षेप कर रहा है । ' सिर झुकाने ' का भाव ' अनुकूल होना ' है । सो अनुकूल तो वे ऋषिके सामने भी हो सकते हैं । इसलिए आवश्यक नहीं कि यहाँ परमात्मा ही वक्ता हो । ऋषि भी हो सकता है । इधर ' सन्नमतां ' का अर्थ ' सन्नमयताम् ' है । ' छन्दस्युभयथा ' ( पा. ३ | ४ | ११७ ) ' णेरनिटि ' ( पा. ६।४।५१ ) इन पाणिनिसूत्रोंसे सार्वधातुक-शक्की प्रार्धधातुक संज्ञा हो जानेसे णिका लोप होकर उक्त प्रयोगकी सिद्धि है कि - अमुकको मेरे वशवर्ती करें । यहाँ प्रार्थनामें लोट् है । सो इसका प्रार्थनाकर्ता ऋषि याज्ञवल्क्य ही वक्ता है । परमात्मा वा देवता भला वक्ता कैसे हो सकते हैं? देवता तो इस मन्त्रके अजमेर वैदिक-यन्त्रालयकी यजुर्वेदसंहितामें ' अग्न्यादय: ' इस प्रकार बहुतसे कहे गये हैं ।

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०४ [ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तब वे ही वाच्य हुए । वहाँ परमात्मा कैसे वाचक हो सकता है? जरा बताए तो । फलतः ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृहयेत् ' इतिहास - पुराण, मन्वादि स्मृतिकार. श्रीवेदव्यास, श्रीजैमिनि, श्रीवाल्मीकि प्रादि बहुतों की साक्षीसे स्त्री एवं शूद्रका वेदाधिकार खण्डित हो गया । वेदके नियतानुपूर्वी वाले शब्दों में क्रमिक तथा वैध द्विज - पुरुषोंका ही अधिकार है, जबकि स्वा.द. जीने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुरुषोंका ही उपनयन संस्कार तथा वेदारम्भ - संस्कार कराया है । स्त्री एवं शूद्रादिका स्वा. द. जीने अपनी ' संस्कार विधि ' में न तो उपनयन संस्कार कराया है, और न वेदारम्भ-संस्कार । यहाँ तक कि यज्ञकेलिए अग्नि भी स्वामीने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के घरसे मँगाने के लिए लिखा है, शूद्रादिके घरसे नहीं । देखिये उनको ' संस्कार विधि ' । तब स्त्री - शूद्रादिको यज्ञविषयक-वेदका अधिकार देना जहाँ शास्त्र विरुद्ध है, वहाँ स्वा.द.की ' संस्कार - विधि ' से भी विरुद्ध है । हम इस विषय में ' सिद्धान्त ' - वाराणसी-पत्रके महालेखमें प्रकाश डाल चुके जिसके प्रत्युत्तरार्थ पृथक् पुस्तक प्रकाशित करते हुए भी गुरुकुलके स्नातक एक सिद्धान्तालङ्कारकी लेखनी सफल न हो सकी- यह हम आलोक ' ' के तृतीय पुष्पके इस द्वितीय-संस्करणमें प्रदर्शित कर ही चुके हैं । अब इस विषय में विस्तारकी प्रावश्यकता नहीं रही; और श्रार्यसमाजके सुप्रसिद्ध शास्त्रार्थ - महारथी श्रीबुद्धदेवजी विद्यालङ्कारके इस पक्षकी निस्सारता भी हमने इस निबन्ध में दिखला ही दी है । यह ' प्रालोक ' के विद्वान् पाठकोंने अनुभव कर ही लिया होगा । इसका अन्त तक भी विद्यालङ्कारजीने प्रत्युत्तर नहीं दिया । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन्होंने एक निर्मूल पक्षका आश्रयण कर रखा था । आशा है- धनुसन्धान प्रिय पाठकोंको इस दिशामें प्रवृत्त होनेकेलिए पर्याप्त सामग्री मिली होगी । यह शास्त्रार्थं तथा पुष्प यहाँ समाप्त हो गया है । शम् । अन्तिम सूचना [ १०५ ६०६ अन्तिम सूचना गप्प है ' ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन और वैदिक कर्मकाण्डमें अधिकार ' नामक पूर्वापर - प्र २३६ पृष्ठकी गुरुकुली - सिद्धान्तालङ्कार श्रीधर्मदेव विद्यामार्तण्डजी की समर्थ नह पुस्तककी हमने ५६७ पृ. से ८७३ पृ. तक कुल २७६ पृष्ठोंमें प्रत्यालोचना प्रायश्चित कर दी है । उसके अक्षर - अक्षरका समाधान कर दिया गया है । सकते हैं वादीने उस पुस्तककी भूमिका में हनपर गोवध माननेका वाचक है कलङ्क लगाया था । इसका कारण यह है कि जब यह लोग देखते हैं लगाने में कि हमसे इनका प्रत्युत्तर नहीं वन सकता; तब यह लोग अपने प्रति- ८ अव वक्ताको जनदृष्टिसे गिरानेकेलिए कई प्रकारके कलङ्क लगाने के लिए तत्पर होने को है हो जाते हैं । कष्ट होन उक्त कलङ्क वादीने गलत लिखा है । हमने वहाँ लिखा था कि देश- प्राप्त नह · काल - नात्र भेदवश माँससे कोई प्राचीन पुस्तक छूटी नहीं है । पर जहां प्रकारका किसी प्राचीन ग्रन्थ में ' गो ' - वध दिखाई पड़े; तो वेद - पुराणानुसार गायके इस ' अन्य ' होने वहाँ ' गो ' शब्दसे ' गाय ' न लेकर ' पशु - सामान्य ' अर्थ ' चव ' अ समझना चाहिये; क्योंकि— ' गो ' का अर्थ कोषोंके अनुसार ' पशु ' भी हुग्रा कि यह ' व करता है । उल्टा गोवध तो प्र ० सत्यार्थप्रकाश में स्वा. द. जी लिख गये हैं । कि वह ह गायकी अवध्यतामें तो हमने ' आलोक ' के छठे सुमन ( पृ. ३११ से सरके उ ४७१ पृ. तक ) तथा ११ वें पुष्पके २ य पृष्ठसे ११७ पृष्ठ तक विचार है । इस दिया है । जोकि पुराणादिमें गोवधका कलङ्क दयानन्दियों द्वारा लगाया सावधान " जाता है; उन सबका प्रत्युत्तर हमने इन पृष्ठोंमें दे दिया है । ७ म पुष्पके कहीं - कहीं कुछ पृष्ठों में भी हगने इस विषय में विचार दिया था; जिनका निर्देश - यह • हम ११ वें पुष्पमें कर चुके हैं । इन निबन्धोंसे दयानन्दियोंसे लगाया उक्त प्रेस म कलङ्क निर्मूल सिद्ध होता है । हमने इस विषय में इतना विचार दिया ( न होनेसे है कि अपनेको हिसावादी माननेवाले दयानन्दी भी उतना विचार नहीं होता नहीं कर सके । केवल ' यह प्रक्षिप्त है, यह वेदविरुद्ध है, यह पौराणिक- खाया ।

पृष्ठ 483

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६०६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) 1 गप्प है ' इतनामात्र ही कहकर वे लोग अपनी जान छुड़ा लियाकरते हैं । नक पूर्वापर - प्रकरणानुसार तथा उस ग्रन्थकी विवक्षानुसार वे व्यवस्था करनेमें की समर्थ नहीं होते । इतना भी वे नहीं समझते कि जो प्रायश्चित बताया करते हैं; वे भला ' गोवध ' कैसे पुराण- गोवधमें ना सकते हैं? अतः वहाँ ' गो ' शब्द ' गाय ' का नाम न होकर सिद्धान्तित कर ' पशु - स. मान्य ' । वाचक है । केवल पुराणोंसे विद्वेष होनेसे ही वे पुराणपर का लगाने में अपनी निकम्मी एवं बेबुनियाद शूरता दिखलाया झूठा कलङ्क हैं करते हैं । ति- अव छठा सुमन जिसमें गोविषयक समाधान किये गये थे - समाप्त पर होने को है । समाप्त हो जानेपर इस विषय में घर्मदृष्टिकोणवालोंको कष्ट होना सम्भव है; क्योंकि - फिर उन्हें ऐसे सुव्यवस्थित कुछ समाधान प्राप्त न हो सकेंगे । तथापि ११ वें सुमनसे वे लोग भी इस विषय में सब देश- प्रकारका समाधान प्राप्त कर सकते हैं । जहां यके इस पुष्पके मुद्रणमें ' वन्व ' की गड़बड़ी रही हैं; क्योंकि प्रफके प्रर्थ चन्द ' अक्षरोंमें कभी स्याही अधिक लग जानेसे पता नहीं लगता हुआ कि यह ' ब ' है, या ' व ' । और फिर इस टाईपमें अनुस्वार इतना सूक्ष्म है कि वह छपने के समयमें स्पष्ट नहीं उठता । इसी प्रकार पूर्वोक्त कारणवश से प्रसरके ऊपरके " ' के स्थान कभी अनुस्वार ( बिन्दु ) छपा हुआ होता बार है । इस प्रकार मुद्रणमें टाइपके अक्षरोंके सूक्ष्म होनेसे कई अक्षरों की या सावधानी ( अपेक्षित अक्षरके स्थान अन्य अक्षर मुद्रित हो जाना ) भी पके कहीं - कहीं हुई है । ' आलोक ' पाठकगण इन प्रसावधानियोंको स्वयं जान दश - यह हम उनसे आशा करते हैं । उक्त प्रेस में चढ़ा हुआ अन्तिम प्रूफ हमें न मिलने के कारण वह हमारे सामने दया होनेसे ऐसी असावधानियाँ रह ही जाती हैं; पर इनसे अर्थभेद कुछ भी बार नहीं होता । इस कारण व्यर्थं समझकर हमने इन अक्षरोंका शुद्धिपत्र नहीं क-गाया । जैसे ' प - ष ' ' ब - व ' ' थ - य ' आदि । कभी कई मात्राओं वा अक्षरोंमें अन्तिम सूचना [ २०७ स्याही न लग सकनेसे उनका भी मुद्रण नहीं हो सका । यह मुद्रणयन्त्रके अनुभव रखनेवाले पाठक जान सकते हैं । कहीं ' ' यह चिन्ह भी नहीं छप सेके । कहीं - कहीं विषयोंकी क्रमसंख्या भी नहीं छप सकी । अन्य बात यह है कि मुझे सिरमें भारी एक्सीडेन्ट हो जानेसे जिसका निर्देश हमने भूमिकामें दिया है - एक मास सफदरजङ्ग हस्पतालमें रहना पड़ा । सो मेरे परोक्षमें कई फर्म छपनेसे कई अन्य मुद्रक प्रमाद रह गये । आशा है - ' आलोक ' पाठकगण ऐसी असावधानताओं भी देकर उनका स्वयं शोधन कर लिया करेंगे । यद्यपि हस्पतालसे में ध्यान धानेके बाद दुर्बलतावश हमें इस प्रकारके परिश्रमकेलिए निषेध कर दिया गया था; तथापि यह सोचकर कि जब परमात्माने मुझे नवजीवन दान दिया है, तब यह कार्य भी रोक देना ठीक नहीं । देर भले ही हो; पर कार्यमें रुकावट होनी ठीक नहीं । आगे हम सदाकी भाँति इस पुष्पका परिशिष्ट दे रहे हैं, जिसमें समाचार - पत्रोंकी घटनाएं हैं, जिनसे प्राशङ्कित पौराणिक विषयोंका समाधान भी हो जाता है । आशा है- ' आलोक'-पाठकगण उधर भी दृष्टिपात करेंगे । *

पृष्ठ 484

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परिशिष्ट [ वादी की पुस्तक समाप्त हो जानेसे हम भी इस विषयको समाप्त करते हैं । अब समाचार - पत्रोंकी सच्ची घटनाएं ' ग्रालोक'- पाठकोंके समक्ष रखते हैं । ] ( १ ) पतिकी मृत्यु के बाद मैं तीन साल तक उनकी आत्मा से बात करती रही । ( ' नवभारत टाइम्स ' नई दिल्ली ३ सितम्बर ७२ रविवाराङ्क पृ. ४ से उद्धृत अपेक्षित अंश ) ( स्व ० आचार्य चतुरसेन शास्त्रीकी पत्नी श्रीमती कमल किशोरीकी लेखनीसे ) १० जून १ ९ ४५ को उन्हों ( श्रीचतुरसेन शास्त्री ) ने मेरा हाथ ग्रहण किया था, १४ वर्ष बाद दो फरवरी १ ९ ६० को जब मृत्युने उन्हें घेर लिया, तब उन्होंने अपनी मूर्छासे कुछ क्षणका अवकाश ले मुझे स्मरण किया । मैं उनके सामने खड़ी थी, उनके सिरहाने थी, अपने प्राण उनके वदले विसर्जन करनेको प्रस्तुत थी, परन्तु मृत्यु- धर्मकी सत्ता बहुत प्रबल है, उसने देखते - देखते उन्हें चिरनिद्रा में सुला दिया, मेरा रुदन- चीत्कार कुछ काम न आया; फिर तो प्रांखों में पानी जब तव बहता रहा । कांकरौली महाराज गोस्वामी श्री व्रजभूषणलालजीने प्राचार्यजीको प्लान्ट पर मृत आत्माएं बुलाकर बातें करना सिखाया था, प्राचार्यजी मुझे भी अपने साथ प्लान्चट पर बैठा लेते थे, इससे आत्माका श्राह्वानज्ञान मुझे भी हो चला था । उनके निधन के बाद मैं प्लान्ट लेकर बैठने लगी, दो - तीन सिटिंगके बाद आत्मा बात करने लगी, आरम्भमें मृत्यु होने के पन्द्रह दिन तक तो आत्मा पांच - दस मिनट रुकती थी, फिर चली जाती थी, वे कहते थे- अभी बात करने में कष्ट होता है । समाचारपत्रोंकी घटनाएं कुछ दिन बाद प्रातः काल की सिटिंगमें उनकी मुझे कष्ट नहीं होता । माओ चाय पियें । ' कैसे पियेंगे, मुझे क्या करना चाहिए? '. ' वढ़िया चाय बना कर कपमें लाभो । ' [ Coe १ आत्माने कहा -- प्रव मैं कमरेसे बाहर आकर रसोईमें गई, और अपने हाथसे चाय बना कर ले गई । प्लान्चटने कहा – ' कप जरा पास सरकाओ । ' व्यक्ति पिला कप सरका कर मैं प्रतीक्षा में बैठी रही, उस समय मैं इस आशा में थी कि कदाचित् उनका हाथ दृष्टिगोचर हो, परन्तु ऐसा नहीं हुआ । चार - पांच मिनट बाद प्लान्चटने कहा- मैं पी चुका, अब तुम पिम्रो । ' कहाँ पी, चाय तो उतनी ही भरी हुई है । ' अवश्य ' मैं सूक्ष्म- प्रात्माके रूपमें यहाँ हूं, हम ग्रहश्य रूप से स्पर्श करके तृप्त होते हैं । एक दिन चाय पीनेके बाद बोले- ' पान लाभो । ' परन्तु उनकी मृत्युके वाद पान - दान तो बन्द पड़ा था, उनके सिवा और कोई व्यक्ति घरमें पान खाता नहीं था, अतः मैंने कहा - ' पान तो ठीक श्रव घरमें नहीं है । ' कल बाजारसे मंगा रखना, वनारसी बीड़ा मंगाना । ' रेशमी अगले दिनसे चाय पीकर पान भी खाते थे, परन्तु वही अदृश्य-स्पर्शमात्रसे । वादमें वही चाय और पान मुझे खानेकी प्राज्ञा होती थी । गूंथी, इस वार्तालापसे मेरा दिल बहलने लगा, दुःख कुछ कम हुआ, परन्तु प्लान्चटसे उठकर बाहर आते ही मेरी प्रांखें बहुत देर तक लाल रहती माला थीं । मैं गुम - सुम देर तक पलंगपर पड़ी रहती थी, मुझे सामान्य - स्थितिमें होनेमें तीन - चार घण्टे लग जाते थे । श्रध्या

पृष्ठ 485

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१० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) एक दिन उन्होंने कहा - ' तुम वहुत रोती हो, यह ठीक नहीं है, खुश रहो । मेरा जीवन समाप्त हुआ, इससे दुःख क्यों? ' ' क्या श्राप वहाँ सुखी हैं? ' ' हाँ, हम आत्माएं शरीर - मोहसे उन्मुक्त हैं । एक दिन प्लान्ट पर बातें हो रही थीं कि वोले – ' देखो, अमुक व्यक्ति लाकर वाहर बैठे हैं, जाओ और उनका स्वागत करो, चाय - बाय पिलाओ । मैं बाहर आई तो सचमुच वह व्यक्ति आये हुए थे 1 एक बार कहा - ' तुम्हारी साड़ियां फट गई हैं, नई मंगा लो । अगले दिन फिर यही कहा और अधिकारपूर्ण प्रादेश दिया - प्राज अवश्य मंगाओ । ' नया कपड़ा कैसे पहनूं, जी नहीं करता । ' न मंगाग्रोगी, खुश न रहोगी; तो मुझे कष्ट होगा । अगले दिन नई साड़ी पहन कर प्लान्चट श्रव ठीक है, पर बालोंमें तेल कवसे नहीं डाला ठीक रखना । एक दिन बोले- भूल गई, आज १० जून रेशमी साड़ी पहन कर ग्राम्रो, कुछ फूल लाम्रो, मैं चमत्कृत हो वाहर ग्राई, साड़ी बदली, गंथी, चाय - पान लेकर फिर प्लान्चट पर बैठी । ' हाँ, अब ठीक हुआ, लो मैं चाय पी चुका, माला भी मैंने पहन ली, प्रव तुम पहनो, श्राज पर बैठी; तो वोले- हाँ, है, सूखे हो गये हैं, कलसे है, ब्याहका दिन! जान चाय लाभो । कुछ फूल तोड़कर माला अव तुम भी पीओ, फूल-दिन भर खुश रहना । ' इसी प्रकार प्लान्चट तीन वर्ष तक चलता रहा । शायद यह श्रध्यात्म - प्रमका परिणाम था, कभी - कभी किसी विषयपर सम्मति लेनेके-समाचारपत्रोंकी घटनाएं, [ ε?? लिए भी मैं प्लान्चट पर बैठती थी, और वे सही धैर्य बंधाते थे, परन्तु तीन वर्ष बाद परामद्यं देते थे, मुझे वन्द कर दिया । एक दूसरी ग्रात्माने उनकी आत्माने प्लान्टपर माना अव अन्य लोकको चले गये हैं, नहीं प्लान्ट पर आकर बताया कि वे स्थायी नहीं रहती । " आ सकते । श्रात्मा एक ही लोकमें | ' आलोक ' - पाठकोंने श्रीकमल किशोरी - चतुरसेनका होगा । इसमें स.व. की बहुत - सी सैद्धान्तिक लेख पढ़ लिया हो रही हैं । बातें पुष्ट होती हुई प्रतीत पहले कहा था कि- ' अभी ( १५ दिनोंके भीतर ) बात करनेमें होता है । यह ठीक है । प्रारम्भिक १२ दिनोंमें कष्ट उसमें शक्तिकी न्यूनता होती मृतक प्रत होता है; करनी है । सो उसकी पुष्ट्यर्य प्रौध्वदेहिक क्रियाए पड़ती हैं । दश - गावसे प्रेत दश की पुष्टि पड़ती है । करती फिर कहा था — ' हम अदृश्यरूपसे स्पर्शादि करके तृप्त हो जाते हैं ' । पितर भी एक देवविशेष होते हैं ( देखो - सांख्यकारिका ) । सो देवताओंके-लिए लिखा है ' न वै देवा प्रश्नन्ति न पिवन्ति । एतदेव श्रमृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छान्दो. उप. ३।६।१ ) ( देवता लोग न स्थूलरूपने खाते हैं, और न स्थूलरूपसे पीते हैं; किन्तु उस पदार्थके अमृत ( सूक्ष्म अंश ) को देखकर ही तृप्त हो जाया करते हैं ) । मनुस्मृतिमें लिखा है- ' निमन्त्रितान् हि पितरः उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् । वायुवच्चानुगच्छन्ति ' ( ३११८६ ) ( पितर लोग निमन्त्रित-ब्राह्मणोंके पास वायुकी भांति सूक्ष्म होकर उपस्थित होते हैं ) इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे सूक्ष्मरूप होनेके कारण परोसे हुए अन्नके सूक्ष्म अंशको मधुमक्षिकाकी भान्ति लेकर तृप्त हो जाते हैं । फिर इसमें कहा गया था कि -३ सालके बाद वे फिर अन्य पृथिवी-आदि लोकोंमें चले जाते हैं ।

पृष्ठ 486

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६१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) श्रीचतुरसेन शास्त्री प्रायसमाजी थे; उनकी धर्मपत्नी भी वैसी रही होगी । सो यह लोग लोक - लोकान्तरोंको नहीं मानते रहे होंगे । पर यहाँ परलोकगत शास्त्रीजीने स.ध. की मान्यतानोंको सिद्ध कर दिया है । आर्यसमाजी लोग मृतकका तुरन्त इस लोक में आ जाना मानते हैं; अब उनकी इस पत्नी के सत्य - संस्मरण में मृतक ग्रात्माका ३ सालतक परलोक में रहकर फिर अन्य लोकमें जाना कहा है । इससे उनकी पत्नोके सत्य-अनुभबसे स.ब.की मृतकके विषयमें मान्यताएं सत्य होती हुई सिद्ध हो रही हैं । यह ' आलोक ' - पाठकोंने समझ लिया होगा । श्रीचतुरसेन शास्त्रीका एक मन्तव्य हम गत पृ. ३४०-३४१ में आलोचित कर चुके हैं । उन्हों ( चतुरसेनजी ) ने चार वेद - ऋषियोंको शूद्र माना था । हमने उनका खण्डन किया था । यदि हमें पहले पता होता; तो हम उनकी पत्नीसे उक्त प्रश्न उक्त परलोकगत आत्मा से पुछवाते; तव उसकी सत्यताका पता भी लग जाता; क्योंकि - परलोकगत - धात्मा असत्य नहीं बोला करते । पर अव तो ' पयोगते कः खलु सेतुबन्धः ' न्यायसे कुछ नहीं हो सकता । ( २ ) पुनर्जन्मके विषय में । पुनर्जन्मके सिद्धान्तको कई प्राजकल के व्यक्ति सन्दिग्ध दृष्टिसे देखते हैं । इस विषय में ' नवभारत टाइम्स ' ( २८-१०-७२ के शनिवारके श्रद्ध ) में एक मार्केकी टिप्पणी प्रकाशित हुई है, हम उसको भी यहाँ उद्धृत करते हैं— ( ' पुनर्जन्म ' ) दिल्ली प्रदेश प्रणुव्रत समितिकी गोष्ठी में बर्जीनिया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डा ० इयन स्टीवेंसनने बताया है । कि— सन् १ ९ ६१ से अब तक कंप्यूटरकी सहायतासे मैंने पुनर्जन्मके जिन १२ सौ मामलोंकी जांच की; उनसे इस विचारकी पुष्टि होती है कि-मृत्युके बाद व्यक्तिका जन्म फिर होता है । समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ ९ १३ ९ १४ पुनर्जन्मके अधिकांश प्रमाण भारत, श्रीलङ्का, वर्मा, थाईदेश और तुर्की, सीरिया तथा लेवनान, जैसे मुस्लिम ( पुनर्जन्म के अविश्वासी ) ( 3 ) देशोंमें मिले । कई मामलोंमें तो बच्चे उस रोग से पीड़ित पाये गये, ज जब रोगसे वे पूर्वजन्ममें पीड़ित थे । यहीं नहीं, बल्कि पूर्वजन्मके चिन्ह - जैसे मस्सा आदि इस जन्ममें भी ठीक उसी अंगमें देखे गये, जिस श्रङ्गमें मानस - पु पिछले जन्म में थे । पूर्वजन्मके कुछ भाव और व्यवहार इस जन्म में भी पढ़ते हैं, मौजूद थे । दमसे सप मानने के डा ० स्टेवेंसनने जो तथ्य प्रस्तुत किये, उससे भारतीय दर्शनके इस कहावत विचारकी वैज्ञानिक पुष्टि होती है कि मनुष्यका पुनर्जन्म होता है, और मस्तक उसे कर्मो का भला या बुरा परिणाम भी भोगना पड़ता है । यह भोग पुराणों की एक ही जीवन तक नहीं, बल्कि अगले जीवनमें भी चलता है । एक सबके सा जन्मके उच्च विचार, भाव या साधना अगले जन्ममें भी चलते है, और करेंगे । व्यक्ति पिछले जन्म में जितनी मंजिलें तय करता है; उससे श्रागे चलना आरम्भ कर देता है | ( ४ ) डाक्टर इयन स्टेवेंसन की खोजों और विश्लेषण के आधारपर सूक्ष्म जब शरीर के विचारकी पुष्टि होती है । स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, किन्तु सो क्षण मन - बुद्धि, चित्त और अहङ्कार प्रादिके साथ आत्मा नये स्थूल शरीरमें जाता है, यह चक्र इसी प्रकार चलता रहता है । " जब मह अन्य श्रय हमने ' पुनर्जन्म तथा परलोक ' के विषय में ' कल्याण ' के विशेषाङ्क देवताओं ' पुनर्जन्म और परलोक ' म्रुङ्कमें विशेष विचार किया है, ' आलोक ' पाठकों प्रकार के ' हम उसे देखनेकी प्र ेरणा करते हैं । ( ' श्रालोक ' - प्रणेता ) वह इन अब भक्त रामशरणदास जी पिलखुमा निवासीसे संगृहीत घटनाएं सम्बन्धी उत की जाती हैं ।: - ( १ स ० घ ० ५८ म

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m १४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( 3 ) क्या पुराणोंमें श्राई बातें झूठ वा कपोलकल्पित हैं? जब कभी पुराणों में बड़ी प्राश्चर्यजनक घटनायें प्राजके अंग्रेजोंके मानस - पुत्र, पाश्चात्य सभ्यताके रंगमें रंगे बाद लोग तथा कम्युनिस्ट आदि में पढ़ते हैं, तो वे सहसा पुराणोंकी बातोंको सत्य नहीं मानते, और एक-भी दमसे सफेद झूठ श्रौर कोरी गप्प बताकर हंसी में उड़ाया करते हैं, श्रौर माननेकेलिए तैयार नहीं होते । पर ' भूत वहीं जो सर चढ़ बोले ' की कहावतके अनुसार अपना अद्भुत चमत्कार दिखाकर अपने सामने नत-मस्तक होने और सनातनधर्मका लोहा माननेको वाध्य कर देते है | हम र पुराणोंकी बातोंको अक्षर - अक्षर सत्य सिद्ध करनेकी दृष्टिसे सत्य घटनायें ग सबके सामने रखने जा रहे हैं, प्रशा पाठक इन्हें ध्यानसे पढ़ने की कृपा कर करेंगे । ना ( ४ ) क्या पुराणों में आई सिद्धियों - सम्बन्धी बातें गप्प हैं? जब हमारे पुराणोंमें ऋषि महर्षियों की सिद्धियोंके बलपर जो चाहे सो क्षणमात्र में घर बैठे बुला लेने की बातें और जो चाहे मंगा लेनेकी बातें भाती हैं; तो यह दयानन्दी कूपमण्डूक इन बातोंको गप्प बताते हैं । में जब महर्षि भरद्वाज द्वारा घोर जंगल में अपने श्रश्रममें भरतजीकी तथा अन्य प्रयोध्यावासियोंके श्रातिथ्य करनेकी बातें और सिद्धियोंके बलपर देवताओं को भी महान् दुर्लभ वस्तुनों द्वारा स्वागत करने और छप्पन-प्रकारके सुस्वादु भोजन उपस्थित कर देनेकी बातें लिखी मिलती हैं, तो यह इन बातोंको माननेकेलिए तैयार नहीं होते । अब जरा सिद्धि-सम्बन्धी महान् श्राश्चर्यजनक घटना सुनिये । ( १ ) सिद्धि द्वारा हाथोंसे चीनी और कुंकुम गिरानेवाली अद्भुत विलक्षण महिला अभी उस दिन जो कमलानगर में पूज्य शास्त्रार्थ - महारथी पं ० श्री-समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ २१५ माघवाचार्य - शास्त्रीजी महाराजके पास में गया, तो शास्त्रीजीने श्राल्मारीमें से निकाल कर एक छोटी - सी शीशी रोलीकी निकाली लोहेकी मेरे हाथमें थमा दी । उसकी विशेषता पूछने पर उनने; और में एक उत्सव में मैं गया हुआ था, श्रीर साथमें थे प्रेमाचार्य बताया कि महाराष्ट्र-श्रीस्वामी करपात्री जी भी उसमें शास्त्री भी । पधारे हुए थे । मैं कहीं गया हुआ ` था, तो स्वामी श्रीकरपात्रीजीने एक महिला द्वारा अद्भुत चमत्कार की बात सुनाई । वह महिला मसावद जिला बूलिया से श्राई थी दिखाने- । वह सिद्धिका चमत्कार दिखाकर लौट गई । मैंने उस महिलासे मिलनेका निश्चय किया । स्वामीजी भी साथ चलनेको प्रस्तुत हो गये, और प्रमाचार्य भी । कारमें बैठकर मसावद ग्राम पहुंचे । घरमें से वह स्त्री बुलाई गई । उस समय वह रोटी बनानेका घाटा माड़ रही थी । वह आई, तो उसके दोनों हाथ गीले आटेमें सने थे । शीघ्र ही अपने हाथ घोकर वह हमारे सामने श्रा बैठी । हिन्दु लुबाण जातिकी पुराने ढंगकी ग्रामीण वेशमें थी । उसने हमारे सामने अपनी दोनों हथेलियां रगड़नी प्रारम्भ कीं । इसी प्रकार यही अद्भुत चमत्कार वह पहले श्री करपात्री-जी महाराजको दिखा चुकी थी । उसके हथेलियाँ रगड़ने से दानेदार सफेद चीनी और लाल कुंकुम रोली हथेलियोंसे गिरने लगीं । मैंने उस अद्भुत महिलासे कहा कि यह दानेदार चीनी और रोली एक पात्रमें गिरने से मिलकर किसी कामकी नहीं रह गई । आप इनको अलग - अलग गिरावें; तो इनका कुछ उपयोग भी होगा । उसने मेरी बात स्वीकार कर ली । अब उसने हथेलियाँ रगड़कर एक पात्रमें दानेदार चीनी और दूसरे पात्रमें लाल रोली गिराना प्रारम्भ किया । इस प्रकार उस अद्भुत महिला से लगभग दो तोले रोलो मैंने प्राप्त की, और सिद्धि-द्वारा प्राप्त इस रोलीका ही मैं तिलक लगाता हूं । इस सिद्धि - द्वारा रोली और चीनीका ढेर लगानेवाली अद्भुत विलक्षण महिलाको देखकर हम श्राश्चर्यचकित रह गये ।

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६१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कहिये महाशय! अब क्या कहते हो | क्या इन विश्व - विख्यात नेताओं के द्वारा देखी सिद्धि द्वारा मंगाई रोली और चीनीके ढेर लगाने-की बातको भी क्या गप्प बताओगे? ( २ ) पुराण में आई स्वप्न में भविष्य ज्ञान होने सम्बन्धी-बातें क्या गप्प हैं? जब हमारे पुराणोंमें स्वप्न- विचार और स्वप्न में देखी गई बातों से भविष्य में होनेवाली वातोंका ज्ञान हो जाना और स्वप्नकी बातोंको सत्य मानने - सम्बन्धी बातें आती हैं; तो इन्हें प्रार्यसमाजी प्रादि गप्प बताते हैं, और जव रामायण आदिमें यह पढ़ते हैं कि प्रशोकवाटिका में विराजमान भगवती जगदम्बा श्रीसीताजी महारानीको त्रिजटा नामक राक्षसीने श्राकर बताया कि मुझे स्वप्न दिखाई दिया है; जिससे मालूम पड़ता है कि ' सीते! शीघ्र ही इस राक्षसराज रावणकी लंकाका और राक्षसोंका विनाश होने वाला है; और शीघ्र ही तुम्हारा संकट दूर होने वाला है । तुम घयं धारण करो, चिन्ता न करो । बादमें वास्तवमें त्रिजटाकी स्वप्न - सम्बन्धी बातें बिल्कुल सत्य निकलीं, तो इन सब बातों को पढ़कर यह महाशय कोरी - गप्प बताकर हंसी में उड़ाया करते हैं । लो उन श्रार्यसमाजीके मुख से ही स्वप्न- सम्बन्धी सत्य घटना सुनिये, जो इस प्रकार है -- । श्रार्यसमाजके सुप्रसिद्ध विद्वान् श्री उदयवीर शास्त्रीजीने अभी मार्च सन् १ ९ ७१ में जो स्वप्न देखा है, उसे बिल्कुल सत्य पाया है । अपने जीवनमें घटी स्वप्न - सम्बन्धी घटना देहलीसे ' नवभारत टाइम्स ' ता ० २-४-१६७१ में आपने इस प्रकार छपवाई है 1 ( ३ ) स्वप्न में भविष्यका ज्ञान " गत ५ मार्च को एक लिफाफा अपने सम्बन्धी ले ० कर्नल श्री-केशरीसिंहको इम्फाल ( मणिपुर राज्य की राजधानी ) के पते पर रजिष्ट्री समाचारपत्रोंकी घटनाए [ १७ [ १ ] किया था; और आशा थी कि उसके उत्तरमे १७-१८ मार्च तक उसका कुशल - समाचार मिलेगा, परन्तु कोई उत्तर उधरसे २० मार्च तक भी नहीं पुराणों में अ क्या होगा मिला । २० मार्च शनिवार की रातमें लगभग तीन - चार बजेके बीच स्वप्न ( ४ ) देखा कि पोस्टमैनने वह लिफाफा लाकर मेरे हाथमें दिया; ओर कहा कि आपका रजिस्ट्री पत्र वापस श्रा गया है, इस स्लिप पर दस्तखत कर दें । हमारे हस्ताक्षर कर स्लिप वापस कर दी । स्वप्नमें जो पारिवारिक जन दिखाई खजाने हैं । दे रहे थे; उन्हें वह रजिस्ट्री पत्र दिखाया; और वापस आजाने का जिक्र शती हैं; किया । उसकी साधारण चिन्तामें करवट बदलते उठने का समय हो मानते । मन गया । आवश्यक कार्यों से निवट कर जब पारिवारिक जन आहार के विपत्ति को लिए बैठे; उस स्वप्न का मैंने सबके सामने जिक्र किया, सबने चिता की द्वारा दूर क भावना व्यक्त की, और बात आई - गई हो गई । पटना हम उस दिन ( २१ मार्च रविवार था, में आशान्वित रहा; संभवतः इस ( x ) f सप्ताह कोई सूचना उधरसे यावे । सप्ताह बीतने पर लिखने का अ संकल्प किया पर जब गुरुवार २५ मार्च को दोपहर पोस्टमेन ने आवाज दी; और वही रजिस्ट्री लिफाफा मेरे हाथमें देकर कहा – आपकी यह अभी रजिस्ट्री वापस आ गयी है, इस स्लिप पर हस्ताक्षर कर दें । उस समय परम - गोभक्त मेरे और पारिवारिक जनों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । अपनी आँख संभवत: दिनांक २० मार्च शनिवार को पत्र इम्फाल के पोस्ट- नाई आफिस से वापस किया गया, उसी रात मुझे वह स्वप्न हुआ । लिफाफा मंत्रों क मेरे पास सुरक्षित है । हे कि जो व देखा पाठको! यह है भारतके सुप्रसिद्ध श्रार्यसमाज के विद्वान् श्री- होकर स उदयवीर शास्त्री जी की स्वयं की अपने जीवन में घटी स्वप्न - सम्बन्धी र दिया । सत्य - घटना शास्त्री जी ने भविष्य में होने वाली बात को स्वयं स्वप्नमें और प्रत्यधि पहले ही देख लिया; और इसे बिल्कुल सत्य पाया । इससे बढ़कर शास्त्र- गए थे और

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[ 25 ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) I आई स्वप्न - सम्बन्धी बातों की सत्यता का प्रत्यक्ष पुराणोंमें प्रमाण और क्या होगा? ( ४ ) क्या शास्त्र - पुराणोंमें आई यन्त्र एवं मन्त्रविद्याके न अद्भुत चमत्कार की बातें गप्प हैं? हमारे पुराण अनन्त - विद्यानोंके भण्डार हैं; और अनन्त विद्याओं के 1 खजाने हैं । जब पुराणों में मन्त्र - विद्या के विलक्षण चमत्कारों की बातें पाती हैं; तो महाशय लोग नाक - भौं सिकोड़ते हैं, और इन्हें सत्य नहीं क मानते । मन्त्र - विद्याकी बड़ी अद्भुत विलक्षण महिमा है, और भयंकर घोर के विपत्ति को और बड़े - से - बड़े कष्टों को और रोगों को क्षण मात्र में मंत्रों को द्वारा दूर कर दिया जाता था । इस मंत्र के प्रद्भुत चमत्कार की एक घटना हम यहाँ पर दे रहे हैं । स ( ५ ) जिस महान् घोर भयंकर बवासीरको बड़े - बड़े डाक्टर अच्छा न कर सके; उसे क्षण भर में मन्त्रने दूर ज कैसे कर दिया? ह अभी सन् १ ९ ७० में पिलखुवा हमारे स्थान पर भारत के सुप्रसिद्ध य राम - गोभक्त नेता श्रीस्वामी रामचन्द्र वीर पधारे थे । तभी श्रापने स्वयं मनी आँखों - देखी मंत्र के प्रदभुत चमत्कार सम्बन्धी घटना यह E- नाई— का मंत्रों की बड़ी विलक्षण महिमा है, और बड़ी अद्भुत विलक्षण शक्ति कि जो बस वर्णनातीत है । जिस रोग को बड़े से बड़ा डाक्टर ठीक 7. होकर सका, उसे क्षणमात्र में एक बुढ़िया ने मंत्र बांधते ही तुरन्त दूर ची र दिया । हमारे पिता जी खूनी बवासीर के रोग से बहुत पीड़ित थे । नमें पौर प्रत्यधिक खून के गिर जाने से वह बिल्कुल मरणासन्न अवस्था को - गए थे । बड़े - बड़े अग्रेजी डाक्टरों से पिताजी का इलाज कराया प; और खूब रुपया - पैसा भी खर्च किया गया, और जो भी किसी द्वारा समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ ere औषधियां बताई गई, और लगाई गई, पर खून जाना बन्द नहीं हुआ; और तनिक भी रोग शान्त नहीं हुआ । पिताजी की सारी घोती खून से, रक्तसे भर जाती थी; और वह ऐसे कमजोर हो गये थे, सारे दिन चारपाई पर पड़े रहा करते थे, और मरने के दिन बिन रहे थे । हम लोगों ने भी उनके जीवन की प्राशा विल्कुल छोड़ दी थी; और इधर डाक्टर चंद्योंने भी जवाब दे दिया था । तेल मिर्च खटाई आदि का परहेज करना ही बता रखा था । इससे उनका खानासीना भी बन्द हो गया था । अकस्मात् एकदिन हमारे गांव की ही एक बुढ़िया - माता हमारे घर आई, जो जाति को जोगी थी; और उसने हमारे पूज्य पिता जीके वस्त्र खूनसे लथपथ देखे; और उन्हें चारपाई पर पड़ा हुआ मरणासन्न - अवस्थामें देखा; तो उसे यह दयनीय दशा देखकर बड़ी दया आई । वह बुद्धा मादा छल - बलसे रहित बिल्कुल सीधी और लोभ - लालचसे रहित बिल्कुल सीधी-साधी थी; और वह मन्त्र - यन्त्रविद्यामें बड़ी निपुण थी । उसने हमारे पिता जी को बड़ा आश्वासन दिया और बंधाया, और एक मंत्र वा यन्त्र लिख करके लाई और हमारे पिताजीकी दाहिनी भुजा में बांध दिया, और बड़ी दृढ़तासे कहा कि अब यह तुम्हारे मंत्र बांध दिया गया है और बस इसी समय से तुम्हारे इस बवासीर रोग की भी समाप्ति हो गई, और अब से तुम्हें परहेज करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है । तुम तेल मिर्च खटाई गुड़ प्रादि जो मन चाहे, सो सब कुछ खाओ पीयो और न तुम्हें कोई औौषिवी खानेकी और लगाने की आवश्यकता है । अव प्रापको अपने समस्त जीवन में कभी भी यह रोग नहीं होगा और निश्चिन्त होकर चैन की वंशी बजाओ । वस वह बुढ़िया हाथमें मंत्ररूप यन्त्र बांधकर चली गई और इधर उसके जाते ही उसी क्षण पिता जी का सारा रोग - शोक तत्क्षण न जाने कहाँ चला गया; और वह विकुल ठीकठाक पूर्ण स्वस्थ हो गये; और उसके पश्चात् जो अभी - अभी मरणासन्न थे, और खाने - पीनेको तरसा करते थे ।

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२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः वह पन्द्रह वर्षों तक जीवित रहे और खूब गुड़, तेल, मिर्च, खटाई श्रादि सब कुछ खाते - पीते रहे, और फिर उन्हें कभी जीवन पर्यन्त खूनी बवासीर का रोग नहीं हुमा और उनका शेष जीवन बड़े सुख से बीता । उस मंत्र-विद्याका यह महान् प्राश्चर्यजनक अद्भुत चमत्कार हमने स्वयं अपने जीवन में देखा था, और सभी देखकर बड़े ही आश्चर्यचकित रह गये थे । मुझे घोर पश्चात्ताप क्या हुआ । वह वयोवृद्धा माता जोगन मर गई तो मुझे बाद में बड़ा घोर पश्चात्ताप हुआ कि उसके साथ ही यह मंत्र - विद्या भी चली गई; और यदि मैं उससे यह अद्भुत मंत्र सीख लेता; तो आज मैं लाखों मनुष्योंका रोग दूर करके महान् पुण्यका भागी बन जाता । उस माताको यह विद्या एक संत से प्राप्त हुई थी । ग्राज भी ऐसे बहुतसे गुप्त संत महात्मा हैं कि जिनके पास मंत्रों - यंत्रोंकी शक्ति विद्यमान है, किन्तु प्राधुनिक शिक्षा के द्वारा विंगड़े हुए तथाकथित सुधारवादी मूढ़ोंको प्रत्येक पुरातन बातों में बस पाखण्ड ही पाखण्ड दिखलाई पड़ता है; और अंग्रेजी वातों-में सब अच्छा ही अच्छा दिखाई देता है । यह देशका महान् घोर दुर्भाग्य नहीं तो क्या है? ( वेद तो मन्त्रराज ही माने जाते हैं । उनके प्रयोगसे भी बड़े - बड़े लाभ प्राप्त होते हैं । श्रार्यसमाजी प्रायः मन्त्रशक्तिको नहीं मानते । इनके दादा - गुरु स्वा.द. भी ' मन्त्र शक्ति ' को नहीं मानते थे, और ' मन्त्र ' नाम ' विचार'का कहकर ' मन्त्रशक्ति ' को उड़ा देते थे ( स.प्र. ११ समु. ) पर हमें ' वैदिकधर्म ' पारड़ी अक्टूबर १ ९ ६६ के पृ. २०५-२०८ में कट्टर दयानन्दी श्रीधर्मदेवजी विद्यामार्तण्डका निम्न लेख प्राप्त हुआ है, ' प्रालोक ' पाठक उसे देखें-" वेदों का स्वाध्याय नवजीवनदायक है, मुख्यतया मन्त्रशक्तिते मेरी ( धर्मदेवकी ) ' मृत्यु- मुखसे मुक्ति ' यह वहां शीर्षक था; उसमें लेखकका समाचारपत्रोंकी घटनाए [ २२ ] २१ नाम लिखा था - ( श्रीधर्मदेव विद्यामार्तण्ड ) । ' कल्य वहाँ पृ. २०५-२०८ में यह लेख था— सनातन धर्म ‘ सितम्बर - अक्टूबर १ ९ ३३ में दुर्भाग्यवश टाईफाईड, निमोनिया, आप आपर अतिसार व्याधि भगन्दर और अर्धाङ्ग ( लकवा ) के श्राक्रमणके कारण कोठी पर मैं [ धर्मदेव ] ऐसी अवस्थामें पहुंच गया था, जिसे वेदमें— ' यदि मृत्यो- एक भगवद रन्तिकं नीतएव ' [ यदि मौतके पास लाया गया हो ] इन शब्दोंमें कहा सुनकर सभ जा सकता है. मरणासन्न अवस्था उस प्रत्यन्त शोचनीय अवस्थासे जिसमें श्री मेरे ( धर्मदेवके ) बचनेकीं प्राशा ही प्रायः सव डाक्टरों और मित्रोंने छोड़ दी थी, कैसे मङ्गलमय, दयासागर भगवान्‌की अपार कृपा और वेदमन्त्रोंकी शक्तिसे मेरा उद्धार हुआ |... ' [ उद्धृतकर्ता — ' आलोक ' एक मद्भागवत प्रणेता ] । हुआ था । इससे एक तो यह सिद्ध हो रहा है कि वेद मुख्यतया शब्दरूप एवं भी गये हुए मन्त्ररूप होते हैं । उनके शब्दों में बड़ी शक्ति होती है । उसे श्रधिकारी अच्छे वक्ता लोग प्रयुक्त करके अपना नव जीवन प्राप्त कर सकते हैं । ) श्रीमद्भाग ( ६ ) क्या पुराणोंमें ग्राई ' पशु - पक्षियोंकी भगवद्भक्ति करनेकी उसमें एक बातें गप्पबाजी हैं? एक भगवद उसे सबने जब हमारे शास्त्र - पुराणोंमें पशु - पक्षियोंके तथा अन्य वहुतसे मनुष्येतर प्राणियोंकी भगवद्भक्ति करनेकी वातें आती हैं; और जिस समय जिस श्रीरामचरितमानस में यह पढ़ने को मिलता है- पर वह पूर वट तट करि हरि कथा प्रसंगा । प्रावहिं सुनहि अनेक विहंगा ॥ का कहना एक मेंढ़क तो इसे पढ़कर बहुतसे दयानन्दी- प्रादि इसे एकदमसे गप्प बताने चुपचाप बैठ लगते हैं । लो एक श्रीमद्भागवत सप्ताहके महान् प्रेमी भगवद्भक्त मेंडकके * माय वड़े जीवनकी सत्य घटना हम आपके सामने रख रहे हैं कि जो इस दुई और प्रकार है- चला गया