सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 491–500
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 491–500
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] श्रीसनाततधर्मालोकः ( ३-२ ) १२२ ' कल्याण ' के सम्पादक श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार जी एक विश्वविख्यात । सनातनधर्मी नेता थे । आपको कुछ दिनों पूर्व बवासीरकी बीमारी थी तो माप आपरेशनकी दृष्टिसे दिल्ली पधारे थे. और श्री ज.द. डालमियाजी की , कोठी पर ठहरे हुए थे । हम आपसे भेंट करने गये तो श्रापने सबके सामने I एक भगवद्भक्त में डकके जीवनको अपनी आँखों - देखी घटना सुनाई; जिसे सुनकर सभी बड़े आश्चर्य चकित रह गये । घटना इस प्रकार है— Iमें श्रीमद्भागवत सप्ताह सुननेवाला अद्भुत विलक्षण I भगवद्भक्त मेंडक एक बारकी बात है कि हमारे एक मित्रने अपने स्थानपर श्री-| मद्भागवतका सप्ताह कराया था कि जो बड़े ही समारोहके साथ सम्पन्न हुआ था । उस श्रीमद्भागवत के सप्ताहमें हमें भी बुलाया गया था । हम वं श्री गये हुए थे । श्रीमद्भागवतका सप्ताह कहनेवाले ब्राह्मण भी बड़े हो 7 अच्छे वक्ता और विद्वान थे; और बड़ी सुललित कथा कहते थे । उस श्रीमद्भागवत के सप्ताहमें जहाँ बड़े - बड़े सुप्रतिष्ठित सज्जन कथा करते थे इसमें एक बड़े ही अद्भुत विलक्षण श्रोता पधारा करते थे । नित्यप्रति एक भगवद्भक्त मेढ़क भी होता था; जो एक बड़ी रोचक घटना है । उसे सबने देखा था । E जिस दिन से श्रीमद्भागवतका सप्ताह आरम्भ हुआ और व्यासासन-पर वह पूज्य ब्राह्मण - वक्ता या करके विराजमान हुए; और उन्होंने क्या कहना ज्यों ही प्रारम्भ किया; तो झटसे न जाने कहाँ से वहाँ पर एक मेंढक फुदकता - कूदता हुआ आया और वह एक ओर श्राकर के चुपचाप बैठ गया; और प्रारम्भसे लेकर अन्त तक वह बड़ी तन्मयता के 5I " काय वड़े ही शान्तभाव से कथा सुनता रहा । ज्योंही कथा समाप्त श्रीर श्रोतागण उठ उठकर जाने लगे, तो वह मेढ़क भी वहांसे कहीं चला गया? समाचारपत्रोंकी घटनाए [ २३ पहले दिन तो किसीने भी उस मेढ़ककी ध्यान नहीं दिया, धौर सबने उस समय यही समझा श्रोर विशेष मेढ़क है, और इधर कहींसे निकल कि यह कोई साधारण करके श्रा गया है । जब अगले दिन भी वह पुन: पहले दिन की ही भांति श्रीमद्भागवत प्रारम्भ होने पर कहींसे कुदता हुआ की कथा आ करके बैठ गया और प्राया और ययास्थान वहां पर ज्योंही बड़े ही शान्तभावसे कथा सुनता रहा और कथा समाप्त कि वह झटसे फिर न जाने कहाँ चला गया । तो फिर उसे नित्यप्रति प्राते - जाते देखकर अब तो सबको बड़ा भारी प्राश्चर्य हुआ; और बड़ी उत्सुकता पैदा हुई; और वह बड़ी श्रद्धाभक्तिकी दृष्टिसे देखा जाने लगा और बड़ी चर्चाका विषय बन गया । उस परम सौभाग्य-शाली मेढ़कने बिना नागा किये श्राद्योपान्त पूरा श्रीमद्भागवत सप्ताह श्रवण किया था । पश्चात् फिर उस मेढ़कको किसीने भी नहीं देखा । पता नहीं फिर वह कहीं लुप्त हो गया? वह तो श्रीमद्भागवत की कथाका प्रेमी था और रसिक था और जब तक उसे श्रीमद्भागत सप्ताह सुनने को मिलता रहा, वह बराबर प्राता - जाता रहा और बड़े ही प्रेमसे सुनता रहा, और ज्योंही श्रीमद्भागवतका सप्ताह समाप्त हुआ तो; फिर उस भगवद्भक्त भागवत प्रेमी मेंढ़कका श्राना जाना भी समाप्त हो गया । वह तो श्री-मद्भागवत कथामृतका रसिक था फिर भला उसका वहाँ पर क्या काम? यह हमारी स्वयं की अपनी प्रांखों देखी बिल्कुल सत्य घटना है और इसे वहाँ पर सबने देखा था । और सबने उस परमसौभाग्तशाली श्री मद्भागवत सप्ताहके प्रमी उस प्रभुत विलक्षण - भक्त मेढ़कके दर्शन कर अपने को बड़ा ही कृतकृत्य और बड़ा ही धन्य - धन्य माना था; और उसके भाग्य की भूरि - भूरि प्रशंसा की थी । ७ मालूम होता है कि वह कोई पूर्वजन्मका महान् भगवद्भक्त और भागवतरसिक जीव था, और उससे कोई पूर्वजन्ममें भूलते कोई ऐसा पाप बन गया होगा, कि जिस पापके फलस्वरूप उसे इस प्रकार अब मेंढ़क
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