सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 491–500

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 491–500

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] श्रीसनाततधर्मालोकः ( ३-२ ) १२२ ' कल्याण ' के सम्पादक श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार जी एक विश्वविख्यात । सनातनधर्मी नेता थे । आपको कुछ दिनों पूर्व बवासीरकी बीमारी थी तो माप आपरेशनकी दृष्टिसे दिल्ली पधारे थे. और श्री ज.द. डालमियाजी की , कोठी पर ठहरे हुए थे । हम आपसे भेंट करने गये तो श्रापने सबके सामने I एक भगवद्भक्त में डकके जीवनको अपनी आँखों - देखी घटना सुनाई; जिसे सुनकर सभी बड़े आश्चर्य चकित रह गये । घटना इस प्रकार है— Iमें श्रीमद्भागवत सप्ताह सुननेवाला अद्भुत विलक्षण I भगवद्भक्त मेंडक एक बारकी बात है कि हमारे एक मित्रने अपने स्थानपर श्री-| मद्भागवतका सप्ताह कराया था कि जो बड़े ही समारोहके साथ सम्पन्न हुआ था । उस श्रीमद्भागवत के सप्ताहमें हमें भी बुलाया गया था । हम वं श्री गये हुए थे । श्रीमद्भागवतका सप्ताह कहनेवाले ब्राह्मण भी बड़े हो 7 अच्छे वक्ता और विद्वान थे; और बड़ी सुललित कथा कहते थे । उस श्रीमद्भागवत के सप्ताहमें जहाँ बड़े - बड़े सुप्रतिष्ठित सज्जन कथा करते थे इसमें एक बड़े ही अद्भुत विलक्षण श्रोता पधारा करते थे । नित्यप्रति एक भगवद्भक्त मेढ़क भी होता था; जो एक बड़ी रोचक घटना है । उसे सबने देखा था । E जिस दिन से श्रीमद्भागवतका सप्ताह आरम्भ हुआ और व्यासासन-पर वह पूज्य ब्राह्मण - वक्ता या करके विराजमान हुए; और उन्होंने क्या कहना ज्यों ही प्रारम्भ किया; तो झटसे न जाने कहाँ से वहाँ पर एक मेंढक फुदकता - कूदता हुआ आया और वह एक ओर श्राकर के चुपचाप बैठ गया; और प्रारम्भसे लेकर अन्त तक वह बड़ी तन्मयता के 5I " काय वड़े ही शान्तभाव से कथा सुनता रहा । ज्योंही कथा समाप्त श्रीर श्रोतागण उठ उठकर जाने लगे, तो वह मेढ़क भी वहांसे कहीं चला गया? समाचारपत्रोंकी घटनाए [ २३ पहले दिन तो किसीने भी उस मेढ़ककी ध्यान नहीं दिया, धौर सबने उस समय यही समझा श्रोर विशेष मेढ़क है, और इधर कहींसे निकल कि यह कोई साधारण करके श्रा गया है । जब अगले दिन भी वह पुन: पहले दिन की ही भांति श्रीमद्भागवत प्रारम्भ होने पर कहींसे कुदता हुआ की कथा आ करके बैठ गया और प्राया और ययास्थान वहां पर ज्योंही बड़े ही शान्तभावसे कथा सुनता रहा और कथा समाप्त कि वह झटसे फिर न जाने कहाँ चला गया । तो फिर उसे नित्यप्रति प्राते - जाते देखकर अब तो सबको बड़ा भारी प्राश्चर्य हुआ; और बड़ी उत्सुकता पैदा हुई; और वह बड़ी श्रद्धाभक्तिकी दृष्टिसे देखा जाने लगा और बड़ी चर्चाका विषय बन गया । उस परम सौभाग्य-शाली मेढ़कने बिना नागा किये श्राद्योपान्त पूरा श्रीमद्भागवत सप्ताह श्रवण किया था । पश्चात् फिर उस मेढ़कको किसीने भी नहीं देखा । पता नहीं फिर वह कहीं लुप्त हो गया? वह तो श्रीमद्भागवत की कथाका प्रेमी था और रसिक था और जब तक उसे श्रीमद्भागत सप्ताह सुनने को मिलता रहा, वह बराबर प्राता - जाता रहा और बड़े ही प्रेमसे सुनता रहा, और ज्योंही श्रीमद्भागवतका सप्ताह समाप्त हुआ तो; फिर उस भगवद्भक्त भागवत प्रेमी मेंढ़कका श्राना जाना भी समाप्त हो गया । वह तो श्री-मद्भागवत कथामृतका रसिक था फिर भला उसका वहाँ पर क्या काम? यह हमारी स्वयं की अपनी प्रांखों देखी बिल्कुल सत्य घटना है और इसे वहाँ पर सबने देखा था । और सबने उस परमसौभाग्तशाली श्री मद्भागवत सप्ताहके प्रमी उस प्रभुत विलक्षण - भक्त मेढ़कके दर्शन कर अपने को बड़ा ही कृतकृत्य और बड़ा ही धन्य - धन्य माना था; और उसके भाग्य की भूरि - भूरि प्रशंसा की थी । ७ मालूम होता है कि वह कोई पूर्वजन्मका महान् भगवद्भक्त और भागवतरसिक जीव था, और उससे कोई पूर्वजन्ममें भूलते कोई ऐसा पाप बन गया होगा, कि जिस पापके फलस्वरूप उसे इस प्रकार अब मेंढ़क

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२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) की योनि में जन्म लेना पड़ा । विशेषताकी बात यह रही कि मेढ़क की एक महान निकृष्ट योनि में जन्म लेने पर भी पूर्वजनोंके महान् पुण्योंके कारण मेढ़ककी योनिमें वह अपने परमकल्याणके साधन श्रीमद्भागवत की अद्भुत विलक्षण महिमाको अभी तक भी भूला नहीं था । अब इसने श्रीमद्भागवतका सप्ताह सुनकर अपनी इस मेढ़क योनिको त्यागकर श्रीभगवद्धाम प्राप्त कर लिया होगा; इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । इससे बढ़कर ' निगमकल्पतरोगंलितं फलम् इन शब्दोंसे वेदरूप कल्पवृक्षसे गिरे फलस्वरूप श्रीमद्भागवतकी अद्भुत विलक्षणताका प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या होगा? जिस श्रीमद्भागवतकी साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण-का वाङ्मय स्वरूप माना गया है; उसे ही यह दयानन्दी लोग पापोंकी बनाई हुई बताकर बड़ी घृणा की दृष्टिसे देखा करते हैं, क्या वह मनुष्य होकर भी इस परमसौभाग्यशाली मेढ़कसे भी गये - बीते नारकीय जीव नहीं हैं? ऐसे पामरोंसे तो यह मेढ़क हो लाख दर्जे श्रेष्ठ हैं, कि जो मेढ़क की योनि जन्म लेकर भी श्रीमद्भागवतकी विलक्षण महिमाको जानकर और श्रीमद्भागतके सप्ताहको सुनकर अपना उद्धार कर गया; और इधर यह दयानन्दो महाशय मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी दिन रात तर्क - वितर्क - कुतर्क में उलझे रहकर घोर नरक को प्रस्थान करनेकी तैयारीमें लगे हैं । ( ७ ) एक साथ अनेक वच्चों का जन्म जब कभी ' महाभारत ' में गांधारीके सौ पुत्र होनेकी बातें आती हैं, या एकसे अधिक सन्तान उत्पन्न होनेकी बातें पढ़नेको मिलती हैं, तो मनचले लोग इन सब बातोंको एक दमसे सफेद झूठ, कोरी गप्पबाजी बताकर हंसी में उड़ाने लगते हैं | और कहा करते हैं कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता । हम ' आलोक ' - पाठकोंके सामने एकसे अधिक सन्तान उत्पन्न होनेकी कुछ ग्राश्चर्यजनक सत्य घटनाएं रखते हैं । समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ ६२५ ६२६ ] एक साथ चार बच्चों का जन्म हिन्दुस्तान देहली ( ता ० २०-७-७२ ) में छपा हैं कि कोटा । पता लिए पर्याप चला है कि पंचायत समिति अन्ताके ग्राम राजगढ में एक चमार जातिकी पाठ वर्ष महिलाने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया । उनमें से एक बच्चे की तो होमिन्सल पूरी तरह आकृति भी नहीं बन पाई थी । उन बच्चोंको ग्रामके सैंकड़ों यह बीमार स्त्री - पुरुषोंने देखा, परन्तु १२ घण्टोंके भीतर उन चारों बच्चों की मृत्यु १५ मृत हो गई । लोगोंको यह भी कहते सुना गया कि सरकार एक और परिवार-नियोजन चाहती है, तो दूसरी ओर ग्रामीण जनता में प्रकृतिकी ओरसे परिवार प्रयोजन हो रहा है । जब एक साथ & बच्चोंका जन्म धमावस्या हिन्दुस्तान देहली दैनिक ( ता ० १४ जून सन् १ ९ ७२ ) सिडनी । प्रादिके व्रत १३ जूनमें एक १६ वर्षीय अष्ट्रेलियाई महिलाने याज यहाँ एक साथ दयानन्दी बच्चोंको जन्म दिया । अब तक विश्वमें जो एक - साथ बच्चे हुए हैं; प्राज्ञा देन उनमें यह संख्या सबसे बड़ी है । सात बच्चे ३ लड़के और ४ लड़कियां स्वा. दया जीवित हैं । दो बच्चे दोनों लड़के अभी - अभी हुए हैं । जिस अस्पताल में वेदव्यासक इन बच्चों का जन्म हुआ है उसके अधिकारियोंने बताया कि सम्वद्ध सूखा मार महिलाका सन्तान के लिए इलाज चलता रहा है । ये बच्चे पूर्ण विकसित रखनेसे क नहीं हैं, किन्तु उनकी दशा ठीक है । । मूर्खताकी . एक साथ १५ शिशुओं का जन्म अमेरिका के उपवास र हिन्दुस्तान दैनिक देहली ( ता ० २८-७-१९ ७२ ) रोम २४ जुलाई । करके व्रत-यहां डाक्टरोंने एक ३५ वर्षीय महिलाके गर्भाशयका श्रापरेशन कर १५ उनके परम शिशुत्रोंके पूर्ण परिपक्व और विकसित भ्रूण निकाले हैं । चिकित्सा - विलक्षण म इतिहास में एक बार में गर्भस्थ शिशुयोंकी यह सर्वाधिक संख्या है | सभी १५ शिशु १० कन्यायें और ५ लड़के सर्वाङ्ग सम्पन्न थे । हर एक गर्भस्थ- दिल्ली शिशुका भार १५० ग्राम था । और गर्भमें श्वास और हिलने - जुलनेके. दिलक्षणता ज्योंकी त्य

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२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लिए पर्याप्त स्थान न होनेके कारण सभी मृत थे । उक्त महिलाने माठ वर्ष पूर्व एक कन्याको जन्म दिया था; तबसे वह अगले वच्चेकेलिए होमिन्स ले रही थी । उसका पति सेल्समैन है । गर्भधारणके चौथे मासमें यह बीमार हुई, तो उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां आपरेशनसे १५ मृत शिशु निकाले गये । ( ८ ) क्या पुराणों में व्रत - उपवास रखने की अद्भुत-महिमा सम्बन्धी वार्ते गप्प हैं? जब पुराणोंमें दयानन्दी लोग एकादशीके व्रत रखनेकी, मावस्या - पूर्णिमा, श्रीशिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्रीरामनवमी | प्रादिके व्रत - उपवास रखने की अद्भुत महिमाासम्बन्धी बातें पढ़ते हैं; तो दयानन्दी अपने गुरु दयानन्द श्रादि की भांति व्रत - उपवास रखने की प्राज्ञा देनेवाले ऋषि - मुनियोंको अन्टसन्ट गालियां वकने लगते हैं । स्वा. दयानन्दने निर्जला एकादशीका व्रत रखना लिखनेवाले भगवान् वेदव्यासको कंसाई तक लिख मारा कि वह एकादशी का व्रत रखवा कर मूला ' मारते हैं; और इन व्रत उपवासोंमें क्या रखा है? व्रत उपवास रखनेसे कोई लाभ नहीं है । व्यर्थमें ही भूखों मरना पड़ता है, यह मूर्खताकी बातें हैं, श्रादि - प्रादि लिख मारा है । यह लोग इङ्गलैण्ड, अमेरिका के अंग्रेजोंके और घोर नास्तिक रूसियों- कम्यूनिस्टोंके व्रत-उपवास रखने की बातोंको मूर्खतापूर्ण बातें बतानेपर उनका अंधानुकरण करके व्रत - उपवास रखनेकी बड़ी खिल्ली उड़ाया करते हैं । अब वही उनके परम गुरु रूसी नास्तिक स्वयं हमारे व्रत - उपवास रखनेकी अद्भुत विलक्षण महिमा बताने लगे हैं; अब जरा यह ध्यानसे सुनिये । दिल्ली के नवभारत टाइम्स ता ० १३-५-१९ ७१ में व्रत - उपवासकी विलक्षणता के सम्बन्धकी सम्पादकीय महत्त्वपूर्ण टिप्पणी हम यहांपर लोकी त्यों दे रहे हैं । जो इस प्रकार है-समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ ६२७ उपवाससे इलाज " प्रायुर्वेद चिकित्सापद्धतिका अध्ययन करने भारत प्राये रूसी डा ० निकालायेवने कहा है कि प्रायुर्वेदमें विभिन्न रोगोंका इलाज करनेकेलिए उपवास की जो व्यवस्था है; वह बहुत उपयोगी एवं वैज्ञानिक सोवियट - रूस के स्वास्थ्य मन्त्रालयने उपवास है । द्वारा इलाजकी पद्धतिको सरकारी मान्यता दे रखी है; और डा ० निकोलायेवने स्वयं पिछले लगभग २२ वर्षमें उपवास कराकर लगभग चार हजार रोगियोंको अच्छा किया है । श्रायुर्वेदकी मान्यता के अनुसार जब शरीरमें तत्त्वोंका सन्तुलन बिगड़ जाता है; तब कई तरहके रोग पैदा होते हैं, रोगके लक्षणोंके अनुसार योग्य ग्रायुर्वेदाचार्य उपवास - हचन आदि विधियोंको अपनाकर नाड़ियों श्रौर शरीरको ग्राम तौर पर शुद्ध करने एवं असंतुलन को दूर करनेका प्रयत्न करते हैं । डा ० निकोलायेवने स्वीकार किया है कि ज्वर, दिमागकी कई-बीमारियों और कई उदर रोगोंका उपवास सर्वश्रेष्ठ इलाज है । २०-२५ दिनके उपवासके बाद रोगीको क्या भोजन दिया जाय, यह प्रश्न बड़ा महत्वपूर्ण होता है । प्रायुर्वेदाचार्य इसके लिए मूंग आदिकी दालके पानीसे शुरूआत करना उपयुक्त समझते हैं । उपवासकी उपयोगिता स्वीकार कर लिये जानेके बाद भारतीय-ऋषियों और मुनियोंके स्वस्थ श्रौर दीर्घजीवी होनेका रहस्य ग्रासानीसे समझ में आ जाता है । जो कि व्रत - उपवासोंसे स्वर्गीदिलोककी प्राप्ति कही जाती हैं, वह भी गलत नहीं है । क्योंकि व्रत आदिसे मस्तिष्क तथा वुद्धि ठीक रहती है । उससे सत्कर्म किये जाते हैं; तब निष्काम सत्कर्मोंसे स्वर्ग, मुक्ति प्रादिकी प्राप्ति स्वाभाविक है । एतदर्य ' आलोक ' पञ्चम पुष्पमें ' एकादशी - विज्ञान ' ( पृ. ५४५-५६४ ) में पढ़िये ।

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६२८ ] श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) देखा पाठको! यह है व्रत - उपवास रखनेका अद्भुत चमत्कार कि जो रूसी - डाक्टरको भी नतमस्तक होकर स्वीकार करना पड़ा है । बोलो महाशयो! अब क्या कहते हो? ( e ) क्या पुराणोंमें आई भूतप्र ेतोंकी बातें और उनके निमित्त किये गये श्राद्ध - तर्पण - द्वारा मुक्तिकी बातें गप्प हैं? जब हमारे शास्त्र - पुराणोंमें भूतप्र ेत आदिके होनेकी अदभुत-घटनाओं का वर्णन आता है, ( देखो इसकेलिए ' आलोक ' का ११ वाँ पुष्प ) 1 और प्र ेतोंके निमित्त किये गये श्राद्ध - तर्पण श्रादिके द्वारा उनकी मुक्तिका वर्णन आता है; तो इन्हें पढ़कर दयानन्दी आदि श्रागबबूला हो जाते हैं और कोरी गप्प बताने लगते हैं । भूत - प्र ेतादिके होनेकी बातें और उनके निमित्त किये गये श्राद्ध - तर्पण द्वारा उनकी मुक्ति होनेकी बातें कितनी अक्षर - प्रक्षर बिल्कुल सत्य हैं; हम इस सम्बन्धमें कुछ सत्य घटनायें आपके सामने रखने जा रहे हैं । पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी कृष्णबोधाश्रमजीने पार्वण-श्राद्ध द्वारा एक प्रेतात्मा की मुक्ति कैसे कराई? यह सितम्बर १ ९ ७० की बात है कि पिलखुवा हमारे स्थान पर हापुड़ चंडी संस्कृत महाविद्यालयके प्राचार्य पूज्य पं ० श्रीबालकराम-शास्त्री पुराणेतिहासाचार्य जी पधारे थे । तभी थापने यह एक प्र ेतात्मा-सम्बन्धी घटना बताई थी, और लिखाई थी । प्रापने बताया-हापुड़के एक अग्रवाल वैश्य हैं, जिनकी लड़कीका नाम सत्यवती है । सत्यवती गाज़ियाबाद विवाही है । सत्यवतीके माता - पिता आदि तो कट्टर सनातनधर्मी हैं; पर उसके ससुराल वाले दयानन्दी हैं । कुछ दिनों पूर्व लड़की सत्यवती बीमार हो गई; और उसका बड़े - बड़े डाक्टरोंसे इलाज कराया गया; पर उसे लाभ कुछ नहीं हुआ । उसे कोई शारीरिक रोग नहीं था; जोकि श्रौषधियां काम देती; उसे था प्र ेतावेश । जिसे प्रेतका उद्धार [ ERE [ ३० ] उसके ससुराल वाले समझ नहीं सके । एक दिन सत्यवतीका भाई महेन्द्र-कुमार अपनी बहनको देखनेकेलिए गाजियाबाद गया; और उ पूज्यपा बहनको देखा; तो बहनको कोई बीमारी नहीं है; श्रपितु उसे प्रतावेश प्रेतका भावे है उसे प्रेत सताता है । भाईके सामने ही सत्यवतीको प्रतावेश हुआ । महेन्द्रकु और प्रेतने अपने उद्धार की मांग की; और अपना उद्धार होने पर अपनी बह सत्यवतीको छोड़ देनेका और आगेसे सत्यवतीको किसी भी प्रकार से अत्यवती के श कष्ट न देने का वचन दिया । भाई उस प्रेतसे उसके उद्धारका कोई बातें हुई उपाय करनेका वचन देकर वहाँसे चला श्राया । मैं- तु एक दिन सत्यवतीका भाई महेन्द्रकुमार मेरे पास दौडा हुआ प्राया । प्रेत-मैं उस समय भगवान् श्रीराधावल्लभजी - महाराजके मन्दिरमें था; मैं तु और उसने आकर मुझे अपनी बहनकी बड़ी दुःख - गाथा सुनाई; और कहा कि किसी प्रकार हमारी बहनको सतानेवाले ऐसा कोई उपाय करो; जिससे उस दुष्ट - प्र ेतात्मासे की छुटकारा हो सके । मुझे यह दुःखगाथा सुनकर बड़ी दया आई प्रेत-प्र ेतका उद्धार हो-मेरी वहन सत्यवती- मैं तु और उसके भी कष्ट दूर । पर उस प्रतिका प्रेत-उद्धार कैसे हो; और लड़कीको प्रेतसे छुटकारा कैसे मिले; अव यह समस्या सामने आई । दैवयोग से हापुड़ में उस दिन भारतके सुप्रसिद्ध-महान धर्माचार्य, पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी कृष्णवोधाश्रमजी. महाराज पधारे हुए थे; और मन्दिरके ऊपरके कमरे में विराजमान थे । मैं जिससे मुझे महेन्द्रकुमारको झटसे पूज्यपाद श्राशङ्कराचार्यजी महाराजके पास ले बहनको भी गया । उसने जगद्गुरुजीको अपनी बहनकी दुःखगाथा सुनाते हुए करबद्ध प्रार्थना की कि महाराज! मेरी बहनको दुष्ट प्रदेत सताता है; इस इन बातो कारण हमारी वहन और हम सब घरवाले बड़े परेशान हैं । किसी वे तो क प्रकार उस प्र ेतसे छुटकारा मिले, ऐसा कोई उपाय बताइये । देखा दें; स ० घ ० ५६ जायगा? प्रेत - त

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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३० पूज्यपाद जगद्गुरुजीने उससे पूछा कि तुम्हारी बहनके शरीर में भावेश है; यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ? तका महेन्द्रकुमारने सव आद्योपान्त घटना सुनाते हुए कहा कि महाराज-अपनी बहनको बीमार समझकर देखने गया हुआ था; तो उस समय उत्यवतीके शरीर में प्रेतका प्रवेश था, और मेरी उस प्र तसे इस प्रकार इबातें हुई-मैं- तुम कौन हो? . प्रेत- मैं एक प्रेत हूं । मैं- तुम इसे क्यों सताते हो? { प्रेत- मैं स्वयं बड़े कष्टमें हूं; मेरा उद्धार करो । मैं – तुम अपने उद्धारका कोई हमें उपाय बताओ, जिसे हम करें; और उसके करने से तुम्हारा उद्धार हो जाय; और इधर हमारी वहनका भी कष्ट दूर हो जाय । प्रेत- मैं बड़े कष्ट में हूं, मेरे लिए किसीने जलदान नहीं किया । मैं – अब हम तुम्हारे लिए क्या करें? प्रेत - श्रव प्राप लोग कोई मेरे निमित्त ऐसा शुभ - कर्म कराओ कि जिससे मुझे कुछ शान्ति मिले, और मेरा उद्धार हो, तव मैं आपकी इस I नको भी छोड़ दूंगा । मैं – हमारी वहनके ससुरालवाले तो दयानन्दी हैं; इसलिए वह हो इन बातों को मानते नहीं हैं; और न उनका इन बातोंमें कोई विश्वास T है वे तो कुछ करेंगे नहीं । अब यदि हम तुम्हारे उद्धारकेलिए कुछ रखा दें; तो तुम यह बताओ कि क्या हमारे करानेसे तुम्हारा उद्धार जायगा? प्रेत - तुम करवा दो; तुम्हारे करानेसे भी मेरा उद्धार हो जायगा । प्रेतका उद्धार [ ९ ३१ मैं – श्रव यह बताओ कि तुम्हारे उद्धार प्रत यह मुझे के लिए हम क्या करें? उद्धार होगा कुछ पता नहीं है कि किस शुभ - कर्मके करने से मेरा ? यह तुम किसी पण्डित वा प्राचार्यसे शुभ - कर्मके करानेसे प्रेतका उद्धार मालूम करो कि किस करवा दो कि होता है; सो वह शुभ कर्म मेरे निमित्त हो जाये जिससे मेरा उद्धार हो जाय, और मुळे शान्ति प्राप्त । मैं - अच्छा; हम तुम्हारे उद्धारका कोई उपाय अवश्य प्रेत- यदि तुमने मेरा उद्धार करा दिया तो मैं भी बहनको अवश्य ही छोड़ दूंगा । ' मैं- अच्छा, तो तुम अब इसे छोड़ दो । प्र ेत- तुम हमें यह वचन दो कि तुम हमारे उद्धारका दिनों में करा दोगे? करा देंगे । तुम्हारी इस उपाय कितने मैं- आज मंगलवारका दिन है; हम आनेवाले रविवार तक तुम्हारे निमित्त कोई न कोई ऐसा शुभ कर्म अवश्य ही करा देंगे कि जिससे तुम्हारा उद्धार हो जाय । इसलिए अब तुम इसे छोड़ दो । प्रेत - बहुत अच्छा । अव मैं तुम्हारी इस वहनको छोड़ देता हूं, अब मैं इसे नहीं सताऊंगा । तुम प्राने वाले रविवार तक मेरे उद्धार का कोई न कोई उपाय अवश्य ही कराओ । यदि तुमने मेरे उद्धारका कोई उपाय नहीं कराया; तो पुनः मैं ग्राकर इसे सताऊंगा । मैं- नहीं; हम अवश्य ही उपाय करा देंगे । प्रतने स्वीकार कर लिया, और वह तुरन्त उसी समय हमारी बहन--को छोड़कर उसके शरीरसे चला गया । उसके जाते ही अब क्या था? एकदमसे बेहोश पड़ी हमारी बहन सत्यवती बिल्कुल होश में आ गई, और ' एकदमसे स्वस्थ – ठीक - ठाक होगई; और ऐसी दिखलाई पड़ने लगी कि मानो उसे कुछ हुआ ही न हो ।

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६३२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पूज्यपाद जगद्गुरु शङ्कराचार्यजीने उद्धारका उपाय क्या बताया? पूज्यपाद जगद्गुरुजी महाराजने महेन्द्रकुमारके मुख से प्रतकी बात सुनकर उससे पूछा- क्या तुमने उस प्रतके उद्धारका कोई उपाय कराया है? महेन्द्रकुमार - महाराजजी, हम उस प्र ेतके उद्धारका उपाय- साधन पूछने के लिए उसी दिन से लगे हुए हैं, और बड़ी भाग - दौड़ कर रहे हैं कि हमें कौई ठीकसे उपाय बता दे, पर अभी तक हमें सफलता नहीं मिली-है । कारण कि हम उस प्रेतके उद्धारकी दृष्टिसे प्रेतको अपने दिये. वचनके अनुसार मेरठके तथा दिल्लीके बड़े - बड़े पण्डितोंसे मिले हैं; और उनके सामने सब बातें रखी हैं । हमें उन पण्डितोंने प्रतके उद्धारके उपाय तो अवश्य बताये हैं, पर वह उनके बताये उपाय या तो अधिक-द्रव्य - साध्य थे, जिसमें हमारी सामर्थ्यसे ज्यादा पैसा लगने, खर्च होनेकी बात थी, जो हमारी शक्तिके बाहरकी बात थो; और या फिर अधिक-कालमें होनेवाले उपाय बताये गये थे, सो हमारे पास अधिक समय भी नहीं था । इमीसे हम आज तक कुछ भी नहीं कर पाये हैं । आजः शनिवारका दिन ही शेष है; और कल प्रेतको दिये वचनके अनुसार अन्तिम दिन रविवारका दिन है । हमारी बहन अभी तक तो बिल्कुल स्वस्थ है; पर हमें सन्देह है कि हमने यदि अपने वचन के अनुसार कला रविवार तक भी कुछ नहीं किया; तो हमारी बहन पर वह प्रेत पुनः आक्रमण कर देगा; और उसे सतायेगा, और हमारी बहन फिर पहले-जैसी अस्वस्थ हो जायगी । इसलिए अब कृपा कर हमें कोई ऐसा सरल उपाय बतायें कि जो कल ही हो जाय; और जिसके करनेसे उस प्रेतकी सद्गति हो जाय; और इधर हमारी बहन सत्यवतीका कष्ट भी दूर हो जाय । प्रतका उद्धार [ ९ ३३ | ६३४ 2 पूज्यपाद जगद्गुरुजी महाराजने सब बातें सुनकर कृपा कर अपना सनातनधर्मां सत् - परामर्श यह दिया, और आज्ञा की कि तुम लोग सुप्रसिद्ध तीर्थ श्री- शाघा कर्म ह गढ़मुक्तेश्वर जानो; और परम पवित्र, पतितपावनी, कलिमलदारिणी, श्रीगंगाजी ने श्रीगंगाजीके तटपर बैठकर पार्वण श्राद्ध करो, और तीर्थ श्राद्ध करो; और तड़की के भ दो पण्डितोंको गायत्रीका जप कराने बैठा दो । पण्डित एसे होने बढ्न झोंपड़ी चाहियें कि जो सदाचारी हों, और जो वीड़ी - सिगरेट, तम्बाकू चाय आदि राग । हमने पीते हों । उसके पार्वण श्राद्ध कोन कराये, अब समस्था यह सामने आई । जगद्गुरु- कि जो लड़क जी महाराजने कहा कि शास्त्री जी, तुम्हीं श्रीगढ़मुक्तेश्वर जाकर इनका एकदम से स विधि - विधान से सब कार्यं सम्पन्न राम्रो । सबके सामने महाराजजीकी आज्ञानुसार इधर हापुड़से तो हम श्रीगढ़मुक्तेश्वर बार - बार यह ब्रजघाटपर पहुंच गये, और उंधरसे लड़कीका भाई गाजियाबाद से अपनी और अब मैं बहन सत्यवतीको और उसके पति वा सास प्रादि घरवालोंको ले करके गंगाजी में आ गया । बड़ा भयप्र पार्वणश्राद्धने अपना क्या अद्भुत चमत्कार दिखाया? मर न श्रीगढ़मुक्तेश्वर में पहुंचने पर हम लोगोंको देखते ही लड़की की माँने दर जाने कहा कि शास्त्रीजी महाराज, लड़की सत्यवती पर प्रेतका प्रवेश हो गया उसने है, और वह लड़की बेहोशीकी अवस्थामें झोंपड़ी में लेटी हुई है; आप लोग रोता लगाया बड़ी देरसे आये? भाईने लड़कीके शरीर में प्राये उस प्रेतसे कहा कि उद्धार हो ग पंडितजीके में कुछ देरी हुई है । अब पंडितजी श्रा गये हैं, अब विल्कुल स्वस् तुम्हारे उद्धारका सब कार्य करेंगे, तुम जरा धैर्य रखो । से उस प्रो सबने सबसे पहले पतितपावनी भगवती भागीरथीका स्नान - पूजन सन्नता की आदि किया; और फिर पार्वण श्राद्धका सब कार्य प्रारम्भ हो गया । दो यद्यपि पंडित गायत्री जप कराने बैठा दिये गये । लडकीके पतिने अपने आर्य-कट दूर ह समाजी- विचारोंको छोड़कर सब कार्य बड़ी श्रद्धा - भक्तिके साथ कराया श्री

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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३८३४ सनातनधर्मानुकूल जो हमने बताये थे; सब कार्य किये । कर्म कराते समय ना कर्म हो जानेपर पार्वण श्राद्धने और गायत्री मंत्र जपने और साधा माता श्रीगंगाजीने अपना क्या अद्भुत चमत्कार दिखाना प्रारम्भ किया कि तड़कीके भाईने हमसे ना करके कहा कि शास्त्रीजी महाराज हमारी बहन झोंपड़ी में बैठी हुई है और वह यह कहती है कि लानो, हमारा निदि । हमने उससे कहा कि पंडित करा रहे हैं । उसके पश्चात् पार्वण श्राद्ध समाप्त होते समय श्रकस्मात् क्या हुआ - जो लड़की अब तक झोपड़ी में बेहोश पड़ी हुई थी; वह लड़की सहसा का एकदमसे सबके देखते - देखते उठी और अपनी उस झोंपड़ीमें से निकलकर सबके सामने श्रीगगाजीकी और चल दी और यह लड़की अपने मुखसे र. बार - बार यह कहती जाती थी कि अच्छा लो; अव मेरा उद्धार हो गया; नी और अब मैं यहांस जा रहा हूं । ऐसा कहते कहते वह लड़की एकदमसे र के बोगंगाजी में अन्दर घुस गई; और आगे बढ़ती चली गई; जिससे सबको. बड़ा भय प्रतीत हुआ कि कहीं ऐसा न हो कि यह लड़की डूब न जाय, मर न जाय? मैंने घरवालोंसे कहा कि तुम घबड़ा नहीं; इसे निन्दर जाने दो, चिन्ता न करो । या उसने अन्दर जाकर कंठ तक जलमें खड़ी होकर श्रीगंगाजी में ज्योंही गोता लगाया, तो एकदमसे उसके शरीरमें व्याप्त उस प्र ेतका तत्काल कि द्वार हो गया, और वह लड़की नव बिल्कुल स्वस्थ और प्रसन्न होकर से उस प्रेतसे छुटकारा मिल जन सुन्नता की लहर दौड़ गई, और दो यद्यपि पार्वणश्राद्धके द्वारा यं-थ कट दूर हो चुका था; लेकिन उस प्रोतसे छुटकारा पाकर एकदमसे जलसे बाहर आ गई; और सदाके लिए गया । अब तो सबमें एकदमसे बड़ी सभी गद्गद हो गये । प्रेतका उद्धार और उसकी लड़कीका फिर भी हमने बादमें तीर्थश्राद्ध भी कराया श्रौर ब्राह्मणोंने शुभाशीर्वाद दिया, और श्रीगंगाजीका पूजन प्रतका उद्धार [ २३५ श्रारती की । उसके पश्चात् फिर कभी भी आज तक उस लड़की को कोई कष्ट नहीं हुआ; और वह लड़की पूर्ण स्वस्थ और ठीक - ठाक है और बड़ी प्रसन्न है । देखा पाठको, जिस लड़की को बड़े - बड़े डाक्टर भी अच्छा न कर सके, उसे शास्त्रीय - कर्मके द्वारा पूज्य भूदेव ब्राह्मणोंने एक दिनमें ही क्रिया करके उस लड़कीको प्र ेतसे छुटकारा दिला दिया; और इवर उस प्रेतात्माकी भी सद्गति करा दी । इससे बढ़कर हमारे पुराणोंकी और सनातनधमकी बातोंकी सत्यताका प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या चाहिये? ( ख ) श्रव और सुनिये - विश्वविख्यात ' कल्याण ' सम्पादक श्रीहनुमान-प्रसाद पोद्दारजीने स्वयं पारसी प्रेतसे कैसे भेंट की? यह घटना ' मां और बाबूजी ' नामक ग्रन्थमें श्रीराधेश्याम वंकाजीने पृष्ठ १६७ पर इस प्रकार है । श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दारजीने पारसी प्रेतको प्रत्यक्ष कैसे देखा; और उसका उद्धार कैसे कराया? ४ अप्रैल १६६७ को स्वयं अपने श्रीमुखसे भाई पोद्दारजीने यह घटना सुनाई थी – जो इस प्रकार है रहे - भाईजीको ही यहां पर बाबूजी कहा गया है । जब बाबू श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दारजी बम्बई में रहते थे को घूमनेकेलिए चौपाटीकी प्रोर समुद्र तट पर जाते । की तरफ अंधेरेमें एक बेंच थी, एकान्त देखकर उसी बैठ जाते; और नाम - जप करते । यह प्रतिदिनका क्रम श्रीहनुमानप्रसाद । यह स्मरण ; तो प्रति सायं वहां बालुकेश्वर बेंच पर बाबूजी था । एक बार रातके आठ या नौ बजे होंगे । अंधकार था ही, बेंच पर बैठे हुए बाबूजी जप कर रहे थे । बाबूजीने देखा कि श्वेत वस्त्रधारी एक पारसी सज्जन सामने आकर खड़े हो गये हैं । वैशविन्यास से वे पारसियोंके पुरोहित लगते थे । पारसियोंके पुरोहित जैसे सफेद पाजामा, सफेद श्रचकन श्रीर

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३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सफेद टोपी - सी धारण करते हैं, वैसे ही वे पहने हुए थे । बाबूजीके सामने प्राकर वे खडे हो गये । न बाबुजी उनसे बोले; और न वे बाबूजी से बोले । वे बहुत देर तक खड़े रहे । फिर बाबूजीके मनमें प्रायाः यह कोनसी सभ्यता है कि मैं बैठा हूँ, और ये खड़े हैं । अतः उनसे बैठने के लिए कह दूँ । ऐसा विचार मनमें आते ही बाबूजीने उनसे कहा- आपको खड़े हुए बहुत देर हो गयी, सो आप विराज जाइये । वे इस प्रतीक्षा में थे ही कि बाबूजी पहले बात करें । वे बाबूजी की ओर देख ही रहे थे । बाबूजीके अनुरोध करते ही वे पारसी सज्जन बोले- मैं प्रापको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझसे बातचीत प्रारम्भ की । प्राप मुझसे डरियेगा नहीं । मैं प्र ेत हूं । यह प्रसंग सम्भवतः सन् १६२२ ई ० का होना चाहिये । भले ही पारसी प्रेतने कहा था कि डरियेगा नहीं, पर प्र ेतका नाम ही बुरा है । और उस समय बाबूजीकी उम्र ही कितनी थी? प्र ेतका नाम सुनते ही बाबूजीको डर लगा | वेंचपर अकेले रातका अंधेरा, स्थानकी एकान्तता और सामने एक प्रेत । डरके मारे बाबूजीको पसीना छूटने लगा । पारसी प्रीतने फिर कहा- इसमें डरनेकी बात नहीं है । मैं प्रापका कोई अनिष्ट करने नहीं आया हूं, अपितु श्रापसे कुछ सहायता लेने आया हूं । बाबूजीने हिम्मत करके कहा— कहिये क्या बात है? उस प्रतने कहा -- " यदि आप पहले मुझसे नहीं बोलते, तो मैं आपसे वात नहीं कर सकता था । मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि आप बोलें । हमारे प्रेतलोक में अनेक स्तर हैं । प्रेतोंके अनेक प्रकारके अधिकार हैं, उनकी विभिन्न शक्तियाँ हैं । कई प्र ेत सभी जगह आ जा सकते हैं, कोई नहीं ग्रा - जा सकते । कोई अनेक काम कर सकते हैं, कोई नहीं कर सकते । जैसे मानवलोक में मनुष्योंके अलग - अलग अधिकार हैं, प्रेतका उद्धार [ ६३७ १३८ ] शक्तियाँ हैं, बल हैं; वैसे ही वहाँपर हैं । मैं प्र ेत - योनिमें हूं । मैं सब जगह करे, प जा सकता हूं, हरएकको दिखाई दे सकता हूं, पर मुझसे पहले कोई प्रकार वास बोले, नहीं तो मैं बोल नहीं सकता । इसीलिए मैं आपके सामने खड़ा भी बडा रहा । " प्रतलोक में धीरे - धीरे बाबूजीका भय कम होता गया; तथा उस प्र ेतकी बात में प्रे तके " रुचि बढ़ने लगी । वह प्र ेत अपनी बात कहता गया - मेरी मृत्यु छः पते के अनुस - माह पहले हुई । मैं बाँदरा में रहता था । मेरे परिवारके पारसी लोग जो कुछ बत अभी भी वहां हैं । उनका नाम पता इस प्रकार है । मेरी सद्गतिमें एक उसका परि -प्रतिबन्धक है, और वह प्रतिबन्धक कट सकता है आप गयांमें मेरा श्राद्ध करवा दें । गयामें श्राद्ध छूट जायगा । व वावजीका भय जाता रहा, पर साथ पारसी लोग श्राद्ध आदि नहीं मानते, फिर ये गयामें श्राद्ध करनेपर । बाद बाबूजी करवानेसे मेरा प्रतत्व प्राश्विन औ में बारह दान दिया । ही एक आश्चर्य था । श्राद्धकेलिए कैसे कहते वह पारसी ग्रामको घूम हैं? बाबूजीने प्रकट रूपसे प्र तसे पूछा – गयामें श्राद्ध हिन्दुओं के द्वारा दिखाई दिया ' किया जाता है; और श्राप पारसी हैं, श्रतः श्राद्ध में आपका क्या प्रयोजन? उस प्र ेतने उत्तर दिया – सत्य यदि सत्य है तो वह जाति- सापेक्ष नहीं आज व होता । भिन्नता जातिमें होती है । जाति तो यहांके लोगोंको लेकर दो । उस प होती है । जीव जातिका भेद नहीं होता । इसमें पारसी, हिन्दू, करने आया - ईसाईका सवाल नहीं । जिस जीवको प्र ेत बनना होता है; बनता ही है । मुळे गयाजी म यह उत्तर बाबूजीको कभी नहीं भूलता । अब प्र ेतसे खुलकर बात होने रई और लगी । वाबुजीने पारसी - प्र तसे अनेक बातें पूछीं- जैसे प्रतलोकके बारे या हूं । में, कर्मों के फलके बारेमें । पारसी प्र ेतको जितनी जानकारी थी, उसने कहिये उतनी बातें बताई । पारसी प्रोतने कहा- जो वैर या द्वेष लेकर शादिको नह मरता है; उसकी प्रतलोक में बड़ी दुर्गंत होती है, बहुत यातना सहनी श्राद्धकी * पड़ती है । अतः द्वेष लेकर नहीं मरना चाहिये । भले ही दूसरा पक्ष प्रेम भाकरइ

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६३८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न करे, परन्तु अपनी श्रोरसे मनसे उससे प्रेम करना प्रकार वासना लेकर अथवा दूसरेका धन चाहिये । इसी भी बड़ा कष्ट होता है । वासनापूर्ति अपहरण करके मरनेवालोंको का साधन मानवलोकमें है; पर प्रेतलोक में नहीं होता । प्रे तके जानेके बाद रातको बाबूजी लोट प्राये पते के अनुसार बाबूजीने वांदरामें । दूसरे दिन नाम-खोज करवायी । उस पारसी प्र ेतने जो कुछ बताया था, वह सब सही निकला । वहीं उसका घर, वहीं उसका परिवार, और वहीं छः माह पूर्व मृत्यु । सही जानकारी मिलने के बाद बाबूजीने श्रीहरिगम नामक ब्राह्मणको उसी दिन गया भेज दिया । प्राश्विन और चैत्र मासमें विशेष रूपसे पिण्डदान होता गया में बारहों मास लगता है । श्रीहरिराम ही हैं, परन्तु ब्राह्मणने गया जाकर पिण्ड-दान दिया । पिण्डदान करनेमें छः सात दिन लग गये । इतने दिनों तक वह पारसी प्रेत बाबूजीको दिखाई नहीं दिया । बाबूजी प्रतिदिन ग्रामको घूमने जाते ही थे । सातवें या आठवें दिन वह प्रेत फिर दिखाई दिया । आज वह अपने आप बोल सकता था । उसके चेहरे पर प्रसन्नता दी । उस पारसी प्र ेतने कहा- मैं धन्यवाद देने और कृतज्ञता प्रकट करने आया हूं । श्रव मैं जा रहा हूं । मेरा प्रतत्व कल छूट जायगा । के गयाजी में पिण्ड प्राप्त गया । इस प्रेतयोनिसे मेरी मुक्ति हो ई; श्रीर श्रव में दूसरे लोकमें जा रहा हूं । बस आपको धन्यवाद देने हूं । कहिये महाशयो, अब क्या कहते हो! जो पारसी श्राद्धतर्पण आदिको नहीं मानते; वही मरकर सनातनधर्म की रीतिसे प्रेत बनकर पाश्राद्धकी स्वयं माँग कर रहे हैं, और गया श्राद्ध करनेपर पुनः वह ति ग्राकर इससे महान् लाभ होने और अपने उद्धार हो जानेकी बात प्रतका उद्धार [ ३२ स्वीकार कर रहे हैं । क्या श्रव भी पुराणोंकी बातोंको जायेगा? गप्प माना ( ग ) श्रभी कुछ दिनों पहले भारतकी राजधानी दिल्ली शक्तिनगर पूज्यपाद श्रीमज्जगदगुरु शंकराचार्य गोवर्धनपीठाधीश्वर में श्रीनिरंजनदेवतीर्थजी अनन्तश्री स्वामी महाराजने अपना चातुर्मास्य किया था । एक दिन हम भी आपके दर्शनार्थं वहांपर गये हुए थे । वहांपर एक प्रायसमाजी-नवयुवककी पत्नी अंग्रेजी पढ़ी महिला पूज्य जगद्गुरु शङ्कराचार्यजी-महाराजके दर्शनार्थं श्राई, और उसने अपनी बड़ी दुःख - भरी करुण - गाया सुनाई, जिसे सुनकर सभी बड़े आश्चर्यचकित रह गये । उस श्रार्यसमाजी-महिला ने बड़े दुःख - भरे शब्दोंमें जो वातें की, वे इस प्रकार हैं-स्त्री - महाराज, मैं बड़ी ही दुःखी हूं | पूज्य जगद्गुरुजी- क्या बात है बेटी? स्त्री- मैं बड़ी रोगी हूं । जगद्गुरुजी - क्या रोग है बेटी तुम्हें? स्त्री – महाराज, कोई शारीरिक रोग तो नहीं है, पर मुझे प्रत सताया हुआ है । जगद्गुरुजी - तुम क्या पढ़ी हुई हो बेटी? स्त्री- मैं इङ्गलिश पढ़ी हुई हूं । जगद् गुरुजी - किन विचारोंकी हो? स्त्री - महाराज, मैं प्रार्यसमाजी परिवार की हूँ; श्रायंसमाजिन हूं, और में अन्धविश्वासी बिल्कुल नहीं हूं । जगद्गुरुजी – क्या वह प्रेत तुम्हें दीखता है? और मैं स्वयं स्त्री — जी हां, महाराज, वह प्रेत मुझे प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ता है P जगद्गुरुजी- क्या वह तुमसे बातें भी करता है?

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४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) स्त्री - जी हाँ, महाराज वह प्र ेत मुझसे बातें भी करता है । जगद्गुरुजी- वह प्र ेत कौन है; और किस जातिका है, यह तुम्हें कुछ मालूम है? स्त्री- महाराज जी, क्या बताऊ? जगद्गुरुजी - बेटी बतायो । स्त्री - महाराज जी बताते हुए बड़ी लज्जा आती है; और कहते हुए भी बड़ा दुःख होता है । जगद्गुरुजी - बेटी लज्जाकी क्या बात है, तुम जो भी बात हो निःसंकोच कहो । स्त्री -- महाराज जी, वह प्रेत और कोई नहीं है, अपने हो घरके मेरे सगे ससुर । जगद्गुरुजी - क्या सुम्हारे ससुरकी मृत्यु हो चुकी है स्त्री - जी हाँ, महाराज मेरे ससुरकी मृत्यु हो चुकी है; - पूज्य ससुर अब प्रेत वन गये हैं; और प्र ेत बनने पर प्रत्यक्ष दिखलाई देते हैं, और वह अव प्रेत बनकर मुझे बात मैं आपसे बिल्कुल सत्य कहती हूं । जगद्गुरुजी- वह तुम्हें क्या सताते है? स्त्री - जव उनका मेरे ऊपर प्रवेश हो जाता है; वह प्रोत है मेरे ? और वही मेरे वह मुझे अब सताते हैं, यह तो मैं कई - कई घंटे तक बड़ी बेहोश रहती हूं, और बीमार जैसी बनी पड़ी रहती हूं, और मेरे शरीरमें शक्ति नहीं रहती, मुर्दा जैसी बन जाती हूं । मेरी जिन्दगी बरबाद हो रही है । जगद्गुरुजी- क्या इलाज भी कराया था? स्त्री - जी हाँ, महाराज खूब इलाज भी कराया, और बड़े - बड़े प्रतका उद्धार [ ६४१ ९ ४२ डाक्टरोंको भी दिखाया, पर इलाज तो तब हो, जबकि मुझे कोई स्त्र शारीरिक रोग हो, यह तो प्रतकी बाधा है, इसमें डाक्टर बेचारे भला मैं क्या करेंगे? डाक्टरने जबाब दे दिया । अब तो किसी प्रकार इस और प्र ेतसे छुटकारा मिलना चाहिए, तब जाकर हमें शान्ति मिलेगी । ज‍ग स्त्र जगद्गुरुजी - बेटी, क्या तुम्हारे घरपर श्राद्ध होता है । और मुझ स्त्री- महाराजजी, श्राद्ध तो हम लोग कभी नहीं करते । लिए बा जगद्गुरुजी - हिन्दु होकर फिर भी श्राद्ध नहीं करते, यह तो । तुम जग अच्छा नहीं करते । श्राद्ध तो अवश्य ही करना चाहिए । रद स्त्री - महाराजजी, श्राद्ध हमारे कभी नहीं होता । वह कट्ट दयानन्दी जगद्गुरुजी - बेटी, तुम अपने उन प्रोत - ससुर के निमित्त श्राद्ध अवश्य किया करो; और तर्पण कराया करो, और गया जाकर और भूत - प्र ेतो अपने पूज्य पतिदेवको साथमें ले जाकर अपने पतिके द्वारा अपने ससुरके स्त्री निमित्त श्राद्ध - पिण्डदानादि कर्म श्रवश्य करा डालो | गया श्राद्धसे तुम्हारे समा उन प्रेत बने ससुर की प्रेतयोनि छूट जायेगी; और ससुरकी बड़ी उत्तम मेरे स्वय गति हो जायगी; और फिर तुम्हारा इस प्रकारसे प्रेत - द्वारा सताया बने मुझे जाना भी और प्रेतबाधा भी सदा - सर्वदाकेलिए दूर हो जायगी । स्त्री - महाराज, हमारे पति कट्टर ग्रार्यसमाजी विचारोंके हैं । जगद्गुरुजी- तुम्हारे ससुर किन विचारोंके थे? स्त्री - महाराज, हमारे ससुरजी कट्टर दयानन्दी विचारोंके थे; वे भी श्राद्ध - तर्पण आदि बातोंको नहीं मानते थे; और नहीं करते जगद्गुरुजी - जब तुम सभी लोग कट्टर दयानन्दी विचारोंके अब हम हा है । जग भूलती ह और: प्रेतयोनि थे । कर हो; तुम्हारे व तो फिर आर्यसमाजी तो भू - प्र ेतोंको नहीं मानते? तुम प्रार्यसमाजी- विश्व लोगोंके घर में यह भूत - प्रेतत कहाँसे घुस आया? स्त्री