सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 501–510
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 501–510
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४१ ६४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कोई स्त्री- महाराज, पहले तो मैं भी कट्टर दयानन्दी विचारोंकी थी; ला और में भी इन भूत - प्रेतोंको कभी नहीं मानती थी । इस जगद्गुरुजी - श्रव मानती हो? स्त्री- प्रव तो जब प्रत्यक्ष मेरे घरमें मेरे ससुर ही प्रत वन गये हैं; और मुझे प्रेत प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं; तो मुझे लाचारीसे प्र ेत माननेके-लिए बाध्य होना पड़ा है । न मानू ं ; तो क्या करू ँ? तुम जगद्गुरुजी - जब तुमने यह प्रत्यक्ष देख लिया है कि तुम्हारे ससुर कट्टर दयानन्दी थे; और वह भी भूत - प्रेतोंको नहीं मानते थे, तो फिर बह कट्टर दयानन्दी होकर भूत - प्र ेतोंको माननेकी बात तो दूर रही; वह दयानन्दी महाशय स्वयं भूत - प्रेत बन गये? अव उनका दयानन्दीपना और श्रद्ध भूत - प्रेतोंको न मानना कहाँ चला गया? और स्त्री - महाराज, इसमें तो- तनिक भी सन्देह नहीं कि हम लोग कट्टर -हारे पार्थसमाजी हैं; और हम भूत - प्रेतोंको कभी भी नहीं मानते हैं, पर जब उत्तम मेरे स्वयंके ससुर ही दयानन्दी होकर प्रेत बन गये हैं, और वह प्रत नाया बने मुझे स्वयं दिखाई देते हैं, और प्रेत बनकर मुझे बड़ा सताते हैं; तो पत्र हमें लाचार होकर प्र ेतयोनि माननेकेलिए वाध्य होना पड़ हा है । जगद्गुरुजी- इतना होनेपर भी अब भी तुम्हारे पतिजी की प्रांखें नहीं खुलती हैं, और वह अब भी दयानन्दी वने हुए हैं; और अव भी और Γι योनिको नहीं मानते हैं, और सनातनधर्म की शरण में आकर श्राद्ध-कर अपने पूज्य पिताको प्रेतयोनिसे छुटकारा दिलाकर अपने और हो; तुम्हारे कल्याण करने की नहीं सोचते हैं, यह तो बड़े खेदकी बात श्रीर जी- विश्वासकी बात है! स्त्री - महाराजजी, उन्हें बड़ी लज्जा लगती है, अतः वह नहीं मानते हैं । प्रतका उद्धार [ III जगद्गुरुजी - इस प्रतके श्रद्भुत चमत्कार के सामने अब आपके पति-के दयानन्दी विचार क्या करेंगे? जब उनके स्वयंके अपने दयानन्दी घर में और अपने स्वयंके दयानन्दी पिता प्रेत बनकर जब वह अपनी ' पुत्र- वधूको बड़ी बुरी तरहसे सता रहे हैं, तो इससे बढ़कर भूत - प्रेतोंके होनेका प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या होगा? अपने पूज्य पिता के निमित्त यदि तुम्हारे पति श्राद्ध - तर्पण कर दें और गया चले जायें; तो इसमें उनका क्या बिगड़ता है? यदि तुम्हारे पतिदेव और तुम दोनों मिलकर गया चले जाम्रो, और वहाँपर जा करके गया पण्डितों पिता के निमित्त श्राद्ध - तर्पण पिण्डदानादि क्रम करा दोगे, तो इसमें - तुम्हारा और तुम्हारे प्रेत बने ससुरका दोनोंका ही कल्याण होगा । गयामें जाकर श्राद्ध - तर्पण पिण्डदानादि कर्म करनेसे तुम्हारा तो रोग दूर हो ही जायगा; और फिर तुम्हें प्रेतका सताना भी बन्द जायगा; प्रेत-वाघासे छुटकारा मिल जायगा; और इनके पूज्य पिताजीका भी उद्धार हो जायगा; वह प्रेतयोनिसे मुक्त हो जायेंगे; और शान्ति प्राप्त कर तुम्हें अपना शुभाशीर्वाद देंगे । स्त्री- महाराजजी, क्या वास्तवमें गयामें जाकर श्राद्ध - तर्पण करने, पिण्डदान आदि कर्म करनेसे प्रेतबाधा दूर हो जाएगी? जगद्गुरुजी हां, बेटी! अवश्य ही प्रतस्त्रसे छुटकारा हो जायगा । स्त्री- महाराजजी, क्या प्रमाण है कि गयामें जाकर श्राद्धतर्पण करने-से प्र ेत - बाधा दूर हो जायगी? जगद्गुरुजी- हमारे शास्त्र - पुराण प्रमाण हैं, वे कह रहे हैं । स्त्री - क्या शास्त्र - पुराणोंकी सभी बातें सत्य हैं? जगद्गुरुजी- जो हमारे शास्त्र - पुराण और जो हमारा सत्य-सनातनधर्म भूत - प्रेतोंका होना बता रहा है, और भूत - प्रेतोंका होना मानता है; और जिन भूत - प्रेतोंके लिए तुम दयानन्दी लोग कल तक यह
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६४४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रतका उद्धार [ ६४५ ' ६४६ कहते थे कि भूत - प्र ेत नहीं होते; और शास्त्र - पुराणोंमें भूत - प्रतों की बातें गप्प हैं । उन्हीं भूत - प्रेतोंको तुम कट्टर दयानन्दी लोगोंने स्वयं देख लिया है; और तुम स्वयं दयानन्दी ही हमारे सामने बैठे हुए भूत - प्रेतोंकी बातें बता रहे हो, और भूत - प्र ेतोंका होना स्वयं स्वीकार कर रहे हो,. और तुम दयानन्दी ही भूत - प्र ेतोंका देखना भी स्वीकार कर रहे हो; स्वयं अपनी आँखोंसे भूत - प्र ेतोंके देखनेके प्रत्यक्ष प्रमाण हो । इतना हो नहीं, तुम्हारे कट्टर प्रायसमाजी - ससुर ही जब स्वयं प्रत बनकर तुम्हारे सामने खड़े हो गये हैं; तो इससे बढ़कर शास्त्र - पुराणोंकी बातों-की सत्यताका प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या होगा? ' भूत वही जो सिर चढ़ बोले ' इसे ही तो कहते हैं । जब हमारे शास्त्र - पुराणोंकी यह भूत - प्र ेतों-वाली बात भूतों - प्रतोंको न माननेवाले तुम कट्टर दयानन्दियोंके द्वारा बिल्कुल सत्य सिद्ध हो रही है; तो उन्हीं हमारे शास्त्र - पुराणोंका और हमारे सत्य सनातनधर्मका यह कहना है कि गयामें जाकर श्राद्ध-तर्पण पिण्डदानादि कर्म करनेसे प्र ेत - बाधा दूर हो जाती है, तो हमारे शास्त्र - पुराणोंकी और सत्य सनातनधर्मकी यह बात भी बिल्कुल सत्य ही सिद्ध हुई । भला झूठ कैसे हो सकती है? सनातनधर्मकी और हमारे शास्त्र - पुराणोंकी सभी वातें अक्षर - प्रक्षर बिल्कुल सत्य हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता । तभी तो सपिण्डी आदिमें मृतकका ' अमुक प्र ेतस्य ' कहना पड़ता है । स्त्री- महाराजजी, कुछ मनुष्य कहते हैं कि तुम अपने ससुरके निमित्त गायत्री मन्त्रका जप करानो, यह गायत्री मन्त्रका जप कराना कैसा है? जगद्गुरुजी- हां, गायत्री मन्त्रका जप कराना भी ठीक है । स्त्री- गायत्रीका जप किससे कराना चाहिये? जगद्गुरुजी - गायत्री - मन्त्रका जप किसी सनातनधर्मी कर्मकाण्डी-. ब्राह्मणके द्वारा होना चाहिये, इससे भी बड़ा लाभ होगा । असली लाभ तो गया जाकर गया - श्राद्ध पिण्डदानादि कर्म करनेसे ही विशेष होगा । स्त्री - महाराजजी, गायत्री मन्त्रका जप ब्राह्मणोंसे न कराकर यदि हम स्वयं गायत्री जप कर लें, तो कैसा रहेगा? । बताये जगद्गुरुजी- नहीं, तुम्हें गायत्री जप नहीं करना चाहिये । श्रीर स्त्री - क्यों महाराज? जगद्गुरुजी - तुम्हें गायत्री मन्त्रका जप करनेसे लगेगा । स्त्री - क्यों पाप लगेगा? जगद्गुरुजी - स्त्री और शूद्रोंको वेदमन्त्र बोलनेका जप करनेका अधिकार नहीं है । स्त्री - अधिकार क्यों नहीं है? य बड़ा घोर पाप स्वयं प्रेत क बढ़कर और गायत्री मन्त्र महाश प्रेतों जगद्गुरुजी - जिस हमारे शास्त्र - पुराणोंने भूत - प्रेतादिके होने की बात बताई थी; और वह भूत - प्र ेतकी बात जिसे आप लोग स्वप्न में भी कभी स्वीकार नहीं करते थे; तुम्हें तुम्हारे घरमें ही तुम्हारे ससुरको प्र ेत बनाकर शुभार शास्त्रोंने तुम्हारे मुखसे उनका होना स्वीकार करा लिया, वही शास्त्र- बताय पुराण किसको किस बातका अधिकार है; यह बताते हैं । सो शास्त्रोंमें अपने ही यह लिखा हुआ है कि गायत्री और वेदमन्त्रोंका अधिकार स्त्री और ' वीर शूद्रको नहीं है । सो शास्त्रोंकी यह बात हम आपको बता रहे हैं; अपनी मनमानी वात नहीं बता रहे हैं, हमें कोई तुम लोगोंसे शत्रुता नहीं है । [ इस विषय में इसी तृतीय पुष्प ( पृ. २ से ६०७ पृ. तक ) को देखो ]! सत्य स्त्री - तो महाराज, हमें क्या करना चाहिये? चमत्व जगद्गुरुजी - गया जाकर श्राद्धतर्पण पिण्डदानादि करानो, तभी ठीक रहेगा । की ह स ० ध ० ६० उठे स्थित
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-५ ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) 1 स्त्री- बहुत अच्छा महाराज, ऐसा ही करूंगी । इम. स्त्री ऐसा कहकर चली गई; और बादमें उसने पूज्य जगद्गुरुजीके G बताये अनुसार सब कार्य कराया; तो उसको प्र ेतसे छुटकारा मिल गया और इधर उसके ससुरको भी प्र ेतयोनिसे छुटकारा मिल गया । यह है सनातनधर्म और शास्त्र - पुराणोंका अद्भुत चमत्कार; जो कि स्वयं कट्टर दयानन्दी - परिवारको भूत - प्रेतोंको मानना पड़ा; और भूत-पाप प्रेत बनकर सबको पुराणोंके माननेका प्रत्यक्ष प्रमाण देना पड़ा । इससे बढ़कर सनातनधर्मकी अद्भुत विलक्षण महिमा और क्या होगी? कहिये महाशयो, अब तो तुम स्वयं प्र ेत बन गये, अब क्या कहते हो? भूत-मन्त्र प्रेतोंके विषय में वेदादिशास्त्रोंके प्रमाण ' आलोक ' के ग्यारहवें पुष्पमें देखें । ( १० ) क्या ऋषि - मुनियोंके शुभाशीर्वादके चमत्कारकी बातें मिथ्या हैं? बात जब हमारे पुराणोंमें ऋषि - मुनियोंके, सन्त - महात्माओं के शाप और कभी शुभाशीर्वादके अदभुत चमत्कारोंकी बातें श्राती हैं; तो इसे सफेद झूठ कर बताया जाता है । सन्त - महात्माओंके शुभाशीर्वादका अद्भुत चमत्कार स्त्र- अपने परम मान्य समाचार - पत्रों में देखिये; दिल्लीके आर्यसमाजी- पत्र त्रोंमें और ' वीर अर्जुन ' ता ० १२ - ९ -७० में यह छपा है— पनी महात्माका चमत्कार है । " करोली ११ सितम्बर । आप विश्वास करें; या न करें, यह एक सत्य घटना है कि सांपका काटा हुआ मरणासन्न बालक एक महात्माके चमत्कारिक प्रयास से जी उठा । ठीक महौली कोटा ग्राममें एक बालकको सौंपने काट लिया, और बालक-को हालत मरणासन्न हो गई, और परिवार के सभी लोग बड़े चिन्तित हो उठे । दैवयोगसे एक महात्मा उसी समय श्रा गए और उन्होंने बालककी स्थिति देखकर अपने हाथसे तीन थपकियां लगाई । पंता नहीं; क्या समाचारपत्रोंकी घटनाएं [ २४७ असर हुआ कि बालकके शरीर में व्याप्त रूपिका जहर समाप्त हो गया, और वह चेतन अवस्थामें श्रा गया । " देखा पाठको, यह है शुभाशीर्वाद देनेवाले महात्माका अद्भुत चमत्कार! कहिये महाशयो, अव क्या कहते हो? ( ११ ) क्या पुराणोंमें आई नागोंके अद्भुत चमत्कारकी बातें झूठी हैं? हथारे शास्त्र - पुराणोंमें नागदेवताकी, नागकन्यायोंकी बड़ी - बड़ी अद्भुत घटनाओं का वर्णन आता है; जिसे आजके पामर लोग सफेद - कूठ बताते हैं । आज श्रापको नागके सम्बन्धको महान् श्रावयजनक घटना सुनाते हैं, और यह भी सुनाते हैं आपके प्राणप्रिय दैनिक - पत्रोंकी घटना; जो इस प्रकार है । - · दैनिक ' हिन्दुस्तान ' पत्र देहली ता ० २-५-१९ ७० में यह घटना इस प्रकार छपी है-. सांपका स्त्रीसे प्रणय " नई दिल्ली १८ मई ( भारती ) एक कावरा पिकी एक पाकिस्तानी महिलासे प्यार करनेकी सच्ची दास्तान यहां प्राप्त हुई है । मेहर बीबी नामकी यह महिला तीन बच्चों की मां प्रौर अधेड़ आयुकी है; और कोवरा ७ फुट लम्बा है । किस्सा छ: साल पुराना है । मेहर बीबीने जो मांग जिले में होर-झाके मशहूर गांवकी है, लाहौरके मेयो अस्पतालके डाक्टरोंको हालमें -बताया कि कोवरासे उसकी पहली मुलाकात गाँवके तालावपर हुई थी । सांपने मुझे घुटनेके पास काट खाया । मेरा अस्पताल में उपचार किया गया; और मैं बच गयी । मेहरबीबीने डाक्टरोंको वताया कि तबसे लेकर ग्राज - दिन तक
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६४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) काबरा नियमित रूपसे मेरे पास आता है, और उसी स्थानपर काट कर चला जाता है । इसका जहर मुझे इस कदर अनुकूल आया है कि मैं उसके दर्शनकेलिए पागल रहती हूं । इससे मुझे सम्भोगके समान आनन्द माता है । खबर के अनुसार मेयो अस्पताल के डाक्टर अब इस महिला की जांच - पड़ताल कर रहे हैं । कहिये महाशयो! अब क्या कहते हो? ( ख ) लो अवसरी घटना भी सुनिये । हिन्दुस्तान दैनिक ता २३ - ९ -१६७० में यह घटना इस प्रकार छपी है । सर्प पीड़ितकी समस्या " हिन्दुस्तान के माध्यम से मैं पाठकोंका ध्यान एक समस्याकी और • दिलाना चाहता हूं । मेरे एक सम्बन्धीका जो कि जिला मुजफ्फरनगरके शामली कसवेके पास वघेव नामक ग्राम में रहते हैं, और जिनका नाम पं ० जियालाल है; सर्पने बीसवीं बार काटा है । करीब १७ वर्षसे प्रत्येक वर्ष, और कभी - कभी वर्षम दो बार भी काटा है । सर्पका वर्ण सदैव एक - सा नहीं रहता । परन्तु अक्सर काले वर्णका होता है । उन्होंने बचनेकेलिए हर सम्भव प्रयत्न किया हैं, परन्तु कोई सूरत नजर नहीं प्राती । आज रात १२ बजे जब मैं एक रोगीको देखकर आया; तो मेरा भतीजा जैसे ही दरवाजेके पास प्राया, एक सर्पने दरवाजे में अटके हुए उसके पैर पर फन मारा । दरवाजेसे करीब एक गजकी दूरी पर वही सम्बन्धी जोकि कलसे हमारे यहां प्राये हुए हैं, लेटे हुए थे । हर वर्ष जब कभी उन्हें सर्पने काटा है, उन्होंने ऐंटी वीनम सीरमका इन्जेक्शन शामली आकर लगवाया । करीब एक माह पूर्व वह दिल्लीके सफदरजंग अस्पतालने अपनी शिकायतें सुना पाये; तो डाक्टरोंने उनके खतकी परीक्षा कर बताया कि यदि अगली बार सांप काटे, तो यह इन्जेक्शन न लगवाएं । मेरी राय में उन्होंने वैज्ञानिक प्राधार पर हों समाचार - पत्रोंकी घटनाए [ ४६ ६५० बतलाया होगा । त्रि क्या कोई सर्पके जानकार इसका उपाय खोज निकाल्नेका प्रयत्न नानू भी करेंगे? पूर्ण जानकारीकेलिए मेरे पते पर पत्र - व्यवहार किया जा सकता है ।— शिवनन्दन क्लिनिक वेलरा ज ' वाया नगोपा, मुजफ्फरनगर ब्रह्मा के चंद्र. के. कौशिक कार्तिके देखा पाठको! सर्पके १७ वर्षसे बराबर काटनेकी सत्य घटना; इसे. पोड़ेब आप क्या बतायेंगे? जा रहे ( १२ ) क्या पुराणोंमें श्राई प्रार्थना ' मूकं करोति वाचालं ' ग्रादिकी गा अद्भुत चमत्कारकी बातें गप्प हैं? हमारे पुराणोंमें जब देवमन्दिरोंमें जाकर प्रार्थना करने की बातें " आती हैं; और प्रार्थना द्वारा कठिन से कठिन रोगोंके दूर होने की बातें पढ़ने को मिलती हैं, तो दयानन्दी इन्हें झूठ मानते हैं । लो, सुनो प्रार्थना-बालक के अद्भुत चमत्कार की सत्य घटना । व ' हिन्दुस्तान ' दैनिक ता ० २८-१२-१९ ७० में यह घटना इस प्रकार छपी है । “ कोट्टायम, २६ प्रत्य तुतला मूक प्राणी बोले बालक गया । दिसम्बर ( यू. न्यू. ) एक गूंगी लड़की थाज यहाँ लीला - सावरि - मन्दिर में अईअप्पा ' भगवानकी पूजा करनेके बाद बोलने लगी । सातवर्षीय सुभद्रा जो जन्मसे गूंगी थी, पूजा पूर्ण होनेके बाद बोलने लगी । सुभद्रा कोट्टायम के प्राकुलम नामक स्थानके पुरुषोत्तम नामक व्यक्तिकी कन्या है ।
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६५० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) त्रिचूर जिले काटुगलूर नामक स्थानका १२ वर्षीय गूंगा लड़का नानू भी यहाँ प्रार्थना करनेके वाद बोलने लगा था । ( १३ ) शास्त्र - पुराणोंमें लाई रावणके दस. सिर, ब्रह्माके चार मुख होनेकी बात क्या गप्प है? जब हमारे पुराणोंमें राक्षसराज रावण के दस सिर और भगवान्-ब्रह्मा के चार मुख, और भगवान् दत्तात्रेयजीके तीन मुख और भगवान् कार्तिकेयजीके छः मुख होने श्रादिकी बातें श्राती हैं; दयानन्दी इन्हें गपोड़ेबाजी बताते हैं । लो सुनो प्रत्यक्ष प्रमाण; जो श्रापके सामने रखे जा रहे हैं । -गांडीव दैनिक वाराणसी ता ० २०-६-१६७० में यह घटना छपी T = - त्रिमूर्ति बालक = " काशी । शुक्रवार की शाम कबीर चौरा अस्पताल में एक ऐसा बालक लाया गया; जिसके तीन सिर हैं, जो एक - दूसरेसे जुड़े हुए हैं । बालकका मस्तक एवं उसकी प्रांखें अपेक्षाकृत विशाल हैं, किन्तु अन्य अंग साधारण एवं कमजोर हैं । लगभग ५ वर्षीय उक्त बालक तुतला कर बातें करता है; तथा बैठने, चलने - फिरने में असमर्थ हैं । बालकके गलेमें सिक्का अटक जानेके कारण कबीर चौरा अस्पताल लाया गया । ठठेरी बाजार निवासी बालकके माता - पिता उसे भगवान्की लीला समझ रहे हैं । ने कहो जी महाशयो! क्या इसे भी गप्पबाजी बताओगे? 5 ( १४ ) प्रार्थना का महत्त्व भगवान् की प्रार्थनामें बड़ा बल होता है । हमारी न्यायोचित मांग ईश्वर स्वयं पूर्ण करते हैं । उन्हें प्रत्येक की सहायताका सदैव ध्यान रहता है । ईश्वरकी सृष्टिमें हर प्रकारके जीव - जन्तु, पशु - पक्षी विद्यमान हैं । उनके लिए भिन्न - भिन्न प्रकारके भोजन तथा रक्षणकी आवश्यकता... होती है । इस असंख्य श्रोर अपरिमित जीव जगत्का रक्षण, भरण - पोषण ईश्वरके द्वारा होता रहता है । इस महती कृतिको जीवित रखनेकेलिए प्रत्येक अणु में उनकी सत्ता व्याप्त है । परमात्माका नियम है कि उनके राज्यमें कोई भूखा न रहे, प्राणीमात्र आनन्द प्राप्त करें । प्रत्येक व्यक्ति अपनी विवेक - बुद्धिके द्वारा सत् चित् श्रानन्दस्वरूप ईश्वरके अस्तित्वको पहचाने, अपनी दिव्य शक्तियोंका सदुपयोग करे । प्रार्थना वह साधन है, जो हमारे लिए ईश्वरीय सहायताका द्वार खोल देती है । यदि थोड़ा भी ध्यान दें; तो हम पद - पदपर प्रार्थनाका अद्भुत प्रभाव अनुभव कर सकते हैं । अनादिकालसे सभी देशोंके तथा सभी श्रेणियोंके व्यक्ति प्रार्थनाका महत्त्व अनुभव करते प्राये हैं । आजके बड़े - बड़े बुद्धिजीवी भी प्रार्थनाके महत्त्वको स्वीकार करते हैं । श्रीगान्धिजी प्रार्थना को ' परमात्माका भोजन ' कहते थे; और जीवनभर प्रार्थना करते रहे । उनकी सायंकालकी प्रार्थनाका इतना दृढ़ नियम था कि समय हो जानेपर वे अन्य किसी भी महत्त्व से महत्त्वपूर्ण कार्यकी भी परवा नहीं करते थे, और प्रार्थना अवश्य करते थे । उनका जीवन प्रार्थनाके विलक्षण चमत्कारोंसे भरा पड़ा है । विदेशों में भी प्रार्थनाका महत्त्व सर्वत्र स्वीकृत है । आज विज्ञानकी इतनी उन्नति होनेपर भी बहाँ लोग व्यक्तिगत रूपसे एवं सामूहिक रूपसे प्रार्थना करते हैं । स्व ० डा ० श्रीदुर्गाशङ्करजी नागरने अपने विदेश-प्रवासके अनुभव लिखते समय इङ्गलैण्डके जार्ज मूलरके जीवनकी कुछ
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६५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) घटनाद्वारा प्रमाणित किया है कि बाज भी वहाँ प्रार्थनापर लोगों का दृढ़ विश्वास है; और उससे असम्भव कार्य भी सम्भव होते देखे जाते हैं । वे लिखते हैं-" विलायत के प्रसिद्ध प्रातंसेवी जाजं मूलरने सैकड़ों अनाथालय स्थापित किये हैं, जिनका सारा खर्चा प्रार्थनापर ही चलता है । वे सहायताकेलिए कभी किसीके पास याचना करने नहीं जाते थे । कोठरी बन्द कर वे प्रभुसे ही प्रार्थना द्वारा मांग किया करते थे । जब - जब उनके सामने कोई पेचीदगी उपस्थित होती, उसी समय वे चुपचाप ईश - प्रार्थना में तन्मय हो ईश्वरीय - सान्निध्य प्राप्त करते । ईश्वर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी करता । प्रार्थना के बलपर प्रारम्भसे ही उन्हें अनाथालय चलानेकेलिए धन प्राप्त हुआ करता था । लाखों रुपये उनके पास घर बैठे ही आ जाते थे । दो करोड़से ऊपर रुपये बिना मांगे प्रार्थनाके बलसे ही मूलर-साहबको प्राप्त हुए थे । उन्हें प्रार्थनाकी शक्तिमें पूर्ण विश्वास था । " एक बार संयोग से उनके अनाथालयके दो हजार बालकोंके लिए भोजन नहीं था । विषम स्थिति थी । बच्चों की भूखको कैसे शान्त किया जाय, यह समस्या उपस्थित हो गई थी । मूलर - साहबको प्रार्थना में पूरा भरोसा था । प्रबन्धकसे बोले – “ आप अपना काम कीजिये । परोसनेकेलिए टेबल, तश्तरी और पानीका प्रबन्ध कहीं - न - कहींसे शीघ्र ही भोजन भेजनेवाले हैं । " प्रबन्धक सोचने लगा कि मूलर साहब पागल तो वह निष्क्रिय खड़ा रहा । भला, भोजन कहाँसे प्रायेगा वे अनाथालय के बालकोंको भोजन कीजिये । ईश्वर नहीं हो गये हैं! ? थोड़ी देर बाद प्रवन्धकसे उन्होंने फिर भोजनका प्रवन्ध करने का प्रादेश दिया! बच्चोंके भोजनको परोसनेका समय अब बिल्कुल निकट या गया था । उधर कहींसे भोजन के प्रनेकी सम्भावना न दीखती थी । प्रार्थनाका महत्त्व [ ९ ५३ ६५४ ] " आप अपना काम जारी रखिये । बच्चोंको भोजन परोसनेका प्रदेश दि प्रबन्ध कीजिए! " मूलर साहबने फिर दोहराया वेज दीजि सहायताकी प्रार्थना कर रहे थे । " फिर इतनेपर भी प्रबन्धकको सन्तोष न हुआ । उसने पुनः मूलर साहबके तत्काल उ ' पास आकर आग्रहपूर्वक कहा - " अब तो खानेका समय श्रा ही गया है । हवने मेज और तश्तरी इत्यादि रखी जा चुकी हैं । क्या बच्चोंको भोजनालय में तुम्हारे उ बुलानेको घंटी बजा दी जाय? " समपिता " हाँ, भोजनालय में बुलानेकी घंटी बजा दो । हमने प्रार्थना द्वारा जो - कुछ करना था, वह कर दिया है । अव शेष जिनका काम है, वे कार्य करेंगे । देखना है, यह कार्य कैसे सिद्ध होता है? " इतनेमें घंटी बजी । भोजन खानेकेलिए बालक जल्दी - जल्दी * होने लगे । भोजनालय में श्राकर सब अपने - अपने स्थानपर बैठ गये इतने में एक प्राश्चर्यजनक घटना घटी । मूलर अपना ( जहाज ) रहे थे एकत्र र्वत्र धुंध । ' महा देब्रेक नग तुरन्त ही रोटियां, सब्जी, मिठाई, पकवान तथा अन्य भोज्य पदार्थो - रहने पर * से भरी हुई एक गाड़ी अनाथालय में श्रा पहुंची । सभी अचरजमें खड़े थे । ' प्राज यह सब कैसे हो गया? इतने बड़े परिमाण में भोजन कहाँसे श्रा पहुंचा था वह किसने भिजवाया था? ते हुए ईश्वरके अपना उद्देश्य पूर्ण करनेके अलग उपाय होते हैं । उन्हें ' हम · पता रहता हैं कि कब किसकी सहायता कैसे करनी है । र साह बात हुई कि किसी बड़े अमीरने उसी दिन अपने मित्रोंको एक ' वह - बड़ा भोज देनेका आयोजन किया था, और एक प्रसिद्ध होटलमें भोजन ' आओ ' पकवाया था; किन्तु एकाएक किसी कारणवश उसे उस दिन वह दावत डूबने मा स्थगित करनी पड़ी थी । उस मनुष्यको दिव्य भगवत्प्रेरणा हुई कि यह सब पका हुआ भोजन सड़ जायगा । इसलिए उसने होटल के मैनेजरको ' आप ते हैं । "
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८३ [ ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) I प्रादेश दिया- " आप इस सब भोजनको मूलर साहबके व्य देव दीजिये | अनाथालय के बालकोंके अनाथालय में काम ना जायगा । ” फिर क्या था; सब बच्चोंने खुशीसे भरपेट भोजन पाया । प्रार्थनाका काल उत्तर मिलने की इस घटनापर सबको बड़ा श्राश्चर्य है । पावने प्रार्थना से उठकर प्रबन्धकको बुलाया हुआ । मूलर-, और उसे चेतावनी दी— यमें तुम्हारे - जैसे व्यक्तिकी हमें आवश्यकता नहीं है, जिसे उस महादानी, समपिता परमेश्वरपर घण्टे भरकेलिए भी विश्वास नहीं है । " जो मूलर साहबके जीवनकी एक और घटना है । एक बार वे जलयान मना ( जहाज ) में बैठकर कहीं ' ईश्वर - प्रार्थना से लाभ ' बिषयपर व्याख्यान देने ग रहे थे । संयोगसे मार्गमें बड़े जोरोंका तूफान और कुहरा पड़ा । कत्र तंत्र धुंध छाई हुई थी, और रास्ता विल्कुल नहीं दीखता था । ' महाशय! मुझे शनिवार के दिन पहली तारीखको सायंकालसे पूर्व विवेक नगरे अवश्य पहुंचकर ईश- प्रार्थनापर भाषण देना है । ' मूलर-थ- सबने पानीके जहाज के कप्तानसे कहा । थे । ' प्राज मौसम बड़ा खतरनाक है । देखो, कैसा कुहरा पड़ रहा है ।-जिका तूफान में जाना असम्भव दीखता है! ' कप्तानने दुःख प्रकट हुए उत्तर दिया । उन्हें ' हम एक उपाय कर सकते हैं । उससे मुसीबतें दूर हो जायंगी । " तर साहबने ढाढ़स बंधाया । एक ' वह क्या है? ' कप्तानने जिज्ञासा प्रकट की । जन' प्राग्रो, ईश्वर - प्रार्थना करें कि यह विपत्ति दूर I मूलर वित वने मार्ग सुझाया | यह रको ' आप किस पागलखानेसे आये हैं, जो इस प्रकारकी अनहोनी बातें हैं । ' प्रार्थना का महत्त्व [ १५५ ' मैंने प्रार्थना की है, और मुझे ईश्वरीय गुप्त सहायतामें विश्वास है । मैं श्रनन्त - सामर्थ्यो र प्रसीम विभूतियोंके स्वामी ईश्वरको अपना सहायक मानता हूँ । इस संसार में सर्वत्र उन्हींका वैभव हो तो फैला हुमा है । जो इतने शक्तिशाली पिताके पुत्र हैं, वह निस्सहाय होने की बात क्योंकर सोचें? ईश्वरको अपनेसे श्रसम्बद्ध माननेसे ही निराशा आती है । मैं सत्तावन वर्षसे अपने प्रभुसे गुप्त दिव्य - सहायता पा रहा हूं, और अभी तक मेरी प्रार्थना के अचूक उत्तर मिले हैं । मेरी दृष्टि उस परम प्रभुकी घोर है, जो जीवनकी प्रत्येक स्थितिपर शासन करता है । डेकपर जाओ; देखो, कुहरा उतर रहा है । ईश्वरकी सहायता के कारण मौसम अनुकूल होता जा रहा है । ' कप्तान केबिनसे बाहर गया । श्राश्चयंसे उसने देखा कि सचमुच कुहरा दूर होने लगा था । लगता था, जल्दी ही वह मौसम अनुकूल हो जायगा । कप्तान इस सीधे - साधे भोले - भक्तको प्रार्थना प्रभावको देखकर चकित हो गया । वैसा ही हुआ! ईश्वरकी प्रार्थनाके बलसे कुहरा दूर हुआ; और मूलर क्वेवेक ठीक उसी समय पहुंचे, जब उनका वहाँ पहुंचना आवश्यक था । जार्ज मूलर ६४ वर्ष जीवित रहे । जन्मसे ही वे दुर्बल - शरीर थे । फिर भी सत्तर वर्षकी उम्र के बाद भी सारे विश्वमें भ्रमण कर ईश्वर-वादका प्रचार करते रहे । जो - जो प्रेरणाएं प्रार्थना के समय होती थीं, उन्हीं के अनुसार वे अपना कार्यक्रम जारी रखते थे । इस घटना में कोई अतिशयोक्ति नहीं है । अनेक व्यक्तियोंके जीवन में ऐसी अजीब घटनाएं घटती रही हैं । लोगोंको अनेक प्रकारकी परेशानियों-से मुक्ति ईश्वरीय - प्रार्थना के बलपर मिली है । विश्वकी इतनी बड़ी
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६५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रचना में जो चेतन समाया है, वह कितना समर्थ है - यह बात ऐसी घटनाओंसे स्पष्ट हो जाती है । पं ० शिवदत्त शर्माने अपने एक परिचितका उल्लेख किया है । एक बार उनकी पुत्री प्रत्यन्त बीमार पड़ी; और क्रमशः मरणासन्न दशा में पहुंच गयी । जब उन्होंने समस्त युक्तियां निष्फल देखीं, तब वे सबको छोड़कर अपने घरकी तीसरी मंजिलपर भगवान्के मन्दिरमें उनकी मूर्ति-के सामने जाकर रोने लगे । आकाशमें ईश्वरको हाथ जोड़कर पृथ्वी की ओर मुंह कर साष्टाङ्ग झुक गये । फिर अत्यन्त दीन - भावसे प्रार्थना की-' हे नाथ! मेरे तो समस्त सांसारिक प्रयत्न, सम्पूर्ण प्राशाएं अब निष्फल हो चुकी हैं । अब मैं सहायता और शक्तिकेलिए आपके शरण आया हूँ । आपकी कृपासे सब आधि - व्याधि दूर होती हैं । अब इस बालिकाकी प्राणरक्षा आपके ही हाथ । प्रभो! अपने इस भक्तको ' ओर निहारिये; और बच्चीको जीवन - दान दीजिये । ' पूरे विश्वासी और एकनिष्ठ हो वे सच्चिदानन्द - परमात्माकी पूर्ण अनुभूति करते रहे । अपने अश्रु - बिन्दुनोंसे हृदय स्थित प्रभुके मानस-मूर्तिके चरण पखारते रहे । उनके प्राश्चर्यका ठिकाना न रहा, जब वहांसे नीचे उतरकर उन्होंने देखा कि लड़की क्रमशः चेतना - लाभ कर रही है । ईश्वरीय शक्तिके प्रभावसे उसका रोग और पीड़ा बहुत कम - हो गई है; और स्वस्थ हो रही है । इस प्रकार अनेक आस्थावान् व्यक्तियोंने शारीरिक, मानसिक और - स्वास्थ्य सम्बन्धी कठिनाइयोंको प्रार्थनाके बलसे दूर किया है । रोगीको बिना देखे प्रार्थनाकी शक्तिसे इलाज किया जाता है । विपत्ति, चिन्ता, भय, बीमारी, दरिद्रता, हानि, बेकारी आदि सब संकटकालीन परिस्थितियों में प्रार्थनाद्वारा श्रदृष्ट शक्ति मिलती रही है । प्रार्थना का महत्त्व [ ९ ५७ ६५८ निश्चय जानिये, प्रार्थना वह पुष्ट प्राध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो पीड़ित उत्तेजित और विक्षुब्ध मनको ठण्डा करती है; और उसे सन्तुलित और पतिके सन्तुष्ट करती है । हमारी सन्ध्याके मन्त्र प्रार्थनारूप ही तो हैं! अग्नि में प्रार्थना मनुष्यके दैवीगुणोंका विकास करती है, उन्नति और जाती सफलताके अभिनव मार्ग खोलती है । यह यह हाड़ - मांसका मानव कहलानेवाला पुतला हमारे गुप्त मनसे सो पति संचालित होता है । प्रार्थना हमारे गुप्त मनको दैवी शक्तिसे जोड़ देती स्त्री भ हैं । हम कठिनाइयोंसे डटकर मुकाबला करनेकी शक्तिको विकसित करते सो वि हैं । यह हमारे सोये हुए श्रात्म - विश्वासको जाग्रत् कर देती है । हम भमें अपने आपको कमजोर माननेके वजाय ईश्वरको अपने साथ रक्षकके पुरुष आ रूपमें मानने लगते हैं । इस प्रकार प्रार्थना हमें नयी हिम्मत और ग्रात्म-- वह व्रत बल देती है । हमारी विषम परिस्थितियाँ बदलकर उपयोगी बन जाती प्रतिका हैं । ( श्रीरा.च. महेन्द्र एम. ए. ' कल्याण ' ) । है; वा ( वेदमन्त्रों की महत्ता भी इसी प्रार्थनामें है । वेद मन्त्रराज है । देखिये उपासनाकाण्ड भी वेदमें सन्निविष्ट होनेसे उन मन्त्रों में प्रार्थनाएं अनुस्यूत होती हैं । बुद्धिकी प्रार्थनारूप सावित्री - मन्त्र वेदमें इसीलिए ही तो सुप्रसिद्ध इति है । उसमें बुद्धिकी प्रार्थना होनेसे ' सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम् ' के भूतपूर्व अनुसार उससे लौकिक सभी सुव्यवहार सिद्ध होते हैं । पर उसमें प्रार्थक रामदल चाहिये - वेदका अधिकारी ' द्विज ', तथा पूर्ण भक्त ) । [ ' प्रालोक ' - प्रणेता ] विद्यानि मारस्वते विपये त ( पृ. ८५६ की पूर्ति ) ' पत्युरनुव्रता ' मन्त्रमें पतिका अनुव्रतस्व ' पतिव्रत ' धर्म है, जिसका लक्षण ' आर्ता, मुदिता - हृष्टे प्रोषिते - मलिनाम्बरा । मृते पय विशेद् अग्नि सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता ' ( कार्तिक माहात्म्य ७।३७ ) ( पतिके
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५७ ६५८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जो पीडित होनेपर जो पीड़ित रहे, पतिके प्रसन्न होनेपर जो प्रसन्न और पति के परदेस होनेपर जो साधारण कपड़ोंमें रहे, पतिके मर जानेपर रहे जो । प्रग्निमें वा पतिकी विरहाग्निमें जलती रहे; वह स्त्री पतिव्रता कही र जाती है । ) यही पतिव्रत ' पत्युरनुव्रता भूत्वा ' इस वेदमन्त्र में भी विवक्षित है । मनसे तो पतिका अनुव्रतत्व यह नहीं है कि पति यदि वेदका अध्येता है; तो देती स्त्री भी वेदाध्येत्री हो । पतिव्रत विवाहके समय लेना पड़ता है । करते सो विवाह के समय में पतिका वेदारम्भ नहीं होता कि- विवाहा-रम्भमें पतिकी अनुव्रता स्त्री भी उस हम कके पुरुष आठ वर्षकी अवस्था में वेदारम्भ त्म-. वह व्रत नहीं ले सकती; क्योंकि तब जाती ' पतिका अनुव्रतत्व ' आर्तार्ते मुदिता ' के है; वादीके अनुसार वेद पढ़ने में नहीं देखिये । है । स्थूत समय वेदारम्भ जारी करे । जब करता है, तब भी लड़की उसका वह उसका पति नहीं होता । सो अनुसार पतित्रत - धर्म अपनाने में । शेष ८५६-८५७ पृष्ठ पं. १० में सिद्ध इति श्रीगौरीदेवी - गर्भजेन, श्रीपं ० शीतलल, लशर्म से तुपाल तनुजनुषा, ' के भूतपूर्व मुलतानस्थ- सनातनधर्मसंस्कृत - कालेजाध्यक्षेण, इदानों देहलीस्थ-र्थक मदल संस्कृत महाविद्यालयतः कार्यनिवृत्तेन, विद्यावागीश -विद्याभूषण-ता ) विद्यानिधि विद्यावाचस्पतिप्रभृति - पदभाजा श्रीदीनानाथशमं शास्त्रि-नारस्त्रतेन प्रणीते ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थे स्त्री - शूद्रयोर्वेदानधिकार-पये तृतीयपुष्पस्य द्वितीय संस्करणं सम्पूर्णम् ॥ सका विशेद् पति ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाकापरिचय । ( इसे अवश्य पढ़िये ) विद्यावागीश श्री दीनानाथशास्त्री - सारस्वत ( प्रिंसिपल श्री सनातनधर्म-महाविद्यालय, फस्टं वी. १६, लाजपतनगर ( नई दिल्ली -२४ ) द्वारा प्रगीत ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ संस्कृत में १० हजार पृष्ठोंमें लिखित है । यह हिन्दुधर्मके प्राचीन वेद, दर्शनादि साहित्यार्णवको मयकर लिखा गया है, अतः वह हिन्दुधर्मका विश्वकोष एवं स.व.का महाभारत वा कल्पवृक्ष सिद्ध हो सकता है । इसकी ग्रन्थमाला हिन्दीमें छप रही है । इसे १००० ) रु ० देकर इसके सरक्षक बनें, आपका चित्र छपेना, आपका नाम प्रत्येक-प्रकाशनमें छपेगा । अथवा ५०० ) देकर इसके ' सम्मान्य- सहायक ' वा २५० ) देकर ' मान्य सहायक ' बनिये, आपके पास ग्रन्यमाला पहुंचती रहेगी । अथवा न्यूनसे न्यून १०० ) देकर इसके साधारण सहायक बनिये । इस प्रकार आपके सहयोगसे ' प्रालोक ' -ग्रन्थमाला शीघ्र प्रकाशित होकर भ्रान्त - जनोंकी धार्मिक - शंकाओंको दूर करनेवाली सिद्ध हो सकेगी । अब तक इसके १० पुष्प छप चुके हैं । ११ वाँ पुष्प छप रहा है । ५२८ पृष्ठ उसके छप चुके हैं । विद्वानों एवं गुणज्ञोंने इस ग्रन्थमालाकी भूरि - भूरि प्रशंसा की है । आप भी स्वयं इस ग्रन्थमालाको खरीदें, तथा दूसरों को भी इसके मंगानेके लिए प्रेरित करें । सभी शंकाएं मिटेंगी । आप शीघ्रतासे इसकी सहायतार्थ उद्यत हों । इनसे हिन्दु जातिको धार्मिक नवजीवन प्राप्त होगा । आज ही ग्रन्थकारके नामसे आप सहायता- द्रव्य शीघ्र ही भेजना शुरू कर दें । जो महोदय स्थायि ग्राहकताका शुल्क १० ) दस रुपये पूर्व जना करायेंगे, उन्हें सब पुष्प पौने मूल्य में दिये जाएंगे । १-२ पुष्प - ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) आजकल ' नमस्ते ' शब्दका प्रचार संस्कृतानभिज - जनता में बहुत हो गया हैं; और इसके प्रचारक इसका वैदिक होने का दावा करते हैं । हमने इसमें ' नमस्ते ' विषय पर विस्तीर्ण विवार दिया है । ' नमस्ते ' विषयक ट्रैक्ट में जितने मिल सके उनपर हमने मालोचना भी कर दी है । प्रारम्भमें उक्त महाग्रन्यकी सम्पूर्ण-
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