सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 61–70
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के T:, T. नी ६६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रूप ब्रह्मचर्यका निरूपण है, तथा एक - आध अन्य मन्त्रमें भी । शेष सभी मन्त्रोंमें ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' उपस्थसंयम ' ही है । उक्त मन्त्रमें ' ब्रह्मचारिणं ' यह पुंलिङ्गान्त है, स्त्रोलिङ्गान्त नहीं; तब इससे स्त्रियोंका उपनयन नहीं हो सकता है । जव उपनयन ही नहीं; तब स्त्रीका वेदाधिकार कैसा? यहाँ जातिपक्षसे ' ब्रह्मचारिणम् ' से ' ब्रह्मचारिणी ' लड़कीका ग्रहण वेदको इष्ट होता, तब ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( प्र. ११५१८ ) में ' कन्या के पृथक् ग्रहणकी श्रावश्यकता नहीं थी । यदि पृथक् ग्रहण किया गया है; तो स्पष्ट है कि - ' ब्रह्मचारिणं ' से यहाँ ' ब्रह्मचारिणी ' इष्ट नहीं । उक्त मन्त्रमें ' ब्रह्मचारिणं ' में पुंलिङ्ग विवक्षित है, अविवक्षित नहीं । कन्या वाले मन्त्रमें ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ भी पृथक् ग्रहणवश पूर्ववाले मन्त्र से भिन्न है; नहीं तो अलग मन्त्रकी आवश्यकता नहीं थी । सो यहाँ : ' कन्या के ब्रह्मचर्य ' से उसका ' उपस्थनिग्रह ' अर्थ इष्ट है, वेदाध्ययन वा ण ट उपनयन अर्थ नहीं । तभी तो ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इस मन्त्रके उत्तरार्धमें घोड़े - वेलके ब्रह्मचयंसे उपमित किया गया है । घोड़े वेलके ' ब्रह्मचर्य में ' वेदाध्ययन ' अर्थका संघटन नहीं हो सकता है, किन्तु ' उपस्थसंयम ' का ही । इस अर्थ में भी मुख्य अर्थ ' शुक्रनिग्रह ' का ही होता है । स्त्रीमें तो शुक्र होता ही नहीं; तव उसका निग्रह कैसा? अतः उसमें ' ब्रह्मचर्य ' का ' वेदाध्ययन ' अर्थ भी नहीं । इसपर गत निबन्धमें स्पष्टता हो चुकी है । तब मन्त्रभागको पुरुषोंका ही ब्रह्मचर्य उपनयनपूर्वक वेदाध्ययन तथा शुक्रनिग्रह इष्ट है । स्त्रियोंका वेदाध्ययन नहीं । तभी वेदने ' ब्रह्मचारी एति समिधा समिद्धः काष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः ' ( अथर्व ११ । ५० ६ ) यह शब्द कहकर वेदाध्ययन - रूप ब्रह्मचर्यं पुरुषके लिए बताया है, स्त्रीके-लिए नहीं । उक्त मन्त्रमें ' दीर्घश्मश्रुः ' तथा ' ब्रह्मचारी ' यह दो पद स्त्रियोंके ' दीर्घदमधु ' की स्पष्टता [ ६७ वेदाधिकारको खण्डित करते हैं । वह ऐसे कि स्त्री में पुरुषत्व न होनेके कारण शुक्र न होनेसे स्त्री ' ब्रह्मचारी ' भी नहीं; और ' दीर्घश्मश्रु ' भी नहीं । ' श्मश्रु ' ( दाढी - मूछें ) शुक्र वालों की होती हैं, शुक्रहीनोंकी नहीं । तब स्त्री तथा नपुंसकोंके शुक्रहीन एवं दाढ़ी - मूंछहीन होनेसे वास्तविक ब्रह्मचर्यं न होनेसे उनकी प्रान्तरिक अपूर्णताके कारण वेदके श्राभ्यन्तरिक स्वर आदिके उच्चारणकी अविकल शक्ति न होनेसे ' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा ' के अनुसार वह मन्त्रोच्चारण हानिप्रद सिद्ध हो जाता है । प्रतः स्त्रीको मन्त्रभागका प्रोत्सगिक अधिकार इष्ट नहीं । यद्यपि पुरुष होनेसे शुक्रकी सत्तावश फिर शूद्रको वेदाधिकार प्रसक्त होता है; तथापि ' वेद- माता '... द्विजानाम् ' ( प्रथर्व. १६७१।१ ) में ' द्विज ' पद आनेसे ' अद्विज ' शूद्रादिका निषेध हो जाता है । ( ख ) प्रश्न – कोई पुरुष वा स्त्री पूर्ण प्रायु प्राप्त होकर शुक्रहीन नहीं होते । पुरुषमें जो ' शुक्र ' होता है, वही स्त्रीमें ' रज ' होता है । श्रथवा स्त्रीको शुक्रहीन माना भी जावे; तब ५-८ वर्षके द्विज बालकको जब वेदका उपदेश होता है, उस समय उस बच्चे में १४ वर्षसे पूर्व शुक्रोदय नहीं होता; तव ५-८ वर्षके द्विज बालकको वेदोपदेश कैसा? वेदमन्त्रोंका शुद्ध उच्चारण तो द्विज वा श्रद्विज सभी स्त्री - पुरुषोंके लिए है । केवल स्त्री - शूद्रोंकेलिए नहीं । इस प्रकारके कर्मकाण्डी पण्डित भी दीखते हैं, जिनका उच्चारण भ्रष्ट होता है, उन्हें वेदमन्त्र देनेका कोई विरोध नहीं करता; तत्र स्त्री - शूद्रोंके वेदके अपूर्णोच्चारणमें उन्हें वेदका निरोध क्यों? ( उत्तर ) स्त्री तो युवति होकर भी शुक्रहीन हो रहती है । उसमें ' शुक्र नामक वस्तु होती ही नहीं । तभी तो दो स्त्रिके संयोगमें भी हड्डी-दिसे रहित की उत्पत्ति प्रायुर्वेदके ग्रन्थ, सुश्रुत प्रादिमें लिखी है । दो : शुक्रोंसे कभी उत्पत्ति होती भी नहीं, किन्तु शुक्र शोणितके योगसे
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६८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ही उत्पत्ति होती है । जब पुरुषमें भी शुक्र है; और स्त्रीमें भी यदि शुक्र है; तब दोनोंके संयोगमें उत्पत्ति ही कैसे हो सकती है; अतः स्पष्ट है कि - स्त्रीमें शुक्र होता ही नहीं । तभी कृष्णयजुर्वेद में स्त्रियोंको ' निरिन्द्रिय ' ( निर्वीर्य ) कहा गया है-' तस्मात् स्त्रियो निरिन्द्रियाः ' ( तै.सं. ६ | शा २ ) । मनुस्मृति में भी कहा है - ' निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियः ' ( ६।१८ ) । इसी प्रकार महाभारत में भी है । ' इन्द्रिय ' का अर्थ यहाँ ' शुक्र ' है । उसमें ' पुनर्मा एतु ' इन्द्रियम् ' ( अथवं. ७।६७।१ ) यह मन्त्र ज्ञापक है । देखो मनुस्मृति ( २।१८ १ ) । स्त्री में शुक्र न होनेसे ही उसके मुखपर दाढ़ी मूछें नहीं आतीं । तव वादीका यह कथन कि- ' जो पुरुषमें शुक्र है; वही स्त्रीमें रज है ' यह बात कट गई । शुक्र ' सोम्य ' होता है, और रज ' आग्नेय ' । तव इनके धर्मभेदसे भी इनकी एकता कट गई । ' अयमेव भेदो भेदहेतुर्वा, यद् विरुद्धधर्मा-ध्यास: कारणभेदश्च ' । यदि शुक्र शोणित दोनों ही शुक्र धातु हैं; तब स्त्रीके दाढ़ी मूंछ - भी क्यों नहीं होते? जबकि - अथर्व में ब्रह्मचारीकेलिए ' ब्रह्मचारी एति समिधा समिद्धः काष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः ' ( ११२५/६ ) आया है । इस मन्त्रमें स्थित ' ब्रह्मचारी ' का प्राशय ' शुक्रनिरोधक ' है । स्त्रीका रज यदि ' शुक्र ' है; तब क्या वह उसका निरोध कर सकती है? बल्कि १२ वर्षोंके बाद उसका रज प्रतिमास स्रुत होता रहता है । तब वह ' ब्रह्मचारी ' नहीं । शुक्र होनेसे पुरुषमें पूर्णता होती है, वह वेदके सभी स्वरोंका उच्चारण कर सकता है । स्त्रीमें शुक्र न होनेसे उसमें अपूर्णता होती है । तब वह वेदके सभी स्वरोंका ठीक - ठीक उच्चारण नहीं कर पाती । श्रतः उसे वेदका प्रोत्सगिक - अधिकार भी नहीं दिया गया । तब ब्रह्मचर्याश्रममूलक उपनयन - वेदादिमें स्त्रीका प्रोत्सर्गिक अधिकार नहीं होता । स्त्रीके ' रज ' को ' पुष्प ' कहा जाता है; वह प्रकट होकर प्रकृतिका ' दीर्घश्मश्रु ' की स्पष्टता ६६ इङ्गित प्रकट करता है कि अब इस पुष्पमें ' फल ' लगना चाहिये । यह प्रकृतिका इङ्गित है कि रजके प्राकट्यसे पूर्व उसका विवाह करो फिर फल - सन्ततिमें बाधा न डालो । तब यह प्रकृतिका इङ्गित इसमें । उसका उपस्थसंयममें न होकर उस संयमको पतिद्वारा समाप्त करने है । विद्यामें स्त्रीकी बहुत प्रवृत्तिसे स्त्रीकी हानि ही सम्भावित में है, यह हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं । निष्कर्ष यह है कि पिताके थोड़े शुक्रसे, माताके अधिक रजसे कन्या का शरीर बनता है । शुक्र सप्तम धातु हैं, और रज तृतीय । इस कारण रज शुक्रको अपेक्षा निर्बल होता है । शुक्रसे हड्डी आदि कठोर तथा शरीरको सबलता करनेवाले अवयव बनते हैं । कन्याके शरीरमें प्रस्थि आदि शरीरको दृढ करनेवाले श्रवयवोंकी गोणता होती है, रजोमूलक कोमल पदार्थोंकी प्रधानता होती है । इसलिए कन्या पुरुषकी अपेक्षा निर्बल स्वभाव सिद्ध होती है । इसलिए वेद में भी स्त्रियोंको अबला कहा गया है ( ऋ. ५ | ३० | १ ९ ) । तब उसका प्रबल-परिश्रमसे साध्य वेदवेदाङ्गादिमें जिसमें भरद्वाज आदि ऋषियोंको भी अन्य कई शतकोंकी श्रायु मांगनी पड़ी थी, उसमें प्रवृत्त कराना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं है । इसलिए ही ' स्त्रिया अशास्यं मनः, उतो ग्रह ऋतु ं रघुम् ' ( ऋ.८ ३३।१७ ) इस मन्त्रका अर्थ करते हुए सुधारक श्रीपाददामोदर सातवलेकर ने अपने ‘ ऋग्वेदके सुवोधभाष्य ' में ' मेधातिथि ऋषिके दर्शन ' ( पृ. ७२ ) में अर्थ करते हुए कहा है- ' स्त्रियोंके मनको संयममें रखना कठिन है । • स्त्रियोंके मनपर काबू करना अशक्य है । स्त्रियोंके कर्म छोटे होते हैं । उन [ स्त्रियों ] का सामर्थ्य कम होता है । उनकी बुद्धि छोटी होती है ' । जिस वैचारीने गर्भ धारण करना है, प्रसवके कष्टोंको उठाना है, घरके सब काम - धन्धोंको करना है; उसीको फिर असिधारा - व्रतके समान वेदवेदाङ्गादिमें नियुक्त करना - यह उसपर अत्याचार करना है । उनके
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६६ ७० ] । सो करो । इसमें स्वास्थ्यपर श्राघात इस विषय में स्पष्टता नेमें ( ग ) पूर्वपक्ष -श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) करना है । उनके मस्तिष्कको हानि पहुंचाना है । अन्यत्र की गई है । ब्रह्मचारी एति... दीर्घश्मश्रुः ' ( प्र. ११५६ ) इस यह मन्त्रमें आपने ' दीर्घश्मश्रुः ' का अर्थ ' दाढ़ी - मूंछवाला ' अर्थ करके इस लिङ्गसे पुरुषका ही ब्रह्मचर्य ( वेदाधिकार ) सिद्ध किया है । स्त्रियोंके कन्या दाढ़ी - मूंछें न होनेसे उक्त लिङ्गसे उन्हें वेदाध्ययन निषिद्ध किया है । कारण पर यह ठीक नहीं । वेदमें रूढि शब्द नहीं होते, इसलिए ' श्मश्रु ' शब्दका तथा ' लोम ' अर्थ है, ' दाढ़ी - मूंछ ' प्रर्थं नहीं । इस कारण निरुक्तमें भी कहा गया है - ' इम- शरीरम् । श्मश्रु लोम, श्मनि ( शरीरे ) श्रितं भवति ' " ( ३।५।२ ) तव स्त्री में भी लोमोंकी सत्ता होनेसे वह भी ' दीर्घश्मश्रु ' सिद्ध लिए हो गई; और उसका उपनयन एवं वेदाधिकार सिद्ध हो गया । उत्तरपक्ष - यह वेदमें केवल यौगिकतावादी एक दयानन्दीकी सम्भावित शङ्का है । इसपर यह जानना चाहिये कि यद्यपि निरुक्तमें ' श्मश्रु ' शब्दका लोम अर्थं किया गया है; तथापि ' श्मश्रु ' शब्द वेदादि-माना सभी शास्त्रों में ' पुरुषके मुख वा चिवुकके लोमों ' केलिए प्रयुक्त होता है । स्त्रीके लोमोंकेलिए ' श्मश्रु ' शब्दका प्रयोग कहीं भी नहीं हुआ करता । ८ । तब ' श्मश्रु ' शब्द व्युत्पत्तिमान् होता हुआ भी योगरूढ है - ' श्मनि मुख -शरीरे श्रितम् ' यह उसका विग्रह है । जाँघ वा शिरमें स्थित लोमोंका कर कहीं भी ' श्मश्रु ' शब्दसे ग्रहण नहीं देखा गया है । इसलिए विधवाके शिरोमुण्डनपर वेद में ' विकेशी ' ( अथवं. ११ || ७ ) शब्द तो श्राया है-' विश्मश्रुः ' शब्द कहीं नहीं श्राया । जव तक पूर्वपक्षी जांघ वा सिरके । बालोंका नाम वेदोंमें ' ' श्मश्रु ' शब्दसे न दिखला दे; तब तक उसका पक्ष प्रसिद्ध ही रहेगा । है, ज्ञान इसलिए पूर्वपक्षीके स्वामी दयानन्दजीने संस्कारविधिमें ' दीर्घश्मश्रुः ' नके उक्त मन्त्रके अर्थ करनेके अवसरपर ( ६८ पृष्ठमें ) ' दीर्घश्मश्रुः ' का ' चालीस वर्षतक दाढ़ी - मूंछ श्रादि पञ्च केशोंका धारण करनेवाला ' दीर्घ ' की स्पष्टता [ ७१ ब्रह्मचारी होता है ' यह लिखा है । वहीं स्त्रीका ग्रहण असम्भव ही है । ४० वर्ष तक स्त्री केश रखे, और फिर उन्हें मुण्डवा दे - यह सम्भव नहीं । फिर उसके दस वर्ष रजोधर्मके बचेंगे, उस समय उसके विवाहका कुछ लाभ भी नहीं । स्वामी भी उसकेलिए २४ वर्ष रख गये हैं । सो ४० वर्षतक स्वा.द.के अनुसार स्त्री ' दीर्घश्मश्रु ' न होनेसे उसका वेदाध्ययना-धिकार सिद्ध न हुआ । इससे यह भी सिद्ध हुआ कि वेदोंमें शब्द केवल यौगिक नहीं, योगरूढ भी होते हैं । इसलिए अथर्ववेद गोपथब्राह्मणमें भी लिखा है- ' पुमांसः श्मश्रुवन्तः, अश्मश्रुवः स्त्रिय: ' ( ११३३७ ) । ( पुरुष श्मश्रुवाले होते हैं; स्त्रियां मश्रु वाली नहीं होतीं । ) इसलिए प्रार्थसमाजके सञ्चालक स्वा.द.जीने भी अपने ' उणादिकोश ' में ' इमधु ' के लिए लिखा है- ' श्मनि मुखे श्रयतीति, श्मश्रु - पुरुष मुखरोमणि ' ( ५।२६ ) श्मश्रुका मुखमें होना बताकर वादीके पक्षको काट दिया है । वादितोषन्यायसे ' श्मश्रु ' शब्दका ' शरीराश्रितलोम ' अर्थ भी माना जावे; फिर भी उससे वेदको स्त्रीका ग्रहण इष्ट नहीं, किन्तु पुरुष का ही ग्रहण इष्ट है, क्योंकि वेदमें ' दीर्घश्मश्रु ' शब्द आया है; सो ' दीर्घलोमा ' पुरुष ही होता है, स्त्री नहीं । उसके तो सारे शरीरमें पुरुषकी भांति लोम नहीं होते । उसके मुख, चिवुक भागमें केश होते ही नहीं । छाती पर भी उसके केश नहीं होते, कान आदि पर भी नहीं होते । जहां होते हैं, वहाँ तनु लोम ही होते हैं, दीर्घ केश नहीं होते । इस कारण वादीकी इष्ट-सिद्धि नहीं; तब उक्त स्थल में पुरुषका ग्रहण इष्ट होनेसे वादीका स्त्री-वेदाधिकार तथा उपनयनपक्ष निराकृत हो गया । वास्तव में वेदको भी ' श्मश्रु ' से ' मुखलोम ' ही इष्ट है । इसलिए यजुर्वेद - माध्यंसं. में एक मन्त्र आया है— ' आत्मनुपस्थे न कस्य लोम, मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम । केशा न शीर्षन् यशसे श्रियै शिखा, सि हस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि ' ( यजुः १२१६२ ) इस मन्त्रमें मुख-
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७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लोमोंको वेदमें स्पष्ट ही ' श्मश्रु ' कहा है । इसलिए यजुः - महीधरभाष्यमें भी लिखा है- ' श्मश्रूणि मुखलोमानि ' । आर्यसमाजी श्रीग्रार्यमुनिजीने भी अपने ' मीमांसायं भाष्य ' ( ३२८४ ) में ' मृता वा त्वक् प्रमेध्या यत् - केशश्मश्रु ' । इस श्रुतिको उद्धृत करके ' केश ' और ' श्मश्रु ' को पृथक् - पृथक् वताया है । तब ' श्मश्रु ' का ' केश-सामान्य ' अर्थं निरस्त हो गया । इसलिए ' लाट्यायन श्रौतसूत्र ' में ' श्मश्रूणि वापयेत्, न केशान् ' ( ६२।२१ ) यहाँपर ' श्मश्रु ' का ' केश ' से पृथक् ग्रहण किया है । इस प्रकार ' श्मश्रु प्रवपति शुन्धि मुखम् ( १।२१०११४ ) ' मानवगृह्य-सूत्र ' के इस सूत्र में भी ' श्मश्रु ' की सत्ता मुखमें ही बताई हैं । इसी तरह ' श्मश्रूणि अग्र वापयते, अथ केशान, अथ लोमानि ' ( हिरण्यकेशिगृ. ३1 ९ ) में भी ' श्मधु ' केश वा लोमोंसे पृथक् कहे गये हैं । इसी भांति ' वपसि केश - श्मधु ' ( अथर्व. = २।१ ९ ) में भी ' मधु ' का केशोंसे पार्थक्य बताया है । ' केश- श्मश्रु - लोमनखानि -इत्युक्तं पुरस्तात् ' ( ४ | ११ | ६ ) इस आश्व लायनगृ. में जिसे स्वा.द.ने भी ' अन्त्येष्टि ' ( पृ. २८६ ) में उद्धृत किया है । केश श्मश्रु आदिको पृथक् - पृथक् कहा गया है । इसलिए अथर्ववेद-गोपथब्रा. में भी ‘ श्मश्रुका सम्बन्ध पुरुषोंसे कहा गया है, स्त्रियोंसे नहीं— ‘ पुमांसः - श्मश्रुवन्तः अश्मश्रुवः स्त्रियः ' ( १।३।७ ) तव ' दीर्घश्मश्रुः ' ( अथवं. ११।५।६ ) इस वेदके लिङ्गसे स्त्रीका उपनयन तथा वेदका अधिकार कट गया । ( ३ ) वेदकी ऋषिकाएं । पूर्वपक्ष- ' बृहद्देवता ' ( २६४-६६ ) के अनुसार गोधा, विश्ववारा घोषा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, रोमशा, सूर्या, ब्रह्मजाया, जुहू, प्रदिति, वदक ऋषिकाए ७३ इन्द्राणी, सरमा, उर्वशी, लोपामुद्रा, यमी, रात्रि, इत्यादि शतश: ऋषि, काएं वैदिककालमें हुई, जो ऋ. १०११३४, ५१२८, १० ३६, ४०. ८ ११, १०,८५,१०१४०, १०/१५१, १०८६, १०६५, १०/१०७, ५२६, १०।१०६, १।१७६, १०/१५४ १० १५२. १०११८६ सूक्तोंकी ऋषिका हैं, जो ब्रह्मवादिनी नामसे कही जाती हैं । इनकी उपस्थिति में किसी भी विद्वान्को यह साहन नहीं हो सकता कि स्त्रियों को वेदाध्ययन वा का अधिकार नहीं, यह कह सके? ( सार्वदेशिक जून १ ९ ४६ ) । उत्तरपक्ष — यह प्रश्न बड़े - बड़े विद्वानोंको भी मोह में डाले हुए है । इस पर यह जानना चाहिए कि ऋषि मनुष्यसे भिन्न एक योनिविशेष है । जैसे कि – ' मनुष्य - देव - ऋषि - पितृगणाः प्रजापतेर्मानसा आख्याताः ' ( प्रशस्त-पादभाष्य सृष्टिसंहार - विधिनिरूपण ) ' देवा मनुष्या, असुराः, पितर, ऋषयः ' ( अथर्वसं. १०।१०।२६ ) अथ प्रतर्पयत् चतुरः चतुर्धा देवान्, मनुष्यान्, असुरान् उत ऋषीन् ' ( अ. दाहा २४ ) ‘ [ मनुष्य - जातिः | न पशूनुद्दिश्य श्रेयसी, देवान्, ऋषींश्च अधिकृत्य न ' ( योगदर्शन व्यासभाष्य प ४ | ३३ ) शाङ्खायनगृ. ( ६ | ६ | १२४४ ), मनुस्मृति ( ११३६ ) ऐतरेय. इ ब्राह्मण ( ६।१,७१३ ) शतपथ ( १४/४/२/२१ ) ' मनुष्या वा ऋषिषु उत्क्रामत्सु ' ( निरु. १३।१२ ) ऋषीणां ' देवतानां च मानुषाणां च सर्वशः । पृथिव्यां सहवासोभूद् रामे राज्ञि प्रशासति ' [ महा. द्रोणपर्व ५६।१२ ] त ह इत्यादि बहुतसे प्रमाणों में ऋषि मनुष्य - भिन्न योनि सिद्ध होते हैं । आर्य- ऋ समाजी श्रीभगवद्दत्तजीने ' भारतवर्षका वृहद् इतिहास प्रथम भाग [ १४० उ पृष्ठकी टिप्पणी में ] लिखा है- ' देव, ऋषि और मनुष्यका भेद न समझ क कर पं ० शिवशंकर काव्यतीर्थने अपने उपनिषद् - भाष्यके उपोद्घातमें ' सहस्रसंवत्सर ' ( मी. ६।७।१३ ) इस सूत्रका अधूरा अर्थ किया है; और हैं ऋषियोंकी श्रायु भी मनुष्यवत् सीमित करनेकी भूल की है " । क क इससे ऋषियोंकी मनुष्योंसे भिन्नता सिद्ध होती है । ऋषि वा ऋषिका त भिन्न योनि होनेसे प्रयोनिज होते हैं । वैशेषिक दर्शनके प्रशस्तपादभाष्यमें आ
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७४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ऋषि. कहा गया है - ' तत्र अयोनिजम् अनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देव ऋषीणां शरीर धर्म - सहितेभ्योऽणुभ्यो जायते ' ( द्रव्यग्रन्थ, पृथिवी - निरूपण ) यहाँ देवता पिका एवं ऋषियोंके शरीरकी मनुष्योंके शरीरसे विलक्षणता तथा अयोनिजता नी भी दिखलाकर ऋषियोंकी मनुष्योंसे भिन्नता बताई गई है । -यापन इससे ऋषि एक प्रकारके अवतार सिद्ध होते हैं । जैसेकि श्रीकृष्णा-वतार आदि अभौतिक दिव्य शरीर वाले थे, और वे मनुष्योंके घर भी है । हुए । ' ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञे च मानुषाणाम् ' ( १८४/२ ) यहाँ भी है । ऋषियों और मनुष्योंका पृथक् - पृथक् ग्रहण होनेसे दोनोंका परस्पर भेद शस्त स्पष्ट है । नतरः, ऋषियोंका अयोनिजत्व देखिये - विश्वामित्र ऋषिकी उत्पत्ति चरुसे दिवान हुई थी । वसिष्ठ ब्रह्मा के मानसपुत्र थे । अगस्त्यने लोपामुद्रा ऋषिकाको पतिः । अपनी तपस्याद्वारा अयोनिज ही उत्पन्न किया था यह महाभारतके वन-भाष्य पर्व ९ ६ अध्यायमें स्पष्ट है | अगस्त्य तथा वसिष्ठ भी विना स्त्रीके तरेय- शोणितके योगसे उर्वशीसे मानसिक उत्पन्न हुए । सूर्या - यमी आदि ऋषिपु ऋषिकाएं देवता हैं, सो वह भी प्रयोनिज सिद्ध हैं । यह मानुषी नहीं हैं । वंशः । तब अयोनिज ऋषिकानोंके दृष्टान्तसे मानुषियोंको वेदाधिकार सिद्ध नहीं [ १२ ] हो सकता । वादी भी वेद मन्त्रोंको नियत मानते हैं, इस प्रकार उनके आर्य- ऋषि ऋषिका भी नियत हैं, उनसे भिन्न अन्य नहीं हो सकते । कहीं १४० उनका नाम भेद लेखकोंके भ्रमसे, भिन्न निर्माताके मतभेदसे, श्रथवा समझ कल्पभेदवश वा नामान्तर होनेके कारणसे हुआ है । उत्सर्गके अपवाद भी घातमें हुआ करते हैं । उनमें ऋषिकाएं तो अत्यन्त न्यून हैं, अगुलि - गणनीय और हैं । इन ऋषिकाओंने वेद पढ़े नहीं, किन्तु बिना ही श्रध्ययनके, उनको कई मन्त्र [ न कि सारा वेद ] अतर्कित ही स्वयं प्रतिभात हो गए, जैसे पिका कि- निरुक्त ( २।११।१ ) के भाष्यमें श्रीदुर्गाचार्यने लिखा है - ' अनधीतमेव नाष्य में तत्त्वतो ददृशुः ' । इससे सर्वसाधारण - स्त्रियोंका सम्पूर्ण - वेदाध्ययनमें अधिकार कैसे सिद्ध हो सकता है? वेदक ऋषिकाएं [ ७५ संक्षिप्त निष्कर्ष यह है कि ऋषिकाएं विशेष मन्त्रोंकी द्रष्ट्री हुआ करती हैं । न तो उन्होंने उन मन्त्रोंका गुरुमुखसे क्रमिक विधिपूर्वक अध्ययन ही किया है, न उन्होंने उन मन्त्रोंकी रचना ही की । उनको तो एक - प्राध मन्त्र अतर्कित ही प्रतिभातमात्र हो जाते हैं, उन्हें इसके लिए पढ़ने - लिखनेका परिश्रम विना किये ही वे मन्त्र स्फुरितमात्र हो जाते हैं । जैसे कि श्रीवाल्मीकिको निषाद द्वारा कौञ्च मारनेके समय ' मा नियाद! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ' यह कविता स्वयं ही स्फुरित हो गई । थी । अथवा जैसे कि कइयों को सुश्रुत चरकानुसार भूतोन्माद हो जाया करता है, वे श्रुत - पूर्व कई संस्कृत श्लोकों को बोलने लग जाया करते हैं । जैसेकि - ' चरक - संहिता ' के चिकित्सित स्थानमें इसका लक्षण कहा है— ' अमर्त्यवाग् - विक्रमवीर्य - चेष्टा - ज्ञानादि विज्ञानबलादिभियः । उन्मादकालोऽ-नियतश्च यस्य भूतोत्यमुन्मादमुदाहरेत् तम् ' ( ६।१५ ) ' बद्धाबद्ध प्रभाषिण... पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ' ( 81-५ ) ' वेदमन्त्रशास्त्रोदाहरणैः... ब्रह्मराक्षसो-न्मत्तं विद्यात् ' ( ६२५ ) यहाँ पर भूतावेश में पुरुयको श्रमर्त्यवाणी तथा वेदमन्त्र बोलनेवाला कहा है । हमारे लाजपतनगरमें ३-४-६२ को सिर हिला हिला कर वेदमन्त्र वोलनेवाला एक पुरुष प्राया था । उसका मन्त्रोंका उच्चारण कुछ प्रस्पष्ट था; और वे मन्त्र प्रायः वर्तमान वेदोंमें भी नहीं मिलते थे । उसे प्राय-समाजके श्रीसुरेन्द्रशर्मा गौर, शृङ्गी ऋषिकी ग्रात्मा वा श्रवतार मानते हैं । यह उन्होंने ' वैदिकधर्म ' पत्रमें लिखा था । हम यह नहीं कहते कि वह सचमुच ऋषि था । हाँ, ऋषियों का भी यही तरीका था कि उनके मुखसे अनायास वेदमन्त्र जो पहले लुप्त थे - निकल पड़ते थे । चाहे वे मनुष्ययोनि-प्रावित थे; अथवा पशु - पक्षियोनिमें थे । इसी प्रकार ' सुश्रुत संहिता ' के उत्तरतन्त्रमें भी कहा है- ' गुह्यानागत-विज्ञानम् अनवस्थाऽसहिष्णुता । क्रिया वाऽमानुषी यस्मिन् स - ग्रहः परिकीर्त्यते ' ( ६।४ ) यहाँ पर गुह्य और अनागत पदार्थोंका ज्ञान हो जाना
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७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) और श्रमानुषिककर्मता, विशेष - ग्रहगृहीतता में बताई गई है । इसमें कोई पढ़ने - लिखनेकी आवश्यकता नहीं रहती । जैसे कि वह सिर हिला - हिला-कर मन्त्र बोलने वाला आर्यसमाजी पुरुष पढ़ा - लिखा हुआ नहीं है । इसी भूतविद्याके बलसे कई मीडियम बनने वाली स्त्रियोंके मुखसे परोक्ष- बहुत दूर ठहरे हुए लोगोंकी बातचीत निकल रही होती है, और दूरके दृश्यका वर्णन किया जा रहा होता है । वहाँ चित्र भी या जाता है । [ ख ] अथवा जैसे सन्त ज्ञानेश्वर द्वारा सिर पर हाथ रखे जानेसे एक भैसा ' सहस्रीशीर्षा पुरुषः ' आदि मन्त्र बोल उठा, यह उसके जीवन चरित्र में प्रसिद्ध है, और टाकी सिनेमाओं में दिखाया भी जाता है [ ग ] अथवा जैसे हिपनोटिज़म श्रादि विद्याओं में किसी पुरुष वा स्त्रीको बेहोश करके काले कपड़ेसे ढककर सुला दिया जाता है । उस तमाशेको दिखलाने वाला द्रष्टानोंको कहता है कि — जो प्रश्न पूछना है, मेरे कानमें कह दो, तो यह-बेहोश उस प्रश्नको भी सुना देगा, और उसका उत्तर भी दे देगा, वैसा ही यह प्राजकल प्रत्यक्ष भी है । वहाँ यह बेहोश उस प्रश्नको सुन नहीं रहा होता, पर उसका नायक उस प्रश्नको सुनता है, वह उस सोए हुए में स्वय संक्रांत हो जाता है, सोये हुएको सुननेके परिश्रमकी आवश्यकता नहीं रहती । वही सोया हुग्रा - जिसका मुख काले कपड़ेसे ढका हुआ होता है; वह वहाँसे जा रहे हुए मोटरका नम्बर भी बता देता है । वहाँसे गुज़र रहे हुए टांगेकी सवारियोंकी संख्या भी बता रहा होता है । ( घ ) प्रथवा कई लड़कियाँ ऐसी देखी - सुनी जाती हैं, जो पिछले जन्म का अपना वृत्त बताती हैं, गत जन्ममें उन्होंने कहीं धन गाड़ा हो, उसको इस जन्ममें बता देती हैं, गत जन्मके अब तक विद्यमान संबंधियोंको पहचान भी लेती हैं, वही लड़कियाँ गत जन्ममें यदि वेद पाठी ब्राह्मण रही हों, तो विलक्षण- कर्मवश गत जन्मके स्मृत वेदमन्त्रोंको बिना वेद पढ़े भी बोल सकती हैं । इस विषयमें रामायण - महाभारतादिमें वेदवतीका इतिहास देखा जा सकता है, हम इस पर प्रागे लिखेंगे । [ ङ ] अथवा गर्भा -वदक ऋषिकाए [ ७७ वस्थामें अर्जुनके बताये हुए चक्रव्यूहके प्रवेशको जिस प्रकार श्रभिमन्युने सीख लिया, वड़े होनेपर बिना सीसे भी उसे वह ज्ञान रह गया था । उस चक्रव्यूहसे निर्गमनके प्रकारको वह सुभद्राको नींद या जानेके कारण गर्भावस्थामें न सुन सका था इसलिए बड़ी आयु में युद्धावसरमें वह ' उसमें फेल हो जानेसे मारा गया । यदि इसी प्रकार गर्भमें कोई विलक्षण संस्कारोपेत लड़की हो, पुनः पुनः अपने पिताके बोले हुए वेदमन्त्रको गर्भावस्था में सुमनेसे उसके संस्कार उसमें प्ररूढ हो जावें, और उत्पन्न होकर फिर ज्ञानावस्था में उन मन्त्रों को अपने संस्कारवश बिना पढ़े - लिखे स्वयं बोल उठे । [ च ] अथवा - जिस प्रकार जादूगर अपने जादूसे ही कोई बात किसी जड़ वस्तुसे भी कहला दे, वैसे ही ऋषिकायोंको वा ब्रह्मवादिनियों को वेदमन्त्र अतर्कित प्रतिभात हो जानेकी बात भी याद रख लेनी चाहिये | इन बातोंसे न तो यह सिद्ध होता है कि सन्त ज्ञानेश्वरका भैंसा वेद पढ़ा - लिखा था, न उस अपवादसे अन्य भैसों का भी वेदमें अधिकार हो जाता है । ऋग्वेद ( ८1६७/५ ) का सूक्त जाल में बच्चे मत्स्योंके मुखसे निकल पड़ा था, अतएव उसके वही ऋषि माने गये । जैसेकि निरुक्तकार-ने लिखा है - ' जीवान्नो अभिवेतन - मत्स्यानां जालमापन्नानामेतद् प्रा वेदयन्ते ' ( नि.६।२७।१ ) यही वात ' आर्षानुक्रमणी ' में ' जालेन नद्धा बहवो हि मत्स्याः ' ( ८२६ ) तथा ' बृहद् देवता ' ( ६।८ ९ - ९ ० ) में कही गई है । प्रार्यसमाजके वैदिक यन्त्रालय अजमेरकी छपी मूल ' ऋग्वेद-संहिता ' के ४५४ पृष्ठमें भी ' बहवो वा मत्स्या जाल वद्धा ऋषय: ' लिखी गई हैं । इससे न उन मछलियोंका वेद पढ़ना सिद्ध हो जाता है, न इससे अन्य मत्स्यों का वेदमें अधिकार होता है । इसी प्रकार ' सरमा ' नामकी शुनी भी ऋ. १०।१०८।२-४ आदि मन्त्रोंकी द्रष्टी मानी गई है, निरुक्त [ ११।२५।१ ] में श्रीयास्क तथा ' ऐतरेयालोचन ' ' सरमा दिव्यगुणोपेता, अतस्तन्नामिका सुशिक्षिता कुक्कुरी ' [ पृ. ३१ ] श्रीसामश्रमी भी यह मान
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७७ ७८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न्युने उस गये हैं, तो क्या उस कुतियाका वेद पढ़ना माना जायगा? कभी नहीं । रण आजकल कई वैल, कहे हुए पुरुषके पास पहुंच जाते हैं । किसीके वह जेबमें इत्रकी शीशी हो, उसके पास जाकर ठहर जाते हैं; केवल उन क्षण को ऋषियोंकी भान्ति बोल नहीं सकते । पर ऋषियोंमें अलौकिक शक्तिवश वे बोल भी सकते थे । जैसे कि - शृङ्गी पक्षिणीके चार ऋषि लड़के -पन्न जरितर आदि बोल सकते थे- यह हम आगे बनावेंगे । केवल यहाँ यह जाना जाता है कि किसी देवताकी प्रेरणाविशेषसे, बिना भी वेद पढ़े किसी विशिष्ट दिव्य, श्रारूढपतित वा संस्कारी पशु-वा पक्षी वा मनुष्य के मुखसे अनायास मन्त्र निकल पड़ा करते हैं । इसी रख दिव्यतावश उसे ' ऋषि ' कहा जाता है । वे ऋषि साधारण मनुष्य वा लौकिक पशु - पक्षियोंसे विलक्षण माने जाया करते हैं, उनके दृष्टान्तसे वेद सर्वसाधारणका वेदमें अधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । ‘ ताण्ड्य - महान्राह्मण ' ( १३।३।२४ । १ - ३ ) तथा ' मनुस्मृति ' ( २।१५१-खसे १५२ ) में आङ्गिरस लघुवयस्क शिशुकी मन्त्रदर्शनकी कथा आती है । र- उसने उन मन्त्रोंको देखा, जिन्हें उनके पिता - पितृव्य आदि भी नहीं जानते थे, और वे उन्हें पढ़नेकेलिए शिशुके पास गये । वह उन वृद्धोंको भी द्वा ' पुत्रो! ' ऐसा पढ़ाने के समय कहता था, पर इस उदाहरणसे लघु - शिशुओं कही का वेदमन्त्रमें अधिकार नहीं हो जाता । विद- इस प्रकार वैदिक ऋषिकाओं के मुखसे भी स्वयं विना ही उनकी खी इच्छा या अध्ययनके कई मन्त्र प्रकट हो गये । इससे अन्य ( अनृषि ) ससे स्त्रियोंका वेदमन्त्रोंमें अधिकार थोड़े ही हो जायगा । आर्यसमाजके मान्य की ' श्रीप्रिय रत्न - श्रार्षजी तो ' वेदमें इतिहास नहीं ' इस अपनी पुस्तकके ४२, क्त ४३, ४५, ४६, ४८, ६१ प्रादि पृष्ठों में भी वैदिक ऋषिकानोंको मनुष्य-ता, व्यक्ति - विशेष न मानकर आकाशीय पदार्थ मानते हैं । उनमें प्राय: देवता नान होनेसे यह बात सम्भव भी है । उनके एक - दो उद्धरण वादियोंके दर्शनार्थं उद्धृत किये जाते हैं-वेदक ऋषिकाएं [ 08 ' मन्त्रोंके ऋषि क्वचित् नदी ( ऋ. ३१३३२४ ) पर्वत ( ८११२२३ ). सूर्यकी चक्षु ( २०११५८१४ ), कूमं ( यजुः ३३५१ ) मत्स्य ( ऋ. ८६७ | ६ ) शंख ( २०११५/७ ) कपोत १०११६५८ ), श्येन २०११ ), ऋषभ ( ३ | १३ | ४ ) हैं, क्या ये पदार्थ भी कभी मन्त्रोंके कर्ता हो सकते हैं? ( पृ. ९ ) उपर्युक्त हेतुत्रोंसे यह समझमें या सकता है कि - सम्बन्धोंके कारण वैदिक ऋषिकाओंको मनुष्योंका वाचक व्रताना सर्वथा अनुचित है ' ( पृ. २६ ) ' मन्त्रों में छन्द ' देवता, ऋषि भी नित्य [ पदार्थ ] हैं ' ( पृ. ४२ ) इत्यादि । श्राशा है प्रार्यसमाजी लोग अपने मान्य महोदयका अपमान न करेंगे । फलतः इन ऋषिकाओंके दृष्टान्तसे मानुषी स्त्रियोंका वेदाधिकार सिद्ध न हो सका क्योंकि - ऋषिकाएं तो बहुत थोड़ी सी हैं, अतः अपवाद हैं । विशेष बात यह है कि इन ऋषिकाओंको सम्पूर्ण वेद प्रतिभात न होकर एक - दो मन्त्र ही अतर्कित स्फुरित हुए, तभी इन ऋषिकाओंके दृष्टान्तका बड़े संरम्भसे देते हुए प्रायं समाजियोंके नेता स्वा.द.जीने चार ऋषि - पुरुषोंमें ही एक - एक वेदका श्रवतरण माना है । यहाँ यह याद रखना चाहिए कि इन चारोंमें उनके अनुसार परमात्माने न तो एक भी शूद्र रखा, न ही एक भी स्त्री रखी । इसीलिए स्वा.द. द्वारा कोई नवीन-विनष्ट मन्त्र समाधिद्वारा न देखे जानेसे हम उन्हें ऋषि नहीं मानते । केवल ये ही क्या, पाणिनि, पतञ्जलि, यास्क आदिको भी हम इसी कारण ' ऋषि ' नहीं कहते । तव परमात्माकी दृष्टिमें भी स्त्री - शूद्रको वेदाधिकार देना - यह वादियोंका पक्ष प्रयुक्तं सिद्ध हुआ । तब एक - दो मन्त्रोंकी दर्शिका ' गुलिगणनीय ऋषिकाओंके दृष्टान्तसे सर्वसाधारण- स्त्रियोंका सम्पूर्ण वेदमें श्रमिक एवं वैध अधिकार जैसे कि मनुजीने कहा है - ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २१७३ ) सिद्ध न हो सका, यह विज्ञ पाठकोंने सम्यक्तया समझ लिया होगा । और इससे भ्रान्त पूर्वपक्षियोंका भ्रम हट गया होगा ।
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05 | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( ४ ) हारीतवचन, यमवचन, गोभिल - वचनपर विचार । इन्हीं ब्रह्मवादिनियोंके विषय में हारीत स्मृति में लिखा ( क ) पूर्वपक्ष- वेदाध्ययनं स्वगृहे भिक्षा-है - तत्र ब्रह्मवादिनीनामुपनयनम् अग्नीन्धनं प्रार्यमर्यादाके चर्येति । इस प्रकार ' यमस्मृति ' में भी प्राचीनकालकी उल्लेखके अवसरमें कहा है- ' पुराकल्पे कुमारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते । अध्यापन च वेदानां सावित्री - वाचनं तथा ' । अर्थात् प्राचीन शास्त्र - विधिके कुमारियोंका उपनयन तथा वेदाध्ययन था । यह वचन श्राजकलके धनुसार हारीतस्मृति तथा यमस्मृतिसे उड़ा दिये हैं, तथापि ' पराशर-पंडितोंने माघवीय ' ( प्राचारकाण्ड १, प्र. २ पृ. ८२ ) में उद्धृत किये गये हैं । इसलिए वेदमें भी ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ( ऋ. १०।१३६।४ ) ब्रह्मज्ञान - सम्पन्न विदुषीका ' उपनीता ' यह विशेषण आया है । केवल ब्रह्म-वादिनियोंका ही उपनधन नहीं, अपितु ' सद्योवधू ' नामकी साधारण स्त्री-का उपनयन भी हारीतने माना है- ' सद्योवधूनां तु उपस्थिते विवाहकाले कथञ्चिदुपनयनमात्रं कृत्वा विवाहः कायः ' । इससे सिद्ध होता है कि-सभी स्त्रियोंका उपनयन संस्कार होता था । ( ख ) हारीत -संहितामें यह भी कहा है- ' नहि शूद्रसमाः स्त्रियः, नहि शूद्रयोनौ ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्या जायन्ते । तस्मात् छन्दसा स्त्रियः संस्कार्याः ' ( २११२३ ) अर्थात् स्त्रियाँ शुद्रोंके समान नहीं, शूद्रोंकें गर्भसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य उत्पन्न नहीं होते । इसलिए स्त्रियोंके सब संस्कार वेदमन्त्र सहित होने चाहियें ( सार्वदेशिक जुलाई १ ९ ४६ ) । इसलिए गोभिल-गृह्यसूत्रमें वधूकेलिए ' यज्ञोपवीतिनीम् ' ( २।१।१६ ) यह विशेषण दिया है । उसका घुरन्धर विद्वान् श्रीसत्यव्रतसामधमीने ' यज्ञोपवीतयुताम् ' यज्ञोपवीत-वाली यह अर्थ किया है । यह अर्थ बिल्कुल सरल है । म.म. पं. शिवदत्तजीने भी सिद्धान्तकौमुदीकी तथा जैमिनि न्यायमालाकी टिप्पणीमें इस सूत्रका यही अर्थ माना है । उसका ' यज्ञोपवीतवत् कृतोत्तरीयाम् ' यह कइयोंसे किया जाता हुआ प्रर्थं खींचातानीका है । ' पारस्करगृह्यसूत्र ' के समय हारीतकी ब्रह्मवादिनिया [ ८१ वैदिक - मर्यादाका कुछ लोप हो गया था, इसलिए उसमें ' स्त्रिय उपनीता अनुपनीताश्च ' यह लेख सन् १ ९ ३६ के ' सिद्धविनायक काशी के छपे संस्करण पृ. ८४ में मिलता है, इससे स्पष्ट है कि उस समय आर्य- स्त्रियों का-उपनयन होता था, ( एक सिद्धान्तालंकार ) ( सार्वदेशिक जून. १ ९ ४६ ) ।. उत्तरपक्ष—– हम इस पूर्वपक्षका भिन्न - भिन्न शीर्षकोंसे उत्तर देंगे । वादीके दिये हुए ब्रह्मवादिनीके हारीतप्रोक्त वचनसे सर्वसाधारण - स्त्रियोंकी वेदादि - पठनकी सिद्धि कभी हो नहीं सकती । ब्रह्मवादिनी वे ऋषिकाएं, नियत थोड़ी - सी स्त्रियाँ होती हैं, जो वैदिक कालकी हैं, जिन्हें कल्पारम्भमें थोड़े - से मन्त्र स्फुरित हुए थे - यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । यह हारीत-वचन उन्हीं से सम्बन्ध रखता है, सर्वसाधारण स्त्रियोंसे नहीं । वादी सिद्धान्तालंकार के ( ' सार्वदेशिक ' जून १ ९ ४६ पृष्ठ १६२ स्तम्भ १ पं. १०-११ ) में यही शब्द हैं-- इन्हीं ब्रह्मवादिनी ( घोषा ग्रादि वैदिककालो-त्पन्न ऋषिका ) स्त्रियों के विषय में हारीत - स्मृति में लिखा है । ' यह वचन ' हारीतस्मृति में तो है नहीं; क्योंकि उसमें गद्यकी शैली ही नहीं, न उसमें ऐसा प्रकरण है, तब ' पण्डितों द्वारा उसमेंसे यह वचन उड़ा लेना ' ऐसा वादीका आक्षेप अन्याय्य हैं । हाँ, कोई ' हारीत - धर्मसूत्र ' पृथक् रहा हो, यह अन्य बात है । वादीको उक्त वचन ' पराशरमाधवीय'-मैं मिला है, वादीने देखा होगा कि वहाँ पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष किये गये हैं । [ पू. ] ' ननु ' असंस्कृतायाः कन्यायाः कुतो लोकास्तवानघे ' ( महा. शल्यपर्व ५१।१२ ) इति वचने विवाहरहिताया उत्तमलोकाभाव उक्तः, सोऽनुपपन्नः, विवाहरहितानामपि ब्रह्मवादिनीनाम् उपनयनाध्यापनादिभिरुत्तमलोक-सम्भवात् । अतएव हारीतेनोक्तम् ' द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवध्वश्च ' इत्यादि, [ उतरपक्षः ] मैवम् - तस्य ( हारीत - वचनस्य ) कपान्तरविषयत्वात् । तथाच यमः - ' पुरा कल्पे [ कल्पारम्भे ] कुमारीणाम् इत्यादि । स ० ध ० ६
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८२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) T इस पूर्व और उत्तरपक्षसे सिद्ध होता है कि हारीनको ' ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ सारी श्रायु अविवाहित होकर रहें यह इष्ट है । इससे विरुद्ध चलने वाली कई अपवाद स्त्रियां भी हो सकती हैं, जिनका ' पति ' कहा गया हो, अथवा वह उनका विवाहित - पति न हो, किन्तु ' रक्षक ' हो, जैस कि- म.म. पं ० शिवदत्तजीने ब्रह्मवादिनियोंके विपयमें ' श्रार्यविद्यासुधाकर ' के ८४ पृष्ठकी टिप्पणी में कहा है- ' पतिरेको गुरुः स्त्रीणाम् ' इत्यत्रोपात्तः पतिः शब्दो रक्षक पर एव न पाणिग्राहपरः, ब्रह्मवादिनीनां पाणिग्राहस्य असम्भवात् 1... ब्रह्मवादिनीनां पितृगोत्रप्रवर - वेद - शाखानामेव यावज्जीव सत्त्वात् ( यतः सा यावज्जीवं विवाहं न करोति ) । सर्वायु कुमारी ब्रह्म-वादिनियोंकी ही प्रतिद्वन्द्वितामें हारीतने दूसरा भेद ' सद्योवधू ' रखा है । सद्योवधूका अर्थ है ' जिनका विवाह होना हो ' । तव जव हारीतके मतमें ब्रह्मवादिनियोंका सारी श्रायु विवाह ही नहीं होता, अन्यथा उस [ पराशर-माघवीय ] का ' ननु असंस्कृतायाः ' इत्यादि प्रश्न ही व्यर्थ है । आर्यसमाजी विद्वान् श्रीनरदेव शास्त्रीजीने भी हारीतके मतका अनुवाद करते हुए लिखा है- ' स्मृति ग्रन्थोंको देखनेसे दो प्रकारकी स्त्रियोंके विधान हैं— सद्योवधू वह जिनका उपनयन संस्कार विवाह - संस्कारके साथ ही हो । ब्रह्मवादिनी वह जिनका बाल्यावस्थामें ही यज्ञोपवीत हो, और जो श्रामरण - ब्रह्मचर्य व्रतमें स्थित ( अविवाहित ही ) रहें । ( श्रयंसमाजका इतिहास प्रथम भाग ११८ पृष्ठ ) । ' पुरा कल्पे कुमारीणाम् ' इस यम-वचनका ' कुमारी ' शब्द भी ब्रह्मवादिनियोंका कौमार्य ही बताता है । वादीने भी अपनी ' भारतीय समाज शास्त्र ' ( प्र.सं. ) पुस्तकके १८५ पृष्ठमें लिखा है - ' ब्रह्मवादिनियोंको नैष्ठिक ब्रह्मचारिणी और कौमारब्रह्म-चारिणीके नामसे भी पुकारा गया है; जिससे मालूम होता है कि वे जीवन-भर ब्रह्मचर्य - पूर्वक रहती हुई आध्यात्मिक विद्यायोंके पढ़ने - पढ़ाने और प्रचार करनेमें अपना समय लगाती थीं । म.म. शिवदत्तजीकी सम्मति पहले लिखी ही जा चुकी है । इनके सदाके ब्रह्मचर्यका रहस्य श्रागे देखिये । ब्रह्मवादिनियाँ स्त्रियाँ [ ८३ जब ऐसा है, तो ' ब्रह्मवादिनी ' बनना सर्वसाधारण स्त्रियोंका विषय न रहा, यह एक विरल अपवाद ही बना; क्योंकि करोड़ों में भी कोई एक ही स्त्री कदाचित् निकले, जो विवाह न करे । वादीके स्वामी दयानन्दजी भी लिखते हैं- " यह बड़ा कठिन काम है कि जो कामके वेगको थामके ( मरण - पर्यन्त ) इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना " ( स.प्र. ३ समु. पृ. २६ ) । श्रीनगरकी ' श्री ' पत्रिका ( १११ अङ्क ५ पृ., १ ९ -२० ) में उक्त वादीने भी लिखा है - " सर्वाभिर्महिलाभिरामरणं ब्रह्मचयं तं धारयितुं न शक्यते " । तब वह विरली स्त्री विवाह न करती हुई ब्रह्मवादिनी हो - यह भी सम्भव नहीं; क्योंकि - ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं की संख्या वादीके मतमें भी नियत है; और वादीने उनको वैदिककालमें ही माना है । जैसे कि-श्रार्यसमाजी श्रीराजाराम शास्त्रीजीने भी ' निरुक्त ' की टीकामें लिखा है-' जिन्होंने धर्मका साक्षात्कार किया था, ऐसे ऋषि मन्त्रकालमें हुए हैं । ( १।२० पृ. ७७ ) अब वेद - ( मन्त्र - ) काल नहीं है; वेद अन्तहित भी नहीं हैं, किन्तु कल्पकी श्रादिमें प्रकट हो चुके हैं । यह भी हम पूर्व कह चुके हैं कि ब्रह्मवादिनियों को बिना ही अध्ययनके स्वयं ही वेदके कई मन्त्र प्रतिभात हो जाते हैं, और वे प्रारूढ पतिता होती हैं । प्रारूढपतिताका यह भाव है कि जैसे महातपस्वी भरत मुनि मृगके प्रेममें आकर अपनी तपस्यामें विघ्न कर बैठे, और मर कर मृग जा बने, फिर भी वे पूर्व - जन्म-को जानते और उस योनिमें भी ज्ञानी थे । तब वे जड़ - भरत बने, इस. प्रकार कोई पुण्यात्मा ऋषि कारणवश योगभ्रष्ट होकर स्त्री जा बने, पूर्वजातिम्भर होनेसे ' ब्रह्म स्वयम्भु अभ्यानयंत्, तद् ऋषीणामृषित्वम् ' ( निरु. २१११११ ) उसे पूर्व जन्मका ब्रह्मवाद स्मृत हो जाता है । तब इस प्रकारकी घटना कादाचित्क एवं क्वाचित्क होनेसे उत्सगं ( सामान्य - शास्त्र ) नहीं हो सकती, किन्तु ' अपवाद ' ही रहेगी । तब इससे अन्य स्त्रियोंकी वेदाधिकार वा वेदाध्ययनकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
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८४ ] श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) तभी तो इन्हीं ब्रह्मवादिनियोंके विषयमें सायण - माधवने कहा है-' मैवम्, तस्य कल्पान्तरविषयत्वात् ' अर्थात् यह बात श्राजकलकी नहीं है, किन्तु किसी कल्पके प्रारम्भकी बात है । यह ठीक भी है । जब वेदमन्त्र नियत हैं, उनकी ऋषिकाएं ( ब्रह्मवादिनियाँ ) भी नियत हैं, तब आजकल अन्य ब्रह्मवादिनियां कहाँसे आ जाएंगी? क्या वादी वेदों को प्रपूर्ण मानता है? यदि नहीं; तब पूर्व - कल्पके अन्तमें नवीन कल्पके प्रारम्भमें उन - उन ब्रह्मवादिनी - ऋषिकाओंसे नियत - मन्त्र प्रकट हो ही चुके । उन मन्त्रोंमें उनके नाम भी आ हो चुके । अब अन्य ब्रह्मवादिनियाँ कहाँसे श्रा जाएंगी और उनकी आवश्यकता भी क्या है? क्या वादीके मतमें कई वेदमन्त्र अभी तक भी अवशिष्ट हैं, जिन्हें नूतन ब्रह्मवादिनियां छू डेंगी? वादीने ' सार्वदेशिक ' के उसी अङ्क ( १६२ पृ. १ स्तं. ε पं. ) में उन-ऋषिकाओंको ' वैदिक काल में हुआ बताया है; तो क्या वह वेदाविर्भाव-काल बादीके मतमें आजकल है? यदि नहीं, वादी भी उन ऋषिकामोंको किसी कल्पकी आदिमें ही हुआ मानता है, तब उसने भी ' कल्पान्तर - विषय -त्वात् ' वाली हमारी बातको स्वयं सिद्ध कर दिया; क्योंकि वह पाश्चात्यों की तरह ' वैदिक काल ' को आजसे कई शतक पूर्व तो मानता नहीं होगा, किन्तु कमसे कम १, ६७, २६, ४६, ०७१ वर्ष पूर्व ही मानता होगा । वह काल सृष्टिका आदि प्राविर्भाव काल ही है । इसीलिए आर्यसमाजी-विद्वान् श्रीप्रियरत्न श्रार्षने ' वेदमें इतिहास नहीं इस पुस्तकमें ऋषि-ऋषिकाओंके विषयमें लिखा है- ' ऋषियोंका छ्रादि - सृष्टिमें निर्धारित होना ठीक है ' ( पृ. ४३ ) । और फिर वेद इस कल्पसे प्रारम्भ हुए हों, गत कल्पमें न हों, यह तो वादी भी नहीं मानता होगा । तब वह जब वेदोंका प्रारम्भ मानेगा, ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओंको भी उसे उसी वैदिक-कालमें मानना पड़ेगा । वैदिककाल सब समयोंका नाम नहीं होता; क्योंकि उन ऋषिकाओंका नाम प्रायः अपने - अपने मन्त्रोंमें भी आता है । तब पराशर - माधवीयकी वह बात तो ठीक हो गई कि पता नहीं, यह किस ब्रह्मवादिनियाँ स्त्रियाँ कल्पकी बात है? इसके अतिरिक्त उन ऋषिकानोंका अध्ययन भी । स्वप्रतिभात उन विशेष - मन्त्रोंका स्मरणमात्र ही है - ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' ( महाभाप्य ५।१।११५ ) इस कथनसे वेदावयव-मन्त्र भी वेद होते हैं । उपनिषत्कालमें भी वादी ब्रह्मवादिनियों को मानता है, तो क्या वह उपनिषदोंको वेद मानता है? यदि नहीं, तो वह उनको ब्रह्मवादिनी मानता है? यदि वह उपनिषद्की x गार्गी आदि तथा मन्त्रभागकी घोषा श्रादि स्त्रियोंको वैदिककालकी ब्रह्मवादिनी मानता है, तब उसने मन्त्र एवं ब्राह्मणको वेद स्वयं सिद्ध कर दिया, और वेदमें इतिहास भी मान लिया । यदि वह अपने मान्य श्रीप्रियरत्न आपकी तरह इन ऋषिकाओं को नित्य-पदार्थ मानता है, तो उस उदाहरणसे लौकिक - स्थियोंके वेदाध्यनाधिकारकी सिद्धि न हुई । जब उक्त वचन ' हारीतस्मृति ' में नहीं; और जहाँ - जहाँ मिला है; वहाँ कल्पान्तर, पुरा - कल्प अर्थात् कल्पारम्भका माना गया है, तो इससे स्पष्ट है कि - उद्धरण देनेवालोंने हारीतके वचनका पूर्वापर देख लिया था । हम भी कल्पारम्भिक उक्त वचनकी वैदिककाल- विषयता में उपपत्ति दे हो चुके हैं । तब इस वचनकी सार्वकालिकता न हुई । पराशरमाधवीय-आदिके अतिरिक्त तो वादीके पास उक्त वचनकी सत्ताका कुछ भी प्रमाण नहीं, इस लिए इस समय ' कल्पके मध्यमें ' इसकी उपयोगिता भी नहीं हो सकती । × ( गार्गीने याज्ञवल्क्यसे कई प्रश्न ही पूछे, शास्त्रार्थं नहीं किया, जैसा कि वादी कहा करते हैं । मातृभाषा संस्कृत होनेसे प्रत्येक समझदार प्रश्न कर ही सकता था, इसमें आश्चर्यं कुछ नहीं । तभी तो याज्ञवल्क्यने उसे कहा था, अधिक न पूछ, ' मूर्धा ते विपतिष्यति ' ( तेरा माथा गिर जायगा ) ।