सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 71–80

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 71–80

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८६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न भी शब्दाः यमस्मृतिके ' पुरा - कल्प ' शब्दका भी ' कल्पारम्भ ' अर्थ ही उन सबको वयव- विवक्षित है, ' प्राचीन शास्त्रविधि ' अर्थ नहीं । स्वाद के भी अनुसार सृष्ट्यादि प्रणीत ' मनुस्मृति ' से भिन्न और कौन प्राचीन शास्त्र होगा, वह जिसका अर्थ यमस्मृतिको इष्ट हो । ' क्षात्रेण कल्पेन ' इस उत्तररामचरितके कैसे वाक्य में ' क्षात्रेण ' पदके सान्निध्य में ' अनुष्ठानप्रकाशक ग्रन्थ ' अर्थ ' कल्प ' घोषा शब्दका भले ही हो, क्योंकि वहाँ वैसा प्रकरण है, पर सब जगह ' कल्प ' एवं का वह अर्थ कैसे हो? क्या सैन्धवका यात्राके समयमें भी ' नमक ' ही अर्थ यां । होगा? ' पुरा- कल्पे ' में ' क्षात्र ' आदि विशेषण न होनेसे वह अर्थ नहीं नत्यः होता । वहाँ ' पुरा ' शब्दके सान्निध्यसे ' कल्प ' शब्दका अर्थ प्रलयकालके की बादका ' समय - विशेष ' ही है, यह स्पष्ट है । जबकि लुप्त मन्त्र ऋषि-ऋषिकाओंको समाधिमें प्रतिभात हुए थे । जैसे कि - सायणने ऋभाभू. में लिखा है - ' युगान्ते ऽन्तर्हितान् मन्त्रान् ' ( इसे धागे देखिये ) ' पुरा है; कल्पे... इष्यते ' में लिट्के स्थानमें लट्का प्रयोग आर्ष है, अथवा ' पुरि लुङ चास्मे ' ' ( पा. ३।२।१२२ ) इस सूत्र से अनद्यतन - भूतकाल में ' वसन्तीह पुरा था । छात्राः ' की तरह यहाँ भी ' पुरा ' के योगमें लट् है, अतः हमारे पक्षमें महाराणीशङ्कर ( एक आर्यसमाजी ) - प्रोक्त दोष नहीं आता । य-माण जिन पराशरमाधवीय, निर्णयसिन्धु, संस्कार - रत्नमाला, स्मृतिचन्द्रिका हो ( संस्कार काण्ड ), श्री चन्द्रकान्ततर्कालंकार, चतुर्विंशति - मतसंग्रह श्रादिसे वादीको उक्त वचन मिला है, उनका अनिष्ट अर्थ करके उसे उनको तथा उनके पीछेकी श्राजकलकी जनताको ठगना ठीक नहीं । स्वयं वादी अपने ' भारतीय समाज - शास्त्र ' ( प्र. सं. ) के १८५ पृष्ठमें ' पुरा - कल्पे ' इस यम-बश्न वचनका ' प्राचीनकाल में यह अर्थ कर चुका है । वहीं उसने गोधा, घोषा, उसे पाला आदि ऋषिकाओंको ब्रह्मवादिनी माना है, तब हमारा पक्ष सिद्ध गिर हो ही गया कि - यह कल्पारम्भका ही वर्णन है । इस अपने पूर्व- पक्ष में भी वादीने यमके इस वचनको ' प्राचीनकालको श्रार्यमर्यादाका उल्लेखक ' ( सार्व. १६२ पृ. १. स्तं. १७-१८ पृ. ) बताया है; सो वह ' प्राचीनकाल ' हारीत ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ [ ८७ वैदिक काल ही है, यहां भी वही कस्पारम्भकी बात प्रतिफलित हुई । स्मृति- चन्द्रिका कारने भी ' पुराकल्प ' का ' अर्थवाद - विशेष अर्थ खण्डित करते हुए ' तत्र प्रार्थवादिकविधेः सार्वकालिकत्वे शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात् ' कल्पान्तरे ' इत्यर्थः ' ( वीरमित्रोदय संस्का. प्रका. उपनयन प्र. ४०३ पृ. ) कल्पान्तर हो अर्थ माना है । निर्णय सिन्धुमें हारीतके वचनकेलिए दिया हुआ ' युगान्तर ' शब्द भी कल्पार्थक है, इसलिए सिद्धा. कौ. की बाल-मनोरमा टीकामें ' उपाध्याया ' पर ' युगान्तरे ब्रह्मवादिन्यः स्त्रियः सन्ति ' यहाँ भी कल्पके अर्थ में ' युगान्तरे ' शब्दका प्रयोग किया गया है, उसके कर्ताको ' पुरा युगेषु नारीणां मौञ्जी ' यह स्मृतिवचन जो मिला यह ' यमस्मृति ' का ही है, ' पुराकल्पे ' के स्थान ' पुरा - युगे ' यह पाठ उसकी पर्यायतावश ही वादीने अपने ' स्त्रीका वेदाध्ययन ' के १४२ पृष्ठमें इसका जो विरोध किया है, इसका कारण यह है कि - फिर वे इसीके पर्यायवाचक ' पुरा - कल्पे ' का स्वकल्पित अर्य नहीं निकाल सकते । यहाँ ' युग ' शब्द कल्प- वाचक है - यह पाठान्तर होनेसे तो स्पष्ट ही है, इसमें एक अन्य भी प्रमाण है— ' युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्व ' यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है, श्रीसायणने भी इसे अपने ऋग्वेद भाष्यके श्रारम्भमें ' ऋषि ' शब्द के निरूपण पर उद्धृत किया है, यहाँपर ' युगान्ते ' का अर्थ ' कल्पारम्भे ' के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं । इसी प्रकारका अन्य स्मृतिवचन भी मिलता है - ' सर्गादिसमये वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वम् ' यहाँ ' सर्गादिसमये ' शब्दसे ही प्रस्मदिष्ट ' कल्पारम्भ ' श्रर्थ प्रत्यक्ष सिद्ध हो रहा है । श्रतः स्पष्ट है कि निर्णयसिन्धु तथा यम-स्मृतिके उक्त पाठ में भी ' युग ' का अर्थ ' कल्पारम्भ ' ही है, तभी तो निर्णय-सिन्धुके ३ य परिच्छेद पूर्वभाग में ' यत्तु हारीतः... तद् युगान्तरविषयम्; ' पुराकल्पे ' इति यमोक्तेः ' यह लिखा है, तो स्पष्ट है कि - निर्णयसिन्धुका भी अपना ' युगान्तर ' शब्द ' पुरा - कल्पे ' का वाचक है; सो यह काल - विशेष-

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== } श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) हारीतकी सद्योवधुका उपनयन- विचार वाचक शब्द है - जबकि वेदोंका ऋषि ऋषिकाओं द्वारा प्राकट्य होता है । यह स्पष्ट हो गया कि कल्पान्तरमें वैसा होता है । और ' पुरा - कल्पे ' का तो स्पष्टतया वह अर्थ है हो । तब वादियोंका इसका अर्थ बदलना अपने पक्षकी दुर्बलता प्रकट करना है । यमको हमारा ही प्रथं विवक्षित है, उनका नहीं । सो जो कल्पारम्भमें हो, वह अब भी हो, यह ठीक नहीं; प्राचीनकाल में स्त्रियोंका विवाह नहीं होता था, देखिये महाभारत ( १११२२/४ ); तो फिर अब भी विवाहसंस्कारविधि हटाइये, यदि यह नहीं, तो वह भी नहीं । वादीने ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इस मन्त्रमें ' ब्रह्मचर्य ' शब्दके ' वेदाध्ययन ' अर्थकी सिद्धिकेलिए उसीके प्रमाण - स्वरूप ब्रह्मवादिनियोंका उदाहरण दिया है । इस उदाहरणसे भी उक्त मन्त्रमें ' ब्रह्मचर्य ' का ' वेदाध्ययन ' अर्थ कट गया, क्योंकि वे ब्रह्मवादिनियाँ तो हारीत आदिके अनुसार सारी आयु अविवाहित ही रहती है, पर ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्रमें तो पतिवेदन ( विवाह ) की बात है । सद्योवधुओं ( विवाहित हो रही स्त्रियों ) का वेदाध्ययन तो हारीतने कहा ही नहीं, यह वादीने भी अपने लेखमें माना है, तभी उसने अपने पूर्वपक्षमें उन्हें ' साधारण स्त्री ' माना है, तब हारीतको उसका ' उपनयन ' पतिके समीप यथाविधि नयन करके उससे उसे ' उपवस्त्र-प्राप्ति ' ही इष्ट है - यह हम आगे अर्थ यहाँ न हुआ । क्योंकि जब ही नहीं, तब उनका यज्ञोपवीत सद्योवधुनोंके विवाह प्रतिपादक वेदाध्ययन अर्थ वादीके दिये हुए यह विद्वान् पाठकोंने अनुभव ' पुरा कल्प ' वाली वह स्त्रियां ' पुरा - कल्पे कुमारीणाम् ' में उसने पाठ हो; तो वह भी जातिवाचक कहेंगे । इससे ' उपनयन ' का ' यज्ञोपवीत ' उन साधारण- स्त्रियोंको वेदका अधिकार ही क्यों और कैसे होगा? तब वादीका ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' मन्त्रमें ' ब्रह्मचर्य ' का प्रमाण और उदाहरणसे ही कट गया— कर ही लिया होगा । यमस्मृतिकों भी ' सर्वायु - अविवाहित ' ही इष्ट हैं - इसलिए ' कुमारी ' शब्द रखा है । कहीं ' नारी ' ( जातिमें नरको ङीन होता है ) होनेसे ' कुमारी ' प्रर्थमें पर्यवसित होता है । तब उन वैदिककालकी परिमित सारी आयु अविवाहित ब्रह्मवादिनियों ( ऋषिकाओं ) के यज्ञोपवीतादिसे सर्वसाधारण स्त्रियों का वह अधिकार सिद्ध न हो सका । इनके कुमारीत्वका रहस्य आगे प्रकट होगा । ( ५ ) हारीतका सद्योवधुत्रोंका उपनयन- विचार । सद्योवधुनोंको हारीतने वेदाध्ययन, अग्निहोत्र, भिक्षाचर्या श्रादिकां अधिकार तो नहीं दिया, यह पहले कहा जा चुका ही है । तब उनके ' उपनयन ' कहनेका या रहस्य है; क्योंकि - उपनयन इन्हीं ब्रह्मचर्यकी बातोंकेलिए तो दिया जाता है, इसीसे स्पष्ट हो रहा है कि - सद्योवधुओंका यहां उपनयन संस्कार इष्ट नहीं । उपनयन संस्कार सदा ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भमें ही ' अष्टक - द्वादशाब्दानि सगर्भाणि द्विजन्मनाम् । मुख्यः कालो व्रतस्यैव ह्यन्य उक्तो विपर्यये ' ( ४।१६२ ) इस ' श्री ' पत्रिकामें वादि-प्रमाणित मूल - स्मृति ' बृहत्पराशरस्मृति ' के प्रमाणसे होता है । विवाह-कालका प्रारम्भ किसी भी शास्त्रमें ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भका काल नहीं माना गया । कन्या -विवाह वादीके मतमें उत्तमरूपमें २४ वर्षमें होता है, तो क्या वह उनका यज्ञोपवीत भी ' सद्योवधूनां तु उपस्थिते विवाहकाले उपनयनमात्रं कृत्वा विवाहः कार्यः ' २४ वर्ष में करेंगे; और गुरुकुलमें भी उसे तभी भेजेंगे । तब वह विवाही जा रही हुई पतिकुलमें न जाकर गुरुकुलमें कैसे जावेगी? पतिके गृहकार्यको छोड़कर वह वेद कैसे पढ़ेगी? दूसरोंके घर भिक्षा कैसे मांगेगी? इसके अतिरिक्त वह उपनयन ही कैसा, जो वेदाध्ययन, अग्नीन्धन, गुरुकुलवासादिका अधिकार ही न देता हो? इसी कारण मीमांसा. ( ६।१।३५ ) के शावरभाष्य में कहा है- ' विद्या-( वेदा- ) ऽर्थमुपाध्यायस्य समीपमानीयते, नाऽदृष्टार्थं कुड्यं वा कर्तुम, सैषा विद्यायां पुरुष - श्रुतिः ' । तब यहाँ केवल उपनयन - सूत्रके भारसे ही क्या लाभ? इससे उपनयनका यहाँ ' यज्ञोपवीत ' अर्थ नहीं - यह स्पष्ट है,

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03 [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) किन्तु अन्य तात्पर्य है । यहाँ तात्पर्य यह है कि - सद्योवधूके विवाहकाल उपस्थित होनेपर उसका पतिके उप- समीप नयन ( वैध ले जाना ) करो । स्वा. द. जीने सं.वि. के पृ. ७८ में ' उपनयन ' का अर्थ ' उप - नाम समीप नयन अर्थात् प्राप्त करना वा होना ' यह किया है । वहाँ तो ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भ होनेमे माणवकको आचार्यके पास ले जाया जाता है, पर यहाँ तो ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भ न होनेसे उसे साक्षात् प्राचार्यके पास न ले जाकर, गृहस्थाश्रमारम्भवश ' पतिसेवा गुरौ वासः ' ( मनु. २।६७ ) ' यो मे भर्ता स मे गुरुः ' ( वाल्मी. ५ । २४१६ ) ' गुरुविप्रेष्टदेवेषु सर्वेभ्यश्च पतिर्गुरुः । विद्यादाता यथा पुंसां कुलजानां तथा प्रिय: ( पतिः ) ' ( ब्रह्मवैवर्तपु. प्रकृति-खण्ड ४२१३१ ) ' पतिर्वन्धुर्गनिर्भर्ता दैवतं गुरुरेव च । सर्वस्माच्च प: स्वामी, न गुरुः स्वामिनः परः ' ( ब्रह्मवै. श्रीकृष्ण ज.खं. ५७ । १० ) उसे गुरुसदृश पतिके समीप ले जाना पड़ता है । यही उसका उपनयन हो जाता है । उपनयन संस्कार में आचार्य उपनीत ( अपने समीप लाये गए ) शिष्य को वेदाधिकार - सूत्र बाएं कन्धेमें रखनेकेलिए देता है, परन्तु इस विवाह-संस्कारमें उपनीता ( विवाहार्थ अपने पास लाई गई ) शिष्या -सदृश स्त्रीको पति बाएं कन्धे में रखनेकेलिए उपवस्त्र ( विवाहाधिकार - वस्त्र ) देता है । तब यहाँ ' उपनयन ' का ' विवाहार्थं विधिपूर्वक पतिके समीप नयन ' यही हमारा कहा हुआ अर्थ प्रतिफलित हुआ । तभी ' वसिष्ठस्मृति ' में ' अद्भि-र्वाचा च दत्तायां... न च मन्त्रोपनीता स्यात् ' ( १७ ६४ ) यहाँपर ' मन्त्र पढ़कर पतिके पास लाई गई यह अर्थ सर्वसम्मत है । इसीका पर्याय इसके साथके ' मन्त्रैर्यदि न संस्कृत ' ( १७६५ ) इस पद्यमें है । ' स्मृतितत्त्व ' के ' उद्वाहतत्त्व ' के १२६ पृष्ठमें भी लिखा है - ' मन्त्रोपनीता - पाणिग्रहणमन्त्र-जन्य संस्कारवती कुमारी ' । हारीतको भी यही अर्थ विवक्षित है, नहीं तो वह सद्योबधूको ब्रह्म-हारीतकी सद्योवधुनोंका उपनयन- विचार [ १ वादिनीकी प्रतिद्वन्द्वितामें न रखता । यदि हारीत उसे यज्ञोपवीतका श्रधिकार देता, तो उसे वेदका अधिकार भी देता, ब्रह्मचर्याश्रम - मूलक उपनयनको वह ब्रह्मचर्यके समाप्त करनेवाले विवाहमें न कहता । इस कारण आर्यसमाजी विद्वान् श्रीनरदेव शास्त्री ' आर्यसमाजका इतिहास प्रथमभाग ११८ पृष्ठ में ' जो कुछ हो हम तो इस मतके हैं कि कन्याओं का यज्ञोपवीत प्रवश्य होना चाहिए । किस समय हो? गुरुकुल या पाठशाला के भेजनेके पूर्व, या विवाहके समय? इसका निर्णय करना कठिन है ", इस प्रकार निर्णय न कर सके, क्योंकि विवाहमें उसका उपनयन हो, तो उसका गुरुकुलवास तथा वेदाध्ययन नहीं हो सकता । यदि गुरुकुलसे पूर्व हो तो उसका विवाह नहीं हो सकता । स्पष्ट है कि यहां पर वह उपनयन नहीं, जो वादियोंको इष्ट है, नहीं तो उन्हें सन्देहके भूलेमें लटकना न पड़ता । लड़केके उपनयनमें गुरु शिष्यको पुत्र मानता है, उसका ब्रह्मचर्य प्रारम्भ कराता है, फिर उसका वेद समाप्त करवाकर उसे वरको लौटाता है; तब उसे व्रत समाप्त्यर्थं श्राज्ञा देकर उसको किसी कुमारीसे विवाह करनेका प्रदेश देता परन्तु स्त्रीके उपनयनमें पति उसे ' पुत्री ' न समझकर ' पत्नी ' समझता है, उसका व्रत समाप्त कराता है, पितृगृहसे उसका सम्बन्ध छुड़वाता है, फिर उसे किसीके पास भी विवाहार्थं नहीं भेजता, उसका पतिव्रत प्रारम्भ कराता है । तो अब वादीको सोचना चाहिये कि इतने भेद होने पर भी क्या दोनों उपनयन एक हो सकते हैं? ' अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद् विरुद्धधर्माव्यासः कारण - भेदश्च ' । ( भेद या भेदका हेतु यही होता है कि दोनों में परस्पर विरुद्ध धर्म होते हैं, और कारण भिन्न - भिन्न होते हैं । ) यदि नहीं, तब हारीतोक्त उपनयन यहाँ यज्ञोपवीत - वाचक सिद्ध न हुआ । यह ' उपनयन ' गौण शब्द प्रतिफलित हुआ, वास्तविक नहीं । यज्ञोपवीत - संस्कारमें उपनयनके बाद वेदारम्भविधि होती है, पर सद्योवधूके ब्रह्मवादिनी न होनेसे वेदारम्भ न होनेसे पति- समीप नयन करके

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६२ श्री सनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) हरीतकी सद्योवधुका उपनयन- विचार [ ६३ उसे उपवस्त्र देकर विवाहारम्भको विधि होती है । वहाँ विद्यार्थीको प्राचार्य के कुल ( गृह ) में अस्थायी ( ब्रह्मचर्य की अवधि तक ) निवास करना पड़ता है, भिक्षार्थं इधर उधर जाना पड़ता है, पर यहाँ ब्रह्मवादिनीत्वका अधिकार न होनेसे बेदाधिकार न हो सकनेके कारण ' ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम् ' ( मं. बा. १।६।६, गोभि. २।३।११, स्वा. द. संस्कारवि. पृ. १६५ ) सद्योवधूको पतिके कुल ( गृह ) में स्थायी निवास करना पड़ता इधर-उधर भिक्षाकेलिए नहीं जाना पड़ता । ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भमें माणवक-को गुरुके अग्निहोत्र में समिदाधान करना पड़ता है; परन्तु यहाँ ब्रह्म-वादिनीत्व न होनेसे अनधिकारवश सद्योवधूको गृहकर्म तथा पाकक्रियाके-लिए अग्निसमिन्धन करना पड़ता है, तथा पतियज्ञमें संयोग - सहावस्थिति-मात्र करना पड़ता है । यही ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोग्नि - परिक्रिया ' ( २।६७ ) इस मनु - पद्यमें भी स्पष्ट है । इसकी व्याख्या कुल्लूक, मेधातिथि गोविन्दराज, नारायण, राधवानन्द, नन्दन आदियों ने ऐसी ही की है । यह हम आगे दिखलावेंगे । श्रीभट्टोजिदीक्षितने भी ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह ' के ११२-११३ पृष्ठ में कहा है – ' स्त्रीणां च विवाह उपनयनस्थानापन्नः, तदाह मनु- ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणामौपनाय-निको मतः ' । इसी अर्थ में मनु, गोभिल, हारीत, कौशिक प्रादियों के वच-नों में नामञ्जस्य होता है । यही वास्तविकता है । ' सद्योवधू ' शब्द विवा-हारम्भको ही बताता है । पतिके पास वैध - नयन विवाहारम्भ ही है, जिस से पति सद्योबधूको उपवस्त्र देता है, तव स्त्रियोंका उपनयन संस्कारका अर्थ वेदाध्ययनाधिकार खण्डित ही हो गया, क्योंकि प्राजकी सभी स्त्रियाँ विवाह - रहित नहीं । सृष्टिका प्रारम्भ न होनेसे यह वैदिककाल भी नहीं, अतः वे स्त्रियां ब्रह्मवादिनी भी नहीं, किन्तु हारीतानुसार सद्योवधू हैं । उन्होंने सद्य: ( शीघ्र ही ) वधू बनना है, तब उनका वेदाध्ययन हारीत कथनसे ही खण्डित हो गया । इस प्रकार वहृदिमान्य हारीतने स्वयं वादीका पक्ष काट दिया । ( ख ) क्या वादी हारीऩके ' नहि शूद्रसमाः स्त्रियः, छन्दसा स्त्रियः संस्कार्या: ' इस वचनको मानता है? यदि हाँ, और इस वचनको उपनयन-वेदारम्भादि संस्कार - विषयक मानता है, तो इससे शूद्रका वेदमन्त्रों में अधिकार कट जाता है, तभी तो ' नहि शूद्रसमाः स्त्रिय: ' हेतुको देकर वादीके मतानुसार स्त्रीके संस्कारमें मन्त्रोंका अधिकार दिया गया है क्या वे ऐसा मानते हैं? यदि ऐसा है, तो उनके स्वामीका ' यथेमां वाचं ' का अर्थ खण्डित हो गया, जिसमें वे शूद्र तथा अन्त्यजोंको वेदमन्त्राधिकार देते हैं । क्या वादीको यह स्वीकार है? अथवा यदि हारीतका यही वचन स्वामी के किये अर्थसे विरुद्ध होनेसे वेदविरुद्ध है, तब वादी इसे कैसे प्रमाणित करता है? ' हि शूद्रासु ब्राह्मण - क्षत्रिय वैश्या जायन्ते ' यह हारीतका वाक्य वादी-. से सम्मन वर्णव्यवस्थाको काटता है । यह जन्मसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य मान रहा है । वादी तो वसिष्ठ, सत्यकाम श्रादिको गणिका - शूद्रा आदिका पुत्र बताकर उन्हें ब्राह्मण सिद्ध करते हैं, यहाँ तो उसके विरुद्ध कहा है । यदि साक्षात् शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणादि - पिताके वीर्यसे ब्राह्मणादि उत्पन्न हो सकते हैं, तो स्त्री - जो साक्षात् शूद्र वर्णकी नहीं, केवल वेदादिके अनधिकार रूप कुछ विवक्षितांशकेलिए ही शूद्रमहरा कही गई है ( क्योंकि - सदृशतामें साक्षात् वही नहीं हो जाता ) तो उसके गर्भसे ब्राह्मणादि पिताके बीर्यसे सन्तान ब्राह्मणादि क्यों न होगी? यदि वह ब्राह्मणादि होगी; तो वादीके, स्वामी की मानी गुण - कर्मुसे वर्णव्यवस्था कट गई, अथवा स्वाद से विरुद्ध होनेसे वेदविरुद्ध हो जानेके कारण वादीसे यह वचन स्त्रपक्ष - पोषकत्वमें कैसे उद्धृत किया जा सकता है? ' तस्मात् स्त्रियः छन्दसा संस्कार्याः ' यहाँ ' संस्कार्याः ' पद ' नहि शूद्र-: योनी ब्राह्मणादयो जायन्ते ' इस हारीतके ' योनो जायन्ते ' लिङ्गसे विवाह: संस्कार विषयक है, शेष संस्कारोंमें ' योनौ जायन्ते ' का कोई सम्बन्ध नहीं

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३३ ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रहता । तत्र यह उपनयन - वेदारम्भ विषयक नहीं । क्योंकि - सभी गृह्यसूत्र यः स्त्रीके विवाहसे अतिरिक्त संस्कारोंमें मन्त्रों का निषेध करते हैं । ' विवाहो न-में मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्याऽमन्त्रतः ' ( व्यासस्मृति १।१६ ) ' तूष्णीमेताः क्रियाः कर स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक: ' ( याज्ञ. १।२।१३ ) इन प्रमाणोंसे स्त्रीका या केवल विवाह - संस्कार ही अपवादरूपसे समन्त्रक इष्ट है, क्योंकि विवाह-का ही स्त्रीका द्विजसतापादक है । पुरुषके लिए जहां ' संस्कार ' शब्द मा र जाए, वहाँ उसका सदा ' उपनयन ' इष्ट होता है. जैसाकि - ' नाऽसंस्कृतस्तथा वन ( मनु. ११1३६ ) संस्कारोतरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्माधीयते ' ( महा. से पस्पशाह्निक ) । स्त्रियोंके लिए जहाँ ' संस्कृत ' वा ' संस्कार ' शब्द प्रा जावे, वहीं सदा उनका विवाह इष्ट होता है । जैसे- ' रजः पश्यत्यसंस्कृता ' दी- ( वृहद्यम ३ | १८ ) ' मन्त्रैर्यदि न संस्कृता ' ( वसिष्ठ १७ ६५ ) इमीलिए श्य मनुने कहा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारों ' ( २२६७ ) जहाँ उक्त का हारीतवचन उद्धृत किया गया वहां स्त्री - विवाह विषयक ही रखा गया है, उपनयनादि अन्य संस्कार विषयक नहीं । यह हम बता चुके हैं कि-सर्वसाधारण स्त्रियों ( सद्योवधुओं ) को ब्रह्मवादिनी न होनेसे हारीत वेदाधिकार नहीं देता । तब वादीका इस हारीत वचनसे सब तरह की र स्त्रियोंका बेदाधिकार खण्डित हो गया; नहीं तो वादीके अनुसार हारीतके दोनों वचनोंमें विरोध उपस्थित हो जायगा, पर यह अनिष्ट है । के एक विशेष बात यह भी विचारणीय है कि- हारीत ब्रह्मवादिनियों का द्ध विवाह क्यों नहीं कराता क्यों उन्हें यावज्जीवन ब्रह्मचारिणी रखता है, वेदाधिकारी पुरुषकेलिए भी यावज्जीवन ब्रह्मचर्यं प्रदिष्ट क्यों नहीं करता? ब्रह्मवादिनी स्त्रियोंके लिए ही ऐसी कठोरता क्यों करता है? द्र-: क्या इसमें भा कोई रहस्य है? हाँ, इसमें भी एक रहस्य है जिसकी ओर हः विद्वानोंका ध्यान नहीं गया । यह यह है - हम अन्यत्र बता चुके हैं कि-हृीं साधारण - स्त्रियोंमें अपूर्णता होनेसे उन्हें वेदका अधिकार नहीं दिया गया, पर ब्रह्मवादिनी नामक विशिष्ट स्त्रियों - ऋषिकाओं पर जो वेदमन्त्र हाती का उपनयन- विचार उतरे, उसका कारण उनमें साधारण स्त्रियों की अपेक्षा विलक्षणता है, अर्थात् अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उनमें कुछ अधिक पूर्णता होती है । इसलिए उन्हें वेदाधिकार भी होता है । वे रजस्वला नहीं होती थीं । रजस्वलात्वका प्रारम्भ कल्पारम्भके कुछ समय बाद विश्वरूप- वधकाण्डमें इन्द्रद्वारा ब्रह्महत्याका भाग स्त्रियों को रजस्वलात्वरूपमें देनेके समय हुआ यह कृष्ण-यजुर्वेद ( तै.सं. २।५।१।५ ) तथा पुराण ( श्रीमद्भा. ६।९।१-१६ ) में राष्ट है । रजस्वला स्त्रियों की भीतरी कुछ प्रपूर्णताका और तै.सं. के अनुसार ब्रह्महत्याका चिह्न है - इसलिए साधारण - स्त्रियोंका पूर्ण प्रकृतिवाले पुरुषसे विवाह होता है । पर ब्रह्मवादिनी स्त्रियों में ब्रह्महत्याका श्रंश रज एवं अपूर्णता न होनेसे हारीतानुसार उनका यावज्जीवन विवाह भी नहीं होता, क्योंकि पुरुषकल्प और रजोहीन कल्पादिम स्त्रियोंका भला पुरुषसे विवाह कैसे हो? इसलिए वैसी अमथुनयोनि वाली ब्रह्मवादिनी स्त्रियां भी प्रायः कल्पारम्भमें होती अपवादवश मध्यमें भी । इसलिए उन्हें मनुष्ययोनि न मानकर उन्हें भिन्न- योनि ( ऋषिका ) माना जाता है । ऋषि मनुष्यसे भिन्न योनिविशेष होता है, यह हम पहले सप्रमाण बता श्राये हैं । इसलिए ' रुचं नो धेहि ' ( यजुः १८१४८ ) मन्त्रमें ऋषिने ' माथि ' अपना नाम ब्राह्मणादि मनुष्योंसे भिन्न बताया है । उन ब्रह्मवादिनियोंके लिए कहीं प्रयुक्त ' पति ' शब्द ' अधिपति ' - वाचक समझना चाहिए, ' विवाहित स्वामी ' - वाचक नहीं, यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं अतः ब्रह्म ( वेद ) बादका अधिकार भी उन्हीं ब्रह्महत्या के प्रशंसे रहित, यावज्जीवन कुमारी ब्रह्मचारिणी ब्रह्मयादिनियोंको ही होता है, दूसरी ब्रह्महत्या के प्रश वाली; थोड़ा समय कुमारी रहकर फिर सद्य: -वधू बनने वालियोंका वह ब्रह्म ( वेद ) -वादका अधिकार अपूर्णतावश हारीत द्वारा नहीं दिया गया । फलतः उन ब्रह्मवादिनियोंके दृष्टान्तसे साधारण स्त्रियों का वेदाधिकार नहीं हो जाता, इसलिए उन साधारण - स्त्रियोंका नाम हारीतने ' ब्रह्मवादिनी ' न रखकर ' सद्योवधू ' रखा है, उन्हें वेदकी प्राज्ञा नहीं दी, उन्हें विवाहकी आज्ञा दी है । हारीतका यह वचन उन्हीं अपूर्ण-

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३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सद्योबधुप्रोंके विवाह - संस्कारमें लागू होता है, उपनयन एवं वेदारम्भमें नहीं । आशा है- अभिज्ञ पाठकोंने यह रहस्य समझ लिया होगा । और साधारण- स्त्रियोंको वेदाधिकार न देनेकी तथा ब्रह्मवादिनियों को वह अधिकार देनेकी बात भी समझ ली होगी । वादी कौमार ब्रह्मचारिणी, कुसारी - ब्रह्मचारिणी ब्रह्मवादिनियोंका महाभारत आदिसे जो उद्धरण दिया करते हैं, वे यही ब्रह्मवादिनियाँ हैं । उनके दृष्टान्तसे जोकि -बादी अपना पक्ष सिद्ध करनेकी चेष्टा किया करते हैं. अब उन्होंने उसकी व्यर्थता समझ ली होगी । वादी इसपर तथा गत विषयपर कुछ भी नहीं बोल सकते; क्योंकि उनका पक्ष निराधार है । ( ६ ) ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' ( गोभिलवचन ) पर विचार । यही बात ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' ( २।१।१६ ) इस गोभिल - सूत्र में भी है, क्योंकि इस सबसे पहले के ' अहतेन पतिः परिदध्यात् ' या अकृन्तन् ' इत्येतया ऋचा ' ( २।१।१८ ) सूत्रसे वर, वधूको ' या प्रकृन्तन् अवयन् मंत्र बोलकर प्रहत वस्त्र ( उपवस्त्र ) देता है; वह वधू उसी उपवस्त्रको ' दक्षिण बाहुमुद्धृत्य शिरोवधाय सव्ये ( वामे ) प्रसे ( स्कन्धे ) प्रतिष्ठा-पयति, दक्षिणकक्षमन्वलम्बं भवति एवं यज्ञोपवीती भवति ' ( १।२।२ ) इस गोभिल की परिभाषासे बाएं कन्धे में उत्तरीयकी भान्ति, वा यज्ञोपवीत-की भांति लपेट लेती हैं । यही उसका यहाँ ' यज्ञोपवीतिनीत्व ' होता है । ( क ) केवल यज्ञ - सूत्रकी ही वाएं कन्धेपर रखनेसे यज्ञोपवीतिता नहीं होती, किन्तु वस्त्रको भी दाहिनी बाहुको उठाकर बाएं कन्धे पर लटकानेसे भी व्यक्ति ' यज्ञोपवीती ' कहा जाता है । जैसेकि - गोभिलने ही स्वयं कहा है - ' यज्ञोपवीतं कुरुते सूत्रं वस्त्रं वापि, कुशरज्जुमेव ' ( १ | २ | १ ) यहाँ पर सामश्रमी श्रीसत्यव्रतने लिखा है... ' दक्षिणं वाहुमुत्क्षिप्य शिरोवेष्टयित्वा बामस्कन्धोपरि प्रतिष्ठापयति, तत्र दक्षिणकक्षान्तलम्बमानं भवेत्, एवं गोभिलवचनपर विचार [ II प्रकारेण सूत्र - वृस्त्र — कुशरज्जूनामन्यतमधारणेन यज्ञोपवीती भवति ' । ब स्त्रीलिङ्गमें वस्त्रयुक्त स्त्रीका भी ' यज्ञोपवीतिनी ' यह नाम होता है । ( ख ) ‘ वाचम्पत्य ' कोषमें उपवीत- उपवीती शब्द के अर्थावसर पर कहा है-. ' उपवीतं वहिर्भूत - दक्षिणहस्ततया वामांसस्थापिते वस्त्रे च । न केवल यज्ञसूत्रस्यैव तथात्वम्, तथाभिनिवेशितस्य वस्त्रस्यापि तथात्वम्, ' दक्षिणं बाहुमुद्धृत्य ' इत्यादिना गोभिलेन सामान्यतोऽभिधानात् मनुना ‘ उधृते दक्षिणे पाणी उपवीतीत्युच्यते द्विज: ' इति सामान्यतोऽभिधानाच्च । उपवीती - तथासन्निवेशित - सूत्र - वस्त्रधारिणि उपवीतस्य वस्त्रादिसंनिवेश-विशेषरूपस्य प्राकरणिक्राङ्गता मीमांसायां २ अध्याये १ पादे निर्णीता " ।. ( ग ) इसी प्रकार वैजयन्तीकोषम ' यज्ञोपवीतोपवीत ब्रह्मसूत्रोत्तरी-ययोः ' ( शेषकाण्ड नपुंसकलिङ्गाध्याय ) ' उपवीतं तु प्रोद्धृते दक्षिण करें ( वैजय. भूमिकाण्ड ब्राह्मणाध्याय २० ) यहाँपर भी बाएं कन्वेंपर रखे उत्तरीय ( दुपट्टे ) का नाम भी उपवीत माना गया है । इस प्रकार स्पष्ट है कि - गोभिलके ' यज्ञोपवीतिनी ' का ' यज्ञोपवीत-' वाली ' अर्थं नहीं; किन्तु ' बाएं कन्धे पर वरसे दिये हुए उपवस्त्रको पहिरे हुई स्त्री ' यही अर्थ है । ( घ ) वादीके स्वामी दयानन्दजी को भी उक्त गोभिलसूत्रका यही अर्थ उस प्रकरणमें इष्ट है । यह गोभिलगृह्यमें वरके द्वारा वघूको उपवस्त्र - प्रदानका ही प्रकरण है - यह हम लिख चुके हैं । अब स्वामीजीकी ' संस्कारविधि ' का विवाह - प्रकरण १४१ पृष्ठ देख लीजिये । उसमें लिखा है- ' नों ' या प्रकृन्तन्नवयन् ' इस मन्त्रको बोलके वधूको वर उपवस्त्र देवे, और वह ( वधू ) उपवस्त्रको यज्ञोपवीतवत् धारण करे ' कितने स्पष्ट शब्द हैं? स्वाद जीने यह बात उक्त गोभिलसूत्र को ही अनूदित करके कही है, क्योंकि अपनी सं.वि. में स्वामीजी गोभिलकी बातें, बिना भी उसका वचन उद्धृत किये अपनी भाषामें अनूदित कर उद्धृत कर देते हैं । यदि वादी यह न माने, तो बतावे कि- ' यज्ञोपवीतवत् उपवस्त्र संघ ० ७

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६७ तब है । है--क्षणं दधृते चि । विश-री-करें रखे वीत.. हिरे उक्त रके अब ये । वर करे ' ह बातें, द्धृत वस्त्र ८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) को धारण करे ' ' इस स्वामीजीके वाक्यका कौनसा गृह्यसूत्रका है? स्वा.द.जी कन्याओंका यज्ञोपवीत वचन मूल मानते हों, वा न मानते हों, हमें उससे कोई प्रयोजन नहीं, पर हमारा यह कहना है कि इस ' या श्रकृन्तन् ' के अवसर पर उन्होंने वैसा श्रयं नहीं किया, वा नहीं माना । वर्तमानमें मिलनेवाले किसी भी गृह्यसूत्र में इस वैवाहिक - वस्त्रप्रदानके श्रवसरपर स्त्रीका यज्ञोपवीत नहीं कहा गया । तब स्पष्ट है कि गोभिलमें भी उससे स्त्रीका यज्ञोपवीत संस्कार इष्ट नहीं, किन्तु उक्त प्रकारसे पहिरे हुए वस्त्रवाली वधू ही ' यज्ञोपवीतिनी ' संज्ञक होती है । ( ङ ) इसलिए ' वैखानस - गृह्यसूत्र ' में भी उपनयन संस्कार में ' या श्रकृन्तन् ' इति वस्त्रम् ' ( २५ ) इस मन्त्र से वस्त्रपरिधान ही कहा है, यज्ञोपवीतका परिधान नहीं । गोभिलगृह्यके स्पष्ट करनेवाली पुस्तकोंका भी हम इस विषय में प्रमाण देते हैं, जिससे गोभिलके ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्दके अर्थके विषय में थोड़ा सा भी सन्देह पाठकोंके चित्तमें न रह जाए । ( च ) ' गोभिल - गृह्यकारिकामें उसपर लिखा है - पतिः कन्यां परि-दध्याद् श्रधीत - नव्यवाससा । ' या प्रकृन्तन् ' पठन् मन्त्रं द्वितीयेनापि वाससा । प्रावारयेत् परिधत्त मन्त्रेणैवोपवीतवत् । सोमो ददत् पठेन्मन्त्रं, ' गृहाच्च वेदिसम्मुखीम् ' ( २२११३५-३६ ) ( छ ) यहाँ पर गृह्यकारिकाकार श्री शिवराम स्वकृत- ' सुबोधिनी पद्धति ' के इस विवाह प्रकरणमें कहते हैं— ' ततोऽपरेण हतेन वाससा दक्षिणं बाहु वहिः कृत्वा उपवीतवद् उपरि प्रावृणुयात् ' । ( ज ) अव ' कृत्यचिन्तामणि ' के भी शब्द इस पर देखें— ' प्रावृतां - कृतोत्तरीयाम्, यज्ञोपवीतिनीम् - ' यज्ञोपवीतवत् कृतोत्तरीयाम् अभ्यु-दानयन् कन्याप्रतिग्रहदेशाद् विवाह - वेद्यभिमुखमानयन् ' सोमो ददद् ' इति मन्त्रं जपेत् ' । ( झ ) ' गोभिल - गृह्यकर्म - प्रकाशिका ' ( १८८६ संस्क. ) के ४ ९ पृष्ठ में भी लिखा है - ' पुनरन्येन महतवस्त्रेण यज्ञोपवीतवत् ' परिधत्त इति वधूं परिधापयेत् ' । ( ञ ) म म श्री रघुनन्दन - भट्टाचार्यने भी इस विषय में गोभिलवचनपर विचार [ Æ ' स्मृतितत्त्व ' में कहा है- ' वासो विन्यासविशेषस्तु तत्तदुद्देशाचाराद् श्रवगन्तव्यः । ' गोभिलः परिवत्त धत्तं वामसा इति प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम्... प्रावृतां यज्ञोपवीतवत् कृतोत्तरीयपरिधानाम् ' यथा स्मृतिः - ' यथा यज्ञोपवीतं च चायंते च द्विजोत्तमैः । तथा सन्धार्यते यत्नाद् उत्तराच्छादनं शुभम् ' । न तु ' यज्ञोपवीतिनी - इत्यनेन स्त्रीणामपि कर्माङ्गत्वेन यज्ञोपवीतवारणमिति ' हरिशर्मोक्त युक्तम्, स्त्रीणां यज्ञोपवीत धारणानुपपत्तेः । सरलाभट्टभाष्ययो-रप्येवम् ( प्रथम भाग ८६६ पृष्ठ ) । अब इस अर्थ में अन्य विद्वानोंकी सम्मति भी लिखी जाती है । ( ट ) ' आपस्तम्बधर्मसूत्र ' ( १।१५।१ ) के भाष्यमें श्री हरदत्तने लिखा है - ' वामो-विन्यासविशेषो यज्ञोपवीतम् । ' वहाँपर उसने ' दक्षिण बाहुमुद्धरते, श्रवधत्ते सव्यम् इति यज्ञोपवीतम् ( २1१ ) यह ' तं. आ. का प्रमाण भी दिया है । उस चचनमें सायणका भाग्य इस प्रकार है- ' दक्षिण बाहुमूर्ध्वं वृत्वा सव्ये बाही लम्बमाने सति यद् वेष्टनं तद् यज्ञोपवीतम् ' ( ११११ ) यहाँपर यज्ञोपवीत + की शर्त नहीं लगाई गई है; अतः इस प्रकारके वस्त्रके विन्यासविशेषवाली ' स्त्री ' यज्ञोपवीतिनी ' कही जायगी । ( ठ ) ' मीमांसादर्शन ' ( अ १।२१ ) सूत्रके शावर भाष्य में भी कहा है- ' कर्तुश्च वासोविन्यासमात्रं गुणो भवति उपवीतं नाम ' ( ड ) आर्यसमाजके महामहोपाध्याय श्रीश्रार्यमुनिजीने भी ' मीमांसाभाष्य ' ( ३११।२१ ) में कहा है- ' यागमें सूत्र के स्थान में प्राय: बिना सोया वस्त्र हो उक्त प्रकारसे ( वाएं कन्वेमें ) डाला हुआ उपवीत कहा जाता है, वही उपवीत इस अधिकरणका विषय है । .. ( ढ ) इस प्रकार ' जैमिनि गृह्यसूत्र ' के व्याख्याता श्रीनिवासाध्वरीने भी ( १/१ खण्डकी व्याख्यामें ) कहा है- ' स्त्रिया अपि यज्ञोपवीताकारेण उत्तरीयं कर्माङ्ग भवति ' ( ण ) ' उद्धृते दक्षिणे पाणी उपवीती ' ( मनु. २।६३ ) इसपर श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है- ' वामस्कन्धस्थिते... यज्ञसूत्रे, वस्त्रे वा उपवीती ' । इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि स्त्रियोंके, यज्ञोपवीतकी भांति लपेटे वस्त्र को भी यज्ञोपवीत कहते हैं, वह वास्तविक यज्ञोपवीत-

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१०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः. ( -२ ) विवक्षित नहीं । इस प्रकार ' गोभिल - सूत्र ' ( २।१।१६ ) में विवाह्यमान वधूका ब्रह्मचर्याश्रममूलभूत यज्ञोपवीत - सूत्र प्रभिप्रेत नहीं, किन्तु गोभिल-( २1१1१८ ) सूत्र में वरदत्त उपवस्त्रका हारीत वचनानुसार यज्ञोपवीतवत् विवाहयज्ञके प्रारम्भमें स्थापन करना ही यज्ञोपवीतिनीत्व है । ( त ) यही बात गोभिलगृह्यसूत्र के भाष्यकार श्रीचन्द्रकान्ततर्कालंकारने भी लिखी है- ' प्रावृतां - कृतोत्तरीयाम् । कथं प्रावृताम्? यज्ञोपवीतिनीम् -यज्ञोपवीतिनीमिव, यज्ञोपवीतवत् कृतोत्तरीयामित्यर्थः ।... यज्ञोपवीतं -यज्ञोपवीतवत् विन्यासविशिष्टसुत्तरीयम्, तद् यस्या अस्ति, सेयं यज्ञोपवीतिनी ताम्, यज्ञोपवीतवत् परिहितोत्तरीयवसनामित्यर्थः । तद् आभ्यां पदाभ्यां पूर्वत्र ( २।१।१८ सूत्र ) सूत्रितयोर्वाससो विन्यासविशेषमिह दर्शयति । यज्ञो-पवीतपदं च उत्तरीयेपि प्रयुज्यते विन्यास - विशेषलाभार्थम- इति पुरस्ताद् अभिहितमस्माभिः ।... सिद्धं खलु आसां [ वधूनां ] यज्ञोपवीतशब्दमुत्तरीयं; न यज्ञोपवीतम्, तस्माद् असिद्धिर्योषितां यज्ञोपवीतस्य । तामिमां प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् [ यज्ञोपवीतवत् परिहितोत्तरीयवसनां ] वधूमभ्युदानयन् जपेत् पतिः ( सोमो ददद् ' इत्येतं मन्त्रम् ' २६५ पृष्ठ ) । इसमें कैंसी स्पष्टता है? ( थ ) म.म. पं ० मुकुन्दमिश्रने भी इसकी यही व्याख्या लिखी है— ' प्रावृतां - कृतोत्तरीयाम्, कथं प्रावृताम्? यज्ञोपवीतिनीम्, तामिव, यज्ञो-पवीतवत् कृतोत्तरीयाम् इत्यर्थः, स्त्रीणामुपवीतस्याऽभावात् ' ( २।१।१६ ) । पूर्वसूत्र ( १८ ) में वर द्वारा दिये वस्त्रका इस [ १ ९ सूत्र ] में विन्यास-विशेष अनूदित किया है, यह दोनों सूत्र इकट्ठे ही हैं, दूरके नहीं; तब एक वादीका ' सार्व. फरवरी १ ९ ४८ के श्रद्धमें यह लिखना कि- ' यदि वस्त्रको यज्ञोपवीतवत् धारण करना अभिप्रेत होता, तो वहाँ ही यज्ञो-पवीतवत् धारण करना कह देते, अतः यहां यज्ञोपवीतका धारण करना ही अभिप्रेत है ' यह कथन निस्सार तथा निरुपपत्तिक है, ये १८ - १६ सूत्र कोई श्रापसमें व्यवहित नहीं, जिससे यह कल्पना पनप सके । १।२।१ गोभिलवचनपर विचार [ १०१ गोभिल - गृह्यसूत्र भाष्यमें भी पं ० मुकुन्दमिश्रने लिखा है- ' प्रत्र यज्ञोपवीतार्थः स्त्री - शूद्राणां कृते देवपितृकर्मणोरुपपद्यते इति द्रष्टव्यम् वाससा । यहाँपर भी उन्होंने स्त्री तथा शूद्रकेलिए ' विन्यासविशेषसे वस्त्र पहनने ' का नाम ' यज्ञोपवीत ' होता है ' यह माना है, उपनयन संस्कार नहीं माना । ( द ) यह स्मर्तव्य है कि- ' या अकृन्तन् ' मन्त्र बोलकर वर - द्वारा देनेके इस प्रकरणमें किसी भी सूत्रकारने वधूका यज्ञोपवीत नहीं माना वस्त्र समय यज्ञोपवीतके होनेमें किंवा उस विशेषण में कोई उपपत्ति, ही न है उस । ‘ खादिर - गृह्यसूत्र ' प्रायः ‘ गोभिल - गृह्यसूत्र ' से मेल खाता है, पर वहाँ भी ' स्नातामहतेन ग्राच्छाद्य ' ‘ या प्रकृन्तन्निति ' इत्यानीयमानायां पाणिग्राहो जपेत् ' सोमो ददद् इति ' ( ११३१६ ) यहाँ पर पति द्वारा स्त्रीका ' या अकृन्तन् ' मन्त्रसे उपवस्त्र - द्वारा प्राच्छादन ही है; ज्ञ अवसर पर कोई गन्ध ही नहीं वतलाया गया । क्योंकि - यज्ञोपवीत शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्याश्रमके प्रारम्भमें ही होता है, गृहस्थाश्रम के प्रारम्भ कभी इष्ट नहीं; यह ग्रत्यन्त स्पष्ट है; इसपर वादी प्रत्युत्तर कभी नहीं. दे सकते । तब गोभिलमें इस अवसरपर यज्ञोपवीत अर्थ निराधार सिद्ध हुआ । केवल वधूका वस्त्र पहनना ही इष्ट हुआ । ( घ ) यही बात सायणभाष्य वाले अथर्ववेदके १४ वें काण्डके प्रारम्भमें भी ' कौशिक सूत्र ' के आधारसे लिखी है - ' अहतेन वाससा तामाच्छादयति [ वधूं वरं: ] ' ( ११४५, ५३ ) यज्ञोपवीतवद् वाधूयं वस्त्रं वघ्नाति ' ( २।६८ ) । देखिये यह गोभिल - सूत्रसे कितना मेल रखता है? कैसा शब्द - सादृश्य है? जैसे- ' अहतेन वसनेन परिदध्याद् ' या अकृन्तन् इत्येतया ऋचा ' ( २ | १ | १८ ) यह गोभिलसूत्र है, वैसे ही अथर्ववेद १४ वें ' काण्डकी कौशिकसूत्रानुसारी विधिमें भी लिखा है- ' अहतेन वाससा तामाच्छादयति यह शब्द कौशिक तथा गोभिलके शब्दतः तथा अर्थतः मिलते हैं । गोभिलने यहाँ ' या प्रकृन्तन ' ऋचा कही है, कौशिकसूत्रीय विधिमें भी १४ वें काण्डकी प्रथर्ववेदीय ऋचा ' या प्रकृन्तन्' ही है । पूर्व

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१०२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वाससा यम् सूत्रके आगे गोभिलमें ‘ प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' सूत्र है, कौशिकमें भी पूर्व नने का । सूत्रसे आगे इसी गोभिलसूत्रका अनुवाद है- ' यज्ञोपवीतवद् वाधूयं वस्त्रं TI वनाति ' । कितना समान अर्थका मेल है? वही बाधूय वस्त्रं विवाहकी समाप्तिमें ब्राह्मणको दे देना पड़ता है । इसमें प्रथर्ववेदकी भी साक्षी है-T वस्त्र ' सूर्यां [ सूर्या - सूक्त ' ] यो ब्रह्मा [ ब्राह्मण: ] वेद, स इद् [ स ब्राह्मण एव ] न उस वाघूयमर्हति ' [ वधूवस्त्रग्रहणयोग्य: ] ( १४ १ २६ ). यही बात अथर्ववेदसं. ही है । के १४।२।४१-४२ मन्त्रमें स्पष्ट है । यही बात ' बाधूयं वस्त्रं ददतं वरम् भी अनुमन्त्रयते ' ( ११२५-३० ) ' प्राचार्यस्तत् परिगृह्णाति ' ( २।४१-४२ ), ग्राह कौशिकसूत्रकी विधिमें यह स्पष्ट है ( को.गृ. ७६।२७ ) । T ' याइस ( न ) अब यही बात साक्षात् ' कौशिक- गृह्यसूत्र ' में भी वादी श्रीघ.दें. पवीत जी देखें | वहां दशमाध्यायमें ' या प्रकृन्तन् ' इति ग्रहतेन श्राच्छादयति ' रम्भमें ( ७६।४ ) इस सूत्र की वादीके परममान्य ठाकुर उदयनारायणसिंहने इस नहीं प्रकार व्याख्या की है- ' या अकृन्तन् ' मन्त्रसे अन्य नये अखण्ड वस्त्र - सिद्ध ( दुपट्टे ) को अभिमन्त्रित कर यज्ञोपवीतकी भाँति बाँह में बाँध लेवे ' । अब इससे बढ़कर अन्य क्या स्पष्टता हो? Tush ( १ ) श्रीबाणभट्ट जव राजा हर्षसे मिलने गये, तवका हाल लिखते वाससा हुए उन्होंने ' हर्षचरित ' में लिखा है- ' यज्ञोपवीती स्वस्ति - शब्दमकरोद् ' वस्त्रं ( द्वितीय उच्छ्वास ) तब क्या वादी इसका यह अर्थ करेगा कि - यज्ञोपवीत-है पहने बाणभट्टने राजाको स्वस्ति कहा, क्योंकि यह सरल है? सरलताका इन्तन ' विचार तो किया जाता है, पर यह नहीं सोचा जाता कि ऐसा विशेषण श्रसाभिप्राय हो जायगा । कवि लोग श्रसाभिप्राय विशेषण नहीं दिया ' २४ वें करते । क्या किसीको शंका पड़ गई थी कि ब्राह्मण बाणभट्ट, बिना ससा यज्ञोपवीत पहने वहाँ गया हो, जिसे दूर करनेकेलिए ' यज्ञोपवीती ' विशेषण कहना पड़ा? वस्तुतः ऐसा नहीं । यहां भी यही अर्थ है कि-सूत्रीय यज्ञोपवीतकी तरह दुपट्टा पहने हुए ( यह उसके उस समयके वेषका वर्णन पूर्व है, जो उस समय वासोविन्यासविशेष उसने किया ) वा दाहिना हाथ गोभिलवचनपर विचार [ १०३ ऊपर करके ( मनु. २१६३ ) बाणभट्टने ' स्वस्ति ' शब्द कहा । इसी प्रकार उक्त गोभिलसूत्र के लिए भी समझना चाहिए । उसमें उपपत्ति यह है कि-उक्त सूत्रसे पूर्व सूत्रमें स्त्रीको वर द्वारा उपवस्त्र प्रदान किया गया है । उस वस्त्रको वधू कहाँ पहिरे, कैसे पहिरे यह प्रश्न रह जाता है, उसे ही स्पष्ट करनेकेलिए ' यज्ञोपवीतिनीम् ' शब्द प्राया है कि उसे यज्ञोपवीतकी तरह बाएं कन्वेपर दाहिनी बगल ऊपर करके पहरे, जिससे कर्ममें सुविधा हो । इस प्रकार यह अर्थ सोपपत्तिक हुआ, पर वादीके किये प्रथमें कोई उपपत्ति नहीं । स्त्रीका यदि वादीसे श्रमीष्ट श्रर्थवाला ' यज्ञोपवीतिनी ' विशेषण श्राया है, तो ' सोमो ददद् ' मन्त्र पढ़नेवाले वरका ' यज्ञोपवीती ' विशेषण क्यों नहीं श्राया — वादी इसका उत्तर त्रिकालमें भी नहीं दे सकता । यह लोग इसी प्रकारका गलत व्यवहार करके अपना ' अन्धोंमें काना राजा ' होकर व्यवहार कर रहे हैं । ( फ ) वादीके पक्ष में सामश्रमीके अतिरिक्त किसी प्राचीनकी सम्मति नहीं, कोई इसमें उपपत्ति नहीं, बल्कि इस अवसर पर वादीके स्वामीको भी सम्मति नहीं । ' सामश्रमीका अर्थ सरल है, ग्रापका अर्थ खींचातानी है ' ( सावं. मई १ ९ ४७ ) यह उपालम्भ भी बादी हमें नहीं दे सकता । कई ऐसे पारिभाषिक शब्द होते हैं, जिनका तदनुसार ही अर्थ करना पड़ता है । वहाँ सीधा प्रतीत हो रहा हुआ अर्थ प्रयुक्त होता है । एक छात्र ' मरुस्थली ' की सम्बुद्धि में ' मरुस्थली ' लिख श्राया था, उसे लिखना चाहिए था ' मरुस्थलि! वह ' हे गङ्ग! ' लिख श्राया था, उसे लिखना चाहिये था - ' हे गङ्ग '! मैं उसे समझा रहा था - देखो वत्स! मरुस्थली ' नदी ' है, अतः उसे ' अम्बार्थ नद्यो ह्रस्वः ' करो । गङ्गा ' नदी ' नहीं है, अतः उसे ह्रस्व न करो । वहाँ कोई वादी - जैसा ' तर्कमनीषी ' श्र गया । कहने लगा – पण्डितजी! मरुस्थली भला कभी ' नदी ' हो सकती है? ' गङ्गा ' भी कभी नदी - भिन्न हो सकती है? आप सरल बात छोड़कर खींचातानी क्यों करते हैं? इस प्रकार क्या वादी भी यहाँ ऐसी विद्वत्ता

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१०४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नहीं दिखा रहा? ( ब ) यदि वादी इसमें सरलता देखता है, प्रकरण वा उपपत्ति नहीं देखता; तो ' मातुदिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ. ६।५५।५ ) में ' मांके हरामी पतिको तथा बहिनके उपपतिको अपनी सुनाना ' ही सरल अर्थ मानेगा? सूर्य, उषाका अर्थ खींचातानी समझेगा? ' यज्ञोपवीतिनीम् ' का यदि ' यज्ञोपवीतिनीमिव ' यह अर्थ खींचातानी माना जायगा, तो फिर उसके स्वामीका वेदभाष्य भी उसे खींचातानीका मानना पड़ेगा, जहां स्वामीने बहुत स्थलोंमें वाचेक - लुप्तोपमा दिखलाकर ' इव ' रख दिया है । श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने ' वेदवाणी के वेदांक ( ५1१-२ ) के १२१ पृष्ठमें यह स्वामीजीकी बात बड़े गौरवसे लिखी है - ( ४ ) ' आचार्य दयानन्दने वाचक - लुप्तोपमालंकारसे अनेक मन्त्रोंका भावार्थ खोला है, अर्थात् उषाके समान स्त्री, मित्रके समान अध्यापक, वरुणके समान उपदेशक आदि ( स्तं. २ पं. १४ ) । हमारे पक्षमें तो गोभिल प्रोक्त परिभाषाका अनुग्रह है - हम दिखला चुके हैं, क्योंकि यह पारिभाषिक शब्द है । ( भ ) यदि वादी विवाहमें इस अवसरपर गोभिलके ' यज्ञोपवीतिनी ' का अर्थ उस लड़कीका ' यज्ञोपवीत करना ' मानता है, जैसेकि विवाह-संस्कारमें वह ' या प्रकृन्तन् ' मन्त्रके अवसरपर लड़कोके गलेमें यज्ञोपवीत डाला करता है; तो वह अपनी उक्तिसे विरुद्ध करता है । वह ' पितुर्गे हे तु या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । भ्रूणहत्या पितुस्तस्या: सा कन्या वृषली मता ' इस वचनमें— ' प्रसंस्कृता ' का अर्थ ' अनुपनीता ' करता है, देखिये उसका ' स्त्रियोंको वेदाध्ययन ' ( पृ. १४५-१४६ ) इस पद्यसे वह बिना यज्ञोपवीत हुए लड़कीका पिताके घरमें रजोदर्शन हो जानेपर उसे वृषली ( धर्मपतिता - शूद्रा ) मानता है । कन्याके विवाहकी आयु वह १७ से २४ वर्षके भीतर मानता है, और लड़कीके इस विवाहके १७-२४ वर्षके प्रवसर पर वह उसका गोभिलानुसार यज्ञोपवीत करता है; तब वह पिताके घरमें उपनयनसे पूर्व ही १३-१४ वर्षकी अवस्थामें दृष्टरजस्का हो गोभिलवघनपर विचार [ १०५ जाने से शुद्रा हो गई, तब विवाहमें वृपली ( शूद्रा ) हो जानेसे ही यज्ञोपवीत की अनधिकारिणी हो गई; क्योंकि - गोभिल शूद्रको यज्ञोपवीत नहीं देते । तब उसका उस अवस्था में गोभिलके अनुसार ' यज्ञोपवीतिनीत्व ' नहीं हो सकता । यदि इस डरसे वादी उक्त पद्य में ' असं कृता ' का अर्थ ' अविवाहिता ' करे; तो विवाहसे पूर्व पितृगृहमें दृष्टरजस्का कन्याको उसे वृषली ( शुद्रा ) मानना पड़ेगा । तब फिर उसके १७-२४ वर्षमें विवाह होनेपर वृषली होनेसे वह यज्ञोपवीतवती नहीं हो सकेगी । तब गोभिलोक्त ‘ यज्ञोपवीतिनी ’ शब्द निर्विषय हो जायगा । तब उसे भी ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्दका भिन्न अर्थं करना पड़ेगा । इससे भी उसका ही पक्ष कटा । यदि वह उस लड़कीका यज्ञोपवीत ८-१२ वर्षमें ही कर देगा; तो फिर विवाहके अवसर पर उसका ‘ यज्ञोपवीतिनी ' विशेषण प्रप्रासङ्गिक हो जायगा; जबकि पूर्वके यज्ञोपवीती वरका इस अवसर पर ' यज्ञोपवीती ' विशेषण नहीं आया । तब वादीकी इस ' यज्ञोपवीतिनी ' का ' यज्ञोपवीतयुता ' अर्थ करना सभी दृष्टियोंसे अशुद्ध सिद्ध हुआ । वादी त्रिकालमें भी इसका प्रत्युत्तर नहीं दे सकता - यह ' आलोक ' पाठक नोट कर लें । ( म ) म.म. मुकुन्दशर्माने ' यज्ञोपवीतिनी ' का ' तदेव [ कङ्कण ] सूत्र ब्राह्मणोपनीतमिह यज्ञोपवीतपदार्थ:, ' उपवीतं ब्रह्मसूत्रम् ' इत्याग्नेयकोशेन स्मृत्या च ब्रह्मसूत्रमुपवीतम्, तद् यज्ञौपयिकमिति यज्ञोपवीत - समाख्या श्रस्य । तेन अतः पूर्वं तद् विद्यते यस्यास्तद्वतीम् । तद्बन्धनमपि प्रचार-परम्परागतममुमर्थं प्रमाणयति ' यह वैयक्तिक अर्थ भी अपनी गोभिलकी टीकांमें किया है; इससे भी वादीके इष्ट अर्थं यज्ञोपवीतकी सिद्धि नहीं, जसे कि — उसने ' सार्वदेशिक ' ( मई १ ९ ४७ पृ. १६० ) में उनका पूर्वोत्तर पाठ छिपाकर दिखानेकी चेष्टा की है । क्योंकि उक्त म.म, महोदय गोभिल - व्याख्याकी भूमिकामें स्त्री एवं शूद्रका उपनयनाधिकार नहीं मानते ।