सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 81–90
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 81–90
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१०५ । १०६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नोपवीत देते । नहीं यह उन्होंने श्रीचन्द्रकान्तका खण्डन नहीं किया, क्योंकि उन्होंने उक्त हो गोभिलसूत्र की वैसी ही तो व्याख्या की है, उसमें ' स्त्रीणामुपवीतस्याभावात् ' यह उपपत्ति भी दी है । शेष प्रर्थ उन्होंने स्वतन्त्र दिया है । उसका वाहिता ' उनका तात्पर्य यह है कि प्राग्नेय ( अमर ) कोषमें उपवीत ब्रह्मसूत्र अर्थात् ( शूद्रा ) ब्राह्मणसे [ ब्रह्मेति ब्राह्मणानां नामास्ति ' ( ऋ.भा.भू.पू. ८७ ) ' समानार्थी एतौ वृषली ब्रह्मन्शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च ' ( महाभाष्य ५1१1७ ) ब्राह्मण भोजन ' ब्रह्मभोज ' नीतिनी ' नामसे प्रसिद्ध है ] लाये गये सूत्र ( कङ्कण ) को कहते हैं । वही विवाहरूप भिन्न यज्ञका उपयोगी ब्राह्मणसे लाया हुग्रा कङ्कणसूत्र बांधे हुई कन्या यहां वह उस ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्दसे इष्ट है - यह श्रीमुकुन्दभाजीका प्राशय है । उसी विवाह के कङ्कणको बांधना उन्होंने प्राजकल के प्राचारानुकूल भी माना है । जैसेकि -यगा; ' उत्तररामचरित ' में श्रीराम, सीताको विवाहमें बान्धे हुए उसी कङ्कणको विशेषण याद दिलाते हैं, वह ब्राह्मण शतानन्द द्वारा लाया गया था... ' प्रयमागृहीत-' अर्थ कमनीय- कङ्कणः ( विवाह सूत्रधारी ), तव मूर्तिमानिव महोत्सवः करः ' इसका ( १११८ ) तव इससे वादीके पक्षकी सिद्धि नहीं । ( य ) वादी जो कि - म.म. पं ० शिवदत्तजीका उक्त गोभिलसूत्र के ] सूत्र अनुसार वधूका यज्ञोपवीत मानना दिखलाता है; उससे उसकी इष्टसिद्धि कोशेन नहीं हो सकती । पं. शिवदत्तजी ' सिद्धान्तकौमुदी तत्त्ववोधिनी ' के १५२ माख्या पृष्ठमें टिप्पणी कर गये हैं— ' विवाहमुहूर्ते एव उपनयनं कार्यम्, स्त्रीणां चार- पतिव्यतिरिक्तगुरोरभावाद् उपनयनतः परं गुरूपासनस्य श्रावश्यकत्वादेव भलकी ' पतिसेवा गुरी वासः ' इत्युक्तम् । श्रतएव कन्यादानतः पश्चात् ' सोमो ददद् ' नहीं, इति पाठतः प्रागेव उपनयनेन यज्ञोपवीतादिधारणम् ' इससे उन आर्य-त् समाजियोंको - जो यदि उनका पक्ष मानते हैं, तो विवाहमें ' सोमो ददद् ' महोद मन्त्रके पाठसे पूर्व अपनी कन्याओं का यज्ञोपवीत संस्कार कराना पड़ेगा । -नहीं उस समय विवाह्यमान लड़कीका शिरोमुण्डन भी करायें; क्योंकि -उपनयनकी आदिमें उपनेयका शिरोमुण्डन सर्वसम्मत है ( स्वा.द.सं. बि. पृ. ८० ) । जातिपक्ष माननेवाले वादी लड़कीका मुण्डन मानेंगे भी । गोभिलवचनपर विचार [ १०७ कन्याविवाहका सिद्धान्त वादीके मतमें २४ वाँ वर्ष है, तब इससे पूर्व कन्याका यज्ञोपवीत न हो सकेगा, न वह वेद पढ़ सकेगी । तब पं ० शिवदत्तजीका ' प्रष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत ' में जातिपक्षसे कन्याका ग्रहण वादी द्वारा भी खण्डित हो जायेगा, क्योंकि -वादी कन्याका विवाह उत्तमतासे मानेगा - २४ वर्षमें, यज्ञोपवीत भी उसका पं ० शिवदत्तजीके अनुसार विवाह में होगा, तब श्राठवें वर्षमें कन्याका यज्ञोपवीत न हो सकनेसे [ क्योंकि पं ० शिवदत्तजी विवाहमें कन्योपनयन मानते हैं ] ' अष्ट-वर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' में पं ० शिवदत्तजीका जातिपक्षसे कन्याका ग्रहण व्यर्थं सिद्ध हो जायगा । यह जातिपक्षमें दोष पड़ा । श्रथवा यदि वादी, पं ० शिवदत्तजीकी बात मानकर ८ वर्षकी कन्याका यज्ञोपवीत मानेंगे, क्योंकि - मुख्यकाल उसका यही होगा; तब वादीको कन्याका विवाह भी ८ वर्षमें करना पड़ेगा, क्योंकि पं ० शिवदत्तजी, गोभिल तथा हारीत आदि, विवाहमें ही कन्याका तथाकथित ' यज्ञोपवीत ' कहते हैं, यद्यपि वहां उपवस्त्रका बाएं कन्धेपर रखना ही इष्ट है, तब वादी कन्या विवाहा-वस्थामें अनायास ही पराजित हो जावेगा । यदि वादी अपनी इच्छा ही करेगा, तो उसने म.म.जीका प्रामाण्य ही क्या किया? इसके अतिरिक्त म.म.जी कन्याका गुरु पतिके अतिरिक्त अन्य नहीं मानते, तब उसे पतिसेवा ही करनी पड़ेगी, गुरुकुलबास न करना पड़ेगा । तव वादीको अपने कन्यागुरुकुल अशास्त्रीय मानने पड़ेगे । अव वादीकी बनी - बनाई बालूकी दीवार भी गिरती है, पाठकगण देखें । वादीने ग्रह गोभिलका मत दिखलाया है! अन्य किसी गृह्यसूत्रका मत ऐसा है ही नहीं । तो क्या वादी लोग अपना विवाह गोभिलगृह्यसूत्रानुसार करते हैं? यदि नहीं, तो ' न रहा बांस न बजी बांसुरी ' । म.म.जी कहते हैं— ' सोमो ददद् ' मन्त्र पढ़नेसे पूर्व विवाहमें कन्याका यज्ञोपवीत हो, पर जब वादीकी विवाह - संस्कार - विधिमें- ' सोमो ददद् ' मन्त्रका ही श्रत्यन्ताभाव है; तब वे कन्याओंका यज्ञोपवीत कब कराएंगे? उडी उनकी बालूकी दीवाल ।
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१०८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) fe वादी कन्याका यज्ञोपवीत २४ वर्षमें विवाह न करके बहुत पहले वर्षमें कर देगा, तो फिर विवाहके गोभिलके उक्त सूत्रमें ' यज्ञोपवीतिनीम् ' इस वधूके विशेषणकी सोपपत्तिकता एवं साभिप्रायता नहीं रहती । अन्यथा पुरुषका भी वहां ' यज्ञोपवीती ' विशेषण क्यों नहीं आया, यह वादीको बताना पड़ेगा । पर वादी इसका त्रिकालमें भी उत्तर नहीं दे सकता । ( र ) हमारे किये हारीतप्रोक्त सद्योवधूके उपनयनके ' पतिके पास ' वैधनवन ' अर्थको उपहासास्पद बताते हुए वादीका यह कहना कि - ' क्या बिना पतिके समीप लाये भी बधूका विवाह हो सकता था, जो ' उपनयन-मात्रं कृत्वा विवाहः कार्यः ' यह लिखनेकी प्रावश्यकता हुई? उपनयनका ऐसा विचित्र अर्थ किसीने भी नहीं किया ' ( सार्व. जून १६४७ पृ. २०७ ) इसपर हम सोपपत्तिक तथा वसिष्ठादिकी साक्षीपूर्वक पहले लिख चुके हैं, जिसपर वादी कुछ भी नहीं बोल सका । वादी भी बताये कि क्या उपनयन संस्कार विवाहकालमें ही हुआ करता है, जो कि वह विवाह-प्रकरणके उपनयन वा यज्ञोपवीत शब्दका यथाश्रुत अर्थ ले रहा है? यदि सद्योवधूका ' उपनयन ' उपनयन संस्कार ही होता, ता उसे हारीतने वेद क्यों नहीं पढ़ने दिया? ' ब्रह्मवादिनी ' इस नामसे उसे क्यों वंचित किया? स्पष्ट है कि बहाँ वादिसम्मत प्रथं नहीं है । ' मन्त्रोपनीता ' ( १७६४ ) में वसिष्ठको भी हमारा हो अर्य सम्मत है । हारीत, गोभिलादिकी एक-वाक्यतासे वरसे उपवस्त्र लेना, उसे ही यज्ञोपवीतवत् धारण करना, विवाहके अन्तमें उसे भी वेदानुसार ब्राह्मणको दे देना - यह विवाहविधि-विशेष हो उसका उपनयन है, उपनयन संस्कार वधूका यहाँ इष्ट नहीं । इस विषयमें पहले पर्याप्त स्पष्टता की जा चुकी है । ( ल ) न्यायसिन्वु प्रादिसे पं ० शिवदत्तजी प्रादिके हारीतकी ब्रह्म-वादिनी प्रादिके उद्धरणसे वादीका अपने पक्षकी सिद्धि करना व्यर्थ है । उसमें प्रष्टव्य है कि- हारीतकी ब्रह्मवादिनी तथा वैदिककालकी ऋषिकाएं ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' पर विचार [ १०१ समान हैं, या भिन्न - भिन्न? यदि कहें कि भिन्न - भिन्न, तो ' सार्वदेशिक ' जून १ ९ ४६ पृ. १६२ में लिखित ' गोधा आदि सैकड़ों ऋषिकाएं वैदिक-कालमें हुई, जिन्हें ब्रह्मवादिनियोंके नामसे पुकारा जाता था । इन ब्रह्म-बादिनियोंके विषयमें ' हारीतस्मृति ' में लिखा है- ' तत्र ब्रह्मवादिनीनाम् उपनयनम् ' इत्यादि वादीके वचनका स्ववाक्यसे विरोध पड़ेगा । ब्रह्मवादिनी तथा वैदिककालकी ऋषिकाओंको वादी समान माने, तो उसका अब तकके लेखमें सम्यक् उत्तर दिया ही जा चुका है । ब्रह्मवादिनी सारी प्रायु हारीतानुसार ब्रह्मचारिणी रहती है, यह बात आजकी स्त्रियों पर लागू न होनेसे उनके यज्ञोपवीतका प्रश्न ही नहीं उठता । फलतः स्त्रियोंको उपनयन तथा वेदाध्ययनका अधिकार शास्त्रीय नहीं, गोभिलको भी वैसा इष्ट नहीं, यह सम्यक्तया सिद्ध हो गया । ( ७ ) ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' पर विचार । पूर्वपक्ष - ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ( ऋ. १०११०६१४ ) इस मन्त्रसे स्त्रीके उपनयनकी सिद्धि है, ' ब्राह्मणकी जाया स्त्री यज्ञोपवीत धारण करके भयंकर सबला बन जाती है । इस मन्त्र द्वारा ब्राह्मण स्त्रीके ' ' लिए ' उपनीता ' विशेषणका प्रयोग उसके उपनयन एवं वेदाधिकारका सूचक है ( स्वा. वे. नं. ' वैदिक धर्ममें, श्रीम.रा. पौराणिकपोलप्रकाशमें, वादी ' सार्वदेशिक ' में श्रीरा.भ., ' स्वा. ह.प्र. वैदिकमुनि स्वाध्याय संहितामें, श्रीज. कु. शास्त्री ' वैदिक डिप्लोमामें ' श्रीउ. बु. शि.पू. सार्वदेशिकमें, श्रीर. श्रार्य ' हिन्दु ' में इत्यादि । ) उत्तरपक्ष — यहाँ वादियोंको ' उपनीता ' शब्द देखकर भ्रम पड़ गया है, जैसेकि कइयोंको ' विद्या हवं ब्राह्मणमाजगाम ' ' हवे विद्या ' देखकर ' हवाई ' विद्या प्राप्त हुई, यह अर्थ प्रतीत होता है । जैसे स्वा. द. को ' तरुतारं ' में ' तारं ' देखकर ' ताराख्यं यन्त्र " का विचार आ गया । उक्त
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१०६ ११० ] देशिक वैदिक-' मन्त्र में ' उपनीता ' ब्रह्म- पवीतिनी अर्थका नीनाम भयङ्करता में कभी । यदि श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रर्थं ' उपस्थापिता ' है, ' यज्ञोपवीतवाली ' नहीं । यज्ञो-वहां कोई प्रकरण भी नहीं, न ही यज्ञोपवीतिता हेतु हो सकती है । यदि यहाँ यज्ञोपवीत विवक्षित ' होता, तो यहाँ ' कन्या ' शब्द होता, ' जाया ' शब्द न होता । वादियोंने यहाँ नि, तो चादिली ' जाया ' का ' स्त्री ' अर्थ किया है - यह है भी ठीक, ' सा जाया जाया भवति स्त्रियों यदस्य जायते पुनः ' ( ऐत.ब्रा. ७ १३, मनु. 25 ) ' जाया ' पुत्रको उत्पन्न कर चुकी स्त्रीका नाम है, क्या उसी समय उसका उपनयन संस्कार फलतः भलको ' होगा? वादीका ' ब्रह्मज्ञान - सम्पन्ना देवी ' अर्थ करना भी ठीक नहीं, ' ब्राह्मणस्य ' यह षष्ठी है, प्रथना नहीं, जायाका विशेषण नहीं । ' भीमा ' का अर्थ ' भयानक सबला ' यह ' सबला ' अर्थ कहाँसे निकल आया? उपनयनके पहिननेसे स्त्रीका भयकर होना वा सबल हो जाना निरुपपत्तिक तथा प्रत्यक्ष विरुद्ध भी है । यज्ञोपत्रीतसे माणवकको ' सौम्य ' कहा जाता है, भयंकर नहीं, अतः स्पष्ट है कि यह अर्थ यहाँ बनावटी है । ६४ ) यहाँ ' उपनीता ' का अर्थ ' उपस्थापिता ' है, इस मन्त्रमें चन्द्रसे अपहृत पवीत बृहस्पतिकी स्त्रीको उपस्थापित करनेका वर्णन है । देखिये- इसपर सायण-स्त्रीके भाष्य - ' ततः, भीमा - शत्रुरूपाणां पापानां भयंकरी पतिवत्नी एषा जाया, सूचक · ब्राह्मणस्य - वृहस्पतेः, उपनीता - समीपे देवः स्थापिता; तपः - प्रभावो दुर्धाना-वादी मपि परमे व्योमन् - उत्तमे स्थाने निदधाति खलु । तस्माद् एनामपि देवानां -इता में, परिग्रहरूपः तपोमहिमा वृहस्पतेरन्तिके उपस्थापयति ' । स्पष्ट है कि यहाँ श्रीर. • कोई यज्ञोपवीतकी गन्ध भी नहीं । उक्त मन्त्रमें ' ब्राह्मण ' का अर्थ ' वृहस्पति है; प्रकरण भी वही है । गया ब्राह्मणभाग में लिखी है- ' ब्रह्म व बृहस्पतिः ' ( ऐतरेय ब्रा. २०३८ ) यहाँ खकर ' ब्रह्म ' का अर्थ ' वृहस्पति ' किया गया है । इससे अधिक स्पष्टता शतपथ-- द.को के इस बचनमें देखनी चाहिये – ' स वे एप ब्राह्मणस्यैव यज्ञः, यद् एतेन उक्त वृहस्पतिरयजत; ब्रह्म हि वृहस्पतिः, ब्रह्म हि ब्राह्मण: ' ( ५ | १ | १ | ११ ) ' तैत्तिरीयब्रा ' में भी कहा है- ' ब्रह्म वै देवानां बृहस्पतिः ' ( ३।७।३।७ ) ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' पर विचार 1 १११ इस प्रकार यहाँ ' ब्राह्मण ' का अथ ' बृहस्पति ' है । वृहस्पतिकी ' तारा ' का जिसे चन्द्रने हर लिया था, वृहस्पतिके पास पहुंचानेका वर्णन है । इसकी पुष्टि पूर्वोत्तर - मन्त्रोंसे होती है । ' सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छद् ब्रहृणीयमानः ' ( ऋ.सं. १०।१०६२ ) अर्थात् सोमो राजा ( चन्द्रने ) हृणीयमान: ( लज्जित न होते हुए ) ( हृणी लज्जायाम्, कण्ड्वादिः ) ब्रह्मजायां — बृहस्पतिकी स्त्रीको पुनः प्रायच्छत् ( फिर वापिस कर दिया ) । ' ब्राह्मण ' का अर्थ ' बृहस्पति ' हैं, यह पहले सप्रमाण दिखलाया हो जा चुका है । इसीकी पुष्टि ' तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीताम् ( ऋ. १०११० ९ १५ ) इस मन्त्रमें है । यहाँपर ' ब्राह्मण ' का पर्यायवाचक ' ' वृहस्पति ' शब्द साक्षात् देनेसे स्पष्ट ही है । अर्थ भी वही है - ' सोमेन-चन्द्रण, नीतां जायां वृहस्पतिः ग्रन्वविन्दत् । यहाँ भी स्पष्ट ही ' बृहस्पति ' की चन्द्रापहृत पत्नी ताराको लौटाना सिद्ध हो रहा है । इसलिए ' यामाहुंस्तारकैपा ' ( ५१७१४ ) अथर्ववेदके इन पूर्वोक्त ऋग्वेद वाले मन्त्रोंके उल्लेखके साथ यह मन्त्र भी लिखा है, जिसमें ' तारा ' का नाम ' तारका ' शब्दसे मिलता है । तब इसमें वादियोंक अर्थका गन्ध भी सिद्ध न हुआ । ब्राह्मणकी स्त्रीको ' उपनीता ' कहनेसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रकी स्त्री-का इससे यज्ञोपवीत निषिद्ध हो जायगा । अथवा वे पहनें, तो ब्राह्मणकी स्त्री तो उससे भयानक हो जायगी, शेष स्त्रियां तो सचमुच राक्षसी हो जायंगी । भयानक ब्राह्मणी भी फिर पतिसे वर्जनीय हो जायगी, क्योंकि-उसके पतिका तो उपनयनसे कहीं भयानकत्व दिखलाया नहीं गया, तब यह असदृश विवाह हो जायगा । वस्तुतः उक्त अर्थं निर्मूल है । इस प्रकरणसे स्पष्ट है- उक्त ' उपनीत ' यह क्तान्त क्रिया है, ' यज्ञोपवीत पहने हुई ' यह उसका विशेषण शब्द नहीं, किन्तु वृहस्पति के पास उपस्था-पित की गई यही इसका अर्थ है । तभी ' अथर्ववेद संहिता ' में ऋग्वेद-संहिता -जैसे उक्त मन्त्रमें ' भीमा जाया ब्राह्मणस्याऽपनीता ' ( ५।१७१६ )
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११२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यहां ' उपनीता, पाठ नहीं, किन्तु ' अपनीता ' है । यदि वेदको ' उपनीता ' का ' यज्ञोपवीत वाली ' यह अर्थ इष्ट होता, तो प्रथर्ववेद में ऋग्वेद - जैसे मन्त्र में ' उपनीता ' के स्थानमें ' प्रपनीता ' यह पाठ न मिलता । इससे स्पष्ट है कि - ' ऋग्वेद, के मन्त्रमें तो ' उपनीता ' यह ' उपस्थापित की गई इस अर्थ में क्तान्त क्रिया है, और ' अथर्ववेद ' के मन्त्रमें ' अपनीता ' यह बृहस्पति की स्त्रीका क्तान्त विशेषण है । ' प्रपनीता ' का अर्थ हर ली गई हुई हैं । इसमें ज्ञापक मन्त्र है- ' तेन जायामन्त्रविन्दत् बृहस्पतिः सोमेन नीताम् ' ( ऋ. १० १०६/५ ) इस लिये इस पर आर्यसमाजी श्रीराजारामजी शास्त्रीने यही अर्थ किया है- ' हर ली गई ब्राह्मणकी जाया भयावनी है ' । तब ' यज्ञोप-वीत धारण करके पत्नी भयंकर सबला बन जाती है ' | यह वादियों का अर्थं बनावटी सिद्ध हुआ । इधर वादी लोग वेदमें रूढ, योगरूढ शब्द नहीं मानते, तब ' उपनीता ' पदका सामान्य अर्थ ' उपस्थापित की गई ' यही होगा, ' ज्ञोपवीतवाली ' इस अर्थ में इसकी शक्ति नहीं । यदि इन मन्त्रोंका प्राध्या-त्मिक अर्थं माना जाए, तो भी यहां स्त्र्युपनयनकी कोई बात ही सिद्ध नहीं होती । इससे वादियोंकी सिकताभित्ति गिर गई । तब स्त्रीका इस मन्त्रसे वेदाध्ययन कैसा? ( ८ ) ' स्त्रिय उपनीता अनुपनीता: ' पर विचार । पूर्वपक्ष — ' पारस्करगृह्यसूत्र ' के निर्माणके समय वैदिक - मर्यादाका कुछ लोप हो चुका था, अतः उसमें ' स्त्रिय उपनीता अनुपनीताश्च ' ऐसा लेख सन् १ ९ ३६ में ' सिद्धविनायक प्रेस काशी ' में छपे संस्करणमें पृ. ८४ में पाया जाता है, जिससे सिद्ध होता है कि उस कालमें आर्य स्त्रियोंका उपनयन संस्कार हुआ करता था ' ( एक सिद्धान्तालंकार, सार्वदेशिक जून १ ९ ४६ ) । उत्तर- यदि ऐसा है; तो पारस्कर - वर्णित स्त्रियोंका उपनयन भी ' उपनीता ग्रनुपनीता: ' पर विचार [ ११३ वैदिक - मर्यादाका लोप हुआ, क्योंकि वादीने वैसा माना है । फिर तो चादी के स्वामी भी वैदिक - मर्यादाके कुछ विलोपक हुए, क्योंकि उन्होंने अपनी ' सं.वि.में पारस्करका अनुसरण किया है । जवकि ऐसा पाठ सब पारस्कर ग्रन्थोंमें नहीं है, एकमें दीखा है, तब स्पष्ट है कि यह पाठ किसी आधुनिकने उसे मूलमें प्रक्षिप्त कर दिया, अन्यथा सव ग्रन्थोंमें होता । पारस्कर जब कन्याओंके संस्कार में मन्त्र ही नहीं पढ़वाते, तब उसे उपवीत कैसे देंगे, यह वादी सोच नहीं सकता । देखिये पारस्कर - ' अथास्य ( पुत्रस्य ) मूर्धानमवजिघ्रति ' प्रजापतेष्ट्वा ' इत्यादि मन्त्रः । स्त्रियै मूर्धानमेव अवजिघ्रति तूष्णीम् ' ( १११८१६ ) ' तूष्णीं ' के हरिहर भाष्य में लिखा है-" विना मन्त्रण ' । श्री जयरामने भी लिखा है- ' स्त्रियास्तु मूर्भाव त्राणमात्र ' न त्वन्यत्, तदपि तूष्णीं नतु मन्त्रण ' । श्रव स्त्रियोंका ' उपनीता ' यह पद पारस्करके मत में प्रक्षिप्त हो गया । और फिर ' अनुपनीता ' पक्ष हो उस में क्यों? यदि मुद्रायन्त्रविशेषका नाम लेने से प्रामाणिकता होती है, तो .सं. १ ९ ६५ में ' मास्टर प्रिण्टिंग काशी में छपे हुए पारस्करमें लिखा है-' पु ' सामेवैतद् ( उपनयनं ) भवति, न स्त्रीणाम् ' तब वादीके पक्षका खण्डन हो गया । इस उद्धरणको श्रार्यसमाजी श्री इन्दु ० ने अपने ' कन्योपनयन संस्कार ' के द्वितीय स्तवक ५४ पृष्ठ में, बम्बई प्रार्यसमाजके उपदेशक श्री महा. शं. ने ' कन्योपनयनविधि ' के ३७ पृष्ठमें दिया है । सम्भवत: इसे ' पुरुषार्थ-' प्रकाश ' में स्वा ० नि.नं.जी ने भी उद्धृत किया है । श्री स. दे. सेठी शास्त्रिणीने ' संस्कृतम्, अयोध्या ' ( ११११० अङ्क ) में, शि.सि. ने ' सार्वदेशिक फर्वरी १ ९ ४८ में उद्धृत किया है, पर सबने उद्धरण देते हुए अन्धपरम्परा कर दी । देखा भी नहीं कि उक्त पाठ पा. गृ. के मूल में है भी या नहीं? वस्तुतः यह पा.गृ. के मूलमें तो है ही नहीं । यह ३।२।१ पारस्करसूत्रके हरिहर भाष्य में है । उपस्थापक लोग इसका पूर्व तथा उत्तर पाठ जनता स ० ध ०८
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११३ करतो उन्होंने ठ सब किसी होता । उपवीत नथास्य निमेव है-गमात्र पद ही उस है, है-खण्डन स्कार व्हा. शं. षार्थ-.सेठी देशिक रम्परा नहीं? ११४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ). की दृष्टिसे छिपा कर मध्यका पाठ जनताकी दृष्टिमें रखते हैं, जिससे अनुसन्धान न करने वाली साधारण जनता इनके पक्षको दूधका ला समझ ले । वस्तुतः ऐसा करना विद्वानोंकी दृष्टिमें अपने पक्षको दुर्बल सिद्ध करना है । जब यह मूल का पाठ नहीं, किन्तु टीकाका पाठ है, तो टीकाकार के अपने वाक्यसे पहले मूलका वचन देखना पड़ता है, तभी उसके सिद्धान्तका पता लगता है । अव पारस्करगृ. को देखना चाहिए कि उसकी कन्या -संस्कारके विषयमें क्या सम्मति है? उसके श्रवगाहनसे मालूम पड़ता है कि - पारस्करगृ. तो कहता लड़कोंका ही संस्कार है, लड़कियोंका नहीं । देखिये – ' जातस्य कुमारस्य ' ( १।१६।३ ) इसकी अनुवृत्ति सव संस्कारोंमें है । यहाँ पारस्करको जातिपक्ष इष्ट नहीं । ' कुमारस्य ' कहने से उसे जातिपक्षका बाघ इष्ट है, अन्यथा ' जातस्य ' ही कहना पर्याप्त था, उसीसे जातिपक्षवश ' जाताया: ' उत्पन्न लड़कीका ग्रहण हो जाता, पर पृथक् ' कुमार ' शब्द कहने से यहाँ जातिपक्ष वार्धित हो गया । इसलिए इस सूत्र की टीकामें श्रीकर्काचार्यंने कहा है- ' कुमारग्रहणाच्च श्रतः प्रभृति स्त्रिया न भवति ' । इसी बातको श्रीगदाधरभट्टने भी लिखा है । यहाँ श्रीवेणीराम गौडकी विवृति भी है - ' अत्र सूत्र े ' कुमार ' पदपाठाद् इतः प्रभृति कार्य स्त्रीणां न भवतीति ध्वन्यते ' ( पृ. ५७ ) । इस प्रकार पारस्करके मतमें कुमारीके वैध संस्कार होते ही नहीं । जहाँ पर उसे कुमारीका कोई कर्म इष्ट होता है, वहाँ उसका नाम भी कह देता है, और ' तूष्णीम् ' कहकर मन्त्रका भी निषेध कर देता है । जैसाकि हम है । १८ । ६ का उद्धरण ऊपर दे चुके हैं । स्वा. द. जीने भी सूत्र • प्रथम संस्कारविधि नामकरण ३६ पृष्ठमें लिखा है- ' अ गादगात् सम्भवति ' जनता यह मंत्र पढ़के पुत्रका शिर सूघे ११। कन्याकी भी इस प्रकारसे क्रिया नामकरणकी करें, किंवा मन्त्रको छोड़ के । इस भान्ति पार.गृ. में अवशिष्ट संस्कारोंमें भी समझ लेना चाहिए । ' उपनीता श्रनुपनीता ' पर विचार [?? % जैसा - ' पष्ठे मासि अन्नप्राशनम् ' ( १ | १३ | १ ) यहाँ श्रीकर्कने भाष्य किया है – ' कुमारस्य कर्तव्यमिति शेषः । उसका कारण है ' जातस्य ' से भिन्न ' कुमार ' की श्रा रही हुई अनुवृत्ति ' । इस प्रकार जयराम श्रादि अन्य भाष्यकारों ने भी लिखा है । चूडाकरणमें ' कुमारमादाय ' ( २ । १ । २४ ) और ' उपनयन ' में ' तं च पर्युप्तशिरसम् ' ( २२२५ ) यहाँपर श्रीककने लिखा है- ' तं च इति कुमारोऽभिधीयते ' । इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि पारस्करगृह्यसूत्र स्त्रियों का उपनयन " नहीं चाहता, तब उसका कोई भाष्यकार भी ' स्त्रिय उपनीताः ' कैसे लिखे? यदि लिखे भी, तो फिर उससे विरुद्ध कैसे लिखे स्त्रियोऽनुप-नीताः । फिर भी ' पारस्करगृ. ' के हरिहरभाष्यसे जो कि- ' स्त्रिय उप-' नीता अनुपनीताश्च ' यह वाक्य कई ग्रार्यसमाजियोंकी श्रोरसे उद्धृत किया जाता है, उसकी परीक्षा करनी चाहिये कि उसका क्या अभिप्राय है? यह उद्धरण ३।२।१ सूत्रस्थ- हरिहरभाष्यसे दिया जाता है । उसमें पूर्वपक्षी इस उद्धरणका पूर्व और उत्तर पाठ जनताको दृष्टिमें नहीं आने देते । श्रब हम उनसे छिपाए हुए पाठको उद्धृत करते हैं, जिससे वादियों का अभिप्रेत प्राशय निरस्त हो जायेगा । वह पाठ यह है । ' तमरुह्य ते पुये उपनीता: [ यह ' उपेता जपन्ति ' पार. ३१२११२ सूत्रकी व्याख्या है ] ते ' सुहेमन्त: ' इति मन्त्रं जपन्ति ' अर्थात् उनमें जो उपवीतधारी पुरुष होते हैं, वे ' सुहेमन्त: ' इस मन्त्रको बोलते हैं । इसके आगे प्रकृत पाठ यह है-" अथ ' स्योना पृथिवि! ' इत्यनया ऋचा स्वामि - प्रभृतयः, स्त्रियः, उपनीताः, अनुपनीताश्च सर्वे यथोक्तक्रमेण दक्षिणपार्श्वः, प्राक्शिरसः संविशन्ति - स्वपन्ति ' ( ३।२।१-१२ ) यहाँ पर ' उपनीता अनुपनीताश्च ' यह ' स्त्रियः ' का विशेषण नहीं है, किन्तु ' स्वाभिप्रभृतयः सर्व ' के ये विधेय विशेषण हैं । वहां प्रर्थ यह है कि - स्वामी तथा अन्य बड़े - छोटे, स्त्रियां, . तथा उपनीत अनुपनीत सभी लोग क्रमशः दाहिनी करवटसे पूर्व दिशाकी ओर सिर करके लेटें ' ।
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११६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यहाँ पर स्वामी आदि जो बड़े उपनीत होते हैं; जो छोटे तथा स्त्रियां अनुपनीत होती हैं, उन सभीको लेटना पड़ता है । इस वाक्य में उपनीत-अनुपनीत सबको नियत स्थान पर लेटनेका विधान आया है; यह ' उप-नीताः ' शब्द स्त्रियोंका विशेषण नहीं है । अथवा ' स्वामिप्रभृतयः, तथा स्त्रियः ' यह दो पद उसके मुकाबलेके भी दो पद हैं- ' उपनीता अनुप -नीताश्च ' । तो ' यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ' इस न्यायसे ' उपनीताः ' यह ' स्वामिप्रभृतयः ' का विशेषण है; और ' अनुपनीताः ' यह ' स्त्रियः ' का विशे-पण है । प्रद विद्वान् पाठकोंने देख लिया होगा कि अपने निराधार पक्षको सिद्ध करनेके लिए वादी लोग किन - किन अवैध हथकण्डोंका अवलम्बन किया करते हैं । ' स्त्रिय उपनीता अनुपनीताश्च ' से पूर्व जो ' स्वामिप्रभृतयः ' पाठ था, तथा उसके बाद ' सर्वे ' यह पाठ था; जो ' उपनीता अनुपनीताः ' का विशेषण था — उसको यह लोग छिपा दिया करते हैं । केवल इसलिए . कि- किसी प्रकार इनका निर्मूलपक्ष समूल सिद्ध हो जावे । जबकि मूल-कार स्त्रीका उपनयन नहीं मानते, भाष्यकार हरिहर प्रादि भी वैसा नहीं मानते, तब बलात् उनके पूर्वापररहित उद्धरणसे वैसा कैसे सिद्ध हो जावेगा? सूक्ष्मदर्शी पाठक अब इनसे छिपाये हुए पाठसे समझ गये होंगे कि — इनका पक्ष अब भी वैसेका वैसा निर्मूल ही रहा । तब स्त्रियोंका उपनयनमें इस वाक्यसे अधिकार सिद्ध न होनेसे वेदमें भी अधिकार न रहा । ( e ) ' यज्ञोपवीतमार्गेण ' पर विचार । पूर्वपक्ष - ' यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना तेन तपस्विनी । सा पृथिव्यां पृथुश्रेणी पपात प्रियदर्शनी ' ( ६१८१ ) यह वर्णन नकली सीतादेवीके यज्ञोपवीतके मार्गसे राक्षस द्वारा काटे जानेका है । उसका समस्त श्राकारादि धोखा देनेकेलिए ठीक सीताजी जैसा बनाया गया था । श्रतः यज्ञोपवीतमार्गन पर विचार [ ११७ सीतादेवीका यज्ञोपवीतघारण इससे सूचित होता है ' ( श्रीरवि. ' नातं ' ' हन्दु ' में; श्रीध.दे. ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' में ) । उत्तरपक्ष - जब वादी असली सीताके वर्णनसे उसका यज्ञोपवीत सिद्ध नहीं कर सकते, तव नकली सीताके वर्णनसे उसका यज्ञोपवीत कैसे सिद्ध कर सकते है? उन्हें याद रखना चाहिए कि- सीताका विवाह छः वर्षकी आयुमें हुआ था ( यह आगे सप्तम पुष्पमें प्रकृत - निबन्धमें बतावी ), वे उसका यज्ञोपवीत कब मानेंगे? क्षत्रियका यज्ञोपवीत बारहवें वर्षमें होता है, और फिर उसका गुरुकुलमें गमन और निवास कब और वर्ष तक मानेंगे? रामायण में सीताके विवाह के समय या उससे पूर्व कहीं उसका यज्ञोपवीत नहीं दिखलाया गया, यह अवश्य स्मृतंव्य है । उक्त पद्यका वादि प्रदर्शित अभिप्राय भी ठीक नहीं, वादीने ' यज्ञोपवीतके मार्ग से सीताको काट डाला ' यह गोलमटोल अर्थ कर डाला, यह अर्थ संगत ही नहीं होता । वस्तुतः उसे यह अर्थ समझ ही नहीं आया, या फिर उसने उसे छिपाया | यहाँ पर ' मार्ग ' शब्द ' शैली ' या ' रीति'-वाचक है | महाकवि दण्डीने अपने ' काव्यादर्श ' में लिखा है- ' अस्त्यनेको गिरां मार्गः सूक्ष्मभेद: परस्परम् । तत्र वैदर्भगौडीयौ वयते प्रस्फुटान्तरौ अर्थात् कविवाणियों - कविताओं के अनेक मार्ग - शैलियां होती हैं, जिनमें बहुत सूक्ष्म अन्तर रहा करता है । उसमें दो ' मार्ग ' वैदर्भ और गौडीय हैं, जिनमें परस्पर अन्तर स्पष्ट है । यहाँ ' मार्ग ' शब्द शैली एवं रीति-वाचक है । दण्डीसे अर्वाचीन साहित्यिकों- श्रीमम्मटभट्ट, श्रीविश्वनाथ-आादियोंने इसी मार्गका नाम ' रीति ' रखा है, गौड़ी रीति, वैदर्भी रीति । इसी प्रकार रामायणके उक्त वाक्योंमें भी ' मार्ग ' शब्द शैली, रीति-वाचक ही है; अर्थात् मेघनादने उस नकली सीताको ' यज्ञोपवीतकी शैली से, यज्ञोपवीतकी रीति - ढंगसे अर्थात् यज्ञोपवीतकी तरह काट डाला । अभिप्राय यह है कि जैसे यज्ञोपवीतसूत्र बाएं कन्धेसे प्रारम्भ होकर दाहिनी कमर तक ' चपरास ' की तरह लटकता है, जैसाकि इस विषय में
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[ ११७ ११८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) . ' आयं गोभिलने इस परिभाषाको इस प्रकार स्पष्ट किया है- " दक्षिणं वाहुमुद-झोपवीत धृत्य शिरोऽबधाय सव्ये असे प्रतिष्ठापयति दक्षिणकक्षमन्ववलम्बं भवति, बीत कैसे एवं यज्ञोपवीती भवति ” ( १२/२ ) वैसे ही मेघनादने भी नकली सीताके वाह छ: बाएं से लेकर दाहिनी बगल तक उसे तेज़ - तलवारसे काट डाला, तावेगे ), जिससे वह गिर गई । यहीं इस बातको स्पष्ट करनेवाला पद्य भी मिलता वें वर्ष में है — ' तमेवमुक्त्वा रुदतीं सीतां मायामयीं च ताम् । शितधारेण खड्गेन कितने निजघानेन्द्रजित् स्वयम् ( ६।८१।२ ९ ) । कहीं हम इस अर्थ में प्राचीन टीकाकारों की सम्मति भी दिखलाते हैं, जिससे वादीने हमारा पक्ष सिद्ध होगा । ' रामायणशिरोमणिकार ' ने लिखा है - ' यज्ञोपवीत-र डाला, मार्गेण - ' तदुपलक्षित शरीरार्धदेशेव छिन्ना ' यहां वही हमारा किया हुआ अर्थ स्पष्ट है । इससे भी अधिक स्पष्टता गोविन्दराज - कृत ' भूषण ' टीकामें ' रीति'- आया, देखिये – ' यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना [ अत्र ] ' मार्ग ' शब्द: ' प्रकार ' वचन: । स्त्यनेको यज्ञोपवीत धारणप्रकारेण छिन्ना इत्यर्थः [ कितनी स्पष्टता है? ] । मूर्धजेषु गृहीतामादाय यज्ञोपवीत - प्रकारेण भिन्ना यज्ञोपवीतं यया भवति, तयां तजिनमें भिन्ना - यज्ञोपवीतप्रकारेण भिन्ना ' इत्यर्थः । " ( यहाँ ' मार्ग ' शब्दका अर्थ गौडीय है — प्रकार, तरीका । जनेऊके धारणके ढंगसे सीताको काट डाला । वं रीति- वालों में पकड़कर जनेऊ के विन्यासकी तरह नकली सीताको चीर डाला ) इससे अधिक स्पष्टता श्वनाथ-उच्छिन्न हो गया । रीति । ' यज्ञोपवीत ' अर्थ , रीति-नहीं लाई जा सकती टीकाकार क्या करते? इस प्रकार वादीका पक्ष उस प्रकरणमें हो भी नहीं सकता । सीता नंगी तो थी कि उसका यज्ञोपवीत दीख जाता । वस्त्राच्छन्न की शैली उसका यज्ञोपवीत कहाँ दीखता? उक्त प्रकरणमें उसकी बाहरी प्राकृति - डाला । दिखाई गई है, उसके शरीरकी नहीं । यज्ञोपवीत कपड़ोंके नीचे छिपा होकर होता है, कपड़ोंके ऊपर नहीं होता । तब वहाँ सीताका यज्ञोपवीत प्रसक्त - विषयमें ही नहीं हो सकता । श्रतएव यहाँ उस नकली सीताके जनेऊ पहरनेके ढंगसे काटने से वादी पक्षकी कोई सिद्धि नहीं । वादीके अर्थसे भी उसकी ' यज्ञोपवीतमार्गेण ' पर विचार [ ११६ पक्ष - सिद्धि नहीं होती । इस विषय में हम रामायण की दूसरी अन्तः साक्षी भी दिखलाते हैं; जिससे वादीका पक्ष कट जावे- ' तस्यांस फलके खड्गं निजघान ततोऽ-ङ्गदः । यज्ञोपवीतवच्चैनं चिच्छेद कपिकुञ्जरः ( ६।७६।१० ) उसके कन्धेपर प्रङ्गदने यज्ञोपवीतकी भान्ति, यज्ञोपवीतके ढंगसे तलवारसे काट दिया; अर्थात् जैसे यज्ञोपवीत वाएं कन्धे पर और दाहिनी कोखपर होता है, वैसे ही प्रङ्गदने कंपन राक्षसको बाएं कन्वेसे दाहिनी कोख तक तिछे ढंगसे तलवारसे काट डाला । इस प्रकार सीताके काटनेके विषयमें भी समझ लें । ' यज्ञोपवीतवत् ' और ' यज्ञोपवीत - मार्गेण ' दोनों पद्योंका अर्थ समान है । ( १० ) ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ' पर विचार । पूर्वपक्ष - अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( १४१६ ४११६, वृहदा. ६।४।१७ ) शतपथके इस प्रकरणमें यहां लड़कीको पण्डिता बनाने-का उल्लेख है । इससे उसका वेदाध्ययन सिद्ध है । शास्त्रोंमें पण्डितका ऐसा ही अर्थ लिखा है । जैसेकि - विदुरनीतिमें- ' प्रात्मज्ञानं समारम्भ: तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते । २० । प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊह्वान् प्रतिभानवान् । ग्राशु ग्रन्यस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते । २ = | श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा । असम्भिन्नायं-मर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ( २४ ) । ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं, ' धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( मनु ० ) इत्यादिके अनुसार जब वेद जाने बिना कोई परमात्मा तथा धर्मका यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, ता स्पष्ट है कि पंडितके लिए भी वेदज्ञान अनिवार्य है, सो शतपथमें ' पण्डिता ' शब्दका ऐसा सर्वग्राही प्रयोग कर दिया है, जो १, २ या ३ वेदोंके अध्ययनसे भी अधिक विशाल हैं ' ( एक सिद्धान्तालंकार सार्वदेशिक अगस्त १ ९ ४६ )
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१२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) उत्तरपक्ष ( १० ) —शतपथ ब्राह्मण वा वृहदारण्यक उपनिषद्में पुत्रको तो वेदका अधिकार दिया गया है, लड़कीको नहीं । देखिये- ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे वेदमनुब्रुवीत ' ( १४१६१४११३ ) यहाँ पर शतपथने पुत्रको एक बेदका अधिकार दिया है । ' पुत्रो मे द्वौ वेदी अनुबुवीत ' ( १४ ) यहाँ पर उसने पुत्रको दो वेद पढ़नेका अधिकार दिया है, ' पुत्रो मे त्रीन् वेदान् अनुब्रुवीत ' ( १४ | ६ | ४ | १५ ) में पुत्रको तीन वेदोंके अध्ययनका अधिकार दिया है । ' पुत्रो मे पण्डितो विजिगीथः, समितिङ्गम, भाषिता जायेत, सर्वान् बेदान् अनुब्रवीत ' ( १४ | ६ | ४११७ ) यहाँ पर शतपथ ब्राह्मणने पुत्रके लिए पाण्डित्य ( बुद्धिमत्ता ) का, तथा सब वेदोंका पढ़ना मांगा है; पर लड़कीकेलिए शतपथने ‘ अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( १४ । १ । ४।१६ ) केवलमात्र पण्डिता ( बुद्धिमती ) होना मांगा है, लड़कीकेलिए वेदानुवचन नहीं मांगा । सब अथवा तीन, दो वेदोंका वा एक वेदका अनुवचन भी दूर, • श्राधे वदका, वा १/४ व ेदका अनुवचन भी लड़कीके-लिए नहीं माँगा । देखिये अजमेर वैदिक यन्त्रालयका शतपथ ( ७४५-७४६ पृष्ठ ) । इसी प्रकार बृहदारण्यक उपनिषत् ( ६।४।१४-१५-१६-१७ १८ ) में भी देख लेना चाहिये । इससे शतपथ- जो ब्राह्मणभागात्मक यजुर्वेद है - के मतमें लड़कीको वेदाधिकार सिद्ध नहीं होता । शतपथ अपनी भिन्न - भिन्न कण्डिकाओं में पुत्रकेलिए बार - बार वोदका नाम लेता हुआ भी नहीं थकता, ' पुत्रो मे पण्डितः, सर्वान् वेदान् ग्रनुबुवीत ' ( १७ ) यहाँपर पुत्रको ' पण्डित होने तथा पंडितत्वसे पृथक् सब व ेदोंका अधिकार देता है, पर वही वेद - शतपथ लड़कीकेलिए ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( १६ ) कह कर चुप हो जाता है, उसे पण्डिता - सयानी तो बनाना चाहता है, पर वह लड़कियोंको वेदका अधिकार नहीं देता । वह ' पंडितत्व ' से ' वेदाविकार ' पृथक् वस्तु मानता है, लड़केको वह पण्डितत्व और वेदा-धिकार दोनों देता है, पर लड़कीको वेदाधिकार न देकर केवल पण्डिता-त्वमात्र देता है, सो यहाँ पण्डितात्व स्पष्ट ही घरके काम - काजमें विश्रान्त ' दुहिता म पण्डिता जायत ' पर विचार [ १२१ है । जैसे कि – वृहदारण्यककी उक्त कण्डिकाकी व्याख्या करते हुए श्राचार्य. शङ्करने कहा है — ' दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्रविषयकमेव, ( न विषयकम् ) बेदेऽनधिकारात् ' यह व्याख्या निर्मूल भी नहीं है, किन्तु मूलानुसारिणी ही है । यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । इधर वही शतपथ लड़केसे लड़कीका ग्रहण न मानकर वेदानुवचनमें ' जातिपक्ष ' का भी सर्वथा बाध कर देता है; तव " उसी शतपथको ' पण्डिता ' शब्दसे दुहिताको वेदाधिकार देना भी इष्ट है " यह वादीका कयन उसक अपनी भयङ्कर भूलको ही स्पष्ट कर रहा है; तभी तो उसकी कण्डिकामें लड़केकेलिए बहुत बार वेदाध्ययन कहे होनेपर भी लड़कीके. लिए एक बार भी वेदाध्ययन नहीं कहा गया । ' विदुरप्रजागर ' में ' पण्डित ' के लक्षण हैं, ' पण्डिता ' के नहीं; तव दे पुरुषमें चरितार्थ हो जाएंगे । पण्डिताके लक्षण वहाँ न होनेसे यहां ' पण्डिता ' शब्द ' सयानी ' प्रथमें विश्रान्त हुआ । विदुरनीतिके पंडितके लक्षणमें वेदका नाम भी नहीं । नीतिमें वेदका कोई प्रकरण भी नहीं । कमसे कम ' शतपथ ' को तो उक्त स्थलमें दुहिताका पांडित्य वेदानुवचनसे भिन्न इष्ट है, तभी तो पुत्रके वाक्यमें ' पुत्रो मे पंडितो जायेत ' यह पृथक् । ' कहा है, ' सर्वान् वेदान् अनुब्रुवीत ' यह पृथक् कहा है । यदि ' पंडित ' शब्दका प्रयोग शतपथको सव वेदोंके अध्ययनसे भी विशाल इष्ट होता, तो पुत्र वाले वाक्यमें ‘ पंडित ' कहकर ' शतपथ ' को फिर पुत्रकेलिए उससे पृथक् । सब वेदोंका अनुवचन कहना क्यों सूझा? देखिये शतपथ - ' पुत्रो मे पंडित, सर्वान् वेदाननुबुवीत ' ( १७ ) उक्त कण्डिका में शतपथ ( ब्राह्मण - वेद ) को ' पंडित ' शब्द वेदानुवचनसे विशाल अभिमत न होनेसे ही शतपथने ' पुत्रकें पण्डितत्व ' पर सन्तोष न करके उसके लिए वेदानुवचन पृथक् कह डाला ॥ और लड़कीके ' पंडितात्व ' पर ही सन्तोष करके उसकेलिए अनधिकृत वेदको शतपथने अनुशिष्ट नहीं किया । इससे स्पष्ट है कि- शतपथको । दुहितावाले वाक्यमें ' पंडिता ' का अर्थ ' बुद्धिमती ' इष्ट है । वुद्धि जन्मसे
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[ १२१ १२२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) - आचार्य. वेद- - ही होती है, वहाँ विद्याध्ययनकी आवश्यकता नहीं । बुद्धिकी विपरीत है, किन्तु कोटिमूर्खता तो अध्ययनसे भी सम्भव है - ' शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति ' मूर्खा ' । विद्या पढ़े भी ब्राह्मण बुद्धिमान् नहीं थे, यह पञ्चतन्त्रमें ‘ वरं दानुवचनमें बुद्धिर्न सा विद्याविद्याया बुद्धिरुत्तमा ' इस कथा में प्रसिद्ध है । तो उक्त शतपथको लड़की वाले वाक्यमें उसे ' पंडिता ' बनानेका नहीं, किन्तु जन्मसे ही का कयन ' पंडिता ' ( बुद्धिमती, सयानी ) होनेका निर्देश है जोकि — घरके कार्योंमें तो उसकी इष्ट है । लड़कीके ' नावेदविद् मनुते ' इत्यादिमें ' वेदके शब्द जामनेवाला ' इष्ट नहीं, ` किन्तु ' वेदके अर्थ जाननेवाला ' इष्ट है क्योंकि - वेदका केवल शब्द तो ; तब वे ' अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कहिचित् ' के अनुसार ज्ञानकांडमें, मोक्ष-जैसे यहाँ ' जिज्ञासा में काम नहीं दे सकता! वेदका अर्थ तो वेदके भाष्यभूत अनादि-के पंडित के प्रवृत्त पुराणों तथा इतिहासोंसे जैसाकि - सायणने अपने ऋग्वेद - भाव के भी नहीं । उपोद्घातमें लिखा है- ' ऐतरेय तैत्तिरीय- काठकादिशाखासु उक्तानि दानुवचनसे हरिश्चन्द्रनाचिकेताद्य ुपाख्यानानि धर्म - ब्रह्माववोघो युक्तानि तेषु तेषु यह पृथक् इतिहास ग्रन्थेषु स्पष्टीकृतानि । उपनिषदुक्ताः सृष्टि - स्थिति - लयादयो ब्राह्म-शब्दका पाद्म - वैष्णवादि - पुराणेषु स्पष्कृताः ' तथा अपने पिता वा पतिसे भी निष्कर्ष तो पुत्र रूपसे प्राप्त हो जाता है, उसमें स्त्रीको निषेध नही । निषेध उसका ससे पृथक् शब्दात्मक, नियत - पद - प्रयोग - परिपाटीक वेदमें ही है, वह भी क्रमिक और पंडित, वैध अध्ययनका ( मनु. २।१७२- १७३ ), क्योंकि - उसमें अधिकार नियतों -बेद ) को । का होता है, सर्वसाधारणोंका नहीं । ' धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाण परमं बने ' पुत्रके श्रुतिः ' कहने वाले मनु स्वयं स्त्रीको वेदका अधिकार नहीं देते, अतः व्ह डाला उनका उद्धरण देना व्यर्थ है । तव स्त्रियोंकेलिए ' परम प्रमाण ' की अनधिकृत आवश्यकता भी नहीं, उसकी श्रावश्यकता और उसमें अधिकार केवल - शतपथको द्विज पुरुषोंके लिए ही है । सेवक तथा सेविका तो वह मेवा सेव्यसे द्धि जन्मसे अनायास ही यथावकाश प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि- स्त्रीशूद्रादिका धर्मं सेवा होनेसे उन्हें नियमितताका अवकाश होता ही नहीं, ' नास्ति स्त्रीणां दुहिता में पण्डिता जायेत पर विचार [ १२३ पृथग् यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । पनि शुश्रूपते येन तेन स्वर्गे महीयते ' ( ५।१५४-१५५ ) यह मनुजीकी स्पष्ट ग्राज्ञा है, अतः कोई दोष नहीं । इसी तरह श्रीसायणने भी अपने ऋग्वेद उपो में कहा है - ' स्त्री - शूद्रयोः सत्यपि धर्मब्रह्मोपाय - त्रोघायित्वे हेत्वन्तरेण वेदाविकारस्य प्रतिव ( पि ) द-त्वात् । उपनीतस्यैव अध्ययनाधिकारं ब्रुवत् शास्त्रम् अनुपनीतयोः स्त्रीशूद्रयो-वेदाध्ययनमनिष्टप्राप्तिहेतुरिति बोधयति । तयोः तदुपायावगमः पुराणादि-भिर्जायते । श्रतएवोक्तम्- ' स्त्री - शूद्र - द्विजवन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमाख्यानं मुनिना कृपया कृतम् ' इति । इसका अर्थ हम पूर्व कर चुके हैं । ( ११ ) पूर्वपक्ष - ' पुत्र ' शब्द ' जाति ' वाचक हुआ करता है, तभी तो ' पुमांसं पुत्रमाधेहि ' ( अ. ६।१७ १० ) यहाँपर ' पुमांस ' विशेषण सायंक है, अन्यथा ' पुत्रम् ' इस पुंलिङ्गसे ही ' पुत्र ' का नाम सिद्ध और कन्याका नाम निषिद्ध हो सकता है, तब ' पुमांस ' विशेषण व्यर्थ हो जावेगा । इस प्रकार ' पुत्र ' शब्दसे ' पुत्री ' का ग्रहण भी जब सिद्ध है, तब पुत्रको वेदाधिकार देनेवाली शतपथकी ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो जायेत, सर्वान् वेदान् अनुब्रुवीत ' ( १४/६/४४१७ ) इस कण्डिका पुत्रीका भी वेदाधिकार सिद्ध होता है । ( म.म. पं ० शिवदत्त शर्मा सिद्धान्तकौमुदी तत्त्वबोधिनी स्त्री - प्रत्यय १५२ पृष्ठ - टिप्पणी ) । उत्तरपक्ष — महामहोपाध्यायजीका ' पुत्र ' शब्दको जातिवाचक सिद्ध करनेकेलिए ' पुमांसं पुत्रमाधेहि ' ( अथर्व. ) इस मन्त्रके ' पुमांस ' पदको · प्रमाणस्वरूप देना ठीक नहीं । यहाँ ' पुमांसम् ' शब्द पुंलिङ्ग अर्थ बोधन करानेवाला नहीं, ' पुमांस ' में ' अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ' ध्वनि ही है, उसका तात्पर्य है ' शूर ' । जैसे लोग कहते हैं — यह मर्द श्रादमी है । जैसेकि - मनुस्मृति में ' सुरूपं वा कुरूपं वा पुमान् इत्येव भुजत ' ( मनु. 21 १४ ) यहाँ ' पुम् ' शब्द ' बलवीर्यशाली ' वाचक है, पुरुष वाचक नहीं । अन्यथा ' यह मर्द आदमी है इसमें पुनरुक्ति हो जाय, और मनुके पद्यमें
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१२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' पुमान् ' व्यर्थ हो जावे । पूर्वोक्त शतपथके ( १४१६/४/१७ ) इस प्रक्षिप्त वाक्यमें ' पुत्र ' शब्द यदि ' जाति ' वाचक इष्ट होता, तो ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो जायेत, सर्वान् वेदाननुबुवीत ' इस वाक्यसे पुत्रीका भी पण्डितत्व तथा वेदानुवचन सिद्ध हो जाता, फिर पुत्रीकेलिए ' अथ य इच्छेद् दुहिता मे पंडिता जायेत ' ( शत १४ | ६ | ४ | १६ ) यह उसके साथ वाली कण्डिका जिसमें दुहिता के लिए पुत्रकी तरह वेदका नाम न लेकर केवल उसके पण्डितात्वमात्रा उल्लेख है - व्यर्थ हो जाती, उसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी, पः उस कण्डिकाके पृथक् लिखनेसे तथा उसके साथ वेदानुवचन न लिखने । सिद्ध हो रहा है कि यहां जातिपक्ष बाधित है, पुत्रसे पुत्रीका ग्रहण नहीं होता, और पुत्रीको वेदका अधिकार भी नहीं - यह स्पष्ट है । ( ११ ) म. म. पं ० शिवदत्तजीका मत । आर्यसमाजी - बिन स्त्रियोंके उपनयन - वेदाधिकार विषयमें जैमिनि-न्यायमाला, सिद्धान्तको द्दीकी टीका, ऋक्सूक्त संग्रहकी टिप्पणी, न्याय-सिन्धु, आर्यविद्यासुधाकर ग्रादिकी टिप्पणीसे म. म. पं ० शिवदत्तजीका मत उद्धृत करते हैं, हम उस मतको पूवपक्षमें उद्धृत तथा अनूदित करके अपना उत्तरपक्ष देंगे । ( १२ ) पूर्वपक्ष - जैमिनीयन्यायमाला - प्रानन्दाश्रम प्रेस पूना - ३०५ पृष्ठ ( क ) अस्यैव प्रधिकरणस्य [ पत्नीयज्ञाधिकारस्य ] अनुसारेण ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत इत्यत्रापि स्त्रिया अधिकार: ' ( इसी अधिकरण ( पत्नीके यज्ञाधिकार ) के अनुसार ' आठ वर्षके ब्राह्मणका उपनयन करे और उसे पढावें, इस ८ वर्षमें लड़कीको उपनयनका अधिकार भी है । ( ख ) अतएव ' प्रादृतां यज्ञोपवीतिनीम् ग्रभ्युदानयन् जपेत् - इति गोभिलगृह्यसूत्रम् ( २/१/१६ ) ( इसलिए ' प्राकृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' म.म.जीका मत [ १२५ इस गोभिलसूत्र में भी स्त्रीकेलिए यज्ञोपवीत पहनना लिखा है । ) ( ग ) ' पश्चादग्नेः संवेष्टितं कटम् पदा प्रवर्तयन्तीं वाचयेत् - ' प्र मे पतियानः पन्थाः कल्पताम् ' ( २।१।२० ) इति च ' ( लपेटी चटाईको पांवसे फैलाती हुई स्त्रीसे यह मन्त्र बुलवावे - ' प्र मे पतियानः... ( घ ) ' मनसा भर्तु रतिचारे श्रिरात्रं यावकं क्षीरोदनी वा भुञ्जाना श्रधः शयीत, ऊं त्रिरात्राद् शप्सु निमग्नायाः सावित्र्यष्टशटेन शिरोभिर्जुहुयात् पूता भवति ' ( २०।५ ) इति वशिष्ठ स्मृतिः । ( मनसे यदि स्त्री भर्ताका अतिक्रमण कर चुकी हो; तीन रात नीचे सोवे । उसके बाद पानी में डुबकी लगाकर सावित्रीके शिरोमन्त्रका १०८ बार हवन करे । इससे पवित्र हो जाती है ( वशिष्ठ ) । ( ङ ) ' अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत, सर्वमायु-रियात् - इति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ईश्वरौ जनयितवं, . इति वृहदारण्यकोपान्त्य - श्रुतिश्च ' । ( जो चाहे कि - ' मेरी लड़की पण्डिता बने; तो पति - पत्नी तिलौदन घीमें पकाकर खावें । यह बृहदारण्यकको उपान्तश्रुति है । ) ( च ) ' कठी बह्व चीत्यादिप्रयोगसाधकम् शाखाध्येतृवाचौ च शब्दो जातिकार्य लभते इत्यर्थकम् ' गोत्रं च चरणैः सह ' इति वार्तिकं च संगच्छते । ( कठी, वह्न ची - इत्यादि प्रयोगवाचक ' शाखाध्येतृवाचक ' शब्दको जातिकार्यं ङीप हो जाता है, इस अर्थवाला ' गोत्र ' च चरणैः ' वार्तिक भी सङ्गत हो जाता है । ) ( छ ) किंच यजमानपत्न्या अध्ययन-मन्तरेण ऋत्विगादिप्रोक्तस्यार्थस्य ज्ञानाभावाद् उक्त कर्मणि प्रवृत्तिरेव न स्यात् ' ( इसके अतिरिक्त यजमान - पत्नीको यदि पढ़ाया नहीं जावेगा; तो उसे ऋत्विक् प्रादिसे कही हुई संस्कृतके ज्ञान न हो सकनेसे उस स्त्रीकी कर्ममें प्रवृत्ति ही न हो सकेगी । ) ( ज ) संस्कृतातिरिक्त भाषणं तु ' नायज्ञियां वाचं वदेत्, इत्यादिना निषिद्धमेव ' ( यदि न पढ़ी हुई स्त्री संस्कृत से भिन्न हिन्दी यदि वोलेगी; तो यज्ञमें ' श्रयज्ञिय ' ( असंस्कृत ) वाणी न बोले ' इस वचनसे निषिद्ध होगा । ) ( झ ) ' उपलभ्यते च प्राचीनेतिहासादिषु सीतामहाश्वेतादीनां यज्ञोपवीतधारणपूर्वक - सन्ध्यो-पासनमपि ( प्राचीन इतिहास आदिमें सीता - महाश्वेता श्रादिका