साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ — पृष्ठ 111–120

साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ · Chaukhamba Vidya Bhavan Varanasi · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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सस्कृत हिन्दी - व्याख्योपेता ९ ५ अवक्तृत्व, हाथों का लूलापन, पैरों का पङ्गुत्व, पायु का टट्टी न होना, उपस्थ का नपुंसकता, मन का स्मरणशक्ति का नाश हो जाना । इन्हीं ११ इन्द्रियों के बधों को बुद्धिवधों के साथ मिलाकर अशक्ति कहा है । अव प्रश्न यह होता है । कि वे बुद्धिबध कितने हैं और कौन - कौन से हैं? इसका उत्तर कारिका में दिया कि नौ प्रकार की तुष्टियों और आठ प्रकार की सिद्धियों के विपर्यय से १७ प्रकार भेद बुद्धिबधों के माने हैं । इस प्रकार ११ इन्द्रियबध और १७ बुद्धिबधों को मिलाकर अट्ठाइस २८ भेद अशक्ति के हो जाते हैं । अशक्ति के हो जाते हैं । अब रहा प्रश्न यह कि वे ६ प्रकार की तुष्टियाँ तथा ८ प्रकार की सिद्धियाँ कौन - कौन हैं इस प्रश्न का उत्तर हम क्रमशः ५० और ५१-वीं कारिकाओं के आधार पर देंगे ॥ ४६ ॥

पूर्वोक्त नौ प्रकार की तुष्टियों को बतलाते हैं—

आध्यात्मिदयश्चतसः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः ।

बाह्य विषयोपरमात् पञ्च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥५० ॥

गौ ० - विपर्ययात् ', तुष्टिसिद्धीनामेव भेदक्रमो द्रष्टव्यः, तत्र तुष्टि-नवधा कथ्यते - आध्यात्मिक्यश्च तत्र स्तुष्टयः, आध्यात्मनि भवा आध्यात्मिक्य: ३ ताश्च प्रकृत्युपादानकाल भाग्याख्याः । तत्र प्रकृत्याख्या यथा कश्चित् प्रकृति वेत्ति तस्याः सगुण निर्गुणत्वं च तेन तत्त्वं तत् कार्य विज्ञायैव केवलं तुष्टस्तस्य नास्ति मोक्षं एषा प्रकृत्याख्या । उपादानाख्या यथा कश्चिद-विज्ञायैव तत्त्वान्युपादानग्रहणं करोति त्रिदण्डकमण्डलुविविदिषाभ्यो मोक्ष इति, तस्यापि नास्ति मोक्ष इति एषा उपादानाख्या । तथा कालाख्या-१. विपर्ययादिति । यतो विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनां सप्तदश वुद्धिवधा भव । न्त्यतस्तेषामेव क्रमो वर्णनीयः प्रतियोगिज्ञानपूर्वकत्त्वाद्विरोधिज्ञानस्येति भावः । २. प्रकृत्याद्यतिरिक्तमात्मानं ज्ञात्वाप्यसदुपदेशेन यो नात्मश्रवणादी प्रयतते तस्यात्मविषयिण्यस्तुष्टयश्वतत्र आध्यात्मिक्यो भवन्तीत्यर्थः । ३. विवेकसाक्षात्कारो हि प्रकृतिपरिणामभेदस्तं च सैव करोति कृतमात्म-ध्यानाभ्यासेनेति कस्यचिदुपदेशेन तुष्टिः प्रकृत्याख्येति मिश्राः । ४. प्राकृत्यपि विवेकख्यातिर्न प्रकृतिमात्राज्जायते सर्वेषां सर्वदा प्रकृते-रविशेषात्तदुत्पादप्रसङ्गात्, किन्तु प्रव्रज्ययाऽतस्तामुपाददीथाः कृतं ध्यानादिनेति उपदेशेन या तुष्टिः सोपादानाख्येति वाचस्पतिमिश्राः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 112

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९ ६ सांख्यकारिका कालेन मोक्षो भविष्यतीति किं तत्त्वाभ्यासेनेत्येषा कालाख्या तुष्टिस्तस्य नास्ति मोक्ष इति । तथा भाग्याख्या – भाग्येनैव मोक्षो भविष्यतीति भाग्याख्या ', चतुर्द्धा तुष्टिरिति । बाह्यां विषयोपरमात्पञ्च । बाह्यास्तुष्टयः पञ्च विषयो-परमात्, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धेभ्य े उपरतोऽर्जनरक्षणक्षयसङ्गहिंसा दोषदर्श-नात् । वृद्धिनिमित्तं पाशुपाल्य वाणिज्यप्रतिग्रहसेवाः कार्या एतदर्जने दु: खम्, अर्जितानां रक्षणे दु: खम्, उपभोगात् क्षीयत इति क्षयदु: खम्, तथा विषयोप-भोगसङ्गे कृते नास्तीन्द्रियाणामुपशम इति सङ्गदोष:, तथा न अनुपहत्य भूतान्यु-पभोग इत्येष हिंसादोषः, एवमर्जनादिदोषदर्शनात् पञ्चविपयोपरमात् पञ्च तुष्टयः एवमाध्यात्मिकबाह्यभेदान्नव तुष्टयः, तासां नामानि शास्त्रान्तरे प्रोक्तानि — अम्भः साललं मेधो वृष्टिः सुतमः पारसुनेत्रं नारीकमनुत्तमाम्भसि-कम् ' इति । आसां तुष्टीनां विपरीता अशक्तिभेदाद् बुद्धिवधा भवन्ति । तद्यथा-अनम्भोऽसलिलमेघ इत्यादि - वैपरीत्याद् बुद्धिवधा इति ॥ ५० ॥

अन्वयः - प्रकृत्युपादानकाल भाग्याख्याः, चतस्रः, आध्यात्मिक्याः, तुष्टयः, १. अत एव मदालसायास्तत्त्वज्ञानवत्या वर्षाभ्यन्तरायुष्काणि अपत्यानि ' त्वं शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि मा रुदिहि दुःखं नात्मधर्म ' इत्याद्युपदेशेन प्राग्भवीयभाग्य-वशादेव विवेकख्यातिमन्ति मुक्तानि बभूवुरिति, भाग्याख्येयं तुष्टिरित्यर्थः । २. विषयोपरम एव कथमत आह— शब्देति । अर्जनादिदुःखदर्शनाद्यदा शब्दादिभ्य उपरतो भवति तदा बाह्यास्तुष्टयः पञ्चविधविषयविषयकत्वात्पञ्च-वेत्यर्थः । अर्जनादिदुःखमेव विवृणोति - वृद्धिनिमित्तमिति । ३. उक्तविधनवतुष्टीनां योगदर्शनोक्तानि संज्ञान्तराण्याहाम्भ इति । संसार-मज्जन हेतुत्वादृश्यात्प्रकृतितुष्टेरम्भ इति, संसरणनिमित्तत्वादुपादानतुष्टेः सलिलमिति, कालप्रतीक्षाया उत्तापकत्वात्कालतुष्टेर्मेघ इति, अकस्मात् विवेक-ख्यातिसेचनाद्भाग्याख्या तुष्टिवृष्टिरित्येवमाध्यात्मिकीनां तुष्टीनां संज्ञाः । एव-मर्जनदुःखस्यात्यन्तं भयावहत्वात्सुतम इति, रंक्षणकाले भोगाभिलाषपुर्त्या तद्-दुःखस्य पारगमनसम्भवाद् द्वितीया पारमिति एवं क्षयदोषदर्शनादप्रवृत्तौ दुःख-पारगमनात्तृतीया सुनेत्रमिति, सङ्गदोषं भावयतो नास्त्यरिरिति चतुर्थी नारीक-मिति, तथा हिंसादोषदर्शनान्नास्ति अन्यत् जलवत् कारुण्योत्पादकमिति पञ्चम्य: नुत्तमाम्भसिंकमित्येवं बाह्यास्तुष्टयो वैराग्ये सति जायन्ते इति वैराग्यहेतुपञ्च-स्वात्पञ्चेति भावः । एताश्च पारं सुपारं पारापारमनुत्तमाम्भः उत्तमाम्भ इति संज्ञापञ्चकेन मिश्रैः प्रोक्ताः, एतेषां युक्तायुक्तत्वे सुधीभिः स्वयं विभावनीये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 113

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सस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपता ९ ७ ( सन्ति ), विषयोपरमात्, पञ्च, बाह्याः, तुष्टयः, ( सन्ति मिलित्वा ) नव तुष्टयः, अभिमता:, ( सांख्याचार्याणाम् ) । व्याख्या - प्रकृत्युपादानकाल भाग्याख्याः 11 प्रकृतिः - उपादानम् - कालः-भाग्यम् इति आख्या = नाम, यासां ताः । चतस्रः । आध्यात्मिक्यः = आत्मत्वेना-भिमता: । तुष्टयः = सन्तोषा: । ( सन्ति ) विषयोपरमात् = विषयेभ्यो दोष-दर्शननिबन्धन निवृत्तिदर्शनात् पञ्च । बाह्याः = शब्दादिव । ह्यविषयिण्यः । तुष्टयः । सन्ति । ( एवं मिलित्वा ) नव । तुष्टयः । अभिमताः । ( सन्ति सांख्याचार्याणाम् ) । हिन्दी - प्रकृति - उपादान - काल भाग्य वे चार अन्दर की इन्द्रिय मन को सन्तुष्ट करने वाली तुष्टियाँ हैं । बाह्यविषयों में दोषदर्शनप्रयुक्त उनसे निवृत्ति हो जाने के अनन्तर मन को जो शब्दादि पांच विषयों द्वारा सन्तोष होता है उन बाह्यविषयों के पाँच होने के नाते पाँच बाह्य तुष्टियाँ हैं । इसी दृष्टि से ९ तुष्टयाँ सांख्यवालों ने मानी हैं । अब प्रश्न यह होता है कि इन प्रकृति आदि नौ प्रकार की आध्यात्मिक तथा बाह्य तुष्टियों से मन का सन्तोष अथवा प्रसन्नता कैसे होती है? इसका उत्तर यही दिया गया कि कोई गुरु अपने शिष्य को यदि यह उपदेश करता है कि हे वत्स! मोक्ष को सम्पन्न करने वाला विवेकज्ञान प्रकृति का ही परिणाम विशेष है, क्योंकि वह प्रकृति से ही होता है अतः उस विवेक-ज्ञान के लिये आत्मा के श्रवण - मनन आदि व्यर्थ हैं इस प्रकार के उपदेश को हृदयंगम कर श्रवण आदि का सर्वथा परित्याग करके जो प्रकृति से ही अपने मन का सन्तोष करना है उसे प्रकृतितुष्टि कहते हैं । इसी को ' अंभ ' भी कहते हैं । और यदि दूसरा गुरु अपने शिष्य को यह उपदेश करता है कि हे शिष्य! बिना संन्यास के मोक्ष नहीं होता है अतः श्रवण - मनन आदि के प्रपंच को छोड़कर संन्यास ग्रहण करो, इस प्रकार के उपदेश होने वाली मन की सन्तुष्टि को " उपादान तुष्टि " नाम ' सलिल ' भी है । उप = वृद्धावस्थायाः समीपे अर्थात् वृद्धावस्था के नजदीक आ जाने पर जिस उसी संन्यासधर्म को उपादान कहते हैं । संन्यास भी युक्तिप्रद नहीं है अपितु कालसापेक्ष CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by से संन्यास के आधार पर कहते हैं, इसी का दूसरा आदीयते इति उपादानम् धर्म का ग्रहण किया जाय है अतः कालपरिपाकवशात् S3 Foundation USA

पृष्ठ 114

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९ ८ सांख्यकारिका वह खुद ही हो जायेगा, इस प्रकार के उपदेश से काल के आधार पर होने वाली मनः सन्तुष्टि को " कालतुष्टि " कहा गया है । इसे ' ओघ ' भी कहते हैं । प्रकृति से - उपादान से - काल से विवेकज्ञानद्वारा मोक्षप्राप्ति होने वाली नहीं है अपितु वह भाग्य के अनुकूल होने पर स्वयं ही हो जायेगी । जैसे मदालसा के लड़कों को अत्यन्त बालक होते हुए भी माता के उपदेशमात्र से भाग्यानुकूल होने से विवेकज्ञान हुआ और उससे मोक्ष हुआ । और शब्दादि पाँच बाह्य तुष्टियाँ सांसारिक विषयों में वैराग्य उत्पन्न होने के पश्चात् ही होती हैं । वैराग्य के पाँच प्रकार का होने के नाते बाह्य तुष्टियाँ भी पाँच प्रकार की हैं । कारिका में वैराग्य को विषयोपरमशब्द से कहा है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँच विषय हैं, और इनसे उपरम होना भी पाँच प्रकार का है --- अर्जन, रक्षण, क्षय, भोग, हिंसा । इन पाँच प्रकार के दोषों का दर्शन जब विषयों में हो जाता है तब विषयों से मनुष्य की निवृत्ति हो जाती है । सेवा, वाणिज्य आदि धर्म परमगहन हैं परन्तु इनके बिना धनोपार्जन आदि कार्य भी नहीं हो पाते हैं । मालिक लोग जब कि अपने सेवकों को गले में हाथ देकर बाहर निकाल देते हैं तव कौन सेवक सेवा करने में प्रवृत्त होगा । अतः धनोपार्जन के इन उपायों को दुःखद समझ कर विचारशील व्यक्ति इनसे सर्वथा विरक्त हो बैठता है । इसके पश्चात् मन में जो तुष्टि होती है उसे ' पार ' कहते हैं | धनोपार्जन कर लेने पर भी चोर डाकू वगैरह से उत्त अर्जित धन की रक्षा करने में होने वाले कष्ट के अनुभव को देखते हुए उसमें भी दोषदर्शन होता है । उस दोपदर्शन से फिर विषयों में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है । उस वैराग्य से जो मन में सन्तोष ( तुष्टि ) होती है उसे ' सुपार ' कहते हैं । किसी प्रकार उस धन की रक्षा भी की जाय परन्तु फिर भी उपभोग में आने से उस धन की समाप्तिप्रयुक्त बहुत ही कष्ट होता है । इससे भी विचार-शील व्यक्ति के मन में उसकी नश्वरता को देखते हुए वैराग्य हो जाता है । इस प्रकार के वैराग्य से होने वाली मन की तुष्टि को ' पारापार ' कहते हैं । एवं विषयों के उपभोग से उनमें उत्तरोत्तर इच्छा ही तो बढ़ती रहती है । और उन विषयों के किसी समय न मिलने से भी बहुत कष्ट होता है । उस कष्ट से भी दोषदर्शनप्रयुक्त विचारशील व्यक्ति के मन में वैराग्य उत्पन्न हो CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 115

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सस्कृत - हिन्दी व्याख्योपेता ९९ जाता है, उस वैराग्य से उत्पन्न होने वाले मन के सन्तोष को ' अनुत्तमाम्भ ’ कहते हैं । इसी प्रकार कभी - कभी विषयों के उपभोग के लिये मनुष्य को प्राणियों की हिंसा भी करनी पड़ जाती है, उस हिंसात्मकदोषदर्शनप्रयुक्त भी विचारशील व्यक्ति के मन में वैराग्य पैदा हो जाता है । इस वैराग्य के आधार पर होने वाले सन्तोष को ' उत्तमाम्भ ' नामक पञ्चम तुष्टि कहते हैं ॥ ५० ॥

अब आठ ८ प्रकार की सिद्धियों को बतलाते हैं—

ऊहः शब्दोऽध्ययनं दु: खविधातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः ।

दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कशस्त्रिविधः ॥५१ ॥

गौ ० – सिद्धिरुच्यते – ऊहो यथा कश्चिन्नित्यमूहते किमिह सत्यं किं परं किं नैःश्वेयसं किं कृत्वा कृतार्थः स्याम, इति चिन्तयतो ज्ञानमुत्पद्यते प्रधानादन्य एव पुरुष इतोऽन्या बुद्धिरन्योऽहङ्कारोऽन्यानि तन्मात्राणीन्द्रियाणि पञ्च महाभूता-नीत्येकं तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते येन मोक्षो भवति, एषा ' ऊहाख्या प्रथमा सिद्धिः । तथा शंब्दज्ञानात् प्रधानपुरुषबुद्ध्यहङ्कारन्तमात्रेन्द्रियपञ्चमहाभूतविषयं ज्ञानं भवति ततो मोक्ष इत्येषा शब्दाख्या सिद्धि: २ । अध्ययनाद् वेदादिशास्त्राध्ययनात् पञ्चविंशतितत्त्वज्ञानं प्राप्यते मोक्षं याति इत्येषा तृतीया सिद्धि: । दुःख-“ विधातत्रयम्, आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकदुःखत्रयविघाताय गुरुं समुप-गम्य तत् उपदेशान्मोक्षं याति एषा चतुर्थी सिद्धि: । एषैव दुःखत्रयभेदात् त्रिधा कल्पनीया इति षट् सिद्धयः । तथा सुहृत्प्राप्तिः, यथा कश्चित् १. ऊहस्तर्कः आगमाविरोधिन्यायेनागमार्थपरीक्षणम्, परीक्षणं च संशय-पूर्वपक्षनिराकरणेनोत्तरपक्षव्यवस्थापनं यन्मननमाचक्षते आगमिन इति मिश्राः । अस्याश्च तन्मते तारतारमिति संज्ञेतन्मते तु तारमिति विशेषः । २. अध्ययनकार्यं शब्दजन्यार्थज्ञानरूपेयं ' सुतारम् ' इति मिश्रमतेऽपि व्यप-दिस्यत इति न कश्चिद्विशेषः । ३. गुरुमुखात् अध्यात्मविद्यामक्षरस्वरूपग्रहणमध्ययनं ' तार ' मिति संज्ञया व्यपदिष्टा मिश्रमते प्रथमा सिद्धिरियं बोद्धव्या । ४. एता मुख्यास्तिस्रः सिद्धयः, तदुपायतया त्वितरा गौण्यः पञ्च सिद्धयस्ता अपि हेतुहेतुमत्तया व्यवस्थिताः, तत्राध्ययनरूपा सिद्धिर्हेतुरेव मुख्यास्तु हेतुमत्य एव, मध्यमा उहशब्दसुहत्प्राप्तिदानाख्या हेतुहेतुमत्य इति तत्त्वकौमुदी । ८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 116

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१०० सांख्यकारिका सुहज्ज्ञानमधिगम्य मोक्षं गच्छति, एषा सप्तमी सिद्धिः । दानं यथा कश्चिद्भगवतां प्रत्याश्रयौषधित्रिदण्डकुण्डिकादीनां ग्रासाच्छादनादीनां च दानेनोप-कृत्य तेम्यो ज्ञानमवाप्य मोक्षं याति, एषाऽष्टमी सिद्धि: २ । आसामष्टानां सिद्धीनां शास्त्रान्तरे संज्ञाः कृताः - ' तारं सुतारं तारतारं प्रमोदं प्रमुदितं प्रमोदमानं रम्यकं सदाप्रमुदितम् ' इति । ' आसां विपर्ययाद् बुद्धेर्बंधा ये विपरी-तास्ते अशक्तो निक्षिप्ताः - यथाऽतारम सुतारमतारतारमित्यादि द्रष्टव्यम् । अशक्तिभेदा उ अष्टाविंशतिरुक्तास्ते सह बुद्धिवधैरेकादशेन्द्रियवधा इति । तत्र तुष्टिविपर्यया नव, सिद्धीनां विपर्यया अष्टो, एवमेते सप्तदश बुद्धिवधाः, एतैः सहेन्द्रियवधा अष्टाविंशतिरशक्तिभेदाः पश्चात् कथिता इति विपर्ययाशक्तितुष्टि-सिद्धीनामेवोद्देशो निर्देशश्व कृत इति । किञ्चान्यत् सिद्धे " पूर्वोऽङ्कुशस्त्रि-विधः सिद्धेः पूर्वा या विपर्ययाशक्तितुष्टयस्ता एव सिद्धेरङ्कुशस्तद्भेदादेव त्रिविधः, यथा हस्ती गृहीताङ्कुशेन वशो भवति, विपर्ययाशक्तितुष्टिभिर्गृहीतो-लोकोऽज्ञानमाप्नोति, तस्मादेता: परित्यज्य सिद्धिः सेव्या, सिद्धेस्तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते तस्मान्मोक्ष इति ॥ ५१ ॥

अन्वयः — ऊहः, शब्दः, अध्ययनं त्रयः दुःखविधाता सुहृत्प्राप्तिः दानं च ( इति ) अष्टौ सिद्धयः । सिद्धेः पूर्वः अङ्कुशः त्रिविधः । व्याख्या - अध्ययनम् = आत्मज्ञानम्, अर्थात् शास्त्रीयविधिविधानपूर्वक-माध्यात्मिक विद्यानां गुरुमुखात् अध्ययनमित्यर्थः । इयं प्रथमा सिद्धि " स्तार " -१. न्यायेन स्वयं परीक्षितमप्यर्थं न श्रद्धत्ते न यावद्गुरुशिष्यब्रह्मचारिभिः सह संवाद्यतेऽतः सुहृदामुक्तसंवादकानां प्राप्तिः सुहृत्प्राप्तिचतुर्थी सिद्धिः रम्यकमिति मिश्रतम् । २. दैप् शोधन इत्यस्माद्धातोर्दानपदव्युत्पत्तेः सदाप्रमुदितनाम्ना व्यपदिष्टेयं पञ्चमी सिद्धिमिश्रः । ३. प्रदर्शिततुष्टिसिद्धिविपर्ययाशक्ति भेदसंख्या पूरकत्वं प्रदर्शयन्नष्टाविंशति-संख्या सङ्कलयति - अशक्तीति । ४. नाममात्रेण सङ्कीर्तनमुद्देशः, लक्षणपूर्वकं नामकीर्तनं च निर्देश इति । ५. अत्र समासेन चतुर्विधे बुद्धिसर्गे सिद्धिरूपादेया तन्निवारिका विपर्यया-- शक्तितुष्टयो हेया इत्याह-- सिद्धेरिति । पूर्व इति विपर्ययादित्रयग्रहणम् । ताः सिद्धिकरिणीनामङ्कुशो निवारकत्वात्, अतः सिद्धपरिपन्थित्वाद्विपर्ययाशक्तितुष्टयो हेया इति मिश्राः । तदुभेदादेव विपर्ययादिभेदाभावः, अङकुशोऽपि त्रिविध इत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu.. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 117

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सस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपता १०१ मित्युच्यते । शब्दः = लक्षणया शब्दजन्यमर्थज्ञानमित्यर्थः । इयं द्वितीया सिद्धिः । ऊहः = आगमाविरोधिन्यायेन आगमजन्य अर्थ परीक्षम्, सुतारमित्युच्यते उत्तरपक्षव्यवस्थापनम् । इयं तृतीया परीक्षणञ्च संशयपूर्वपक्षनिराकरणेन सिद्धिस्तारतारमित्युच्यते । सुहृत्प्राप्तिः - सुहृदाम् = गुरुशिष्यब्रह्मचारिणां, प्राप्तिः = लाभः । अर्थात् स्वयं परीक्षितस्यापि अर्थस्य तावन्न निर्दुष्टत्व-प्रकारको निश्चयो भवति यावत् गुरुशिष्यसतीर्थैः सह न संवाद्यते इतीयं सिद्धिः " रम्यकम् ” उच्यते । दानम् = संशयविपर्यय आदिदोषाणां निराकरणेन विवेक-सा च शुद्धिः बहुकालपर्यन्तम् अभ्यासपरिपाकेन विना न भवतीति ज्ञानशुद्धिः सेयं सिद्धिः सदामुदितमित्युच्यते । त्रयः दुःखविधाताः = आध्यात्मिक- आधि-भौतिक - आधिदैविक - पूर्वोक्तदुःखध्वंसाः । इमा एव तिस्रो मुख्याः सिद्धयः सन्ति, एताश्च क्रमशः प्रमोदमुदितमोदमाना उच्यन्ते । आसाम् अष्टानां सिद्धीनां सर्वथा परित्याज्या भवन्तीत्याह – “ सिद्धेः प्रतिबन्धकीभूता विपर्ययाशक्तितुष्टयः " । सिद्धेः = अष्टविधायाः सिद्धेः । पूर्वः = पूर्वोक्तः । त्रिविधः = पूर्वोऽङ्कुश स्त्रिविधः त्रिप्रकार: 1 अंङ्कुशः - अङ्कुश इव सिद्धेः प्रतिबन्धकः । विपर्ययाशक्तितुष्टिस्वरूपः भवति तथा विपर्ययाशक्तितुष्टिभिः सिद्धेः यथा अङ्कुशेन शासितोऽश्वादिर्वश्यो प्रतिरोधो जायते लोकश्च संसारचक्रे नितरां सुतरां भ्रमति । सिद्धिप्रतिबन्ध-हेयाः सिद्धिोपादेया भवति मुमुक्षूणाम् । यतोऽ-क़त्वात् विपर्ययाशक्तितुष्टयो भवति, तस्माच्च मुक्तिर्जायते इति भावः । ष्टाभ्य एव सिद्धिभ्यो विवेकज्ञानं हिन्दी - ऊह, शब्द, अध्ययन तथा आध्यात्मिक प्रभृति दुःखत्रय के तीन प्रकार प्राप्ति एवं दान ये आठ प्रकार की सिद्धियाँ हैं । जिनमें तीन के विघात, सुहृत् हैं और इतर पाँच इन तीन सिद्धियों प्रकार की दुःखविघातात्मक सिद्धियां मुख्य साधनभूत होने के नाते गौण हैं । की से आधार पर ही तर्कबल से शास्त्रों के बिना उपदेश के अर्थात् पूर्वजन्म कहते हैं । इसी का दूसरा नाम अर्थ का निश्चय करना रूप सिद्धि को ऊह ' तारतार ' भी है । के आधार पर करने के पश्चात् क्रिया - कारक आदि शब्दों शास्त्र श्रवण शब्द सिद्धि कहा है । इसी का दूसरा नाम सुतार-होने वाले अर्थज्ञान को सिद्धि भी है । गुरु के से आध्या-विधिविधान के आधार पर ब्रह्मचर्यपूर्वक मुख शास्त्रीय CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 118

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१०२ साख्यकारिका त्मिक विद्याओं के अध्ययन से होने वाले आत्मज्ञान को अध्ययन सिद्धि कहते हैं, इसका दूसरा नाम तार भी है । दुःखविघातस्वरूप सिद्धियाँ तीन प्रकार की हैं । जैसे — आध्यात्मिक दुःख-विघात, आधिभौतिक दुःखविघात, आधिदैविक दुःखविघात । दुःखों के त्रैविध्य से उनका विघात भी तीन प्रकार का है । और दुःखविघात ( दुःख ध्वंस ) अन्तिम फल होने के नाते मुख्य सिद्धि है और इतर इसके साधन हैं अतः वे गोण हैं । इन तीन प्रकार की सिद्धियों के क्रमशः दूसरे नाम ये हैं- प्रमोद-मुदित- मोदमान । स्वयं अन्वयव्यतिरेक के आधार पर तर्क के द्वारा सुनिश्चित किये हुए अर्थ ( विषय ) का ज्ञान यदि फिर से उसे दृढ़ करने के लिये अपने विद्वान् मित्रों की प्राप्ति ( संसर्ग ) से किया जाय तो उसे सुहृत् प्राप्ति सिद्धि कहते हैं । इसका दूसरा नाम " रम्यक " है । संशय - विपर्यय आदि दोष ज्ञानों का निराकरण करते हुए जो विवेक ज्ञान की शुद्धि करना है उसे दानसिद्धि कहते हैं । और वह शुद्धि बहुत काल पर्यन्त होने वाले अभ्यास की परिपक्वता के बिना नहीं हो सकती है । इसका दूसरा नाम ' सदामुदित ' सिद्धि भी है ॥ ५१ ॥

प्रश्न - पुरुष के भोगापवर्गरूप अर्थ ( प्रयोजन ) के लिए जो एकादश गणात्मिका तथा पंचतन्मात्रात्मिका सृष्टि २४ वीं कारिका में बतलायी गयी थी उस द्विविध सृष्टि की क्या आवश्यकता है एकविध सृष्टि से ही जबकि पुरुष का वह अर्थ सिद्ध हो सकता है ।

न बिना भावैलिङ्ग न बिना लिङ्गेन भावनिवृत्तिः ।

लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्त्तते सर्गः ॥५२ ॥

गौ ० — अथ तदुक्तं भावैरधिवासितं लिङ्गं तत्र भावा धर्मादयोऽष्टा-वक्ता बुद्धिपरिणामः विपर्ययाशक्तितुष्टि सिद्धिपरिणताः, स भावाख्यः प्रत्ययसर्गो ' लिङ्गञ्च तन्मात्रसर्गश्चतुर्दशभूतपर्यन्त उक्तः, तत्रैकेनैव सर्गेण पुरुसार्थसिद्धो किमुभयविधसर्गेणेत्यत आह - भावैः प्रत्ययसर्गेविना र लिङ्गं न तन्मात्रसर्गो १. विपर्ययाशक्तितुष्टि सिद्धिरूपेण परिणता धर्मादयोऽष्टी भावास्यो बुद्धिसर्ग इत्यर्थः । भावा एव २. धर्मादिसहितैर्भोग साधनैरिन्द्रियान्तःकरणादिभिर्विना । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 119

साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
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सस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपता १०३ न पूर्व पूर्व संस्कारादृष्टकारितत्वादुत्तरोत्तरदेहलम्भस्य ', लिङ्गेन तम्मात्रसर्गेण चविना भावनिवृत्तिर्न स्थूलसूक्ष्मदेहसाध्यत्वाद्धर्मादेः, अनादित्वाच्च सर्गस्य बीजा कुरवदन्योन्याश्रयो न दोषाय, तत्तज्जातीयापेक्षित्वेऽपि तत्तदूव्यक्तीनां परस्परानपेक्षित्वात्, तस्माद्भावाख्यो लिङ्गाख्यश्च द्विविधः प्रवर्तते सर्व इति ॥ ५२ ॥

अन्वयः - भावः, विना, लिङ्गम्, न ( भवति ) लिङ्गेन, विना, न, भावनिर्वृत्तिः, तस्मात्, भावाख्यः, लिङ्गाख्यः, द्विविधः, सर्गः, प्रवर्त्तते । व्याख्या —भावैः — पूर्वोक्तधर्माधर्मादि - अष्टविधभावपदार्थः विना धर्मा-धर्मादि - अष्टविधभावपदार्थोपलक्षितबुद्धिसर्गं विना । लिङ्गम् = लिङ्गसर्गः । न सम्भवति । लिङ्गेन = तन्मात्रासर्गेण । विना । न भावनिर्वृत्तिः = भावपदार्था-नाम् उत्पत्तिः । तस्मात् = प्रत्येकेन विना द्वयोः स्वरूपस्यैवानुपपन्नत्वात् । भावाख्यः = बुद्धिसर्गः । लिङ्गाख्यः = लिङ्गसृष्टिः, शब्दादितन्मात्र सृष्टिरित्यर्थः । द्विविध: । सर्ग: सृष्टि: । प्रवर्त्तते = उत्पद्यते । अयमाशयः तन्मात्रसर्गस्य पुरुषार्थसाधनत्वं स्वरूपश्च न बुद्धिसृष्टि विना भवितुमर्हति । एवं बुद्धिसर्गस्य स्वरूपं पुरुषार्थ साधनत्वञ्च न तन्मात्र सृष्टि विना इत्युभयथा उभयविधः सर्ग आवश्यकः ॥ ५२ ॥

हिन्दी - धर्म - अधर्म - ज्ञान अज्ञान वैराग्य - अवैराग्य - ऐश्वर्य - अनैश्वर्यरूप । अष्टविधभावभूतस्थूल पदार्थों के बिना सूक्ष्म शरीरप्रभृति लिङ्गपदार्थों की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है । कारण कि संसार के सभी उत्पत्तिशील पदार्थों के विषय में ऐसा नियम है कि उनमें से किसी की उत्पत्ति धर्मनिबन्धन है तो किसी की अज्ञान से इत्यादि । अतः सूक्ष्म शरीर प्रभृति लिङ्ग पदार्थ भी कार्य होने के नाते भाव पदार्थों से सापेक्ष हैं जिससे भाव पदार्थों की सृष्टि आवश्यक है । १. स्थूलसूक्ष्मशरीरप्राप्तेः । २. नंनु धर्मादयो भावाः शरीरापेक्षाः 1 शरीरं धर्माद्यपेक्षमित्यन्योन्याश्रय-इत्यत आह- अनादित्वाच्चेति । सर्गप्रवाहस्याना -दोषादुभयस्याप्यसम्भव, यथा बीजं प्रथममङ्कुरो वेत्यनिर्णयेऽपि नेतरेतराश्रय-दित्त्वादविच्छिन्नत्वात् दोषस्तथा बुद्धेरनादितया तत्संयोगस्याप्यनादित्वेन संसारप्रवाहस्यानादितयो-भयविधसर्गेनान्योन्याश्रयदोष इति भावः । अन्योन्याश्रयाभावे हेतुमाह-तत्तदिति I - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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१०४ सांख्यकारिका इसी प्रकार न लिङ्ग पदार्थों के बिना भाव पदार्थों की ही निवृत्ति ( उत्पत्ति ) हो सकती है, क्योंकि अनुभव सिद्ध है सूक्ष्म से स्थूल की उत्पत्ति होती है । लिङ्ग - सृष्टि सूक्ष्मसृष्टि कहलाती है और भावसृष्टि स्थूलसृष्टि कहलाती है | अतः तन्मात्रगणस्वरूप लिङ्ग सृष्टि ही भावभूतस्थूल सृष्टि का आधार है, जैसे न्याय में परमाणुओं को ही स्थूलपृथिवी स्थूलजल आदि स्थूल सृष्टि का कारण माना है । इसलिए भावाख्य और लिङ्गाख्य दोनों प्रकार की सृष्टि आवश्यक है । दूसरी बात यह भी है कि सांख्य ने पुरुष के भोगापवर्गरूप अर्थ के लिये ही तो सृष्टि मानी है, सो उन दोनों अर्थों में से भोगात्मक पुरुष का अर्थ भोग्यशब्दादि - पञ्चतन्मात्राओं के बिना कैसे सम्पन्न हो सकता है । एवं भोग का साधन बाह्य दशविष इन्द्रियों को तथा अन्तःकरण मन को भी माना गया है इसलिये तन्मात्रसृष्टि आवश्यक है । इसी प्रकार वे भोग के साधनभूतकरण धर्म - अधर्म आदि भावपदार्थों के बिना सम्भव नहीं हैं अतः भावपदार्थों की सृष्टि भी आवश्यक है । इस प्रकार दोनों सृष्टियाँ अन्योन्याश्रित हैं इसलिये दोनों आवश्यक हैं ॥ ५२ ॥

भौतिक सृष्टि का विभाजन तथा विवेचन करते हैं—

अष्टविकल्पो देवैस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।

- मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः ॥ ५३ ॥

गौ ० - किञ्चान्यत् — तत्र दैवमष्टप्रकारम् - बाह्म प्राजापत्यं सौम्यमैन्द्रं गान्धवं याक्षं राक्षसं पैशाचमिति । पशुमृगपक्षिसरीसृपस्थावराणि भूतान्येवं पञ्चविधस्तैरश्चः । मानुषयोनिरेकैव ' इति चतुर्दश भूतानि ॥ ५३ ॥

अन्वयः — दैवः, अष्टविकल्पः, भवति, तैर्यग्योन, पञ्चधा, भवति, मानुष्यश्च, एकविधः भवति, ( इति ) समासतः, भौतिकः, सर्गः, ( अस्ति ) । व्याख्या – दैवः = देवानामयं देवः देवसर्गः, देवतानां सृष्टिरित्यर्थः । अष्टविकल्पः = अष्टविधः । ( अस्ति ) यथा - ( ब्राह्मः, प्राजापत्यः, ऐन्द्रः, पैत्रः, गान्धर्वः, याक्षः, राक्षसः, पैशाचः । तैर्यग्योनच = तिर्यग्योनः, तिर्ग-ग्जातीयसर्गः पञ्चधा । यथा— पशु - पक्षि- मृग- सर्प वृक्ष आदि भेदात्मकः । १. ब्राह्मणत्त्वाद्यवान्तरजातिभेवाविवक्षयैकत्वमिदं बोध्यम्, संस्थानस्य सर्व-त्राविशेषादिति । इतीति । संक्षेपतोऽयं भौतिकः सर्ग उक्त इत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA