साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ — पृष्ठ 51–60
साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ · Chaukhamba Vidya Bhavan Varanasi · पृष्ठ 51–60
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सस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपता ३५ अतश्च अव्यक्तं प्रख्यातं कारणमस्ति यस्मान्महदादिलिङ्ग प्रवर्तते । त्रिगु णतः त्रिगुणात्, सत्वरजस्तमांसि गुणा यस्मिन् तत् त्रिगुणम् । तत् किमुक्तं भवति? सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रधानम् । तथा समुदयात्, यथा गङ्गा-स्रोतांसि त्रीणि रुद्रमूर्धनि पतितानि एकं स्रोतो जनयन्ति, एवं त्रिगुणमव्यक्तमेकं व्यक्तं जनयति, यथा वा तन्तवः समुदिताः पत्रं जनयन्ति, एवमव्यक्तं गुणसमु-दयान्महदादि जनयतीति त्रिगुणतः समुदयाच्च व्यक्तं जगत् प्रवर्तते 1 २ ' यस्मा-देकस्मात् प्रधानाद् व्यक्तं तस्मादेकरूपेण भवितव्यम् ' । नैष दोषः, परिणामतः सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् । एकस्मात् प्रधानात् त्रयो लोकाः समुत्पन्नास्तुल्यभावा न भवन्ति देवाः सुखेन युक्ताः, मनुष्या दुखेन, तिर्यश्वो मोहेन, एकस्मात् प्रधानात् प्रवृत्तं व्यक्तं प्रतिप्रतिगुणाश्रय विशेषात् परिणामतः सलिलवद् भवति प्रतिप्रतीति वीप्सा, गुणानामाश्रयो गुणाश्रयस्तद्विशेषस्तं गुणाश्रयविशेषं प्रति निधाय प्रतिप्रतिगुणाश्रय विशेषपरिणामात् प्रवर्ततेऽव्यक्तं, यथा — आकाशादेकरसं सलिलं पतितं नानारूपात् संश्लेषाद् भिद्यते तत्तद्र-सान्तरैः ४ एवमेकस्मात् प्रधानात् प्रवृत्तास्त्रयो लोका नैकस्वभावा भवन्ति, देवेषु सत्त्वमुत्कटं रजस्तमसी उदासीनं तेन तेऽत्यन्तसुखिनः, मनुष्येषु रज उत्कटं भवति सत्त्वतमसी उदासीने तेन तेऽत्यन्तदुःखिनः, तिर्यक्षु तम उत्कटं भवति सत्त्वरजसी उदासीने तेन तेऽत्यन्तमूढाः ॥ १२ ॥
अन्वयः — भेदानाम्, कारणम्, अव्यक्तम्, अस्ति, ( कुतः ) परिमाणात्, समन्वयात्, शक्तितः प्रवृत्तेच, कारणकार्यविभागात्, वैश्वरूप्यस्य अविभागात् १ परिणामस्वभावानां गुणानां क्षणमपि परिणामं विहायावस्थानाऽसं-भबात्सत्त्वादिरूपतया प्रधानस्य प्रवृत्तिरिति मिश्राः । प्रधाने सत्त्वादीनामवस्था-नात् वहुत्वसंभवात्रिगुणतः प्रवृत्तिस्त्रिधा व्यवहारोऽत एकस्मात्तन्तोः पटासंभव-वत्कथमेकं प्रधानमनेककार्यजनकमिति निरस्तमिति माठरः । २ शङ्कृते यस्मादिति । एकरूपात्कारणात्कथं विचित्रकार्योत्पत्तिरिति शंकाभिप्रायः । समाधत्ते - नैष इति । ३ अवलम्ब्य । ४. नारिकेलतालतालीबिल्व चिरविल्वतिन्दुकामलककपित्थफलाभितैस्तत्तद्र-सैरित्यर्थः । ४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३६ साख्यकारिका तच्च अव्यक्तम् ) त्रिगुणतः, समुदयाच्च, प्रवर्तते, प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात्, परिणामतः सलिलवत् ॥ १५-१६ ॥ व्याख्या - भेदानाम् = परस्परविभिन्नमहदादिकार्याणाम् । कारणम् = मूल-उतमुपादानं कारणम् । अव्यक्तम् = प्रकृति: 1 अस्ति । ( कुतः ) परिमा-गात् = परिमितत्वात् – अव्यापित्वात् 1 अत्रानुमानम् – “ महदादयः अर्थात् महत्तत्त्वादिपृथिव्यन्ताः पदार्थाः अव्यक्तकारणवन्तः - परिमितत्वात् - घटपटादि-वत् ” । समन्वयात् = सुखदुःख मोहात्मसमानरूपवत्त्वात्, अर्थात् महत्तत्त्वादि-थिव्यन्ताः सर्वेऽपि पदार्थाः सुख - दुःख- मोहात्मका दृष्टा अतस्तथाविधेनैव षां कारणेनापि भवितव्यम्, तादृशं च कारणम् अव्यक्तमेव, अत्रानुमानम्-' महदादयः अव्यक्तकारणवन्तः समन्वयात्, सुखदुःखमोहात्मकत्वात् घटादिवत् " । कारणकार्यविभागात् = प्रधानात्मकाव्यक्तरूपकारणात् महदादिभूम्यन्त-समस्तकार्याणाम् आविर्भाव - ( उत्पत्ति ) रूपविभागदर्शनात् । अर्थात् प्रकृतिरूपा-यक्तकारणत एव महत्तत्त्वादि भूम्यन्ताः सर्वेऽपि कार्योद्भूतपदार्था विभज्यन्ते ( उत्पद्यन्ते ) इत्येतेषामुत्पादकत्वेन अव्यक्तमवश्यं स्वीकार्यम् । .वैश्वरूपस्य अविभागात् = वैश्वरूपस्य = जगतः, अविभागात् = तिरोभावात्, अर्थात् प्रलयकाले जगतो यस्मिंन् कारणं तिरोभावो भवति तदेव अव्यक्तं कारणम् । अव्यक्तं साधयित्वा तस्य प्रवृत्तिप्रकारमाह— ' प्रवर्तते त्रिगुणतः ' अर्थात् व्यक्तं त्रयाणां गुणानां सदृशरूपेण परिणमते, गुणानां परिणामो हि स्वभावः प्रतस्ते क्षणमप्यपरिणम्य नावतिष्ठन्ते, तथा च प्रलये सत्त्वं सत्त्वरूपतया रजो रजो रूपतया, तमस्तमोरूपतया प्रवर्त्तते, त्रयाणां गुणानां साम्यावस्था हि प्रकृतिः । ' समुदयाच्च ' सृष्टिकाले इमे त्रयो गुणा मिलित्वा महत्तत्त्वमारभ्य पृथिव्य तानि समस्तानि कार्याणि कुर्वन्ति । तथा च त्रयो गुणा उपमद्यपमर्दकभावेन. रस्परं मिलित्वा महूदादिरूपेण प्रवर्तन्ते । प्रलये स्व - स्व - रूपेण परिणतानां अर्थात् सत्त्वं सत्त्वरूपतया रजोरजोरूपतया नमस्तमोरूपतया परिणतानाम् अर्थात् एकरूपाणां गुणानां सृष्टिकाले अनेक-पेण प्रवृत्तिर्दृश्यते येन विचित्रं कार्यं भवति तत् कथम्? अर्थात् एकरूपाणां CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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संस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपेता ३७ गुणानामनेकरूपा प्रवृत्तिः कथमित्यत आह - " परिणामतः सलिलवत् प्रतिप्रति-गुणाश्रयविशेषात् " अर्थात् गुणानामाश्रयभेदेन परिणामभेदो जायते यथा आकाशात् पतितं तोयं सर्वथा एकरसमपि वर्तते, परन्तु नानाभूमिविकारानासाद्य नारिकेल-ताल - बिल्व - आमलकेत्यादिपदार्थानां रसः अम्ल लवण - कटु - कषाय- तिक्ताद्यनेक-प्रकारको भवति, तथैव इमेऽपि त्रयो गुणाः परस्परवैषम्यवशात् अनेकस्वभावा जायन्ते । यथा गुणानां वैषम्यात् देवेषु उत्कृष्टं सत्त्वं भवति, मनुष्येषु रजोगुण उत्कृष्टो भवति, पक्षिप्रभृतिषु तम उत्कृष्टं भवति, तथा च एवंविध - देव - मनुष्य-पक्षि - आदि - आश्रयाणां विशेषात् ( भेदात् ) अनेकस्वभावा गुणा जायन्ते येन तेषामनेकरूपा प्रवृत्तिर्भवति विचित्रं च कार्यं जायते ॥ १५-१६ ॥ हिन्दी- - परस्पर में भिन्न - भिन्न रूप से प्रतीत होने वाले जो भेदस्वरूप महदादि ( महत्तत्त्व आदि ) कार्य हैं उनका कोई ' अव्यक्त ' नाम का कारण अवश्य है जिसमें कि महदादि रूप कार्य अव्यक्त रूप से रहता है । अव्यक्त का साधक प्रथम हेतु है ' परिमाणात् ' जिसका अर्थ सांख्य ने यहाँ परिमित = अव्यापी याने व्याप्य किया है । अर्थात् जो कारण अपने में कार्य को व्याप्त करके याने अपने में सन्निविष्ट करके रहे वही ' अव्यक्त ' है । जैसे घट आदि मिट्टी से बने हुए पदार्थों का मिट्टी ही अव्यक्त कारण है । क्योंकि घट आदि मिट्टी ही में अव्यक्त रूप से रहते हैं वैसे ही महत्तत्त्व आदि कार्यों का भी कोई ' अव्यक्त ' कारण है जो कि महत् आदि कार्यों को अपने में अव्यक्त रूप से व्याप्त करके रहता है । उसी को ' प्रकृति ' ' प्रधान ' इन शब्दों से भी कहा है । ‘ समन्वयात् ' यह अव्यक्त का साधक दूसरा हेतु है । इसका अर्थ है समान-रूपता, अर्थात् महत्तत्त्व आदि पदार्थ जैसे सुख - दुःख मोहात्मक हैं इसी प्रकार अव्यक्त ( प्रकृति ) भी त्रिगुणात्मक होने के कारण सुख - दुःख - मोहरूप है, क्योंकि कार्य के अनुरूप ही कारण होता है । वही कारण अव्यक्त ( प्रकृति 1 " शक्तितः प्रवृत्तेश्व " यह तीसरा हेतु है, जिस कारण में जिस कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति होती है उस कारण शक्ति के द्वारा वही कार्य उत्पन्न होता है, जैसे मिट्टी से घट, तिलों से तैल, सो इसी प्रकार महत्तत्त्व से लेकर पृथ्वी पर्यन्त समस्त कार्यों को उत्पन्न करने की साक्षात् परम्परा साधारण शक्ति का आश्रयीभूत जो कारण है वही अव्यक्त ( प्रकृति ) है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३८ सांख्यकारिका “ कारणकार्यविभागात् ” समस्त कार्यो का विभाग ( आविर्भाव = उत्पत्ति ) अपने - अपने कारणों से होती है, जैसे मिट्टी से घट की, तन्तुओं से पट की, इस प्रकार महत्तत्त्व से लेकर पृथ्वी पर्यन्त समस्त कार्यों की साक्षात् - परम्परया उत्पत्ति अव्यक्त से होती है अतः उसी अव्यक्त रूप कारण को समस्त चराचर जगत् का कारण सांख्य ने माना है । “ अविभागाद्वैश्वरूपस्य " महत्तत्व से पृथिव्यन्त समस्त कार्य प्रलयकाल में जिस अव्यक्त रूप कारण में अविभक्त ( विलीन ) हो जाते हैं वही अव्यक्त रूप कारण प्रकृति है । इन पाँच कारणों से अव्यक्त सिद्ध हुआ अब उसकी प्रवृत्ति का प्रकार बतलाते हैं— " प्रवर्त्तते त्रिगुणतः समुदयाच्च " तीनों गुणों की साम्यावस्था को अव्यक्त कहते हैं और वे तीनों गुण प्रलयकाल में समान रूप से परिणत होते रहते हैं । जैसे सत्त्व सत्त्वरूप से, रजोगुण ' रजोरूप से, तम तमोरूप से, क्योंकि गुणों का परिणत होते रहना ही स्वभाव है - बिना परिणाम के ये तीनों गुणं एक क्षण भी नहीं रह पाते हैं, अतः प्रलयकाल में अव्यक्त का तीनों गुणों का समानरूप से परिणाम भाव चलता ही रहता है । " समुदयाच्च " और प्रकृति पुरुष का संयोग हो जाने पर इन तीनों गुणों की समानता में विकार उत्पन्न हो जाता है । इसलिए सृष्टिकाल में ये तीनों गुण आपस में मिलकर ही महत्तत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व पर्यन्त समस्त कार्यो को उत्पन्न कर पाते हैं । और इसी समय इनका जमकर संघर्षात्मक युद्ध भी हो है जिस संघर्ष में एक गुण अपने से इतर दो गुणों का उपमर्दन करता है और उन दो गुणों को उपमदित होना पड़ता है । जैसे कई व्यक्ति मिलकर कोई कार्य करते हैं और उसमें संघर्ष उपस्थित हो जाने पर एक व्यक्ति अपनी प्रबल शक्ति के आधार पर इतर व्यक्तियों को दबाकर अपना उल्लू सिद्ध कर ही लेता है । इसी उपमर्द्योपमर्दकभाव के आधार पर होनेवाली गुणों की प्रवृत्ति से सुख - दुःख - मोहादिस्वरूप अनेक विचित्र कार्य देखने में आते हैं । प्रश्न - प्रलयकाल में ये तीनों गुण जबकि अपने २ असली प्रत्येक रूप में स्थिर रहते हैं जैसे सत्त्व - सत्त्वरूप से. रजोगुण रजोरूप से, तम तमोरूप से, तब CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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संस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपेता ३ ९ फिर सृष्टिकाल में इनकी अनेक रूपवाली विचित्र प्रवृत्ति क्यों देखने में आती है? उत्तर - " परिणामतः सलिलवत् प्रति- प्रतिगुणाश्रयविशेषात् " अर्थात् यद्यपि ये तीनों गुण एकरूप हैं फिर भी इन गुणों के आश्रय भिन्न -२ हैं अतः आश्रय-भेद से इनका परिणामभेद देखने में आता है । जैसे देवताओं में तीनों गुणों के होते हुए भी सत्त्वगुण प्रधान होने के नाते वे सात्विक कहे जाते हैं, मनुष्यलोग रजोगुण की प्रधानता के कारण राजसिकवृत्ति वाले कहे जाते हैं, इसी प्रकार पक्षियों में तमोगुण की प्रधानता है अतः वे तामसवृत्ति सम्पन्न होते हैं । ऐसे ही एक ही माता से उत्पन्न हुए बालक भिन्न- २ प्रवृत्ति एवं स्वभाव वाले देखने में आते हैं, उसका कारण एकमात्र वालकरूप - आश्रयभेद - प्रयुक्तगुणभेद ही है । इसी प्रकार आकाश से बिन्दु के रूप में गिरा हुआ जल एकरस होता हुआ भी नाना भूमि विकारों को प्राप्त करके नारियल - ताड़ी - वेल - आंवला आदि पदार्थों के रस में परिणत होता हुआ कहीं खट्टा कहीं मीठा कहीं तीता अनेक प्रकार का 7, हो जाता है ॥ १५-१६ ।
सङ्घातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात् ।
पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥
गौ ० - एवमार्याद्वयेन प्रधानस्यास्तित्वमवगम्यते, इतश्चोत्तरं पुरुषास्तित्वप्रति-पादनार्थमाह । यदुक्तं ‘ व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञानान्मोक्षः प्राप्यत ' इति, तत्र व्यक्ता-दनन्तरमव्यक्तं पञ्चभिः कारणैरधिगतं व्यक्तवत्, पुरुषोऽपि सूक्ष्मस्तस्याधुनाऽनुमि-तास्तित्वं प्रतिक्रियते । ' अस्ति पुरुषः, कस्मात्? सङ्घातपरार्थत्वात् – योऽयं महदादिसङ्घातः स पुरुषार्थ इत्यनुमीयते, अचेतनत्वात् पर्यङ्कवत् यथा पर्यङ्कः प्रत्येकं गात्रोत्पलकपादपीठ तूलीप च्छादनपटोपधानसङ्घातः परार्थो न हि स्वार्थः, पर्यस्य न हि किञ्चिदपि गात्रोत्पलाद्यवयवानां परस्परं कृत्यमस्ति, अतोऽवगम्यते-ऽस्ति पुरुषो यः पर्यङ्के शेते यस्यार्थं पर्यङ्कस्तत्परार्थम् इदं शरीरं पञ्चानां महाभूतानां सङ्घातो वर्तते, अस्ति पुरुषो यस्येदं भोग्यं शरीरं भोग्यमहदादि-सङ्घातरूपं समुत्पन्नमिति । इतश्चात्मास्ति - त्रिगुणादिविपर्ययात् । यदुक्तं पूर्वस्यामार्यायां ' त्रिगुणमविवेकि विषय ' इत्यादि, तस्माद्विपर्ययात् येनोक्तं १. अनुमानेनास्तित्वं प्रतिष्ठाप्यत इत्यर्थः । तत्साधयति - इदमिति । २. पर्यङ्कवदिति दृष्टान्ते परार्थत्वं प्रसाध्य दान्तिके CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४० साख्यकारिका तद्विपरीतस्तथा च पुमान् । अधिष्ठानात्, यथेह लङ्घनप्लवनधावनसमर्थै र श्वे. र्युक्तो रथः सारथिनाऽधिष्ठितः प्रवर्तते तथात्माऽधिष्ठानाच्छरी र मिति तथा चोक्तं षष्टितन्त्रे — ‘ पुरुषाधिष्ठितं प्रधानं प्रवर्तते । अतोऽस्त्यात्मा - भोक्तृत्वात् यथा मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायषड् सोपबृं हितस्य संयुक्तस्यान्नस्य साध्यते एवं महदादिलिङ्गस्य भोक्तृत्वाभावादस्ति स आत्मा यस्येदं भोग्यं शरीरमिति । इतश्च कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्व केवलस्य भावः कैवल्यं तन्निमित्तं या च प्रवृत्तिस्तस्याः स्वकैवल्यार्थे प्रवृत्तेः सकाशादनुमीयते --- अस्त्यात्मेति, यतः सर्वो विद्वानविद्वांश्च
संसारसन्तानक्षय मिच्छति । एवमेभिर्हेतुभिरस्त्यात्मा शरीराद् व्यति-रिक्तः ॥ १७ ॥
अन्वयः - पुरुषः अस्ति, संघातपरार्थत्वात्, त्रिगुणादिविपर्ययात् अधि-ष्ठानात्, भोक्तृभावात्, कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च । व्याख्या - ( यहाँ पर पुरुष पक्ष है- अस्तित्व साध्य है - और पुरुष के अस्तित्व को पाँच हेतुओं के द्वारा सिद्ध किया जाता है ) – संघातपरार्थत्वात् = संहन्यन्ते = एकत्रोभवन्ति, सुखदुःखमोहा यत्रासौ संघातः = जडसमुदायः, तस्य - – परार्थत्वात् = पुरुषोपभोगात्मकार्थसाधनत्वात् । लोके सर्वेऽपि जडभूताः पर्यङ्कगृहादिपदार्थाः परार्था अर्थात् चेतनपुरुषप्रयोजनका दृष्टाः, चेतन एव पुरुषः पर्यङ्कस्योपरि शयनं करोति, ( मरे हुए को बल्कि खटिया से नीचे उतार दिया जाता है ) एवं चेतन एव पुरुषः गृहेऽपि निवसति, ( मरे हुए को घर से निकाल कर श्मशान आदि स्थानों में भेज दिया जाता है ) अतो यस्य चेतनपुरुषस्य कृते इमे पर्यङ्कगृहादि-पदार्थाः प्रयोजनवन्तो दृश्यन्ते स एव चेतनपुरुष आत्मभूतः सांख्यपुरुषः । हेत्वन्तरमाह - त्रिगुणादिविपर्ययत्वात् = सुखदुःखमोहत्रैगुण्याभावात् । ( जो वस्तु सुखदुःखमोहरूपत्रिगुणात्मक है वह जड़ है जैसे घट - पट आदि और जहाँ त्रिगुणादि ( आदिपदग्रा अविवेकित्व ) विषयत्व - सामान्यत्व - अचेतनत्व - प्रसवधर्मित्व ) नहीं हैं अर्थात् त्रिगुणादि का विपर्यय है वही सांख्याभिमतपुरुषस्वरूप १. अत्र शरीरं प्रयत्नवदात्माधिष्ठितं चेष्टावत्त्वाद् रथवदित्यनुमानप्रयोगो द्रष्टव्यः । २. अन्नस्य भोक्तृत्वाभावाद् भोग्यत्वेन भोक्ता देवदत्तादिः यथा साध्यत इत्यर्थः । ३. मुमुक्षूणां शास्त्राणां चेति शेषः ।. CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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संस्कृत - हिन्दी - व्याख्योपेता ४ आत्मा ( जीवात्मा ) है । इससे भी पुरुष का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है -: पुरुष: अस्ति ( अस्तितावान् - स्वनिरूपितसत्तावान् ) त्रिगुणादिविपर्ययात् - वेदान्त ब्रह्मवत् । ( सांख्यलोग पुरुषस्वरूप आत्मा का अस्तित्व पाँच हेतुओं से सिद्ध करते हैं— ) तृतीयं हेतुमाह - अधिष्ठानात् = अधिष्ठातृत्वात्, ( प्रेरकत्वात्-सञ्चालनकर्तृत्वात् ) यथा लोके इदं दृश्यते यत् सारथिनाऽधिष्ठितः = प्रेरित एव रथञ्श्र्चलति तथा सर्वमपि जड़भूतं वस्तु चेतनपुरुषाधिष्ठितमेव प्रवर्तते स एव चाधिष्ठाता चेतनः पुरुषपदाभिधेय आत्मा, तथा च ' पुरुषः - अस्ति - अधिष्ठा-नात् ( जडवर्गसञ्चालनकर्तृ त्वात् ) यन्नैवं तन्नैवं शशशृङ्गवत् ' । चतुर्थ हेतुमाह - भोक्तृभावात् = भोक्तृत्वात्, लोके घटपटादिभोग्यपदार्थान् दृष्ट्वा तेषां भोक्ता यथा कश्चिच्चेतनोऽनुमीयते तथा बुद्धयादिसमस्तजडपदा-र्थानामपि भोक्ता चेतनः पुरुषोऽवश्यमस्ति स एव सांख्यपुरुष आत्मा । तथा च अनुमानम् - “ पुरुषः अस्ति- भोक्तृभावात् - मायोपहितब्रह्मवत् " । पञ्चमं हेतुमाह - कैवल्यार्थं प्रवृत्तेः - आत्यन्तिक - ऐकान्तिकदुःखत्रयप्रशमन-रूपकैवल्यार्थं प्रवृत्तिदर्शनात् । सा च कैवल्यार्थं प्रवृत्तिर्न बुद्धयादीनामपि तु पुरुषस्यैव । तथा च पुरुषः अस्ति कैवल्यार्थं प्रवृत्तेः ' महर्ष्यादिवत् ' इत्यनुमाने-नापि शरीराद् व्यतिरिक्तः पुरुष आत्मा सिद्धः ॥ १७ ॥
हिन्दी- - अब इस कारिका से अनुमान के आधार पर पुरुष ( आत्मा = जीवात्मा ) को सिद्ध करते हैं- जिस अनुमान में प्रथम हेतु है– ( १ ) ‘ संघात् परार्थत्वात् ’ – अर्थात् जितना भी संघात = भोग्य पदार्थ है वह ' परार्थ ’ अर्थात् पर जो चेतन पुरुषस्वरूप आत्मा है उसके ' अर्थ ' प्रयोजन के लिये है, क्योंकि लोक में जितने भी संघात = भोग्य सुन्दर पदार्थ तेल - फुलेल, पलङ्ग, आसन आदि देखने में आते हैं उन सबको देखकर यह अनुमान होता है कि इनका भोक्ता कोई चेतन व्यक्ति अवश्य है वही चेतनपुरुष शरीरव्यति-रिक्त आत्मा है । ( २ ) ' त्रिगुणादिविपर्ययात् ' इस द्वितीयहेतु की हिन्दी व्याख्या की जा चुकी है । ( ३ ) ' अधिष्ठानात् ' ' - - इस तृतीयहेतु से भी पुरुष ( आत्मा ) का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है । अधिष्ठान शब्द का अर्थ है प्रेरित करने वाला अर्थात् CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४२ सांख्यकारिका सञ्चालन करने वाला । हम लोक में देखते हैं कि सारथिरूप चेतन से व्यक्ति प्रेरित अथवा सञ्चालित हुआ रथ जैसे अपने वहन आदि कार्य को सम्पन्न करता है उसी प्रकार संसार की सभी जड़भूत वस्तुयें चेतन पुरुष से अधिष्ठित अर्थात् प्रेरित होकर ही अपने अपने कार्यक्षम देखी जाती हैं, सो इनका जो अधिष्ठाता ( प्रेरक ) है वही सांख्यपुरुष आत्मा है । ( ४ ) ' भोक्तृभावात् ' इस हेतु से भी बुद्धि आदि समस्त जड़ पदार्थों का भोक्ता चेतन पुरुष कोई अवश्य है यह सिद्ध होता है वही सांख्य पुरुष आत्मा है । ( ५ ) ' कैवल्यार्थं प्रवृत्ते ' पञ्चम हेतु से भी यह सिद्ध होता है कि कैवल्य-रूप मोक्ष के लिये प्रवृत्तिशील कोई जड़पदार्थ न होकर चेतन ही हो सकता है बस, यही चेतन सांख्यपुरुष आत्मा है । अब प्रश्न यह होता है कि वह पुरुषस्त्ररूप आत्मा प्रति शरीर में एक है अथवा अनेक? ॥ १४ ॥
जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च ।
पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥
गौ ० — ‘ अथ स किमेकः सर्वशरीरेऽधिष्ठाता मणिरसनात्मकसूत्रवत् आहो-स्विद् बहव आत्मानः प्रतिशरीरमधिष्ठातार ' इत्यत्रोच्यते – जननञ्च मरणश्च करणानि च जननमरणकरणानि तेषां प्रतिनियमात्, प्रत्येक नियमादित्यर्थः । यद्येक एव आत्मा स्यात् तत एकस्य जन्मनि सर्व एव जायेरन् एकस्य मरणे सर्वेऽपि म्रियेरन् एकस्य करणवैकल्ये वाधिर्यान्धत्वमूकत्वकुणित्वखञ्जत्वलक्षणे सर्वेऽपि वधिरान्धमूककुणिखञ्जाः स्युः, न चैवं भवति, तस्माज्जन्ममरणकरणानां प्रतिनियमात् ' पुरुषबहुत्वं सिद्धम् । इतश्च अयुगपत्प्रवृत्तेश्च युगपदेककालं न युगपदयुगपत् प्रवर्तनं, यस्मादयुगपद्धर्मादिषु प्रवृत्तिर्दृश्यते, एके धर्मे प्रवृत्ता अन्येऽधर्भे वैराग्येऽन्ये ज्ञानेऽन्ये प्रवृत्ताः, तम्मादयुगपत्प्रवृत्तेश्च बहव इति सिद्धम् । किञ्चान्यत् त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव त्रिगुणभावविपर्ययाच्च पुरुषबहुत्वं सिद्धम् । यथा सामान्ये ' जन्मनि एकः सात्त्विकः सुखी. अन्यो राजसो दुःखी, अन्यस्तामसो मोहवान्, एव त्रैगुण्यविपर्ययाद् बहुत्वं सिद्धमिति ॥ १८ ॥
१. व्यवस्थातः, अत एवोक्ते न्यायसूत्रे ' व्यवस्थातो नानेति ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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संस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपेंता ४३ अन्वयः - पुरुष बहुत्वं, सिद्धम्, ( कुत: ) जननमरणकरणानां प्रतिनियमात्, अयुगपत्प्रवृत्तेः, त्रैगुण्यविपर्ययाच्च । व्याख्या - पुरुषबहुत्वम् = पुरुषानेकत्वम्, ( प्रतिशरीरमित्यर्थः ) सिद्धम् = अनुमितं भवति । ( त्रिभि: हेतुभिरित्यर्थः ) कथमित्याह - जननमरणकरणानां प्रतिनियमात् - - जन्ममृत्यु - इन्द्रियाणां - प्रतिनियमात् = प्रतिशरीरं भिन्नत्वात् । अयमाशयः - नूतनपरिगृहीतशरीरेन्द्रियमनोबुद्ध यहङ्कारादिभिः सह पुरुषस्य आत्मनः ) सम्बन्धो जन्म तद्विच्छेदश्च मरणम् - अर्थात् प्राप्तशरीरादिभिः सह पुरुषस्य सम्बन्ध विच्छेदो मरणम्, तथा च सर्वेषु शरीरेषु यदि एकः पुरुषः स्यात्तदा एकस्मिन् जायमाने सर्वे जायेरन्, एकस्मिन् म्रियमाणे च सर्वे म्रियेरन् एवं एकस्मिन् अन्धे सर्वेऽप्यन्धाः स्युः एकस्मिन् बधिरे च सर्वेऽपि बधिराः स्युः, न चैवं भवतीत्यतः प्रतिशरीरं भिन्न एव पुरुषः स्वीकार्यस्तस्माज्जननमरणकरणानां प्रतिनियमात् इति हेतुना पुरुषबहुत्वं सिद्धम् । अर्थात् ' पुरुषाः - अनेकाः ( प्रति-शरीरं भिन्नाः ) जननमरणकरणानां प्रतिनियमात् ' इत्यनुमानं पुरुष- बहुत्वे मानम् । अयुगपत्प्रवृत्तेश्च = विभिन्नकालीन प्रवृत्तिमत्त्वात् । त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैकः गुण-त्रयाणां परिणामभेदाच्च । अर्थात् केचन प्राणिनः सत्त्वगुणप्रधाना दृश्यन्ते यथा ऋषिप्रभृतयः, अपरे केचन रजोगुणप्रधानाः सन्ति यथा मनुष्याः अन्ये च प्राणिनस्तमोगुणप्रधाना अपि वर्त्तन्ते यथा पक्षि- सर्प - पश्वादिप्रभृतयः । सोऽयं त्रैगुण्यविपर्यय एकात्मवादपक्षे नोपपद्यते, यतः यद्येक: पुरुष: ( आत्मा ) स्यात् तर्हि कश्चित् प्राणी सत्त्वगुण प्रधानश्चेत् तर्हि सर्वेऽपि प्राणिनः सात्त्विका एव भविष्यन्ति, रजो गुणप्रधानश्चेत् कश्चिदेकः प्राणी तदा सर्वे एव राजसा भवन्तु, तमोगुणप्रधाने च तामसा भवेयुः, न च तथा भवति, तस्मात् पुरुषबहुत्वं स्वीकार्यम् ॥ १८ ॥
हिन्दी - ( १ ) जनन ( जन्म ) मरण ( मृत्यु ) और करण ( इन्द्रियाँ ) ये प्रत्येक शरीर में भिन्न - भिन्न रूप से देखने में आती हैं, अतः इन सबकी व्यवस्था के कारण पुरुष ( आत्मा ) अनेक ( बहुत ) है । कारण कि शरीर-इन्द्रिय - बुद्धि - मन अहङ्कार आदि के साथ आत्मा का सम्बन्ध होना जन्म कहलाता है और उस सम्बन्ध का विच्छेद हो जाना ही मृत्यु है, अब ऐसी परिस्थिति में यदि आत्मा को एक माना जाता है तो उस एक आत्मा का यदि एक शरीर के तथा उस शरीर से सम्बन्धित मन - बुद्धि- अहङ्कार आदि के साथ सम्बन्ध हो CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४४ साख्यकारिका गया तो सब शरीरों के तथा उससे सम्बन्धित मन - बुद्धि- अहङ्कार आदि के साथ सम्बन्ध हो गया, इससे यह आपत्ति लग जाती है कि एक प्राणी के उत्पन्न होने से सभी प्राणी उत्पन्न होने लग जायें । और एक शरीर से तथा उससे सम्बन्धित मन - बुद्धि- अहंकार आदि से यदि आत्मा के सम्बन्ध का विच्छेद हो गया तो समझो कि सभी से हो गया, इससे एक प्राणी के मरने से सभी प्राणियों के मरण की आपत्ति लग जाती है । ( २ ) अयुगपत्प्रवृत्तेः = भिन्न - भिन्न कालों में अलग - अलग प्राणियों की प्रवृत्तियों के देखने से भी पुरुष ( आत्मा ) का बहुत्व सिद्ध होता है, अर्थात् किसी समय कोई धर्म में प्रवृत्त है तो कोई अधर्म में इत्यादि, अतः यदि आत्मा सब शरीरों में एक ही हो तो एक किसी भी प्राणी की धर्म में प्रवृत्ति होने पर सभी धर्म में प्रवृत्ति होने लग जायें और अधर्म में प्रवृत्ति हो जाने पर सभी अधार्मिक बन जायें कारण कि सबका प्रेरक आत्मा एक ही है । ( ३ ) त्रैगुण्यविपर्ययात् = त्रैगुण्य ( सत्त्व - रज - तम ) के विपर्यय अर्थात् परिणामभेद से भी पुरुष का बहुत्व सिद्ध हो जाता है जैसे कोई तो प्राणी एक मात्र सुखी ही है जैसे देवता लोग, और कोई एकमात्र दुःखी ही हैं जैसे पशु आदि प्राणी, कोई एकदम मोहजाल में ही फंसे हुए हैं जैसे सांसारिख मनुष्य । अतः पुरुष को यदि एक माना जायगा तो एक यदि सुखशाली है । तो सभी सुखशाली हो जावें और एक यदि दुःखी है तो सभी दुःखी हो जावें, तथा एक के मोहग्रस्त होने से सभी मोहग्रस्त हो जायँ । कारण कि सबसे सम्बन्धित आत्मा एक ही है ॥ १८ ॥
विवेक ज्ञान के उपयोगी आत्मा के धर्मो को बतलाते हैं-तस्माच्च विपर्यासात्सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृ भावश्च ॥ १६ ॥
गौ ० — अकर्ता पुरुष इत्येतदुच्यते - १ तस्माच्च विपर्यासात्, तस्माच्च यथोक्तत्रैगुण्यविपर्यासाद्विपर्ययात् - निर्गुणः विवेकी भोक्तेत्यादिगुणानां पुरुषस्य यो विपर्यास उक्तस्तस्मात्, सत्त्वरजस्तमःसु कर्तृ भूतेषु साक्षित्वं सिद्धं पुरुषस्येति १. पुरुषबहुत्वं प्रसाध्य विवेकज्ञानोपयोगितया तस्य धर्मानाहेति मिश्रः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA