Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 101–110
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
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शतपथ - प्रथमखण्ड सनातन - ज्ञानविज्ञान - तथ्यों से सर्वथा शून्य, भूतानुत्रन्धी- मनः शरीरमात्र प्रधान अशन - पान - भ्रमणादि लोकजीवनों से अनुप्राणित मनोऽनुरञ्जनात्मक, तथा शरीरपुष्ट्यात्मक [ कामार्थभोगात्मक ] प्रत्यक्षसिद्ध व्यासङ्गों के प्रति निरन्तर पथप्रदर्शक बने रहना हीं इनकी ' लोकप्रियता ' की एकमात्र परिभाषा है । इत्थंभूत व्यक्ति ही प्रज्ञानुगत - स्वाध्याय - चिन्तन - मननानुगत - नैष्ठिक - व्यासङ्गों के प्रति इसलिए आलोचक बन जाते हैं अपने उद्युष्ट - ‘ लोकप्रियता - बापूलर ' आदि शब्दों के माध्यम से कि, बिना ऐसा किए इनका - ' समझाने के लिए आतुर ' लक्षण व्यामोहन कदापि सुरक्षित नहीं रह सकता । अ एव ये प्रायः सभी सांस्कृतिक - निधियों से ' लोकप्रियता ' के नामच्छल से अपने आप को ' पुष्करपलाशवन्निर्लेप ' प्रमाणित करते रहते हैं तथोक्त व्यक्ति-त्त्व के संरक्षणाकर्षण से । अन्यथा प्रत्येक मानव मानव है । अध्यवसायात्मिका निष्ठा के द्वारा, तन्मूलक पुरुषार्थं के द्वारा, भगवत्प्रदत्ता ' संवित् ' नाम की ' समझ ' के द्वारा इसके लिए कुछ भी न समझने जैसा नहीं है । समझने के लिए समझने की चेष्टा करने वाला जिज्ञासु मानव कठिन से कठिन विषय को भी जहाँ अलसा समझ लेता है, वहाँ समझाने के लिए समझने की चेष्टा में प्रवृत्त केवल तर्कवादी मानव सरलतम विषय को भी न तो स्वय ही समझ सकता, नापि दूसरों को ही समझा सकता । वक्रता, और कठिनता, दोनों शब्द हैं, वहाँ ऋजुता, और सरलता, दोनो हाँ समानधर्मा समानधर्म्मा शब्द हैं । एवं दोनों शब्दों का क्रमशः बुद्धि, और बोध, इन दोनों शब्दों से क्रमिक सम्बन्ध है । बुद्धि का सौर सम्वत्सरमण्डमलवर्त्ती कुटिलकाल से सम्बन्ध है, एवं बोध का कालातीत कुटिल - अवक्र-अज - अव्ययात्मा से सम्बन्ध है । एवं इसी सहजसिद्ध तथ्य के आधार पर ऋषिप्रज्ञाने सरलता, और कठिनता का स्वरूप - समन्वय किया है । सौरसम्बत्सरकाल की प्रतिबिन्दु कुटिल है, वक्रित है, छद्मगति-भावापन्ना है | अतएवः - ‘ सर्वतः -त्सरन् - गच्छति ' निर्वचन से सम्वत्सरकालचक्र ' सर्वत्सर ' कहलाया है, जोकि ' सर्वत्सर ' शब्द ही ' सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध होरहा है * । कालात्मक वृत्त ( चक्र ) की प्रतिबिन्दु अपने त्सरणात्मक - छद्मगतिभावात्मक कुटिल भाव से वक्रित है । यह वक्रता ही सौरकाल को चक्रात्मक वृत्तरूप में परिणत किए रहती है । अतएव सौरसम्वत्सरचक्रात्मक कालवृत्त लोकव्यवहारभाषा में ' कुटिलकाल ' नाम से ही प्रसिद्ध होरहा है, जिस इस रहस्यपूर्ण ' काल ' स्वरूप दिग्दर्शन के लिए ही अथर्ववेदीय ' कालसूक्त ' के आधार पर हमें ‘ दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा ' नामक सहस्रपृष्ठात्मक एत स्वतन्त्र निबन्ध उपनिबद्ध करना पड़ा है । मानव की बुद्धि इसी कुटिलकाल से, दिग्देशकालानुबन्धी सौरसम्वत्सरकाल से अभिव्यक्त हुई । अतएव कालात्मिका, अर्थात् दिग्देशकालालात्मिका सौरी बुद्धि को ही ' कुटिल'- ' वन ' अतएव - ‘ कठिन ’ कहा जाना चाहिए, जबकि दिग्देशकालातीत अव्ययात्मक पुरुष वृत्तात्मक कुटिलभाव से पृथक् रहता हुआ । अवक्रचेता -- अकुटिलचेता - ऋजु ही कहलाया है, जैसाकि ' अजस्यायक्रचेतसः ' ( उपनिषत् ) से स्पष्ट है । इस अकुटिल - अवक्रचेता, अतएव सरलतम ऋजुतम आत्मपुरुष के सहजधर्म का नाम ही है - ' संवित् ', जो संस्कृतभाषा में ' बोध ' नाम से, तथा लोकभाषा में-- ' समझ ' नाम से व्यवहृत किया जासकता है । * स ऐक्षत प्रजापतिः - सर्व वा अत्सारिषं य इमा देवता असृक्षीति । स ' सर्वत्सरो'-ऽभवत् । सर्वत्सरो ह वै नामैतत् [ - -यत-- य ' सम्वत्सर ' इति । शत ० ११।१।६।१२ ६७
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श्रात्मनिवेदन संविन्मूलक - बोध का ही नाम ' मम ' है, जिस का ऋजु अव्ययपुरुषात्मा से ही सम्बन्ध है, जिस इस संबि-न्मूलक ' बोध ' नामक ' समझ ' भाव से समन्वित होने के अनन्तर ही मानवबुद्धि की दिग्देशकालानुगता--सर्वत्सरभावात्मिका कुटिलता पृथक् होसकती है । इस कुटिलता से, कठिनता से परित्राण - प्राप्त करने के अनन्तर ही मानव की बुद्धि ऋजुभावात्मक - श्रात्मानुबन्धी निश्चय - निर्णयात्मक - संविदुरूप बोध की, समझ की अनुगामिनी बन सकती है । जबतक बुद्धि इस बोधरूपा ' समझ ' से समन्वित नहीं होजाती, तत्रतक तो यह अपने प्रातिश्विक -- सौरकालात्मक - व्यक्त --मूर्त्त'- कुटिल - काल के वारुणपाश से आबद्ध रहती हुई, ' समझ ' से वञ्चित होती हुई सर्वथा परावलम्बना - भावुकता क्रान्ता - पराश्रिता, श्रतएव सर्वथा- ' निरीहा ' ( निश्चित - संदिग्ध - सहज - ऋजु - निर्णय में असमर्था; ही बनी रहती है, जिस इस गहनतम तथ्य का ही हमारी प्रान्तीयभाषाने ‘ समझ बिना बुध बापड़ी ' ÷ इस लोकसूक्ति से स्पष्टीकरण किया है । सचमुच ऋजु– आत्मसंवित् ( बोधात्मिका समझ ) के बिना बुद्धि अपने कालात्मक कुटिलभाव से निरीहा ही तो है, जो अपने इस कुटिल बुद्धिदम्भ से, बुद्धिवाद से किसी भी तो तथ्य को नहीं समझ पाती । अर्जुन की, नितान्त भावुक अर्जुन की बुद्धिमानी में कौन सन्देह कर सकता है, जिसने अपने बुद्धिवादा-त्मक – प्रज्ञावाद के अभिनिवेश में आकर दिग्देशकालानुत्रन्धी तर्क - युक्ति - सदसत्परिणाम — आदि से समन्वित अपने ‘ बौद्धिक - व्याख्यान ' से एकबार तो भगवान् के सामने भी अपना बुद्धिमत्तापूर्ण कालिक पाण्डित्य अभिव्यक्त कर ही तो डाला । सचमुच ही तो दिग्देशकालात्मिका प्रत्यक्षसिद्धा कालिक - बुद्धि की दृष्टि से अर्जुन का वह सुप्रसिद्ध व्याख्यान ' बुद्धिमत्ता ' पूर्ण ही तो था, जिसका प्रत्येक बुद्धिवादी बुद्धिमान् तो सम-र्थन ही करेगा अपनी बुद्धि के मापदण्ड से । और इसे ही ' लोकप्रिय ' पथ कह देगा । किन्तु वस्तुस्थिति सर्वथा विपरीत ही थी । अर्जुन की बुद्धि आत्मसंविद्रूपा ' समझ ' से, इस आत्मयोग से वञ्चित बनती हुई शुष्क - कुटिल – कालिक – ‘ प्रज्ञावाद ' ( बुद्धिवाद ) रूप में हीं परिणत होगई थी, जो तात्कालिक - उपयोगिता, अनुपयोगिता के अतिरिक्त परिणामात्मिका उपयोगिता - अनुपयोगिता से तो एकान्ततः पराङमुख ही बनी रहती है । अतएव अर्जुन के उस बुद्धिमत्तापूर्ण भी महान् व्याख्यान के सम्बन्ध में उसी श्रात्मसंवित् - रूपा ‘ समझ ' के माध्यम से भगवान् को यही कह देना पड़ा कि - ' अशोच्यानन्वशोचस्त्वं- प्रज्ञावादांश्च भाषसे ' । प्रत्यक्षोपस्थित - दिग्देशकालानुबन्धी- तात्कालिक - प्रभाव से प्रभावित अर्जुन की यह ' बुद्धिमत्ता ' भी यों तत्त्वतः ‘ मूर्खता ’ ही प्रमाणित करदी गई सविदवतार भगवान् के द्वारा । और आगे चलकर सम्पूर्ण गीताशास्त्र के द्वारा भगवान् ने सृष्टितत्त्वस्वरूप - विश्लेषण - पूर्वक अर्जुन की इस कालप्रभावानुगता बुद्धि को आत्मसंविद्रूपा ' समझ ' से समन्वित करते हुए सुप्रसिद्धा उस ' बुद्धियोगनिष्ठा ' का ही अनुगामी बनाना पड़ा, जिसके चल पर हो इसकी बुद्धि बड़ी कठिनता से यह समझ सकी कि आततायी - हिंस्रक - नराधमों पर दया करना पुण्य नहीं, अपितु पाप है । एवं इनका आमूलचूड़ विनाश करने जैसा महत्पुण्य मानवता के क्षेत्र में और कोई दूसरा नहीं | ' ददामि बुद्धियोगं तम् ' -- ' बुद्धियोगमुपाश्रित्य ' -- ' बुद्धौ– शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ' इत्यादिरूप से भगवान् ने संविद्रूप ( दिग्देशकालातीत “ ÷ इस लोकसूक्ति के रहस्यात्मक स्वरूप -- विश्लेषण के लिए देखिए - ' दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा ' निबन्ध का ‘ आचारप्रकरण ' । हद
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शतपथ - प्रथमखण्ड श्रात्मभावयुक्त ) बुद्धियोग से ही बुद्धिमान् अर्जुन का ' समझाने की आतुरता ' जैसा महाभयावह मोह उपशान्त किया, एवं इस ' समझ ' से ही अन्ततोगत्त्वा इसके भावुकमुख से भी - ' करिष्ये वचनं तव ' जैसा नैष्ठिक - वाक्य विनिःसृत होसका । यही वह तथ्य है, जिसे विगत तीन सहस्र वर्षों से पुनः भारतराष्ट्र ने अपनी प्रत्यक्षमूला दिग्देशकालानुबन्धिनी बुद्धिमत्ता, अर्थात् भावुकतापूर्णा मूर्खता से विस्मृत कर आततायीवर्ग के द्वारा अपना सबकुछ अपहृत ही करा लिया है । सचमुच अनात्मवादमूला, श्रात्मयोगात्मक– बुद्धियोग से वञ्चिता ( प्रारम्भ के भावुक अर्जुन की ) उस बुद्धिमत्तापूर्णा व्याख्यानशैली का ही अक्षरश; अनुगमन करने वाले भावुक भारतीय मानव ने अपनी इसी ' बुद्धिमत्ता ' के प्रवेश से वैसे वैसे अकल्पित— प्रज्ञावादों की कल्पना करती है, जिनके द्वारा आज यह वेदशास्त्र, तदुपबृं हक पुराणशास्त्र, तदुपनिषदात्मक [ रहस्यविश्लेषणात्मक ] गीताशास्त्र, जैसे नैष्ठिक शास्त्रों के विद्यमान रहते हुए भी ' संवित् ' रूप बुद्धियोग से वञ्चित रहता हुआ ‘ समझ ' के क्षेत्र से अपने आपको पृथक् कर बुद्धिमानीपूर्वक ' समझाने के लिए ' ही आतुर बना हुआ है । अतएव इसे अपना वास्तविक ' प्रिय ' जहाँ आज ' प्रिय ' लग रहा है, वहाँ वास्तविक ' अप्रिय ' ही इसके लिए, ' प्रिय ' बनता जा रहा है । और यों एक- ' समझ ' के बिना इसकी बुद्धि ' बापड़ी ' [ निरीहा निश्चयात्मक निर्णये - असमर्था ] ही बनी हुई है, जिस इस असमर्थता से परित्राण प्राप्त कर लेने का एकमात्र प्रारम्भिक उपाय है - ज्ञानविज्ञानात्मक उस स्रोत का पुनः समाश्रय, जिसके आधार पर ही मानवबुद्धि वस्तुस्थिति का मर्म समझ पाती है । संस्कृति के उस पारिभाषिक स्रोत को पुनः प्रवाहित किए बिना अन्य प्रयत्न - सहस्रों से भी तीन हजार वर्षों जैसी हमारी दीर्घनिद्रा जागृतिरूप में परिणत नहीं होसकती । अपनी तत्त्वमूला - सांस्कृतिक-निष्ठा को आधार बनाए बिना कदापि भारतराष्ट्र का त्रिसहस्र वर्षात्मक प्रज्ञावाद उपशान्त नहीं होसकता । एक-मात्र इसी मङ्गलकामना से, भारतराष्ट्र के अभूत स्वयं हम अपने आपके उद्बोधन के लिए ही - ' समझाने की आतुरता से ' एकान्ततः संस्पृष्ट रहते हुए स्वयं अपने आपको समझाने और समझने के लिए ही ज्ञानविज्ञानात्मिका - परिभाषाओं के महान् कोश - ' शतपथब्राह्मण का हिन्दी - विज्ञानभाष्य ' अभिव्यक्त होरहा है, जिसकी पारिभाषिक - मौलिक - शब्दानुगता- कठिन ' हिन्दी ' से सम्बन्ध रखने वाली- ' समझ ' के सम्बन्ध में हीं हमें अत्र बोध, और बुद्धि से श्रनुप्राणित ' समझ ', और ' बुद्धिमानी ' का यशोगान करना पड़ा प्रक्रान्ता ' लोकप्रियता ' के स्वरूप - विश्लेषण के लिए ही । दूसरा क्रमप्राप्त शब्द है - ' विज्ञान ' । वर्त्तमानयुग का यह भी बुद्धिमत्तापूर्ण एक महान् ' उद्घोष ' है | भारतीय शास्त्र - संस्कृति - सांस्कृतिक - आचार - धर्म्म - आदर्श - सभ्यता आदि आदि के प्रचण्ड आलोचक इन भारतीय विभूतियों पर आज के बुद्धिमत्तापूर्ण युग में सब से बड़ा अभियोग यही लगाते हुए देखे सुने गए हैं कि, “ जिन आदियुगों- पुरायुगों में इन सबकी रचना हुई थी, वे युग ' विज्ञान ' से अपरिचित थे । अतएव केवल अनुमान के माध्यम से ही वैसा कुछ बन गया । किन्तु श्राज के वैज्ञानिक युग में वे सब तथ्य निस्तत्त्व प्रमाणित हो चुके हैं प्रत्यक्ष - परीक्षणों के द्वारा । अतएव विज्ञानशून्य उस ' प्राचीन ' को हमें आज के वैज्ञानिक, अतएव प्रगतिशीलयुग में सर्वथा भुला ही देना चाहिए, और इत्यादि - इत्यादि ” । अपरिचित हैं हम आज के ‘ सायन्स ' नामक उस भौतिक विज्ञान से, जिसकी तत्त्वसंख्या क्रमशः दिग्देशकालानुबन्धों से परिवर्तित ही होती जारही है । हमारी संस्कृति के मौलिक आधार भौतिक विज्ञान के इस वारुणपाशबन्धन से सदा ही उन्मुक्त रहैं, यही हमारी मङ्गलकामना है । जिसे आज ' विज्ञान ' कहा जाता है, वैसा विश्वविनाशक-बहिर्मुख - आत्मप्रतिष्ठ । वञ्चित - भूतविज्ञान अपनी क्षणिक - विज्ञानता से विश्वविनाशक बनता हुआ भारतीय-६६
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आत्मनिवेन संस्कृति की दृष्टि से तो सदा से ही उपेक्षणीय रहा है । ठीक इसके विपरीत यहाँ तो ज्ञान सहकृत विज्ञान का ही समादर हुआ है * | ‘ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' लक्षणा ब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' लक्षण ' नित्य - विज्ञान ' हीं भारतराष्ट्र के लिए आराध्य रहा है, जिस इस ' नित्यविज्ञान ' से ही ऋषिप्रज्ञा ने विश्व, विश्वप्रजा, प्रजा के कर्त्तव्य, आदि आदि व्यवस्थित किए हैं, जो नित्यविज्ञान आधिदैविकविज्ञान, अवि भौतिकविज्ञान, आध्यात्मिकविज्ञान, आधियाज्ञिक विज्ञान, आधिनाक्षत्रिकविज्ञान, आदि आदि भेद से अनेक धाराओं में विभक्त है । काल्पनिक अद्वैतवाद से अनुप्राणित काल्पनिक ज्ञानवाद के दार्शनिक विजृम्भण से अवश्य ही भारत की विज्ञाननिधि तथोक्ता अवधि से अभिभूत ही होती चली आरही है, जिसके दुष्परिणाम - स्वरूप ही तो हमारा अधःपतन हुआ है । अतएव हमें अविलम्ब अपनी उन विज्ञानधाराओं के अन्वेषण - आचरण में प्रवृत्त हो ही जाना चाहिए, जिन उन विज्ञानधाराओं को हमें वर्त्तमान युग के क्षणिक - भूतविज्ञान के महा अभ्व से सर्वात्मना असंस्पृष्ट ही बनाए रखना चाहिए । सचमुच वर्त्तमान में कुछ एक विद्वानों की यह प्रवृत्ति भारतीय - ज्ञान - विज्ञान - निधि के मौलिक - स्वरूप को विकृत - श्रवमानित ही करने · वाली प्रमाणित होरही है, जिस प्रवृत्ति ने आज शब्दों के इतस्तत: - चङक्रमण के माध्यम से, ‘ वेदों में विज्ञान ’ आवेश से वर्त्तमान भूतविज्ञान के दिग्देशकालानुबन्धी- विजृम्भणों से समतुलन प्रारम्भ कर दिया है । • भारतीय दृष्टिकोण से अनुप्राणित - ' विज्ञान ' शब्द की सर्वथा स्वतन्त्र, एवं मौलिक - परिभाषा है, जिसका कदापि वर्त्तमान विज्ञान - विजृम्भण से समतुलन नहीं होसकता । ' राम - रावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ' के अनुसार हमारी विज्ञानधारा, उसके पारिभाषिक तथ्य अपने आप में ' कृत्स्न ' हैं । अपने आप में मर्यादित हैं, जिस इस- ' विज्ञान ' ÷ शब्द के समन्वय के लिए ही हमें इसी प्रथमखण्ड के प्रारम्भिक - ' पारिभाषिक - सूचना-प्रकरण ' में विस्तार से स्पष्टीकरण कर देना पड़ा है । विज्ञानप्रधान ब्राह्मण - ग्रन्थों के पारिभाषिक स्वाध्याय के बिना वेद के इतर भागों का ( संहिता, आरण्यक, तथा उपनिषद् - भागों का ) एकाक्षर भी समन्वित नहीं होसकता, जैसाकि पूर्व में निवेदन किया जाचुका है | सर्वसामान्य की मान्यता के अनुसार विध्यात्मक ब्राह्मणग्रन्थों में केवल उस ' कर्म्मकाण्ड ' का ही निरूपण हुआ है, जिसका अर्थ है आजकी सभ्यभाषा के अनुसार ' ब्राह्मण - पुरोहितों के वे यज्ञाडम्बर, जिनके द्वारा कुण्डविशेष में अग्नि जला कर अनेक प्रकार के तिल - घृत - चाँवल - आदि भौतिक पदार्थों की ‘ स्वाहा – स्वाहा ' पूर्वक आहुति देते हुए इस आहुतिकर्म से किहीं अज्ञात - देवताओं को प्रसन्न करना, और उनसे पुत्र - सम्पत्ति - यश - वैभव आदि की कामना करते रहना ” । तदतिरिक्त आज से पूर्व के सांस्कृतिक - अधःपतनात्मक युगों में भी इस यज्ञिय - कर्म्मकाण्ड के सम्बन्ध में अना-त्मवादियों की ओर से अनेक प्रकार के अनर्गल ऊहापोह सुने जारहे हैं । " यज्ञ के नाम पर, भगवान् के * ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ ( गीता ) विज्ञानाद्वय व खल्विमानि भूतानि जायन्ते, विज्ञानेन जातानि जीवन्ति, विज्ञानं प्रयत्त्यभिसंविशन्ति: विज्ञानमित्युपास्त्र । -उपानपत् . १००
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शतपथ - प्रथमखण्ड नाम पर, देवता के नाम पर यज्ञ में पशुबलि जैसा हिंसाकर्म्म प्रक्रान्त था जिह्वालोलुप पुरोहित--ब्राह्मणों के द्वारा | इस हिंसा से दुःखी होकर ही अहिंसा के अमुक अवतार ने यज्ञकम्मों का विरोध किया, एवं तत्स्थान में प्राणीमात्र के हित की कामना से अहिंसात्मक वह परमधर्म्म ही स्थापित किया, जिसका व्यापक मानवता से सम्बन्ध था, जिसमें मानव के सहज ' पञ्चशील ' की ही प्रधानता थी । इसी से भारतीय मानव हिंसात्मक यज्ञकम्मों से उपरत हुआ, एवं सर्वत्र अहिंसा-त्मक मानत्रधर्म्म का साम्राज्य स्थापित हुआ " इत्यादिरूपेण आज के प्रगतिवादी बड़े ही आवेश से विगत शताब्दियों के उस ‘ अहिंसावाद ' के गुणानुवाद में तल्लीन हैं, जिस अहिंसावाद के जन्म से सम्भव है यज्ञा-नुगतां पशुबलि तो परिसमाप्त होगई हो । किन्तु निश्चयेन तथाविधा परमधर्म्मात्मिका? हिंसावृत्ति? के उपक्रम-से आजतक के तत्प्रधानयुगों में भारतीय मानवों का ही आततायीवर्गों के द्वारा निर्म्मरूपेण जैसा नृशंस ' बलिदान होता रहा है, सम्भवतः अहिंसावादी इस प्रत्यक्षसिद्ध ऐतिहासिक - तथ्य से भी अपरिचित नहीं होंगे । कदापि हम स्वयं भी इस तथ्य पराङमुख नहीं हैं कि, त्रिसहस्रवर्षात्मक - हमारे अधःपतनात्मक युगों में शास्त्र के अनुत्रन्ध से अगणित अनाचार भी हुए हैं । यह भी माना जासकता है कि, अमुक विशेष वर्गों के द्वारा ‘ यज्ञ ' के व्याज से निरर्थकं हिंसाकर्म भी हुआ हो । एवमेव श्रुति - स्मृति - पुराण - धर्म्म - कर्म्म-श्रादर्श - आदि आदि पावन - शब्दों के माध्यम से वैसे वैसे गणित मतवाद भी अवश्य ही विभूत - तिरोभूत होते रहे हैं, जिनसे राष्ट्र का प्रात्यन्तिक - हित ही हुआ है । तथाकथित ' अहिंसावाद ' भी उसी मतवादकोटि में हीं अन्तर्भूत है । ये सभी विसंवाद उस एक ही - ' पारिभाषिक - तथ्य ' से अनुप्राणित माने जायँगे, जिनके समन्वय के बिनान तो तद्युगों में ब्रह्मविज्ञान के श्राधार पर प्रतिष्ठित प्रकृतिसिद्ध ' यज्ञकर्म ' का ही समन्बय हो-सका, नापि अन्यान्य मतवाद ही राष्ट्रका हित साधन करसके । और यों पारिभाषिक - तथ्यों के ज्ञान - विज्ञानात्मक-समन्वय से पराङ्मुख बने रहने के कारण ही वेदशास्त्र के सम्बन्ध में, इस की यज्ञविद्या के सम्बन्ध में भावुक -विद्वानोंनें अगणित वैसी वैसी अनर्गल कल्पनाओं का ही सर्जन कर डाला, जिनका ' वेद ' नाम से संस्पर्श भी नहीं है । ये ‘ कल्पनाएँ ' तो आगे चलकर बन गईं स्वयं वेदशास्त्र, और वेदशास्त्र बना रह गया केवल उपास्या प्रतिमा । निसप्रकार ' प्रस्थानत्रयी ' का नाम लेकर तन्नाम - माध्यम से विचारकों के काल्पनिक जगत् में अगणित ‘ शास्त्रबाद ' ( अद्वैतवाद - शुद्वाद्वैतवाद - विशिष्टाद्वैतवाद - द्वैताद्वैतवाद - द्वैतवाद आदि आदि सुप्रसिद्ध साम्प्रदायिक - वाद ) प्रकट होगए, तथैव उसी वेद, उपनिषत् गीता के अमुक वचनों के माध्यम से अनेक प्रकार के वैसे लोकवाद भी उसीप्रकार ग्राविष्कृत होपड़े, जैसे कि आज भी तो शास्त्रसिद्ध - विद्यास-` मुच्चित - सुप्रसिद्ध - यज्ञ - तपो - दान --रूप शास्त्रीय कम्नों के नामच्छल - माध्यम से चर्खायज्ञ, भूदानयज्ञ, सम्पत्तिदानयज्ञ, श्रमदान, आदि आदि अगणित यज्ञ - तपो -- दान - भाव आविर्भूत होपड़े हैं । स्वयं मूल--शास्त्र का इसमें कोई अपराध नहीं है । ये तो दिग्देशकालानुबन्धिनी उस भावुकता की कृपा के ही प्रसून मानें जायँगे, जिनके द्वारा मानवीय मन तात्कालिक - प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी कल्पना के बल पर ' परानुरञ्जनदृष्ट्या ' कल्पना जगत् ही का सर्ज्जन कर लिया करता है । सृष्टिविज्ञान की सुनिरचिता पद्धति से अनुप्राणित शास्त्र का वैज्ञानिक -- समन्वय जब श्रन्तम्मुख होजाता है, तो इसप्रकार के विसंवादों का आविर्भाव, तिरोभाव स्वाभाविक ही बन जाया करता है । अतएव १०१
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श्रात्मनिवेदन राष्ट्रप्रज्ञाओं का इत्थंभूत सांक्रामिक युगों में एकमात्र यही कर्त्तव्य शेष रह जाता है कि, वे प्राचीन, और अर्वा-चीन, सभी प्रकार के साम्प्रदायिक, तथा दिग्देशकालानुबन्धी काल्पनिक विसंवादों की आलोचना -प्रत्या-लोचनाओं से निरपेक्ष बनीं रहतीं हुई स्वयं मूलशास्त्र के माध्यम से परिभाषाओं के हीं चिन्तन - मनन - निदि-ध्यासन में अनन्य - निष्ठा से प्रवृत्त होनायँ । पाप बहुत पुराना है, न्यूनतम तीन सहस्र वर्षों से सञ्चित होते रहने वाला, अतएव घनरूपेण पुञ्जीभूत । श्रतएव च प्रज्ञान्धुओं का भी स्खलन स्वाभाविक है । और सम्भव है वे भी इस कार्य्यं में इसलिए तत्काल ही सफलता प्राप्त न करसकें कि, स्वयं उनके मानस में भी दिग्देश-कालानुबन्धी काल्पनिक - संस्कार, तथा काल्पनिक - प्राचीनता का व्यामोहन येनकेन रूपेण विद्यमान है ही । तदपि अपनी निरपेक्षा शुचिता से प्रज्ञाशीलों का वह पारिभाषिक समन्वय प्रयास अगली पीढ़ियों के लिए तो अवश्य ही पथप्रदर्शक प्रमाणित होजायगा, और उनके द्वारा इन पारिभाषिक तथ्यों के दिग्देशकालानुबन्धी- श्रागन्तुक संस्कारों का भी परिमार्ज्जन सम्भव बन सकेगा । एकमात्र इसी अनुबन्ध से शतपथब्राह्मण के मौलिक शब्दों के आधार पर कतिपय परिभाषाओं के समन्वय का ही स्वल्पतम प्रयास प्रक्रान्त हुआ है । निश्चय ही ब्राह्मणग्रन्थों में यज्ञिय - कर्मकाण्ड का ही विस्तार से स्वरूप - निरूपण हुआ है, जिसकी प्रत्य-क्ष में आज के भौतिक - युग में कोई उपयोगिता प्रतीत नहीं होरही । नापि प्रस्तुत भाष्य के द्वारा हमारा यही दुराग्रह है कि, भारतीय - मानव तत्काल अग्निष्टोम राजसूय - वाजपेय चयन आदि आदि यज्ञिय – कर्म्म– काण्डों में प्रवृत्त होनाय । अपितु ठीक इसके विपरीत विश्वशान्ति, नगरशान्ति, अमुक की शान्ति, आदि आदि के अनुबन्धों से आज महता समारम्भेण जो यज्ञ - यागादि प्रक्रान्त हैं, उनके प्रति भी हम अनेक कारणों से उत्साह अभिव्यक्त नहीं कर रहे, जिन कारणों को व्यक्त न करना हीं हम अपने लिए श्र ेयः पन्था मान रहे हैं | कदापि यज्ञिय कर्म्मकाण्ड इत्थंभूत प्रदर्शनों की वस्तु नहीं है, जैसा कि आज ' यज्ञप्रदर्शन ' होरहा है, एवं जिनके द्वारा एकप्रकार से यज्ञेश्वर भगवान् विष्णु का उमहास ही किया जारहा है । ' न वै सर्वेणैव संवदेत् ' मूला यज्ञपद्धति कदापि इत्थंभूत प्रदर्शनों से यत् किञ्चित् भी तो सम्बन्ध नहीं रख रही । अतएव स्पष्ट है कि, ‘ यज्ञ-कम् ' के अनुबन्ध से हम अंशत: भी अभिनिविष्ट नहीं हैं । हमारा लक्ष्य तो एकमात्र वह ' मौलिक सृष्टि-विद्या ' ही है, जिसके आधार पर ही आधिदैनिकक - ईश्वरीय - प्रकृति सद्ध - नित्य - यज्ञकर्म्म प्रतिष्ठित हैं, एवं जिस उस सनातन - ईश्वरीय - नित्ययज्ञ के नित्य - प्राकृतिक विधि - विधानों के आधार पर ही हमारे आध्यात्मिक-आधिभौतिक - कर्म्मकपाल व्यवस्थित हैं । यज्ञसृष्टि के उन शाश्वत - सनातन नियमों की मूलप्रतिष्ठा के आधार पर ही विश्व, और विश्वप्रजा का स्वरूप व्यवस्थित है, जिन सनातन - नियमों से अपरिचित बने रह जाने के कारण मानव अपनी तात्कालिक - कल्पनाओं से अनेक प्रकार की अनर्थ - परम्पराओं का सर्जन कर बैठता है । अशन - गमन - शयन - जागरण - दर्शन - श्रवण - वदन - आदि आदि मानवीय प्रत्येक कर्म्म एक एक स्वतन्त्र ‘ यज्ञ ' है । प्रत्येक यज्ञ का अपना अपना मूलप्रतिष्ठाप्राण है । वही मूलप्राण तद्यज्ञ का विज्ञान है । तत्स्वरूप - विज्ञान हीं - ' यज्ञविज्ञान ' है, जिस इस यज्ञविज्ञान से आधार ही पर मानव के यच्चयावत् श्राध्यात्मिक यज्ञों की स्वरूप - व्यवस्था हुई है । उसी मूलयज्ञ से आधिभौतिक यज्ञ व्यवस्थित है । किस आध्यात्मिक यज्ञ के लिए कौन से आधिभौतिक यज्ञ उपयुक्त, एवं उपकारक हैं, और कौन से अपकारक?, प्रश्न का समाधान उस ‘ यज्ञविज्ञान ' पर ही अवलम्बित है, जो पारिभाषिक शब्दों के तत्त्वार्थ- समन्वय के प्रभाव से विलुप्तप्राय है | अतएव हमारी जीवनव्यवस्था सर्वथैव यशिया प्रमाणित होचुकी है । यज्ञिया - जीवनपद्धति ही मानव की १०२
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शतपथ - प्रथमखण्ड वास्तविक - जीवनपद्धति है । और यह साभिनिवेश कहा जासकता है कि, मानव प्रकृतिसिद्धा यज्ञिया - जीवनप-द्धति के सम्बन्ध में यज्ञविज्ञान के आधार पर भारतीय ऋषिप्रज्ञा के द्वारा जो सनातन - नियम - व्यवस्थित हुए हैं, उनका महत्त्व किसी भी दिग्देशकालानुबन्ध से कदापि विस्मृत नहीं किया जासकता । उदाहरण के लिए ' तपश्चर्य्या ' को ही लीजिए । त्याग तपस्या - बलिदान - शब्दत्रयी आज के राष्ट्रीय मानव के लिए अत्यन्त प्रिय हैं । किन्तु क्षमा करेंगे वे राष्ट्रवादी महाभाग इस कटुसत्य के लिए हमें कि, इनका जैसा जो कुछ श्राचारा-त्मक ( व्यवहारात्मक ) समन्वय आज किया, और कराया जारहा है, उनका इन शब्दों के विज्ञानसम्मत, प्रकृ-तिसिद्ध तथ्य से तो संस्पर्श भी नहीं है । जैसे गीता के ' निष्कामकर्म्मयोग ' शब्द की ( पूर्वकथनानुसार ) दुर्गति होरही है उच्छृ ंखल- काल्पनिक - कम्र्मों के द्वारा, तथैव काल्पनिक - त्याग - तपस्या - बलिदान - विजृम्भणों के द्वारा भी हम आज ‘ त्येन त्यक्त ेन भुञ्जोथाः ' मूलक- प्रवर्ग्यात्मक वास्तविक - ' त्याग ' के, ' सर्वमात्मानमजु-होत् ' मूलक ब्रह्मौदनात्मक ' बलिदान ', के एवं - ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' मूलक श्राङ्गिरस - तेजो-भाव, भार्गव - स्नेहभावानुगत ' तप ' के समन्वय से सर्वथा ही विदूर होचले हैं | प्रज्ञाशील कतिपय राष्ट्रबन्धुओं के अपनी इस मूलनिधि - ( वेदशास्त्र ) के सम्बन्ध में जब हम ये उद्-गार सुनते हैं कि, – ' आज के दैनिक - जनजीवन में हजारों वर्ष पूर्व की ज्ञानचर्चा से सम्बन्ध रखने वाले वेदशास्त्र का, उसके तत्त्ववाद का, उसके प्रजापति, वरुण, इन्द्र, मित्र, धाता, पूषा, अर्यमा, आदि शब्दविजृम्भृणों का क्या उपयोग '?, तो सहसा हम श्रार्थ्य से स्तब्धवत् ही बने रह जाते हैं । सर्व कारणात्मक सनातन - उपयोग ही वेदशास्त्र का वह निष्कारणतात्मक उपयोग है, जिसे लक्ष्य बना कर ही ' सर्वं वेदात्प्रसिद्धयति ' ( मनुः ) कहा गया है । प्रतिकृतिभूत स्वाहा स्वधा - वौषट् श्रादि भावापन्न, गार्हपत्य - आहवनीय - श्रपणाग्नि - से समन्वित, यज्ञिय - भौतिक - कर्म्मकाण्ड के प्रत्यक्षत भौतिक रूप के आधार पर ही सम्भवतः कारणतावादी - उपयोतितावादीने यज्ञकर्म्मप्रधान वेदशास्त्र को दिग्देशकालानुबन्धिनी - तात्का-लिकी-- ' वर्त्तमान- उपयोगिता ' की दृष्टि से आन के जनजीवन के लिए अनुपयुक्त मान लिया होगा । अथवा तो - अध्यात्मविद्याप्रधान, श्रात्मानुवन्धी औपनिषद - ज्ञान के माध्यम से ही लोकवादीने वेदशास्त्र को लौलिकी-उपयोगिताओं से असंस्पृष्ट घोषित कर दिया होगा । और इह्नीं कतिपय भ्रान्त - कल्पनाओं के आधार पर राष्ट्र-वादी की दृष्टि में ‘ पुरातन - वेदशास्त्र वर्त्तमान के लिए अनुपयोगी ' ही प्रमाणित होगया होगा, एवं सम्भवतः इस ‘ अनुपयोगी ’ दृष्टिकोण से ही उसने अपनी ' राष्ट्रीय - योजनाओं में ' राष्ट्र की इस मूलनिधि के पुनः संस्कार का स्मरणमात्र कर लेना भी सामयिक नहीं समझा होगा, जबकि इसकी ' उपयोगिनी ' दृष्टि के लिए भारतीय मूलशास्त्र, तदनुप्राणित मूलधर्म्म के अतिरिक्त अन्यान्य सभी लौकिक- मतवाद, लोकसाहि-त्य, लोकगीत, नृत्य - गायन - वादन - आदि आदि दिग्देशकालानुबन्धी महान् उपयोगी? सभी तथ्यों का साटोप अनुगमन - प्रक्रान्त है अभिनिवेशपूर्वक । ‘ योग ' शब्द का चिरन्तन - इतिवृत्त क्या है?, उसके सन्निकट रहने वाले ' उप ' नामक उपसर्ग का क्या स्वरूप है?, ‘ उप ', और ' योग ' के समन्वय से सम्पन्न ' उपयोग ' शब्द का प्रकृतिसिद्ध-- वाच्यार्थ क्या है?, तथाकथिता दिग्देशकालानुबन्धिनी आज की ' उपयोगिताओं ' के साथ ' उपयोग ' शब्द के वाच्यार्थ का किस सीमा - पर्यन्त समन्वय है?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान का अब अवसर नहीं है । क्योंकि १०३
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श्रात्मनिवेदन अत्मनिवेदन आवश्कता से अधिक विस्तृत होता जारहा है X 1 प्रसङ्गसमन्वययदृष्टि से प्रकृत में वेदशास्त्र की उपयोगिता के सम्बन्ध में आत्मनिवेदन को उपसंहृत करते हुए पुनः एकबार उस ' उपक्रम वचन ' की ओर ही हम उपयोगितावादियों का ध्यान आकर्षित कर लेना चाहते हैं, जिस - उपक्रमवचन के ग्रादेश को शिरो-ध्रार्ध्य करके ही हम वेदस्वाध्याय में जराम - सत्त्रवत् प्रवृत्त हैं । ऋषि ने कहा है कि - " ब्राह्मण को कारण के बिना हीं, अर्थात् उपयोगिता, लाभ, फल की छान बीन किए बिना हीं वेदशास्त्र का अध्ययन, औस मनन करना चाहिए " ( ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ” -- देखिए पृ ० सं ० ५० ) ) | इस श्रादेशसूत्र की ' निष्कारणतामूला - निष्कामता ' के समन्वय के लिए ही हमें - ‘ कर्म्मण्ये-बाधिकारस्ते ' ' मूलक ' निष्कामकर्मयोग ' का स्वरूप -- समन्वय व्यक्त कर देना पड़ा था तत्रैव । अत्र एक दूसरी दृष्टि से इस ‘ निष्कारणम् ' का समन्वय कारणतावादियों की सेवा में प्रस्तुत है । श्रूयतामवधान--पूर्वकम्! सापेक्षभावापन्न -- प्रकृतिनिबन्धन -- खण्ड - खण्डात्मक-- अगणित - असंख्य कार्य्य - कारण - भावों का मूल-कारणात्मक, प्राकृत विश्व से अध्यक्ष, षोडशीप्रजापतिरूपेण अपने महिमाभाव से सर्वत्र अणोरणीयान्, मह-तो महीयानुरूप से परिव्याप्त परिपूर्ण ' अव्ययपुरुषात्मा ' * का एक लक्षण माना गया है - ' स वा एष आत्मा -- वाङ्मयः, प्राणमयो, मनोमयः ' ( बृह ० उप ० ), जिसका अक्षरार्थ यही है कि, वह विश्वात्मा मनोमय, प्राणमय, और वाङ्मय है । ज्ञानशक्तिघन तत्त्व ही ' मन ' है, क्रियाशक्तिघन तत्त्व ही ' प्राण ' है, एवं अर्थशक्तिधन तत्त्व ही ' वाक् ' है । मनोरूपा ज्ञानशक्ति ' वह पुरुष ' सर्वज्ञ ' है, प्राण-रूपा क्रियाशक्ति से वह - ‘ सर्वशक्तिमान ' है, एवं वागुरूपा अर्थशक्ति से वह ' सर्ववित् ' है । जिन विश्वपदार्थों में यह पुरुषमन ( अव्ययमन ) अभिव्यक्त रहता है, वे मनस्त्री कहलाए हैं, जिनमें यह पुरुषप्राण ( अव्यम-प्राण ) अभिव्यक्त रहता है, वे ' प्राणवान् ' कहलाए हैं । स्वयं अव्ययपुरुषात्मा क्योंकि मनः प्राण - रूप है, ज्ञान - क्रिया - शक्तिघन है, अतएव ' सामान्ये सामान्याभाव: ' न्यायानुसार इस अव्ययमन की एक पारिभाषिक-संज्ञा मानली मई है, – ‘ अमनः ', और अव्ययप्राण को मान लिया है - ' अप्राण: ' । ' अमनः ' का अर्थ है - ' मनो-घनः ’, एवं ‘ अप्राणः ' का अर्थ है - ' प्राणघनः ', अर्थात् ' ज्ञान - क्रिया - शक्तिघनः ’ । इसप्रकार ‘ पराप्रकृति ’ रूप ' अक्षर ' से परे अवस्थित मनःप्राणधन अव्ययपुरुषात्मा अपनी घनता, तद्रूपता से ' प्राणः - अमनः ' नाम से भी प्रसिद्ध है, जैसाकि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट है— वे X ' दिग्देशकालस्वरूप मीमांसा ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध के ' किञ्चिदिव - प्रास्ताविकम् ' में ' उपयोग ' शब्द के वाच्यार्थ का समन्वय द्रष्टव्य है ।
* –यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाशीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धेा दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥
-- यः सर्वज्ञः सर्वविद्य
-- यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म - नामरूप - मन्नञ्च जायते ॥
- उपनिषदि - उपनिषदि १०४
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शतपथ - प्रथमखण्ड
दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्यभ्यन्तरो ह्यजः ।
प्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यन्तरात्परतः परः ॥
मुण्डकोपनिषत् २ । १२ । यही स्थिति उस स्वायम्भुव - ' ऋषिप्रारण ' की है, जो अपने सप्तपुरुष - पुरुषात्मक चित्यरूप से भौतिक - विश्व की मूलप्रतिष्ठा बना हुआ है ( देखिए शत ० ६ | १ | १ | ५-६ ) | ' सदेवेदमग्रे सोम्य - आसीत् ' रूपेण यह प्राणतत्त्व ‘ सद्रूप ' है, ' विश्वसत्ता ' का प्रवर्तक है, सन है । अतएव पूर्वन्यायानुसार ही सद्-रूप इस ऋषिप्राण को भी ' सत् ' न कह कम ' असत् ' कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है - ' सत् ' ही, जैसाकि – ‘ प्राणा वा ऋषयः । असद्वा इदमग्र आसीत् । ऋषयो वा तदग्रेऽसदासीत् ( शत ० ६ | १ | १ | १ | ) से स्पष्ट है | अतएव - ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' के अनन्तर ही ऋषि ने स्वयं हीं इस वाक्य की व्याख्या करते हुए -- ‘ सदेवेदमग्रे तत्- असदासीत् । कथं असतः सज्जायेत ' यह कह दिया है । जिसे हम अपनी भूतदृष्टि से नामरूपात्मक - ' सत् ' कहते हैं, वह वैसा व्यक्त सत् नहीं है, इसलिए तो उसे ' सत् ' नहीं कहा जासकता! साथ ही जिसे । प्रभाव को ) हम ' असत् ' कहते हैं, वह वैसा ' असत् ' भी नहीं है । अतएव न वह हमारी मान्यता से ' सत् ' ही है, और न ' असत् ' ही । इसी तथ्य का- ' नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् ० ' ( ऋक्संहिता ) रूपेण स्पष्टीकरण हुआ है । एवमेव इत्थभूत आत्मपुरुषनिष्ठ मानव क्योंकि मनुस्तत्त्वात्मक – केन्द्रीय - आत्मतत्त्व से अभिन्न बनता हुआ मनुर्घन है, मानवघन है । अतएव उसी न्यायानुबन्ध से ऐसे दिव्य - आत्मनिष्ठ - मानव को ' अतिमानवात्मक ' ' मानव ' ही माना है श्रुति ने, जैसाकि -' तत्पुरुषः- अमानवः ' ( छान्दो ० उप ० ४।१५।५ ) से स्पष्ट है । उक्त निवेदन से ग्रत्र वक्तव्य यही है कि, तत्त्वात्मक पुरुषवेद पुरुषाव्यय से अभिन्न है, जिसे हमने-‘ अनन्तवेद् ' कहा है ( देखिए पृ ० सं ० ५४ ) । अनन्ताव्ययमूर्त्ति यही वेदपुरुष अपने प्राकृत - तत्त्ववेद के ' माध्यम से सम्पूर्ण विश्व का महान् ग्रन्यतम, ' मूलकारण ' ही बना हुआ है । अतएव उस वेदात्मा पुरुषो-त्तम अव्यय को ‘ कारणानां कारणम् ' नाम से ही जाना पहिचाना जारहा है विज्ञानजगत् में | दिग्देश-कालातीत, सर्वकारणकारणात्मक उस मूलकारण वेदात्मा के आधार पर ही तूल - कार्य्य - कारण - प्रपञ्चात्मक भूत-भौतिक विश्व, और विश्वप्रजा प्रतिष्ठित है, अतएव उस मूल कारण को- ' पति ', किंवा ' विश्वपति ' नाम से भी समन्वित कर लिया गया है, जैसाकि निम्नलिखित श्वेताश्वतर - वचनों से स्पष्ट प्रमाणित है-( १ ) -ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् - देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ - श्वेता ० उप ० १३ |
( २ ) –न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके, न चेशिता, नैव च तस्य लिङ्गम् ।
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्विजनिता स चाधिपः ॥
- श्वेता ० उप ०६ हा
* सदृशं त्रिषु लिङ्गषु सर्वासु च विभक्तिषु ।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
— गोपथब्राह्मणे १०५
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श्रात्मनिवेदन अनन्ताव्ययात्मपुरुष से अभिन्न, प्राकृतवेदगर्भित पुरुषात्मवेदतत्त्व ही सम्पूर्ण विश्व का मूलकारण है, आदि कारण है । इस सर्वकारण मूलता से ही इस कारणरूप, काम्य - कम्मों से संस्पृष्ट, विशुद्धकार— णात्मक, दिग्देशकालातीत, किन्तु सापेक्ष - कार्य्यकारणात्मक दिग्देशकालभावों के प्रतिष्ठारूप तत्त्व को पूर्वन्यायानुसार उसी प्रकार - ' निष्कारण ' नाम से व्यवहृत कर दिया है, जैसे कि सर्वगुणविशिष्ट इसी तत्त्व को – ‘ निर्गुण ' कह दिया जाता है । ' सर्वकारणमूलता ' ही आत्मवेद की ' निष्कारणता ' है । इसी निष्का-रण, सर्वकारणरूप, सर्वरूप, सर्वरूपातीत तत्त्ववेद के स्वरूप से अनुप्राणित ब्रह्मविज्ञानात्मक - वेद विज्ञान का, एवं तदनुगत वेदमूलक यज्ञविज्ञान का मन्त्रब्राह्मणात्मक शब्दात्मक वेदशास्त्र में पारिभाषिक - समन्वय हुआ है । अतएव इस सर्वकारणात्मक वेदशास्त्र के पारिभाषिक - तत्त्वों का समन्वय तबतक सर्वथा - असम्भव ही हैं, जबतक कि तत्स्वाध्याय - निष्ठ ब्राह्मण दिग्देशकालानुबन्धी - खण्ड – खण्डात्मक कार्य्य - कारणभावों, तात्कालिक - उपयोगितावादों - सामायिक - मान्यतावादों से अपने आप को सर्वथा असंस्पृष्ट बनाए रहते हुए सनातन- शाश्वत - दिग्देशकालातीत - अनन्तात्मसत्य –— को स्वप्रतिष्ठा बना कर उसी निरपेक्षा दृष्टि से इस के स्वाध्याय - मनन में प्रवृत्त नहीं होजाता । सनातन - वेदशास्त्र के सनातन - पारिभाषिक - तत्त्वों की अनुगति का महान् राजपथ - ' निष्कारणम् ' के अतिरिक्त और कोई भी तो नहीं बन सकता । निष्कारणभावात्मिका, बोधानुगता - आभ्यन्तरा - आत्मदृष्टि ही वेदस्वाध्याय - साफल्य का मूल बीज है, जब कि कारणभावात्मिका बुद्धिवादात्मिका बाह्या भूतदृष्टि तो दिग्देशकालात्मक - उन सापेक्ष - कार्य्यकारण भावों पर ही परिसमाप्त होजाती है, जो कार्य्यकारणभाव - दिग्देशकालानुबन्धों से सदा ही परिवर्तनशील बने रहते हैं । भूतजीवन — पद्धति का निर्वाह अवश्य ही इस तात्कालिक - कारणता - उपयोगिता से - सम्भव है अमुक सीमा पर्य्यन्त ही ( पशुसर्ग से समतुलिता - कामभोगपरायणता - मात्रावधि- पर्य्यन्त ही ) । किन्तु कदापि इस प्रत्यक्षदृष्टा भौतिक-उपयोगिकता से मानव की मानवतानुबन्धिनीं सनातना श्रात्मसाम्यमूला - समदर्शनात्मिका जीवनपद्धति व्यव– स्थित नहीं बन सकती, नहीं बन सकती । और इत्थंभूत - निष्कारणात्मक, अर्थात् सर्वकारणात्मक वेदशास्त्र की आत्मसाम्यमूला यही वह महती कारणता, महती उपयोगिता है, जिस का कि- ' निष्कारणम् ' शब्द से परोक्ष रूपेणैव सङ्क ेत हुत्रा है । लोकोपयोगितावादी जनतन्त्रनेता कहेंगे कि, ये " आत्मा ', ' आत्मासाम्य ' तन्मूलक समदर्शन, आदि आदि तो कुछ समझ में आए नहीं । अतएव बुद्धिगम्य नहीं बन रहे तथाविध आत्मानुबन्धी उपयोग ” । ‘ उपयोगिता ’ से हमारा अभिप्राय है- मानव की वे वैधानिक बाह्य समस्याएँ, जिन का शासनतन्त्र से सम्बन्ध है, राजनीति से सम्बन्ध है, प्रत्यक्ष दृष्टा लोक - समाजनीति से सम्बन्ध है । और वेदशास्त्र के तत्त्ववाद का, किंवा उसकी आत्म - परमात्म - ईश्वर - परलोक आदि अचिन्त्या चर्चा का इन लोकोपयोगी - क्षेत्रों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, कोई उपयोग नहीं है, अतएव ं • अलमतिप्रलापेन . दिग्देशकालानुबन्धिनी-- इत्थंभूता - लोकव्यवहारानुगता -- कारणता, उपयोगिता, किंवा फलानुगति - के सम्बन्ध में आज हमारे प्रज्ञाकोश में कोई उत्तर नहीं है । यही तो हमारी, और अस्मच्छदृश प्रज्ञाशून्य वेदशास्त्र - भक्तों की वह निरीहना, किंवा विवशता है, जिस के कारण आज के उपयोगितावाद के सम्मुख, जनतन्त्र की सामयिकी उपयोगिता के सम्मुख, एवं तत्समर्थक राष्ट्रीय वर्ग के सम्मुख हमें लज्जा से अवनत-शिरस्क ही बन जाना पड़ता है । और इस विवशता के अनुबन्ध से ही हमें भी लोकदृष्ट्या यह मान ही १०६