Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 91–100
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100
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शतपथ - प्रश्न मत्र एड का कदापि यह अभिप्राय नहीं है कि, ' वेदमन्त्रन्त्य हैं । अपितु अर्थ यही है कि, ब्राह्मणवेद की ज्ञानविज्ञानात्मिका - परिभाषाओं के आश्रय के बिना साक्षाद्रूपेण अपनी कल्पनामात्र से, किंवा केवल व्याकरणादि के बल पर, किंवा अपनी काल्पनिकी बुद्धि से काल्पनिक जोड़ - तोड़ बैठा कर कदापि वेदमन्त्रों का अर्थसमन्वय सम्भव नहीं है । पारिभाषिक समन्वानन्तर मन्त्र का जो गभीर अर्थ प्रस्फुटित होता है, उसे कदापि हम अपनी व्यक्ता वाणी के माध्यम से सर्वात्मना लिपिबद्ध नहीं करसकते । क्योंकि प्रत्येक मन्त्र एक एक स्वतन्त्र वैसा उक्थ है, जिससे रहस्यात्मक आधिदैविक आध्यात्मिक- आधिभौतिक - आधिनाक्षत्रिक - आधियाज्ञिक आदि आदि भेदेन-' सहस्रधा महिमानः सहसम् रूपेण अनन्त अर्क विनिर्गत हैं, जिनका मनन - चिन्तन- तो फिर भी अंश-प्रत्यंश - प्रत्यंतमरूपेण - सम्भावित है । किन्तु कदापि मन्त्रार्थं का एकत्र लिपि के द्वारा समन्वय सम्भव नहीं है । और इस दृष्टि से कौत्स का ' अनर्थका हि मन्त्राः ' कथन अक्षरशः चरितार्थ होरहा है । अतएव जो महानुभाव झुटिति - मूलमन्त्रों उद्घोष एव उनके दिग्देशकालानुबन्धी- बुद्धिवादात्मक भाष्यों, व्याख्यानों, व्याख्यानों, लेखों में प्रवृत्त होजाने का साहस कर बैठते हैं, वे प्रथम तो हमारी दृष्टि से साक्षात् मन्त्रद्रष्टा महर्षि ही होने चाहिएँ, अथवा तो फिर वे क्या हैं?, यह कहना हमारी स्वल्पप्रज्ञा से तो अतीत ही है । प्राचीनवर्ग उपनिषदों की ज्ञानचर्व्वणा में आसक्त, तो अर्वाचीनवर्ग बुद्धिवाद के बल पर मूल == संहिताओं के ही निगरण कर जाने के लिए आतुर, इसी अहमहमिका से वेदतत्त्व के व्याख्याकेन्द्रात्मक ब्राह्मणग्रन्थ आज असंस्पृष्ट ही प्रमाणित होरहे हैं । ' इतिहासपुराणाभ्यां वेद्धुं समुपव हयेत् ' की घोषणा करने वाले पुराणपुरुष भगवान् चादरायण इतिहास - पुराण के द्वारा किस ' वेद ' का उपबृंहण करने की ओर सङ्क ेत कर रहे हैं?, यह प्रश्न उपस्थित है अनेक कारणों से । हमारी स्वल्पमति के अनुसार इस ' वेदम् ' से प्रमुखरूपेण वेद का आधिदैविक = सृष्टिविज्ञानव्याख्यारूप ब्राह्मणभाग ही अभिप्र ेत होना चाहिए | क्यों? । श्र यताम्! पुराणशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण वचन है, जिसे सम्मुख आया देखकर सम्भव है वेदभक्त चौक पड़े । सुनिए! “ पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरश्च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ” । वचन का अक्षरार्थ यही है कि, " सृष्टिकर्ता ब्रह्मा प्रजापति ने सब से पहिले पुराण का ही स्मरण किया । एवं पुराण के अनन्तर ही ब्रह्मा के मुख से वेद निकले ” । अर्थात् सीधी - साधी सहजभाषा में ' पुराणों का निर्माण पहिले हुआ, एवं वेद का संकलन, अथवा तो निर्माण पुराण के अनन्तर हुआ ' । क्या आज का कोई भी वेदभक्त भारतीय विद्वान् इस तथ्य पर सहसा विश्वास कर लेगा! । आर्य्यबन्धु तो फिर भी ' पुराण को गप्प ' कहते हुए अपनी वेदभक्ति यथाकथञ्चित् सुरक्षित रख लेंगे । किन्तु वेदवत् ही पुरागशास्त्र को भी मूर्द्धान्य, तथा प्रामाणिक शास्त्र मानते रहने वाले सनातन - आर्ष-धर्म्मनिष्ठ विद्वान् क्या समन्वय करेंगे उक्त वचन का, जबकि उनकी आस्था के अनुसार मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद का स्थान प्रथम है, एवं पुराणों का स्थान द्वितीय है? | समन्वय कीजिए इस महती समस्या का अपनी ८७
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श्रात्मनिवेदन पुराणनिष्ठा के बल पर ही, जिस निष्ठा के संस्मरण के लिए ही उसी पुराणशास्त्र का एक वचन आर्ष- उनातन-मानवश्रेष्ठों के सम्मुख और रक्खा जारहा है -" श्राख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गायामिः कल्पशुद्धिभिः पुराणसंहिताञ्चक्रे भगवान् वादरायणः ” ॥ आधिदैविक - सृष्टि के रहस्यों के स्वरूप - विश्लेषक चिरन्तन - पारम्परिक - आई - ( ऋषिदृष्ट ) मौलिक -' आख्यानों ' का ही नाम वस्तुत: ' पुराण ' है, जिन इन मौलिक - पौराणिक आख्यानों के आधार पर ही तो मन्त्रसंहिताओं का आविर्भाव हुआ है, एवं इनके आधार पर ही तद्व्याख्यारूप ब्राह्मण माहित्य का आविर्भाव हुआ है, जिन इन सनातन श्राख्यानों का - ' एतद्ध सौपर्णमाख्यानमाख्यानविद श्राचक्षते ' इत्यादिरूपेण स्वयं ब्राह्मणग्रन्थोंने बड़े सम्मान के साथ स्मरण किया है । ब्राह्मणवेद में संस्मृत पुराणाख्यान ( अतिपुरातन -सनातन – परम्परया समागत, आख्यानोपाख्यान ) हीं वास्तविक - ' पुराण ' है - ' पुरा नवं भवति ' इस निर्वचन के द्वारा । इन ‘ गाथारूप - पुराणों ' के आधार पर ही संहितावेद संकलित हुआ है । इसी पुराण को लक्ष्य बना कर अष्टादशपुराण संकलनकर्त्ता ' सूत ' ने- ' पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ' इत्यादि कहा है । आगे चल कर महाभारतयुग में भगवान् बादरायणने उहीं पुरातन, पुराणरूप ग्राख्यानो– पाख्यानों का एकत्र संकलन कर ( वेदसंहितासंकलनवत् ) एक - ' पुराणसंहिता ' नाम की पाँचबी संहिता उपनिषद्ध की, जो दुर्भाग्यवश अन्यान्य परः - शत वेदसंहिता शाखावत आज अनुपलब्ध है । भगवान् व्यास के द्वारा उपनिबद्धा वही ' पुराणसंहिता ' मौलिक पुराणशास्त्र कहलाया, जो कि – ' पञ्चमवेद ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी के आधार पर पुरागमर्मज्ञ सून के द्वारा उन दश पुराणों, तथा उपपुराणों का संकलन हुआ, जो - ' पुराण ' नाम से उपलब्ध है - ग्रस्तव्यस्त - रूपेण । उक्त सन्दर्भ के द्वारा निवेदनीय यही है कि, यद्यपि सनातन ग्राख्यानोपख्यानरूप मौलिक - ' गाथात्मक'-पुरारातयों के आधार पर ही संहितावेद उपनिबद्ध हुया । तदनन्तर ब्राह्मणवेद । तथापि संहितोत्तर उपनिबद्ध ब्राह्मणवेद के साथ क्योंकि श्राख्यानोपख्यानरूप - उस पुरातन - मौलिक - गाथारूण - पुराण का व्यक्त सम्बन्ध रहा, कि वे ही पुराणतथ्य मूल संहिताओं में सूत्ररूप से ही समाविष्ट हुए । अतएव वेदशास्त्र के इस ग्राख्यानोप-ख्यानभाषा - प्रधान ब्राह्मणभाग को ही हम उस गाथारूप - पुरातन - ' पुराण ' के सन्निकट मान सकते हैं । यही कारण है कि, आर्षसम्प्रदाय में यत्रतत्र ब्राह्मणग्रन्थों के लिए भी ' पुराणेतिहास ' शब्द त्रयुक्त होते रहे हैं । पुरातन - इतिहासगाथात्मक - पुराण के सृष्टीतिवृत्तों के आधार पर सर्वप्रथम मूलदेद की * ( १ ) -- यदनुशासनानि - विद्या, वाकोवाक्यं, इतिहासपुराणं, गाथा, नाराशंस्यः । - शत ० ९९ | ५ || ( २ ) - ऋग्वेदों यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः । इतिहास: पुराणं ( ब्राह्मणमेव ) -विद्या-उपनिषदः, वाचैव सम्राट् - प्रजायन्ते । दद - शत ० १४ | ६ | १० | ६ |
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शतपथ - प्रथमखण्ड ( संहितावेद की ) अभिव्यक्ति, तदनन्तर तद्द्व्याख्याभूत ब्राह्मणभाग ( विधि - आरण्यक उपनिषत् - भागत्रयी ) की अभिव्यक्ति । पुराणपुरुष भगवान् व्यास के द्वारा वेद के - आख्यानोपख्यानभाषाप्रधान, अतएव पुराणभाषा-प्रधान - पुराणप्रधान - ब्राह्मण वेद के आधार पर ' पुराणसंहिता ' की अभिव्यक्ति, तदाधारेण च महाभाग सूत के द्वारा अष्टादशपुराणोपपुराणों का संकलन, यही तथ्य सर्वात्मना समन्वित होरहा है - पूर्वोक्त दोनों पुराणवचनों के माध्यम से । श्रतएव मानना पड़ेगा कि, पुराणकारने इतिहास - पुराण के द्वारा जिस वेद के उपबृ ंहण की ओर सङ्क ेत किया है, वह वेद - आख्यानोपाख्यान - समानधर्म्म से ‘ ब्राह्मणवेद ’ ही हो--सकता है । और इस दृष्टि से वेद के ब्राह्मणभाग के सृष्टिरहस्य प्रतिपादक - श्राख्यानोपाख्यानों का, तथा पुराण के आख्यानोपाख्यानों का हम परस्पर आभाराधेयभाव मान सकते हैं । ब्राह्मणग्रन्थों के तत्त्वात्मक आाख्या-नोपाख्यान नहाँ ' आधार ' हैं, वहाँ इह्रीं बात्त्विक आख्यानों के आधार पर उपनिबद्ध पौराणिक आख्यानो-पाख्यान ' आधेय ' हैं, और इसी सजातीय तथ्य के आधार पर पुनः हमें किञ्चिदि आवश्यक निवेदन और कर देना है । अभिनव - प्रज्ञाओं के लिए, एवं अभिनव - बेदभक्तों के लिए, दोनों के ही लिए पुराणशास्त्र का आख्यानोपाख्यान - विभाग ही प्रमुख रूपेण इसलिए आलोच्य बना हुआ है कि, ये पौराणिक आख्यान इन के दिग्देशकालानुत्रन्धी बुद्धिवाद से समन्वित नहीं होपाते । दिग्देशकालकमसिद्धा बुद्धि पौराणिक आख्यानों को मानवबुद्धि से असंस्पृष्ट मानती है । अतएव इन आख्यानों के सम्बन्ध में, अतएव च तत्प्रतिपादक पुराणशास्त्र के सम्बन्ध में प्रज्ञाशील आज के बुद्धिवादी की, तथा अपने बुद्धिवाद के आधार पर ही वेद की बुद्धिगम्या व्याख्या के लिए आतुर बने रहने वाले अभिनत्र वेदभक्त - महाशयों की पुराण के प्रति सर्वथा अमान्यता है, जिस इस मान्यता के आवेश में आकर ही इस उभयभावुक वर्ग ने सर्वस्वात्मक इस महतो महीयान् पुराणशास्त्र के प्रति - ' पुराणपन्थी ' - ' पोंगापन्थी ' - ' प्राचीनता के पुजारी ' ' रूढिवादी'-' दकियानूसी ' - ' बाबाबाक्यं प्रमाण माननेवाले ' आदि आदि अनर्गल प्रलापों का सर्जन कर लिया है । वस्तुस्थिति वास्तव में ऐसी है कि, पुराणशास्त्र के जो श्राख्यानोपाख्यान प्राकृत - मानव - बुद्धि से परे की वस्तु प्रतीत होरहे हैं, वेदशास्त्र के संहिता - भाग में सूत्ररूप से सङ्कतित, एवं पुराणशास्त्र के आधार-भूत वेदशास्त्र के ब्राह्मणभाग में वे ही श्राख्यानोपाख्यान विस्तार से प्रतिपादित हैं, जब कि अभिनव वेद-भक्त भी ब्राह्मणवेद को प्रमाण मान रहा है, एवं अमुक सीमापर्य्यन्त वेदशास्त्र अभिनव बुद्धिवादी के लिए भी प्रत्यक्षरूप से आलोच्य नहीं बन पाया था स्वतन्त्रताप्राप्ति से पूर्वकाल - पर्य्यन्त, जब कि आज के स्वत— न्त्रयुग में तो भारतराष्ट्र के उच्चकोटि के नेताओं तक के द्वारा वेदशास्त्र भी आलोच्य ही बनता जारहा है । धर्मनिरपेक्षता के आवेश से । ( ३ ) - इतिहासपुराणं पञ्चमं - वेदानां वेदम् ( ब्राह्मणभागः - इति यावत् ) - छा ० उप ० ७/२ ( ४ ) - ब्राह्मणानीतिहास - पुराणानि - कल्पान् - गाथा - नाराशंसीः । - आश्वलायनगृह्यसूत्रे ३।३।१–३– । ( ५ ) - पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मण कल्पेषु ( पा ० सू ० ४ | ३ | १०५ ) Σε — इत्यादि
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श्रात्मनिवेदन जो अभिनव प्रज्ञाएँ भारतीय प्राच्यशास्त्र से अपने आप को धर्म्मनिरपेक्षता के व्याज से सर्वथा तटस्थ - प्रमाणित कर चुकीं हैं, उन के सम्बन्ध में कुछ भी वक्तव्य शेष नहीं रह जाता । किन्तु जिन अभिनव-वेदभक्तों की मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के प्रति अमुक मान्यता है, वे तो पुराणशास्त्र की मान्यता में वेदशास्त्र की अपनी इस मान्यता को भी क्षणमात्र भी इसलिए सुरक्षित नहीं रख सकेंगे कि, पुराणोक्त सभी आख्यानों का साक्षाद्रूपेण वेद का ब्राह्मण भाग, तथा सूत्ररूपेण स्वयं मूलभाग ही प्रमाण बना हुआ है, जिस प्रमाणन - समन्वय के लिए तो ' वेदशास्त्र के साथ पुराणशास्त्र का समन्वय ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध ही द्रष्टव्य है । ब्राह्मणग्रन्थों में उपात्त श्राख्यानाोपाख्यानों का आठ प्रकार से वर्गीकरण हुआ है, जो निम्न लिखित रूपेण समन्वित हैं -१ - आध्यात्मिक - श्राख्यानोपाख्यान २- आधिदैविक-- आख्यानोपाख्यान ३- आधिभौतिक- आख्यानोपाख्यान. ४ - आध्यात्मिक - आधिभौतिक - श्राख्यानोपाख्यान ५ श्रध्यात्मिक - आधिदैविक आख्यानोपाख्यान ६ - याधिभौतिक क- - आधिदैविक- च श्राख्यानोपाख्यान ७ - आधिदैविक - श्रात्मिक - भौतिक ( त्र्यात्मक ) आख्यानोपाख्यान ८ -- असदाख्यानोपाख्यान ( नाक्षत्रिक आदि आख्यानोपाख्यान ) * वैदिक, तथा पौराणिक उक्त आठों ह्रीं प्रकार के श्राख्यानोपाख्यानों की, प्रत्येक की अपनी अपनी स्वतन्त्र परिभाषाएँ हैं, जिन के समन्वय के बिना केवल - शब्दाक्षरार्थ के माध्यम से बुद्धि का निःतीम · कोश भी समन्वय नहीं करसकता तदाख्यानोपाख्यानों का । ब्राह्मणग्रन्थों के प्रत्येक यज्ञकर्म्म के साथ प्रायः इन आठों में से कोई न कोई ग्राख्यानोपाख्यान उपक्रमभूमि बना हुआ है, जिस के प्रत्यक्ष - प्रतीयमान अक्ष— रार्थ - मात्र से न केवल तदाख्यानोपाख्यान का बुद्धिगम्य- समन्वय ही हमें उपलब्ध नहीं होता, अपितु उस आख्यानभाषा से ऐसा ही कुछ प्रतीत होने लग सकता है प्रभिनव भारतीय - प्रज्ञाओं को भी, जैसा कि ब्राह्म-णग्रन्थों की पारिभाषिकी तत्त्वभाषा के समन्वय में नितान्त असमर्थ कतिपय वेदभक्त भी पश्चिमी विद्वानोंनें वेद के इस ब्राह्मण भाग के प्रति वैसे ही साहसपूर्ण अनर्गल मन्तव्य व्यक्त कर देने का अक्षम्य अपराध कर लिया है, जैसा कि भारतीय अभिनव - वेदभक्त पुराणाख्यान - परिभाषाओं से अपरिचित रह जाने के कारण के प्रति ' इत्यालप्यालमेव । पुराण * –व्याज से इसलिए कि, एक ओर जहाँ आज का राष्ट्रवादी श्रुतिस्मृतिपुराण - शास्त्रत्रयी के प्रति, एवं तत्सिद्ध ज्ञानविज्ञानात्मक - शाश्वत - धर्म के प्रति अपने सत्ता न्त्र को निरपेक्ष घोषित कर रहा है, वहाँ वही ' नात्मवादमूलक अमुक मतवाद की सोल्लास जयन्तियाँ मनाता हुआ धर्म के प्रति सापेक्षता भी व्यक्त करता " हा है, इत्यहो महतीयं विडम्बना धर्मनिरपेक्ष सत्तातन्त्रस्य । ६०
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शतपथ - प्रथमखण्ड सचमुचही तो जत्र ब्राह्मणग्रन्थों की ऐसी भाषा एक बुद्धिवादी के सम्मुख उपस्थित होती है – ( १ ) - " देवता, और असुर परस्पर प्रतिस्पर्द्धा करने लग पड़े इस पृथिवीलोक को मध्यस्थ बना कर | स्पर्द्धा करते हुए देवता, और असुरों के बीच में गायत्री खड़ी होगई । गायत्री पृथिवी ही तो थी । देवताओं नेत्राग्नि नामक दूत को भेजा, और असुरोंने ' ' सहरक्षा ' नामक दूत को | गायत्री अग्निदूत के साथ देव-ताओं की ओर ही लौट आई " । बुद्धिवादी तत्काल प्रश्न कर बैठेगा कि जब देवता, और असुरों के बीच में पृथिवी खड़ी होगई, तो ये दोनों दल किस पर खड़े रहे? - ( शतपथ १ | ४ | ३ | ४ | ) २ ' - ' वृत्र नामक असुर सत्र पर छागया । इन्द्र ने वज्रप्रहार से उसे मार दिया । वृत्र का निष्प्राण शरीर जल में तैरने लगा । इस से पानी सड़ने लगा । जो पानी वृत्र के शव से पृथक रह गया, उसी से दर्भ कुशा - डाभ ) बनी, जो पवित्रगुण से युक्त है ' ( शत ० १११।३।४,५ । ) ( ३ ) - यज्ञ देवताओं को छोड़ कर पलायित होगया । वह काला मृग बन कर विचरण करने लगा । " देवताओंने उसे पहिचान कर उस का चमड़ा - उखाड़ लिया, जिस काले हिरण के चमड़े के कृष्ण -- श्वेत-बभ्रु - वर्ण के लोम क्रमशः ऋक् - यजुः - साम थे ' ( शत ० १ | १ | ४ | १,२ ) | ( ४.– ‘ मनु के समीप एक बैल था, जिस की ध्वनि से असुर निष्प्राणवत् - बन जाते थे । किलाता-कुली नाम के असुरपुरोहितोंने षड्यन्त्र कर यज्ञ के केि से बैल को मार दिया । बैल की ध्वनि मनु कीं पत्नी में समाविष्ट होगई । पत्नी की भी आहुति दे दी गई । पत्नी की ध्वनि यज्ञपात्रों में प्रविष्ट होगई । उसी पात्रध्वनि से ग्राज यज्ञकर्ता असुरों को नष्ट कर रहे हैं ' ( शत ० १११ | ब्रा ० ) —तो बुद्धिवादी की बुद्धि उक्ता भाषा से सर्वथैव कुण्ठित होजाती है । मानव प्रयास करके भी क्यां तात्त्विक — समन्वय कर सकता है ऐसे रहस्यपूर्ण श्राख्यानों का? | हमने यहाँ जो चार उदाहरण उद्ध त क्रिए हैं, उन के लिए पाठक सायणभाष्य पर दृष्टि डालने का अनुग्रह करें । स्पष्ट हो जायगा कि, ज्ञानविज्ञानात्मिका-परिभाषाओं से प्रात्यन्तिक रूपेण तटस्थ वेदभाष्यकार श्रीमायणाचार्य्यं भी इन वैदिक आख्यानों का पारि-भाषिक समन्वय नहीं करसके हैं । ऐसी स्थिति में यदि पश्चिमी विद्वान् इस दिशा में कुण्ठित होकर अन-र्गल कहने लग पड़ें, तो उङ्ख विशेष दोषभाक् नहीं माना जाना चाहिए । हमने पूर्व में वे ही उदाह-रण उद्धृत किए हैं, जिन का ' प्रस्तुत प्रथमखण्ड में समन्वय - प्रयास हुआ है । पश्चिमी विद्वानों में वेदव्यासङ्ग के सम्बन्ध में जर्म्मन् विद्वान् सर्वश्री मेक्समूलर ( Maxamular ) का नाम प्रतीच्यदेशों में तो गौरव से स्मृत है ही । साथ ही भारत के अभिनव - संस्कृतिनिष्ठ अभिनव चिद्वान् भी अपने वेदज्ञान का अधिक श्रेय मेक्समूलर महोदय को ही समर्पित करते सुने गए हैं । सचमुच इस महाप्राण मानव ने अपने दिग्देशकालानुपात से वेदशास्त्र प्रति अपनी बौद्धिक- निष्ठाएँ अर्पित कर देने में कोई न्यूनता नहीं की है, जब कि हमारे देश के वेदभक्तों, वेदों को साक्षात् ईश्वर की वाणी मानने वाले कतिपय - भारतीय - आस्तिकों को तो यह भी आज विदित नहीं है कि, ' शतपथत्राह्मण ' है क्या वस्तु ६१
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श्रात्मनिवेदन * | हमारी ऐसी सास्कृतिक पतनदशा में पश्चिमी विद्वान् यदि वेदों पर स्वतन्त्र निबन्ध लिखते हैं बिना ही किसी तात्कालिक - लाभ की कामना के, तो क्या इस पर भी उसी पश्चिमी जगत् के आदर्शों का अन्धानुकरण करने वाले हमारे राष्ट्रवादी मानवों का मस्तक उन के वेदनिबन्धों की गाथा सुनने मात्र से अवनत नहीं होता? । हाँ, तो मेक्समूलर महोदय के सम्मुख जब ब्राह्मण - ग्रन्थों की अलौकिक भाषा श्राख्यानोपाख्यानरूपेण उपस्थित हुई, तो वे सहसा क्षुब्ध होपड़े । और प्रयास करने पर भी ( पारिभाषिक तथ्यों से अपरिचित रहने के कारण ) वे ब्राह्मणग्रन्थों के प्रति अपनी निष्ठा अर्पित नहीं करसके, एवं प्रतिक्रियाजनित अपने आवेश को इस रूप से अपने सुप्रसिद्ध - संस्कृत - साहित्य का इतिहास ' नामक निबन्ध के ३८६ वें पृष्ठ पर निम्न लिखित उद्गार लिपिबद्ध कर ही तो दिए, जिन के द्वारा ब्राह्मणग्रन्थों के प्रति आप की भावुकता ही व्यक्त हो रही है, जो कि भावुकता अभिनव वेदभक्त पुराण रहस्य का समन्वय करने में असमर्थ बने रहते हुए तत्प्रति व्यक्त करते हुए ‘ अशक्तास्तत् - पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' को ही अन्वर्थ बनाते रहते हैं— The Brahmanas represent no doubt a most fnteresting phase in the. history of Indian minds but judged by themselves as literary productions they are most disappointing. No one would have supposed that at so early a period and in so primitive state of Society there could have risen up a literature which for pedentry and downright absurdity can hardly be matched any where. There is on lack of striking thoughts, bold expression, of sound reasoning, and curious traditions in these collections. But these are only like the fragments of a ' torso ', like precious gems set in brass and lead. The general character of these works is marked by shallow and insipid grand eloquence, by priestly conciet, and antiquarian pedentary ***** these workes deserve to be studies as the plysician studies twaddle of idiots, and the raving of madness. वस्तुस्थिति तो यथार्थ में कुछ ऐसी है कि, ' ब्राह्मणग्रन्थ ' ही मूल संहितावेद के सन्निकटतम के पारिभा--षिक वैसे ‘ व्याख्याग्रन्थ ' हैं, जिनका पारिभाषिक समन्वय किए बिना न तो मूल संहिताओं का ही अर्थ समन्वय सम्भव, नैव ब्राह्मणग्रन्थों की परिभाषाओं को आधार बनाए बिना शेषभूत आरण्यकग्रन्थों, तथा उपनिषद्-ग्रन्थों का ही अर्थसमन्वय सम्भव | अतएव वेद के विध्यात्मक इस ब्राह्मणभाग को हम मन्त्र - विधि- आर-* –अनुमानतः पन्द्रह वर्षं पूर्व बम्बई प्रान्तगमनावसर पर वहाँ के एक ब्राह्मणत्रन्धुने हीं व्याख्याना-नुबन्ध से अनेक बार ' शतपथब्राह्मण ' का नामोल्लेख श्रवण कर हमारे आवासस्थान में आकर हमसे जिज्ञासापूर्ण यह प्रश्न करने का अनुग्रह किया था कि - ' शतपथब्राह्मण नाम की ब्राह्मणजाति तो नवीन लगती है । कहाँ है इस जाति के ब्राह्मण '? । ६२
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शतपथ - प्रथमखण्ड एयक - उपनिषत् - भेदेन चतुर्द्धा विभक्त वेदशास्त्र की प्राणप्रतिष्ठा कह सकते हैं । श्रतएव हमनें प्रमुखरूप से ब्राह्मणग्रन्थों में सुप्रसिद्ध शतपथब्राह्मण की आराधना को ही अपने वेदव्यासङ्ग में प्रमुखता प्रदान की है । निरन्तर तीन सहस्र वर्षों से विलुप्तप्राया वेदशास्त्र की ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं का मूलवेदशास्त्र के आाधार पर ही अपनी चालीस वर्षों की स्वाध्याय - तपोनिष्ठा से प्राचार्य्यचरण श्रद्ध ेय पूज्य श्री श्रीमधुसूदन-जी महाराज ( ओझ! ) ने हीं भारतराष्ट्र के प्रमुख रखने का वैसा अद्भुत कार्य्यं किया, है जिसके प्रति भविष्य की पीढ़ियाँ शताब्दियों पर्य्यन्त महामानवश्रेष्ठ के इस लोकोत्तर - महान् सांस्कृतिक - ऋण के प्रति अनन्यश्रद्धा से अर्घ्यदान ही करती रहेंगीं । इह्रीं श्राचार्य्यचरणों के अन्तेवासित्त्व में निरन्तर १५ वर्ष पर्य्यन्त प्रमुखरूपेण ‘ शतपथब्राह्मण ' का ही प्रमुखरूपेण क्रमबद्ध स्वाध्याय करने का महद्भाग्य प्राप्त हुआ है इस वेदवीथीपथिक को । अपने स्वाध्यायकाल में हीं ऐसी कामना - जागरूक होपड़ी थी कि, स्वान्तः सुखाय शतपथ की इस पारि-भाषिक -- निधि को राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिपिबद्ध किया जाय, और यदि सम्भव हो, तो समान सहयोगी वेदप्रेमियों तक इस पारिभाषिक सन्देश को पहुँचाने का प्रयास किया जाय । इसी कामना को मूर्तरूप प्रदान करने के लिए, ' शतपथ ' का ' हिन्दी -- विज्ञान भाष्य ' ग्रन्थानुगत बन गया, एवं तद्भाष्यनिर्माणकाल में हीं प्रथम-काण्ड से - मासिक पुस्तक्त - रूपेण इसका प्रकाशन भी उपक्रान्त होगया सन् १६३२ में हीं । इस सम्बन्ध में सबसे बड़ी कठिनता हमारे सम्मुख यही उपस्थित हुई कि इन रहस्यपूर्ण, दुरूह परिभाषाओं का हिन्दी - भाषा जैसी लोकभाषा में संकलन कैसे किया जाय, जबकि वैदिक -- पारिभाषिक शब्दों के लिए संस्कृतभाषाकोश में भी पर्य्याय - शब्दों का प्रभाव है 1 इसके अतिरिक्त वर्त्तमाना हिन्दी भाषा के व्यवस्थित अध्ययन से भी हम सदा से ही निरक्षरमूर्द्धन्य हीं प्रमाणित रहे हैं । अतएव हमारे इन भाषा - निबन्धों के प्रति सदा से ही हमें समय समय पर उद्बोधन प्रदान करते रहने वाले आत्मबन्धुओं की ' लोकप्रियतानुगता - इच्छा ' का हम से आज-तक समादर नहीं हो सका है, जिस के लिए भाषा की अपेक्षा शब्दानुपलब्धि को ही हमने प्रमुख कारण माना है । दिग्देशकालानुत्रन्धी युगधम्र्मों के अनुपात से लोकनिबन्धना प्राकृत- लोकभाषाओं- ( व्यवहारभाषाओं ) में उच्चावच ' परिवर्त्त'न होते रहते हैं, जिन परिवर्तनों का यदृच्छाशब्दात्मक सङ्केतभावों से ही सम्बन्ध है, जैसाकि पूर्व के वाच्यार्थ --प्रसङ्गानुगत शब्दार्थ के औत्पत्तिक - सम्बन्ध - दिग्दर्शन - परिच्छेदों में स्पष्ट किया जाचुका है । भूतव्यवहारानुगत लोकतन्त्र में तो इन परिवर्तनों से तात्कालिकी -स्थिति-- परिस्थितियों का अमुक सीमापर्य्यन्त समन्वय होजाता है । किन्तु प्रानिबन्धन तात्त्विक - श्रौत्पत्तिक - पारिभाषिक शब्दों के सम्बन्ध में लौकिक प्राकृत- -शब्दों का पर्य्यायात्मक समावेश मौलिक अर्थ को अनर्थरूप में हीं परिणत कर दिया करता है । यह बात दूसरी है कि, मौलिक - अर्थ को प्रमुखता न देकर केवल प्रतारणामात्र के लिए लौकिक - शब्दपर्य्यायों का जोड़ तोड़ बैठा कर हम अनुरञ्जनभाव समाविष्ट करदें । किन्तु ऐसे अनुरञ्जनभावों से वस्तुस्थिति का समन्वय सर्वथा ही पराः परावत बना रह जाता है । वस्तुस्थिति का समन्वय तो मौलिक - शब्दों के श्राश्रय से ही सम्भव है । एकमात्र इसी अनुबन्ध से हमने राष्ट्रभाषा हिन्दी के राष्ट्रीय - शब्दभण्डार को यथासम्भव तत्त्वानुगत मौलिक--औत्पत्तिक शब्दों के साथ समन्वित कर देना हीं मर्य्यादित मान लिया है । और इसी से परिवर्तनशीला प्राकृत भाषाओं में अभ्यस्त, अनुरञ्जनप्रियमात्र पाठकों की दृष्टि में हमारा यह निबन्ध प्रयास ' लोकप्रियता ' ६३
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ग्रात्मनिवेदन की सीमा से बहिष्कृत ही मान लिया जासकता है । अनुरञ्जनात्मक प्रयोभावों के समतुलन में वेदशास्त्रने क्योंकि हमें तत्त्वात्मक -- आचारस्मन्वयात्मक - श्र योभावानुगति का ही आदेश प्रदान किया है-, बिन श्रेयः— प्रेयः - भावों के सम्बन्ध में अग्रे विशेषरूप से किञ्चिदिव निवेदनीय है ), अतएव लोकभावुकता के इस सीमातीत समादर के समतुलन में हमने -'श्र योभावानुगता -- मूलशब्दोपासनात्मिका -- सांस्कृतिकी--राष्ट्रभाषा - हिन्दी की आराधना को ही श्रेयः पन्था मान लिया हैं अपने लिए भी, और राष्ट्र के लिए भी । पारिभाषिक विषयों की दुरूहता - रूपा कठिनता अन्य पक्ष है, एवं भाषाकाठिन्य भिन्न पक्ष है । हमने जिस राष्ट्रभाषा का अनुगमन किया है, उसमें पारिभाषिक - विषयों की कठिनता तो अवश्य है, किन्तु भाषाका टिन्य नहीं । अहोरात्र लोकव्यवहारासक्ता हमारी मानसप्रज्ञा ' यत्तदग्रे विषमिव ' न्यायेन अवश्य ही इन तात्त्विक-पारिभाषिक -- विषयों की ओर कठिनता से प्रवृत्त होती है, जो स्वयं हमारा प्रज्ञादोष है, जिसे व्यक्तित्त्वप्रतिष्ठा --व्यामोहन से हम -- ' भादोष ' की संज्ञा प्रदान कर दिया करते हैं । ग्रवश्य ही उपन्यास - गल्प - नाटक-कत्रिता - सामयिक - समाचारपत्र- यादि आदि की भाँति ऐसे सांस्कृतिक - पारिभाषिक - साहित्य में तात्कालिक -मनोऽनुरञ्जन सम्भव नहीं है । यदि इसी दृष्टि से पारिभाषिकी - राष्ट्रभाषा को ' लोकप्रियता ' की उपाधि से वञ्चित किया जारहा है, तो हम अभिनन्द ही करेंगे. इस वञ्चना की । अन्यथा पारिभाषिक -- तत्त्वांनुगत मौलिक शब्दों की मर्य्यादा का संरक्षण करते हुए लोकभावुकतासंरक्षण के लिए जितना सा मर्य्यादित अनुरञ्जन अपे-क्षित है, हम समझते हैं -- उस अनुरञ्जन से हमारे ये भाषानिबन्ध कदापि विदूर नहीं हैं । राजस्थान में एक लोकसूक्ति प्रसिद्ध है कि - " जए जण को मन राखताँ स कोई बेसां रहगी बाँझ ' । अर्थात् ' प्रत्येक के मन के अनुरञ्जन के लिए सदैव तुरा वेश्या वंशसुख से वञ्चित ही रह जाया करती है ' । ऐसे आत्यन्तिक - मनोऽनुरञ्जन के दुष्परिणाम राष्ट्र के सम्मुख स्पष्टतम हैं । ' गङ्गा गए गङ्गादास, जमना गए जमनादास, और यों न गङ्गादास, न जमनादास ' लोकप्रामाणिक को चरितार्थ करतीं रहने वाली, विभिन्न सत्तातन्त्रों के तात्कालिक अनुरञ्चनों से, विभिन्न सम्प्रदायवादों के अनुरञ्जनों से, तदित्थं दिग्देशकाला-नुत्रन्धी -- परदर्शनात्मक, अतएव स्वस्वरूपदर्शनात्मिका स्वनिष्ठा से प्रात्यन्तिकरूपेणैव पराङमुख प्रमाणित होते रहने वाले तथाविध ग्रनुरञ्जनों से समन्विता व्याख्याने हीं इस मूलसस्कृति के सनातन - श्र ेय - प्रोयो-भावात्मक क्षेत्रों से आज पराङमुख ही बना उभयात्मक अर्थसमन्वय को श्रेय और प्रेयसे, दोनों हीं दिया है । पारिभाषिक - तत्त्वात्मक श्रेयाभाव को आधार बनाने वाला मर्य्यादित प्रयोभाव जहाँ अर्थात्मक है, वहाँ श्र ेयःप्रतिष्ठा से वञ्चित अनुरञ्जनात्मक केवल प्रयोभाव तो - ' हीयतेऽर्थान् य उ प्रेयो वृणीते ' के अनु-सार अनर्थात्मक ही बन जाया करता है, जिस अनर्थ का अर्थ है - एकही शास्त्र के आधार पर विभिन्न मतवादों, मान्यताओं, कल्पनाओं का नवनवाविर्भाव, एवं तदनुग्रह से संशय - निवृत्ति के स्थान में संशय की आत्य-न्तिक - प्रवृत्ति * । एक ही श्रुति - मृति - पुराणशास्त्र | किन्तु तन्मान्यतानुगामी विभिन्न सम्प्रदायवादियों के उसी एक शास्त्र के आधार पर अभिव्यक्त होजाने वाले अगणित वाद, सभी मतवादों में परस्पर अहमहमिका, प्रचण्डप्रतिद्वन्द्विता, तदनुग्रहेणैव राष्ट्रीय सांस्कृतिक - ऐक्य का, संघटन का मूलोच्छेद, अतएव राष्ट्र की संघ-शक्ति में अनेक छिद्रों का आविर्भाव, उनके द्वारा ही श्राक्रान्ता श्राततायी वर्गों का भारतराष्ट्र में प्रवेश, और * - एकस्मिन् धर्म्मणि विरुद्धनाना कोट्यवगाहिज्ञानमेव संशयः । ६४
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शतपथ - प्रथमखण्ड उनके आक्रमणों से ही भारतराष्ट्र का श्रात्मबुद्धिमनःशरीरदासात्मक सर्वात्मकं पारतन्त्र्य, और यही श्र े यःप्रतिष्ठा से वञ्चिता, केवल — प्रयोभावानुगता अनुरञ्जनात्मिका घोरघोरतमा महाभयावहा सर्वनाशकारिणी - ' लोकप्रियता ' का अश्रुपूर्णांकुलेक्षणात्मक वह दुःखपूर्ण मलीमस इतिवृत्त, जिसे इसी लोकप्रियता के व्यामोहन से, परदर्शन-मूला इसी भावुकता के व्यामोहन से विगत तीन सहस्र वर्षों के अनुरञ्जनात्मक -युगों से अपना श्राराध्य मानते हुए हम उत्तरोत्तर अपना सवतः पतन ही कराते रहे हैं, इति नु ब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!! वस्तुस्थिति तो वास्तव में विपरीता ही मानी जायगी लोकानुरञ्जनात्मिका लोकप्रियता के क्षेत्र में इसलिए कि, लोकप्रियता से सम्भव है तात्कालिक रूपेण मानवीय मन तत्प्रति आकर्षित होजाता हो । किन्तु प्राणसंघर्षशून्य, अतएव श्राचारात्मिका कर्त्तव्यनिष्ठा से पराङमुख, तत्स्थाने च अनुरञ्जनात्मक तात्कालिक फलभाव में ही विश्रान्त, परिसमाप्त यह प्रयोभाव मनव के लिए तदुत्तरकाल में तो एक ' भार ' ही बन जाया करता है - ' परिणामे विषोपमम् ' के अनुसार, जबकि श्र ेयोभावानुगत मर्यादित प्रयोभाव में आरम्भ में थोड़ी कठिनता रहते हुए भी संघर्षजनिता -- कर्मात्मिका मानवाधिकार सिद्धा सहज शान्ति ही अभिव्यक्त होजाती है कालान्तर में -- ‘ परिणामेऽमृतोपमम् ' के अनुसार । लोकानुरञ्जनमात्रप्रधान प्रयोभावों में मानवीय मन जहाँ प्रतिक्षण परिवर्त्तनशील बना रहता हुआ नित्य अशान्त है, वहाँ लोकनिष्ठानुगत - मर्य्यादित - प्रयोभावों में शान्तिमूला -- सहज स्थिरता है, जिस इस तथ्य का उनकी प्रज्ञा कदापि समन्वय नहीं करसकती, जिनकी प्रज्ञा दिग्देशकालातीत - श्र ेयो मूर्ति आत्मपुरुषभाव से पराङमुख बनी रहती हुई, दिग्देशकालात्मक - प्रयोभाव-मूर्ति -- तात्कालिक -अनुरञ्जादि फलों की चर्व्वणा में हीं परिसमाप्त होती रहती है । निश्चयेन इस तात्कालिक-अनुरञ्जनात्मक – प्र ेयःफल की दृष्टि से भी भगवान् के ' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ' इस उद्घोष की अभिव्यक्ति हुई है, जिसका पूर्व के ' निष्कारणात्मक - बुद्धियोग - निष्ठा - प्रसङ्ग सन्दर्भ ' में स्पष्टीकरण किया जाचुका है । श्रेयोभाव सनातनत्त्वेन स्थितिप्रधान है, जबकि प्रयोभाव परिवर्तनत्त्वेन गतिप्रधान है । स्थितिशून्या गति अन्ततोगत्वा ' जड़ता ' में हीं परिणत होजाती है, जिस इस रहस्यपूर्ण गतिस्थिति -- सिद्धान्त का हम कदापि लोकानुरञ्जनात्मक -- आज के युग के भातिसिद्ध - नर्त्तन - गायन -- बादनात्मक - काल्पनिक- सांस्कृ – तिक - आयोजनों से समन्वय नहीं करसकते । इसीलिए तो हमें कहना पड़ा कि, श्रेयोवञ्चित प्रयोरूप जिस अनुरञ्जन में, जिस लोकप्रियता में दिग्देशकाल - परिवर्तनानुबन्ध से नूतन - नूतन - भाव - विन्यास आविर्भूत तिरोभूत होते रहते हैं, उसके आधार पर कदापि व्यवसायधर्मावच्छिन्न - एकत्त्वधर्म्मनिबन्धन -- निश्चयात्मक सैद्धान्तिक - निर्णय अभिव्यक्त नहीं होसकता । अपितु कभी यह अच्छा, कभी वह अच्छा, तो कभी अच्छा भी ही प्रधान बनी. बुरा, तो बुरा भी अच्छा, तो कभी सभी अच्छे, तो कभी सभी बुरे, इत्येवंरूपा - संशयवृत्ति रहती है, जिसके सम्बन्ध में - ' संशयात्मा विनश्यति ' ही अन्तिम निर्णय हुआ है । अतएव श्र ेयोभावात्मक-नैष्ठिकपथ - को, आरम्भ में कठिनवत् प्रतीत - तत्त्वसम्मत - मार्ग को, तदनुप्राणिता सांस्कृतिक भाषा को ही ' सरल ' माना जायगा, और यों जिसे कठिन बतलाया जारहा है, उसे तत्त्वसमन्वय दृष्ट्या जहाँ निर्खयात्मक-' अञ्जना प्रतिपादन ' माना जायगा, वहाँ जिसे ' सरला ', अतएव ' लोकप्रिया ', अतएव च ' अनुरञ्जना– त्मिका ' भाषा माना, और मनवाया जारहा है, उसे ही निश्चितार्थ - एकार्थ- सन्देहरहितार्थ से असंस्पृष्ट रहने के कारण परिणामतः कठिना हीं भाषा कहा जायगा । सरलता, और कठिनता की यही परिभाषा की है स्वयं वेदमहर्षिने, जैसाकि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट प्रमाणित है -
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आत्मनिवेदन
सम्पूषन्! विदुषा नय य एवेदमिति ब्रवत् ।
योऽञ्जसानुशासति ॥
-ऋक्संहितायाम् मन्त्रार्थ स्पष्ट है, जिसका भावार्थसमन्वय यही है कि, “ पार्थिवभूतात्मा के अभिमानी पार्थिव पूषादेवता, तथा सौर विज्ञानात्मा के पूषादेवता हमें वैसे तत्त्वाचारनिष्ठ विद्वान् के सान्निध्य में रक्खे, जो सर्वथा ऋजुभाव से ही हमारा पथप्रदर्शन करता है, जिसकी तत्त्वनिष्ठात्मिका - निश्चित - निर्णयात्मिका आज्ञा विविध -- संदेहों से पृथक् रहती हुई, हमें भी पृथक् रखती हुई, ' इदमित्थमेव नान्यथा रूप से एक निश्चित - नैष्ठिक निर्णय से ही समन्वित करती रहती है " । निश्चयात्मक निर्णय ही असा - अनुशासन माना जायगा, जिसमें सन्देहा-नुगता - नानाभावान्विता कुटिलता का संस्पर्श भी नहीं है । इसी कठिनता, और सरलता के अनुबन्ध से हमें आगे चलकर एक विशेष तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है । अतएव इस प्रसत को अत्रैव उपरत किया जारहा है । अत्र प्रसङ्गोपात्त दो शब्दों में उस ' लोकप्रियता ' के प्रच्छन्न रहस्य का भी समन्वय कर लीजिए, जिसे अपना महान् शस्त्र बना कर प्राकृत मानव अपने भातिसिद्ध व्यक्तित्त्व का यथाकथञ्चित् परित्राण करते रहने का दिग्देशकालानुबन्धी काल्पनिक - प्रयास करते रहते हैं । व्यक्ति का व्यक्तित्त्व वस्तुतः ' आत्मस्वरूपाभि-व्यक्तित्त्व ' से ही अनुप्राणित है, जिसका मूलभूता श्रात्मपुरुषनिष्ठा से ही सम्बन्ध है, जैसा कि पूर्व के ' पुरुष--मानव ' स्वरूप - निरूपण - प्रसङ्ग में स्पष्ट किया जाचुका है । यही पुरुषमानव का अपना वास्तविक वह ' व्यक्तित्त्व ' है, जिसका किसी भी दिग्देशकालानुबन्धिनी पदप्रतिष्ठा ( अधिकारबल ), वित्तत्रल, एवं अन्यान्य भूत - भौतिक - बलों से अनुप्राणित परप्रति ' परव्यक्तित्व ' रूप काल्पनिक व्यक्तित्त्व से संस्पर्श मी नहीं है । सहज - व्यक्तित्त्व ही मानव का वास्तविक व्यक्तित्त्व है, जिसमें सम्प्रश्नात्मिका--जिज्ञासा ही प्रधान वनी रहती है, जिसका मुख्य लक्ष्य है निरन्तर अध्यवसायपूर्वक स्वाध्याय-तपो - निष्ठादि पूर्वक ‘ समझने का प्रयास करते रहना ' | दूसरा प्राकृत व्यक्तित्व ठीक इसके विपरीत . है । ज्ञात - अज्ञात कारणानुग्रह - परम्पराओं से श्रात्मनिष्ठाशून्य, अतएव स्वस्वरूपानुगत नैष्ठिक - व्यक्तित्त्व से शून्य किसी यथाजात प्राकृत मानव को यदि ' पद ' ' वित्तादि ' लक्षणा कोई परप्रतिष्ठा उपलब्ध होजाती है, तो यह आगन्तुक — उपाधि ही इसका लोक - सामाजिक- बाह्य - व्यक्तित्त्व बन जाता है, जिसका तदेषणप्रिय वर्गमात्र में तत् - पद - तद्वित्त- पर्य्यन्त ही प्रभुत्त्व रह पाता है । ऐसा व्यक्ति ही - ' पद - विन- प्रतिष्ठित - व्यक्ति ' माना गया है लोकदृष्ट्या । स्पष्ट ही सभी प्रकार के आध्यात्मिक - प्राणानुबन्धी नैष्ठिक - संघर्षों से शून्य, तत्त्व— शिक्षण - चिन्तन - मनन- निदिध्यासनादि विद्यासंस्कारों से संस्पृष्ट इत्थंभूत व्यक्ति अपने आभ्यन्तररूप से सर्वात्मना शून्यं - शून्यं बना रहता हुआ भी परप्रतिष्ठात्मक ' परव्यक्तित्त्व ' से मान बैठता है अपने आपको सकलगुणनिधान, जिस इस भ्रान्ति का मुख्य लक्ष्य चन जाता है सम्भव, असम्भव -प्रत्येक उपाय से सब का बथ प्रदर्शन कराते रहना, परामर्श प्रदान करते रहना, सहज भाषानुसार मूलतः - ' समझ ' से सर्वात्मना असंस्पृष्ट भी इनका दूसरों को ‘ समझाने के लिए ' प्रतिक्षण आतुर बने रहना । इस ' समझाने के लिए ' इनके कोश में हैं शून्यं - शून्यम् । अतएव अपने इस व्यक्तित्त्व संरक्षण के लिए यही प्राकृत - मानव वर्ग उस लोकप्रियता का श्रय लिया करता । अर्थात् प्रकृतिसिद्ध-है, जिसका अर्थ है- इत्यादि इत्यादि ६६