Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 111–120

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120

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शतपथ - प्रथमखण्ड लेना पड़ता है कि, “ इत्थंभूता - व्यावहारिकी - जनतन्त्रीया - उपयोगिता की दृष्टि से तो सचमुच ही वेदशास्त्र का आज कोई भी उपयोग प्रतीत नहीं होरहा ", जिस इस मान्यता के अभिव्यक्त करने मात्र से ही यह वेदभक्त ब्राह्मण हार्दिक - वेदना का ही अनुभव कर रहा है, क्योंकि - " नान्यः पन्था विद्यते--अयनाय " । इसी प्रसङ्ग में हम उस ममवेधिनी घटना का भी स्मरण किए बिना नहीं रह सकते, जो आज से तीन वर्ष पूर्व हमारे स्वाध्याय - संस्थान मानवाश्रम में घटित होचुकी है । विहारप्रान्त के भूतपूर्व राज्यपाल सर्वश्री . रङ्गनाथ दिवाकर महोदय मान्य अतिथि के रूप में अनुग्रह कर एकबार मानवाश्रम पधारे । आप स्वयं भारतीय-संस्कृति, साहित्य के प्रति अनन्य श्रद्धा रखने वाले तेजस्वी मानवश्रेष्ठ हैं । आप के साथ निरन्तर २ घन्टे ' वेदशास्त्र ' के सम्बन्ध में प्रक्रान्त रहने वाली सामयिक चर्चा के प्रसङ्ग में हीं इस शास्त्र के सम्बन्ध में हमें आप के ये विचार उपलब्ध करने का महद्भाग्य प्राप्त हुआ कि - ' वेदशास्त्र तो वैसा आध्यात्मिक शास्त्र है, जिस के लिए किसी लोकतन्त्र - परिग्रह - साधनों की कोई आवश्यकता नहीं है । अमुक गिनी गिनाई पुस्तकें, एकान्त स्थान, और एकान्त चिन्तन, बस पर्याप्त है ही साधन इस कार्य के लिए । क्योंकि बाह्य लोकजावन के साथ इस शास्त्र का कोइ सम्बन्ध नहीं है " इत्यादि - इत्यादि " | उक्त घटना के कुछ ही समय के अनन्तर आपने एक पत्र के द्वारा हमारे साहित्य में यत्र तत्र निर्दिष्ट-' चिज्ञान ' शब्द के अर्थ के सम्बन्ध में जिज्ञासा अभिव्यक्त की संस्थान के मन्त्री महोदव के माध्यम से । तदुत्तर में हीं हमें एक छोटा सा निबन्ध प्रकाशित कर आप की सेवा से भेजना पड़ा * । तदनन्तर इस दिशा में हमें आपकी कोई और विचारधारा विदित न होसकी । आप की इच्छा थी कि हम एक बार विहार-यात्रा करैं । किन्तु यात्राव्यासङ्ग से सदा ही उदासीन रहने वाले हमारे वेदाभ्यासविजड़ित - मनने यात्रा का साहस नहीं किया । घटनोल्लेख से निवेदनीय केवल यही है कि, जिन राष्ट्रीय विद्वानों की अपनी इस मूल-. निधि पर पूर्ण आस्था है, वे भी इसे केवल वैसा ' आत्मचिन्तकशास्त्र ' ही मान रहे हैं, जिस का कि उन की दृष्टि में लोकजीवन से, लौकिकी- भौतिकी उपयोगिता से कोई भी सम्बन्ध नहीं है । ऐसा क्यों? । ऐसा यौं, और इसलिए कि वेदशास्त्र का विज्ञानमूलक लोकाचारपक्ष विगत तीन सहस्र वर्षो से धूमिल ही बनता चला रहा है, जिस के अमुक कारणों का पूर्व में यत्र तत्र सङ्क ेत किया जा-चुका है । जगन्मिथ्यात्व - मूलक काल्पनिक आत्मवाद, तन्मूलक श्राचारशून्य दर्शनवाद, तन्मूलक विविध सम्प्रदायवाद, तदनुगत असंख्य मतवाद, आदि की विभीषिकाओंने वेदशास्त्र के लोकजीवनोपयोगी व्यावहारिक-आचारपक्ष को उस सीमापर्य्यन्त एकान्ततः ही अभिभूत ही कर लिया है कि, लोकजीवनोपयोगी - विधि - विधानो का महान् कोशभूत भी वेदशास्त्र आज केवल ' पुण्यपाठ ' की ही वस्तु बना रहा गया है । उन विधि - विधानों की संक्षिप्ता - सूची भी एक स्वतन्त्र - निबन्ध का ही विषय होगा X | यहाँ हम राजर्षि मनु के २–४ वैसे * - " भारतीय दृष्टिकोण से - ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय " नामक निबन्ध X “ वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्त्वम् ” ( संस्कृतनिबन्ध ) १०७

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श्रात्मनिवेदन

श्लोक मात्र ही उद्धृत कर इस दुःखकर प्रसङ्ग को उपरत कर रहे हैं, जिन से वेदभक्तों को यह आभास होजा-यगा कि, वेदशास्त्र पारायणात्मक केवल पुण्यपाठ की ही वस्तु नहीं है, किवा वेदशास्त्र के तत्त्वों का सूक्ष्म-जगत् से, आत्मजगत् से सम्बन्ध रखने वाले आत्म - परमात्म - ईश्वर - परलोक आदि दिग्देशकालातीत- परोक्ष-अचिन्त्यभावों से ही सम्बन्ध नहीं है । अपितु इस सुसूक्ष्म तत्त्ववाद के साथ साथ ही वेदशास्त्र सभी युगों के लिए

मानव को उन लौकिकी व्यावहारिकी भौतिकी उपयोगिताओं का भी विज्ञान के आधार पर ही स्वरूप - विश्लेषण कर रहा है, जिस व्यवस्था - पद्धति के प्रांशिक अनुगमन से भी मानव का लौकिग - अभ्युदय गतार्थ बन जाया करता है ( न जाया करता था ग्राज से तीन सहस्रवर्ष पूर्व, जब कि वेदशास्त्र का वह प्रचारात्मक - व्यावहा-रिक पक्ष सर्वसामान्य के लिए अनुगमनीय बना हुआ था ) | [ १ ] - पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चतुः सनातनम् । अशक्यं चाप्रमेयञ्च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ( ममुः १२।६७ ) । [ २ ] - चातुर्वर्ण्यं, त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं - भवद् - भविष्य ं च “ सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति ” ॥ ( मनुः १२६७ ) । [ ३ ] - बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्र ं सनातनम् । तस्मादेत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ( मनु- १२।६६ ) । [ ४ ] - यदा स्वयं न कुर्य्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् । तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मण काय दर्शने । ( मनुः ८ । ६ । ) । [ ५ ] - सेनापत्य ' च, राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्व लोकाधिपत्यञ्च वेदशास्त्रविदर्हति । ( मनुः १२।१०० ) । उक्त पाँचों श्लोकों में पाँचवाँ श्लोक सर्वथा व्यक्ता भाषा में हीं वेदशास्त्र की लोकानुबन्धिनी-व्यावहारिकी - उपयोगिता व्यक्त कर रहा है । ' वेदशास्त्र का विद्वान् सेनापति बन कर सेना का सफल सञ्चालन कर सकता है, राज्यशासन कर सकता है, लोकन्याय का व्यवस्थापक बन सकता है, सभी क्षेत्रों का अधिकारपूर्वक उत्तरदायित्त्व पूर्वक सञ्चालन कर सकता है ” राजर्षि मनु : के इन उद्गारों के अनन्तर भी क्या वेदशास्त्र की लौकिक- उपयोगिता के सम्बन्ध में किसी भी अर्वाचीन राजनैतिक-राष्ट्रीय मानव को कोई सन्देह रह जाता है?, प्रश्न का उत्तर अभी - ' हाँ ' में हीं इसलिए दिया जायगा कि उक्त शोक तो उस ' स्मृतिशास्त्र ' के हैं, जिसके सम्बन्ध में आज के ऐतिहासिकों की ऐसी मान्यता है कि -'-** श्रालप्यालम् । श्रतएव केवल वेदस्तुतिपरक इत्थंभूत स्मार्त्त ' वचनों के आधार पर ही ' उप-योगिता ' जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के सम्बन्ध में वेदशास्त्र के प्रति आस्था नहीं करली जासकती, इति नु अब्रह्मण्यमेव! 1 और हाँ, सेनापतित्त्व, दण्डनेतृत्त्व, राज्यशासनादि उपयोगिताएँ तो आज हमारे राष्ट्र की गौण उप-योगिताएँ हैं । मुख्य उपयोगिताएँ तो कुछ और ही हैं अभी हमारे राष्ट्र के लिए, जिनके सम्बन्ध में निश्चयेन वेदशास्त्र में हमें कोई प्रचारात्मक सूत्र उपलब्ध नहीं होरहे । अतएव तत्प्रति ' इति मातिप्राक्षीः । १०८

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शतपथ - प्रथमखण्ड वेदशास्त्र जैसे निर्भ्रान्त शास्त्र के सम्बन्ध में ' लोकोपयोगिता ' जैसे किञ्चित्कर प्रसन को लेकर इस प्रमाणं स्युः ' रूपेण अपने आपको प्रकार के प्रश्नोत्तर - विमर्श से तो सचमुच ही हम आज ' यदि वेदाः महान् प्रायश्चित्त का ही भागी बनाते जारहे हैं । किन्तु स्थिति वर्त्तमानयुग में कुछ ऐसी उपस्थित होपड़ी है कि, आज आत्मभावा भी अन्तम्मुख है, बुद्धिभाषा भी कुण्ठित है, एवं सामान्या मनोभाषा भी शिथिल प्राया है । आज तो सर्वात्मना ' इन्द्रियभाषा ' रूपा ' नग्ना भाषा ' का ही प्रभुत्त्व है, जिसका सर्वथा नग्न यही अर्थ है कि, जबतक आज हमें इन्द्रियों की अनुभूति - प्रत्यक्ष के माध्यम से अपनी लोकमान्यतात्रों का साक्षात्कार नहीं करा दिया जाता, तबतक हम कदापि उपयोगिता - अनुपयोगिता का निर्णय नहीं कर सकते । ओमित्येत् । वही होगा | वर्त्तमानयुगानुगता ऐन्द्रियिकी - उपयोगिता के माध्यम से ही वेदशास्त्र की उपयोगिता का स्वयं वेदशास्त्र में हीं अन्वेषण - प्रयास किया जायगा । किन्तु किसी अन्य स्वतन्त्र निबन्ध में | क्योंकि अब आत्मनिवेदन सीमा का अतिक्रमण करता हुआ वेदशास्त्रसिद्धा छन्दोमर्य्यादा का ही उल्लङ्घन करता जारहा है | यहाँ दो शब्दों में हीं स्वतन्त्र - निबन्ध - सापेक्षा आज की उपयोगिता का वेदशास्त्र के अक्षरों के माध्यम से ही संस्मरणमात्र ही कर लिया जाता है । सर्वप्रथम हमें ' मानव ' के सम्बन्ध में यह विचार कर लेना चाहिए कि, इसके लिए सभी युगों में सामान्यरूप से - ‘ उपयोगी ' क्या है?, जिस इस विचारात्मक प्रश्न का तथ्यपूर्ण समाधान तो मानव के उस तत्त्वपूर्ण चतुपर्वा - स्वरूप पर ही अवलम्बित है, जो मानवीय चारों पर्व पूर्व में क्रमश: ' आत्मा, बुद्धि, " मनः ' ४ शरीर, इन नामों से उपवर्णित हुए हैं, एवं जिनका क्रमशः दिग्देशकालातीत ' विश्वात्मा, २ कालात्मक सूर्य, दिगात्मक चन्द्रमा, ४ देशात्मक भूपिण्ड, इन चार ईश्वरीय - आधिदैविक - विवर्त्तो से क्रमिक - सम्बन्ध है | दिग्देशकालातीत विश्वात्मा से भिन्न ' आत्मा ' नामक प्रथम पर्व मानव का ' पुरुषषर्व ' है, तदनुत्रन्धेनैव वही मानव ' पुरुष ' है । एवं काल - दिग् - देशात्मक - सूर्य्य - चन्द्रमा - भूपिण्ड- से अभिन्न बुद्धि - मनः - शरीर नामक तीनों पर्वों की समष्टि ही मानव का ' प्रकृतिपर्व ' है, तदनुत्रन्धेनैव वही मानव ' स्त्री ' है । और यांद्विधा विभक्त पुरुष - प्रकृतिरूप इस दाम्पत्य से समन्वित ' मानव ' अपने चार पर्वों से ही ' पूर्णमानव ' बना हुआ है | मानव के प्रकृतिसिद्ध इस सहज स्वरूप के आधार पर ही ऋषिप्रज्ञा की ओर से इसके क्रमसिद्ध चारों मानवीय पर्वों के अनुबन्धों से चार प्रकार के साध्ययोगात्मक - ' उपयोग ' व्यव स्थत हुए हैं, जो भारतीय आस्तिक जनतन्त्र में ' मोक्षपुरुषार्थ ' नाम से, बुद्धिपर्वानुगत ' पुरुषार्थ ' नाम से प्रसिद्ध हैं | आत्मपर्वानुगत प्रथम उपयोग ही द्वितीय उपयोग ही ' धर्म्मपुरुषार्थ ' नाम से, मनःपर्वानुगत तृतीय उपयोग ही – ‘ कामपुरुषार्थ ' ’ नाम से, एवं शरीरपर्वानुगत चतुर्थ उपयोग ही - ' अर्थपुरुषार्थ ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिन इन वास्तविक उपयोगों की अभिधा से ' धम्मर्थिकाममोक्ष ' रूपेण भारतराष्ट्र के आबालवृद्धवनितादि सभी वर्ग सुपरिचित हैं । इन चारों में धर्म्म - काम - अर्थ, इन तीन उपयोगों को तो हप दिग्देशकालात्मक - लौकिक - प्राकृत-‘ उपयोग ’ कहेंगे, एवं ‘ मोक्ष ' को दिग्देशकालात्मक - अलौकिक - श्रप्राकृत - ‘ उपयोग ' कहेंगे । यह अप्राकृत मोक्षोपयोग जहाँ – ‘ परमपुरुषार्थ ' कहलाया है, वहाँ प्राकृत धर्म्म - काम - अर्थ- उपयोग ' सामान्यपुरुषार्थ ' ही मान लिए गए हैं | चारों हीं पुरुषार्थ, किंवा चारों हीं उपयोग परस्पर ' दहरोत्तर सम्बन्ध ' से समन्वित होकर ही मानव के लिए वास्तविक उपयोगी बना करते हैं । यदि इन चारों को पृथक् कर दिया जाता है, १०६

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आत्मनिवेदनं तो ये चारों हीं न तो पुरुषार्थ ही रहते, न प्रकृत्यर्थ ही । अर्थात् न तो इन से निःश्र यस् - रूप आत्मशान्ति सम्भव, एवं न अभ्युदयरूप बुद्धि - मनः - शरीरानुगत - तृप्ति - तुष्टि - पुष्ट- -भात्र ही सम्भव । धर्म्म - काम-अर्थ - से वञ्चित निष्कैवल्य मोक्ष केवल कल्पना है । शून्यं शून्यं - भात्रमात्र है । तथैव श्रात्म, काम, अर्थ से चितधर्म्म अधर्म है, आत्म - धर्म - अर्थ- वञ्चित काम पशुकाम एवं आत्म- धर्म - काम - वञ्चित -अनर्थ रूप में हीं परिणत होजाता है । इसी स्थिति का यों भी समन्वंय किया जासकता है कि, ' धर्म ' वही ' धर्म्म ' है, जिसके मूल में मोक्षात्मक - आत्मभाव प्रतिष्ठित है । आत्मभावमूलक साम्य ( समदर्शन ) से वञ्चित धर्मं तो केवल ' मतवाद ' ही बना रह जाता है । एवमेव आत्मानुगत धर्म को आधार बनाए रखने वाला ' काम ' ही वास्तविक ' काम ' है । तथैव आत्म - धर्म- काममूलक अर्थ ही वास्तविक ' अर्थ ' है । आत्मा की महिमा में धर्म्म को प्रतिष्ठित रहना चाहिए, धर्म की महिमा में काम को प्रतिष्ठित रहना चाहिए, एवं धर्म्मसम्मत काम की महिमा में अर्थ को प्रतिष्ठित रहना चाहिए, जिसका सहजरूपेण यही निष्कर्ष है कि, आत्मा के नियन्त्रण में बुद्धि को, आत्मानुगता बुद्धि के नियन्त्रण में मन को, तथा आत्म- बुद्धि- सहकृत मन के नियन्त्रण में इन्द्रियमाध्यम से शरीर को नियन्त्रित रखना चाहिए । क्योंकि प्रकृति में यही पारम्परिक-नियमन है | ' तत्तु समन्वयात् ' मूलक दहरोत्तरं - सम्बन्धात्मक - इस समन्वय से ही मानव के चारों पवों की उपयोगिताएँ वास्तविक - उपयोगिताएँ प्रमाणित होतीं हैं । चारों के. पार्थक्य से मानवस्वरूप भी विकृत हो जाता है, एवं मानव की उपयोगिता भी दुरुपयोगिता में हीं परिणत होजाती है । आत्मानुगत मोक्ष, बुद्ध्यनुगत धर्म्म, मनोऽनुगत काम, शरीरानुगत अर्थ, इन चार उप– योगिताओं की सीमा में अलौकिक - लौकिक - यच्चयावत् उपयोगिताएँ अन्तगर्भित हैं, जिन गर्भीभूता सामान्या उपयोगिताओं का इन चारों प्रमुख मोक्षं धर्म्म - काम अर्थ नामकी आत्मिक बौद्धिक - मानसिक - शारीरिक-उपयोगिनों के साथ समन्वय किया जासकता है । व्यायाम, और गोदुग्धसेवन, इन दो सामान्या उपयो-गिताओं से हम शारीरिक - प्रमुख - ' अर्थ ' नामकी - पयोगिता के लाभों से शतः समन्वित होसकते हैं । शास्त्रीय - सङ्गीत, और इन्देवोपासन ( विभिन्न प्राणदेवोपासन ), इन दो से मानसिक प्रमुख - ‘ काम ’ के लाभों से समन्वय स्थापित किया जासकता है । तत्त्वदर्शन, और सत्कर्म्माचरण ( धर्म्माचरण ), इन दो से बौद्धिक - प्रमुख - ' धर्म ' सम्पत्ति प्राप्त की जासकती है । अनन्यनिष्ठापूर्ण - विश्वास, और सात्त्विकी श्रद्धा, इन दोनों के माध्यम से आत्मानुवन्धी मोक्ष के साथ समन्वय सम्भव है । समन्वयात्मिका निष्ठा के पुनःसंस्कर्त्ता भगवान् वासुदेव कृष्ण के लोकानुत्रन्धी - चतुष्पर्वात्मक - मानवीय - जीवन के आत्मा - बुद्धयादि-चारों पर्वों को हम उक्त आठों सामान्य अनुबन्धों से समन्वित देख रहे हैं । गोसेवा पूर्वक गोदुग्ध सेवन, एवं शारीरिक व्यायाम व्यासङ्ग, दोनों शारीरिक भाव भी हमें भगवान् के जीवन में उपलब्ध हैं । अपने इष्टदेव ( पीताम्बरा भगवती - उमा हैमवती ) का श्राराधन, और वंशीवादनात्मक सङ्गीत, दोनों मनोभाव भी श्रीकृष्ण के जीवन में उपलब्ध हैं । गीतोपनिषद् रूप तत्त्वदर्शन, तथा शास्त्रीय धर्म्माचरण, रूपेण दोनों बौद्धिकभाव भी भगवान् के जीवन के साथ समन्वित हो रहे हैं । तथैव अपने श्राचाय्यं सान्दीपन के प्रति, देव-द्विज - शास्त्र - आदि के प्रति पूर्ण विश्वास, और श्रद्धा का भी समन्वय उपलब्ध हो रहा है हमें भगवान् के जीवन में । और हम समझते हैं - स्वानुगत श्राचरण से सम्बन्ध रखने वाली इत्थंभूता उपयोगिता का जैसा सहसमन्वय भगवान् कृष्ण के अमानवीयरूप मानवस्वरूप से हुआ है, वैसा अन्थ अवतारपुरुषों के द्वारा नहीं | इसी तथ्य के आधार पर पुराणपुरुष भगवान् व्यास के मुखपङ्कज से निर्भ्रान्तिरूपेण यह उद्घोष विनिः-११०

पृष्ठ 115

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शतपथ - प्रथमखण्ड स्रुत है कि -- ‘ कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ' | हम समझते हैं - भारतीय वेदादिशास्त्र से अनुप्राणिता, प्रमुखरूपेण चतुर्विधा, सामान्यरूपेण श्रष्टविधा तथोक्ता उपयोगिता को लक्ष्य बना लेने के अनन्तर वर्त्तमान राष्ट्रीय मानव के इस अभियोग में शिथिलता ग्राही जानी चाहिए कि, - ' श्राज के जनजीवन में उस पुराने शास्त्र का,. उसके तत्त्ववाद का क्या उपयोग? ' । तालिकारूपेण - उक्त - उपयोगी- विवर्त्त को अवधानपूर्वक लक्ष्य बनाने के अन्तर ही इङ्ख भारतीय शास्त्र की उपयोगिता - अनुपयोगिता - जैसे भावुकतापूर्णं श्रापातरमणीय विसंवाद की उत्थानिका करनी चाहिए । मानवस्य- आत्मपर्व तदनुगता उपयोगिता – ' मोक्षः ' ( धर्म्मकामार्थंसमन्वितः ) मानवस्य बुद्धिपर्व मानवस्य - मनःपर्वः मानवस्य - शरीरपर्व " " " ‘ धर्मः ’ ( मोक्षानुगतः ) ' काम: ' ( मोक्ष - धर्मानुगतः ) ‘ अर्थः ' ( मोक्ष - धर्म्म - कामानुगतः ) उपयोगचतुष्टयी ---- प्रमुखा विशेषा ( १ ) | १ - निष्ठात्मको - विश्वासः ( २ ) | २- सात्त्विकी - श्रद्धा आत्ममोक्षोपयोगिभावौ ( ३ ) १ - तत्त्वदर्शनम् ( ४ ) २ – सत्कर्म्माचरणम् ' बौद्धिकधम्मोपयोगिभाव ( ५ ) १ - इष्ट देवोपासनम् ( ६ ) २ – उपासनानुगतं सङ्गीतम्' मानसिक - कामोपयोगिभाव ( ७ ) | १ - गोदुग्धसेवनम् ( ८ ) | २ - व्यायामश्च ' शारीरिक अर्थोपयोगिभावौ १११ - उपयोगाष्टकम् सामान्यं

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आत्मनिवेदन ‘ पुनस्तत्रैवावलम्बितो बेतालः ' न्यायमूलक अभिनिवेश अपनी भूतप्रकृति ( विकृति ) के माध्यम से चिर - अभ्यस्ता - स्थूलतमा - जड़भावनिबन्धना ' मान्यताओं के वारुणपाश से सहसा उन्मुक्त होना चाहता ही नहीं तत्रतक, जबतक कि उसे उसी की ' भूत मान्यता ' के माध्यम से तुष्ट न कर दिया जाय । ऐसी सी ही स्थिति पूर्वोक्ता - उपयोगचतुष्टयी के सम्बन्ध में घटित हो सकती है, और कहा जासकता है कि, मोक्ष - धर्म - विश्वास-श्रद्धा - ईश्वरोपासन - तत्त्वदर्शन आदि आदि तो साम्प्रदायिक? भाव हैं । अतएव कदापि इन व्यामोहनों के माध्यम से हम आज के राष्ट्र की ' जनजीवनीया महती - उपयोगिताओं ' की दृष्टि से मोक्ष, धर्मादि, उप--योगिताओं का कोई महत्त्व स्वीकार नहीं करसकते, तो अत्र हमें अत्यन्त प्रणत - भाव से राष्ट्रीय - मानव से ही उसकी पारिभाषिकी जनजीवनीया - उपयोगिता के सम्बन्ध में जिज्ञासा करनी पड़ेगी, जिसके सम्बन्ध में सम्भवत: यही उत्तर - मिलेगा हमें कि— “ राष्ट्र की सब से पहिली आवश्यकता, किंवा उपयोगिता है - अन्न, और वस्त्र की व्यवस्था करना । अन्न - वस्त्र - की चिन्ता से राष्ट्र को मुक्त कर देना हीं राष्ट्र का प्रमुख और प्रथम कर्त्तव्य, एवं यही प्रथमा उपयोगिता । तदर्थ कृषि को सम्मुन्नत करना । फलों के वृक्ष लगाना । पशुसम्पत्ति को समृद्ध करना! योग्य शिक्षित - परिश्रमी - प्रजावर्ग को लक्ष्य बनाना, अर्थात् राष्ट्र में सुसन्तति-उपलब्ध करना | वाणिज्य को व्यवस्थित करना । देश से अविद्या का मूलनाश कर सब को शिक्षित - साक्षर बना देना । और यों देश की गरीबी - भुखमरी - अविद्या - अशिक्षा - आदि को हटाते हुए देश को वैसा सुसमृद्ध बना देना, जिससे हमारा यह भारतराष्ट्र भी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का सम्मान प्राप्त कर सके " - इत्यलमतिपल्लवितेन । सम्भवतः यही वह उद्घुष्ट ( धोका चुकाया ) महान् भाषण है, जिसे आज हम सर्वत्र सभी बड़े - छोटे-राष्ट्रीय आयोजनों में, एवं योजनाओं में राष्ट्र के अमुक वर्ग के श्वेताम्बरधारी यच्चयावत् राष्ट्रीय नेताओं के श्रीमुख से उच्चघोषपूर्वक अनुदिन सुनते रहते हैं । निःसन्देह उद्घोष सर्वात्मना अभिनन्दनीय है, स्तुत्य है, और सभी राष्ट्रप्रेमियों के लिए अनुगमनीय भी । किन्तु इत्थंभूत महान् उद्घोष के सम्बन्ध प्रश्न उपस्थित है उस व्यवस्था का ही, जिसका हमने पूर्व में सङ्केत कर दिया है । मानव, और मानवेतर पश्वादि प्राणियों की जीवन-पद्धति सर्वथा विभिन्न ही मानी गई है, जिसे तत्रैव हमने क्रमश: संकरजीवनव्यवस्था, एवं विभक्ता जीवन- -व्यवस्था नाम से व्यवहृत किया है ( देखिए पृ ० सं ० ४५ ) । काल - दिक - देश - अनुबन्ध से मानव की तथोक्ता आवश्यकताएँ जबतक विभक्तरूपेण व्यवस्थित नहीं होजातीं, किंवा समाजशास्त्रियों के द्वारा व्यवस्थित नहीं करदीं जातीं, तजतक ये सभी आवश्यकताएँ परस्पर सङ्क्रान्त होतीं हुईं सङ्करभाव से ही अनुगत रहतीं हैं, जिस संकरव्यवस्था को तो पशुजोत्रनपद्धति ही माना गया है । तो आइए! अब हम यह देखें कि, ऋषिप्रज्ञाने उद्घोषित – उपयोगिताओं का काल - दिक् देशानुबन्ध से किस प्रकार विभक्त - रूपेण - व्यव-स्थापन किया है? | तदाधार पर ही हम भारतीय मानव की तथोक्ता आवश्यकताओं को - ' व्यवस्थित - जीवन-पद्धति ' से समन्वित करने का प्रयास करेंगे । आत्मा, और तदनुबन्धी- ' मोक्ष ' नामक उपयोग की चर्चा थोड़ी देर के लिए इसलिए विस्मृत कर देते हैं कि, आज के भौतिक - जनजीवन को - आत्मा - और मोक्ष शब्द प्रिय नहीं लग रहे । शेष रह जाते हैं. मानव के काल - दिक् - देशात्मक - बुद्धिः -मनः शरीर - नामक तीन प्राकृत पर्व, जिनकी मान्यता में सम्भवतः आज ११२

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शतपथ - प्रथमखण्ड के जनजीवन को भी कोई आपत्ति नहीं है । मानव के इन तीनों प्राकृत पर्वों का प्रकृति के प्रत्यक्ष - दृष्ट - सुप्रसिद्ध कालात्मक सूर्य्य, दिगात्मक चन्द्रमा, एवं देशात्मक भूपिण्ड, इन तीन पर्वों से क्रमिक सम्बन्ध है, यह और मान लेना चाहिए प्रकृतिवादी को । तीनों हीं पर्व प्रत्यक्ष में पिण्ड ' रूप से दिखलाई दे रहे हैं । क्या इस पिण्डसीमा में हीं इनके स्वरूप-परिसमाप्त हैं? | नहीं | हम देख रहे हैं कि, सूर्य्यपिण्ड को केन्द्र बना कर चारों ओर एक आलोक - मण्डल-प्रकाशमण्डल और परिव्याप्त है । एवमेव चन्द्रपिण्ड को आधार बना कर भी चन्द्रिका मण्डल ( चाँदनी ) परिव्याप्त है | यही स्थिति उस भूपिण्ड की समझिए, जिस पर आप हम सब बैठे हैं, चल फिर रहे हैं । इस भूपिण्ड को केन्द्र बना कर इसके चारों ओर भी एक पार्थिव - मण्डल - परिव्याप्त है, जिसकी व्याप्ति की सीमा वैज्ञानिक – महर्षियोंनें सूर्य्यपिण्ड से भी कुछ ऊपर तक मानी है, जोकि अपने कृष्णमृगाग्निधर्म्म से हमें प्रतीत नहीं होरहा सौर- चान्द्र - मण्डलवत् । तदित्थं तीनों हीं इन पिण्डों के तीन स्वतन्त्र मण्डल और बन जाते हैं, जिह्न ' महिमामण्डल ' भी कहा जाता है । यों प्रत्येक में पिण्ड, और ' मण्डल ', ये दो दो विचर्त्त होजाते हैं । वेदविज्ञानने इन तीनों मण्डलों का क्रमश: - ' सम्बत्सरमण्डल ', ' परिप्लव मण्डल ', ' इला - दमण्डल ', यह नामकरण किया है । तीनों पिण्ड भूतप्रधान हैं, तो तीनों मण्डल प्राणप्रधान हैं । इसप्रकार तीन के ६ विवर्त्त होजाते हैं । इनमें से कालात्मक सूर्य्यपिण्ड से ही ' ज्ञानशक्ति ' की अभिव्यक्ति मानी है ऋषिने, जिसका साङ्केतिक नाम है - ‘ ब्रह्मवर्चस् ' । एवं कालात्मक - सौर - सम्वत्सर मण्डल से ही यशः प्राणात्मिका कीर्त्ति की अभिव्यक्ति मानी है । तथैव दिगात्मक चन्द्रपिण्ड से पशुभाव की, एवं दिगात्मक - चान्द्र - परिप्लत्रमण्डल-से ‘ प्रजाभाव ' की स्वरूप - निष्पत्ति होती है । एवमेव देशात्मक भूपिण्ड से ' अन्नभाव ' की, तथा देशात्मक -पार्थिव - इलान्दमण्डल से ' अन्नादभाव ' की स्वरूपाभिव्यक्ति मानी गई है । यों ६ काल - दिग् - देश - विवत्त मे क्रमशः १ – ब्रह्मवर्चस्, २- कीर्त्ति, ३ - पशु, ४ - प्रजा, ५ - अन्न, ६ - अन्नाद, ये ६ ही दिग्देशकालात्मक– भाव अभिव्यक्त हैं । इन छात्रों से समन्वित इन सूर्य्य - चन्द्र - भू - विवत्तों से ही मानवं के प्राकृत - स्वरूप के-बुद्धि, मन, शरीर नाम के तीन पर्व अभिव्यक्त हुए हैं । अतएव संसिद्ध है कि, ब्रह्मवर्चस् - नामक ज्ञान, और कीर्त्ति का सौरी बुद्धि से, पशुभाव, और प्रजाभाव का चान्द्र मन से, तथा अन्न, और अन्नाद ( भोग्य, और भोक्ता ) का पार्थिव शरीर से ही क्रमिक सम्बन्ध होरहा है । और इन क्रमसिद्धा ६ नों लोकविभूतियों की सीमा में राष्ट्रीय - मानव की उच्चघोषणा से अनुप्राणित वे सभी आवश्यकताएँ समाविष्ट होरहीं हैं, जिनके आधार पर राष्ट्रमानव का आज का उपयोगितावाद प्रतिष्ठित है । यह संस्मरणीय, एवं सर्वात्मना अविस्मरणीय है कि, प्रकृति की व्यवच्छेदात्मिका व्यवस्था स्वयं प्रकृति के द्वारा ही कदापि सम्भव नहीं है । दूसरे शब्दों में- दिग्देशकालानुबन्धी- भावों की क्रमव्यवस्था कभी स्वयं दिग्देशकालभावों से सम्भव नहीं है । व्यवहारभाषादृष्ट्या - बुद्धि - मनः - शरीर - मात्र के माध्यम से कदापि बौद्धिक - मानसिक - शारीरिकभाव व्यवस्थित - नियन्त्रित - क्रमसिद्ध नहीं बने रह सकते, जिसका हम भावुकतापूर्ण अपने प्राकृत जीवन में प्रत्यक्ष कर लेते हैं । आत्मनियन्त्रण से पृथक् होजाने वाले हमारे ये तीनों हीं तन्त्र एक साथ – सम्मिलितरूप से सहैव सभी कुछ जानने - भोगने - करने कराने के लिए आतुर होपड़ते हैं । ज्ञान - कीर्ति - पशु - प्रजा - भोग्य - भोक्ता - आदि का क्रमानुगत- कालसापेक्ष - विच्छेदरूप निलम्ब सह्य होता ही नहीं केवल प्रकृतिपरायण मानव के लिए । ऋषिदृष्टि ने प्रकृति के इस मर्म्म को, इसकी सङ्करतानुगता ११३

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श्रमनिवेदन सहज भावुकता को समझा था, परीक्षण किया था । एवं तदनन्तर ही इसके मूल में दिग्देश-कालातीत वह ' आत्मभाव ' प्रतिष्ठित किया था, जिस में हीं क्रमसिद्धा - व्यवस्था के नियन्त्रण नियमन एवंळ ं सञ्चालन की शक्ति रहती है । दिग्देशकालातीत वैसा आत्मभाव ही दिग्देशकालात्मिका बुद्धिमनःशरीर - व्यवस्थाओं को व्यवस्थिता जीवन पद्धति से समन्वित रखता 1 पुरुष ( आत्मा ) सेही प्रकृति का नियन्त्रण सम्भव है । विगत तीन सहस्र वर्षों के अधःपतनात्मक - श्रनात्मयुगों से यही तो वह महा-भूल होती रही है कि, मानव केवल बुद्धि के बल पर ही सब कुछ व्यवस्थित करने से लिए आतुर बना हुआ है । आत्मनिष्ठाशून्य - अनात्मवादात्मक बुद्धिवादरूप - प्रकृतिवादने हीं हमारा त्रिसहस्रवार्षिक - अधःपतन कराया है दिग्देशकालानुबन्धिनी उपयोगिताओं को सङ्करभाव में परिणत करते हुए । आज जिन्हें ' उपयोगी ' माना जारहा है, वे ही उपयोग वेदादिशास्त्रों से अनुप्राणित हैं । मानवहितानुबन्धिनीं उपयोगिताओं के सम्बन्ध में मानव अन्यथा कल्पना कर भी कैसे सकता है । अन्तर केवल यही है कि, वेदशास्त्र दिग्देश -कालानुबन्धिनी - मानवीया - प्राकृत - उपयोगिताओं - आवश्यकताओं के मूल में श्रात्मनियन्त्रण अपेक्षित मानता है इनकी क्रमबद्धा - सुव्यवस्था के लिए, जबकि हम उसकी उपेक्षा कर प्राकृत - मान्यताओं के आवेश में आकर इन उपयोगिताओं में वैसा साङ्कर्य ही उत्पन्न कर लेते हैं, जो कि साङ्कर्य्यं श्रात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति से असंस्पष्ट, - अतएव केवल प्रकृतिपरायण पशुजगत् से ही सम्बद्ध माना गया है । मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के ' ब्राह्मण ' भाग में कर्त्तव्यकर्म्मात्मिका इस आचारनिष्ठा का ही प्रतिपादन हुआ है, एवं वही आाचार ' विधि ' नाम से प्रसिद्ध है जिसका अनारभ्याधीतविधि, आरभ्याधीतविधि, सामान्यविधि, रूप से त्रिधा वर्गीकरण हुआ है । इन तीनों विधियों की मूलप्रतिष्ठा विभिन्न ' सृष्टिविज्ञान ' हैं, जो विज्ञान ' उपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध है | अनारम्याधीता पुरुषार्थविधियों से सम्बन्ध रखने वाले प्रशिक विज्ञानोपनिषदों का, तथा श्रारभ्याधीता. क्रत्त्वर्थविधियों से सम्बन्ध रखने वाले सम्पूर्ण विज्ञानोपनिषदों का ` नो तद्विध – कम्र्मों के साथ विधिभाग में हीं स्वरूप - निरूपण होगया है । एवं बोधसौकर्य की दृष्टि से अनारभ्या-धीतविधियों के ज्ञानानुगत यांशिक विज्ञानोपनिषदों का, तथा सामान्य विधियों के अध्यात्मप्रधान - ज्ञानप्रधान-विज्ञानोपनिषदों का ऋषिप्रज्ञा के द्वारा जो स्वतन्त्र रूपेण संकलन होगया है, वही स्वतन्त्र विभाग आरण्य-कोपनिषत्, किंवा ' उपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध होगया है, जो वस्तुतः विध्यात्मक ब्राह्मणभाग का ही पूरक अंश है । तभी तो त्रिध्यात्मक शतपथब्राह्मण के अन्तिम ( चौदहवें ) काण्ड को - ' बृहदारण्यकोपनिषत् ' नाम से व्यवहृत करना अर्थ प्रमाणित होरहा है * । उक्त निवेदन से स्पष्ट यही करना है कि, विधि - आरण्यक उपनिषत्, नाम से लोकसामान्य में त्रिधा विभक्त वेदभाग वस्तुतः एक ही वेदग्रन्थ है, जिस का समष्ट्यात्मक नाम है - ' ब्राह्मण ' । अतएव तीनों हीं वेदभाग अन्योऽन्याश्रित बने रहते हुए एक दूसरे के पूरक हैं । उपनिषद्वादी वेदान्तव्याख्याताओंने उप-निषत् - भाग को विध्यात्मक ब्राह्मणभाग से पृथक् कर जो शुद्ध ज्ञान - परकमन्वय कर डाला है, वह एका-न्ततः प्रौढिवाद ही बना रह गया है । मान्यता है सर्वसाधारण की कि “ उपनिबदों में तो केवल उस ' आत्म-* विस्तार के लिए देखिए - ‘ उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड ' एवं ' केनोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' का पारिभाषिक - प्रकरण । ११४

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शतपथ - प्रथमखण्ड ज्ञान ' की ही चर्चा है, जिस का लोक - संसार से कोई सम्बन्ध नहीं है " । इसी भ्रान्तिने उपनिषदों की आचारप्रधाना - विज्ञानविद्याओं के, तत्सहैव व्याससूत्रग्रन्थ के तथा तत्सहैव गीतोपनिषत् ( श्रीमद्भग-वद्गीता ) के, इस प्रस्थानत्रयी के प्रचारात्मक पक्ष को सर्वथा ही अन्तम्मुख प्रमाणिस कर दिया है । सच-मुच ही तो यह आश्चर्य्यं की ही बात है कि, आत्मनिष्ठा - प्रतिपादक जो उपनिषच्छास्त्र आत्मस्वरूप – समन्वय के साथ साथ मानव की पूर्वोक्ता बडूविधा आवश्कताओं, उपयोगिताओं, एवं दिग्देशकालानुबन्धिनी कर्त्तव्यनि-ष्ठात्रों का भी यत्र तत्र संक्षेप, तथा विस्तार से स्वरूप - विश्लेषण कर रहा है, उस आचारपक्ष को, लौकिक-उपयोगिता - पक्ष को दिग्देशकालानुबन्धिनी प्रकृतिदेवी के अन्यतम शत्रु जगन्मिथ्यात्त्ववादी - वेदान्ताभिनिवे-शाविष्टोंनें सर्वथा ही अभिभूत कर लिया है, जिस इस अभिभूति के कारण हीं वेदशास्त्र का " लोकोपयोगी-पक्ष ” आज राष्ट्रीय - जनमानस के लिए सर्वथा विस्मृत ही होचुका है । अलौकिक ज्ञानमात्र में श्रभिनिविष्ट, लोकस्वरूप - विस्मृत - वैसे वेदान्तियों के, तथा अव्यवस्थित - प्राकृत - सङ्करभावानुगत - अस्तव्यस्त - उपयोगीभावों के अनुगामी आत्मस्वरूप - विस्मृत - आज के उपयोगितावादियों के परितोष के लिए ही हमें इस ' लोकोपोय-गोगिता ' - जैसे अकिञ्चित्कर - पक्ष का संस्मरण करना पड़ रहा है, नत्र कि श्राचारनिष्ठात्मिका कर्तव्यनिष्ठा के प्राङ्गण में ऐसे संस्मरणों का यत्किञ्चित् भी महत्त्व नहीं है । निम्न लिखित - उपनिषद्वचन, तथा तदर्थस्वरूप विश्लेषक – परिलेख के माध्यम से अब उहें, और इहें स्वयं हीं मुकुलितनयन बन कर इस तथ्य का अपनी ऋजुप्रज्ञा से ही समन्वय कर लेना चाहिए कि, न तो वेदशास्त्र केवल परलोकचिन्तन का ही विषय है,. नैव वेदशास्त्र में केवल भूतोपयोगिताओं का ही यशोवर्णन हुआ है । अपितु वेदशास्त्र तो वैसा ‘ सर्वशास्त्र ’ है, जिस में मानव की निष्कारणभावात्मिका दिग्देशकालातीता अलौकिक उपयोगिताओं का भी स्पष्टीकरण हुआ है, तो तत् - सहैव कार्य्यकारणभावनिबन्धना - दिग्देशकालात्मिका लौकिक - उपयोगिताओं का भी पद्धति-पुरस्पर यशोवर्णन हुआ है । तभी तो सर्वकालोपयोगी, सर्वसंसाधक इस सनातन - वेदशास्त्र के सम्बन्ध में राजर्षि मनुके द्वारा - ' सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति ' यह उद्घोष हुआ है, इत्यलमतिपल्लवितेन – उपयोगितावादात्मकेन-अकिञ्चित्करप्रसङ्ग ेन नितान्तभावुकतापूर्णेन । आनन्दो ब्रह्म ेति व्यजानात् । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रति-ष्ठिता । य एवं वेद, ( सः ) प्रतितिष्ठति ( लोके प्रतिष्ठितो भवति ), अन्नवान् भवति ], अन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन [ ज्ञानेन ] | महान् [ भवति ] की ( यशसा ) | — तैत्तिरीयोपनिषदि ११५

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श्रात्मनिवेदन २ २- यशोऽनुगताः – सम्वत्सरानुगताः - अर्कात्मिका धियः १- पशुभावानुगतं - चन्द्रपिण्डानुगतं - उक्थात्मकं - मनः १ - अन्नभावानुगतं - भूपिण्डानुगतं - उक्थात्मकं शरीरम् ११६ सौरभावद्वयी काला-त्मिका चन्द्रभावद्वयी पार्थिवभावद्वयी-देशात्मिका कालात्मिका बुद्धिः सौरी } दिगात्मकं ममश्चान्द्रम् } देशात्मकं शरीर ं पार्थिवश् १- कालात्मकः - सूर्य्यः ( पिण्ड: ) ततः ब्रह्मवर्चस्वाभिव्यक्तिः ( ज्ञानम् १ ) १ - कालामकः - छाबासरः ( पण्डकम् ) ततः - पच - प्राणामिव्यकि: ( क्षा: २ ) } १ - दिगात्मकः - चन्द्रमा: ( पिण्डः ) ततः -- पशुभावाभिव्यक्ति: ( पशवः ३ ) २ - दिगात्मकः – परिप्लवः ( मण्डलम् ) ततः - प्रजाभावाभिव्यक्तिः ( सन्ततिः ४ ) ∫ दिगात्मिका १ - देशात्मकः -- भूपिण्डः ( पिण्डः ) ततः -- अन्नभावाभिव्यक्तिः ( अन्नम् ५ ) २ - देशात्मकम् - इलान्दम् ( मण्डलम् ) ततः-- अन्नादभावाभिव्यक्तिः ( भोक्तारः ६ ) ११ - ब्रह्मवर्चस्वानुगता - सूर्यपिण्डानुगता - उक्थात्मिका बुद्धिः २२ - प्रजाभावानुगताः - परिप्लवा नुगताः - अर्कात्मिका: - कामभावाः २ - अन्नादभावानुगताः - इलान्दानुगताः - अर्कात्मिकाः भोक्तृभावाः