Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 21–30

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30

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शतपथ - प्रथमखण्ड जनित विषयात्मक फल ही इसकी मानसिक - चर्व्वणा के प्रमुख उपास्य बने रहते हैं । फलात्मक विषयों के सतत अनुध्यान से उत्पन्न होने वाली भूतानुशयरूपा विषयात्मिका जड़ता मानवीय मन को उत्तरोत्तर अधिकाधिक कर्मापेक्षया तत्फलरूप विषयों के साथ ही श्राबद्ध करती जाती है । इसी बन्धन का नाम है- ' आसक्ति ', इसी का नाम है - गीतापरिभाषा में - ' सङ्ग ' -- ' ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ' । काल्पनिक – फलात्मक विषयों का निरन्तर मानसिक चिन्तन कालान्तर में मानव के स्नेहगुणक मन में तद्विषयों के साथ एक प्रकार का आकर्षणात्मक ' बन्धसम्बन्ध ' उत्पन्न कर दिया करता है, जो कि - ' सङ्ग ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी को वैज्ञानिक परिभाषा में कहा गया है – ' उक्थ ', एवं लोकव्यवहारभाषा में कहा गया है – ' मूलबिम्ब ' । विषयों के साक्षात्कार से जैसे विषयसंस्कार उत्पन्न होजाते हैं, तथैव विषयों के काल्पनिक चिन्तन से भी कालान्तर में विषयसंस्कार उत्पन्न होजाते हैं । ये ही विषयसंस्कार दर्शनभाषा में - ' वासना ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन वासना संस्कारों की पुञ्जीभूता - राशिभूता अवस्था का ही नाम है - ' उक्थ ' । श्रारम्भ– दशा में अवश्य ही वासनासंस्कार पुञ्जीभूत नहीं होते । किन्तु अनुध्यान के नैरन्तर्य से सञ्चित संस्कार – पुटों की परम्परा से कालान्तर में निश्चयेन उन संस्कारों का एक स्तूप बन जाता है । उक्थात्मक इस स्तूप के निष्पन्न होते ही इस उक्थपुञ्ज से उसी प्रकार अर्करूपा रश्मियाँ निकल पड़तीं हैं, जैसे कि सूर्य्यत्रिम्ब से, किंवा दीपविम्वरूप उक्थ से अर्कात्मिका रश्मियाँ निकल रहीं हैं । अर्कात्मिका इह्रीं रश्मियों का नाम है-' काम ', कामना, इच्छा । सङ्गात्मक संस्कारोक्थपुञ्ज ही इन कामनाओं का अनक बनता है । अतएव आगे चलकर भगवान् ने कहा हैं - ' सङ्गात् सञ्जायते कामः ' । अमुक विषयात्मक फल का मानवने निरन्तर चिन्तन किया, इस चिन्तन से तद्विषयक वासनापुट मन पर लगते गए । जत्र वासनापुर सिद्धावस्थापन्न होगए, तो तत्काल उस मानवीय मन में तत्काल्पनिक फल के भोग की इच्छा जाग्रत होपड़ी प्रबल वेग से, - ' सङ्गात् सञ्जायते कामः ' का यही समन्वय है । परिणाम क्या होता है इस कामना का? | सुनिए! इच्छा मात्र से ही तो तत्फल प्राप्त नहीं होजाया करता । और फिर इस विश्व में केवल आप ही तो तत्फल की इच्छा नहीं करते । असंख्य व्यक्ति इसी फलकामना से समातुर हैं । ग्रवश्य ही उनमें कतिपय वैसे भी महद्भाग्यशाली कर्म्मठ व्यक्ति विद्यमान हैं, जो इच्छानुरूप कर्म्म के ही अनुगामी बने रहते हैं | निश्चयेन केवल फलेच्छु, तथा कर्म्मशून्य के समतुलन में वह कर अपनी इच्छा को मफल बना लेता है, और कर्म्मशून्य महाभांग प्रबल इच्छा रखते हुए भी तत्फल से वञ्चित ही बने रह जाते हैं | इस फलवञ्चना से फलवञ्चित इन अकर्मण्य महाभाग के मनस्तन्त्र में फल से समन्वित कर्म्मठ के प्रति निष्कारण हीं ईर्ष्या जाग्रत होपड़ती है । भ्रान्तिवश ये ऐसा भी मान बैठते हैं कि, “ यदि अमुक न होता, तो वह फल मुझे ही मिल जाता " । इसी कल्पना के आवेश से इनमें इर्ष्या रित होपड़ती है प्रायः सभी फलभोक्ताओं के प्रति । अतएव ये सभी की समृद्धि के सहजशत्रु ही बन जाते हैं । इसी का नाम है- ' हीन -. ग्रन्थिता ' । परसमृद्धि- परविद्या - परऐश्वर्य्यादि से संतप्त बनते रहना हीं इनका प्रमुख अध्यवसाय बन जाता है । फलानुगता यही ईर्ष्या कालान्तर में इनके समूल विनाश का ही क्योंकि कारण बन जाया करती है, अतएव परमकारुणिक ऋषियोंनें ) । मानव को श्रादेश दिया है कि - - ' ' हेतावीर्ष्या, फले नेर्ष्या ' ( चरकसंहिता तात्पर्य्य स्पष्ट है | यदि मानव का स्वभाव जन्मान्तरीय संस्कार ( कुसंस्कार ) वश ईर्ष्यालु है, तो इसे अपनी इस ईर्ष्या का सदुपयोग दूसरों की फल समृद्धि, ऐश्वर्य्यवृद्धि के साथ न कर उनकी समृद्धि के कारणों के साथ ही १७

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श्रात्मनिवेदन करना चाहिए । अर्थात् जिन हेतु उपाय - कर्त्तव्यनिष्ठादि से उहें ऐश्वर्य्यादि फल मिले हैं, उन उपायों, कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठात्रों से ही इसे ईर्ष्या करनी चाहिए, अर्थात् तदनुरूप कर्त्तव्यकम्मों में हीं प्रवृत्त होनाना चाहिए । निश्चयेन हेतुनिबन्धना इस ईर्ष्या से यह भी तत्फलसमृद्धि का भोक्ता बन सकता है । यदि महर्षि चरक के आदेश की उपेक्षा कर अपनी कर्म्मशून्या, अतएव भाग्यहीना अकर्म्मावस्था, अथवा तो श्रासुर - असत् - कर्म्मावस्था से ही इह्नोंने फलकामना की चर्व्वणा प्रक्रान्त रक्खी, तो निश्चयेन इनका मन फल समृद्धिशाली सभी इतर व्यक्तियों की फलसमृद्धियों के प्रति सर्वात्मना ईर्ष्यालु ही बन जाता है । इसी ईर्ष्या से इनका शारीरिक - अग्नि प्रायः सदा ही संतुच्ध बना रहता है । शारीरिक संक्षोभ - जनित इसी ताप का नाम है - ‘ आवेश, उत्तेजना ' । यही उत्तेजना निःसीमावस्था में परिणत होती हुई - ' क्रोध ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । यों फलकामजनिता ईर्ष्या से उत्पन्न संक्षोभरूप क्रोध ही इनके पतन का तीसरा सोपान बन जाता है, जिसे लक्ष्य बना कर ही भगवान् ने आगे जाकर कहा है कि- ' कामात् क्रोधोऽभिजायते ' । पतन की सीमा क्रोध पर ही परिसमाप्त नहीं होजाती । अपितु अग्नि- समुत्तेजनात्मक ताप – सन्ताप-धर्मा यही क्रोध कालान्तर में मन की सहज स्थिरता को भी विकम्पित कर देता है । चान्द्र - सोमरस ऋतधर्म्मा बनता हुआ प्राप्य है, सलिलधर्म्मा है । पानीयपिण्डात्मक चन्द्रमा से अन्न के द्वारा उत्पन्न होने वाला चान्द्र सोमान्नरूप मन एकप्रकार का ऋतधर्म्मा तरल पदार्थ है । जिसप्रकार प्रात्यन्तिक अग्नि के संयोग से पात्रस्थ पानी उबल पड़ता है, तथैव स्रीवि नामक दिगछन्दोरूप पात्र में भरा हुआ मनोरस श्रावेशजनिता अग्नि की समुद्दीप्ति से उबल पड़ता । फलतः मनोरस का शान्तिमय सहज - प्रवाह अभिभूत होजाता है । शान्त-प्रवाह की अभिभूति से मन का उद्विग्न होजाना स्वाभाविक है । इस क्षोभरूप उद्वेग से मन में अमनरूप ' वैचित्यभाव ' का उदय होजाता है, जोकि वैचित्य ही - ' मोह ' कहलाया है । फलासक्त - विषयसङ्गी - कामकामी --क्रोधाविष्ट मानव का मन यों क्रोधानन्तर सर्वात्मना महामोहग्रस्त ही बन जाता है । मन की शान्ति से सम्बन्ध रखने वाली अस्थिरता ही ' मोह ' का स्वरूपलक्षण है, जिसके कारण क्रोधाविष्ट इस फलमात्रे'सु कर्म्मण्य का मन कदापि किसी भी एक निश्चित धरातल पर प्रतिष्ठित हो ही नहीं सकता । पूर्वक्षण का अभीष्ट उत्तरक्षण में त्याज्य, किंवा उपेक्षणीय ही बन जाता है । प्रतिक्षण परिवर्तन, तद्रूपा श्रात्यन्तिकी परिवर्त्त'न--शीलता इसी मानसिक -- मोह के दुष्परिणाम हैं, जिस मोह का जनक अग्नितापात्मक क्रोध ही माना गया है । पतन के इसी चतुर्थ सोपान का क्रमिक दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् ने कहा है – ' क्रोधाद् भवति सम्मोहः ' । बतलाया गया है कि, मन पर विषयचिन्तन से, फलचर्व्वणा से वासनात्मक अनेक -- संस्कारपुट खचित-सञ्चित रहते हैं, जोकि तदनुगता कामनाओं के जनक बना करते हैं । इन वासनासंस्कारों का एक क्रम रहता * चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि । -श्रुतिः तरणिकिरणसङ्गादेपपानीयपिण्डो दिनकरदिशि चञ्चच्चन्द्रिका भिश्चकास्ते । - सिद्धान्ततत्त्वविवेक १८

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शतपथ - प्रथमखण्ड है मनोधरातल पर | उसी क्रमानुपात से तत्तदवसरों, स्थिति - परिस्थितियों में दिग्देशकालानुबन्ध से तत्तत् मानसिक संस्कार अभिव्यक्त - उबुद्ध होते रहते हैं, जिस इस संस्कारोद्बोधन को ही - ' स्मृति ' ( स्मरण, याद् आपड़ना, कहा जाता है । क्रोधावेश से जब मन विक्षुब्ध होजाता है, तो मानसिक सोमरस आलोड़ित-विलोड़ित होपड़ता है, जिसे हमनें ' मोह ', किंवा - ' सम्मोह ' कहा है । परिणाम आगे चलकर संक्षोभात्मक इस मोह का यही होता है कि, मनोधरातल पर सञ्चित वासनासंस्कारों का यथाव्यवस्थित क्रम अस्तव्यस्त हो जाता है । सभी संस्कार प्रचण्ड मोहात्मक इस परिभ्रमण से परस्पर एक दूसरे में निमज्जित होते हुए स्वव्य--वस्थाक्रम से तिरोहित होजाते हैं । अतएव कदापि सम्मोहनानन्तर यथाक्रमरूपा ' संस्कारस्मृति ' ( स्मरणशक्ति ) सुरक्षित नहीं रह सकती । और यों सम्मोह की कृपा से ही इस फलेप्सु के मनस्तन्त्र में ' स्मृतिविभ्रम ' नामक महान् दोष व्यक्त होपड़ता है, जिसकी कृपा से इसे यह भी भान नहीं रहता कि, इसने पूर्वक्षण में क्या कहा था, वर्त्तमान क्षण में यह क्या कह रहा है, एवं उत्तरक्षण में यह क्या कहने वाला है । अपितु एक उन्मत्त - प्रमत्त प्रलापी की भाँति अनर्गलरूपेण बिना सोचे समझे यों हीं, निरर्थक ही श्रावेशपूर्वक अस्तव्यस्त रूप से यह कुछ भी बोलता -- करता रहता है । पतन के इसी पञ्चम सोपान का क्रमिक स्वरूप - दिग्दर्शन कराते हुए भग--वान् कहते हैं — ' सम्मोहात्- स्मृतिविभ्रमः ' । ' स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना सम्परिष्वक्तः ' के अनुसार ' प्रज्ञानात्मा ' नामक मानवीय चान्द्र ' मन ' ‘ विज्ञानात्मा ' नाम की सौरी ' बुद्धि ' से नित्य समन्वित रहता है । आधिदैविक विश्व में जो स्थान ‘ सूर्य्याचन्द्रमसौ ’ का है, मानव की अध्यात्मसंस्था में वही स्थान विज्ञानबुद्धि, तथा प्रज्ञानमन का है । प्रज्ञानमन हीं स्नेहगुणक, अतएव ' वीध्रगुणक ' ( प्रतिबिम्बग्राहक ) वह समधरातल है, जिस पर सूर्य्यरूपा विज्ञान बुद्धि प्रतिविम्बरूपेण प्रतिष्ठित, एवं अभिव्यक्त रहा करती है । सहजभाषा में - मन हीं बुद्धि का स्वरूपाधार हैं । अतएव मन की स्थिति के तारतम्य से ही तत्प्रतिष्ठिता बुद्धि की सम - विषम अवस्थाएँ होतीं रहतीं हैं | यदि प्रतिविम्बाधारभूत मन स्थिर शान्त रहता है, तो यही मन की ' स्वस्थता ' ( स्वस्वरूपस्थिति ) कहलाई है । ऐसे स्वस्थ - स्थिर - शान्त मन में उसी प्रकार प्रतिबिम्बभूता बुद्धि अपने स्वरूप से स्थिरा -- शान्ता बनी रहती है, जैसेकि पात्रस्थ शान्त - स्थिर नल में प्रतिविम्बित सूर्य्य स्थिर - शान्त बना रहता है । इसी स्थिति के लिए ' स्वत्ये चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' कहा जाता है । यदि मन शान्त - अस्थिर - चञ्चल - क्षोभयुक्त, अतएव सम्मोहात्मक, अतएव च स्मृतिविभ्रमात्मक बन जाता है, तो निश्चयेन तत्र प्रतिबिम्बिता बुद्धि भी भ्रान्ता - स्थिरा - चञ्चला, क्षोभयुक्ता, सम्मोहनसमन्विता, एवं विवेकशून्या बन जाया करती है । और यों स्मृतिविभ्रम ही कालान्तर में मानव के बुद्धिस्वरूप अभिभव का कारण बन जाता है, जिस बुद्धयभिभव को मानव के सर्वनाश का ही श्रामन्त्रण माना गया हैं । मन की समा, विषमा स्थिति के मेद से ही बुद्धि का धर्म्म व्यवसाय, अव्यवसाय, भेद से दो भागों में विभक्त होजाया करता है । निश्चित - निर्णयात्मक - स्थिर - एकत्त्वनिबन्धन धर्म का ही नाम ' व्यवसाय ' है, एवं अनिश्चित, अनिणेयात्मक अस्थिर -- नानात्त्वनिबन्धन धर्म का ही नाम ‘ अव्यवसाय ' है । भगवान् ने यही स्वरूप - परिभाषा की है व्यवसाय - व्ययसाय की । देखिए!

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन! ।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥

-गीता १६

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आत्मनिवेदन ' व्यवसाय ' का ‘ एकबुद्धि ' से सम्बन्ध है, एवं इसे ही ' निष्ठाबुद्धि ' कहा जासकता है, जिसका परि-णाम माना गया है * ‘ य एवेदमिति ब्रत्रत्'- ' इदमित्थमेव - नान्यथा ' यह । अर्थात् व्यवसायात्मिका बुद्धि अपने सहज स्वरूप से अभिव्यक्त रहती हुई प्रत्येक कर्त्तव्य का निश्चयात्मक एक ही निर्णय कर लेने में समर्थ बन जाती है । ठीक इसके विपरीत अव्यवसाय का ' अनेकबुद्धि ' से सम्बन्ध है, एवं इसे ही - ' भावुक -बुद्धि ' कहा जासकता है, जिसका परिणाम, किंवा दुष्परिणाम माना गया है-- ' इदं वा स्यात् ' - इदं वा स्यात् ' इदमपि न स्यात् ' यह । अर्थात् अव्यवसायात्मिका बुद्धि अपने सहजस्वरूप से मूर्च्छित बनी रहती हुई बहुशाख-युक्ता ही प्रमाणित होती रहती है । अतएव यह प्रतिक्षण- विलक्षणा काल्पनिक योजनाएँ बनाने में हीं परिसमाप्त होजाती है | कदापि ऐसी बुद्धि से निश्चित कर्त्तव्यनिष्ठा का निर्णय सम्भव नहीं बन सकता । पात्रस्थ जल के विकम्पित होते तत्र प्रतिबिम्बित सौर आलोक समूहात्मक - एकीभाव से वञ्चित हो खण्ड - खण्ड रूप में परि-णत होजाता है । इस खण्डता को ही हम प्रतिबिम्ब - स्वरूप का विनाश कहा करते हैं, जिस विनाश का प्रत्यक्ष भग्न -- खण्ड -- खण्डित दर्पण से किया जा सकता है । ठीक वैसी सी ही स्थिति स्मृतिविभ्रम से होजाती हें । एकभावापन्ना बुद्धि नानाभावापन्ना बन जाती है । फलतः ऐसी अनेक बुद्धियाँ अपने समूहात्मक मूलचिम्ब की घनशक्ति से वञ्चित रहती हुई अपने खण्डखण्डात्मक एक एक रश्मिभाव से कदापि निर्णय पर नहीं पहुँच सकती । फलतः स्मृतिभ्रंशमूला इत्थंभूता नष्टबुद्धि से मानव किसी भी कर्त्तव्यक्षेत्र में न तो चिरकाल-पर्य्यन्त स्थिर ही रह सकता, और अतएव च न इसे कुत्रापि सफलता ही मिल सकती । पतन के इसी षष्ठ सोपान का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् ने कहा है – ' स्मृतिभ्र ंशात् - बुद्धिनाशः । अत्र क्या शेष रह गया?, प्रश्न का अन्तिम उत्तर है - ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' । अर्थात् स्मृतिविभ्रम से जत्र मानव की बुद्धि सदसद्विवेक से पराङमुख होती हुई अव्यवसायभाव की अनुगामिनी बन जाती है, तो ऐसी अनिश्चयात्मिका, सर्वत्र सन्देह - शङ्का - कुशङ्का - भावान्विता - अनिर्णयात्मिका – खण्डखण्डात्मिका-बुद्धि किसी भी निश्चित - कर्त्तव्यपथ के साथ युक्त होने हीं नहीं पाती । अतएव ऐसे नष्टबुद्धि को - ' अयुक्त ' ही मान लिया गया है गीता में । बुद्धिनाश के कारण कर्ता व्यकम्र्म्म से युक्त मानव के लिए यही कह देना समीचीन होगा कि, उस में ' बुद्धि है ही नहीं ' । जत्र बुद्धि ही नहीं, तो भाव - भावना- क्रिया - लक्षणा प्राण-शक्ति उस में कैसे अभिव्यक्त होगी?, कदापि नहीं । जब भावनात्मिका प्राणशक्ति ही इस की प्रतिमूर्च्छित है, तो इसे प्राणशक्ति से अनुगत कर्त्तव्यनिष्ठा से उपलब्ध होने वाली सहज शान्ति कैसे प्राप्त होसकती है? । जब कर्त्तव्यपरायणतामूला सहजशान्ति ही नहीं, तो सुख की आशा इस बुद्धिशून्य के लिए केवल दुराशा ही बन जाती है, जैसाकि भगवान् के इन शब्दों से स्पष्ट है—

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य, नचायुक्तस्य भावना ।

नचाभावायतः शान्ति, रशान्तस्य कुतः सुखम् ॥

- सम्पूषन् विदुषा नय योऽञ्जसा अनुशासति ।

य एवेदमिति ब्रवत् ॥

२० — ऋक्संहिता

पृष्ठ 25

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शतपथ - प्रथमखण्ड “ कर्म्मशून्यस्य, कम्र्मणि- प्रयुक्तस्य, केवल फलकामुकस्य मानवस्य बुद्धिर्बुद्धिरेव न । इत्थं-भूतस्य - अयुक्तस्य भावनात्मिका प्राणशक्तिरेव नास्तिभावे परिणता भवति । प्राणशक्तिशून्यस्य शान्तेर-भावः । नित्य - अशान्तस्यैतादृशस्य बुद्धिहीनस्य नास्ति सुखलेशावसरः " इत्यर्थसङ्गति – मूलक उक्त वचन फलाधिकारबुद्धि समन्विता कामकामना का ही फलितार्थ है । फल में अधिकारबुद्धि कर बैठने वाला कदापि कर्त्तव्यकर्म में जागरूक नहीं रह सकता, तो कर्म में अधिकारबुद्धि रखने वाला कदापि फलासक्त नहीं जना करता । परिणामस्वरूप - फलासक्त, अतएव कर्म से युक्त बुद्धिशून्य भावुक मानव अहोरात्र फलच-र्व्वणा में हीं आसक्त होता हुआ दुःखप्रवर्त्तक बन्धनों से आपादमस्तक जहाँ आबद्ध रहता है, वहाँ फल की र से उपेक्षात्मक त्यागभाव रखने वाला, अतएव कर्म्म से युक्त बना रहने वाला व्यवसाय बुद्धिनिष्ठ मान-वश्रेष्ठ नैष्ठिकी शान्ति का अधिकारी बन जाता है, जिस इस तथ्य का ही निम्न लिखित श्लोक से स्पष्टी -करण हुआ है— युक्तः कर्म्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् प्रयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ - गीता ५ | १२ | कैसी दशा, किंवा महती ' दुद्दशा होजाती है तथाविध फलकामुक, अतएव अकर्म्मण्य की, किंवा विकर्म्मण्य की?, प्रश्न के समाधान का श्रत्र अवसर नहीं है । केवल दो शब्दों में हीं इस स्थिति का दिग्द-र्शन पर्याप्त होगा | अहोरात्र प्रमुखरूपेण तात्कालिक फल, किंवा लाभ का ही चिन्तन करने वाला स्वरूप-विमूढ मानवाधन सर्वप्रथम इस फलाधिकारवासना से प्रथम पुरस्कार में ' अयुक्तता ' ही उपलब्ध करता है । अर्थात् केवल लाभचिन्तक– फलमात्रविभोर मानव कदापि कर्त्तव्यकर्म्म के साथ युक्त नहीं होसकता । सुसूक्ष्मा प्राण-शक्ति से अनुप्राणिता कर्म्मशक्ति के योग से वञ्चित ऐसा आयुक्त कालान्तर में ' प्राकृत ' ही बन जाता | पाञ्च-भौतिक विश्व में कृमि - कीट - पक्षी - पशु, - चतुर्विध ये प्राणीसर्ग ही ' प्राकृतजीव ' कहलाए हैं, जिन का आत्म-स्वरूपाभिव्यक्तित्त्व से कोई भी सम्बन्ध नहीं है । अपितु प्राकृत - श्राहार- विहार - निद्रा - रति आदि भौतिक--विजृम्भणों में हीं अहोरात्र व्यस्त रहते हुए अपना यथाजात प्राकृत स्वरूप कालसमाप्ति पर समाप्त करते रहना हीं प्राकृतसर्ग का एकमात्र सम्पूर्ण जीवनेतिवृत्त है । आयुक्त मानव इसी प्राकृत - जीवनपद्धति का अनु · गामी बन जाता है, जो कि प्राकृत पश्वादि की जीवनपद्धति से ही सर्वात्मना समतुलित है, और यह ' प्राकृतता ' ही इस का द्वितीय पुरस्कार है । तृतीय पुरस्कार है - ' स्तब्धता ' | अपनी प्राकृत सीमा में अमर्य्यादित पशुओं की भाँति प्रचण्डरूपेण गर्जन -- तुर्ज्जन करते रहने वाला भी तथाविध प्राकृत बुद्धिशून्य मानव श्राकस्मिक-रूपेण समुस्थित प्रज्ञात्मक - बौद्धिक वातावरणों के सम्मुख सर्वथा उसी प्रकार स्तब्ध - कुण्ठित - हतप्रभ --शून्यं शून्यं ही बन जाता है, जैसे कि बौद्धिक पराक्रम के बल से एक सिंह भी पञ्जरबद्ध होकर शृगालवत् बन जाया करता है । चतुर्थ पुरस्कार है - ‘ शठता ' । जिसप्रकार प्राकृत प्राणियों में कोई सामाजिक-- अनुबन्धन नहीं है । केवल ' आहार ' को लेकर जहाँ इन में परस्पर हिंसा - वृत्ति जागरूक होपड़ती है, तथैव यह प्राकृत मानव अपने फलमुखानुत्रन्धी जघन्य स्वार्थ के माध्यम से अपने पिता -- भ्राता --बन्धु - वर्ग तक के साथ क्रूर बन जाता है | इसी क्रूरता से इस का प्रकृतिदत्त सहज श्रद्धारस मूच्छित होजाता है । और यों यह स्तब्ध —जड़मति-बुद्धिहीन - अविनीत - क्रूर - प्राकृत - मानव अपने श्रद्ध ेय वर्ग के प्रति भी प्रतिक्रियावादी बन जाता है । उन का २१

पृष्ठ 26

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श्रात्मनिवेदन अपमान करने में भी यह अपनी योग्यता? ही अनुभूत करता है । सर्वथा उच्छृङ्खल उद्दण्ड -- भावानुगता, श्रद्धाशून्या, विनयवञ्चिता, अनर्गलवाक् - चापल्यानुगता इस जड़ता का ' नाम है- ' शठता ' । पञ्च पुरस्कार है ' निकृतिभाव ' । निश्चित है कि, अयुक्त, प्राकृत, स्तव्ध, और शठ ऐसा हीन मानव न तो अपने परिवार में हीं सम्मान प्राप्त कर सकता, नापि इस की समाज में हीं कोई स्वरूप- प्रतिष्ठा अभिव्यक्त रहती । इस पारिवारिक, तथा सामाजिक अपमान से इस की तथोक्ता शठता आगे चल कर निर--तिशयरूपेण प्रचण्डतमा बन जाती है । फलस: यह परिवार - समाजादि के प्रति विद्रोही ही बन जाता है । कोई इस का ‘ अपना ' नहीं रह जाता । सभी इस के लिए हेय, उपेक्षणीय इसलिए बन जाते हैं कि, इसने अपने कुकर्मों से स्वयं को ही सत्र की दृष्टि में हेय, तथा उपेक्षणीय ही बना लिया है । इस प्रतिक्रिया के प्रति-शोध का अब इस की हीनंप्रज्ञा में इस के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रह जाता कि, यह सब का अपमान –तरस्कार - अवहेलना - भर्त्सना ही करता रहे । क्योंकि इस के स्वयं के प्रज्ञाकोश में श्रात्मवञ्चकतारूपा भर्त्सना के अतिरिक्त कुछ भी तो शेष नहीं रह जाता । इसी अपमान - तिस्कार - वञ्चना -- का नाम है-- ' निकृति ', जो शठता का ही प्रवृद्धरूप है । इसी शब्द के गर्भ में ' कृतघ्नता ' भी प्रतिष्ठित रहती है 1 । श्रपने बड़े से बड़े उपकारक, हितैषी, श्रा: मबन्धु, समाजबन्धु के उपकारों को क्षणमात्र में विस्मृत कर तत्प्रति कृतघ्न बन जाने वाला ऐसा शठ नराधम ही - ' नैकृतिक ' कहलाया है । कर्म्म से वियुक्तिरूपा अयुक्तता से प्राकृत ( भूतनीवनपद्धतिपरायण ), स्तब्ध ( नड़मति ) शठ ( उच्छ -ङ्खल ), तथा नैकृतिक त्रन जाने वाले इत्थंभूत नराधम के प्रज्ञाकोश में-- ' कर्त्तव्यकर्म्म ' जैसी कोई सुनिश्चिता जीवनपद्धति शेष नहीं रह जाती । अकरणीय असत्कर्म्म ' हों इस के लिए करणीय बन जाते हैं, जिन प्रकरणीय असत्कम्र्म्मो का समाज के प्रत्यक्ष - जीवन में कोई स्थान नहीं है । द्यत ( जुआ ), स्तेय ( चौरी ), सुरापान, मांसभक्षण, पर उत्पीड़न, आदि आदि आदि निन्द्य कर्म्म हीं इस प्रयुक्त के उपास्य बन जाते हैं, जिन का परोक्ष में हीं यह अनुगामी बना रहता है कुछ समय पर्य्यन्त, जब कि पतन की चरम सीमा पर तो ये सभी असत्कर्म्म भी उद्घोषित ही होपड़ते हैं । मानव अन्ततोगत्त्वा मानव है । अतएव इत्थंभूत सत्कम्मों में में रत रहता हुआ भी वह प्रच्छन्नरूपेण या ही बना रहता है इन कुकम्मों से । सहज - सत्प्रवृत्ति इसे यथा-समय निरुद्ध ही करती रहती है इन सत्कम्मों से । इस निरोध से ही यह सर्वात्मना इन हीनभावों के प्रति ( अमुक अवधि पर्य्यन्त, जबतक पतन पराकाष्ठा पर नहीं पहुँच जाता ) श्रात्मसर्पण नहीं करने पाता । फलतः बहुत सा समय बच रहता है इस के जीवन में । सत्कर्म्म का लक्ष्य रहता नहीं, असत्कम्र्मों में निरन्तर प्रवृत्ति अनेक कारणों से सम्भव नहीं । फलतः इस नैकृतिक- सर्वात्मना तिरस्कृत - श्रवमानित - भसित-नराधम का वह अधिक – समय सर्वथा निद्रा तन्द्रा भावानुगत ' आलस्य ' में हीं परिसमाप्त होता रहता है, और यही इस सत्कर्म्म शून्य का ' षष्ठ ' पुरस्कार है । और ग्रागे चलिए । मानलेते हैं - ' बलं सत्यादोजीय: ' इस तमोमूलक प्राकृत सिद्धान्त के अनुसार तमोगुणत्रंहुल ‘ द्य ूत - तस्करता - हिंसा - परपीड़न ' यादि असत् - निन्य कर्मात्मक भौतिक श्रासुरबलों से नराधमों को अभीष्ट पर्य्याप्त सम्पत्ति भी मिल जाती है, इस सत्संग्रह से इनका काम - मोग भी प्रवृद्ध बना रहता है । और यों देखने – मुनने में ये सुखी - समृद्ध से ही प्रतीत होने लगते हैं । किन्तु वस्तुस्थिति वास्तव में कुछ ऐसी २२

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शतपथ - प्रथमखण्ड है कि, इन भूत - समृद्धियों की विद्यमानता में भी इनका अन्तर्जगत् सदा असुन्तुष्ट, संक्षुब्ध, तथा विकम्पित ही बना रहता है | अनेक भीषण - समस्याएँ इहें अग्निज्वालावत् दग्ध ही करतीं रहतीं हैं, जिन से कदापि ये ' शान्ति ' लक्षण वास्तविक सुख के तो स्मरण का भी अधिकार नहीं रखते । सदा अशान्त, सदा असन्तुष्ट, सदा व्यग्र, सदा विनुच्ध, सदा अज्ञात - ज्ञात - भावों से विकम्पित, इन सब तथ्यों की समष्टि का नाम ही है-' विषाद ', जिसे हम इस कम्र्म्मशून्य का सप्तम पुरस्कार कहेंगे! विवादवृत्ति ही इह्नों अपने आसुर कम्मों में भी तन्द्रायुक्त ही बनाए रहती है । आज का काम महीनों में, महीनों का काम वर्षों में, इसप्रकार इनका प्रत्येक सत्कर्म भी चिरकालानुगत ही बना रहता है । क्योंकि सत्त्वत्रिरुद्ध इन असत्कर्म्मो में अपेक्षित उत्साह सम्भव ही नहीं है । श्रतएव उद्यम - साहस - धैर्य्य - बुद्धि-शक्ति - पराक्रम - आदि सद्गुणों के प्रतिद्वन्द्वी निद्रा तन्द्रा - भय - क्रोध- आलस्य- दीर्घसूत्रता आदि दुर्गुणों से नित्य आवेष्टित ये नराधम दीर्घसूत्री ही बने रहते हैं । इनका कोई भी काम कदापि समय पर नहीं होता । होता भी है, तो परिणाम में विषाद का जनक, अतएव सर्वनाश का प्रवर्त्तक । यही ' दीर्घसूत्रता ' इनका अष्टम पुरस्कार है | तदित्थं - ( १ ) - युक्तता, ( २ ) - प्राकृतता, ( ३ ) – स्तब्धता, ( ४ ) - शठता, ( ५ ) -नैकृतिकता, ( ६ ) –अलसता, ( ७ ) -- विषादता, और ( ८ ) - दीर्घसूत्रता, इन - ग्राठप्रकार के प्रमुख पुर-स्कारों से, तथा तत्सहयोगी परःशत अन्यान्य पुरस्कारों से सर्वात्मना पुरस्कृत फलाधिकारलिप्सु, अतएव कर्मा-• धिकारवञ्चित, तमोगुणत्रहुल मानवाधम - ' मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ' को ही अक्षरश: अन्वर्थ बनाते रहते हैं, जिन इन तथोक्त आठों पुरस्कारों का निम्न लिखित भगवद्वचन के द्वारा एकत्र संकलन होरहा है-प्रयुक्तः, प्राकृतः, स्तब्धः, शठो, नैकृतिको ऽलसः । विषादी, दीर्घसूत्री च कर्त्ता तामस उच्यते ॥ —गीता १८/२८ उक्त आठों पुरस्कारों में सर्वारम्भ का पुरस्कार है - ' प्रयुक्तता ', जिसका अर्थ है - ' शास्त्रसिद्ध अलौ-किक - लौकिक -- सत्कर्मों से पृथक् होजाना, एवं काल्पनिक फलों में अधिकारबुद्धि कर लेना ' । इसप्रकार एकमात्र फलाधिकारबुद्धि से ही मानव कर्त्तव्यनिष्ठा से वञ्चित होता हुआ इस प्रयुक्तता से अष्टविध पुरस्कारों से ही समन्वित होजाता है, जिनका सामूहिक परिणाम माना गया है - ' बुद्धिनाश ', जो कि स्मृतिविभ्रम से ही समुत्पन्न होजाया करता है । यही बुद्धिनाश अन्ततोगत्त्वा मानव का सर्वात्मना विनाश ही कर देता है । विविध - सोपानात्मिका इसी क्रमसिद्धा नाशपरम्परा का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् ने कहा है— ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात् कामः, कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

क्रोधाद् भवति सम्मोहः, सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।

स्मृतिभ्र ंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥

-गीता २३

पृष्ठ 28

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
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आत्मनिवेदन क्यों मानव यौं परम्परया सर्वनाश का अनुगामी बन जाता है?, प्रश्न का एकमात्र उत्तर है - ‘ कर्म्म-ण्येवाधिकारस्ते ' की उपेक्षा, एवं - ' मा फलेषु कदाचन ' मूलक - फलसङ्ग की अनुगति । इसी तथ्य के सम--न्वय के लिए हुमें नाशानुगता सोपानपरम्पराओं का, तथा तदनुगत आठ पुरस्कारों का प्रासङ्गिक दिग्दर्शन करा देना पड़ा है । अब इसळम्बन्ध में - ' बुद्धिनाशात् - प्रणश्यति ' मूलक एकमात्र यही प्रश्न शेष रह जाता है कि, -‘ इस नाश का क्या अर्थ? ' । प्रश्न इसलिए इस रूप से उपस्थित होपड़ा कि, जिन मनुष्यों का शास्त्रीय सत्कम्मों से सम्बन्ध नहीं है, अपितु जो शास्त्रविरुद्ध सत्कम्मों के अनुगामी बने रहते हैं, वे भी इसी धरा-तल पर जीवित तो देखे सुने जाते ही हैं । साथ ही शारीरिक - ऐन्द्रियिक- कम्म लिए जो बुद्धिबल अपेक्षित है, वह भी इनमें विद्यमान रहता ही है । अतएव प्रत्यक्ष में न तो इस श्रेणि में स्मृतिभ्रंश ही देखा जाता, न तन्मूलक वुद्धिनाश ही इनमें उपलब्ध होता । फिर ' नाश ' की तो चर्चा करना ही व्यर्थ है । सम्भवत: ही क्यों, निश्चयेन इसी हेतुवाद के आधार पर पुरा देवयुगेऽपि इसी भारतराष्ट्र के शास्त्रकर्म्मनिष्ठ भी भारतीय आस्तिक मानव में - ‘ किं काम्या यजेमहि । य उ यजन्ते - पापीयाँसस्ते भवन्ति । य उ न यजन्ते श्रेयां-सस्ते भवन्ति, इति श्रश्रद्धा वै मनुष्यान् विवेद ' रूपेण शास्त्रीय कम्र्मों के प्रति अश्रद्धा होगई होगी | इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि, जो शास्त्रीय कम्मों में सावधानी कर बैठते हैं, उनमें अपनी मानसिक – फलानुबन्धिनी कल्पनाओं का समावेश कर देते हैं, वे सामान्य प्राकृत मानवों के समतुलन भूत-समृद्धि से भी सर्वथा ही वञ्चित ही रह जाते हैं, और उनके अन्यान्य भी अनिष्ट होनाते हैं । इसी तथ्य के आधार पर श्राङ्गिरस बृहस्पति ने देवयुगीय - मनुष्यों की श्रद्धात्मिका धारणा का निराकरण भी किया था । और इसीलिए विगत तीन सहस्र वर्षों से विश्व के इतर मानववर्गों के समतुलन में भारतीय शास्त्रभक्त, धर्म्मो-द्घोषक मानव कहीं अधिकाधिक ही उत्पीड़ित ही बनता चला ग्रारहा है । और इसीलिए सम्भवतः आज के धर्म्मनिरपेक्षवादी राष्ट्रीय - मानव ने अपनी प्रत्यक्ष प्रभावमूला भूतसमृद्ध्यनुगता प्रतीच्यजगत् की भौतिक - जीवन -पद्धति के समतुलन मे भारतीय शास्त्र, तद्विधि - विधान, तदात्मक कर्म्म, धर्म, याचार, यादर्श, आदि आदि यच्चयावत् विमलविभूतियों को ही भारतराष्ट्र की श्री, समृद्धि के पतन का प्रमुख कारण घोषित करते हुए प्रतीच्या भूतप्रधानार्थकामसमन्विता, मनःशरीरमात्रनिबन्धना जीवनपद्धति को ही ' मानव ' के अभ्युत्थान का अन्यतम साधन मान लिया है । और प्रत्यक्षदृष्टया यह सबकुछ अकाण्ड - ताण्डव प्रत्येक बुद्धिवादी, हेतु-वादी, दिग्देशकालोपयोगितावादी वर्त्तमानप्रेमी के लिए तो उचित ही पक्ष प्रमाणित होरहा है । यही कारण है कि, वर्त्तमानयुग के प्रज्ञाशील बुद्धिवादी अनेक सामाजिक - लेखकोंनें विस्पष्ट शब्दों में यह घोषणा कर देने में यत्किञ्चित् भी संकोच का अनुभव नहीं किया है कि, “ भारत के पत्तन का प्रमुख कारण यहाँ के शास्त्र, धर्म्म, एवं तदनुगत प्राचीनता का मिथ्या व्यामोहन ही है । अतएव इत्यादि इत्यादि * । * -'क्रान्ति ' का अर्थ सिर्फ खून खरात्री ही नहीं है । क्रान्ति का अर्थ है - अत्यन्त शीघ्रता से मूल परिवर्त्तन । कवि! तुम जी खोल कर सामाजिक क्रान्ति का काव्य मुखरित करना शुरू करो । जो कुछ ' सना-तन ' है, जो कुछ प्राचीन, जीर्ण और पुराना है, धर्म - समाज - संस्कार - सत्र टूट फूट कर विध्वंस होजाए । और कुछ न होसके, तो सिर्फ इस महासत्य का ही प्रचार कर दो कि, इस ' प्राचीनता ' के मोह से बढ़ कर बड़ा शत्रु भारत का और कुछ नहीं होसकता ' । —श्रीशरच्चन्द्र - चट्टोपाध्याय ( प्रसिद्ध बँगला - उपन्यासलेखक, एवं नितान्त भावुक समाजसुधारक ) २४

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
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शतपथ - प्रथमखण्ड वर्त्तमान स्वतन्त्र भारतराष्ट्र के समर्थ सञ्चालक प्रज्ञावदातश्रममूर्त्ति स्फटिक हृदय श्रीनँवाहरलाल नेहरू जैसे महाप्राण व्यक्ति के भी इस सम्बन्ध में ऐसे ही विचार हैं । आपकी दृष्टि में भी पुराना सबकुछ गल - सड़ चुका । अतएव भारतीय हिन्दू - मानव की कोई भी प्राचीन धारणा आपको अंशत: भी प्रिय नहीं है, जबकि इत्तर सभी वर्गों की प्राचीन धारणाओं का आप यथावसर सम्मान करते हुए अपनी ' मानवता ' का परिचय देते रहते हैं । भारतीय श्रुतिस्मृतिपुराणशास्त्र की उपेक्षा करने वाले प्राचीन बौद्धमत की अपने सत्तातन्त्र के द्वारा एक ओर सोल्लास जयन्तियाँ मनाना, एवं दूसरी श्रोर भारतीय वेदादि मौलिक शास्त्रों की प्राचीनता को सड़ा - गला बतलाते रहना भी ÷ यही प्रमाणित कर रहा है कि, सचमुच विगत तीन सहस्रवर्षों से भारतीय शास्त्र, धर्म्म, तदभिन्न कर्त्तव्य - कम्र्मो का ज्ञानविज्ञानात्मक सत्य पक्ष उत्तरोत्तर अभिभूत ही होता चला आरहा है, अभिभूति के जिन असंख्य कारणों में से आज से तीन सहस्रवर्षारम्भ में उपक्रान्त उस ' अनात्मवाद ' को ही प्रमुख कारण माना जायगा, जिसका ग्राज के राष्ट्रीय नेता सोल्लास यशोगान करते जारहे हैं काल्पनिक — सत्य - अहिंसा - मैत्री - मानवता - सहास्तित्त्वादि श्रादि वाग्विजृम्भणों के माध्यम से । आज के सर्वतन्त्र – स्वतन्त्र- प्रभुसत्ता समर्थ -गणतन्त्रात्मक - प्रजातन्त्रीय भारतीय - सत्तातन्त्र की, अपने आपको उच्चघोषणापूर्वक - ' धर्मनिरपेक्ष ' प्रमाणित करते रहने वाले इस ' प्रज्ञातन्त्र ' की सचमुच ही तो यह आश्चर्य्यमयी ही प्रवृत्ति मानी जायगी कि, ' कर्म्मण्येवाधिकारस्ते ' मूला, सृष्टि के सनातन - विधि विधानों के आधार पर सुप्रतिष्ठिता, परीक्षित ज्ञान - विज्ञान - सिद्धान्तों से सर्वात्मना समन्विता, अभ्युदय - निःश्रेयस्— करी, आत्मसमदर्शनानुगत - प्रकृतिसिद्ध - विभिन्न- कर्म्मव्यवस्थापिका, अतएव च सदैव सर्वोपकारिणी श्रुति-स्मृति - पुराणानुगता जिस इत्थंभूता उपादेया भारतीया शास्त्रनिष्ठा को आज से तीन सहस्र- वर्षारम्भ की अनात्मवादभावान्विता, प्रत्यक्ष प्रभावानुगता भावुकता से काल्वालीकृता, काल्पनिक अहिंसावादात्मिका जिस मतवादप्रवृत्ति ने अभिभूत कर भारतराष्ट्र की अभ्युदय - निःश्रेयस संसाधिका ' आचारनिष्ठा ' को स्मृतिगर्भ में हीं विलीन कर दिया है, अनात्मवादमूलक इत्थंभूत वह - प्राचीनमृतवाद ' तो तथाकाथेस आज के राष्ट्रवादी के लिए उसी प्रत्यक्ष प्रभावमूला भावुकता के ग्रावेश से बनता जा रहा है श्राराध्य, और ततोऽपि प्राचीन, एवं अपने सनातन ज्ञान - विज्ञान सिद्ध परीक्षणों से सदैव उपयोगी बना रहने वाला श्रुतिमूलक याचार प्रमाणित किया जारहा है सड़ा, गला, एवं निरपेक्ष । सचमुच ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' का निर्भ्रान्त समन्वय इससे अन्य और कुछ भी तो नहीं होसकता । त्रिसहस्रवर्षात्मक, महाग्रहग्राहात्मक दर्शनवाद, एवं तदुपग्रहात्मक स्मार्त्तवाद, नैबन्धिकवाद, साम्प्रदायिकवाद, विद्वत्प्रज्ञावाद, उपदेशकबाद, कल्याणप्रचारवाद, नेतृवाद, सुधारवाद, इन नवविध - ' आज आदमी को बीते हुए समय की न सोचकर आगे की सोचता चाहिए | क्योंकि अतीत मर चुका, और त्रीत चला । हम उसके पास लौट कर नहीं जासकते । और वर्त्तमान भी बहुत तेजी से बदल रहा है । यदि आप भविष्य की दृष्टि से देखें तो हमारे आज के बहुत से संघर्ष अनावश्यक जान पड़ेंगे । तत्र कम से कम एक नया पहलू आप को दिखाई देगा, जिससे पुराने ढंग की लीक से आप बाहिर आजाएँगे ” । — श्रीजवाहरलाल नेहरू २५

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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आत्मनिवेदन ( ६ ) ग्रहोपग्रहवादों से सचमुच ही तो श्रुतिशास्त्रमूलक अभ्युदय - नि - नो यस - संसाधक - ' कर्त्तव्य ' उत्तरोत्तर अभिभूत ही होता चला आ रहा है, जिसके ग्रामुलचूड़ उन्मूलन के त्रिना कदापि भारतीय संस्कृति का सम्प्र-दायवादात्मक मतवादरूप काल्पनिक - शास्त्र, काल्पनिक - धर्म्म के प्रति होपड़ने वाला त्रिसहस्रवर्षात्मक-प्राचीनताव्यामोहन उपशान्त नहीं होसकता । अवश्य ही - ' श्वेतक्रान्ति महान् सन्देश ' के द्वारा राष्ट्र की नैष्ठिकी प्रज्ञाओं को इत्थंभूत काल्पनिक, सांस्कृतिक - अधःपतनात्मक - प्राचीनव्यामोहन से राष्ट्रप्रजा का शीघ्र से शीघ्र परित्राण कर ही लेना है । किन्तु । किन्तु?, इसीलिए कि तथाविध उन्मूलनात्मक क्रान्तिकर्म्म अत्यन्त ही अवधानता की अपेक्षा रखता है । हमें रोग का उन्मूलन करना है, रोगी का नहीं । दूषित - श्लथ अङ्ग को काट फेंकना है, विशुद्ध को नहीं । सुधारवाद के आवेश में यदि हमने मूल का भी कृन्तन कर दिया, तो फिर हमारा कोई भी स्वरूप शेष नहीं रह जायगा । सचमुच यह दुर्भाग्यपूर्णा ही स्थिति मानी जायगी कि, आज हमने ' सुधार ' के आवेश में अपनी सांस्कृतिक - निधि के उस मौलिक तथ्य को भी उपेक्षित कर परिवर्तन के काल्पनिक - विजृम्भ में सभी कुछ विस्मृत कर दिया है । जबकि हम पुराणपुरुष के पुरातन विश्व के सञ्चालक पुंरातन हीं सूर्य्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, नक्षत्र, ग्रह, जल, तेज, मिट्टी, ओषधि, वनस्पति, आदि आदि से अपनी अर्वाचीना स्वरूप - प्रतिष्ठा सुरक्षित किए हुए हैं, तो कदापि एकहेलया— पुरातन के प्रति हमारा विद्रोह सफल नहीं हो सकता । ' धाता यथापूर्वकल्पयत् ' रूपा पुराणीप्रज्ञा ही शाश्वत, सनातन सत्य मानव की स्वरूप - प्रतिष्ठा मानी गई है, जिसके आधार पर ही इसका वर्त्तमान, और भविष्य - प्रतिष्ठित है । और सनातन मानव की सनातन - मानवता के अनुबन्ध से ही हमें उस आपात-रमणीय प्रश्न का समन्वय कर लेना है, जो – ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' के सम्बन्ध में विघटित हो-पड़ा है । ' बुद्धिनाश ' का तात्पर्य है ' बुद्धि का श्रात्मयोग से वञ्चित होजाना ' । क्या तात्पर्य्य १, प्रश्न का मानव के उस दुरधिगम्य स्वरूप से ही सम्बन्ध है, जिसके स्वरूप - विश्लेषण के लिए हमें ' मानवस्वरूपमी-मांसा ' नामक एक स्वतन्त्र निबन्ध ही उपनिबद्ध कर देना पड़ा है, जिस तथ्य का यत्र संस्मरण भी सम्भव नहीं है । प्रश्नसन्दर्भसङ्गतिदृष्ट्या एतावन्मात्र ही निवेदन कर दिया जाता है इस सम्बन्ध में कि, विश्व में जितने भी प्राणी हैं, सबकी अपेक्षा ' मानव ' नामक प्राणी में कुछ पार्थक्य है, और प्रायः सभी मानव इस पार्थक्य को येनकेन रूपेण माना ही रहे हैं । पार्थक्य का वह ' मूल ' क्या है, जिसने मानव को इतर समस्त प्राणियों से सर्वथा पृथक् प्रमाणित कर रक्खा है? क्या मानवने कभी इस प्रश्न - समस्या का चिन्तन किया है? | सभी प्राणियों का एक भौतिक शरीर है, तो मानव का भी एक भौतिक शरीर है । एव इसकी दृष्टि से मानव, और मानवेतर प्राणियों में कोई पार्थक्य नहीं है । प्राणियों में श्राहारविहारादि का अनुगमन करने वाली वाक्-प्राण - चक्षुः - श्रोत्र – आदि इन्द्रियाँ हैं, इन इन्द्रियों का सञ्चालक - सकल्प - विकल्पात्मक, अनुकूल - प्रतिकूलवेदना-नुगत मन भी विद्यमान है । और मानव में भी इन्द्रियवर्गसहित मन विद्यमान है । यों इन्द्रियमन की दृष्टि से भी मानव, और मानवेतर प्राणियों में कोई पाथक्य नहीं है । अब क्षेत्र आता है - बुद्धि का । अवश्य ही अमुक सामान्य रासभादि प्राणी ऐसे भी हैं, जिनमें बुद्धि तो है, किन्तु बौद्धिक - विकास नहीं है पृथिवी के प्रवर्ग्यभूत - शीतप्रधान - रासभादि प्राणों से इनके कृतात्मा बने रहने के कारण । इन सामान्य प्राणियों की सामान्या बुद्धि का उपयोग ऐन्द्रियक - मानसिक - काम - भोगों में हीं परिसमाप्त होजाता है । किन्तु अश्व, गज, शुक, पिक, २६