Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 121–130
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130
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शतपथ - प्रथमखण्ड | १ | १ - भोगसाधनभूता - ज्ञानशक्तिः ( ब्रह्मवर्चस् ) २- भोगफलात्मिका - नामख्यातिः ( कीत्तिः ) ब्रह्मवर्चोभावेन महान् भवति ( १ ) कीर्त्या महान् भवति ( २ ) मानवस्य-बौद्धिक - उपयो-गिताद्वयी २ १ - कृषि - वाणिज्यादि - साधकाः - पशवः - ( पशवः ) पशुभिमहान् भवति ( ३ ) } मानसिक - उप-२- पुत्र - पौत्रादयः - सन्तानभावाः ( प्रजाः ) प्रजया महान् भवति ( ४ ) योगिताद्वयी १- भोग्यपदार्थाः - भूतभौतिकाः २- भोक्तारो - मानवाः ( अन्नम् ) अन्नवान् भवति ( ५ ) ( श्रन्नादः ) अनादो भवति ( ७ ) शारीरिक - उप-योगिताद्वयी जिस स्पष्टतमा - व्यक्ता - श्रद्धा - भाषा में प्रकृतिवादी का सन्तोष - होना चाहिए था - उस की मान्यता से अनुप्राणित उसी के लौकिक - शब्दों के माध्यम से, वैसा सन्तोष, हम समझते हैं - तैत्तिरीयन ति की भार्गवी-वारुणी - विद्या से अनुप्राणिता उक्ता परिलेखत्रयी से अभी तक सम्भव नहीं बन सका है । ग्राज के राष्ट्रवादी की मान्या लौकिक - उपयोगिताओं के सम्बन्ध में तो वह सर्वात्मना तबतक तुष्ट होही नहीं सकता, जबतक कि उसकी मान्यता से अनुप्राणित राष्ट्र, गाय, बैल, घोड़े, जाग्रत नारी, सभा - समिति - चतुर - लोक मानव, युद्धविजेता सैनिक, यातायात साधन, खेती के लिए उपयोगिनी वर्षा, पुष्प - फल से लदे हुए हरे भरे पेड़, सायं - प्रातः की योग - क्षेम चिन्ता, आदि आदि शब्दों, भावों के माध्यम से सम्बन्ध रखने वालौं लौकिक उपयोगिताओंों का ही वेदशास्त्र के द्वारा इस राष्ट्रवादी को सङ्क तग्रह नहीं करा दिया जाता । इसी सामयिक सन्तुष्टि के लिए हमें ‘ श्वेतक्क्रान्ति का महान् सन्देश ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में - ' हमारे राष्ट्र की लौकिक - काम-नाएँ ' नामक एक स्वतन्त्र परिच्छेद का समावेश करना पड़ा है, जिस के संक्षिप्त दिग्दर्शनमात्र के लिए भी च श्रात्मनिवेदन में स्थान शेष नहीं रहा है । अतएव तदनुबन्धी केवल एक माङ्गलिक मन्त्र का संस्मरण करते हुए ही ' उपयोगितावाद ' को बिश्रामपथानुगामी बनाया जारहा है -११७
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आत्मनिवेदन * आब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्! * राष्ट्र राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्! दोग्ध्री धेनुः, वोढानड्वान्, आशुः सप्तिः, पुरंधिर्योषा, जिष्ण रथेष्ठाः! सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्! निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु 1 फलवत्यो न श्रोषधयः पञ्चन्ताम्! योगक्षेमो नः कल्पताम्! - यजुः संहिता २२।२२ । जो वेदमहर्षि अपनी दिव्या - सत्या - वाणी के माध्यम से राष्ट्र के लिए ब्रह्मर्चस - रूपा ज्ञानशक्ति की कामना अभिव्यक्त कर रहे हों, शूर ( शरीरत: बलवान् ), इम्रव्य ( शस्त्रास्त्रबल से समन्वित ), अतिव्याधी ( नीरोग ), महारथ ( विशिष्ट वाहनों - यातायात - साधनों से सम्पन्न ), विजयशील - पौरुष - शक्ति - शाली -- वर्ग की कामना कर रहे हों, लज्जा - शील- सौजन्य - शिक्षा - सद्गुणादि - समन्वयात्मक - ' पुरंधि ' नामक महान् गुणों से समलङ्कृता श्रार्य्यनारी की स्वरूपसत्ता अनिवार्य्यं मान रहे हों, दुधारी गाएँ जिनकी राष्ट्रकामना हो, भारवाही-कृषि – कर्म्म - सम्मर्थं अनड्वान् ( बैल, और साण्ड ) जिनकी कामना हो, वेगशाली अश्व जिनकी कामना हो, जिन महर्षियों के द्वारा राष्ट्र के लिए यजनशील सभाप्रिय युवकों की कामना अभिव्यक्त हो रही हो, कृषिकर्म्म की सफलता के लिए जो महर्षि समय समय पर पज्जन्यदेवता से अनुरूप - अनुकूल वृष्टि की कामना अभिव्यक्त कर रहे हों, जो वृक्ष - वनौषधियों को फलों से सुसमृद्ध बने रहने की कामना अभिव्यक्त कर रहे हों, और सर्वान्त में जो वेदमहर्षिं तथोक्ता - राष्ट्रीय - कामनाओं के द्वारा राष्ट्र की योग - क्षेमात्मिका लोक चिन्ता के प्रति निरन्तर जाग-रूक हों, उन वेदमहर्षियों के प्रांत, उनकी तथाभूता वेददृष्टि के प्रति उनके वेदशास्त्र के प्रति अपनी क्रमव्यव-स्थाशून्या - उद्घोषमात्रप्रधाना - जनजीवनीया - लोकतान्त्रिकी - उपयोगिताओं के छल से गजनिमीलिका करते जाना, प्रायश्चित्त - प्रवर्त्त'क - काल्पनिक - अभिनिवेशों के द्वारा सर्वसंसाधक वेदशास्त्र को - ' आज के जनजीवन में वेदशास्त्र जैसे पुराने पोथों का क्या उपयोग? ' जैसी अनर्गला - अलग्ला - माल्व्यदोषाप्लुता अनार्षवाणी का उदुगिरण करते जाना राष्ट्रवादियों की मान्यता से अनुप्राणिता - ' मानवता ' किंवा ' मानवधर्म्म ' की दृष्टि से कहाँ - तक उचित है?, प्रश्न के समाधान का भार उहीं उपयोगितावादी - जनजीवनीयोपयोगितावादी - राष्ट्रवा--दियों की लोकप्रज्ञा के प्रति सधन्यवाद समर्पित करते हुए इस उपयोगिता - प्रसङ्ग को अत्रैव उपरत किया रहा है । हमारे लिए तो मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र का स्वाध्याय ' अहरहः स्वाध्यायमधीयीतैव ' इस विधि-वचनमात्र पर ही आस्थित है । अतएव हमारी दृष्टि से तो ' उपयोगिता ' का, एवं तन्निबन्धन ताट कालिक फल का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । क्योंकि स्वधर्म्मनिष्ठात्मिका कर्त्तव्यनिष्ठा में ऋषिप्रज्ञा ने ' निष्कारणता ' को ही प्रमुख माना है, जिसे आधार बनाए बिना मानव की दिग्देशकालानुबन्धिनी तात्कालिकता, तदनुगता कारणता, एवं तन्निन्त्रन्धना सामयिक उपयोगिता, आदि आदि कारणपरम्पराएँ मानवप्रज्ञा को कर्त्तव्यनिष्ठा से ११८
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शपथ - प्रथमखण्ड पराङमुख ही कर दिया करतीं हैं, जैसाकि हम स्वयं अपने इस स्वाध्याय - कर्त्त व्यानुष्ठान में अनुभव कर रहे हैं । जिन अंशों में ‘ कारणता ' रूप महान् श्रभ्व जागरूक होपड़ा है, निबन्धों के वे अश अपनी मौलिक ज्ञानविज्ञा-नसमन्वयनिष्ठा से अन्तम्मुग्व बनते हुए केवल लोकानुरञ्जक ही बन गए हैं । और इसी महान् दोष से हम अपने प्रयास में अपेक्षिता सांस्कृतिक शुचिता सुरक्षित नहीं रख सके हैं । दिग्देशकालानुबन्धिनी - उपयोगिता - लक्षणा-इस कारणता के अनुग्रह से ही निबन्धों के अनेक स्थलों पर हमारा आत्यन्तिक स्खलन होगया है, जिसका संशोधन तो भारतराष्ट्र की आगामिनीं सांस्कृतिक - प्रज्ञाएँ हीं कर सकेंगीं । अन्यान्य कारणताओं के समतुलन में सत्र से भयावहा कारणता हमारी दृष्टि में - ' सरलता से लोकप्रियभाषा में दूसरों को समझादेने की आतुरता ' ही मानी जायगी, जिस इत्थंभूता भयावहा ' प्रज्ञावाद ' रूपा कारणता से समझाने के लिए आतुर बना हुआ व्यक्ति स्वय तो ' समझ ' से पराङमुख बना रह ही जाता है, साथ ही दिग्देशकालानुगत - सामयिक-अनुरञ्जन - भावों से काल्वालीकृता इसकी भाषा से ' समझनेवाले ' भी - ' समझ ' नाम की ' संवित्प्रज्ञा ' से तो असंस्पृष्ट ही बने रह जाते हैं, जैसाकि पूर्व में भी स्पष्ट किया जाचुका है । इसी महान् दोष से अपने इन निब-न्धों में जहाँ जहाँ हमने ‘ समझाने ' जैसी भावुकतापूर्णा लोक नुरञ्जकता का आश्रय ले लिया है, वहीं वहीं हमारा सांस्कृतिक - स्खलन होगया है । फलस्वरूप हम स्वयं भी ' समझ ' की दृष्टि से तदंशों को नहीं समझ सके हैं । इसी सन्बन्ध में निबन्धों की भाषा के अनुबन्ध से भी हमें एक विशेष तथ्य का दो शब्दों में स्पष्टीकरण कर ही देना है । ‘ अनुकूलत ' जहाँ मानव की ' भावुकता ' को उत्साहित करती है, वहाँ ' संघर्ष ' मानव की ' निष्ठा ' का संरक्षक माना गया है, एवं इह्रीं दोनों भावों के आधार पर ' सरलता ' और ' कठिनता ' नामक दो शब्द व्यवस्थित हुए हैं । ' भावुकता ' को समुत्तेजित करने वाली ' अनुकूलता ' का नाम है - ' सरलता ', इसी के आधार पर व्यव-स्थिता है - ‘ लोकप्रियता ' । एवं ' निष्ठा ' के संरक्षक ' संघर्ष ' का नाम है - ' कठिनता ', और इसी के आधार पर व्यव-स्थिता है - ‘ लोककर्त्तव्यनिष्ठा ' । प्रकृतिसिद्ध तत्त्ववाद की दृष्टि से यदि हम इस तथ्य का समन्वय करें, तो मानना पड़ेगा कि, आत्मा, बुद्धि, मनः, शरीर - भेद से चतुपर्वा बने हुए मानव के आत्मा और बुद्धि, नामक दोनों पर्व तो संघर्षमूला ‘ निष्ठा ' के क्षेत्र बने रहते हैं, एव मन, और शरीर नामक दोनों पर्व अनुकूलतामूला ' भावु-कता ' के क्षेत्र बने रहते हैं: फलतः आत्म- बुद्धि - समन्विता संघर्षात्मिका निष्ठा जहाँ लोककर्त्तव्यनिष्ठा की मूलप्रतिष्ठा बनी रहती है, वहाँ मनः शरीर - समन्विता भावुकता लोकप्रियता की आधारभूमि रहती हैं । संघर्षा-त्मिका - तपोमूला लोककर्त्तव्यनिष्ठा जहाँ मानव को ' समझने के लिए ' प्रोत्साहित करती रहती है, वहाँ अनु-कुलतात्मिका अनुरञ्जन भावप्रधाना लोकप्रियता मानव को - ' समझाने के लिए आतुर बनी रहती है । ' सम-झने के लिए प्रोत्साहिता लोककर्त्तव्यनिष्ठा जहाँ आरम्भ में कठिन, और परिणाम में श्रेयःफलानुगामिनी प्रमाणित होती है, वहाँ ‘ समझाने के लिए ' आतुरा लोकप्रियता आरम्भ में ' सरल - - सुखावहा, किन्तु परि-णाम में प्रयोऽनुगत शून्यं शून्यं भाव में ही परिसमाप्त होजाती है, जिस इस श्रेयोमूला कठिनता, तथा प्रेयो-मूला सरला के इसी निष्ठा, भावुकता - नुबन्धी तथ्य को लक्ष्य बना कर भगवान् ने कहा है— यत्तदग्रे विषमिव परिणामे सुखोपमम् ॥ तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं- ' श्रात्म - बुद्धि ' - प्रसादजम् ॥ १ ॥
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श्रात्मनिवेदन विषयेन्द्रिय -- संयोगात् - यत्तदग्रे ऽमृतोपमम् ॥ परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ २ ॥
यत्तदग्रे, चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ॥ निद्रालस्यंप्रमादोत्थं तत्तामस उदाहृतम् ॥ ३ ॥
—गीता १८, ३७, ३८, ३६, । वेदशास्त्र इसी तथ्य का श्रेय और प्रेय शब्दों के माध्यम से स्पष्टीकरण किया है । जिसे लोकभाषा में ‘ हितकर ' कहा गया है, वेदभाषा में वही ' श्रेय ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं लौकिक - ' रुचिकर ' भाव ही तत्र ' प्र'य ' कहलाया है । आत्मबुद्धिप्रधान - संघर्षात्मक निष्ठापथ ही हितकर श्रेयोमार्ग है, जो अपने संघर्ष के कारण मनः - शरीर के लिए प्रारम्भ में - ' कठिन ' ही बना रहता है । एवं मनः शरीरप्रधान - अनुकूलतात्मक-भाबुकतापथ ही रुांचकर - प्रयोयार्ग है, जो अपनी अनुकूलता के कारण आत्मबुद्धि के लिए तो सदा ही व्यर्थतम - भार, और मनःशरीर के लिए आरम्भ में प्रीतिकर, किन्तु अन्त में सर्वथा म्लानिकर, एवं - तेजो-विनाशक ही बन जाया करता है । श्रात्मबुद्धिरूप नैष्ठिक पुरुष का केन्द्र जहाँ ' श्र ेयः ' बना रहता है, वहाँ मनः-शरीरभावुक - प्राकृत - मनुष्य की परिधि ' प्रेयः ' ही बनी रहती है । इसी सम्बन्ध में वेदशास्त्र कहता है कि, -' प्रकृतिविशिष्ट पुरुषात्मक ' इस विश्वप्राङ्गण में तद्रूप ( प्रकृतिपुरुष - समन्वयात्मक ) पुरुष के सम्मुख संघ-र्षात्मक, अतएव आत्मदुद्धयनुगत कठिन श्रेयोभात्र ( हितकरभाव ) भी उपस्थित होते रहते हैं, एवं अनु-कूलतात्मक, अतएव मनःशरीरानुगत सरल प्रेयोभाव ( रुचिकर भाव ) भी आते रहते हैं । निश्चय ही जो नैष्ठिक पुरुषश्रेष्ठ इन दोनों में से ‘ कठिन श्रेयोमार्ग ' का अनुगामी बन जाता है, वह ' लक्ष्य ' प्राप्त कर लेता है, और जो भावुक मनुष्य ‘ सरल प्रेयोमार्ग ' का अनुगामी बन जाता है, वह ' लक्ष्य ' से ' च्युत ' होजाता है * । कठिन - श्रेयोमार्ग पर कैसे मानव आरूढ़ रहे, और कैसे सरल प्रयोमार्ग से आत्मपरित्राण करे?, इस प्रासङ्गिक प्रश्न के समाधान के लिए ऋषि ने ' विविनक्ति ', और ' धीरः ' ये दो शब्द हमारे सम्मुख रक्खे हैं । ज्ञानविज्ञानसिद्धा - तत्त्वानुगता - वास्तविक स्वरूप - स्थिति के बोध से ही मानव इस तथ्य का विवेक ( छांट-पार्थक्य ) कर सकता है कि - श्रय, और प्रय दोनों में श्रेयोभाव ही श्रेयः पन्था है | विवेक - ज्ञानात्मक इस व्यवच्छेदबोध के लिए अपेक्षित है – ' धृति ' गुण | दिग्देशकालानुबन्धिनी, अतएव तात्कालिकी, अतएव च प्रतिक्षणविलक्षणा - चञ्चलता से कदापि मानवीय मन तत्त्वविज्ञाननिष्ठा का अनुगामी नहीं बन सकता । इसके लिए तो प्रचण्ड - संघर्षात्मिका- भार्गवाङ्गिरसी - उग्र तपोनिष्ठा, स्वाध्यायनिष्ठा ही अपेक्षित है । इस महान् धैर्य्य से ही वह धीर तत्त्वविवेऋबोध प्राप्त कर सकता है, और तभी वह यह समझ सकता कि, कठिन योमार्ग तो मानव की मानवता का संरक्षक है, एव सरल प्रयोमार्ग मानव की मानवता को कालान्तर में दानवता, किंवा
* - श्रन्योऽन्यदुतैव प्रयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति, हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥
— कठोपनिषत् २ | १ | १, १२०
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शतपथ - प्रथमखण्ड पशुता में हीं परिणत कर देने वाला है, जिस पशुसर्ग के जीवन का एकमात्र लक्ष्य आत्मबुद्धिविवेक से असंस्पृष्ट मनःशरीरनिबन्धन कामार्थभोग ही बने रहते हैं । यही प्रश्न उस मनुष्य के सम्बन्ध में उपस्थित है, जो हितकर, किन्तु कठिन श्रेय की उपेक्षा कर रुचि-कर, और सरल प्रेय को अपना लक्ष्य बना लेता है । क्यों जानबूझकर भी यह हितकर श्रेय की उपेक्षा कर रुचिकर पथ को अपना लेता है?, प्रश्न का ऋषि ने एक अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण - वाक्य के द्वारा समाधान किया है, जो सर्वात्मना अवधेय है । दिग्देशकालग्रहग्रस्त लोकचतुर ' कालमर्मज्ञ ' बुद्धिमानों का ऐसा मत है कि, “ जो समय से लाभ न उठावे - वह आदमी ही नहीं " । शास्त्रचिन्तन -तत्त्वस्वाध्याय - आदि आदि से भी कहीं मनुष्य की योगक्षेमचिन्ता दूर हुई है? | ऐसा ही कुछ हमारे भक्त सन्तोंने भी माना है, जैसाकि उनकी -- ' भूखे भजन न होय गोपाला, यह लो अपनी कण्ठीमाला ' जैसी भक्तवाणी के महान् प्रमाण? से प्रमाणित है । ऐसीसी ही तो मान्यता आज के हमारे राष्ट्रनेताओं की है कि, “ जबकि राष्ट्र के सम्मुख योग - क्षेम की महती समस्या भयानकरूप से मुँह बाए खडी हो, जबकि मानव को दो बार पेट भर भोजन भी न मिलता हो, तब कहीं अन्य बातें कीं जासकतीं है? । तत्त्वानुशीलन-बौद्धिक स्वाध्याय - आदि आदि तो बाद की बातें हैं । आज तो हमें उन उपायों का ही अनुगमन कर लेना है, जिनसे सुविधाप बँक सरलता से राष्ट्र की योगक्षेमचिन्ता - निवृत्त हो — इत्यादि - इत्यादि ” । यही तो वह तात्कालिक, और सर्वथा भ्रान्तिपूर्ण व्यामोहन है, जिस के अनुबन्ध से ही हमारा भारतराष्ट्र दिग्देशकालानुबन्धिनी इत्थंभूता ' यो क्षेमसमस्या ' को ही प्रमुख मानता हुआ सामयिक– मान्यतानुगत - प्रयोभावों का ही अन्धानुसरण, एवं अन्धानुकरण करता हुआ उस श्रेयःपथ से पराङ -मुख ही जनता आरहा है, संघर्षात्मिका श्रेयोमूला जिस कर्त्तव्यनिष्ठा की अभिव्यक्ति के अनन्तर ‘ योगक्षेम ’ जैसा नगण्य प्रश्न क्षणमात्र भी तो अवस्थित नहीं रह जाता । श्रपितु श्रात्मबुद्धिनिष्ठ - कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठ– श्रेयोभावानुगामी मानव के लिए तो सम्पूर्ण दिशाएँ अयाचित रूपेणैव ' बलिद्रव्य ' बन कर इस ग्रात्म-निष्ठ की कर्त्तव्याग्नि में स्वतः ही बहुत होतीं रहतीं हैं । क्या उन भक्त - सन्तों को यह विदित नहीं है कि, अनन्यनिष्ठा से भगवदाराधना में प्रवृत्त भक्तके योगक्षेम का उत्तरदायित्त्व तो स्वयं विश्वम्भर भगवान् ही वहन करते रहते हैं, जैसाकि भक्तों की भावुकता के संग्राहक लोकसंग्रही भगवान् के निम्नलिखित वचन से . स्पष्ट है-अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पय्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यम् ।! - गीता
* यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्येा न ज्यायः परमन्यदस्ति ।
यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति ॥
—छान्दोग्य ० उप ० १२१
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श्रात्मनिवेदन स्वयं पुराणपुरुष भगवान् व्यासने भी ' मानव ' जैसे श्रात्मबुद्धिनिष्ठ कर्त्तव्य - परायण - संघर्षरत-पुरुषश्रेष्ठ के लिए ‘ अन्न चिन्ता ' जैसी भावुकता को सर्वथा हेय ही माना है: । श्रभ्युपगमवाद से थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि, राष्ट्रविभाजन से आज भारतराष्ट्र में अन्न चिन्तात्मिका - योगक्षेम - समस्या विषमा बन गई है | प्रणतभाव से हम सम्प्रश्न करते हैं कि, ऐसा क्यों हुआ? | उत्तर एकमात्र होगा-श्रात्मबुद्धिसम्मता कर्त्तव्यनिष्ठा की अवहेलना, तत्स्थाने च प्रत्यक्ष प्रभावमूला दिग्देशकालानुबन्धिनी वह भावुकता, जिसने ही भारतराष्ट्र को खण्ड - खण्ड रूप में परिणत कर तथाविधा विषमा - समस्या राष्ट्र के सम्मुख खड़ी कर दी । पुनः हमः पूँछते हैं कि, ब्रिटिश राज्यकाल में तो अन्नादि परिग्रहों की न्यूनता नहीं थी । किन्तु सुनते हैं - तच्छासनकाल में केवल एक बङ्गप्रान्त में ही भुखमरी से ३०-४० लाख मानव काल-कबलित होगए थे I । क्यों?, श्रात्मबुद्धिसम्मत - नैष्ठिक - श्र यो भाव की उपेक्षा, और मनःशरीरानुगत भावुकतापूर्ण-योगक्षेम का व्यर्थ का चीत्कार । पुनः हम पूँछते हैं कि, क्या शेषभूत आज के खण्डित भी भारत में भूप्रदेशों का अभाव होगया, जिससे पर्याप्त अन्नोत्पादन कर हमारा राष्ट्र इस समस्या को स्वतन्त्रता के विगत १० वर्षों जैसी सुदीर्घा अवधि में भी समन्वित नहीं कर सका? । इन सब विसंवादों का एकमात्र मूल है-संघर्षात्मिका -कर्त्तव्यनिष्ठा का अभाव, तत्स्थाने च अनुकूलतात्मिका - लोकप्रियता का काल्पनिक – महान् व्यामोहन | इसी व्यामोहन से - ' योगक्षेम चिन्ताव्यामोहन ' जन्म लेता है, एवं मनःशरीरनिबन्धन, अतएव नितान्त भावुकतापूर्ण इसी योगक्षेमव्यामोहन से आज भी हमारा भारतराष्ट्र आत्मबुद्धि सम्मत -- कर्त्तव्यनिष्ठात्मक श्रेयोभाव से, तत्स्वरूपप्रतिपाटक -- वेदशास्त्र से तो बना हुआ है श्रात्यन्तिवरूपेण निरपेक्ष, एवं मनःशरीरानु--गता — तात्कालिकी - अनुरञ्जनात्मिका - नृत्य -- गीत - वादन - समन्विता - भावुकताओं के माध्यम से संघर्षशून्य - प्रचारा-. योजनमात्रों का बन रहा है अनुगामी । राष्ट्र की इसी प्रेयः प्रवृत्ति से राष्ट्र श्र ेयः पथानुगामी नहीं बन रहा, नहीं हीं बन सकता ऐसे ऐसे सहस्र - सहस्र -- प्र यः प्रकारों का अनुकरण करता हुग्रा भी भारतराष्ट्र तत्रतक, जत्रतत्र की वह अपनी काल्पनिकी - ' योगक्षेम - चिन्ता ' का परित्याग कर राष्ट्र के सम्मुख संघषात्मिका - जीवनीय - रसा-त्मिका -- ज्ञानविज्ञान सिद्धा -- सुपरीक्षिता- सांस्कृतिक-- जीवनपद्धति को राष्ट्र की मूल प्रतिष्ठा नहीं बना लेता । श्रेय, और प्र ेय के इी मर्म्म को लक्ष्य बनाकर, साथ ही घृतिगुणान्वित - तत्त्वविवेकात्मक - श्र योमार्ग को, तथा योग--क्षेमाकर्षणात्मक - काल्पनिक प्रयोमार्ग को विस्पष्टरूपेण विभक्त करते हुए ऋषिने निम्नलिखित शब्दों में मानव को महान् उद्बोधन ही प्रदान किया है कि--श्र ेयश्च प्रयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य, विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभिप्रयसो वृणीते, " प्रयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते " ॥ - कठोपनिषदि २ | १ | २ | संघर्षात्मक, आत्मबुद्धिसम्मत, ज्ञान विज्ञानात्मक - सांस्कृतिक -- कोशात्मक - श्री योभावप्रवर्त्तक वेदशास्त्र के सुप्रसिद्ध -- ' शतपथब्राह्मण ' की परिभाषाओं को ' समझने ' के लिए ही हमारा यह प्रयास है, जिसका — समझा देने की आतुरता से यत् किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है । योभावानुगत संघर्ष से सम्बन्ध रखने वाली ' समझने '
- आयुर्माणि रक्षति, आयुरन्न ं प्रयच्छति ।
अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्व े न दैन्यं न पलायनम् ॥
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शतपथ - प्रथमखण्ड मात्र की कामना से उपनिबद्ध यह विज्ञानभाष्य ' समझ ' की दृष्टि से जहाँ सरलतम है, वहाँ ' समझाने की श्रातुरता ' की दृष्टि से तो मनःशरीरानुबन्धी - लोकानुरञ्जन - भावों से पृथक् रहने वाला यह प्रयास सर्वथा कठिन-कठिनतर -- कठिनतम ही माना जायगा । अतएव च हम अपने उन कतिपय - ' सुझाव ' प्रदर्शित करते रहने वाले श्रात्मबन्धुत्रों के इस अभियोग को अपना पुरस्कार मानेंगे कि -- ' तुह्मारी भाषा लोकप्रिय नहीं है, अर्थात् पापूलर ( Popular ) नहीं है, अतएव सर्वसाधारण इससे लाभ नहीं उठा सकते " । इस अभियोग के सम्बन्ध में हीं दो शब्द निवेदनीय हैं, जिनके प्रसङ्ग से ही हमें महर्षि कठ के श्र ेय--प्र ेयो - भावों का प्रासङ्गिक संस्मरण कर लेना पड़ा, जिसके अनन्तर ही अब उन ' दो शब्दों ' की ओर आत्म-अन्धुओं का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है नम्रतापूर्वक ही । श्रुतिशास्त्रमूला – ‘ संस्कृति ’, स्मृतिशास्त्रमूलक - ' सांस्कृतिक- आचार, ' एवं पुराणशास्त्रमूलक– ‘ सांस्कृतिक - आयोजन ' * भेद से त्रिधा विभक्ता भारतीया ' सांस्कृतिक निधि ' के ज्ञातव्य, कर्त्तव्य भेद से सर्वथा विभक्त दो संस्थान माने गए हैं ऋषिप्रा के द्वारा | संस्कृति का -- ' ज्ञातव्य संस्थान ' विभिन्न पक्ष है, एवं इसी का ' कर्त्तव्यसंस्थान ' अन्य पक्ष है । ज्ञातव्या संस्कृति ' विचा ' प्रधाना ' है, एवं कर्त्तव्या - संस्कृति ‘ आचारप्रधाना ' है । विचारप्रधाना ज्ञातव्या - संस्कृति का पारिभाषिक नाम है - ' उपनिषत् ', एवं आचारप्रधाना कर्त्तव्या - संस्कृति का पारिभाषिक -- नाम है - ' विधि ' । ' यह करो, वह करो ' इत्यादेश-मूलक विधिभाव ही आचार की प्रतिष्ठा हैं, एव - ' क्यों करो, कैसे करो ' इत्यादि जिज्ञासात्मक सम्प्रश्नों के ज्ञानविज्ञानात्मक मौलिक - रहस्यों का स्वरूप विश्लेषण करने वाला ' रहस्यबोध ' ही ' उपनिषत् ' है, और यही विचार की प्रतिष्ठा है । मौलिक - रहस्यज्ञान से मानवीया बुद्धि, और मन आचारात्मक - कर्त्त व्यक के सान्निकट ( उप - समीपे ) क्योंकि निर्भ्रान्त - निश्चयरूप से ( नि - नितरां - निश्चयेन ) प्रतिष्ठित होजाते हैं ( सीदति -- यया -- उपपत्या, अतएव वह मौलिक - वैज्ञानिकी उपपत्ति ही - ' उप - नि- वत् ' रूप से ' उप-निषत् ' नाम के प्रसिद्ध होगई है । विधिरूप प्रत्येक आचार ( कर्म्म ) की अपनी एक विचारात्मिका ‘ उपनिषत् ’ रहती है, जिसके द्वारा मानव तद्विधिरूप कर्म में श्रास्था - श्रद्धापूर्वक प्रवृत्त होजाता है । मानव ' क्या कर्म्म करे, क्या न करे? ' इत्यादि विधि-- निषेधात्मक - आचार की शिक्षा नहाँ मन्वादि धर्म्मशास्त्रों से ही सम्बन्ध रखती है, वहाँ ' क्यों करें? " इस प्रश्न का समाधान वेदशास्त्र के रहस्यज्ञानात्मक ‘ उपनिषद्--भाव ' पर ही अवलम्बित है, जो रहस्यात्मिका उपनिषदें वेदशास्त्र के मन्त्र - विधि- आरण्यक - उपनिषत् नामक चारों हीं महिमाविवर्त्तो में यत्रतत्र संक्षेप, और विस्तार से उपर्णित हैं | और यों श्राचारात्मक--धर्म्मरूप कर्त्तव्यकर्म्म का मौलिक - रहस्य श्रुतिशास्त्र पर ही अवलम्बित है । क्या करें?, का उत्तर जहाँ स्मार्त्तधर्म्म देता है, वहाँ क्यों करें? जिज्ञासा का समाधान वेदशास्त्र पर ही अबलम्बित है, जैसाकि निम्न लिखितस्मात्त - वचनों से स्पष्ट प्रमाणित है --* मानवीय ' आत्मपर्व से अनुप्राणित ' ' पर्व ', ' बुद्धिपर्व से अनुप्राणित " उत्सव ', ' मनः पर्व से अनुप्राणित ‘ सम्मेलन ', ' शरीरपर्व से अनुप्राणित ४ समारोह ' नामक चतुर्विध आयोजन हीं क्रमशः ' राष्ट्रीय, ' सामाजिक, ' पारिवारिक, तथा वैय्यक्तिक वे भारतीय - ' सांस्कृतिक - आयोजन ' हैं, जिनका सूत्ररूपेण श्रुति – स्मृति - शास्त्र में, एवं विस्तार से पुराणशास्त्र में हीं निरूपण हुआ है । १२३
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आत्मनिवेदन वेदोऽखिलो धर्म्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ॥ आचारश्चैव साधूनां, आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥१ ॥
यः कश्चित् कस्यचित् - धम्म मनुना परिकीर्त्तितः ॥ स सर्वोऽभितो वेदे - ' सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ २ ॥
सर्व तु समवेच्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ॥ श्रतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥३ ॥
3 श्रुतिस्तु ' वेदो ' विज्ञेयः, ' घर्म्मशास्त्रं तु वै - ' स्मृतिः ' ॥ 3 ते सर्वार्थष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥४ ॥
' अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते ॥ " धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः " ॥ ५ ॥
- मनुः २२६,७,८,१०,१३,। निष्कर्षतः क्या करें?, इस प्रश्न के पूरक विध्यात्मक कर्म्मात्मक - कर्त्तव्यतन्त्र को हम ‘ आचार ’ कहेंगे, एवं क्यों करें?, इस प्रश्न के पूरक रहस्यात्मक - उपनिषदात्मक - ज्ञानविज्ञानतन्त्र को हम ‘ विचार ’ कहेंगे, और इसी के आधार पर अब हम ' संस्कृति ' तथा ' सांस्कृतिक ' इन दो विभिन्न शब्दों का समन्वय करेंगे । मौलिक - रहस्य के स्वरूप का विश्लेषण करने वाला ज्ञानविज्ञानात्मक - विचारप्रधान तत्त्व ही ' संस्कृति ' कहलाएगा, एवं वेदशास्त्र को प्रमुखरूपेण इस ' संस्कृति ' तत्त्व का ही स्वरूप - विश्लेषक - शास्त्र कहा जायगा । दूसरा विभाग - ' सांस्कृतिक ' नामक है, जिसके मानवीय अलौकिक - लौकिक, दो विभिन्न संस्थानों के अनु-बन्ध से दो विभिन्न ‘ आचारक्षेत्र ' होजाते हैं, जिन्हें क्रमशः - अलौकिक- सांस्कृतिक- आचार, तथा लौकिक-सांस्कृतिक आचार, इन नामों से व्यवहृत किया जासकेगा । मानव के चारों आध्यात्मिक पर्वों में से आरम्भ के आत्मा, और बुद्धि, नामक दोनों पर्व अलौकिक हैं, एवं मन, तथा शरीर नामक दोनों पर्व लौकिक हैं । अलौकिक आत्मबुद्धिपवों से सम्बन्धित अलौकिक आचार भिन्न पक्ष है, एवं लौकिक मनःशरीरपवों से अनु-प्राणित लौकिक - आचार अन्य पक्ष है । यों एक ही मानवीय सांस्कृतिक - याचार दो भागों में विभक्त होजाता हैं, जिन इन दोनों कर्त्तव्यात्मक - सांस्कृतिक- आचारों को बोधसौकर्य की दृष्टि से क्रमश: आचार, और आयोजन, इन दो पृथक् पृथक् शब्दों से समन्वित कर दिया गया है । श्रात्मबुद्धिप्रधान अलौकिक आचार ही ‘ सांस्कृतिक - आचार ' नाम से, तथा मनःशरीरप्रधान लौकिक आचार ही - ' सांस्कृतिक आयोजन ' नाम से प्रसिद्ध हैं | जौ मानव - मानवी वर्ग श्रात्मबुद्धिसम्मत आचारों के अनुष्ठान में असमर्थ हैं, उनके अभ्युदय-निःश्रेयस् के लिए ही, उनके मनःशरीरानुबन्धी- लौकिक स्वरूप के अनुपात से ही पुराणपुरुष के द्वारा पर्वो-त्सबसम्मेलनसमारोह - समष्टिरूप ' सांस्कृतिक - आयोजन ' व्यवस्थित हुए हैं, जिस स्वतन्त्र शास्त्र का ही नाम है - ‘ पुराणशास्त्र ' । प्रकृत्यैव सौम्या, अतएव सहजभावुका नारी, सौम्य बालवर्ग, तथा शास्त्रीय-विचारानुगत — बोध से शून्य यथाजात द्विजबन्धुवर्ग केवल मनः शरीरप्रधान बने रहते हुए ' लोकवर्ग ' में हीं अन्तर्भूत हैं, जो कदापि आत्मबुद्धिसम्मत - दुःसह तपोनिष्ठासाध्य - अलौकिक - श्राचारों में न तो अञ्जसा प्रवृत्त १२४
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शतपथ - प्रथमखण्ड ही होसकते, नैव श्रुतिप्रतिपादित इनके मौलिक - रहस्यपूर्ण, अतएव दुर्बोध्य- विचारों को ही तथाकथित वर्ग श्रात्मसात् करसकते । इह्रीं के अभ्युदय - निःश्रेयस के लिए सांस्कृतिक - आयोजनात्मक - पुराणशास्त्र प्रवृत्त हुग्रा है, जैसाकि — ‘ स्त्रो - शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ' इत्यादि सुप्रसिद्ध वचन से स्पष्ट है | तदित्थं श्रुतिमूला संस्कृति, स्मृतिमूलक आचार, तथा पुराणमूलक आयोजन, भेद से भारतीय-संस्कृति के तीन प्रक्रम होजाते हैं, जिनमें आरम्भ का श्र ुतिमूलक ' संस्कृति ' पर्व विचारप्रवान है, एवं शेष दोनों आचारप्रधान हैं | आत्मबुद्धिमूला संस्कृति के आधार पर ही मनः शरीरमूलक श्राचार, और आयोजन सुप्रति-ष्ठित हैं, इसी आधार पर -‘वेदोऽखिलो धम्ममूलम् ' - वेदाद्धम्र्मो हि निर्बभौ ' इत्यादि सिद्धान्त स्थापित हुए हैं । आत्मबुद्धिमूला विचारप्रधाना वेदशास्त्रानुप्राणिता संस्कृति, तथा मनःशरीरमूलक आचारप्रधान-स्मार्त्त आचार, और पौराणिक प्रायोजन - रूपेण द्विधा विभक्त सांस्कृतिक आचार, इन दोनों अलौकिक - लौकिक अनुबन्धों के माध्यम से ही कठिनता, और सरलता व्यवस्थित है, जिनका पूर्व - परिच्छेदों में भी दिग्दर्शन कराया जाचुका है ( देखिए पृष्ठसं ० ११६ ) । संस्कृति से अनुप्राणित आत्मबुद्धिसम्मत विचार मनःशरीर-प्रधाना लोकदृष्टि से जहाँ - ‘ कठिन ' है, वहाँ सांस्कृतिक आचार से अनुप्राणित मनःशरीरसम्मत आचार सर्वथैव-' सरल ' हैं | भारतीय आचारात्मक कर्त्तव्य के आदेश जहाँ अत्यन्त ' सरल ' हैं - " सत्यं वद, ध चर, स्वाध्यायोऽध्येतव्यः, अहरहः सन्ध्यामुपासीत, मातृदेवो भव, पितृदेवो भव " इत्यादिरूपेण, वहाँ इह्रीं सरलतम आचारों की मौलिक - रहस्यात्मिका ' संस्कृति ' लक्षणा वेदशास्त्रसिद्धा विचारपद्धति लोक दृष्ट्या लोक-मानवों के लिए अवश्य ही -- ' कठिन ' बनी हुई है, जिसकी यह कठिनता संस्कृति के तत्त्वानुत्रन्धी उन पारि-भाषिक शब्दों से ही अनुप्राणित है, जिनके सम्बन्ध में पर्य्यायशब्दों का प्रात्यन्तिक प्रभाव है । और हम समझते हैं, -पारिभाषिक- विचारप्रधान आज के भूतविज्ञाननिरूपक लोकनिबन्ध भी सर्वसाधारण के लिए तो बोधगम्य नहीं बन सकते, नहीं बनाए जासकते | विचारप्रधान - साहित्य विचारनिष्ठापूर्वक ही समन्वित हो-सकता है । कदापि दृष्टिनिक्षेपमात्र से उपन्यास - गल्पादि वत् सर्वसाधारण के लिए वह बोधगम्य नहीं बन सकता | चिन्तन - मनन - स्वाध्यायनिष्ठा ही इन ' विचार ' क्षेत्रों में- ' सरलता ' उत्पन्न कर सकती है । अतएव विचारप्रधाना वेदशास्त्र की ' मूलसंस्कृति ' के सम्बन्ध में सर्वसामान्यबोधानुगता - लोकप्रियता का अन्वेषण करने जैसी भ्रान्ति तो हमें कदापि नहीं कर लेनी चाहिए । ' प्रचार ' का ' आचार ' से ही सम्बन्ध माना गया है, न कि ' विचार ' से । अर्थात् ' प्रचार ' से कदापि शब्दोद्घोष अभिप्र ेत नहीं है । अपितु कर्त्तव्यकर्म्म का आचरणात्मक अनुगमन हीं इसका ' प्रचार ' माना गया है । अतएव धर्म्म कभी प्रचार की वस्तु नहीं है, जैसी कि भ्रान्ति अनेक शताब्दियों से प्रचलित है । धर्म्म का आचरण ही हुआ करता है, न कि प्रचार | धर्म्मप्रचारव्यामोहन जब से इस देश में उपक्रान्त हुआ है, तभी से इस धर्म्म का आचारपक्ष शिथिल होगया है । जिसप्रकार आधार की विस्मृतिने धर्म को विस्मृत करा दिया है, तथैव विचार की विस्मृतिने संस्कृति के स्वरूप को अभिभूत कर लिया है । और यों केवल उच्च-उद्घोषात्मक आचार - विचार - शून्य प्रचारामत्क - प्रदर्शन - व्यामोहन से भारतराष्ट्र की विचारमूला संस्कृति, तथा आचारप्रधाना कर्त्तव्यनिष्ठा, दोनों हीं अन्तम्मुख बन गए हैं । प्रस्तुत शतपथ - भाष्य के द्वारा हम अपने * - प्रत्याशं प्रचरन्ति धर्म्मकथकाः सन्ध्याऽपि वन्ध्यायते । १२५
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श्रात्मनिवेदन अन्तर्जगत् में हीं विचारात्मिका संस्कृति के संस्मरण के लिए प्रयत्नशील हैं । अतएव तन्मर्य्यादानुबन्ध से पारिभाषिक शब्दों को ही अपना आराध्य मान लिया गया है प्रस्तुत भाष्य में, जिसकी - पारिभाषिकी कठिनता ही वास्तविक - स्वरूप है । अतएव हम कदापि उन प्रचारकों का, सभामञ्चस्थ धर्मप्रचारकों के उद्घोषों का अनुरञ्जन नहीं कर सकते इस संस्कृतिप्रधान - वेदस्वाध्याय से, जो अपनी उदारता से न केवल मानवों में हीं, अपितु प्राणीमात्र में वेदज्ञान के प्रचार के लिए प्रतिक्षण श्राकुल- ध्याकुल बने रहते हैं । उनके इन उद्गारों के प्रति तो हम निम्न लिखित सूक्ति का ही संस्मरण कर लेते हैं कि— स्यादन्यः परमेश्वरः, स हि नवं ब्रह्माण्डमुत्पादयेत् -तत्राप्युल्बण - याच्यवाचक- गुणान् वेदान् - समुल्लासयेत् । तान्विन्देत चतुष्पदान्तजनता, चेष्टेत साप्युत्पथं — वाद्य सभाजुषां हि हृद्वयोदगारोऽपि पारं नयेत् ॥ - प्राचीनसूक्तिः ' आत्मनिवेदन ' अधिक विस्तृत होगया है अमुक अनिवार्य अनुबन्धों के कारण । अतएव ' भाष्य ' के सम्बन्ध में दो शब्द निवेदन कर ' आत्मनिवेदन ' उपरत किया जारहा है | भगवान् याज्ञवल्क्य के द्वारा उपनिबद्ध शतपथब्राह्मण दिग्देशकालानुबन्ध से सम्भवतः वेद का वैसा ग्रन्थ है, जिसमें प्राय: संक्षेप से सभी तात्त्विक - विज्ञानधाराओं का, एवं सर्वान्ते च ( चौदहवें काण्ड में ) विज्ञानधाराओं की आधारभूता ज्ञानधारा III भी समावेश होगया है । यों शतपथ ' सर्वज्ञान - विज्ञान - निधि ' प्रमाणित होरहा है | एकमात्र इसी अनुबन्ध से हमने इस भाष्य का नामकरण— ‘ हिन्दीविज्ञानभाष्य ' रूपेण समन्वित मान-लिया है । ' अक्षरार्थ - समन्वय ' को जहाँ- ' टीका ' कहा जाता है, विशेष सूचनाओं को जहाँ ' - टिप्पणी ' माना गया है, वहाँ ग्रन्थानुगत शब्दों की पारिभाषिकी व्याख्या ही - ' भाष्य ' नाम से व्यवहृत हुई है । शथपथ की टीका, टिप्पणी, किंवा मूलानुवाद कदापि शतपथ के पारिभाषिक शब्दों का तत्त्वार्थसमन्वय नहीं कर सकते । वेदों पर सर्वश्री सायणाचार्य्यं के, अथवा तो अन्य कतिपय पुरातन विद्वानों के जो भाष्य उपलब्ध होते हैं, वे प्रकृति - प्रत्यय - धातु - उपसर्ग - निपातादि- लक्षण - व्याकरण के अनुबन्धों से अनुप्राणित अक्षरार्थमात्र समन्वयात्मक, यत्रतत्र विशेषसूचनात्मक - टीका - टिप्पणी अनुवादादि ही कहला सकते हैं, जिनका - ' मक्षिकास्थाने मक्षिकापातः ’ के अतिरिक्त और कोई मी पुरुषार्थ नहीं माना जाता । लौकिक साहित्य का अवश्य ही टीका - टिप्पणी - अनु-वादादि से यथाकथञ्चित् समन्वय होसकता है । किन्तु रहस्यपूर्णा- गभीरार्थसमन्विता - परिभाषाओं से समन्वित वेदशास्त्र के मर्म्म का तो किसी भी टीका, अथवा तो टिप्पणी, किंवा अनुवाद से कदापि समन्वय सम्भव नहीं है । तदर्थ तो पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत यशोगान हीं अनिवार्य्यरूपेण अपेक्षित है । वही * - पूज्य श्राचार्य श्रीश्रोझाजी महाराज शतपथ का अध्यापन कराते हुए कहा करते थे कि, शत-पथब्राह्मण की ज्ञान - विज्ञानात्मिका - परिभाषाएँ मन्त्रब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेदशास्त्र की कुंजी है, जिसके द्वारा वेदाव में सुगमता से सन्तरण सम्भव है । १२६