Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 131–140
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140
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शतपथ - प्रथमखण्ड हुआ है यथामति इस ग्रन्थ की उपासना के आधार पर । अतएव इसका ' भाष्य ' नामकरण मान लिया गया है । अन्वर्थ यह निर्विवाद है कि, वैध - यज्ञों ( मनुष्यकृत - यज्ञकर्मों ) को आधार बना कर इन कर्म्मपद्धतियों के अनुपात से ही ब्राह्मण - ग्रन्थों में ' पारिभाषिक - ज्ञान - विज्ञान - तत्त्वों ' का स्वरूप- विश्लेषण हुआ है । अत-एव जबतक वैध - कर्म्म - यज्ञों की श्रौतसूत्रानुगता चिरन्तना कर्म्मपद्धति को सर्वात्मना समन्वित नहीं कर लिया जाता, तत्रतक ब्राह्मणग्रन्थों में प्रतिपादित वैज्ञानिक तथ्यों का समन्वय कदापि सम्भव नहीं है । इसीलिए प्रस्तुत ' विज्ञानभाष्य ' में हमें सुप्रसिद्ध ग्रन्थ- ' कात्यायन श्रौतसूत्र ' के द्वारा समन्विता यज्ञकर्म्म- पद्धतियों का भी. ब्राह्मणग्रन्थ।नुपात से समन्वय कर लेना पड़ा है । पारायणपाठानुगत सस्वर - ' निर्भु ' जपाठा ' त्मक मूलपाठ का हमने ( भाष्ये ) इसलिए समन्वय आवश्यक नहीं माना है कि, भाष्य का प्रमुख उद्देश्य प्रारम्भिक आदे-शसूत्र का- “ षडङ्गो वेदोऽध्येयः ' यह अंश नहीं है । अपितु प्रमुख उद्देश्य तदुत्तर का ' ज्ञेयश्च ' अंश ही है, जिस विज्ञान समन्वयात्मक - ' ज्ञेय ' भाव की दृष्टि से भगवान् ऐतरेय ने पद - वाक्य व्यवच्छेदात्मक ' प्रतॄण्ण-पाठा ' त्मक मूलपाठ को ही प्रमुख माना है । निर्भुजपाठ, तथा प्रतृरणपाठ, इन दोनों पाठों से सम्बन्ध– रखने वाली आर्षपरम्परा का आगे के ' पारिभाषिक- सूचना - प्रकरण ' में विस्तार से स्पष्टीकरण कर दिया गया है । वैज्ञानिक - पारिभाषिक -- शब्द - पद - वाक्यादि - व्यवच्छेदात्मक - स्वर - ' प्रतृष्णपाठात्मक मूलपाठ ' ही प्रस्तुत भाष्य का ' मूलवेदभाग ' नामक पहिला विभाग हैं, जिसके मूलसन्दर्भों के तत्तदुपक्रम - स्थलों में सर्वत्र " ( मूल ) ", यह सङ्क ेत कर दिया गया है । मूलपाठ के अनन्तर भाष्य मे - ' प्रनुवाद ' रूप मूलपाठ के ' अक्ष-रार्थमात्र ' का समन्वय - प्रयास हुआ है । यही भाष्य का दूसरा प्रक्रम विभाग है । तदनन्तर कात्यायनश्रौतसूत्रा-नुत्रन्विनी यज्ञपद्धतियों का ' यथासम्भव ' समन्वय - प्रयास हुआ है । ' यथासम्भव ' इसलिए कि, जत्रतक * यज्ञकर्म्म वैसा वैज्ञानिक - कर्म है, जिसमें यत् किञ्चित् भी भूल यज्ञकर्त्ता का अनिष्ट कर बैठती है । अतएव यज्ञसम्प्रदाय के यज्ञाचाय्यने कर्म्मकाण्ड की शिक्षा के लिए एक ' शुष्केष्टि ' नामक प्रकार व्यवस्थित कर दिया है । अपने अपने स्वाध्याय क्षेत्रों में हीं अमुक स्थानविशेत्रों में यज्ञकुण्ड - वेदि - यज्ञपात्र- यज्ञिय-द्रव्य, आदि आदि यच्चयावत् यज्ञपरिग्रहों का संग्रह कर ठीक यज्ञकर्म के अनुसार ही जिस यज्ञकर्म का अभ्यास किया जाता है, वही अभ्यास ' शुष्केष्टि ' कहलाया है, जिससे अध्येता यज्ञकर्म्मपद्धतियों में निर्भ्रान्त रूपेण निष्णात होजाता है । तदनन्तर ही उसे ' यज्ञकर्म्मप्रवृति ' का अधिकार प्राप्त होता है । इस शुष्केषि-प्रकार के अनुगमन के बिना ' यज्ञकर्म्मपद्धति ' का यथावत् समन्वय सम्भव नहीं है, तो बिना ' यज्ञकर्म्म-पद्धति ' के परिज्ञान के तदाधारेण प्रक्रान्त ' यज्ञविज्ञान ' का समन्वय सम्भव नहीं है । हमारा संकल्प था कि, अपनी इस अज्ञता के परिमाज्जैन के लिए मानवाश्रम संस्थान में हम यज्ञकर्म्म -पद्धति - शिक्षक- ' शुष्केष्टि ' प्रकारों की भी अनन्यनिष्ठा से आराधना करते । किन्तु अमुक कारणों से तत्संकल्प में हम अद्यावधि सफल नहीं होसके । फलत: ‘ यज्ञकर्म्मपद्धति ' की दृष्टि से हमें शून्य शून्यं हीं बना रह जाना पड़ा । यही हमारे - ' यथासम्भब ' शब्द का समन्वय है | हमें तत्त्वशोधसंस्थान के मन्त्री महोदय से यह आशा रखनी चाहिए कि, यदि वे ' शतपथविज्ञानभाग्य ' के ' यज्ञविज्ञान ' को यथायवत् प्रकाशित करवाने की कामना रखते हैं, तो उ ã शीघ्र ही अपने संस्थान के द्वारा – ' शुष्केष्टि - प्रकारों की व्यवस्था का ही अनुग्रह करना चाहिए । १२७
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श्रात्मनिवेदन पद्धतिज्ञानोपयिक सुप्रसिद्ध ' शुष्केष्टिप्रकारों ' का अनुगमन नहीं कर लिया जाता, तत्रतक - यज्ञिय - कर्म्म-पद्धतियों ' का साङ्गोपाङ्ग समन्वय सम्भव नहीं बना करता । इसप्रकार प्रतृष्णपाठात्मक मूलपाठ, अक्षरार्था-त्मक अनुवाद, श्रौतसूत्रानुगता कर्म्मपद्धति, इन तीन प्रक्रमों के अनन्तर ही कर्म की मौलिक - उपपत्ति से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञविज्ञान की यौगिक परिभाषाओं से, तथा यज्ञविज्ञान के मूलाधार ब्रह्मविज्ञान की मौलिक परिभाषाओं से समन्वित मुख्य लक्षीभूत ' भाष्य ' नामक चतुर्थ प्रक्रम का ही भाष्य में समा-वेश हुआ है । और यही प्रस्तुत ' शतपथ भाष्य ' में निरूपित प्रक्रमों का संक्षिप्त स्वरूप परिचय है । छस्सौदस-पृष्ठात्मक ( ६१० ) इस प्रथम खण्ड में पुरुषार्थ - कम्र्मात्मक - दर्शपूर्णमास- यज्ञानुबन्धी- १ - व्रतोपायन-कर्म्म, २ - ब्रह्मवरणकर्म्म, ३ श्रपांप्रणयनकर्म्म, ४ - परिस्तरण - पात्रासादनकर्म्म ५ - वाक्संयमन कर्म्म -६ - पात्रप्रतपनकर्म्म, ७ - हविग्र हरण हविःसादनकर्म्म, प्रोक्षणकर्म्म, ह - पुरोडाशसम्पादन कर्म्म, इन नौ ( E ) ऋत्त्वर्थकम्र्म्मो की इतिकर्त्तव्यता का, एवं तत्कर्म्मविज्ञानों का का ही समन्वय - प्रयास हुआ है- स्वान्तः-सुखायैव । पाण्डुलिषिरूपेण शतपथभाग्य अनुमानतः बीस सहस्र पृष्ठों ( २०००० \ में सम्पन्न हुआ है, जिसमें से तीन सहस्र पृष्ठ तो शतपथ के केवल प्रथमकाण्ड को ही समर्पित कर देने पड़े हैं । शेष सत्रह सहस्र - पृष्ठों की पाण्डुलिपि में शेष १३ काण्डों का समन्व प्रयास हुआ है । प्रारम्भिक विस्तार का कारण ' पारिभाषिक- समन्वय ' ही है । शतपथ - प्रथमकाण्ड के त्रिसहस्रपृष्ठात्मक भाष्य में यथाशक्य शतपंथ की सभी सामान्य- परिभाषाओं का संक-लन कर दिया गया है । इस पारिभाषिक दुर्बोध्यता के कारण हीं प्रस्तुत भाष्य में अमुक विषयों का दृष्टिकोणभेद से अनेकचार कर्म्मस्थल – भेद से पुनरावर्तन हुआ है, जोकि पुनरावर्त्तन स्वयं ब्राह्मणग्रन्थों की एक विशेष शैली है | समानोपपत्तियों ( विज्ञान रहस्यों ) को ब्राह्मणग्रन्थ में उन सभी आवृत् - भावों ( पद्धतियों ) के साथ ऋषिने पुनः पुनः श्रावर्तित किया है । ग्रन्थमर्थ्यादा के संरक्षणानुबन्ध से, सर्वोपरि विलुप्तप्राया - परिभाषाओं की दुर्बोध्यता के अनुबन्ध से हमें प्रस्तुत भाष्य में उस पुनः - पुनरावर्त्तन को ही प्रमुख मान लेना पड़ा है, जिसे ग्राज के बुद्धिमत्तापूर्ण जगत् में - पुनरुक्तिदोष ' कहा गया है । किन्तु हमने अपनी स्वाध्यायनिष्ठासंरक्षण के अनुबन्ध से महर्षि पतञ्जलि के स तु दीर्घकालादर - नैरन्तर्य्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः ' ( पा ० पो ० सू ० ) इस आदेश को शिरोधार्य्यं कर इस ' पुनरुक्तिदोष ' को स्वाध्यायनिष्ठासंरक्षक ' महान् गुण ' ही मान लिया है, जो नीरक्षीरविवेकी मर्म्मज्ञ पाठकों की सहज प्रज्ञा के द्वारा - ' यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि ' अनुबन्ध से स्वत: ही परिमार्जित होता रहेगा । सन् १६३० में, अर्थात् आज से २८ वर्ष पूर्व, अर्थात् अपनी भौतिक आयु की २२२३, वर्ष की उस आयु में शतपथभाष्य के प्रारम्भभित्र ३-४ काण्डों की पाण्डुलिपि सम्पन्न होगई थी, जो आयु दिग्-देशकालानुबन्ध से सर्वथैव प्रत्यक्ष - प्रभावात्मिका भाबुकता से श्रोतप्रोत मानी गई है । समझने की अपेक्षा ' समझाने की श्रातुरता ही व्यग्र बगाए रहती है उत्तरदायित्त्वशून्या इस आयु की सहजभावुकता तद्युक्त भावुक मानव को | इसी भावुकतावेश से प्रथमकाण्ड की भाषा में भावुकतापूर्ण तात्कालिक वैसे कतिपय अनुरञ्जना-त्मक भाव समाविष्ट होपड़े, जिनका समावेश उत्तरदायित्त्वपूर्णा निष्ठा की दृष्टि से असामयिक, अतएव सर्वथा अशोभनीय, अतएवच अनुचित ही माना जायगा । आवेशाविष्ट । तदवस्था के आवेश का प्रमुख कारण था दिग्देशकालानुबन्धिनी- वह ' उपयोगिता ', जिसके माध्यम से प्रत्येक पिता अपनी सन्तति के लिए सुखस्व-१२८
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शतपथ - प्रथमस्खण्ड प्नद्रष्टा बना रहता है । फिर उन स्त्र ० श्रद्धय पितुश्री का स्वप्न माहश जड़मति के लिए तो ओर भी अधिक चिन्ता का ही विषय बना हुआ था, जिनके ज्येष्ठपुत्र हमारे श्रद्ध ेय स्व ० भ्राता: दिग्देशकालानुबन्धिनी प्रतीच्यशिक्षा में सर्वात्मना सफलता प्राप्त कर लोकदृष्टया सभी लोकचिन्ताओं से उन्मुक्त होगए थे । जब हमने पितुःश्री के दृढतम नियन्त्रण से भी आचार्य्यचरण पूज्य श्रोझाजी से वेदाध्ययन अवरुद्ध न कर किसी लोक-क्षेत्र का अनुगमन नहीं किया, तो उसी अवस्था में हमारे उद्बोधन के लिए ही पितुःश्री ने हमारा निष्काशन ही कर दिया । फलत: ५ ) रु ० मासिक की एक भृतकाध्यापकी के द्वारा केवल गुड़ और चना खाकर हमें २ वर्ष पर्यन्त अपनी वेदस्वाध्यायनिष्ठा सुरक्षित रखनी पड़ी । करुणा की सगुणप्रतिमा पितुःश्री के परीक्षण का उपराम हुआ, और पुन ं इत्यादि । इस घटना से हमारा बालमन सहजरूपेणैव समुत्ते जित्ति होपड़ा, जिसके अनुबन्ध से तद्युग के प्रथमकाण्डीय शथपथभाष्य में भारतराष्ट्र के सांस्कृतिक - अधःपतन के लक्ष्य तत्त-त्स्थलों में भावुकतापूर्णं दिग्देशकालानुचन्धी उद्गार विनिःसृत होपड़े । आगे चल कर सम्भवतः सन् १६३२ में उक्त प्रथमकाण्ड का बड़ी कठिनता से मासिकरूपेण प्रकाशन उपक्रान्त हुआ । कठिनता से इसलिए कि, ब्रिटिशराज्य की भक्ति से ओतप्रोत जयपुरराज्य ने ' मासिक - पत्र ' नाम की अमुक आशङ्का से एक वर्ष पर्य्यन्त तो प्रकाशन की स्वीकृति ही प्रदान नहीं की । कष्टसाध्य प्रयत्नों से एक वर्ष में स्वीकृति मिली भी, तो पितुःश्री ने व्यर्थ के व्ययसाध्य इस कार्य्यं का प्रकाशन सामयिक नहीं माना । दुराग्रहा-से इस अंश में सफलता मिली, तब कहीं ३२ पृष्ठों के अनुपात से प्रथमकाण्ड का प्रकाशन उपक्रान्त नुग्रह हुआ, जिसे छपवाने से प्रारम्भ कर पोस्टेज करने तक के सम्पूर्ण संघर्ष सहते हुए भी इसे क्रमबद्ध हम प्रका-शित न करसके । सहसा सन् ३५ में पिनुःश्री का स्वर्गप्रयाण होगया, और शतपथ का प्रकाशन प्रायः श्रव-रुद्ध ही होगया | तदनन्तर अव्यवस्था से ही यदा कदा कुछ एक त्रैमासिक - अङ्कः प्रकाशित होते रहे । और यों अपनी दिग्देशकालानुबन्धिनी विषमता से इस दिशा में हम अपनी व्यवस्थिता - प्रकाशनकामना सफल न करसके । अनुमानतः २० वर्षों के अनन्तर पुनः ' शतपथ प्रकाशनकामना ' ' राजस्थानवैदिक - तत्त्वशोध-संस्थान ' के द्वारा मूर्तरूप में परिणत होने जारही है । हमारी इच्छा थी कि, आरम्भ के भाग से पुनः संशो-धन कर दिया जाता, एवं तदनन्तर ही इसका व्यवस्थित रूप से प्रकाशन उपक्रान्त होता । किन्तु एकाकीरूपेण अत्र इस गुरुतम - भार का वहन कठिन प्रतीत होरहा है निरतिशय श्रम के कारण शरीर के शिथिलप्राय होजाने से | इधर तत्त्वशोधसंस्थान की आर्थिक स्थिति अभी ' नहीं ' के समान है । संस्थान के सम्मान्य मन्त्री सुप्रसिद्ध साहित्यसेवी माननीय डा ० श्रीवासुवेवशरण अग्रवाल महोदय के त्रिवार्षिक - प्रचण्ड प्रयास के अनन्तर विगत मार्च में सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश से, एवं तदाकर्षणेनैव राजस्थान प्रदेश से संस्थान को जो स्वल्पतम - अनु-दान प्राप्त हुआ है, उस से तो प्रस्तुत २ - ३ - प्रकाशनों को विज्ञानानुगत - शिल्पों से अनुप्राणित - चित्रों से भी समन्वित नहीं किया जासका । श्रतएव तत्स्थान में सामान्य - रेखाचित्र ही यत्र तत्र समाविष्ट होपाए हैं । * - श्रद्ध ेय पितुःश्री स्व ० पूज्यश्री बालचन्द्रजी शास्त्री ÷ -श्रद्ध ेय ज्येष्टभ्राता स्व ० श्रीहरिश्चन्द्रजी बी ० ए ० एल ० बी ०, जो जयपुर के राजनैतिक क्षेत्र में- ' बाबा हरिश्चन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध हुए । १२६
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आत्मनिवेदन निरन्तर तीन सहस्र - वर्षों की सुषुप्ति के कारण हीं, ऐसा प्रतीत होरहा है कि, भारतराष्ट्र की सांस्कृ-तिकी - नैष्ठिकी - चेतना को अभिव्यक्त होने में अभी समय लगेगा । यही कारण है कि, सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भी मानने मनवाने वाले वर्त्तमान भारतराष्ट्र की राष्ट्रीया प्रज्ञा का अपनी इस मूलभूना, राष्ट्र की प्राणप्रतिष्ठा -लक्षणा सांस्कृतिक - निधि को और अबतक ध्यान आकर्षित ही नहीं हो सका है । आकर्षण नहीं होने पय्यन्त । * भी स्थिति गच्छतः स्खलनरूपेण सह्य थी । किन्तु जब हम यह देखते, और सुनते हैं कि, वर्तमान सत्ता-तन्त्र के कतिपय वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता भो भारत की इस मूलनिधि की आए दिन - ' प्राचीनता ' - ' रूढिवादी ' आदि शब्दों से आलोचन - में हीं प्रवृत्त रहते हैं, तो हमें सहसा स्तब्ध ही रह जाना पड़ता है । और स्वनिष्ठा वञ्चित इत्थंभूत सांस्कृतिक - अधःपतन को देखते हुए हमें तो भारत का भविष्य अन्धकारावृत ही प्रतीत होने लगऩा है प्रत्यक्षमूला भावुकता के अनुबन्ध से । अतएव एकमात्र जनतन्त्रानुगता आस्था - श्रद्धा - परिपूर्णा आत्म-निष्ठा ही वह आलम न शेष रह जाता है, जिस के आधार पर प्रतिष्ठित रह कर ही एतत्पूर्व के सांस्कृतिक-अधःपतन - युगों में भी नैष्ठिक जनतन्त्र के द्वारा ही राष्ट्र की इस मूलनिधि का संरक्षण - प्रयास हुआ है, एवं धर्मो रक्षति रक्षितः ' अनुबन्ध से इसी रक्षित निधि के द्वारा राष्ट्रने अपनी रक्षा की है । उसी जनतन्त्र के परोक्ष, तथा प्रत्यक्ष सहयोग बल पर हमारा यह सांस्कृतिक - प्रयास येन केन रूपेण विगत ३० ( तीस ) वर्षों से प्रक्रान्त है, प्रक्रान्त ही रहेगा दिग्देशकालानुबन्धिनौं सभी आलोचना - प्रत्यालाचनाओं को अपना महान् पुरस्कार मानते हुए ही । अन्त में हम उन विभिन्न वर्गीय मानवश्रेष्ठों से भी भारतराष्ट्र के इस मूलप्राणनिधिरूप - वेदशास्त्र के सम्बन्ध में किञ्चिदिव आत्मनिवेदन कर देना अपना आवश्यक कर्त्तव्य मान रहे हैं, जिन की दृष्टि दुर्भाग्यवश इस मूलनिधि की ओर से तटस्थप्राया ही प्रमाणित होरही है । फलस्वरूप राष्ट्र की सभी प्रगतियाँ प्रात्यन्तिकरूपेण भातिसिद्धिा ही प्रमाणित हो रहीं हैं । ( १ ) -- सनातनधर्म्म के महान् स्तम्भरूपेण प्रसिद्ध साम्प्रदायिक श्रद्धय आचार्यप्रवरों से! भारतराष्ट्र के धर्म्मस्तम्भरूप अपने इन श्रद्धेय आचार्य - प्रवरों से इस सम्बन्ध में हम क्या निवेदन करैं, जब किं, दिग्देशकालानुबन्धी उन के सभी सम्प्रदायों का मूल उद्घोष - ' वेदमार्ग -प्रतिष्ठापन ' नाम से ही भारत की सत्र दिशाओं में मुखरित होता चला रहा है । किन्तु - स्वय ' वेदशास्त्र ' के सम्बन्ध मे प्राचार्य्यप्रवरों के द्वारा वैसा एक भी नैष्ठिक - प्रयास श्रुत नहीं है, जिस के आधार पर हम उन के ' वेदमार्गप्रतिष्ठापन ' उद्घोष के प्रति उन्मुक्त हृदय से आस्था व्यक्त करसके ं । आज से अनुमानतः २० वर्ष पूर्व बम्बईयात्रा के प्रसङ्ग से वहाँ के ' मोटा मन्दिर ' के सर्वस्व शुद्धाद्वैत – सम्प्रदायाचार्य्य गोस्वामिकुलतिलक श्रद्धय स्व ० श्रीगोकुलनाथजी महाराज से अत्यन्त ही प्रणत– भाव से जब हमने आप ही के ' पुष्टिमार्ग ' सम्प्रदाय के मूल प्रवर्त्तक आदि आचार्यप्रवर श्रीबल्लभा-चार्य्य जी महाराज के * ' वेदाः- श्रीकृष्णवाक्यानि समाधिभाषा व्यासस्य ' इस मन्तव्यसूत्र से अनुप्रा-* ‘ वेदाः ’, अर्थात् ‘ मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र ', ' श्रीकृष्णवाक्यानि ', अर्थात् ' श्रीमद्भगवद्गीता ', ‘ समाधिभाषा - व्यासस्य, ' अर्थात् श्रीमद्भागवत का वह दशमस्कन्ध, जिस के सम्बन्ध में इस सम्प्रदाय की. ऐसी मान्यता है कि, जब भगवान् वेदव्यास को वेदसंहिताओं के संकलन से, तथा पुराणोपपुराणों के १३०
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शतपथ - प्रथमखण्ड णित सर्वारम्भ के –'वेदा: ' के सम्बन्ध में जिज्ञासा अभिव्यक्त की थी, तो उत्तर में हमें निराश ही बन जाना पड़ा था । लगभग यही दशा अन्यान्य सम्प्रदायाचार्यों की है । वेदशास्त्र के प्रति अपनी पूर्ण श्रद्धा रखने वाली भी ये सम्प्रदाएँ अपनी अपनी साम्प्रदायिक - मान्यताओं के प्रचार - प्रसार के लिए ही, तत्सफलता के लिए श्रधिकाधिक - शिष्य भक्त - गण - संग्रह के लिए ही प्रयत्नशील देखीं, एवं सुनीं गई हैं, जिस इस साम्प्रदायिक– श्रभिनिवेश के कारण हीं श्रुति - स्मृति - पुराणसिद्ध, ज्ञानविज्ञानात्मक शाश्वत - ' सनातनधर्म्म ' जैसा - ' सार्व-भौमधर्म्म ' भी दुर्भाग्यवश दिग्देशकालानुचन्धी वैसा ' मतवाद ' मात्र ही प्रमाणित होगया है, जिस ' मत – वादत्त्व ' ने हीं आज के सत्तातन्त्र को ' धर्म्मनिरपेक्ष ' जैसे अनार्य्यजुष्ट - भाव का अनुगामी बना दिया है । यदि हमारे साम्प्रदायिक- श्राचार्य्यप्रवर श्रुतिसिद्ध - ज्ञानविज्ञान -- समन्वित - सनातन तत्वों से अनुपाणित मूल-धर्म्म को ही अपना लक्ष्य बनाए रहते, तो फिर किसी को भी इस सार्वभौम सनातनधर्म्म के प्रति ' निर-पेक्षता ' जैसे ब्रह्मण्य शब्द के उच्चारणमात्र का भी साहस नहीं होसकता था । श्रद्धाशील श्रास्तिक — नन-तन्त्र की श्रद्धा से अर्पित दक्षिणाद्रव्य से अतुलिता -- सम्पत्ति के अधिष्ठाता हमारे सम्प्रदायाचार्य यदि चाहते, और आज भी यदि चाहें, तो वेदशास्त्र की विलुप्तप्राया ज्ञानविज्ञाननिधि का पुनः भारतराष्ट्र में व्यापक रूपेण प्रतिष्ठापन- सम्भव है । किन्तु? | इस किन्तु? के समाधान के लिए ही हम आज अपने प्राचार्य्य-प्रवरों के सम्मुख करबद्धरूपेण इन वेदपरिभाषाओं के माध्यम से उपस्थित हैं कि, वे अपनी साम्प्रदायिक-मान्यताओं को अपने अन्तर्जगत् में हीं सीमित - मर्य्यादित बना लेने का निःसीम अनुग्रह करते हुए धर्म-वि'लवात्मक - सांस्कृतिक - संकटकालात्मक वर्त्तमान युग में एक बार अपनी समस्त शक्ति का मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के पारिभाषिक अध्ययनाध्यापन को पुनरुज्जीवित करने में हीं ' दान ' करने की कृपा व्यक्त करदेंौं । तभी उनकी सम्प्रदाएँ भी सुप्रतिष्ठित रह सकेंगी उन के शिष्यमण्डलों में । अन्यथा तो जैसा कुछ आज के धम्मंनिरपेक्ष वातावरण में उन के लिए भी सब कुछ ' अन्यथा ' ही होता जारहा है, जिस से हमारे वे प्राचार्य्य-प्रवर भी अत्र तो अपरिचित नही रह गए होंगे, इत्यलमतिपल्लवितेन श्राचाय्र्यकथाप्रसङ्ग ेन । ( २ ) - सनातनधम्मवलाम्बी श्रद्धय संस्कृतज्ञ विद्वानों से! दूसरा स्थान भारत के उन सनातनधर्मी विद्वानों, पण्डितों का आता है, जिनकी कृपा, तथा अकृपा पर ही भारत की संस्कृति में उच्चावच परिवर्तन होते आ रहे हैं । असंख्य संख्या - वितान - को समलङ्कत करते रहने वाले, उपाध्याय शास्त्री - श्राचार्य्य - षड्दर्शनाचार्य्य - मीमांसाधर्म्मतन्त्रकोविद - उपदेशक - महोप देशक - महामहोपदेशक -- व्याख्यानवाचस्पति -- पुराणवाचस्पति आदि आदि लोकोत्तरा उपाधियों से सुवि-संकलन से भी शान्ति नहीं मिली, तो अन्ततोगत्त्वा आप मनोवाक्काय का संयम कर ' समाधि ' में लीन होगए | इस समाधि - अवस्था में हीं उनके अन्तःकरण में भगवान् नन्दनन्दन के ( सर्वमूर्ति वसुदेवनन्दन-कृष्ण के नहीं ) प्रति अनन्य भक्तिभाव आविर्भूत होपड़ा । फलतः समाधिदशा में ही व्यासदेव के मुख से भक्तिरस से ओत - प्रोत भगवल्लीलाचरित्र विनिर्गत होपड़ा, और अन्त में इसी से व्यासदेव को चिरशान्ति, वास्तविक शान्ति मिल सकी, ( वही समाधिभाषा श्रीमद्भागवत का कृष्णचरित्रवर्णनात्मक दशमस्कन्ध कहलाया है ) । तदित्थं वेद्, गीता, और भागवत का दशमस्कन्ध, ये तीन हीं प्रमुखरूपेण प्रमाणस्तम्भ हैं ‘ शुद्धा-द्वैतसम्प्रदाय ' के । १३१
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श्रात्मनिवेन भूषित, अपने प्रखर पाण्डित्य से भूतल को विकम्पित करने में समर्थ इत्थंभूत विद्वानों की ' जोवितदशा ' में हीं उनकी आँखों के सम्मुख ही देखते देखते ही आज के स्वतन्त्र भारत के स्वतन्त्र - सत्ताधीशोंनें उनके परम-प्रिय ' सनातनधर्म्म ' को क्षणमात्र में हीं जिस कौशल से भारतीय - जनतन्त्र के लिए ' निरपेक्ष ' घोषित कर दिया, यह तथ्य अत्र तो इन विद्वानों के लिए परोक्ष नहीं रह गया होगा । यही नहीं, उनकी मूल संस्कृति के सर्वमूर्द्धन्य संस्थापक मर्य्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम, एवं षोडशकला सम्पन्न पूर्णावतार भगवान् वासुदेव-कृष्ण के इस लीलाधाम भारतवर्ष में स्वतन्त्र सत्ताजन्त्रने अपनी दशवार्षिकी ' स्वतन्त्रकालावधि ' में जहाँ एक बार भी ' राम कृष्ण की जयन्ती ' का संस्मरण भी ( अपनी धर्मनिरपेक्षता से करना ' उचित ' नहीं माना, वहाँ वही सत्तातन्त्र रामकृष्ण के भक्त भारतीय जनतन्त्र से संगृहीत धन की प्रचुर - आहुति से ' बुद्ध– जयन्ती ' का सोल्लास, साटोप प्रदर्शन करता हुआ, इस प्रदर्शन से अपनी ' धम्र्मनिरपेक्षता ' का मानो स्वयं ही उपहास करता हुआा तथ्यरूप से श्रुति - स्मृति - पुराणभक्त - तथाकथित विद्वानों का उपहास ही तो करता जा रहा है । ऐसा क्यों, और कैसे होपड़ा? । विद्वानों की तथोक्ता विद्यमानता में भी उनके अपने हीं सत्तातन्त्र के द्वारा मातिसिद्ध एक ' अवतार ' को तो मान्यता प्रदान, एवं शेष सत्तासिद्ध ' अवतार पुरुषों ' की प्रात्यन्किक उपेक्षा क्यों और कैसे होपड़ी?, प्रश्न का ,, और तत्त्वसम्मत एकमात्र उत्तर है - ' विद्वानों की जीवित मृत्यु ' । क्या अर्थ है - इस जीवित मृत्यु का १, सहज इस मर्म्मवेधक, उत्तेजक प्रश्न का समाधान तो वे विद्वान् ही भलीभांति कर सकेंगे, जिह्नोंनें दिग्देशकाला-नुबन्धिनी - साम्प्रदायिक - मान्यताओं को ही ' धर्म्म ' के आसन पर विराजमान कर साम्प्रदायिक साहित्य के विमोहन से ' निष्कारणं षड़ङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्चः ' इस आदेश की चिरकाल से प्रात्यन्तिक - उपेक्षा ही कर दी है । साम्प्रदायिक साहित्य, अभिनव न्याय, शास्त्रार्थप्रधान अभिनव व्याकरणग्रन्थ, एवं आज तो प्रधानरूपेण काव्य - नाटक - चम्पू आदि से समन्वित लोकसाहित्य, आदि आदि में हीं अपना पाण्डित्य - परिसमा'त करते रहने वाले विद्वानोंनें षडङ्गसमन्वित - वेदशास्त्र के प्रति जैसी उपेक्षा कर दी है लोकैषणात्मिका - तात्कालिकी वित्तैषणा कं कारणानुबन्धों से, उसी का यह घोरघोरतम दुष्परिणाम है कि, उसी वेदशास्त्र के बल से अमुक व्यक्तिविशेष के द्वारा उनके सनातन - धर्म्म सिद्धान्त सर्वथा ही आचारनिष्ठा से पराङमुख कर दिए गए । ज्ञानविज्ञानसम्मत श्रुतिसिद्ध पिण्डपितृयज्ञ [ प्रेतपितृश्राद्ध ], सगुणावतार, मूर्त्तोपासना, आदि श्रादि महान् शास्त्रीय-आचार भी उसी वेद के नाम पर वैदिक घोषित कर देने का साहस होपड़ा उस अमुक व्यक्ति के द्वारा । वेदशास्त्रस्वाध्यायरूप - महान् तपोऽनुष्ठान से ( १ ) पराङमुख होजाने के कारण हीं वेद के छल से ऐसे अकाण्ड-ताण्डव घटित - विघटित कर देने का दुस्साहस होपड़ा अमुक व्यक्ति की भावुकता से । इसी वेदानभ्यास से वेदसिद्ध निष्कारणात्मक आचार, तदनुगत - सहज - शास्त्रीय कर्म्म तो होगए शिथिल, एवं तत्स्थाने च मान्यतानुगत
( १ ) -वेदमेव सदाभ्यस्येचपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासोहि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥
आ है स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः ।
यः स्रग्न्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥
—मनुः २।१६६,१६७,। १३२
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शतपथ - प्रथमखण्ड मतवादात्मक - काल्पनिक आचार, काल्पनिक वर्म्म ही बन गए आराध्य इन विद्वानों के लिए । निष्ठाशून्य, प्राविहीन इत्थंभूतमतवादात्मक काल्पनिक आचारों की कृपा से ही कालान्तर में विद्वानों का ' प्राण ' मूर्च्छित होगया, ओजस्विता अन्तमुख बन गई, फलतः तन्द्रा - दीर्घसूत्रता - जड़ता - मिश्रित - ‘ आलस्य ' ही आविर्भूत हो— पड़ा | इसी आलस्य की कृपा से कर्त्तव्याचारनिष्ठामूला स्वावलम्बित्व की भावना भी कालान्तर में अभिभूत होगई, एवं शेष रह गई अन्ततोगत्त्वा वह ' अन्नदासता ', जिसे श्रु तिने सम्पूर्ण ग्रहों के समतुलन में ' महाग्रह-ग्राह ' ही कहा है, जिस महाग्रहने भीष्म, द्रोण जैसे महाप्राणों के भी प्राणों को मूच्छित कर दिया था । तदित्थ कारणतामूलक इतर व्यासङ्गों से, तथा निष्कारणात्मक- वेदशास्त्र की उपेक्षा से ही विद्वद्वर्ग क्रमशः आचारविहीनता, ( तत्स्थाने च मतवादानुगति ), तदनुप्राणित आलस्य, एवं तन्निबन्धन अन्नग्रह से जीवित अवस्था में हों -- ' मृत्यु ' संज्ञा का सम्मान्य लक्ष्य बन ही तो गया, जिसका राजर्षिने इन शब्दों में स्पष्टीकरण किया है कि-( १ ) - अधीत्य विधिवद्वदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्म्मतः । " इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्म्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥
( २ ) -- अनधीत्य द्विजो व ेदान्, अनुत्पाद्य तथा सुतान् ।
श्रनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥
—मनुः ६।३६,३७,। ( ३ ) –एवं यथोक्त ं
विप्राणां स्वधर्म्ममनुतिष्ठताम् ।
कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो! ॥
( ४ ) - स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
श्रयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राज्जिघांसति ॥
( ५ ) -- अनभ्यासेन वेदानां, आचारस्य च वर्जनात् ।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥
- मनुः ५ / २,३,४, वेदार्थ के तात्त्विक समन्वय से वञ्चित रह जाने के कारण हीं विद्वानों के द्वारा जनतन्त्र की जिज्ञासा का तात्त्विक - समाधान न होसका । जनतन्त्र की क्यों करें?, मूला जिज्ञासा का उत्तर जिस वेदशास्त्र के ज्ञानविज्ञा-नात्मक अर्थसमन्वय से अनुप्राणित था ( # ), उस वेदशास्त्र का व्यासङ्ग ही विद्वानों के लिए जब ' असङ्ग ' प्रमाणित होगया, तो जनतन्त्र की आस्था का विचलित होना स्वाभाविक ही था । और स्वाभाविक ही तो था उसका य
( * ) - ग्रर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते ।
धर्म्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥
—मनुः २,१३ ॥
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श्रात्मनिवेदन सहसा ‘ धर्म्मनिरपेक्षता ' जैसे उद्घोष के प्रति आसक्त होजाना । राजर्षि मनुने विद्वान् ब्राह्मण को सम्भ--वतः इस धर्मानुबन्ध से ही इत्थंभूत कटुतम उद्बोधनसूत्र प्रदान किया है कि, ' जो द्विजाति वेद का अव्य-यन न कर इतर लोक -- शास्त्रों का अध्ययन करता है, वह स्वयं, और उसका परिवार अपनी इस वर्त्तमाना जीवित - दशा में हीं यथाजात -- प्राकृत-- शूद्रदशा में हीं परिणत होजाता है ' * । अतएव जत्रतक हमारे ये श्रद्ध ेय विद्वान् निष्कारणभाव से मन्त्रब्राह्मणात्मक -- वेदशास्त्र को अध्ययन, और विजानन का अनुगामी नहीं बना लेंगे, तत्रतक कदापि ये अपने- ' सांस्कृतिक संरक्षण ' जैसे महान् उत्तरदायित्त्व का अंशतः भी निर्वाह न कर सकेंगे, जो ' न कर सकना ' ' जीवित मृत्यु ' के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं है । हमारी आस्था - परिपूर्णा ऐसी श्रद्धा है कि, राष्ट्रका यह श्रद्ध ेय विद्वद्वर्ग हमारे तथोक्त स्पष्टीकरण को लक्ष्य बनाता हुआ विलम्ब ही अपनी उस ' पुराणी - प्रज्ञा ' से इस ' पुरातन - आर्ष- वेदशास्त्र ' को अपनी तेजो-यी प्रतिभा - मेधा का अनुगामी बना लेगा, जिस अनुगमग के बिना उसके परमाराध्य - शाश्वत - सनातनधर्मं की प्रक्रान्ता निरपेक्षता कदापि उपशान्त नहीं होसकती, इत्यलमातेपल्लवितेनात्मनिवेदनेन श्रद्ध ेय -विद्वत्सु । ३ - सम्मान्य - ‘ आर्य्य - बन्धुओं ' से! ‘ आर्य्यसमाज ' नाम से प्रसिद्ध अमुक ' समाज ' विशेष को समलङ्कृत करने वाले ' आर्य्यबन्धुओं ' से वेदशास्त्र के सम्बंन्ध में विशेष निवेदन करना इसलिए व्यर्थ है कि, उनके अमुक मान्य दशविध नियमों में सर्वारम्भ का प्रमुख नियम- ' वेढ़ पढ़ना और पढ़ाना प्रत्येक आर्य का प्रमुख धर्म है ' रूपेण सुप्रसिद्ध है । सम्प्रदायवादानुगत विभिन्न रूढ़िवादों के प्रति क्रान्तिकारी दृष्टिकोण रखने वाले वेदभक्त हमारे इस आर्य्यबन्धु-वर्ग से यही निवेदन करना शेष रह जाता है कि, वह अपनी इस ' वेदभक्ति ' को केवल - ' वेदों का बँका बजवाने में ' हीं परिसमाप्त न करदे । क्योंकि स्वयं वेदशास्त्र इस ' हुँका बजवाने ' के सर्वथा विरुद्ध है । अपितु - ' गुहानि हितवृत्यनुगता - एकान्तानुगता - अनन्या - स्वाध्याय चिन्तन - - निष्ठा ही वेदशास्त्र का वास्तविक डॅका बजाना है | अन्यथा तो यह डॅकानाद केवल ' नामसंकीर्तन ' पर ही परिसमाप्त होजाता है । अमुक मत-वादों की मान्यता के वारुण - पाश में श्राद्ध होजाने के कारण जो लक्ष्य स्खलन श्रद्धय विद्वानों के द्वारा हो गया है, तोऽपि भयानक स्खलन इन कार्य्यबन्धुओं में प्रक्रान्त है, जो एक वैसे सामयिक तात्कालिक-मतवाद को ही वेद का वास्तविक अर्थ मान बैठे हैं, जिस नूतन अमुक मतवाद को तो मतवादकोटि के सम्मान से भी सम्मानित नहीं किया जासकता । कदापि यह तथ्य आलोचना - प्रत्यालोचना का विषय नहीं है । अपनी इस मतवाद · भ्रान्ति का परित्याग तो हमारे ये प्राणवान् जागरूक आर्य्यबन्धु तभी कर सकेंगे, जबकि अपने मान्य-मतवाद से पृथक् होकर, वेद - वेद शब्द की डङ्कानादध्वनि से श्रात्मपरित्राण कर निष्ठापूर्वक - स्वयं हीं वेद-शास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्त होजायँगे । तभी इह्न यह विदित होसकेगा कि, रूढ़िवाद के आवेश में आकार इह्नोंनें भारतराष्ट्र के उन मङ्गलमय, शान्ति - स्वस्ति- कर वेदसिद्ध आचारों का ही परित्याग कर दिया है, जिस श्राचारपरित्याग से मानव शुष्क - दग्ध- पुष्पफल विहीन - उद्वेगकर - धूम्रजालाच्छादित श्मशानवृक्षवत् ही बन
* योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
सजीवन शूद्रवमाशु गच्छति सान्वयः ॥
-मनुः १३४
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शतपथ- प्रथमखण्ड जाया करता है | तन्माभूत् । तथा माभूत् । अतएव आर्यमानवों को अपने आपातरमणीय ' वेदनाममात्राभि-निवेषोद्घोष ' का तत्क्षण परित्याग कर वेदस्वाध्याय में हीं प्रवृत्त होजाना चाहिए, इस ‘ प्रवृत्ति ' को अपनी मान्या मतवाद प्रवृत्ति से एकान्ततः श्रसंस्पृष्ट ही रखते हुए । ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाये ' ति अलमतिविस्तरेण-वेदभक्तेषु श्रार्य्यत्रन्धुषु । ४ – हिन्दुत्त्वाभिमानी समादरणीय हिन्दू - नेताओं स! सुसभ्या, एवं सुसंस्कृता – ‘ आय्योयणजाति ' के द्वारा सम्मान में प्रदत्ता ' हिन्दू ' उपाधि से सुविभूषित, भारतीय - आस्तिक मानव की ' हिन्दू ' उपाधि इस मानव के लोकोत्तर - सार्वभौम - सद्गुणों को ही अभिव्यक्त कर रही है, इसमें तो कोई सन्देह नहीं । अतएव आज जो अर्वाचीन भावुक - भारतीय - मानव अपनी इस सर्व-गुणविभूषिता ‘ हिन्दू ’ उपाधि को एक - ' साम्प्रदायिक ' अभिधा मानने, तथा मनवाने की भयावहा भ्रान्ति करते जारहे हैं, वे अपने समस्त गरिमा - महिमामय उस चिरन्तन इतिहास के साथ ही शत्रुता अभिव्यक्त कर रहे हैं, जिस इस ‘ हिन्दू ', – ‘ हिन्दुत्त्व ' की शत्रुताने आज के ' हिन्दूमानव ' को सर्वथा निस्तेज ही प्रमाणित कर दिया है इस अपने आपकी अवहेलना से ही । श्रतएव इस दिशा में ' हिन्दूत्त्वाभिमानी ' समादरणीय ' हिन्दू - नेताओं ' के ' हिन्दुत्त्व ' के आधार पर जो भी राष्ट्रीय संघठन - प्रयास - प्रक्रान्त हैं, उनका तो प्रत्येक प्रज्ञाशील राष्ट्रप्र ेमी तो हार्दिक अभिनन्दन ही करेगा । और इसके साथ ही अपनी अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिमूला, नितान्त - भावुकतापूर्णा, भातिसिद्धा, स्वस्वरूपविमोहिनी आज की काल्पनिकी राष्ट्रीयता के व्यामोहन से व्यामुग्ध, इसी हिन्दूजाति में समुत्पन्न, अतएव सार्वभौम - सद्गुणों से सुविभूषित भी भावुक - राष्ट्रीय नेतात्रों के द्वारा इस ' हिन्दू ' शब्द के प्रति साम्प्रदायिकता का अनुदिन अभियोग लगाते रहने जैसी मनोवृत्ति के प्रति यह स्पष्टीकरणकर देना भी हम अनिवार्य्यरूपेण अपना राष्ट्रीय - कर्त्तव्य ही मानेंगे कि, यदि याज के हमारे इन राष्ट्रीय नेताओं की दृष्टि में ' हिन्दू ' शब्द साम्प्रदायिक है, अतएव त्याज्य है, तो फिर इनकी राष्ट्रीयता के कोश में ‘ राष्ट्र ' के नाम से कुछ भी तो ' असाम्प्रदायिक ' शेष नहीं रह जाता - केवल प्रतीच्य - राष्ट्रों की प्रतीच्या - सभ्यता, शिक्षा, आदर्श, सभ्यता, आदि आदि के अतिरिक्त । क्योंकि उस अवस्था में तो श्रुति - स्मृति - पुराण - शास्त्रत्रयी, तन्निबन्धना संस्कृति, तन्मूलक विज्ञानसिद्ध सांस्कृतिक - आचार, तदनुगत पर्व - उत्सव - सम्मेलन- समारोहादि सांस्कृतिक आयोजन, तत्संरक्षक समस्त ' ऋषि मानव, समस्त अवतार-पुरुष, तत्प्रतीकभूता- हिमालय, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, भारताग्नि, आदि देववर्ग, आदि आदि यच्च-यावत् ही त्रिमल - राष्ट्रीय - विभूतियों का पर्य्यवसान इस काल्पनिक - साम्प्रदायिकता पर ही होजाता है, और इन सत्र राष्ट्रीय - विभूतियों, राष्ट्रीय ' शब्दों ' - ' अभिधाओं को एकान्ततः विस्मृत करने देने पर आज के साम्प्रदायि-कम्मन्य - राष्ट्रीय - नेताओं के प्रज्ञांकोश में, एवं भौतिककोश में ' राष्ट्रीयता ' की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ भी तो शेष नहीं रह जाता कि, ये अपनी तथोक्ता समस्ता राष्ट्रीय - विभूतियों के प्रति तो अपनी अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति के व्यामोहन से तटस्थ बने रहें, एवं अपनी इस भावुकतापूर्णा स्वराष्ट्रनिष्ठाशून्या असाम्प्रदायिकता के व्यामोहन को प्राणपण से सुरक्षित रखते हुए अपनी, तया भारतराष्ट्र की मौलिकता * देखिए, “ भारतीय हिन्दू - मानव, और उसकी भावुकता ' नामक खण्ड चतुष्टयात्मक ग्रन्थ के ' बिश्वस्वरूप - मीमांसा ' नामक प्रथमखण्ड की ' प्रस्तावना ' । १३५
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आत्मनिवेदन को आत्यन्तिकरूपेण जलाञ्जलि समर्पित कर अन्तर्राष्ट्रों की भूतप्रधाना सभ्यताओं, आदर्शों, तथा तज्जीवन-पद्धतियों को ही अपने काल्पनिक ' मानव, मानवता, मानवधर्म्म, सहास्तित्त्व, सहमैत्री, आदि शब्दों के व्याज से महान् वरदानों के रूप में अपनाते रहैं, एवं इस ' पर ' तन्त्रासक्ति को ही अपनी काल्पनिकी ' स्व'-तन्त्रानुगति प्रमाणित करते रहने के भातिसिद्ध प्रयासों में तल्लीन रहैं । ' स्वदर्शननिष्ठा ' की प्रतिबन्धिका, पर-दर्शनव्यामोहनानुगता यही तो इस हिन्दूमानव की सर्वनाशकारिणी वह ' भावुकता ' है, जिसके वारुण– पाशबन्धनने हीं इसे इसकी ' स्व ' ' तन्त्र ' रूपा वास्तविक राष्ट्रीयता से विगत तीन सहस्र वर्षों से इसे उत्तरोत्तर पराङमुख ही प्रमाणित किया है । ' स्व ' तन्त्रात्मिका इस नैष्ठिकी राष्ट्रीयता की विस्मृति से ही इसे तदवधि में ' पर ' तन्त्रात्मिका परासक्ति का ही अन्धानुकरणवर्मा बने रहना पड़ा है । अतएव अविलम्ब इसे अपने इन काल्पनिक, अन्तर्राष्ट्रीय - ख्यातिमुलक भावावेशों का परित्याग कर ' हिन्दू ' जैसे पवित्रतम, सम्मानित, सांस्कृतिक - राष्ट्रीय - सम्मान को अपनी मूलप्रतिष्ठा बना हीं लेना चाहिए, जिसकी प्राणप्रतिष्ठा के बिना कदापि इसकी अखण्डा राष्ट्रीयता ' अखण्डा ' कदापि नहीं बनी रह सकती, इस आवश्यक निवेदन के अनन्तर ही अत्र हमें अपने आज के उन समादरणीय हिन्दूनेताओं से भी प्रणतभाव से किञ्चिदिव निवेदन कर देना है, जो आज हिन्दुत्त्व के जागरण के लिए प्रयत्नशील प्रतीत होरहे हैं अमुक - संघविशेष के माध्यम से * । यदि हमारे इन हिन्दूनेताओं को - ' संघ ' शब्द के पूर्वघटित भावुकतापूर्ण इतिवृत्त का आभास भी उपलब्ध होजाता, तो विशुद्ध ' मतवाद ' के उत्तेजक, निष्ठाशून्य इस ' संघ ' शब्द का कभी भी ये हिन्दूनेता अनुगमन न करते, जिस इस भावुकतापूर्ण - ' संघ ' शब्द से अनुप्राणित इनका अभिनव ' राष्ट्रीय जनसंघ ' भी इतर भावु-कता - पूर्ण मतवादों की श्रेणि में आता हुआ प्रतिक्रियात्मक वैसे भावुकतापूर्ण लक्ष्यों से ही समन्वित होपड़ा है, जिस इत्थंभूता - ‘ संघाभिनिवेशात्मिका ' भावुकता ने इस ' महान् भी हिन्दू ' को आज सर्वथा ' अल्प ', एक संकुचित ‘ साम्प्रदायिकभाव ' पर ही ला खड़ा किया है । अपनी व्यष्टि और समष्टि से, उभयथा ही आत्म-बुद्धि - निष्ठा के अनुग्रह से अपने आप में हीं परिपूर्ण प्रमाणित होते रहने वाले, ग्रतएव ' संघं शरणं गच्छामि ' मूला ‘ संघशरणागति ' जैसी काल्वालीकृता परावलम्बन - रूपा - दासभावनिबन्धना ' आश्रयता ' से सर्वथैव असंस्पृष्ट बने रहने वाले, अतएव च - पूर्णमद: - पर्णमिदं - पर्णात - पर्णमुदच्यते ' मूला आत्म-ब्रह्मोपयिका स्वात्मनिष्ठा से ही ' श्रात्मनिर्भर ' प्रमाणित होने वाले, इत्थंभूत सार्वभौम महान् भी हिन्दूमानव के श्रात्मसाम्यमूलक - समदर्शनात्मक प्रकृतिभेदभिन्न - विभिन्न कर्त्तव्यात्मक महान् लक्ष्य को आज अभिभूत ही तो कर लिया है इसकी तथोक्ता ' संघभावुकता ' ने । फलस्वरूप यह संघ भी इतर वार्दो, मतवादों की पंक्ति में हीं आता हुआ सत्तातन्त्र के प्रति प्रतिक्रियावादी बन अपने महान् लक्ष्य से पराङमुख ही प्रमाणित होरहा है - ‘ हिन्दू ' को एक सम्प्रदायविशेष के वारुणपाश में हीं श्राद्ध करता हुआ । जिस सार्वभौम हिन्दू - महर्षि - मानव का - ' कृण्वन्तो विश्वमार्य्यम् ' लक्षण उदात्त उद्घोष है, जिसका महान् आदर्श- ‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः ' है, जिसका दयार्द्र हृदय - ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' मूला ग्रात्मनिष्ठान्विता ' अहिंसा ' का आगार है, जिस उदारमना हिन्दू - राष्ट्रीय – मानव का - ' मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ' यह उच्च उद्घोष है, जिस हिन्दू का हिन्दुत्त्व प्रकृतिसिद्ध - ज्ञानविज्ञानात्मक, सम्प्रदायवादनिरपेक्ष - मौलिक - प्रति— * - राष्ट्रीय जनसंघ के माध्यम से । १३६