Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 141–150

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150

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शतपथ - प्रथमखण्ड टा - धरातल पर प्रतिष्ठित है, वैसा गरिमा - महिमामय हिन्दू कदापि किसी के भी प्रति प्रतिक्रियावादी, आक्रोशवादी, किंवा आवेशाविष्ट नहीं बन सकता । अपितु यह तो घोरघोरतम नास्तिक - अनात्मवादी मोहाविष्ट विमूढ - जनों के लिए भी - ' काले कारुणिक! त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ' रूपेण मङ्गलकामना हीं अभिव्यक्त करता रहता हैं । ऐसे महान् हिन्दुत्त्व के सन्देशवाहक हिन्दूनेताओं को कदापि किसी भी संघविशेष के व्यामोहन से व्यामुग्ध नहीं होजाना चाहिए । अपितु इहें तो अनन्यनिष्ठा से अपने विस्मृतप्राय, विलुप्तप्राय, अभिभूतप्राय हिन्दुत्त्व के उन सनातन तथ्यों के पुनराविर्भाव में हीं अपने आपको समर्पित कर देना चाहिए, जिन मालिक-सांस्कृतिक तथ्यों की अभिव्यक्तिमात्र से स्वतः ही राष्ट्र के अन्य सभी वर्गों का उद्बोधन सुनिश्चित बन जाया करता है | और वे सनातन तथ्य हैं हिन्दू की उस श्रुति - स्मृति - पुराण - शास्त्रत्रयी में हीं, जिह्न मतवादोंनें विगत तीन सहस्र वर्षों से अभिभूत ही कर लिया है । एवं जिन इन ज्ञानविज्ञानात्मक- सांस्कृतिक - तथ्यों की अभिभूति से ही हिन्दू का सार्वभौम हिन्दुत्त्व सर्वथा काल्वाल्वीकृत ही प्रमाणित होचुका है | श्रात्मनिष्ठ सांस्कृतिक - हिन्दू की इस काल्वालीकृतावस्था, किंवा दुरवस्था के कारण ह्रीं अमुक अवधि से आत्मनिष्ठात्मक - सापेक्ष मौलिक - सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, मानवता, मैत्री, आदि तथ्यों का स्थान आज अना-त्मवादमूलक उन काल्पनिक सत्य - अहिंसा आदि ने हीं अपहृत कर लिया है, जिन शब्दों के छल के माध्यम से श्राजके मानवतावादी मानव के सत्य के गर्भ में प्रचण्ड मिथ्या, हिंसा के गर्भ में मानव का नृशंस हनन, मान वता के गर्भ में दानवता, मैत्री के गर्भ में प्रचण्ड शत्रुता, एवं सहास्तित्त्व के गर्भ में प्रचण्डतम - विविध - वर्गमेद– विघटन हीं पुष्पित पल्लवित होते ना रहे हैं । एकमात्र आत्मसाम्यमूला - सांस्कृतिक - निष्ठा के द्वारा ही मानव की तथोक्ता काल्पनिक — मानवता का उपशम सम्भव है । तत एव च श्रात्मसाम्यमूलिका- ' आर्य ' भावानुगता वास्तविक - मानत्रता की पुनरभिव्यक्ति सम्भव है । जर्ज्जरीभूता आज की विश्वमानवता के ताण्डवनृत्यात्मक– संक्षुब्ध वातारण में आज भी इस महान् उत्तरदायित्त्व के सम्बन्ध में आत्मसाम्य की दृष्टि से अमुक पारिभाषिक — सूत्र अभिव्यक्त कर देने की यदि कोई क्षमता रखता है, तो समस्त विश्व में वैसा मानव एकमात्र वह आम्तिक - हिन्दू - मानव ही है, जिसकी ग्रात्मनिष्ठा सदा ही विश्व में जागरूक रही है । जोकि हिन्दूमानव दिग्देशकालानुगत बुद्धि - मनः - शरीर नामक प्राकृत तन्त्रों का मूलाधार दिग्देशकालातीत उस ' आत्मदेव ' को ही मानता आरहा है, जिसका संस्मरण भी आज के भूतवादी अन्य प्राकृत - वर्गों के द्वारा असंस्पृष्ट ही प्रमाणित होरहा है । ग्रात्मनिष्ठ हिन्दू को, इसके सञ्चालक समादरणीय हिन्दू नेताओं को हिन्दू के इस ' आत्म-भाव ' को, एवं तत्स्वरूप- विश्लेषक वेदशास्त्र को ही सर्वप्रथम अपना आराध्य बना लेना है, जिस इस सांस्कृ-तिक - चल की प्रतिष्ठा के आधार पर ही ये अपने भारतराष्ट्र की अखण्डता पुन: सुरक्षित कर सकते हैं, जिस के आधार पर ही ये विश्वमानव के लिए शान्तिसन्देशवाहक प्रमाणित होसकते हैं, एवं इसी के आधार पर ये हिन्दूनेता आज के स्वतन्त्र - भारत के उन स्वतन्त्र - राष्ट्रवादियों को यह चेतावनी भी दे सकते हैं उद्-घोषपूर्वक ही कि— " भारतराष्ट्र के इस राष्ट्रीय सांस्कृतिक आत्मनिष्ठ - हिन्दूमानव के प्रति होपड़ने वाली उनकी उपेक्षा कदापि उनके राष्ट्र के लिए स्वप्न में भी मङ्गलवहा नहीं बन सकेगी । आज से पूर्व भी जिन जिन सत्तातन्त्रोंनें धृतिगुणनिष्ठ इस हिन्दूमानव के दलन का प्रयास किया है, उनको इस हिन्दूमानव ने अपने सहज धृतिगुण से सहा है, जिस सहनशक्ति को उन दिग्देशकालिक सत्ता-तन्त्रों नें हिन्दूमानव की निर्बलता ही मान बैठने की भयावह भूलें कर डालीं हैं, जिसके दुष्परि-१३७

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आत्मनिवेदन णाम कालपरिकानन्तर उनको भोग ही लेने पड़े हैं । अतएव वैसा ही अकाण्डताण्डव कदाषि किसी को भी इस सहजधृतिगुरण - परायण आत्मनिष्ठ - हिन्दूमानव के प्रति नहीं हीं करना चाहिए । इसी में राष्ट्र का अभ्युदय सुरक्षित है " । निश्चयेनइस महान्, निर्भीक उद्घोष का एकमात्र मूल वेदशास्त्रमूलक वह सांस्कृतिक बल ही माना जायगा, जिसे विस्मृत कर, तत्थाने च दिग्देशकालानुबन्धी - श्रापातरमणीय - श्राक्रोशात्मक - प्रतिक्रियात्मक-संघादि - वादों को अपना कर हमारे हिन्दूनेता श्राज अत्यन्त ही भयावहा भूल करते जारहे हैं, इसी आत्म-निवेदन के साथ हम् पुनः पुनः अपने इन सम्मान्य - हिन्दूनेताओं का ध्यान इनकी राष्ट्रीया ' मूल सांस्कृतिक-निधि ' की ओर ही आकर्षित कर रहे हैं, इत्यलं बहुविस्तरेण समादरणीय - हिन्दू नेतृवर्गानुबन्धेन । ( ५ ) - विभिन्न मतावलम्बी श्रादरणीय बन्धुओं से! सार्वभौम -- सम्राट् -- भारतीय-- हिन्दू - मानव की आत्मनिष्ठामूला - सहज - धृति की वरदा अभया छत्रच्छाया में सभी मतवादों को स्वतन्त्रतापूर्वक पुष्पित-- पल्लवित होते रहने की सुविधा प्राप्त है । इसी सुविधा के कारण विभिन्न मतवाद भारताग्नि के कृष्ण मृगदेशात्मक इस ' त्रयीदेश ' में स्वच्छन्द - विचरण कर रहे हैं । भारतीय आत्मनिष्ठ मानव की सहज उदारताने हीं उन अनात्मवादी -मतवादों के प्रवर्तकों को भी ईश्वरीय विभूति का ही स्थान प्रदान किया है, जैसा कि इस उदार मानव की - ' अवतार सम्मान प्रदानवृत्ति ' से स्पष्ट है । ऐसे उदारचेता सनातन - हिन्दूजगत् की सनातन वैदिक संस्कृति की आवेशपूर्णा आलोचना- प्रत्यालोचना कदापि उन मतवादों का भारतराष्ट्र में तो कदापि कोई भी हित साधन नहीं कर सकती । अतएव नम्रतापूर्वक हम उन सभी मतवादों से निवेदन करेंगे कि, वे भी भारताभिजनत्त्वानुबन्ध से भारत की मूलसंस्कृति की वरदा शीतल छाया के संस्पर्श से अपने अपने मतवादों को आत्मनिष्ठा - पथानुगामी बनाने का ही प्रयत्न करें, जो आत्मनिष्ठा - मूला मूलसंस्कृति मानवमात्र को - ' आर्य ' ( श्रेष्ठ ) उपाधि से सुविभूषित कर दिया करती है | हमारी आस्था है कि, यदि हमारे ये विभिन्न मतवादानुगत आत्मबन्धु दोषदृष्टि से भी, एक बार भी तीन सहस्र वर्ष के पूर्व की इस मौलिक संस्कृति पर हकपात भी कर लेगें, तो निश्चयेन उन सभी का मतवादात्मक अभिनिवेश अमुक अंश तक तो तत्काल ही उपशान्त हो ही जायगा, और निश्चयेन इस आत्म-शान्ति से वे भी अपनी मानवानुबन्धिनी श्रार्य्यत्त्वमूला महत्ता के ही पथिक प्रमाणित होजायँगे, इति - अलमति-विस्तरेण प्रासङ्गिक - मतवादप्रसङ्ग ेन । ( ६ ) - स्वतन्त्र - भारत के गणतन्त्रीय - प्रजातन्त्रात्मक महामहिम सत्तातन्त्र से! हम क्या निवेदन करें, जबकि भारतीय संस्कृति के महान् सूत्र - ' राजा कालस्य कारणम् ' के अनुसार युगधर्म्मानुगता यच्चयावत् कालिक मान्यताओं के सभी कुछ कालानुबन्धी तथ्य सत्तातन्त्र से ही अनुप्राणित माने गए हैं । ब्रिटिशसत्तातन्त्र का युग भारतराष्ट्र के लिए- ' परतन्त्रता ' का युग माना जारहा है, जिस इस मान्यता में तो किसी भी प्रज्ञाशील को कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती । पूर्वयुगात्मक उस ब्रिटिश सत्तातन्त्र की ‘ परत-न्त्रता ' का क्या अर्थ था?, एवं आज के स्वतन्त्रयुग के स्वतन्त्र भारतीय सत्तातन्त्र की ' स्वतन्त्रता ' का क्या अर्थ है?, इस महान् प्रश्न के गर्भ में हीं स्वतन्त्रता, परतन्त्रता शब्दों का वह मौलिक चिरन्तन इतिवृत्त सुर-क्षित है, जिसके स्पष्टीकरण का अत्र अवसर नहीं है । स्वयं मानव हीं अपने आत्मबुद्धिभाव से पुरुषात्मक-१३८

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शतपथ - प्रथमखण्ड बनता हुआ तन्निबन्धन - ‘ पुरुषार्थ ' के अनुग्रह से ' स्व ' - ' तन्त्र ' ( आत्मबुद्धितन्त्र ) में - प्रतिष्ठित रहता हुआ जहाँ ' स्वतन्त्र पुरुषमानव ' है, वहाँ मानव हीं अपने मनः शरीरभाव से प्रकृत्यात्मक बनता हुआ, तन्निबन्धन ‘ प्रकृत्यर्थ ' के अनुग्रह से- ' पर - तन्त्र ' ( मनः शरीरतन्त्र ) में प्रतिष्ठित रहता हुआ - ' परतन्त्र प्रकृतिमानव ' है | आत्मबुद्धेनिष्ठ मानव की स्वतन्त्रता, परतन्त्रता की यही मौलिक स्वरूप - परिभाषा है | आत्मबुद्धिभाव ही दिग्देशकालातीत सनातन - पुरुषभाव है, जिसे स्वतन्त्ररूपेण कर्तृत्वशक्ति प्राप्त है **, जिस इस ' कर्माधि-कार – स्वातन्त्र्य ' से ही इसे ' कर्म्मण्येवाधिकारस्ते ' यह आदेश मिला है, जिस देश का तात्त्विक समन्त्रय आरम्भ में हीं किया जाचुका है । आत्मबुद्धिनिष्ठ मानव के कालानुगत दिग्देशात्मक ' मनःशरीर ' भाव तो ' मानव ' नहीं, अपितु मानव की वह आगन्तुक प्रकृति है, जो दिग्देशकालानुबन्धों से बदलती रहती है-' वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय ० ' सिद्धान्तानुसार । आगन्तुकत्व, और परिवर्तनत्त्व ही मनःशरीरात्मिका प्रकृति का वह ' परत्त्व ' है, जिसमें स्वतन्त्र पुरुषार्थ का, स्वतन्त्र कर्त्तव्य का, उत्तरदायित्त्वपूर्णा निष्ठा का सर्वथा प्रभाव है, जिस प्रकृतिमूलक ' पर ' भावात्मक ' पारतन्त्र्य ' के उदाररण केवल मनःशरीरात्मक- मानवेतर समस्त पशु - पक्षी आदि प्राणी ही बने हुए हैं । केवल ' परप्रकृति ' ही पश्वादि प्राणियों का सर्वस्व तन्त्र है । अतएव इह्न ‘ पर - त्तन्त्रानुगति ' ( प्रकृतितन्त्रानुगति ) से ' परतन्त्र ' ही माना गया है | ब्रिटिशसत्तातन्त्रात्मक युग भारतीय मानव के लिए ' आत्मबुद्धित्वातन्त्र्य ' का ही अभिभवयुग था । उस युग का मानव आत्मना, और बुद्धया, दोनों से ही सर्वात्मना अभिभूत था । अतएव श्रात्मबुद्धिमूला संस्कृति, तन्मूलक स्वतन्त्र सांस्कृतिक - श्राचार, स्वतन्त्र पौरुष, स्वतन्त्र कर्तृत्व, आदि आदि सभी श्रा: मबुद्धि-निबन्धना सांस्कृतिक - विभूतियाँ अभिभूत हीं थीं ब्रिटिशसत्तायुग में । अतएव उस सत्तातन्त्र की मनःशरीर-निबन्धना - पर - तन्त्रात्मिका - मान्यताओं को ही इस भारतीय मानव को अनिच्छन् अपि मानते ही रहना पड़ता था । श्रात्मबुद्धि से अनुगत पारतन्त्र्य अमुक - सीमापर्य्यन्त ही मानव के लिए सह्य हुआ करता है । निःतीमा-वस्था में यही आत्मबुद्धिपारतन्त्र्य विस्फोटन का अनुगामी बन जाया करता है, जिस उस विस्कोटनात्मक विद्रोहने हीं श्रात्मबुद्धि परतन्त्रताप्रवर्त्तक, मानवस्वातन्त्र्यापहारक ब्रिटिश सत्तायुग को अन्ततोगत्त्वा परिसमाप्त कर ही तो दिया, जिसके अनन्तर ही स्वतन्त्रता का श्रीगणेश हुआ, और गणतन्त्रीया प्रजातन्त्र - पद्धति के आधार पर भारतराष्ट्र के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - प्रभुसत्ता समर्थ - सत्तातन्त्र ने अपना जन्म महोत्सव मनाया, इति नु सर्वमेव अभि-नन्दनीयम् । किन्तु? । इस ‘ किन्तु '? जैसे अनार्ष शब्द का प्रयोग इसलिए करना पड़ रहा है कि, ब्रिटिश सत्तातन्त्रयुग में ( एवं तत्पूर्व की भी अनेक शताब्दियों से ) भारतीय मानव का आत्मबुद्धयनुगत जो सांस्कृतिक - वास्तविक - स्वातन्त्र्य अभिभूत ही होता चला आ रहा है, उस मौलिक स्वातन्त्र्य को पाशबन्धनविमुक्ति से पृथक करने का लक्ष्य उपस्थित ही नहीं होसका हमारे इस अपने सत्तातन्त्र से भी । ऐसा कैसे होपड़ा?, और क्यों होपड़ा १, प्रश्न का सीधा सा यही उत्तर है कि, सत्तातन्त्र की दृष्टि का प्रमुख आधार मानव का मन, और शरीर ही बन गया । मनोऽनुगत कामभाव, तथा शरीरानुगत अर्थभाव ही सत्तातन्त्र की दृष्टि में - ' मानवीय - स्वातन्त्र्य ' की परिभाषा बन बैठी गणतन्त्रीय प्रजातन्त्रात्मक - दृष्टिकोण के अनुबन्ध से | मन का धर्म्म गणत्त्व है । * ' स्वतन्त्रः कर्त्ता ' ( पा ० सूत्र ) | क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्त्ता स्यात् । १३६

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श्रात्मनिवेदन कदापि मन एकाकी प्रकृतिस्थ नहीं रह सकता । समूह ही इसका अनुरञ्जक बनता है । तथैव प्रजात्त्व शरीर का धर्म है । अवसर नहीं है इन प्राकृत तन्त्रों के स्वरूप - विश्लेषण का । तदर्थं तो स्वतन्त्र निबन्ध ही दृष्ट-व्य है । विस्पष्टभाषा में हमे इन शब्दों में स्थिति का स्पष्टीकरण कर ही देना चाहिए कि, सत्तातन्त्र ने ' परत-न्त्रता ' का एकमात्र अथ समझा - मानव की योगक्षेमानुगता, कामार्थमयी चिन्ता, अन्नवस्त्र चिन्ता, जिस चिन्ता से ब्रिटिशयुग में भारतीय मानव चिन्तित था । एवं ' स्वतन्त्रता ' का अर्थ समझा- भारतीय मानव को शीघ्र से शीघ्र इन मानसिक - शारीरिक - योगक्षेम - चिन्ताओं से उन्मुक्त कर देना । किन्तु स्पष्टतम है कि, आत्मबुद्धिनिष्ठ सनातन - मानव के वास्तविक - स्वातन्त्र्य की दृष्टि से कदापि स्वतन्त्रता - परत-न्त्रता की परिभाषाओं का मापदण्ड मानव का प्राकृत मनःशरीर - विवर्त्त नही है, जैसा कि पूर्व में निवेदन किया जाचुका है | भारतीय मानव का ' स्व ' तो इसका ' आत्मबुद्धितन्त्र ' ही जिस इस ' स्व ' ' तन्त्र ' की बुभुक्षा को उपशान्त किए बिना ' पर ' ' तन्त्र ' लक्षण मनः शरीर - भावों की कामार्थचिन्ता - मात्र की उपशान्ति से कदापि भारतीय मानव अपने आपको - ' स्व ' ' तन्त्र ' में प्रतिष्ठित नहीं मान सकता । भारतराष्ट्र के आत्म-बुद्धिनिष्ठ ' स्व ' - तन्त्रनिष्ठ भारतीय मानव के इस ' स्व ' तन्त्रात्मक ' स्वतन्त्र ' स्वरूप को समझने से ही हमारा वर्त्तमान- सत्तातन्त्र सम्भवत: इसीलिए तटस्थ बना रह गया है कि, इस अभिनव सत्तातन्त्र के अभिनव-शिक्षा - दीक्षा से समलङ कृत वर्त्तमान सत्तातन्त्र - सञ्चालकों की दृष्टि में उन प्रतीच्य देशों की परप्रकृति - नित्र-न्धना मनःशरीरानुगता कामार्थमयी भूतजीवनपद्धति ही मानव की ' स्वतन्त्रता ' का मापदण्ड प्रमाणित होपड़ी है । अतएव मानवीय मन, तथा शरीर की तुष्टि पुष्टि पर ही भूतजीवनपद्धति को विश्रान्त मान बैठने वाले प्रतीच्य राष्ट्रों की मान्यता के अनुसार हमारे राष्ट्रीय नेताओं नें भी मानव के स्वरूप का पर्यवसान मनः - शरीरा-त्मिका उस व्यक्ता प्रकृति पर ही मान लिया है, जबकि स्थिति सर्वथा विपरीत है । भारतीय मानव की चिरन्तना ' श्रात्मबुद्धिमूला - सांस्कृतिक स्वतन्त्रा ' के आधार पर ही इस मानव के मनःशरीरानुचन्धी कामार्थं व्यवस्थित होसकते हैं, हुए हैं । विशुद्धा मनः शरीरपद्धति जैसी प्राकृतपद्धति के आधार पर प्रयत्न - सहस्रों से भी भारत के हृदय की बुद्धिमूला तृप्ति, तथा आत्ममूला शान्ति कदापि सम्भव नहीं है, जिस शान्ति, तृप्ति के बिना इस की मनोऽनुगता तुष्टि, तथा शरीरानुगति पुष्टि इसके लिए कालान्तर में प्रतिक्रिया का ही कारण बन जाया करती है । वस्तुस्थिति तो वास्तव में ऐसी है कि, श्रात्मबुद्धिमूलक - सांस्कृतिक प्रतिष्ठा - धरातल की उपेक्षा कर बैठने वाली मनःशरीरानुगता तुष्टि, पुष्टि के सभी प्रकार अन्ततोगत्त्वा निष्फल ही प्रमाणित होजाते हैं मानव के लिए | अतएव आत्मबुद्धिवञ्चित मनःशरीरव्यासङ्ग ही कदापि मानव के मन और शरीर की तुष्टि, पुष्टि के साधनों में भी सफल नहीं बन सकते, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण दशवर्षीय - शासनकाल ही प्रमाणित होरहा है । आाज प्रत्येक भारतीय मानव ब्रिटिश सत्तायुगापेक्षया भी अपने मनःशरीर - साधनों से विशेषरूपेणैव उत्पीड़ित होरहा है स्वतन्त्र शासनयुग की प्रचण्डतमा महता के कारण । बड़ी बड़ी योजनाओं के द्वारा इसे ज्यों ज्यों बड़ी बड़ी सुख - समृद्धियों के महान् स्वप्नों की और आकर्षित किया जारहा है उच्च उद्घोषपूर्वक, त्यों त्यों हीं इसकी सामान्या - योगक्षेमचिन्ता भी अधिकाधिक प्रचण्ड बनती जारही है । ब्रिटिशयुग के द्वारा कङ्कालास्थि-* - क्या आज हम मानव हैं?, नामक स्वतन्त्र निबन्ध | १४०

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शतपथ - प्रथमखण्ड मात्र से अवशिष्ट इस भारतीय मानव के शेषभूत शुष्क नीरम जर्जरित प्राणों का भी सत्तातन्त्र के द्वारा तथा-कथित – सुखस्वप्नसाधक - योजना - प्रदर्शनों के द्वारा निर्ममता से विविध करभारों के माध्यम से अपहरण ही होरहा है! सर्वोपरि राष्ट्र के सम्मानित ( होटलों ) विश्रामस्थानों में भी घोती कुर्त्ते वाले इस भारतीय मानव का प्रवेश भी निषिद्ध होरहा है आज के इस स्वतन्त्र - शासनयुग में, सम्भवत: ही नहीं, अपितु निश्चयेन इसी एकमात्र दोष, किंवा महान् अपराध से कि, विगतयुग के ब्रिटिशसत्तातन्त्र की मनः शरीरमात्रा प्रतीच्या भूत-जीवनपद्धति के प्रति ( एक शताब्दी से भी अधिक समय पर्य्यन्त ) श्रात्मदास बने रहने वाले भो इस भारतीय मानव के द्वारा अपने चिरन्तन राष्ट्रीय संस्कारों के अनुग्रह से धोती - कुर्ते का अभ्यास सर्वात्मना विस्मृत नहीं किया जासका । और आज उसी प्रतीच्या ' भूतजीवनपद्धति ' को, मनः शरीर- मात्रप्रधाना उनकी ' भूतसभ्यता ' को ही भारतीय मानव की अनन्या ' राष्ट्रीयता ' मान बैठने वाले समर्थ सत्ताधीशों के द्वारा संस्थापित इन विश्रामागारां ( होटलों ) में तज्जीवनानुगता वेशभूषा ही साम्राज्ञी बन गई, जिसके सम्मान के लिए, वहाँ के सभ्यता - नियमों के संरक्षण के लिए अनिवार्य्यं ही तो था धोती - कुर्ते - जैसी असभ्या? ग्रामीणा? वेशभूषा के लिए दृढ़तम नियन्त्रण, इत्यब्रह्मण्यम्! ब्रह्मण्यमेव!! महतीयं विडम्बना स्वतन्त्रराष्ट्रसत्तायाः!!! रही बात भारतराष्ट्र की ‘ मूलसंस्कृति ' की, एवं तदनुगत सांस्कृतिक आचारों की, और सर्वोपरि जनसाधा-रणोपयोगी सांस्कृतिक - आयोजनों की, सो तत्सम्बन्ध में कुछ न कहना हीं श्रोयः पन्था प्रतीत होरहा है । राष्ट्रीय मानव के मतस्तन्त्र की तुष्टि के लिए विगत - भुक्त - प्रकान्त दशवर्षीय स्वतन्त्रयुग में - ' सांस्कृतिक आयोजनों ' के नाम से प्रचण्डवेग से केन्द्र से आरम्भ कर प्रान्तों पर्य्यन्त समष्टि - व्यष्टिरूप से राष्ट्र की छोटी - बड़ी प्रत्येक योजना के साथ नृत्य - गीत - वादन - नाटकादि - रूप जिन सांस्कृतिक आयोजनों? की उत्ताल तरङ्गों * -कुछ ही दिनों पूर्व स्वतन्त्र सत्तातन्त्र की राजधानी दिल्ली की - प्रतीच्य - साजसज्जा से समलङ्कृता-' अशोकहोटल ' में अमुक धोती कुर्ते वाले एक भारतीय अतिथि का प्रवेश इसलिए निषिद्ध होगया था कि, यह ग्रामीण वेशभूषा? होटल की सभ्यता? के नियमों के विरुद्ध थी । सुना गया कि, किसी मान्य सदस्य ने लोकसभा में जब इस दुर्घटना पर आपत्तिजनक प्रश्न उठाया, तो केन्द्र के सम्मान्य गृहमन्त्री महोदयने अनुग्रह कर यह आश्वासन दिया कि, “ भविष्य में धोती - कुर्ते वाले भी अशोक होटल में प्रवेश पासकेंगे ” । अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्रस्वातन्त्र्य के लिए आहुत करने वाले जिस महाप्राण मानव श्रृद्ध'नग्नशरीरी रह कर, गोड़ों तक ग्रामीणों जैसी धोवती ही पहिन कर सुसभ्य ब्रिटिशराज्य के राज्यभवनों को विकम्पित कर दिया था, उह्रीं महाप्राण सर्वश्री गाधीजी के इस स्वतन्त्र सत्ताक्षेत्र में दशवर्ष के शासनकाल के अनन्तर भी धोवती - कुर्त्ते को प्रवेशाधिकार मिल जाने जैसा अनुग्रह क्या यह प्रमाणित नहीं कर रहा कि, हमारा आज का भारतराष्ट्र तो ब्रिटिशयुग की अपेक्षा भी कहीं कधिक परतन्त्र बन गया है स्वयं अपने हीं स्वतन्त्र -सत्तातन्त्र की कृपा से, इति कालाय तस्मै नमः | इसी सम्बन्भ में सुहृद्वर डॉ ० श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल सुनाते थे कि, अमुक विदेशी विद्वान् ने आप से सांस्कृतिक भेंट करते हुए दिल्ली की इन होटलों के सम्बन्ध में अपने ये उद्गार अभिव्यक्त किए थे कि, “ प्रदर्शनात्मिका भौतिक - साजसज्जाओं से समलङ्कृता ऐसी होटलें तो हमारे देशों ( पश्चिमी देशों में ) हीं बहुत हैं । हम तो भारतवर्ष में यहाँ की जीवनपद्धति के अनुरूप प्राच्यसंस्कृति, प्राच्यसभ्यता के ही दर्शन करने आए थे, सो दुर्भाग्यवश हमें यहाँ उपलब्ध न होसके ” इत्यब्रह्मण्यम्! ब्रह्मण्यम्!? महतीयं विडम्बना स्वतन्त्रसत्तातन्त्रस्य भारतीयस्य । १४१

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आत्मनिवेदन में आज का राष्ट्रीय - मानव प्रवाहित होरहा है, उन से तो ' संस्कृति ' शब्द का वाच्यार्थ सर्वथा ही धूलिधूस-रित होचला है । नर्त्तन - गायनादिरूप वेताल - चेष्टित जिन आज के इन आयोजनों के साथ ' संस्कृति ', किंवा ' सांस्कृतिक ' शब्दों का स्वानिक - सम्पर्क भी नहीं है, उन प्रयोजनों के बल पर, इस नाचने गाने जैसी गन्धर्वाप्सरालीला के माध्यम से ही आज हमारा सत्तातन्त्र भारत की संस्कृति? का विदेशों की संस्कृतियों से मैत्रीसम्बन्ध करने के लिए आकुल व्याकुल बना हुआ है, जिससे बड़ा सांस्कृतिक अधःपतन, हम समझते है - परतन्त्रताप्रवर्त्तक ब्रिटिसत्तायुग में भी नहीं हुआ था, जिस इस निरतिशय सांस्कृतिक अध: पतन से अभिव्यक्ता महती वेदनानें हीं -भारतीय - सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा ' नामक सहस्र पृष्ठात्मक एक स्वतन्त्र-नित्रन्ध उपनिबद्ध करा दिया है, जिसकी ओर हम श्राज के सांस्कृति - आयोजन - प्रेमी राष्ट्रबन्धुत्रों का प्रणतभाव से ही ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । सचमुच अपनी ' मूलसंस्कृति ' की विस्मृति से ही भारतराष्ट्र जेसे आत्मबुद्धिनिष्ठ -सुसंस्कृत सांस्कृतिक राष्ट्र में भी आज इत्थंभूत अकाण्डताण्डव घटित विघटित होपड़े हैं- ' संस्कृति ' - ' भारतीयता ’ – ‘ सांस्कृतिक– आयोजन ' ' राष्ट्रोत्थान- ' प्रगति ' विकास ' आदि काटि आवर्धक शब्दजाल के माध्य से, जिन इन यच्च-यावत् अकाण्डताण्डवों में भारतीय मूलसंस्कृति का तो संस्मरण - प्रवेश भी सर्वात्मना निचिद्ध ही बना हुआ है । भारतराष्ट्र की ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण - विश्व की वह मूल संस्कृति, जिसके आधार सम्प्रदायवाद - मतवाद-निरपेक्ष विशुद्ध ज्ञानविज्ञान हैं, तन्मूलक सांस्कृतिक - कर्त्तव्यनिष्ठात्मक जो धर्मं विश्व के मानवमात्र को उन उनके कर्त्तव्यों पर प्रतिष्ठित रखने जैसे सार्वभौम - उदार- उद्घोष से समन्वित करता है, उस धर्म के प्रति, तदनु-प्राणिता मूल संस्कृति के प्रति इसप्रकार एकहेलया निरपेक्ष बन जाने का नाम हीं यदि ' स्वतन्त्रता ' है, यदि भारतराष्ट्र की यच्चयावत् प्राच्या- सांस्कृतिक - जीवनपद्धतियों के स्थान में मनःशरीरमात्रपरायणा भूतजीवनपद्धति को स्थापित कर देने का नाम हीं ' स्वतन्त्रता ' है, तो असंदिग्धरूपेण यह वह दिया जायगा कि, ' आत्मबुद्धि-मूला - मूलसंस्कृति से पराङ्मुख, केवल मनःशरीरानुगता कामार्थभोगप्रधाना ऐसी स्वतन्त्रता तो भारतीय - मानव के लिए निरतिशया परतन्त्रता ही प्रमाणित होजायगी । श्रतएव आवश्यक है कि, हमारा सत्तातन्त्र अविलम्ब अपने भौतिक - मनःशरीरायोजनों, योजनाओं के मूल में भारत की मूल संस्कृति के सांस्कृ-तिक - सूत्र ही प्रतिष्ठित कर लेने का किःसीम अनुग्रह करे, जिस इस सांस्कृतिक - प्राणप्रतिष्ठा के बिना कदापि उसके सुखस्वप्न सफल नहीं हो सकते । तपस्वी - - राष्ट्रीय नेताओं के चिरसञ्चित महान् पुण्य से उपलब्धा इस ‘ राष्ट्रस्वतन्त्रता ’ को हमारा राष्ट्र नर्त्तन - गायन - वादनादि समन्वित अमुक मनोविनोदात्मक वेताल - चेष्टित श्रायो-जनों में, अनुदिन श्रागत - समागत तथाविध सांस्कृतिक शिष्टमण्डलों के अनुरञ्जक व्यासङ्गों में, विभिन्न निमि-त्तानुबन्धों से प्रायः अनुदिन ही केन्द्र में, तथा प्रान्तों में घटित विघटित होते रहने वाले सम्मानातिथ्य प्रदर्शनों, तात्कालिक उल्लासों में हीं परिसमाप्त न करदे, नापि प्राणप्रतिष्ठा शून्य केवल भूतसंग्रह प्रधाना - जड़जीवन-पद्धति पर ही विश्राम करले । अपितु इसे अविलम्ब इस प्राच्य भारतराष्ट्र की उस प्राच्या ज्ञान - विज्ञान-निधि को ही अपना आराध्य बना लेना चाहिए, जिसकी सनातन - उपयोगिता में किसी भी प्रज्ञाशील को तो कदापि सन्देह नहीं होसकता । जिन प्रतीच्य देशों के चाकचिक्य से, भूतसमृद्धि से दुर्भाग्यवश आज हमारा भारतराष्ट्र भावुकता के द्वारा प्रभावित है, उह्नीं प्रतीच्य देशों के मनीषी विद्वानोंनें भारतीय संस्कृति की मौलिकता १४२

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शतपथ - प्रथमखण्ड को अपनी श्रद्धाञ्जलियाँ हीं समर्पित कीं हैं अत्यन्त ही प्रणतभाव से । जो प्राच्य वेदशास्त्र दुर्भाग्यवश उसी के भारतराष्ट्र में आज उपेक्षित बना हुआ है, उसी शास्त्र के चिन्तन - मनन- प्रकाशन में प्रतीच्य - राष्ट्रों के सत्तातन्त्र उन्मुक्तहस्त बनते हुए हमें लज्जित ही कर रहे हैं । वस्तुगगत्या जत्र हम यह देखते हैं कि, राष्ट्रीय मानव की मनःशरीरानुबन्धिनी भूतैषणा की पूर्ति के लिए एक ओर जहाँ हमारा सत्तातन्त्र च रुपय्यों के समर्पणपथ का अनुगामी बना हुआ है, वहाँ उसी मानव की मलप्रतिष्ठारूपा श्रात्मबुद्धयनुबन्धिनी सांस्कृतिक निधि के संरक्षणमात्र की दृष्टि से भी वह निरपेक्ष ही बना हुआ है, तो हम स्वयं हीं लज्जा से उन प्रतीच्य - विद्वानों के सम्मुख अवनत शिरस्क ही होजाते हैं, जो अपने समस्त जीवन को इस प्राच्यशोधकार्य में समर्पित किए हुए हैं । आज से दो वर्ष पूर्व हमने भारतीय - प्राच्यविज्ञान-सम्बन्धी दो ग्रन्थ विश्व के सभी विद्वानों की सेवा में भेजे थे । उनकी और से जो उद्गार हमें उपलब्ध हुए, उन से हमें प्रभावित भी होजाना पड़ा, और लजित थी । लजित इसलिए कि, जापान की टोकियो युनिव-र्सिर्टी के एक विद्वान् अध्यापक ( प्रोफेसर ) का इस आशय का पत्र हमें मिला कि, ' गत युद्ध की क्षति के कारण हमारी सरकार अभीतक प्राच्यसाहित्यान्वेषण कार्य को पुनः प्रतिष्ठित नहीं कर सकी है । किन्तु आशा है अब शीघ्र ही वह व्यवस्था - पुनः सुचारुरूप से व्यवस्थित होजायगी । और हम आपकी सरकार का ( सत्तातन्त्र का ) अभिनन्दन करते हैं, जिसने ऐसे महान् शोधकार्य्य अपने राष्ट्र में व्यवस्थित कर रक्खें हैं । हमनें इन हिन्दी - वैज्ञानिक ग्रन्थों के व्यापक प्रचार के लिए अपनी युनिवर्सिटी में ' हिन्दी विभाग ' की स्थापना करदी है - यह जानकर " " प्रसन्नता होगी, जिन के परिणामों से हम यथासमय " सूचित करते रहेंगे " " इत्यादि " । केन्द्रसत्ता का सुख -- स्व'न तो हमारे लिए विदूर ही है, जबकि हम अपने प्रान्तीय-- ' राजस्थानसत्ता-तन्त्र ' की दृष्टि से भी इस दिशा में ' सन्तोष ' की अनुभूति नहीं कर पारहे । सन् ४८ से सन् ५८ के मार्च-पर्य्यन्त, अर्थात् निरन्तर १० वर्ष पय्यन्त अथक प्रयास करते रहने पर भी हमें अपने हीं इस प्रान्तीय - सत्ता-तन्त्र से इस दिशा में नाममात्र की सहयोग - भावना तत्र मिल पाई, जबकि सर्वप्रथम उत्तरप्रान्त के यशस्वी प्राच्यसंस्कृतिनिष्ठ - मुख्यमन्त्री सर्व श्री सम्पूर्णानन्दजी महाभाग का सहयोग इस दिशा में संस्थान को उपलब्ध होगया । सचमुच भारतराष्ट्र की अपनी इस मूलनिधि के प्रति प्रक्रान्ता इत्थंभूता उदासीनता, किंवा निरपेक्षता का ही यह दुष्परिणाम है कि, राष्ट्र की ज्ञानविज्ञानात्मिका सर्वोपयोगिनी, सर्वदोपयोगिनी यह मूलनिधि राष्ट्रीय-. जनतन्त्र की प्रज्ञा से संस्पृष्टा ही प्रमाणित होरही है । मतवादात्मक धम्म के प्रति, उनके मतवादात्मक धार्मिक - साहित्य के प्रति सत्तातन्त्र की निरपेक्षता का श्राज के मतवादसंघर्षात्मक युग में अभिनन्दन हीं किया जायगा । किन्तु भारतीय संस्कृति, तन्मूलक आचार-धर्म्म तो इस मतवाद की सीमा से सर्वथा ही असंस्पृष्ट हैं । प्रत्येक मतवाद अपने अपने मत की ही सर्वश्र ेष्ठता प्रमाणित करता हुआ जहाँ सम्पूर्ण मानवों को स्त्रशिष्य बना लेने के लिए ही आतुर रहता है, वहाँ एकमात्र भारतीय – संस्कृतिमूलक आर्ष - वैज्ञानिक प्राच्यधर्म्म ही वैसा धर्म्म है, जो विश्वमानवों को अपने अपने दिग्-देशकालानुत्रन्धी- मान्य- भावों, स्व - स्व - कर्त्तव्यों में हीं आरूढ बने रहने का विधान कर रहा है, जैसाकि इसके निम्न लिखित उदारतापूर्ण महान् उद्घोष से प्रमाणित है— १४३

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आत्मनिवेदन एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्नजन्मनः । स्वं स्व ं चरित्रं शिचेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ - मनुः २/२०१ अर्थात्- “ इस भारत देश में उत्पन्न वेदशास्त्रवेत्ता विद्वान् से सम्पूर्ण विश्व के मानव अपने अपने चरित्र की, अपने अपने कर्त्तव्य की ही शिक्षा ग्रहण करें " । हम समझते हैं, ऐसा उदार उद्घोष संसार के अन्य किसी भी मतवाद की ओर से आजतक अभिव्यक्त नहीं हुआ होगा । ऐसी सार्व-भौम - संस्कृति, सार्वभौम धर्म के प्रति सत्तातन्त्र अपने आप को निरपेक्ष मान रहा हैं, तो इस निरपेक्षता को तो हम भारतराष्ट्र का महान् दुर्भाग्य हीं कहेंगे, जिस का राष्ट्रहितानुबन्ध से जितना भी शीघ्र संशोधन होजाय, उसी में राष्ट्र का मङ्गल है । इस मङ्गलकामना के साथ ही हम इस कटुसत्य का भी दिग्दर्शन करा देन राष्ट्र की मङ्गलकामना से ही अनिवार्य्यं मान रहे हैं कि, सत्तातन्त्र की तथाकथिता ' धर्मनिरपेक्षता ' का एकमात्र केन्द्रबिन्दु वह भारतीय हिन्दूमानव ही प्रमाणित होरहा है, जो दिग्देशकालानुबन्धिनी - त्रिसहस्र-वार्षिकी आक्रमण - परम्पराओं, उत्पीड़न - परम्पराओं को अपने सहज - सांस्कृतिक - धृतिगुण से सहता हुआ भी किसी अज्ञात — सांस्कृतिक - संस्कारानुग्रह से ही गिरता पड़ता -पिटता - कुटता हुआ भी गच्छतः स्खलनरूपेणापि श्राजतक भी अपनी आत्मबुद्धिष्ठामूला - प्राच्यसंस्कृतिनिष्ठा, तदनुप्राणित प्राच्य - राष्ट्रीय - साम्प्रदायिक - धर्म का यशो-गान करता ही आरहा है । इस की इस सांस्कृतिक - धृतिने ही इस राष्ट्रीय हिन्दू को ही आज सत्तातन्त्र की आँखों की किरकिरी बना दिया है । - दिग्देशकालानुबन्धी तात्कालिक लाभों के लिए आकुल - व्याकुल- बने रहते हुए जहाँ आज के सभी मतवाद वर्तमान सत्तातन्त्र की प्रतीच्यदेशानुगता सभी भौतिक - मान्यताओं का मानवता-मानवधर्म्म – व्यापकता - उदारता - आदि आदि भावुकतापूर्ण उद्घोषों के माध्यम से सर्वात्मना अनुकरण करते हुए तात्कालिक लाभों से समन्वित होते जा रहे हैं, वहाँ एकमात्र हिन्दूमानव ही सत्तातन्त्र की इन उत्ताल तरङ्गों में यदा कदा विघ्न उपस्थित कर ही तो देता है अपनी सांस्कृतिकी चिरन्तना राष्ट्रीया उस निष्ठा के माध्यम से, जिस निष्ठा के बल पर ही भारतराष्ट्र अबतक - ' भारत ' अभिधा को अंशतः चरितार्थ करता रहा है । आश्चर्य तो यह है कि, जब हमारे सत्तातन्त्र को अपने श्रागन्तुक प्रतीच्य सम्मान्य अति-थियों को भारतराष्ट्र में कुछ दिखलाना होता है, तो यह उन सांस्कृतिक - प्राच्य - ध्वंसावशेषों को ही इन के सम्मुख रखता रहता है, जो हिन्दू मानव - की सांस्कृतिक निष्ठा के ही परिचयात्मक प्रतीक चिह्न हैं । साक्षात् स्वयं मूल संस्कृति- मूल साहित्य के सम्बन्ध में दिखाने के लिए तो कुछ शेष रह नहीं गया है आज के इस सत्तातन्त्र के प्रज्ञाकोश में सिवाय नृत्य - गान - वाद्यादि तात्कालिक मनोविनोदों के । अतएव अगत्या - ध्वंसाव-शेष ही इस के लक्ष्य बने रह गए हैं, जिन्हें भी हम हिन्दुत्त्व की सीमा से कदापि पृथक् नहीं कर सकते । हिन्दुत्त्व से अनुप्राणित इन वास्तुकलाओं के परिचय - चिह्नों के बल पर ही आज भी हम यों यथाकथंञ्चित् भारत का राष्ट्रीय गौरव सुरक्षित कर लेने हैं, जो भूतप्रधाना दृष्टि रखने वाले सम्मान्य अति-थियों की मनस्तुष्टि के लिए पर्याप्त ही माने जासकते हैं । किन्तु? — किन्तु इन सांस्कृतिक प्रतीक चिह्नों के मूलाधारभूत सांस्कृतिक साहित्यिक - कोश के प्रति तो हम तटस्थ-निरपेक्ष ही बने हुए हैं कल्पित साम्प्रदायिकता के व्यामोहन से, जिस का हिन्दू नेता -प्रसङ्ग में दिग्दर्शन कराया १४४

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शपथ - प्रथमखण्ड जाचुका है | ऐसा क्यों शेरहा है?, प्रश्न का एकमात्र उत्तर है - हिन्दू की ही परदर्शनमूला - सर्वनाशकारिणी-स्वनिष्ठाप्रतिबन्धिका - आत्मबुद्धिस्वरूप - विमोहनी - मनः शरीरप्रधाना वह भावुकता, जिस से निरन्तर तीन सहस्र वर्षों से यह हिन्दूमानव सम्पूर्ण परिग्रह - साधनों की विद्यमानता में भी ' प्रभाव ' का ही अनुभव करता आरहा है, और इसी महान् दोष से इस का आत्मबुद्धयनुगत वास्तविक - नैष्ठिक - स्वातन्त्र्य - अन्तम्मुख ही बना हुआ है । इसी भावुकताने आज के स्वतन्त्र युग में एक नवीन आविष्कार कर डाला है, जिस से बड़ा शत्रु भारतराष्ट्र का अन्य कोई भी नहीं है । एवं भावुकता के सशक्त सबल - उस पुत्र का नाम है- ' अन्तर्राष्ट्रीयख्यातिविमो -हन ' । “ वे हमें बुरा न कह बैठें, उन की दृष्टि में हम साम्प्रदायिक न बन जायँ, हम उन के सम्मान दान से वञ्चित न रह जायँ " - लौकैषणात्मक - इसी आत्मस्वरूपविमोहन का नाम है - ' अन्तर्राष्ट्रीयाख्याति-विमोहन ', जिस इस महान् प्रबल शत्रुने हीं आज हमारे उन सत्ताधीशों के सर्वसमर्थ - प्रतिभायुक्त - सर्वगुण-विभूषित भी अन्तराल को भारत की प्राच्य - सांस्कृतिक साहित्यिक- विभूतियों से पराङमुख ही प्रमाणित कर दिया है । इसी काल्पनिक ख्यातिविमोहन ने इन सत्ताधीशों को- ( जो मांस्कृतिक - हिन्दू होने से ही सर्वगुण सम्पन्न हैं ) - ' हिन्दू ' शब्द के प्रति इस की संस्कृति - साहित्य - धर्म्म- आदर्श सभ्यता आदि के प्रति प्रतिक्रियावादी ही प्रमाणित कर दिया है । स्वयं राष्ट्रीय मानव ही अपनी राष्ट्रीय विमल- विभूतियों का महान् प्रतिबन्धक बन गया है - तत्ख्याति - पाश-बन्धन से आलोमभ्यः श्रनखाग्रेभ्य: श्राबद्ध होता हुआ । अतएव ' हिन्दू ' शब्द से प्रतिध्वनिता राष्ट्र की वह सांस्कृ-तिक हिन्दीभाषा ( हिन्दुस्तानी नाम की कल्पिता ' हिन्दी ' नहीं ) तक भी भारतराष्ट्र की राष्ट्रभाषा अबतक नहीं बन पाई, जिस के सुसांस्कृतिक भावाभिव्यञ्जक - महान् शब्दकोश के समतुलन में संसार की कोई भी व्याव-हारिकी भाषा क्षणमात्र भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकती । प्रतिमान से अपने आप को सर्वथा संस्पृष्ट मानते हुए हम साभिनिवेश यह निवेदन कर देना चाहते हैं अपने महामहिम सत्तातन्त्र से कि, आज के व्यवहार में अंग्रेजी के अभाव में जो शब्ददारिद्रय अनुभूत किया जारहा है, वह सर्वथा काल्पनिक भ्रम है । दुर्भाग्यवश इमनें अपने प्राच्य - मौलिक - सांस्कृतिक - शब्दभण्डार का अबतक संस्पर्श भी नहीं किया है । राष्ट्रभाषा हिन्दी की जननी सुरभारती संस्कृत भाषा का असंख्य ग्रन्थानुगत शब्द भण्डार, तन्मूलभूता ' छन्दोभ्यस्ता ' नाम की वेदभाषा का ४५,२४ ग्रन्थात्मक शब्दभण्डार, ( जिस वेदभाषा की - ' पथ्यास्वस्ति ' नाम की वर्ण-मात्रिका में हीं २८८ वर्ण हैं ), इत्थंभूत सांस्कृतिक मूल शब्दभण्डार को अपनी प्राणप्रतिष्ठा बनाए रखने वाली सांस्कृतिक- राष्ट्रभाषा हिन्दी की पूर्णता में जो राष्ट्रवादी सन्देह करता है, किंवा जो ' अंग्रेजी ' के काल्पनिक -व्यामोहन से अपनी इस परिपूर्णा मातृभाषा को अपूर्णा अव्यावहारिकी - व्यावहारिक - शब्दशून्या बतलाने की धृष्टता करता है, उस से बड़ा राष्ट्रद्रोही और कौन होगा? | उसी मातृभाषा की आराधना के लिए हमने उसी राष्ट्रभाषादेवता के चरणों में लक्षपृष्ठात्मिका यह भाषापुष्पाञ्जलि समर्पित की है, जिस के आधार पर राष्ट्रभाषा के सभी विरोधियों की व्यावहारिकी प्रज्ञा का सोल्लास आमन्त्रया करने में हम अणुमात्र भी संकोच का अनुभव नहीं कर रहे । इसी सम्बन्ध में विगत तीन सहस्र वर्षों की अवधि में हीं घटित होने वाली ' संवादभाषा ' मा ऐतिहासिक घटना को अत्र भाषाप्रसङ्गे उद्धत कर देने का भी लोभ संवृत नहीं होरहा है । घटना आज से दो सहस्र पूर्व के उस युग की है, जिस में शब्दव्युत्पत्यात्मक व्याकरणशास्त्र को अपूर्व मर्य्यादा स्वरूप प्रदान १४५

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श्रात्मनिवेदन करने वाले आचार्य्य पाणिनि के लोकोत्तर सूत्रग्रन्थ ( अष्टाध्यायी ) को आधार बना कर भारत के प्रचण्ड मेघावी दो प्रकाण्ड विद्वानों में शब्दों की उपलब्धि के सम्बन्ध में एक आकर्षक विवाद उपस्थित होपड़ा था । एक ओर पाणिनीय सूत्रों के प्रति छन्दोवत् ( वेदवत् * ) आस्था - श्रद्धा रखने वाले आचार्य्य पत--ञ्जलि अपने सुप्रसिद्ध ' महाभाष्य ' के द्वारा पाणिनीयसूत्रों के तत्त्वात्मक समन्वय में प्रवृत्त थे, तो दूसरी ओर पाणिनीय सूत्रों की तार्किक - आलोचना - प्रत्यालोचना में साभिनिवेश प्रवृत्त उसी युग के प्रचण्ड मेधावी विद्वान् दक्षिणदेशीय आचार्य कात्यायन अपने स्वतन्त्र ' वार्त्तिकों ' के गुम्फन में संलग्न थे । शब्दों की उपलब्धि, तथा अनुपलब्धि के माध्यम से ही इन दोनों वरिष्ठ मंहिष्ठ श्राचार्य्यप्रवरों में एक विसंवाद उपस्थित होपड़ा था, जो आज की शब्दोपलब्धि, अनुत्रलब्धि के प्रसङ्ग से ही स्मृत होपड़ा है । मानवीय - मानसिक - कल्पना से अनुप्राणित सङ्केतभावों के माध्यम से दिग्देशकालानुबन्धी - व्यक्त— भौतिक - युगधर्म्मनिबन्धन- लौकिक - व्यवहारों के तात्कालिक निर्वाह के लिए जो ऐच्छिक शब्द बन जाते हैं, उह्न हीं ' यदृच्छाशब्द ' कहा गया है । उदाहरण के लिए काष्ठदण्डादि की ध्वनि के लिए उपकल्पित खट् - खट् शब्द, वर्षा की स्तोकविन्दुओं की ध्वनि के लिए- ' टप् -- टप ' शब्द, अग्निविस्फुलिङ्गों की विस्फो-टध्वनि के लिए चट् -- चट् शब्द, जीर्ण - शीर्ण - वस्त्रादि की विशकलनानुगता ध्वनि के लिए चर्र चर शब्द, आदि असंख्य ‘ यदृच्छाशब्द ' आविर्भूत - तिरोभूत होते रहते हैं, जिह्न सङ्क े तभावापन्न ' उत्पन्न--सृष्टु ' शब्द ही कहा गया है । मन्त्रत्राह्मणात्मिका, छन्दोम्यस्ता नाम की वेदभाषा से अनुप्राणित प्रकृतिसिद्ध नित्यशब्द जहाँ - ‘ उत्पत्तिसृष्ट ' बनते हुए ज्ञानविज्ञानसिद्ध सनातन शब्द हैं, वहाँ पूर्वोक्त यदृच्छाशब्द युग-धर्मानुबन्धी साङ्केतिक शब्द ही माने गए हैं, जिन के माध्यम से ही विश्व की सम्पूर्ण व्यावहारिकी-भाषाओं कास्वरूप- निर्माण हुआ । यही उत्पत्ति सृष्टा - सनातना - नित्या वेदभाषा, तथा उत्पन्नसृण-परिवर्त्तन शोला- यदृच्छात्मिका लोकभाषा में वह महान् अन्तर हैं, जिसे व्यवस्थितरूप से प्रज्ञानुगत बनाए बिना कदापि भारतीय मूल साहित्य ( वेदसाहित्य ) का समन्वय सम्भव नहीं है । यदृच्छात्मक - लौकिक-शब्दों से पृथक रह कर ही तत्त्वात्मक बौद्धिक शब्दों का ज्ञानविज्ञानात्मक समन्वय सम्भव बना करता है, इसी आधार पर - ' लोके, वेदे च ' व्यवस्था - व्यवस्थित हुई है । अमुक शब्दों की उपलब्धि के सम्बन्ध में वार्त्तिककार कात्यायनमुनि जब यह आपत्ति उठाते हैं कि-' अमुक शब्द तो हमें उपलब्ध ही नहीं हो पा रहे ', तो महाभाष्यकार पतञ्जलि इस आक्षेप का नो उत्तर देते हैं, उसी उत्तर की ओर हम आज के उन लोकमानवों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, जो राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बन्ध में इस काल्पनिक अभियोग के स्रष्टा बने हुए हैं कि, “ हिन्दी भाषा में उपयोगी -पारिभाषिक वैज्ञानिक आदि आदि शब्दों का अभाव है । अतएव यह भाषा आज के विज्ञानयुग में अपूर्ण है ” । महाभाष्यकार कहते हैं कि, " पृथिवी सप्तद्वीपा है, उस में चार वेद, षडङ्गशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र, आदि आदि अनन्त - असंख्य शब्दस्रोत हैं । महान् - शब्दस्य प्रयोग - विषयः । इस विशाल शब्दभण्डार की विद्यमानता में भी यह मान बैठना कि, शब्द उपलब्ध नहीं होते, केवल साहस, किंवा दुस्साहस ही तो माना जायगा -'नोपलभ्यन्ते ' - इतिवचनं केवल साहसमात्रमेव ' ( पात-* –छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति । १४६