Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 151–160
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160
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शतपथ - प्रथमखण्ड अजमहाभाष्ये ) । शिल्प कला - वाणिज्य - नृत्य -- गीत - सङ्गीत - आख्यान - उपाख्यान - गाथा - लोक - समाज राजनीति अन्तर्राष्ट्रीय नीति -- आदि आदि मनः शरीरानुबन्धों से अनुप्राणित यच्चयावत् लौकिक शब्द, तथा अधिदैवत - अध्यात्म - अधिभूत - विज्ञान - नक्षत्रविज्ञान - ज्योतिष्चक्र ( खखोल ) - भुवनकोश ( भूगोल ) -विज्ञान - असंज्ञ-अन्त: संज्ञ - ससंज्ञ- भेद से त्रिधा विभक्त प्राणीविज्ञान, धातु - उपधातु रस- उपरस - विष उपविष आदि भेदभिन्न खनिज विज्ञान, तृण- गुल्म - लता - वृक्ष - श्रोषधि - वनम्पत्यादि भेदभिन्न मूलजीवसर्गविज्ञान, ध्रौव - सौर - सौम्य भेद-भिन्न विद्युद्विज्ञान ग्रहोपग्रहविज्ञान इत्यादि अनन्त असंख्य - विज्ञानभावों से समन्वित शास्त्रीय शब्द, इत्येवंरूपेण सम्पूर्ण - शब्दभण्डार को अपनी सीमा में मर्यादा - व्यवस्था - पूर्वक - सुरक्षित रखने वाले भारतीय-प्राच्यसाहित्य को सर्वथा निरपेक्ष मान बैठना, और तत् - पश्चात् तत्साहित्य की अङ्गभूता राष्ट्रभाषा - हिन्दी को अमुक - पारिभाषिक- ( टेकनिकल Techical ) शब्दों से शून्य बतलाना - साहस - मात्रमेव । सचमुच ही तो हमनें त्रिसहस्रवार्षिकी सर्वदासता के कारण अपना सभी कुछ तो विस्मृत कर दिया है, जिस की स्मृति का आज जब महद्भाग्य से सुअवसर उपस्थित हुआ, तो दुर्भाग्यवश हमारे राष्ट्रीय नेता अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के काल्पनिक - विमोहन में पड़ कर भावुकता - पूणां उदारता के माध्यम से भारतराष्ट्र की गौरवसंरक्षिका अपनी प्राच्यनिधि से सर्वात्मना निरपेक्ष ही प्रमाणित होगए, जिस से बड़ा दुर्भाग्य इस भारतराष्ट्र का और क्या होगा? | आज ' हिन्दी ' क्यों अव्यावहारिकी बनी हुई है?, क्यों इसमें भावाभिव्यञ्जक उपयुक्त शब्द नहीं मिल रहे?, तत्पूर्त्यर्थ हमें आज क्यों अन्य प्राकृत भाषाओं के, विशेषतः सुदूर - पश्चिम की केतुमालवर्षीया * इ ंग्-लिशभाषा के शब्दों की याञ्च्या करनी पड़ रही है?, इन सभी विसंवादों का एकमात्र उत्तर है- राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसकी माता मुरभारती, तथा तन्माता छन्दोभ्यस्ता के अजस्र -रस - प्रवाह से भावुकतावश पृथक् कर देना | नीरक्षीरविबेकी अभिनव आलोचक कहेंगे, फिर तो हिन्दी हिन्दी न रहकर ' संस्कृत ' बन जायगी, अथवा तो वेदभाषा बन जावगी, और उस अवस्था में ऐसी हिन्दी को समझेगा कौन? । उत्तर होगा- समझदार तो अवश्य ही समझ लेंगे- अपनी इस मातृस्थानीया राष्ट्रभाषा सुसंस्कृता हिन्दीभाषा को । हाँ वे बुद्धिमान् अवश्य ही ऐसी सुसंस्कृता राष्ट्रभाषा को समझने से वञ्चित रह जायेंगे, जिनकी भाषा अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से आज इंगलिश भाषा, किंवा उर्दू - फारसी भाषा ही प्रमाणित होचुकी है । ' संस्कृतभाषा, और उसके शब्द तो अत्यन्त कठिन हैं ' इस अभियोग का भाषाविज्ञान की दृष्टि से उस दशा में यत्किञ्चित् भी महत्त्व शेष नहीं रह जाता, जबकि हम यह देखते हैं कि, जिस संस्कृत, अथवा तो तदनुप्राणिता राष्ट्रभाषा हिन्दी के ' शब्द ' ही जहाँ कण्ठस्थ ( याद ) किये जाते हैं, वहाँ इंग्लिश भाषा के तो प्रत्येक शब्द के साथ उस शब्द के वर्णाक्षर ( Spelling ) भी कण्ठस्थ किए जाते हैं, और करवाए जाते हैं । हमारे लिए जहाँ ' राम ' शब्द के लिए- ' रामः ' याद कर लेना हीं पर्याप्त है, वहां इसी शब्द के इंग्लिशभाषान्तर-करणानन्तर ' आर् - ए- एम् - राम ' इस महान् विस्तार का ही अनुगमन आवश्यक होजाता है । लमति -पल्लवितेन - श्रप्रासङ्गिकेन । स्वतन्त्र ही विचार का विषय है यह, जिसके माध्यम से उन सभी काल्पनिक - श्रापात-* नववर्षात्मक भारतीय पाद्मभुवनकोश ( भूगोल ) में इंग्लैण्ड का स्थान - हमारी भौगोलिक मर्य्यादा के अनुसार - ‘ केतुमालवर्ष की सीमा में हीं अन्तर्भुक्त है, जिस इस भौगोलिक - तथ्य का शतपथभाष्य-द्वितीयखण्ड में विस्तार से स्वरूपोपबृंहण हुआ है । १४७
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श्रात्मनिवेदन रमणीय - अभियोगों का अञ्जसा ही निराकरण किया जासकता है, जिन्हें अग्रणी बना कर ही इंग्लिशप्रेमी भारतीय अपनी इस जननी के प्रति श्राज महान् द्रोह ही करते जारहे हैं । यदि अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध संरक्षण के लिए हम इगग्ले - पढ़ना आवश्यक मानते हैं, तो भारत से सम्बन्ध - सौभाग्य- स्थापित करने की कामना रखने वालों को भी यहाँ की राष्ट्रभाषा - हिन्दी पढ़नी ही चाहिए । और हम समझते हैं, संघर्षशील वे नैष्ठिक तो जहाँ इस दिशा में भी निकट भविष्य में हीं सफल होजायँगे, वहाँ हम न्तर्राष्ट्रीय - काल्पनिक - व्यामोहन से अपनी राष्ट्रभाषा-हिन्दी की प्राणप्रतिष्ठा में अज्ञातावधि पर्य्यन्त गजनिमीलिका ही करते रहेंगे, जिस इस निर्णयात्मिका-' अज्ञातावधि ' का भी एक प्रच्छन्न रहस्य है, जिसे स्पष्ट न करना ' सत्य ' का ही हनन माना जायगा । अतएव ' ' ' ' हिन्दी ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए ' इस सर्वसम्मत उद्घोष से, सुनते हैं - हमारा सत्तातन्त्र भी सहमत है । परन्तु सत्ता की यह ' सहमति ' आचाररूप में अबतक क्यों परिणत नहीं होसकी? | यही नहीं, अन्यान्य विवादास्पद विषयों की भाँति ऐसा सर्वसम्मत विषय भी राष्ट्रभाषा आयोग ' के व्याज से क्यों, और कैसे विसंवाद की क्रीड़ास्थली बन बैठा १, किंवा इच्छापूर्वक ही बना दिया गया?, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का रहम्यात्मक समाधान पूर्वोक्त-- ' अज्ञातावधि ' शब्द के गर्भ में हीं सुरक्षित है, जिसका सत्यानुबन्ध से स्पष्टीकरण कर देना अत्र इसलिए अनिवार्य्यं ही प्रमाणित होरहा है कि, कलतक जो राष्ट्रप्रेमी जिस राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही प्रमुखता प्रदान करते आ रहे थे, वे ही आज आकस्मिक रूपेणैव इस जननी का प्रचण्ड विरोध ही करने लग पड़े हैं - अंग्रेजी के गुणानुवादाकर्षण से श्राकर्षितमना बनते हुए । · वस्तुस्थिति के वास्तविक तथ्य को हृदयङ्गन करने के लिए हमारी स्वल्पमति में तो सभी समस्याओं का एकमात्र मापदण्ड चतुष्पर्वा वह ' मानव ' ही है, जिसे केन्द्रबिन्दु मान कर ही राष्ट्रों में विभिन्न समस्याएँ आविर्भूत - तिरोभूत होतीं रहतीं हैं । ' अज्ञातावधि ' से सम्बन्ध रखने वाली इस भाषासमस्या के लिए भी भाषाविज्ञानवेत्ताओं का ध्यान हम भाषाव्यवहारनिष्ठ मानव के स्वरूप की ओर ही श्राकर्षित कर रहे हैं । पूर्व में यत्रतत्र अनेकधा यह स्पष्ट किया जाचुका है कि, आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, इन चारों पर्वों की एकत्र समन्विता अवस्था का नाम हीं ' मानव ' है । यही ' मानवव्यक्ति ' के ' व्यक्तित्त्व ' की वह मौलिक स्वरूप - परि-भाषा है, जिस इस मौलिक - ' व्यक्ति मानव ' के आधार पर ही मानव की वैय्यक्तिकी, पारि रिकी, सामाजिकी, तथा राष्ट्रीया, नाम की सुप्रसिद्धा महिमाचतुष्टयी ( विकास नहीं ) प्रतिष्ठित है । चारों स्व-स्व - तन्त्रों में परिपूर्ण हैं । अतएव व्यक्ति, किंवा समाज, परिवार, किंवा राष्ट्र, आदि किसी भी शब्द में कोई भी विसंवाद उपस्थित नहीं होसकता परिपूर्णताप्रवत ' के - चतुषपर्वात्मक - महिमाभाव के अनुग्रह से, जबकि भावुकतापूर्ण ' विकासवाद ' के द्वारा ही इन चारों तन्त्रों में गौण - मुख्य- भावानुगता अहमहमिका प्रक्रान्त होपड़ी है, जिस तथ्य - समन्वय का अत्र प्रसङ्ग नहीं है! यहाँ केवल यही अवधेय है कि, व्यक्ति मानव में जो चारों पर्व क्रमशः आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, कहलाए हैं, परिवार मानव में वे ही चारों पर्व क्रमशः कुलवृद्ध [ म ], समर्थ युवापुत्र [ बुद्धि ], नारीवर्ग [ मन ], बालवर्ग [ शरीर ] नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । तीसरे समाजमानव में वे ही चारों पर्व क्रमशः ब्राह्मण [ आत्मा ] - क्षत्रिय [ बुद्धि ] - वैश्य [ मन ] -शूद्र [ शरीर ], इन नामों से व्यवहृत हुए हैं | एव सर्वान्त के चौथे राष्ट्रमानव में वे ही चारों पर्व क्रमशः नीतितन्त्र [ आत्मा ], राज्यतन्त्र [ बुद्धि ], १४८
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शतपथ - प्रथमखण्ड गणतन्त्र [ मन ], प्रजातन्त्र [ शरीर ], इन नामों से महाभारतादि ऐतिह्यग्रन्थों में साटोप - उपवर्णित हैं । इन मानवीय चारों तन्त्रों में से प्रकृत में हम सर्वान्त के ' राष्ट्रमानवतन्त्र ' की ओर ही राष्ट्रप्रेमियों का विशेषरूप से ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । क्योंकि यही तन्त्र भाषा समस्या की ' अज्ञातावधि ' का स्वरूप - विस्फोटक प्रमाणित होरहा है । कथमिति चेत्?, श्रयताम्! चतुपर्वात्मक मानव सर्वात्मना अपने आप में परिपूर्ण है । अतएव ऐसे मानव का चतुष्पर्वात्मक राष्ट्रतन्त्र भी परिपूर्ण ही माना जायगा, जिसमें आत्ममूला नीतितन्त्र व्यवस्था, बुद्धिमूला राज्यतन्त्र-• व्यवस्था, मनोमूला गणतन्त्रव्यवस्था, तथा शरीरमूला प्रजातन्त्र व्यवस्था, चारों ह्रीं शासनव्यवस्थाएँ निर्वि-रोध उसीप्रकार सुसमन्वित रह सकतीं हैं, जैसे कि आत्ममूलक मोक्ष, बुद्धिमूलक धर्म्म, मनोमूलक काम, तथा शरीरमूलक अर्थ, ये चारों सुप्रसिद्ध मानवीय पुरुषार्थ सर्वात्मक बनते हुए परस्पर निर्विरोध सुसमन्वित हैं ( देखिए पृष्ठ सं ० १११ ) । इह्नीं चारों तन्त्रों के आधार पर राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता प्रतिष्ठित है । आत्मबुद्धिमूलिका नीतितन्त्रान्विता राज्यतन्त्रानुगता तन्त्रव्यवस्था का मौलिक आधार जहाँ बुद्धिमूला ' संस्कृति ' बनती है, वहाँ मनः - शरीरमूला - गणतन्त्रान्विता प्रजातन्त्रानुगता तन्त्रव्यवस्था का व्यक्त - मूर्त्त - आधार मनःशरीरमूला ' सभ्यता ' बना करती है । चारों राष्ट्रतन्त्रों का यदि निर्विरोध सहसमन्वय है, तो संस्कृति, और सभ्यता भी सहसमन्विता है । यदि दुर्भाग्यवश इनका विघटन होजाता है, पार्थक्य होजाता है, तो तदनुगता संस्कृति और सभ्यता भी विघटन ही होजाता है । और उस दशा में मनःशरीरानुगता व्यक्ता - मूर्ता – बाह्या सभ्यता अपनी आत्मबुद्धि - अनुगता अव्यक्ता - अमूर्त्ता - आभ्यन्तरा संस्कृति की मूलप्रतिष्ठा से वञ्चित होती हुई केवल दिग्देशकालानुबन्धिनी भूतसभ्यतामात्र से ही शेष रह जाती है । एवं ऐसा सा ही कुछ होपड़ा है आज हमारे भारतराष्ट्र में गणतन्त्रीय - प्रजातन्त्रात्मक - शासनतन्त्र के द्वारा | आत्मबुद्धिमूला राष्ट्रीय मूल संस्कृति की प्रतिष्ठा से वञ्चिता यह तन्त्रव्यवस्था ' सभ्यता ' प्रधाना ही बन बैठी है इसलिए कि, इन दोनों हीं तन्त्रों का आगमन एवं प्रतिष्ठापन उन प्रतीच्यदेशों की गणतन्त्रानुगता - प्रजातन्त्र - व्यवस्था के आधार पर ही हुआ है, जहाँ मानव के मनः शरीरात्मक - भौतिक - सभ्यतापर्व ही मानव की स्वरूप - परिभाषा बने हुए हैं । भारतीय गणतन्त्रात्मिका -- प्रजातन्त्र पद्धति के मूल में तो पुराणपुरुष भगवान् व्यास ने आत्मबुद्धिमूला संस्कृति को ही प्रमुखरूपेण प्रतिष्ठित माना है, जो एक स्वतन्त्र निबन्ध का ही विषय है । वर्त्तमान शासनतन्त्र प्रतीच्य - शासनतन्त्र का आंशिक - अनुकरणमात्र है, यह निर्विवाद तथ्य है, जिसका न तो भारतीय मूलसंस्कृति से ही कोई व्यक्त सम्बन्ध है, नैव संस्कृतिमूला भारतीया सभ्यता से अनुप्राणितां भारतीया गणतन्त्र -- प्रजातन्त्र - - पद्धति से ही इसका कोई सम्बन्ध । अतएव स्वाभाविक ही था कि, प्रतीच्य-तन्त्रों की प्रमुखा इंग्लिशभाषा ही यहाँ के सभ्यतानुगामी आचार - व्यवहारों की मूलप्रतिष्ठा बनी रहती । और वही सबकुछ बन रहा है आजतक | राष्ट्रभाषा - हिन्दी के प्रवेश के साथ ही निश्चयेन इन प्रतीच्य - मान्य— तात्रों में वैसा विकम्पन ही उत्पन्न होजायगा, जिसे उपशान्त करने के लिए तो राष्ट्रीय नेताओं को अपनी शासनतन्त्रपद्धति में हीं आमूलचूड़ परिवर्तन कर लेना पड़ेगा । यही वह अज्ञाता आशङ्का है, जिस के अनुबन्ध से सत्तातन्त्र के द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के सम्बन्ध में-- ' अज्ञातावधि ' जैसे माध्यम का ही विवशतावश अनुगमन करना पड़ रहा है, जिस इस विवशता को साम्प्रतं तु हम राष्ट्रीय नेताओं की इसलिए दूरदर्शिता ही कहेंगे कि, आज की वर्त्तमाना विविध प्रान्तीय - भाषा समन्विता - हिन्दी शासनतन्त्र का व्यव--१४६
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श्रात्मनिवेदन स्थापूर्वक सञ्चालन करने में तबतक कदापि समर्थ नहीं बन सकती, जबतक कि, इसे तज्जननी तथाकथिता मूल संस्कृति के शब्दभण्डार से आप्लुत नहीं कर दिया जाता । और हम समझते हैं, यथासम्भव सत्तातन्त्र के अमुक मनीषी नेता इस दिशा में जागरूक भी अवश्य ही होंगे । किन्तु?... इस किन्तु? का एकमात्र स्वारस्य है स्वसांस्कृतिक - - भण्डार के प्रति सत्तातन्त्र का अमुक - काल्पनिक--व्यामोहन से अबतक आत्यन्तिक रूपेणैव निरपेक्ष ही बने रहना । नहीं, तो इस समस्या के समाधान में कदापि इत्थंभूत विलम्ब सम्भव नहीं था । सम्वत्सरत्रयी के माध्यम से ही उस सांस्कृतिक - शब्दभण्डार से वर्त्तमाना हिन्दी को ‘ सांस्कृतिकी - राष्ट्रभाषा ' के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान किया जासकता था । एकमात्र इस भाषा समस्या के निराकरण से ही तत्सहैव परःशताधिका अन्यान्या वे सभी समस्याएँ भी स्वतः ही सहजरूपेणैव सुसमन्विता होसकतीं थीं, जो समस्याएँ श्राज हमारे महामहिम सत्तातन्त्र के लिए ' हृदयशूल ' ही बनीं हुई हैं । क्या हम यह आशा कौं कि, हमारा महामहिम सत्तातन्त्र अपनी निरपेक्षता में राष्ट्रीय निष्टावल से शिथि-लतानुग्रह करेगा? | यदी नहीं, तो महती विनष्टिः । और यदि हाँ, तो महती सम्भूतिः, जिस इस महती सम्भूति की माङ्गलिक - कामना से ही यह राष्ट्रभाषानिबन्ध उपनिबद्ध हुआ है-— शतपथभाष्य के माध्यम से । हम निवेदन कर रहे थे कि, सत्तातन्त्र की ' धर्मनिरपेक्षता ' का मुख्य केन्द्रबिन्दु उस राष्ट्रीय-मानव की संस्कृति, धर्म्म ही बना हुआ है, जो ' हिन्दू ' नाम से प्रसिद्ध है । इस का इस से बड़ा, और ज्ज्वलन्ततम प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या होगा कि, अन्य समस्त - मतवादात्मक धर्म जहाँ सत्तातन्त्र की वरदा अभया छन्नच्छाया में पुष्पित - पल्लवित्त हो रहे हैं, वहाँ एकमात्र यही ' इल्यलमतिविस्तरेण । सर्वोपरि अमुक मतवादविशेष के प्रचार के लिए सत्तातन्त्र का उन्मुक्तहस्त बने रहना, अपने धर्मनिरपेक्ष-जनतन्त्रीय - सत्ताकोश से ही उस मतवादविशेष की सोल्लास जयन्तियाँ मनाना, और सम्पूर्ण राष्ट्र को साम्वत्सरिक - प्रचार के माध्यम से मानने के लिए विवश करना, तत्प्राकृत ग्रन्थों के प्रकाशन - प्रचार के लिए प्रभूत अनुदान प्रदान करते रहना हीं यदि सत्तातन्त्र की ' धर्म्मनिरपेक्षता ' की महती स्वरूप – व्याख्या है, तो कदापि ऐसी साम्प्रदायिक - मनोवृत्ति को अग्रणी बनाने वाला सत्तातन्त्र भारतराष्ट्र में निरपेक्षता-लक्षणा गरिमा - महिमा का अधिक समय पर्य्यन्त संरक्षण नहीं कर सकता । सभी को अनुदान मिलने हीं चाहिएँ, सत्र का संरक्षण होना ही चाहिए | कदापि सार्वभौम - उदारमना हिन्दू को सत्ता की इस उदारप्रवृत्ति के प्रति यत्किञ्चित् भी आक्रोश नहीं है । अपितु - ' मा कश्चिद्दुःखभाग् भवेत् ' का आचारात्मक अनुयायी प्राच्य - राष्ट्रीय हिन्दू - मानव तो इस दिशा में सत्तातन्त्र का अभिनन्दन ही करेगा । किन्तु जत्र स्वयं यह राष्ट्रीय जनतन्त्र अपने स्वरूप पर सत्तातन्त्र की अवहेलना देखता सुनता है, तो इसे अवश्य ही संक्षुब्ध हो-जाना पड़ता है । और इसी संक्षोभ के माध्यम से आज हमें उस तथ्य का भी दो शब्दों में स्वरूपोद्घाटन कर ही देना है, जिसके बिना भारत की राष्ट्रीयता, तथा सांस्कृतिक - प्राणवा सर्वथैव अभिभूता प्रमाणित होरही है, जिस इस अभिभूति के कारण हीं हमारे महामहिम सत्तातन्त्र की सभी राष्ट्रीय - - योजनाएँ ' उदर्क ' दृष्टि से सर्वात्मना आपातरमणीया हीं बनतीं जारही हैं । निवेदन किया जाचुका है कि, ' अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति - मूला भावुकता ' ने हीं आज हमारे सत्तातन्त्र को भारतराष्ट्र की मूल संस्कृति, मूल - मानवधर्म से सर्वात्मना निरपेक्ष, एवं मत— १५० A
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शतपथ - प्रथमखण्ड वादात्मिका मान्यताओं के प्रति सापेक्ष प्रमाणित कर रक्खा है । तो क्या हम भारतराष्ट्र की अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति के, यश, कीर्ति के प्रति श्वमाहिष्य रख रहें हैं? | अब्रह्मण्यम्! ब्रह्मण्यम्! ऐसी कल्पना का तो संस्मरण भी हमें प्रायश्चित्त का ही भागी बना रहा है । कौन भारतीय मानव यह न चाहेगा कि, उसके इस भारतराष्ट्र की ख्याति इसके राष्ट्र में हीं सीमित न रह कर सार्वभौम - ख्याति के रूप में परिणत होजाय? । अवश्य ही वर्त्तमान स्वतन्त्रयुग में अब तो भारतराष्ट्र को शीघ्र से शीघ्र अन्तर्राष्ट्रीय - सम्मान प्राप्त हो ही जाना चाहिए । यही इसके शासनतन्त्र की महती कुशलता मानी जायगी । और प्रत्येक भारतीय मानव हृदय से अभिनन्दन ही करेगा सतातन्त्र की इस अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति -प्रवृत्ति का । किन्तु सत्तातन्त्र को इस ' ख्यातिप्रवृत्ति ' के साथ साथ ही यह भी निष्ठापूर्वक समन्वय कर ही लेना है कि, क्या भारतराष्ट्र की प्राच्या- मौलिक संस्कृति, तदनुप्राणित श्रुति - स्मृति - पुराण - शास्त्रत्रयी, तन्निबन्धन सन्प्रदायवाद - निरपेक्ष आत्मसाम्यमूलक मानवीय धर्म्म, आदि आदि राष्ट्रीय - विभूतियाँ प्रतिबन्धिका हैं तथोक्ता अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति में? | किस आधार पर सत्तातन्त्र इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का नैष्ठिक समन्वय - समाधान प्राप्त करै?, इस प्रतिप्रश्न के लिए सत्तातन्त्र का ध्यान हम राष्ट्रपिता लोकनिष्ठा की प्रतिमूर्ति उस महाप्राण मानव-श्रेष्ठ की ओर ही आकर्षित कर देना चाहते हैं, जो मानवश्रेष्ठ संक्षिप्ततमा ' द्वयक्षरा ' रहस्यपूर्ण श्रभिधा से प्रसिद्ध हैं । इस तपस्वी की निष्ठा से ही भारतराष्ट्र परतन्त्रता के वारुणपाशबन्धन से विमुक्त हुआ है । अतएव आज के राष्ट्रीय नेताओं का तत्प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्त करते रहना सहजधर्म ही बन जाता है । वर्णाश्रमधर्म्म के संरक्षक संस्थापक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् का द्वयक्षरात्मक नाम ( रा - ' म ) ह्रीं जिस द्वयक्षरात्मक ही ( ' गाँधी, मानवश्रेष्ठ का आराध्य मन्त्र था, भारतीय -- संस्कृति की रहस्यपूर्णा ज्ञानविज्ञोपनिषत् का स्पष्टीकरण करने वाला सुप्रसिद्ध भारतीय - सांस्कृतिक ' गीताशास्त्र ' ही जिस द्वयक्षर का स्वाध्याय - मनन - चिन्तन -- आराध्य - ग्रन्थ था, गुर्जरप्रान्त के भक्तशिरोमणि श्रीनरसीमहता का सुप्रसिद्ध-‘ वैष्णव जन तो तेने कहिए, जो पीर पराई जाणेरे ' जैसा वैष्णव भक्तिभावसमा ' लुत भजन हीं जिस द्वयक्षर के प्रातःस्मरणीय ईशसंस्मरण का प्रमुख अवलम्ब था, मातृभाषा हिन्दी ही जिसके मन्तव्य - प्रकाशन का प्रमुख द्वार था, जिसकी वेशभूषा विशुद्धा भारतीया - सांस्कृतिक -- सभ्यता से ही अनुप्राणिता थी, तदित्थं - आपादमस्तक भारतीयता के अग्रदूत तथोक्त तपस्वी की संघर्षात्मिका तपस्या जैसे आभ्यन्तर - सांस्कृतिक -बल के आधार पर ही इसी राजनीतिकुशल मेधावी मानव के द्वारा ' अहिंसा ' रूप राजनैतिक - शस्त्र ही ब्रिटिश -- भूतबल को परास्त करने के लिए अग्रणी बना, और संस्कृतिमूलक इसी ' राजनैतिक - अहिंसावत ' के तात्कालिक प्रयोग के समर्थं प्रयोक्ता इस मानव श्रेष्ठ ने एक ही झटके में भारतराष्ट्र को अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति के सिंहद्वार पर ला खड़ा किया, जिस सिंहद्वार को ही आज हमारा सत्तातन्त्र समलङ्कृत कर रहा है । हमारे राष्ट्रीय नेताओं को सम्भवतः यह भी विदित ही होगा कि, सर्वश्री गाँधीजी अपने आपको पहिले ‘ हिन्दू ' मानते थे, और तदनन्तर भारतीय मानव, एवं आप मानव, और हिन्दू को परस्पर पर्य्याय ही मानते थे, जबकि मुप्रसिद्ध दार्शनिक दिवंगत सर्वश्री डॉ ० भगवानदास के ' मैं पहिले मानव हूँ, और फिर हिन्दू ' ऐसे उद्गार थे । पहिला पक्ष जहाँ नैष्ठिक पथ है, सांस्कृतिक पक्ष है, वहाँ दूसरे पक्ष को हम लोकभावुकता - संरक्षक पथ ही कहेंगे । क्योंकि, वह हिन्दू हिन्दूपद का ही अधिकार नहीं रखता, जो मानव-१५१
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श्रात्मनिवेदन शब्दानुगता श्रात्मबुद्धयनुबन्धिनी मूलसंस्कृति को अपनी मूलप्रतिष्ठा नहीं बना लेता । श्रात्मबुद्धिभाव ही मानव की मानवता का एकमात्र क्योंकि मापदण्ड है । अतएव सांस्कृतिक हिन्दू, और मानव, दोनों शब्दों में यत्किञ्चित् भी अन्तर नहीं रह जाता, एवं इसी तथ्य को व्यक्त किया था सर्वश्री गाँधीजी ने उक्त मान्यता के द्वारा | हां, तो जिस अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति का सत्तातन्त्र ग्राज अनुगमन कर रहा है, वह किंमूला है?, और उसका कैसा स्वरूप होना चाहिए?, प्रश्न का समाधान उक्त प्रासङ्गिक अमुक द्वयक्षरमूर्ति के यशोवर्णन से ही भली-भाँति होजाता है । सर्वश्री गाँधीजी की ' अहिंसा ' कदापि अमुक - मतवाद से सम्बन्ध रखने वाली भातिसिद्धा अहिंसा नहीं थी, जैसाकि तदनुयात्री आज समझ बैठे हैं । यह तो विशुद्धा वह राजनैतिकी ही अहिंसा थी, जिसके सम्बन्ध में स्वयं श्री गांधीजी ने हीं अनेक चार इसकी सापेक्षता का स्पष्टीकरण कर दिया है । सामयिक, एवं उचित नहीं मान रहे अनेक कारणों से इस ' अहिंसा ' के सम्बन्ध में हम विशेष स्पष्टीकरण करना । अभी तो इसी तथ्य का हमें अनुगमन कर लेना है कि, सर्वश्री गांधीजी जिस अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे, उसकेमूल में प्राणप्रतिष्ठारूप से भारतीय - संस्कृति के मूलसूत्र ही प्रतिष्ठित थे । फिर यह अन्य पक्ष है कि, उन सांस्कृतिक - मूलसूत्रों की व्याख्या में श्रीगाँधीजी को कहाँतक सफलता मिली, एवं कहाँतक असफलता १ । यह प्रश्न इसलिए आलोचना से संस्पृष्ट ही बना रहना चाहिए कि, पारिभाषिक - तथ्यों की अभिभूति से इस दिशा में तो विगत तीन सहस्र वर्षों से बड़े बड़े मेधावी भारतीय विद्वानों का भी स्खलन ही होता रहा, जैसा कि पूर्व में यत्र तत्र सोदाहरण स्पष्ट किया जाचुका है । श्रतएव इस समन्वयात्मक प्रश्न को श्रीगांधीजी के सम्बन्ध में उठाना उनके यशः शरीर के विपरीत ही जाना है, इत्यल ं विवादेन । हमारे लिए एकान्ततः एवं अदृष्ट श्रीगांधीजी के उन अज्ञात - अदृष्ट अश्रुत - भक्तों को, तथा ज्ञात अमुक परिगणित मानवश्रेष्ठों को छोड़ कर आज के सत्तातन्त्रीय रङ्गमञ्च को सुशोभित करने वाले मान्य राष्ट्रीय मानवों से नम्रतापूर्वक क्या यह प्रश्न नहीं कर लिया जासकता कि अशन - - परिभ्रमण - शयन — भाषण-भोजन - उद्घाटन - प्रदर्शनादि यच्चयावत् अपने प्रत्येक छोटे बड़े आयोजनों में सवश्री गांधीजी के हो आदर्शों का उद्घोष करते रहने वाले इन राष्ट्रबन्धुओं की जीवनपद्धति क्या आज अंशत: भी श्रीगाँधीजी की जीवनपद्धति का अनुकरणात्मक भ्रम भी कर रही है? । स्वस्वरूपविमोहनात्मिका परस्वरूपानुगता प्रतीच्या भूतजीवनपद्धति ही क्या श्रीगाँधीजी की जीवनपद्धति थी? । भारतीय - संस्कृति - सभ्यता - वेशभूषा - भाषा-आचार - व्यवहार आदि आदि से संस्पृष्टा, तत्स्थाने च प्रतीच्य भूतपद्धतियों से ही अथ से इति पर्य्यन्त काल्वालीकृता इत्थंभूता जीवनपद्धति के द्वारा, इस अनुकरणवृत्ति के द्वारा प्रतीच्य सभ्यता - वादियों को क्षणमात्र के लिए अपनी ओर आकर्षित कर लेने का नाम हीं क्या अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति की स्वरूप -परिभाषा है? | पुनश्च - अपने पुरातन - यच्चयावत्- सांस्कृतिक - धार्मिक - साहित्यिक - अनुबन्धों को गला - सड़ा-कहते, ओर कहलवाते हुए सर्वत्र नवीनता - प्रतीच्या मान्यता- का उद्घोष करते जाने का नाम हीं क्या अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति? है । भूत- भौतकी योजनाओं से अनुप्राणिता भौतिक जीवनपद्धति, तनुप्राणिता यान्त्रिक - जीवन - पद्धति ही क्या एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का मूलाधार है? | हम समझते हैं - ऐसा सम-१५२
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शतपथ - प्रथमखण्ड झना इसलिए एक बहुत बड़ी - ' भूल ' ही मानी जायगी कि, यन्त्रानुगता - भूतजीवनपद्धति से कदापि हम उन प्रतीच्य- भूतविज्ञान कुशल महारथियों को प्रभावित नहीं कर सकेंगे । क्योंकि उन की जीवनपद्धति का उप-क्रम ही मनः - शरीरानुबन्धिनी वह भौतिक - कुशलता है, जिस के प्रति केवल भूतदृष्टि से ही वे सर्वात्मना अपने आप को श्रम - परिश्रम के द्वारा समर्पित किए रहते हैं निष्ठापूर्वक । इसी भूतप्राधान्य से मनः शरीर-- निबन्धना गणतन्त्रीया प्रजातन्त्रपद्धति भी उन प्रतीच्य राष्ट्रों में कहीं विशेषरूपेण व्यवस्थिता है, जब कि इस भौतिकी तन्त्र व्यवस्था से मानवीय - आत्मसुलभा सहज - शान्ति- स्वस्ति कौ दृष्टि से तो वे भी सर्वात्मना अपने आप को आज विकम्पित ही अनुभूत करते जारहे हैं । वैसा भौतिक समर्पण, और आत्मभाव का विस्मरण भारतराष्ट्र में तो कदापि सम्भव नहीं है । कल्पना नहीं है । किन्तु वस्तुस्थिति सचमुच में हीं ऐसी है, जिस का एक उदाहरण आज का उद्-घोषित अहिंसावादमूलक पञ्चशील ही बना हुआ है । यह शीलवाद भारतीय मूलसंस्कृति, आध्यात्मिक-संस्कृति का ही एक प्रवग्यंरूप है, जिस के बल पर ही भार राष्ट्र आज सम्पूर्ण विश्व को तन्मूला - आध्यात्मि-कता का पाठ पढ़ाने के लिए आतुर बना हुआ है । और आज यदि प्रतीच्य राष्ट्रों के मानस में भारत के प्रति अमुक तात्कालिकी सद्भावना नाम की कोई वस्तु है ( जिस का हम तो निष्ठादृष्टि से प्रभाव ही मानते हैं ), और इसी सद्भावना के द्वारा यदि वे इस ओर अंश - प्रत्यंशतः आकर्षित हैं, तो कदापि एतन्मूला अन्तर्राष्ट्रीय-ख्याति को भूतजीवनपद्धतिमूला ख्याति तो नहीं कहा जासकता । हिंसा - भावनाप्रधान, पञ्चशीलात्मक ' बौद्ध-मतवाद ' ही क्या, भारतराष्ट्र का कोई भी ' मतवाद ' ऐसा नहीं है, जिस में अंश - प्रत्यंश - रूप से भारतीय - श्रुति स्मृति - शास्त्रानुप्राणित सांस्कृतिक - आर्षधर्म की किसी शाखा प्रशाखा का अन्तः प्रवेश न हुआ हो । यही नहीं, सम्पूर्ण एशिया के, नहीं नहीं, सम्पूर्ण विश्व के मतबादों के साथ येन केन रूपेण इस आद्या-संस्कृति का, शाश्वत सनातनधर्म की मान्यताओं का ' ऋण ' येन केन रूपेण समन्वित हो ही रहा है । तभी तो यह सावभौम - धर्म्म कहलाया है । तभी तो इस के सम्बन्ध में - ' स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन - पृथिव्यां -सर्वमानवाः ' जैसा उद्घोष अक्षरशः समन्वित होरहा है । तभी तो इसे दिग्देशकालातीत ' सनातन ' तत्त्व. माना गया है, जिस के अमुक अंश प्रत्यंश को दिग्देशकालानुगता अपनी अपनी मान्यताओं के अनुपात से अपना अपना आधार बना कर विश्व में विभिन्न मतवाद आविर्भूत होते रहते हैं तत्तत् - युगों की तात्-कालिकी समस्याओं का तात्कालिक ही समन्वय करने के लिए, जिस तात्कालिकता के उपशान्त होने के साथ साथ ही तन्मतवाद भी तिरोहित ही होजाते हैं । दिग्देशकालानुबन्धी मतवादों, तथा दिग्देशकालातीत आर्ष - शाश्वत धर्म्म, दोनों में यही तो वह महान् मौलिक - भेद है, मिस का विगत तीन सहस्र - वर्षों से हमारा भारतराष्ट्र समन्वय कर ही नहीं पा रहा है ।. अत्यन्त श्रवधानपूर्वक ही हमें ज्ञानविज्ञानतत्त्वानुप्राणित, श्रतएव तर्क - युक्ति - सङ्गत - दिग्देशकाला-तीत, एवं सर्वदिग्देशकालप्रतिष्ठारूप धर्म्म, तथा मत, इन दोनों शब्दों के इस लाक्षणिक अर्थ को सदा ही लक्ष्यारूढ बनाए रखना चाहिए, जिस व्यवच्छेद के बिना भारतराष्ट्र में आज धर्मनिरपेक्षता, तथा मतवाद सापेक्षता जागरूक होपड़ी है । प्रकृति - पुरुषोभयसमन्वयात्मक आधिदैविक- ईश्वरीय तन्त्र से अनुप्राणित सनातन - प्रकृतिसिद्ध शाश्वत विधिविधानों का ही नाम जहाँ- “ धर्म ” है, वहाँ तत्त-गविशेषों के तत्तन्महाप्राण - मानव ष्ठों के द्वारा तत्तद्युगों की तत्तद्दिग्देशकालानुबन्धिनी-१५३
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आत्मनिवेदन तत्तत् - सामयिको - समस्याओं के समन्वय के लिए तत्तत्समयमात्र के लिए ही आविर्भूता तत्तद्यु गीया मान्यताओं का नाम हीं - " मत " है । धर्म का जहाँ ईश्वरीय - सनातन विधि विधानों - से सम्बन्ध है, अतएव वह मानव की दिग्देशकालातीता आत्मबुद्धिनिबन्धना ' संस्कृति ' से समन्वित होता हुआ जहाँ सनातन है, वहाँ मतवाद मानवीय कल्पना - मान्यता से अनुप्राणित होते हुए मानव को दिग्देशकालात्मिका मनःशरीरनिबन्धना परिवर्त्तनशीला ' सभ्यता ' से समन्वित करते हुए युग--धर्मानुसार परिवर्तन - शील ही हैं । ऐसी भ्रान्ति करली जासकती है कि, हमारा ' बुद्धमतवाद ' से सहज अश्वमाहिष्य है । किन्तु इस भ्रान्ति को इसलिए भ्रान्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं माना जासकता कि, युगधर्मानुबन्ध से स्वयं यहाँ के नैष्ठिक - प्रज्ञाशीलोंने महाप्राण बुद्ध को ' अवतार ' उपाधि से सम्मानित करना विस्मृत नहीं किया है, जब कि श्रुतिसिद्धा ईश्वरीय - निष्ठा की दृष्टि से इन की मान्यताएँ ' मान्यता ' से अधिक सम्मान प्राप्त नहीं करसकीं हैं | साभिनिवेश इस मतवाद का उद्घोष करने वाले, तदनुप्राणिता मान्यताभावानुगता अहिंसा— का, तदनुगत पञ्चशील का तुमुलनाद करने वाले आज के बुद्धमतभक्त राष्ट्रीय मानवों से क्या प्रणतिभाव-पुरस्सर यह प्रश्न करने की धृष्टता नहीं कर ली जासकती कि केवल ' शाब्दिकी मान्यता ' के अतिरिक्त क्या इन में से किसी ने भी ' बुद्धाचारपथ ' का आजतक अनुसरण किया है?, किंवा श्राज की अपनी इन भूतपरिग्रहात्मिका महती योजनाओं के व्यामोहन को छोड़ कर कोई भी ' प्रव्रज्या ' ग्रहण करने के लिए अपने मनोराज्य में क्षणमात्र के लिए भी उत्सुक बना है? । स वमुच मानव आज स्वयं हीं अपनी कैसी विडम्बना कर रहा है इन मान्यताओं के उद्घोष के व्याज से? । एक ओर अहिंसा, पञ्चशील, आदि मान्यताओं का उद्घोष, तो तत्सहैव भारतराष्ट्र की भूतसमृद्धि के माध्यम से - प्रचण्डतमरूपेण मानव की अध्यात्ममूला सहज -- शान्ति - स्वस्ति के विघातक ग्रात्म - प्रतिष्ठाशून्य भौतिक विज्ञान - परम्पराओं का प्रचण्ड़वेग से अनुकरण । क्या ' बुद्धमत ' की त्यागानुता मान्यताओं का यही आचारपक्ष था? । उक्त यच्चयावत् विसंवादों के आधार पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, न तो केवल आत्मसंस्कृति ही मानव का पुरुषार्थ है, नैत्र भूतसभ्यता ही मानव का पुरुषार्थ | अपितु संस्कृति-मूला भूतसभ्यता ही मानव को मानवता का धर्मसम्मत मापदण्ड है । संस्कृति और सभ्यता के सह समन्वय से सम्बन्ध रखने वाली इसी जीवनपद्धति का नाम है ' भारतीय - जीवनपद्धति ', जिसमें प्रतिष्ठित मानव न तो केवल आत्मवादी - अहिंसावादी बन कर संसार का त्याग ही कर बैठता, नैव जिसमें प्रति-ष्ठित मानव श्रात्मप्रतिष्ठा - तन्मूला नैष्ठिकी हिंसा का परित्याग कर सर्वात्मना विशुद्ध - जड़ - भूतत्रादी ही बन बेटता । अपितु इस आचारधर्म्मनिष्ठ मानव की ग्रात्मनिष्ठा भूतनिष्ठा से, तथा भूतनिष्ठा श्रात्मनिष्ठा से समतु-लित हीरहती है । एवमेव आत्लमूला हिंसा भूतमूला हिंसा से मर्यादिता बनी रहती है, तो भूतमूला हिसा आत्ममूला अहिंसा से मर्यादिता बनी रहती है । अतएव न तो अहिंसा ही परमधर्म बनने पाता, नैव हिंसा ही धर्म्म बनने पाता । श्रपितु सभी तथ्य, दूसरे शब्दों में मानव के परस्परसापेक्ष ६- मन- शरीर चारों हीं पर्व इस ग्रन्योऽन्याश्रयरूप समत्त्व से सुव्यवस्थित ही बने रहते हैं, आत्मा - बुद्धि-जिसे ही माना गया है - ‘ समत्त्व ', यही कहलाया है- ' योग ', यही है मानव की मानवता का महान् - ' उपयोग ', १५.४
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शतपथ - प्रथमखण्ड और यही है मानवीय कर्म्म का वह महान् कौशल, जिसका - ' समत्त्वं योग उच्यते । योगः कर्म्मसु कौश-लम् । तस्मात् - योगी - भवार्जुन! ' इत्यादि भगवद्वचनों से स्पष्टीकरण हुआ हैं । प्रसङ्ग चल रहा है अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का, जिसके अनुबन्ध से ही हमें भारतीय - मानव की जीवनपद्धति की और राष्ट्रप्रेमियों का ध्यान आकर्षित करना पड़ा । समन्वयात्मिका इस जीवनपद्धति के द्वारा ही भारतराष्ट्र को अतीत युगों में केवल अन्तर्राष्ट्रीया - सत्तासिद्धा ख्याति ही नहीं मिली थी, अपितु इसी समन्वयपद्धति के बल पर अपने अतीत -- युगों में भारतराष्ट्र विश्वमानव का सन्देशवाहक भी रहा था - ' कृण्वन्तो विश्वमार्य्यम् ' उद्-घोष केमाध्यम । समन्वयमूला जीवनपद्धति ही भारतराष्ट्र की स्वनिष्ठात्मिका जीवन - पद्धति है, जिसके आधार पर ही स्वस्वरूप - संरक्षण - पूर्वक भारतराष्ट्र सत्तासिद्धा वास्तविकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के सम्मान से समन्वित होसकता है, जिसके लिए कदापि श्राचारनिष्ठ राष्ट्र स्वयं अपनी ओर से व्यग्र नहीं हुआ करता । अपितु - ' तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' के अनुसार वह ख्याति तो आचार ( नष्ठायोग की संसिद्धि पर स्वतः सिद्धा ही बनी रहती है । यदि हमारा राष्ट्र आत्मसंस्कृति - भूतसभ्यता-समन्वयात्मिका जीवनपद्धति की उपेक्षा कर प्रतीच्य भूतवाद का अन्धानुकरण कर मनःशरीरानुबन्ध से केवल ' भूतसमृद्धि ' को ही अपना प्रधान लक्ष्य मान बैठेगा, तो पूर्वकथनानुसार इस भौतिकमात्रानुधावन में तो भारतराष्ट्र कदापि तदनुधावन - कुशल -- प्रतीच्यदेशों की दृष्टि में अपेक्षिता वास्तविकी ख्याति के सम्मान का कदापि अधिकारी नहीं बन सकेगा । अतएव अपने इस ' ख्याति ' भाव को चरितार्थ करने के लिए भी एकबार तो इसे अपने भारतराष्ट्र के ' मूल हृदय ' का ही अन्वेषण कर लेना पड़ेगा, जो मूलहृदय मिलेगा इसे भारत की मन्त्रब्राह्मणात्मिका - वेदशास्त्र की मूलसंस्कृति के ही गर्भ में । सचमुच यह भारतराष्ट्र का निःसीम दुर्भाग्य ही माना जायगा कि, इस राष्ट्र के सर्वतन्त्र स्वतन्त्र महामहिम हमारे सत्तातन्त्र ने अपने सुशासन की सुदीर्घा भी अवधि में भूतदृष्टया, तन्मूला सभ्यता - दृष्ट्या जहाँ प्रचण्डतमा प्रगति को अपना आराध्य बना लिया, वहाँ इसने ग्राजतक भी भारत की चिरन्तना मूलसंस्कृति के संस्पर्श का भी प्रयास नहीं किया । मान्यतानु-गत मतत्रादों को भ्रान्ति से निरर्थक ही भ्रान्त बने हुए हमारे राष्ट्रीय -- नेता इस मूलनिधि से उद्घोषपूर्वक निरपेक्ष ही बने हुए हैं तथोक्ता भातिसिद्धा - भूतान्विता अन्तर्राष्ट्रीया - ख्याति की एषा से । सचमुच आज से पूर्वयुग के चाणाक्षचतुर - राजनितिकुशल- ब्रिटिश सत्तातन्त्रयुग की स्वार्थलिप्सा के पोषक उस भारतीय - कल्पित - इतिहासने हीं हमारी तथोक्ता सांस्कृतिक - दासता को उस सीमा पर्य्यन्त दृढमूल चना दिया है, जिसके अनुबन्ध से हमारी अपनी सभी मौलिक - निष्ठाएँ सर्वथा ही स्मृतिगर्भ में विलीन होचुकीं हैं । “ अपने पुरातन युगों में भारत असभ्य था, भौतिक - अग्नि वायु आदि का पूजने वाला था, उसकी सभी मान्यताएँ विज्ञान से शून्य थीं । वह एक अन्धविश्वासी रूढिवादी था, इत्यादि इत्यादि ” रूपेण हमारी मूल संस्कृति का चित्रण हमें ब्रिटिश सत्तातन्त्र की छत्रच्छाया में पुष्पित - पल्लवित होते रहने वाले प्रतीच्य - शिक्षाकेन्द्रों ( युनिवर्सिटियों, कॉलेजों, और स्कूलों ) में उपलब्ध होता रहा निरन्तर डेढ़ सौवर्षं पर्य्यन्त । उसी ने हमारी मौलिक- भारतीयता को तो सर्वथा ही अभिभूत कर लिया, जबकि यह अभिभूति का क्रम तत्पूर्व की अनेक शताब्दियों से पहिले भी प्रकारान्तर से जन्म ले चुका था । यों तीन सहस्र वर्षों की आत्म-बुद्धिमनःशरीररूपा इस सर्वदासता ने हमारे भारतीय हृदय को सर्वात्मना ' हीन ' ही प्रमाणित कर दिया । १३५
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श्रात्मनिवेदन अतएव हमें अपना सभी कुछ पुरातन आज के राष्ट्रीय मानत्रों के शब्दों में - सड़ा - गला - प्रगति-शून्य हीं प्रतीत होने लग पड़ा । अतएव च हमारे राष्ट्रीय नेता अपनी इस प्राच्या सांस्कृतिक निधि के नाममात्र श्रवण से भी आज तो उद्विग्न ही होपड़ते हैं, जिस इस महाभयावह उद्वेग का कहाँ, किस सीमा पर पर्य्य-वसान होगा?, उस त्रिकम्पनात्मिका अवस्था किंवा दुरवस्था की कल्पना से पहिले पहिले ही हमारे महामहिम सत्तातन्त्र को अन्तर्राष्ट्रीयख्यातिमूलक अपने प्रतीच्य आकर्षण, एवं तदनुकरण के ' प्रति राष्ट्राभ्युदय - कामना से अविलम्ब जागरूक ही हो जाना है । तत एव महती समृद्धि: । अतएव हमें यह आस्था रखनी चाहिए कि, हमारा महामहिम, सर्वगुण-- प्रतिभा - योग्यता-मेधा - सम्पन्न सत्तातन्त्र अपने राष्ट्र की मूलनिधि प्राच्यसंस्कृति की पुनरभिव्यक्ति की दिशा में अत्र और अधिक गजनिमीलिका नहीं करेगा, इसी में राष्ट्र का अभ्युदय एवं निःश्रेयस् सुरक्षित है, एवं तभी पूर्व -प्रतिज्ञात - ‘ राजा कालस्य कारणम् ' मूलक सत्तातन्त्रीय आदर्श अक्षुण्ण बना करता है, इत्यलमतिपल्लवितेन-महामहिम - सत्तातन्त्रप्रसङ्ग ेन । ७ – स्वतन्त्र - भारत के सत्तातन्त्र - समर्थक अभिनव - सांस्कृतिक मान्य विद्वानों से! ' राजा कालस्य कारणम् ' मूना सूक्ति के ' कालस्य ' के प्रति सत्तातन्त्र को कदापि स्वतन्त्ररूप से ' कारणता ' नहीं है । अपितु यह कारणता तो सत्तातन्त्र के समर्थक तत् सत्तायुगीय उन मान्य सांस्कृतिक– अभिनव विद्वानों ( युगधर्म्मप्रवर्त्तक विद्वानों ) की प्रेरणा पर ही अवलम्बित है, जो अपने प्रज्ञाबल पर सत्तातन्त्र के सम्मुख दिग्देशकालानुगता मान्यताओं का यथावसर स्पष्टीकरण करते हुए परोक्षरूपेण सत्तातन्त्र के, सत्तातन्त्र की शासननिबन्धना -पद्धति के मूल प्रेरक ही माने गए हैं । वैदिक - परिभाषा में इन प्र ेरकों को ही ‘ अभिगन्ता - मित्र ' कहा गया है, एवं इनकी प्रेरणा से प्रेरित क्रियाशील कर्त्ता सत्तातन्त्र को ही ' कर्त्ता-वरुण ' कहा गया है | स्थूलभाषा में एक ही सत्तातन्त्र, किंवा शासनतन्त्र के विभिन्न दो अङ्ग हैं, जिह्नों क्रमशः मित्र, और बरुण माना गया है । मित्रवर्ग सत्ता का ' पुरोहित ' रूप पूर्वाङ्ग है, एवं वरुणवर्ग इसी सत्ता का ‘ शासक - राजा किंवा नेता ' - रूप उत्तराङ्ग है । इन दोनों श्रङ्गों के सहसमन्वय से ही सत्तातन्त्र का स्वरूप सर्वाङ्गीण बना करता है । पूर्वाङ्गभूत मित्र - पुरोहित विचारप्रधान है, तथा उत्तराङ्गभूत वरुणवर्ग आचारप्रधान है | विचारप्रधान मित्रवर्ग ' अभिगन्ता ' रूप ' पथप्रदर्शक ' है, एवं आचारप्रधान वरुणवर्ग ' कर्त्ता ' रूप ' पथानुगन्ता ' है । इसी सम्मिलित स्वरूप का नाम है वह - ' मैत्रावरुणग्रह ', जिसकी सीमा में सत्तातन्त्र का साङ्गोपाङ्ग - स्वरूप सुरक्षित माना गया है [ देखिए - शतपथ ४ | ४ | १ | ५ | ब्राह्मण ] । सत्तातन्त्र के पुरोगामी तथाभूत- ' मित्र ' वर्ग का ही नाम है सांस्कृतिक - पथप्रदर्शक वे विद्वान्, जो सत्त।तन्त्र के व्यक्त – शासनतन्त्र से तटस्थ बने रहते हुए भी सत्तातन्त्र को दिग्देशकालानुबन्धी परामर्श देते रहते हैं । वस्तुगत्या शासक रूप - सत्तातन्त्र काल का कारण नहीं है । अपितु शासकवर्ग को परोक्ष - प्रेरणात्रल देने वाला, परामर्श प्रदान करने वाला मित्र - पुरोहित - स्थानीय सांस्कृतिक - विद्वद्वर्ग ही परम्परया काल का परोक्ष कारण बना रहता है । अतएव श्र तिने परामर्श प्रदाता, पथप्रदर्शक, अभिगन्ता इस विद्वद्वर्ग को एक महान् उद्बोधनसूत्र प्रदान किया है शासनानुगत - व्यक्त - मूर्त्त - सत्तातन्त्र के साथ समन्वित होने से पूर्व यही कि — ‘ तस्माद्ब्राह्मणोऽराजन्यः स्यात् ' [ शत ० ४ । ४ । १ । ६ । ] । १५६