Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 161–170
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170
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शतपथ - प्रथमखण्ड चड़ा ही चमत्कारपूर्ण है श्रुति का उक्त उद्बोधनसूत्र | दिग्देशकालानुबन्धी- व्यक्त - मूर्त्त - -शासन-तन्त्र के दों प्रमुख त्रल माने गए हैं, जिनके बल पर ही शासक की शासननीति स्वशासनतन्त्र में, तथा स्वशासित लोकतन्त्र में सफल हुआ करती है । पहिला बल है – अधिकारात्मक - पद - प्रतिष्ठाबल, एवं दूसरा बल है - भूतबलात्मक वित्तबल | लोकसम्मानानुगत अपने अाधिकारिक पद पर निष्ठा से प्रतिष्ठित रहता हुआ ही शासक अपने सञ्चित कोशचल के आधार पर शासनतन्त्र को सुव्यवस्थित बनाए रखने में समर्थ चन पाता है । जो शासक अपनी आधिकारिकी पदप्रतिष्ठा में शिथिल होजाता है, साथ ही शैथिल्यानु-बन्ध से ही जिसका कोशनल भी निर्बल होजाता है, ऐसा उभयतोभ्रष्ट शासक कदापि शासनतन्त्र को सुव्यवस्थित नहीं बनाए रख सकता । उक्त दोनों चल जहाँ शासनतन्त्र की सुव्यवस्था के प्रमुख मूलस्तम्भ हैं, वहाँ ये ही दोनों बल शासक की यत् किञ्चित् सी असावधानी से इसके स्वरूप के भी सर्वविनाशक बन जाते हैं, एवं परम्परया समूचे शासन-तन्त्र का भी मूलोच्छेद कर देते हैं । व्यक्ता भूतभौतिकी - मूर्त्ता - दिग्देशकालात्मिका प्रकृति की स्वैराचारिता से, सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता से ही इन दोनों बलों के माध्यम से ही दो तात्कालिक भयावह दोष अभिव्यक्त होजाते हैं, जिनकी वैदिकसज्ञा है— लोकैषणा, और वित्तैषणा । ख्याति सम्मान - की इच्छा का नाम हीं ' लौकै-षणा ' है, एवं वित्तलोलुपुता - अर्थ - संग्रहगृध्नुता का नाम हीं वित्तैषणा है, जो क्रमशः अधिकार-बल, तथा कोशबल, इन महान् दोनों शासनचलों को आधार बना कर ही शासक की प्रकृति की स्वैरा-चारिता [ स्वतन्त्रता ] से निश्चयेन उत्पन्न होजाया करती हैं, जिनमें वित्तणा की अपेक्षा लोकैषणा नामक दोष तो अत्यन्त ही भयङ्कर माना गया है भारतीय राजनीतिशास्त्र में । अपने आधिकारिक पद की महती प्रतिष्ठा को स्वसीमा में नियन्त्रित रखने में असमर्थ शासक इस अधिकारबल का स्वतन्त्रता से उपयोग करता हु कालान्तर में निश्चयेन स्वस्वरूप से विस्मृत हो ही तो जाता है, जिस विस्मृति को प्रान्तीय भाषा में -' बौराना ' कहा गया है । प्रतिक्षण अपने नाम की, यश की, कीर्ति की, प्रशंसा की इच्छा ही इस ' चौराने ’ की स्वरूप - व्याख्या है, जिसमें श्रासक्त होपड़ने वाला स्वतन्त्र – स्वैराचारपरायण - भावुक - सौम्य - शासक अपने अधिकारबल को भी उत्तरोत्तर ' मन्दाक्ष ' ही बनाता जाता है, जो ' मन्दाक्षता ' शासक का वैसा भयानक दोष माना गया है, जिसके व्यक्त होजाने पर शासक अपने मनोराज्य में सबकुछ समझता - जानता हुआ भी तत्प्रतीकार में असमर्थ ही बना रह जाता है । फलतः नामख्यातिरूपा लोकैषणा के वारुणपाश में सर्वा-त्मना आवद्ध ऐसा मन्दाक्ष शासक अपने अधिकारबल का न तो अपने नियन्त्रण में हीं उपयोग ले सकता, नैव उत्पथ - गमन - करने - वाले अपने शासनतन्त्रवर्गीय अधिकारियों के ही नियन्त्रण में समर्थ होता । अपितु अवरकक्षा के अधिकारियों के बड़े से बड़े अपराध भी इत्थंभूत - मन्दाक्ष शासक के द्वारा क्षम्य, तथा पुरस्कृत ही होते रहते हैं, जिसका अन्तिम परिणाम माना गया है - ' राष्ट्र - विप्लव ' । मन्दाक्षता की जननी वही लोकैषणा तदधिकारी - शासक में प्रचण्डा वित्तलिप्सा भी जागरूक कर देती है, जिसे -‘वित्तैषणा ' कहा गया है । अपनी मन्दाक्षतानुगता - भावुकतापूर्णा - लोखख्याति -यश की प्रबल आकांक्षा से स्वस्वरूप - विस्मृत ऐसे लोकपणा लिप्सु शासक के शासनतन्त्र का समस्त प्रज्ञाचल येनकेनाप्युपायेन, सदसदुपायों से, जैसे भी बन पड़े- वैसे राष्ट्रीय - प्रजा से इच्छा, किंवा अनिच्छा से वित्तसंग्रह करने में हीं केन्द्रित होजाता है, जिस इस अपहरणवृत्ति से राष्ट्र का जनतन्त्र सर्वथैव निष्प्राण बन जाया १५७
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श्रात्मनिवेदन करता है, और यही निष्प्राणता कालपरिपाकावस्था में सर्व - विनाश की ही जननी बन जाया करती है । हमने देखा कि, लोकसम्मानात्मिका लोकैषरणा, तथा वित्तलिप्सात्मिका वित्तषरणा, इन दोनों भयानक दोषों से प्रज्ञाशील भी शासक का अधिकारबल, तथा वित्तबल, दोनों हीं विप्लव के प्रवर्त्तक बनते हुए कालान्तर में शासक, तन्त्र, शासित राष्ट्र, राष्ट्रसमृद्धि, आदि आद सभी के मूलनाश के ही कारण बन जाया करते हैं | अतएव यह श्रावश्यक है कि, शासक को कदापि इन दोनों दोषों से अनुगत न होने दिया जाय । यह महान् उत्तरदायित्त्व जिस महाप्राण मानववर्ग के साथ यहाँ के राजनीति - विशारदोंनें महर्षियोंनें ) समर्पित किया था, वे ही शासक के ' मित्रपुरोहित ' कहलाए थे, जिनकी वैदिकसंज्ञा - ' पुरोधा ' भी मानी गई है । और यह महान् उत्तरदायित्त्व उस ब्राह्मणवर्ग को ही दिया गया है, जो मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र की स्वाध्याय-निष्ठा के बल पर स्वयं सर्वात्मना उबुद्ध रहता हुआ राष्ट्र के व्यक्त शासक को लोकैषणा, तथा वित्तेषरणा नामक दोनों दोषों से बचाए रखता है । इसी उत्तरदायित्त्व के कारण इस पुरोधा ब्राह्मण की संज्ञा ' मैत्र ' होगई है, जो कि सम्पूर्ण राष्ट्र को इन दोनों दोषों से बचाता हुआ सम्पूर्ण राष्ट्र का ही ' मित्र ' बना बना रहता है * | भारतीय - धरातल से जिस सहजमैत्री की भी अमुक स्वरूप - परिभाषा है, उसके सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव नम्र निवेदन कर देना आवश्यक बन रहा है - वर्त्तमान सत्तातन्त्र के सुप्रसिद्ध- ' अन्तर्राष्ट्रीय - मैत्री ' - सम्बन्धानु-बन्ध से जैसा कि सन्दर्भ के द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है, प्रकृति में भारताग्नि हीं ब्राह्मणमित्र है देवेन्द्र के शासनतन्त्र के । तत्प्रतिरूप ही यह मित्र ब्राह्मण है । उस ब्राह्मणमित्राग्नि का स्वरूप धर्म बतलाते हुए शतपथ ने - ‘ प्रतितरामित्र तिरश्चीवार्चिः ' कहा है, जिसका अन्तिम वाक्य है - ' संशाम्यतो भवति ' । यही ब्राह्मण की स्वरूप - परिभाषा है । क्योंकि यह सर्वनिरपेक्ष है । अतएव किसी के प्रति किसी भी एषणा के माध्यम से इसमें कदापि प्राक्रोश, किंवा प्रतिक्रिया नहीं रहती । यही इसका निरपेक्षतानुबन्धी- ' संशाम्यतो-भाव ' है | साथ ही यह सर्वथा मित्रभाव से ही क्योंकि सम्पूर्ण - वास्तविकता का स्पष्टीकरण कर देता है, अत-एव यह आरम्भ में तिरश्चीन - भाववत् प्रतीत होने लगता है । अर्थात् इसका प्रारम्भिक उद्बोधन कटु– प्रतीत होता है, जो कि ' यत्तदग्रे विषमित्र- किन्तु – ' परिणामेऽमृतोमम् ' के अनुसार सर्वथैव मङ्गल— प्रद ही माना गया है । * अथ यत्रैतत् प्रतिततरामिव - तिरश्चीवार्चिः संशाम्यतो भवति, तर्हि हैष भवति -अग्निः - मित्रः । यमाहुः- “ सर्वस्य वाऽययं ब्राह्मणो मित्रम् " । न वा ऽग्रयं कञ्चन हिनस्ति । - शतपथब्राह्मण २/३/२/१३ |
जप्येनैव तु संसिद्धयेद् त्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्य्यादन्यत्, न वा कुर्य्यात्, " मैत्रो ब्राह्मण " उच्यते ॥
१५८ - मनुः २८७ |
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शतपथ - प्रथमखण्ड वर्त्तमान से पूर्व के ब्रिटिश सत्तातन्त्र - युग में करर्णाकर्णिपरम्परया हम यदा कदा - -'मित्र ' राष्ट्रों ' की प्रवृ-त्तियों के सम्बन्ध में किञ्चिदिव सुना करते थे, जो मित्रराष्ट्र तयुग में - ' अमेरिका, फ्राँस, रूस, ब्रिटेन ' इन प्रमुख चार अभिधाओं से सुप्रसिद्ध थे, एवं जिन इन चारों सशक्त - समर्थ ' मित्रराष्ट्रों ' ने ' सम्भवतः अपनी सहजसिद्धा? पारस्परिकी अभिन्ना मैत्री? के स्वरूप - संरक्षण के लिए ही उस युग के अपने प्रचण्ड शत्रु जर्म्मनी के अधिनायक फासिज्मवादी हर हिटलर को सर्वात्मना निर्मूल कर एकप्रकार से सदा के लिए विश्व में शान्ति ही स्थापित करदी थी । क्या मूल था मित्रराष्ट्रों की उस अभिन्ना मैत्री का १, प्रश्न का म स्पष्टतम है । भारतीय – दृष्टि से तो अधिकारबलान्वित वित्तल से अनुप्राणिता प्रकृतिनिबन्धना स्वैराचारमूला लोकैषणा, तथा वित्तैषणा का प्रवल ग्राकर्षण ही उन ' बड़ों की बड़ी मित्रता ' का एकमात्र आधार बना हुआ था, जिसके श्रंशतः शिथिल होते ही विगत १५ वर्षो की स्वल्पतृमा अवधि के भीतर भीतर ही जो क्रान्तिकारी परिवर्तन होपड़े उन मित्रों की सहज १ मैत्री? में, इस तथ्य से भी विश्वमानव आज अपरािंचत नहीं रह गया है । कलतक के महान् मित्र अमेरिका और रूस आज कैसी मित्रता निभा रहे हैं?, इन दोनों बड़ों की प्रक्रान्ता मित्रता से? विश्व आज कैसी भयावहा शान्ति १ का उपभोग कर रहा है?, प्रश्नों की मार्मिक व्यञ्चना हीं यह स्पष्ट कर देने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, अन्तर्राष्ट्रीय – ख्यातिमूला लोकैषणा ( सम्मानलिप्सा ), तथा तत्परिपोषिका तत्संरिक्षा अर्थगृध्नुता - लिप्सा - लालसा - लक्षणा वित्तैषणा के आधार-पर होने वाली पारस्परिक - मैत्री का प्रच्छन्न अर्थ विशुद्ध शत्रुता ही है, जो लोकैषणा- वित्तैषणा के अणुमात्र-छिद्र से ही व्यक्त होपड़ती है । और इस अभिव्यक्ति के साथ ही पूर्वक्षण की मित्रतानुबन्धिनी विश्वशान्ति उत्तरक्षण में हीं शत्रुत्रानुबन्धिनी विश्व शान्ति की ही जननी बन जाती है, बन गई है आज के तथाकथित मैत्रीधरातल पर ही । अतएव लोक - वित्तपणानुबन्धिनी अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिमूला इत्थंभूता मैत्री का भारतराष्ट्र की सांस्कृतिकी - उस प्रकृतिसिद्धा सहज मैत्री के साथ तो स्पर्श सम्बन्ध भी नहीं रख रही, जिस भारतीय मैत्री का मूलाधार सांस्कृतिक - सूत्र माना गया है - ' समानशील - व्यसनेषु मैत्री, निस इस लोकसूत्र की मूलप्रतिष्ठा माना गया है ‘ सह धर्म्म चरताम् ' लक्षण श्रुतिसूत्र | मानवीय चान्द्र मन के सुप्रसिद्ध स्नेहनगुणात्मक ‘ सोम-रस ' के सहज प्रवाह से सम्बन्ध रखने वाली मानसिक सहज - वृत्ति का नाम ही है - ' प्रेम ', जो प्रवाहता स्तभ्य से श्रद्धा, वात्सल्य, स्नेह, काम, रति, इन पाँच भावों में परिणत होजाता है, जिन इन पाँचों हीं भावों के क्षेत्र अमुक रहस्यपूर्ण - वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही अवलम्बित हैं, जिनका अन्य निबन्धों में हीं स्पष्टीकरण हुआ है । इन पाँचों में तीसरा ' स्नेह ' तत्त्व ही मैत्री का अवलम्ब है, जिसकी मूलप्रतिष्ठा मानव की सांस्कृतिक - याचारपद्धति ही माना गया है । इस आचारपद्धति का, मूलसंस्कृति का स्रोत प्रवाहित रखने वाला सांस्कृतिक - मानव ही भारतराष्ट्र का ' वास्तविक - मित्र ' माना जायगा, जिसके साथ - ' तस्माद् ब्राह्मणो S राजन्यः स्यात् ' रूपेण सत्तातन्त्रानुबन्धिी लोक - वित्त - पद - आदि किसी भी उस एषणा का यत् किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है, जो एषणासम्बन्ध ही एषणामूला काल्पनिक - मैत्री को पूर्वकथनानुसार उत्तर क्षण में हीं भयावहा शत्रुता के रूप में हीं परिणत कर दिया करता है, इत्यलं प्रासङ्गिक - मैत्री-प्रसङ्गेन । कैसा है यह सांस्कृतिक सन्देशवाहक, अतएव वास्तविक - सनातन मित्रपुरोधा १, प्रश्न का उत्तर इस के आधिदैविक ब्राह्मणवर्ण पर ही अवलम्बित है । प्राणाग्नि हीं ईश्वरीय - आधिदैविक-परोक्षजगत् में ‘ ब्राह्मण ' कहलाया है, और इसी ब्राह्मणाग्निदेव का नाम है - ' भारत ', जैसा कि— १५६
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ग्रात्मनिवेदन. ' अहाँ असि ब्राह्मण भारतेति ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । इस ब्राह्मण भारताग्नि-मित्राग्नि की स्वरूपाभिव्यक्ति से ही यह पावनदेश - ' भारत ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जैसा कि पाठक प्रस्तुत शतपथभाष्य में विस्तार से प्रतिपादित देखेंगे | इस भारताग्निप्राणप्रधान भारतीय मानव-वर्णं का ही नाम ' ब्राह्मणमानव ' है, जिस इस रहस्यपूर्ण तथ्य से हमारी वर्त्तमाना राष्ट्रप्रज्ञा सर्वथा ही पराङ्मुख होगई है । देवप्राणानुगत - श्राधिदैविक इन्द्र के शासनतन्त्र में अग्निमित्र ही पुरोधा है-' अग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' के अनुसार । अतएव ऋग्वेदने- ' अग्निमीले पुरोहितम् ' रूप से इस अग्नि को ही ‘ पुरोहित ' पुरोधा ' संज्ञा प्रदान की है । कैसा स्वभाव है अग्नि का १, क्या - क्या धर्म्म हैं अग्नि के १, प्रश्न के समन्वय का अत्र अवसर नहीं है । केवल एक ही प्रमुख धर्म्म की ओर प्रमङ्गधिया पाठकों का ध्यान आकर्षित कर लिया जाता है । तेजोगुणक - त्रिशक्लनधर्म्मा अग्नि का प्रमुख धर्म्म है-सम्पूर्ण दोषों को भस्मसात् कर देना, एवं स्वयं सभी से प्रसङ्ग बने रहना अपने रूक्ष - तेजोभाव के कारण | यही धर्म्म उस श्राग्नेय मित्र पुरोधा ब्राह्मण का माना गया है, जिस धर्म की स्थिति में ही वह ब्राह्मण ‘ ब्राह्मण ' कहनाया है । अन्यथा तो जातिमात्रोपजीवी ब्राह्मण काठ के कल्पित हाथी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है * । शासनतन्त्र के प्रति प्रतिक्षण हीं इस सांस्कृतिक विद्वान् ब्राह्मण को जागरूक रहना चाहिए अग्निवत् सर्वथा संगरूप से ही । जहाँ भी, जब भी यह शासनतन्त्र को लोकपरणा - वितैषणा के गत्त में निमज्जित होता देखे, तत्काल सांस्कृतिक उद्बोधनात्मक ज्ञान - विज्ञानबल से शासनतन्त्र की दिग्देशकाला-नुबन्धिनी प्रसन्नता की चर्वणा से संस्पृष्ट रहता हुआ निर्भीकरूप से स्थिति का स्पष्टीकरण शासनतन्त्र - के सम्मुख रख ही दे, यही इस का वर्णानुबन्धी - सांस्कृतिक - नैष्ठिक - कर्त्तव्य- माना जायगा । पुरोधा आग्नेय ब्राह्मण कच, और कैसे इस महान् उत्तरदायित्त्व में सफलता प्राप्त कर सकता है?, प्रश्न का, एकमात्र उत्तर है - इस की सत्तातन्त्रनिरपेक्षा- ' अराजन्यता ' । सत्ता के प्राङ्गण में लोकैकणा के जनक अधिका वल, तथा वित्तैषणा के उत्तेजक वित्तचल, ये दोनों चल ही प्रमुखरूपेण नर्त्तन करते रहते है । ऐसी दशा में यदि पथप्रदर्शक सांस्कृतिक - विद्वान् सत्तातन्त्र से, इस की व्यक्ता मान्यताओं से घुलमिल जायगा, तो निश्चयेन इस की इस सत्तासापेक्षता - मूला - सत्ताश्रयता से इस का श्राग्नेय - मित्र मावानुबन्धी-वह असङ्गधर्म्म अभिभूत ही होजायगा- ' राजान्न ' तेज आदत्त ' के अनुसार, जिस सङ्ग - धर्म्म के बल पर ही यह सत्तातन्त्र को उक्त दोनों दोषों से बचाने में समर्थ हुआ करता है । सत्तातन्त्र का व्यासङ्गात्मक- सङ्ग * न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ॥ यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ १ ॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्म्ममयो मृगः ॥ यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥ २ ॥
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु, यथा गौर्गवि चाफला ॥ यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥ ३ ॥
- मनुः २।१५६-५७-५८ । १६०
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शतपथ - प्रथमखण्ड इस असङ्ग मानव में भी कालान्तर में लौकैषरणा ( पदाधिकारकामना ), तथा वित्तषरणा ( वित्तलोलुपता ), उत्पन्न कर देसकता है, जिस की उत्पत्ति के अनन्तर इस का उद्बोधक - स्वरूप ही उच्छिन्न होजाया करता है । और उस सत्तासापेक्षता की दशा में तो इस की सांस्कृतिक आस्थाएँ भी कालान्तर में सत्तामान्यता के रूप में हीं परिणत होजातीं हैं । सत्तातन्त्र यदि ' अधिनायकवाद ' के ग्रह से ग्रस्त है, तो यह भी अपने शास्त्रों के बल पर इसी बाद के समर्थन में प्रवृत्त होजाता है । यदि सत्तातन्त्र ' प्रजातन्त्र पद्धति ' का अनुगामी है, तो यह भी शास्त्रीय - शब्दों का अपने प्रज्ञावाद के बल पर जोड़ - तोड़ बैठा कर गणतन्त्रीय प्रजातन्त्र के समर्थन में हीं श्रात्मविस्मृत बन जाता है । यदि सत्तातन्त्र ' नाच - गान ' जैसे ' माल्व्य ' भावों को ही भावकतावश ' सांस्कृतिक-आयोजन ' मान बैठता है, तो यह सांस्कृतिक- विद्वान् भी इसी के समर्थन - प्रचार - प्रसार में आहुत होजाता है । और यों महामोमयी इस सत्तासापेक्षता से स्वयमपि लोकैषणा - जैसे दिग्देशकाल - व्यामोहनों, तात्का-लिक लाभों? में आसक्त व्यासक्तमना बनता हुआ सांस्कृतिक - विद्वान् स्वधर्म्मच्युति के साथ साथ सत्तातन्त्र को भी दिग्देशकालविमूढ़, अतएव लक्ष्य- च्युत ही कर देता है । निश्चयेन राजर्षि मनुने इसीलिए इस सांस्कृ-तिक -ब्राह्मण वर्ग को ' सम्मान ' जैसी लोकैषरणा के व्यामोहन से सदैव आत्मपरित्राण का ही आदेश दिया है, जो सत्ता - लोक - सम्मान इस की सांस्कृतिक - निष्ठा को विगलित कर इसे प्रवाह में हीं प्रवाहित कर दिया करता है । श्रूयताम्!
सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विपादिव ।
श्रमृतस्येव चाकाङ क्षेत् - अवमानस्य सर्वदा ॥
I —मनुः २।१६२ | हाँ, तो हमने अनुभव किया अपने अन्तराल में कि, सत्ता का तटस्थरूपेण उद्बोधन जहाँ सांस्कृतिक-विद्वानों के स्वरूप का संरक्षक है, वहाँ सत्ता की सापेक्षता से अनुप्राणित ' सङ्ग ' रूप ' राजन्यभाव ' ( सत्ता-नुगतपद - वित्तानुगतिभाव ) तो इसे लक्ष्यच्युत ही कर दिया करता है । इसी रहस्यपूर्ण तथ्य को लक्ष्य बना कर शतपथ के द्रष्टा भगवान् याज्ञवल्क्य को यह कहना पड़ाकि-‘ तस्माद् - त्राह्मणोऽराजन्यः - सत्तानिरपेक्ष एव स्यात् ' क्यों भारतीय संस्कृति का ज्ञानविज्ञानात्मक - मौलिक- सांस्कृतिक - उद्बोधनात्मक तथ्य विगत तीन सहस्र - वर्षों से उत्तरोत्तर अभिभूत ही होता चला आ रहा है इन सांस्कृतिक विद्वानों की विद्यमानता में भी?, प्रश्न सर्वात्मना समाहित है उक्त उद्बोधनात्मक महान् सूत्रादेश के द्वारा ही । विद्वानोंने विगत - शता-ब्दियों में संस्कृति -- सांस्कृतिक-- आचार -- सांस्कृतिक -- आयोजनों के मौलिक - विशुद्ध ज्ञान -- विज्ञानात्मक स्वरूप का कदापि राष्ट्र के सम्मुख रक्खा ही नहीं । अपितु दिग्देशकालानुपात से परिवर्तित होने रहने वाले तत्तत्सत्तातन्त्रों की तत्तन्मान्यताओं के अनुपात से ही शब्दों के छल - माध्यम से सत्तातन्त्रों का, तदनुपा-तेनैव मतत्रादों का, एवं तदनुपातेनैव लोकतन्त्रों का ही सामयिक - अनुरञ्जन होता रहा इन सापेक्ष - विद्वानों के द्वारा । और आज के स्वतन्त्र - भारत में तो सत्तासमर्थक तथाकथित अभिनव सांस्कृतिक - विद्वानों की वह चिर अभ्यस्ता - सापेक्षता - वृत्ति शतधा - सहस्रधा - रूपेण व मानो प्रस्फुटित होपड़ी है । इसी शैथिल्य से हमारा वर्त्तमान सत्तातन्त्र आज अपनी राष्ट्रीया मूलनिधि के ज्ञानविज्ञानात्मक - विशुद्ध स्वरूप से वञ्चित होरहा है, १६१
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श्रात्मनिवेदन जिस के लिए व्यक्तभावापन्न सत्तातन्त्र को कदापि प्रत्यक्षरूपेण दोषभाक् नहीं हीं माना जाना चाहिए । क्या हम यह आशा करैं कि, राष्ट्र के ये सांस्कृतिक विद्वान्- ' तस्माद् -- ब्राह्मणोऽराज्यन्यः स्यात् ' इस श्रौत श्रादेश को शिरोधार्य्य कर, स्वयंमपि इस दिशा में उद्बोधन प्राप्त करेंगे, एवं अपनी इस उद्बुद्धावस्था से हमारे राष्ट्रीय - उस सत्तातन्त्र को भी उद्बुद्ध करेंगे, जो आज अन्तर्राष्ट्रीयख्याति - लक्षणा भयावहतम । लोकैषणा में, तथा योजनानिबन्धना वित्तेषणा मे आपादमस्तक निमाज्जत होता हुआ अपनी राष्ट्रीया-ग्रात्मबुद्धिसम्मता सांस्कृतिक चेतना से उत्तरोत्तर पराङमुख होता हुआ मनः शरीरनिबन्धना कामार्थचिन्ता से ही चिन्तित प्रमाणित होरहा है, इत्यलमतिविस्तरेण सत्तासमर्थकेषु सांस्कृतिक - अभिनव - विद्वत्सु । ८ -- अन्त में-- आस्था, श्रद्धा - परायण, श्राचारधर्म्मनिष्ठ अनन्य - - श्रद्धय - आस्तिक-त्मबुद्धिनिष्ठ भारतीय - जनतन्त्र से! अन्त में भारतराष्ट्र के उस श्रास्था - श्रद्धा -- परायण, सहजरूपेणैव -- श्रात्मबुद्धिनिष्ठ, अतएव सहजरूपे -व आचारधर्म्मनिष्ठ, अतएव च अनन्य श्रद्धय जनतन्त्र के प्रति भी श्रद्धाञ्जलि के रूप में दो वाक्यप्रसून श्रद्धापूर्वक समर्पित कर देना हम अपना नैष्ठिक कर्त्तव्य मान रहे हैं, जिस जनतन्त्र की कृपा से ही भारतीय संस्कृति के मूलसूत्र उसके जनजीवनीय पर्व - उत्सव - सम्मेलन- समारोहात्मक - सांस्कृतिक - आयोजनों के रूप में आदिकाल से आज पर्य्यन्त निरवच्छिन्न रूपेणैव प्रक्रान्त हैं इस पावन भारतराष्ट्र में, एवं - ' शाश्त्र-तीभ्यः समाभ्यः- ( सदा सदा के लिए ) ' धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' के अनुसार प्रक्रान्त ही रहेंगे । दिग्देशकालानुत्रन्धी परःशत सत्तातन्त्र आते रहे, और जाते रहे, सभी ने अपनी अपनी मान्यताओं के अनुपात से यहाँ के आस्तिक - जनतन्त्र को अपनी लोकपरणा, तथा वित्तैषणा - का लक्ष्य बनाए रहने में भी कोई न्यूनता नहीं की, अपनी सहज श्राचारनिष्टा के संरक्षणानुबन्ध से इस जनतन्त्र को परःशताधिका उत्पी-इन परम्पराओं से भी यथाकाल - यथादेश उत्पीड़ित बने ही रहना पड़ा, अपनी इसी आस्था - श्रद्धा के संरक्ष-गानुबन्ध से इसे तत्तत् सुसभ्प - सत्तातन्त्रों के द्वारा निर्ममरूपेण अवमानित, तिरस्कृत भी होते ही रहना पड़ा, और आज के मुखावह सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र भारत में भी इस जनतन्त्र को तो इसकी आचारधर्म्मनिष्ठा के सम्मान में अपने आपको ‘ राष्ट्रवादी ' मानने वाले अमुक वर्गविशेष के द्वारा ' दकियानूसी ' - ' पुराणपन्थी ' - ' प्रतिक्रि-यात्रादी ' - ' साम्प्रदायिक ' आदि आदि विभिन्न अवाच्यवादों से ही सम्मानित किया जारहा है | दिग्देशकालानुबन्धी इन सम्पूर्ण प्रतारणाओं को अपने आत्मधृतिमूलक सहज गुण से अवनतशिरस्कतापूर्वक सहते हुए भी अश्मा-खणसमतुलित इस आत्मनिष्ठ जनतन्त्रने अपनी सहजनिष्ठा को प्राणपण से अनुगमनीय मानते हुए भारत-राष्ट्र की सांस्कृतिक - राष्ट्रीयता के गौरव का संरक्षण ही किया है, जिसके लिए हम पुनः पुनः कृतज्ञताञ्जलियाँ ही समर्पित कर रहे हैं अपने इस अनन्य श्रद्ध ेय जनतन्त्र के प्रति । और हमारी आस्था है कि, आज के सांस्कृ-तिक संकटकाल में एकमात्र इस राष्ट्रीय - जनतन्त्र की आस्था के बल पर ही हमारी निष्कारणात्मिका यह साहि-त्यसेवा राष्ट्र के अभ्युदय निःश्रेयस् के लिए सर्वकारणसंसाधिका ही प्रमाणित होगी, इसी मङ्गलाशंसा के साथ तत्प्रति हमारा यह कृतज्ञतार्पण उपरत हो रहा है । ६ - सर्वान्ते च - दिग्देशकालानुबन्धी प्रातिस्त्रिक- तन्त्र के सम्बन्ध में-यही निवेदन कर देना शेष रह जाता है कि, दिग्देशकालानुबन्धिनी तात्कालिकी कारणता, उपयोगिता, किंवा फलान्वितता, आदि आदि से अपने ' प्रातिस्विक तन्त्र ' [ व्यक्तितन्त्र ] को यथाशक्य पृथक्-१६२
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शतपथ - प्रथमखण्ड निरपेक्ष ही बनाए रखने के प्रयास - माध्यम से ही ' मन्त्रत्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र ' के सुप्रसिद्ध ' शतपथब्राह्मण ' की ' ज्ञानविज्ञानात्मिका - परिभाषाओं के संस्मरणमात्रानुबन्ध से ही विंशतिसहस्रपृष्ठात्मक [ बीस हजार-पृष्ठात्मक ] ' शतपथविज्ञानभाष्य ' राष्ट्रभाषा - हिन्दी में उपनिबद्ध हुआ है, जिसके सम्बन्ध में विश्व के यच्चयावत् प्रज्ञाशील - मनीषी विद्वानों का हम ससम्मान इसी दृष्टि से प्रगतभावपुरस्सर आमन्त्रण कर रहे हैं कि, एक बार वे अपनी सुप्रसिद्धा - ' दोषज्ञः ' * अभिधा के आकर्षण से ही, दोषदर्शनदृष्टि के माध्यम से ही इस पर दृक्पातानुग्रह करैं । हमारी आस्था है कि, इस राष्ट्रीय निबन्ध की ओर दृक्पातमात्र से ही सभी पूर्वोक्त वर्गों का ध्यान भारतराष्ट्र की मूलसंस्कृति की ओर विचारपरामर्श के लिए तो अवश्य ही आकर्षित हो जायगा, एवं भारतीय संस्कृति, साहित्य से अनुप्राणिता त्रिसहस्रवार्षिकी वे कल्पिता आपातरमणीया सभी भ्रान्तियां निर्मूल होजायँगी, जिन भ्रान्तियों के कारण ही विश्वमानव, विशेषतः भारतीय अमुकवर्ग अपनी उस राष्ट्रीय - निधि से वञ्चित ही होता रहा है विगत तीन सहस्र - वर्षों से, जिस वञ्चना से ही भारतराष्ट्र को आत्मबुद्धिसम्मत - वास्तविक स्वातन्त्र्य से वञ्चित ही रहना पड़ रहा है । निश्चयेन इस सांस्कृतिक - निष्ठा-बल पर ही भारतराष्ट्र अब निकट भविष्य में हीं सर्वात्मना अभ्युदय - निःश्रेयस् का अनुगामी प्रमाणित होगा हमारे वर्त्तमान सचातन्त्र के शासनयुग में हीं । पारिशेष्यात् - भारतीय संस्कृति, साहित्य - धर्म - आदर्श - आदि सांस्कृतिक - विभूतियों के प्रति सहजरूपे -णैव श्रास्था – श्रद्धापरायण, भारतीय सत्तातन्त्र के सर्वोच्च सत्तापद के महान् प्रतीक महामहिम राष्ट्रपति श्रीराजे-न्द्रप्रसादजी महाभाग के प्रति भी ' राजस्थानतत्त्व शोध संस्थान ' अपनी हार्दिक कृतज्ञताएँ समर्पित कर देना अपना अनिवाय्य कर्तव्य मान रहा है, जिनकी प्रधान - संरक्षकता से अनुप्राणित संस्थान जिनकी सांस्कृतिक प्र ेरणा के अनुग्रह से ही सर्वप्रथम उत्तरप्रदेश, एव तदनन्तर राजस्थान के प्रान्तीय मान्य सत्तातन्त्रों का अमुक प्रारम्भिक सहयोग प्राप्त कर सका है । इसी प्रसङ्ग में धर्म्मसरक्षक भगवान् मनु की विश्वविदिता ' अयोध्या ' नाम की राजधानी जैसे सांस्कृतिक - संस्थान से धन्य बने हुए उत्तरप्रदेश के सम्मान्य मन्त्री भारतीय संस्कृतिनिष्ठ मुख्यमन्त्री मान-नीय सर्वश्री डॉ ० सम्पूर्णानन्दजी महाभाग के प्रति भी संस्थान अपनी हार्दिक कृतज्ञता अभिव्यक्त करना अपना सांस्कृतिक - कर्त्तव्य ही मान रहा है, जिह्नोंनें तत्काल ही इस साहित्य की राष्ट्रीय - उपयोगिता को लक्ष्या-रूढ करने का निःसीम अनुग्रह किया, एवं तत्परिणाम स्वरूप ही आपने संस्थान को अपने सचातन्त्र की ओर से प्रारम्भिक अनुदान प्रदान किया । तदनन्तर राजस्थानप्रान्तीय- अपने सत्तातन्त्र के वर्त्तमान कर्णधार मुख्यमन्त्री सर्वश्री उन मोहनलाल जी सुखाड़िया महोदय के प्रति भी संस्थान कृतज्ञता अभिव्यक्त कर रहा है, जिनका दस वर्ष की हमारी * -विद्वान् विपश्चित् - दोषज्ञः ( अमरः )
* -मेध्या महर्षिविमलैरमलैरयोध्याऽयोध्येति विश्वविदिता मनुराजधानी ।
यत्रोच्छलन्ति कलिकालमलाभिषङ्गा निर्वाणरङ्गचतुराः सरयूतरङ्गाः ॥
- श्वेत क्रान्तिनिबन्धे १६३
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श्रात्मनिवेदन दन्द्रम्यमाणा वृत्ति के अनन्तर संस्थान के सम्मान्य मन्त्री डॉ ० श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल महाभाग की त्रित्रार्धिकी चङ क्रममाणावृत्ति के अनन्तर तथा उत्तरप्रदेश के प्राथमिक अनुदानानन्तर ही अपने प्रान्त की ही राजवानी जयपुर में संस्थापित संस्थान की ओर ध्यान आकर्षित हुआ । और फलस्वरूप इस सुदीर्घ परीक्षण के अनन्तर आपने अनुदान का अनुग्रह अभिव्यक्त किया । इन दोनों अनुदानों के आधार पर ही यह प्रकाशनीं राष्ट्रीय जनतन्त्र के सम्मुख उपस्थित होपाया है । तदर्थ संस्थान के साथ साथ जनतन्त्र भी इन दोनों ह प्रान्तीय - सत्तातन्त्रों के प्रति अपनी कृतज्ञता अभिव्यक्त करने से कदापि पराङमुख नहीं रहेगा | हमनें स्वयं अपने व्यक्तितन्त्र से इस दिशा में सदा से ही भारत के जनतन्त्र के प्रति ही अपनी सापेक्ष-ताएँ समर्पित कीं हैं । एवं जनतन्त्र के श्रद्धात्मक सहयोग से ही हमनें विगत २० वर्षों में अपनी सांस्कृतिक– निष्ठा येनकेन रूपेण प्रक्रान्त रक्खी है । किन्तु अत्यन्त श्रम - परिश्रम - साध्य इस स्वाध्यायतपोनिष्ठा से हमारा शरीर विगत ८-१० वर्षों से सर्वथा ही जर्जरित होगया । अतएव हम जनतन्त्र के सहयोग से वञ्चित रह गए । सन् ३२ से ही हमारे सांस्कृतिक - सहयोगी सुहृदर डॉवासुदेवशरण अग्रवाल महोदय को हमने सन् ५५ में अपनी असमर्थता के इतिवृत्त से परिचित करा देना आवश्यक समझ लिया लिपिबद्ध ' शारदापत्रों ' की भविष्यद् – च्यवस्था के अनुबन्ध से | आप स्वयं जयपुर आए, और सङ्केतित संस्थान स्थापित किया, एवं तदनुबन्ध से आपने हीं सत्तातन्त्र के प्रति अपने नैष्ठिक प्रयास उपक्रान्त किए, जिसके परिणाम जनतन्त्र के सम्मुख हैं । इन सत् -- परिणामों के लिए अग्रवाल महोदय का अभिनन्दन करना तो उनके सांस्कृतिक--महत्त्व को न्यून हीं करना होगा । अतएव आपके सम्बन्ध में तो यही अभिव्यक्ति पर्याप्त मानली जायगी कि, श्रापका यह सांस्कृतिक - प्रयास निश्चयेन भारतराष्ट्र के भावी इतिहास ग्रन्थ में स्वर्णाक्षरों से ही लिपिबद्ध होगा । अपनी स्वल्पमति के अनुसार, सर्वथा स्वतम किञ्चित्कर साधनों के बल पर ही ' निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ' इस प्रारम्भिक मङ्गलोपक्रमात्मक आदेश के आधार पर राष्ट्र की. इस मूलसांस्कृ-तिक - निधि के सम्बन्ध में जो भी कुछ, जैमा भी कुछ गच्छतः स्खलन - रूपेण बन पड़ा है, वह श्रद्धा, आस्था पूर्वक राष्ट्रदेवता के पावन चरणों में समर्पित है । हम तुष्ट हैं अपने अन्तर्जगत् में इस समर्पण से । अत्र प्रकाशन प्रचार आदि आदि कोई भी लौकिक- एषणा प्रक्रान्त वानप्रस्थाश्रम में शेष नहीं रह गई है । श्रतएव भूत - भौतिकानुबन्धी यह समस्त लोक - ब्राह्मोत्तरदायित्त्व संस्थान के सर्वसमर्थ श्री अग्रवाल महोदय के प्रति ही समर्पित करते हुए हम अपने शेष जीवन को ऐकान्तिकी - स्वाध्यायतपोनिष्ठा के प्रति ही अर्पित कर देते हैं | इसी महामाङ्गलिकी निःश्रेयसभावना के साथ शतपथ हिन्दी विज्ञानमाण्यानुगत - दिग्देशकालानु-बन्धी यह आत्मनिवेदन उपरत होरहा है । मिती - आश्विन शुक्ल - विजयदशमी वि ० सं ० २०१५ मानवोक्थवैर | जिकब्रह्मोच ( मानवाश्रम ) दुर्गापुरा - जयपुर इति निवेदयति यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मोपाह्वो मोतीलाल शर्मा श्राङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी - पथिकः १६४
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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्य - प्रथमकाण्डानुगत ' प्रथमखराड ' की संक्षिप्ता - विषयसूची
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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डानुगत ' प्रथमखण्ड ' क संक्षिप्ता - विषयसूची ' पारिभाषिक - सूचनाएँ ' नामक परिशिष्ट प्रकरण की परिच्छेदात्मिका - विषयसूची-१ – माङ्गलिक - संस्मरण २ – शतपथब्राह्मण की - ' अभिधा ' ( नाम ) के सम्बन्ध में ३ – प्रथमकाण्डानुगता - अध्याय सूची ४- प्रथम काण्डानुगता - प्रपाठकसूची ५ - प्रथमकाण्डानुगता ब्राह्मण सूची ६ – प्रथमकाण्डानुगता - विज्ञानानुबन्धिनी - ' निगम ' - ' अनुगम ' सूची ७ — प्रथमकाण्डानुगता - कर्म्मनामसूची ८ – प्रथमकाण्डानुगता ऋष्यादि नामसूची ६ – शाखाभेदभिन्न यजुर्ब्रह्मानुगत शतपथब्राह्मण १० — शतपथब्राह्मणानुगत ' मूलपाठ ' के सम्बन्ध में ११ — शतपथब्राह्मण - ‘ हिन्दीविज्ञानभाष्य ' के ' विज्ञान ' शब्द से समन्विता प्रस्तुत भाष्यशैली १२ – ' विज्ञान ' शब्द का भारतीय दृष्टिकोण से उपक्रम १३ – शब्दार्थानुगता विशिष्ट - शैली, एवं - ' हृदय ' शब्द १४ – चिरन्तनशैली के आधार पर ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय १५ – ' विज्ञानशब्द ' की नित्यसापेक्षता १६ – ज्ञान - विज्ञान - निबन्धन - अमृत, मृत्युभाव १७ – सापेक्ष - ' ज्ञान ' - ' विज्ञान ' शब्दों का दार्शनिक - समन्वय १८ - सापेक्ष - निरपेक्ष दृष्टियों का विवेक १६ – क्रियात्मक विश्व, और उसका निष्क्रिय धरातल २० – सांख्यदृष्टि से ज्ञान - विज्ञान - शब्दों का दार्शनिक - समन्वय २१ – ‘ अव्यक्तनिष्ठा ’ का अभिनिवेश, और तदनुग्रह से ' विज्ञाननिष्ठा ' का अभिभव २२ — कलिवात्याहिता वेदान्तनिष्ठा के दुष्परिणाम २३ –'भारतीय दर्शन ' का समदर्शनात्मक महान् दृष्टिकोण २४. - शरीरमूलक - ' विषमवर्त्तन ', एवं आत्ममूलक - ' समवर्त्तन ' की उपादेयता २५ – समवर्त्तनात्मक विषमदर्शन से भारतराष्ट्र का पराभव २६ – मृत्युमय - ' कर्म्मवाद ' का माध्यम ' ज्ञानतत्त्व २७ - ज्ञान - विज्ञानात्मिका ऋषिदृष्टि का सनातनत्त्व **** ३