Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 171–180
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180
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विषयसूची २८ - ज्ञान - विज्ञान - शब्दों की विविध - परिभाषाएँ २६ – श्रुति के द्वारा ज्ञान - विज्ञान - पक्षों का समर्थन .... ३२ – ब्रह्म विज्ञानधारा, और यज्ञविज्ञानधारा ३३ – ' शब्देतिहासविज्ञान ' की विलुप्ति के दुष्परिणाम ३४ – पारिभाषिक - ‘ निगम ', ' अनुगम ' - शब्द ३५ – ' कलौ वेदान्तिनः सर्वे ' मूलक ' ब्रह्मव्यामोहन ३६ -- ' वृद्धास्ते, न विचारणीयचरिताः ' 1- श्रौतस्मार्त्त - ' ब्रह्म ' का पारिभाषिक - दृष्टिकोण ३७-३८ –'क्षरब्रह्म ' का वैशिष्ट्य - लक्षण विज्ञानत्त्व ३६ — ' क्षरब्रह्म ' का नित्य - महिमाभाव ४० — ब्रह्म – यज्ञ – धारात्रों का पार्थक्य - समन्वय ४१ – ' ब्रह्म ' शब्द का विस्पष्टतम वाच्यार्थ ४२... ब्रह्मवनात्मिका प्रश्नपरम्परा ४३ – वाकू, और मन की प्रतिद्वन्द्विता ४४ – अनिरुक्त प्रजापति की निरुक्ता व्याहृति ४५ – उत्तरगर्भित प्रश्नों का रहस्यात्मक समन्वय ४६ – ' ब्रह्मवनम् ० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थसमन्वय ४७ — तात्त्विक - रहस्यार्थगर्भित - ' वेद ' शब्द ४८ - त्रिधारात्मक - ' ब्रह्मविज्ञान ' का स्वरूप – समन्वय ४६— ब्रह्मविज्ञानाधार पर प्रतिष्ठित यज्ञविज्ञान ५० — स्वाध्यायनिष्ठानुगतमात्र प्राजापत्य - शास्त्र ५१ – भौनब्रह्मा के द्वारा ब्रह्मसिद्धान्त की प्रतिष्ठा ५२ – विश्वेश्वर, विश्वकर्त्ता, विश्वात्मा, शब्दों का समन्वय ५३ – व्यवस्थित, एवं अव्यवस्थित विज्ञानों का तारतम्य ५४ - ब्रह्मविज्ञानानुगत भूतविज्ञान की महती उपयोगिता ५५ – ' यज्ञ ' शब्दार्थ - जिज्ञासा ५७ – दर्शन, और विज्ञान का पार्थक्य ५८ — ( क ) ब्रह्म, और यज्ञ शब्दों का समतुलन ५८ - ( ख ) रस - मला -त्मिका यज्ञप्रक्रिया ५६ - भुक्तान्न की सप्तचितियाँ ६० – ' ओज ' की स्वरूप - निष्पत्ति ५२ " II " ५५ 77 ५६ 17 ५७ ५८ ५६ " " ६० ६१ 73 ६३ 33 II 17 ६५ ६६ " " ६७ 17 ६८ 77 ६६ 23 ३० – ‘ एक ’ ज्ञानात्मक - ' विज्ञान ' का आाधारत्त्व, एवं ' अनेक ' ज्ञानात्मक - ' विज्ञान ' का आधेयत्त्व ३१ – ‘ पुराणीप्रज्ञा ' से अनुप्राणित ' ब्रह्म ', और ' यज्ञ ' शब्द ५६ – ‘ ईक्षणात्मक ’ – ‘ ब्रह्मविज्ञान ', एवं ' परीक्षणात्मक ' - ' यज्ञविज्ञान '
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शतपथ - प्रथमखण्ड ६१ – प्रोज, और ऊर्क का समन्वय ६२ - मनस्तन्त्र की स्वरूप - निष्पत्ति ६३ – अन्नदोष से भारतीय प्रज्ञा का पतन ६४ - आध्यात्मिक यज्ञ की लौकिक - स्वरूप - व्याख्या ६५ – पा'मा - शनाया के द्वारा अन्नाहरण, और उर्क का आविर्भाव ६६ - अन्न - ऊर्क – प्राण का चङक्रमणात्मक आध्यात्मिक यज्ञ ६७ – अधिदैवत, एव अधिभूत यज्ञस्वरूपोपक्रम, एवं चन्द्रमा - भूपिण्ड -सूर्य्य, और परमेष्ठी – त्रिम् परिभ्रमण ६८ - भौतिक सूर्य्यपिण्ड के माध्यम से विश्ययज्ञप्रक्रिया का समन्वय ६६ – सूर्य्यनारायण के आविर्भाव का संक्षिप्त इतिवृत्त ७० - शतायुः सूर्य्य का जीवनसाधन यज्ञान्न ७१ – सौर - सावित्राग्नि के अन्न का स्वरूपपरिचय ७२ - सौर - सावित्राग्नि की कृष्णरूपता ७३ - सौर - अग्नि की कृष्णमृगरूपता ७४– महान् ' भारत ' अग्नि का अपना देश भारतवर्ष, और कृष्णमृगचर्म का इतिहास ७५ — ( क ) सर्ग, एवं प्रलयाधिष्ठाता यज्ञ के स्वरूप - धर्म्म ७५ — ( ख ) सप्त - अन्नाहुति, और भूतों की जीवनसत्ता का कारण ७६ – अग्नीषोमात्मक यज्ञ के ब्यापक अन्न, अन्नाद - भाव ७७ – यज्ञप्रजापति के असंख्य अवान्तर - विवर्त्त ७८ - ऋषिष्ट प्रजापति का महिमाभाव ७६ - प्रजापति के द्वारा याज्ञिकी सृष्टि का सन्तनन ८० - विकृतिविज्ञानात्मक भूतविज्ञान की विस्मृति ८१ - सांख्यदर्शन के आध्यात्मिक चार विवर्त्त ८२ - संख्या से ससिद्ध ' सांख्य ' का - ' सांख्यपुरुष ' ८३ – सांख्य के चार पादों के साथ वैदिक - चतुष्पाद् ब्रह्म- का समतुलन " ८४ - ईश्वर, और मानव के चार पर्वों का समतुलन ८५ - ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् ' का अनुगमात्मक समन्वय ८६ – ' अन्यदेव विदितात्, अथो विदितादधि ' ८७ - ब्रह्म - यज्ञ - भूत - रूपा विज्ञानधारात्रयी -त्रिविध विज्ञानधारात्रों का आचारात्मक समन्वय ८६ – बुद्धि - मनः - शरीरानुगता निष्ठात्रयी के अभिभव से भारतीय - आचारत्रयी की विलुप्ति ६० — वेदशास्त्र की ' परा ', ' अपरा’- विद्याएँ ६१ - प्राणपरीक्षणात्मक ब्रह्मविज्ञान, एवं भूतपरीक्षणात्मक यज्ञविज्ञान ६२ —– ‘ यज्ञविज्ञान ' के आधार पर ' भूतविज्ञान ' का आविष्कार ५
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विषयसूची ६३ – विज्ञानमूलक सनातनधर्मं की सम्प्रदायवादनिरपेक्षता १५ – प्रतीच्य भूतविज्ञानवादियों का आक्षेप, और तन्निराकरण ६६ – भारतीय ' पञ्चतत्त्ववाद ' की मौलिक - सोपान परम्पराएँ ६.७ – पञ्चपर्वा प्रकृति के अध्ययन का आदेश ६८ – रस - बल - स्वरूप - परिचय ६६ – रस- बलात्मिका विद्या और विद्या १०० - ' बलं सत्यादोजीयः ' १०१ —– लनिबन्धन विविध धर्म १०२ बलों की अवस्थात्रयी १०३ - बलों के अष्टादश ( १८ ) सम्बन्ध १०४— आत्मप्रतिष्ठाशून्य भूतविज्ञान की सर्वसंहारकता १०५ – भूतविज्ञान, और मानव के चार पुरुषार्थ १०६ – मानव और पशु के समानधर्म १०७ – समदर्शनानुगता श्रात्मप्रतष्ठा १०८. समन्वयात्मिका मान पर्वचतुष्टयी १०६ - आर्षनिष्ठानुगता विज्ञानधारा... ११० – प्रतीच्य विद्वानों के प्रति कृतज्ञतार्पण १११ – विश्वशान्ति, एवं लोकवैभवप्रवर्त्तक भारतीय - विज्ञान ११२ – ईश्वरीय विज्ञान के साथ मानव - स्वरूप का समतुलन ११३ – अनुकूलताप्रवर्त्तक भूतविज्ञान के प्रकाण्डताण्डव ११४ – मतवादाभिनिविष्ट हिंसादि वादों का निःसारत्त्व ११५ –कल्पित समन्वय से गौरवाभिभूति ११६ — आस्था - श्रद्धा - शून्य - बुद्धिवादों का विजम्भग ११८ - उदाहरण का ज्ञान - विज्ञानात्मक समन्वय १ ९ १६ - मामयं प्रहरिष्यति ' १२० – तत्त्ववादविलुप्ति के दुष्परिणाम १२१ – वित्त - लोकैषणा - व्यामोहन से बुद्धिवाद का आविर्भाव १२२ – बुद्धिवाद, और वेदार्थ की परा: परावता १२३ - वेदार्थसमन्वय की मूलप्रतिष्ठा का दिग्दर्शन ६१ II ६३ εγ ६५ ६६ ६७ " ६८ 5 Σε 3 = = १०० 13 77 १०२ १०३ १०४ 71 १०५ १०६ १०७ " १०८ " ११० १११ 27 ११२ ६४ — सनातनधर्म्म के नाम से मतवादों का विस्तार, और इससे ' विज्ञान ' का अभिभव ११७ – प्राच्य - प्रतीच्य - व्याख्याताओं की भ्रान्ति का सोदाहरण स्पष्टीकरण ' पारिभाषिक - सूचनाएँ ' नामक परिशिष्ट प्रकरण विषय सूची - त्र- उपरत
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शतपथब्राह्मण -- हिन्दी विज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रथम काण्डानुगत प्रस्तुत - ' प्रथमखण्ड ' में समाविष्ट प्रमुख - याज्ञिक - कम्मों की सूची शतपथब्राह्मणान्तर्गत- ' हविर्यज्ञकाण्ड ' नामक ' प्रथमकाण्ड ' के प्रथमाध्याय के प्रथम ब्राह्मण से प्रथमाध्याय के चतुर्थ ब्राह्मण पर्य्यन्त एवं प्रथम पाठक के प्रथम ब्राह्मण से प्रथमप्रपाठक के चतुर्थ ब्राह्मणपर्य्यन्त विज्ञानभाष्य की विषयसूची १ – व्रतोपायनकर्म्म २ ब्रह्मवरणकर्म्म ३ – अपांप्रणयनकर्म्म पृष्ठ सं ० ११७ से पृष्ठ सं ० १५५ पर्यन्त " १५५ से 11 १७० " 19 १७० से 99 २०१ 99 ४ – परिस्तरण, तथा पात्रासादनक " २०१ से 21 २४२ 12 ५ -- वाक्संयमनकर्म्म " २४३ से " २४५ , ६ – पात्रप्रतपनकर्म ७- शकट से हविर्ग्रहण, एवं तत्सादनकर्म्म, ३५४ से ८-- प्रोक्षणक ६ - पुरोडाशसम्पादनाङ्गकर्म " २४६ से " ३५४ " ४२१ " 11 ४२२ से 11 ४५१ " " ४५२ से ६१० 15 ७
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विषयसूची इति - प्रखमखण्डानुगता - प्रधानकर्म्मविषयसूची हविर्यज्ञानुगता ( प्रधानकर्म्मानुगत - विषयों की सक्षिप्ता - सूची ) शतपथब्राह्मणानुगत - प्रथमकाण्ड के प्रथमाध्याय का प्रथम ब्राह्मण एवं प्रथमप्रपाठक का प्रथम ब्राह्मण उपक्रान्त १ ( १ ) - व्रतोपायनकर्म्म ' ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची-पृष्ठसं ० ११७ से १५५ पय्र्यन्त १ व्रतोपायनकर्म्मप्रतिपादक ब्राह्मण ( मूल ) १ प्रथम कण्डिका ] .. २ व्रतोपन कर्म्मब्राह्मण का अनुवाद ३ भाष्यानुगत ) त्रैताग्निस्वरूप - परिचय १३ ज्योतिष्टोम - गोष्टोम - श्रायुष्टोम ११६ ११७ १४ सम्वत्सरयज्ञप्रजापति १५ यज्ञमूला प्रजा " १६ मनः प्राणवाङ् मय आत्मा " 73 १७ यज्ञफल -- दिग्दर्शन " 23 १८ यज्ञमूलक स्तोत्र - शस्त्र - ग्रह 31 39 ४ यज्ञस्वरूपपरिभाषा ५ यज्ञसाधक सोम का संस्मरण ६ सोम के द्वारा प्रकाशित सूर्य ११८ १६ मन: प्राणवाङमय यज्ञ २० मनोमय श्रद्धाधरातल " " ७ ज्योतिः - प्रवत्त के सोम " २१ दक्षिणानुगत ऋत्विग्वर्ग " " ८ श्रात्माधिष्ठाता यज्ञमूर्ति सूर्य्यनारायण 17 २२ यजमानानुगता फलाशी: 17 ६ सौर अग्निहोत्र 29 २३ प्रतिष्ठात्मक - ' परमन ' १२० १० अग्नीषोमात्मकं जगत् 13 २४ आध्यात्मिक- त्रयीवेद " ११ सौर- मनोतात्रयी 33 २५ वेदत्रयात्मक ऋत्विग्वर्ग 23 १२ देव - भूत - श्रात्म- त्रयी 32 ८ २६ अनुष्टुप् श्रौर बृहती "
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२७ होता- उद्गाता - का स्वरूप २८ ' अनुवाक्या ' का स्वरूप २६. ' याज्या ' का स्वरूप ३० ' ग्रह ' स्वरूप - परिचय ३१ सप्तदशस्थ स्वर्ग ३२ सर्वप्रजापति ३३ सत्य, और विश्वात्मक प्रजापति ३४ अमृत - मर्त्य - प्रजापति ३५ षोडशीप्रजापति ३६ परा - अपरा - प्रकृति ३७ अव्यक्त - व्यक्त - अव्यक्त ३८ वेदमय ब्रह्मा ३६ आत्मा की पाँच कलाएँ ४० बन्धन, मुक्ति - प्रवर्तक मन ४१ श्रात्मस्वरूप लक्षण ४२ वेदमूर्ति क्षरब्रह्मा ४३ रुद्र के घोर, शिव - भाव ४४ रुद्र के द्वारा ब्रह्मा का शिरश्छेद ४५ पञ्चमुख ब्रह्मा की चतुम्मुखता ४६ चार मुखों से चार सृष्टियाँ * ४७ ब्रह्मकृत सर्वहुतयज्ञ ४८ पञ्चपुरञ्जन ४६ पृष्ठत्रयी ५० पुण्डरीकत्रयी ५ ९ गर्भस्थ प्रजापति ५२ पुष्करस्थ ब्रह्मा ५३ ब्रह्मा से बुत्पत्ति ५४ परमेष्ठी के तीन मनोता ५५ ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र ५६ सोम और महान् ५७ चिग्राहक महान् ५८ श्राप्य - वायव्य - सौम्यजीव ५६. मनोतानुगस त्रैलोक्य ६० गायत्रीमात्रिकवेद शतपथ - प्रथमखण्ड ६१ वेदमय प्रजापति १२० ६२ महात्मा, दुरात्मा " ६३ तेन पूतिरन्तरतः " ६४ अपवित्रता, और श्रमेध्यता " " ६५ पवित्रता, और मेध्यता " ६६ श्राचमनोपपत्ति " ६७ पानी से प्राण की अनग्नता " ६८ श्राचमनत्रयी " " ६६ श्राचमनस्थानत्रयी १२१ ७० अपां प्रणयन का संस्मरण " ७१ व्रतोपायनमन्त्र [ मूल ] [ २ कण्डिका ] " ७२ मूलानुवाद " ७३ सम्वत्सरयज्ञ के चार पर्व " ७४ विधा, और संस्था १२२ ७५ अग्नि की सोपानपरम्परा ७६ अहोरात्र, और अग्निहोत्र 33 ७७ पक्ष, और दर्शपूर्णमास " ७८ ऋतु, और चातुर्मास्य " ७६ अयन, और पशुबन्ध " ८० सर्वप्रतिष्ठात्मक अग्न्याधान " ८१ सजातीयाकर्षण सिद्धान्त १२३ ८२ श्राधानस्वरूप परिचय ८३ अग्न्याधान की सर्वाङ्गता 39 ८४ इष्टियज्ञस्वरूपपरिचय " " ८५ चतुर्विध सोम 13 ८६ राजसूय - वाजपेय, ग्रहयाग, हविर्याग ,, ८७ यज्ञ, विज्ञान, और ज्ञान - काण्डत्रयी १२४ शतपथ की त्रिकाण्डता " प्रकृतियाग " ६० विकृतियाग " ६१ प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तध्या " ६२ प्रकृतिभूत दर्शपूर्णमास " ६३ पुरोडाशात्मक हविः 23 ६.
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६४ सत्यविरोधी मिथ्याभाषण ६५ अग्निसाक्षी में प्रतिज्ञा ६६ व्रतपति अग्निदेव विषयसूची १२६ " " १२७ श्रद्धात्मक अप्तत्त्व १२८ चान्द्रपानी, और श्रद्धा १२६ श्रद्धासूत्रानुगत बन्धन १३५ " " ६७ हव्यवाहन अग्निदेव ६८ ग्राहवनीयानुगत व्रतग्रह्ण ६६ व्रतत्रिसर्जनत्राह्मण [ मूल ] [ ३-४-५-६- कण्डिका ] १०० मूलानुवाद, और पद्धतिसमन्वय १०१ उपाकर्म्म, उत्सर्ग - स्वरूपपरिचय १०२ व्रतग्रहण - व्रतविसर्ज्जन १०३ व्रतपति अग्नि १०४ सत्यप्रजापति, और व्रतोपायन १०५ सत्यमेव देवा:, अनृतं मनुष्याः १०६ सत्य - अनृत - स्वरूप १०७ अमृत - मृत्यु - स्वरूप १०८ मृत - मृत्यु - मय प्रजापति १०६ सदसन्मूर्त्ति ईश्वरप्रजापति " " " १३० श्रद्धात्मक उपासनाकाण्ड 33 १३१ श्रद्धामय पुरुष १३२ श्रद्धा के द्वारा चन्द्रलोकगमन १३३ श्रद्धानुगत ' श्राद्धकर्म १३४ पिण्डपितृयज्ञ, और श्राद्ध १३० १३१ १३५ सत्यानृतसमन्वय " १३६ सत्यप्रतिज्ञानुगति १३७ सत्यानुगत चक्षु " " १३२ " 71 १३६ " " 13 27 " १३७ १३८ चक्षु, और सत्य सूर्य्य १३६ अशनानशनमीमांसात्राह्मण ( मूल ) ( ७,८, ९, १०, कण्डिका ) " १४० मूलानुवादानुगत पद्धतिसमन्वय १४१ अमोत्तरा, पूर्णिमोत्तरा इष्टियाँ 33 १३८ १३ ९ " " " १४२ दर्श, और पौर्णमास ११० ईश्वरप्रजापति, और प्रजा १३३ १४३ उभयप्राथम्यमीमांसा १११ सत्यानृत्य की सर्वव्याप्ति ११२ चतुर्विध प्रतिमाप्रजापति ११३ परमप्रजापति का संस्मरण ११४ सत्य, और ऋत के लक्षण ११५. पिण्डात्मक शरीर ११६ अग्निमय वस्तुपिण्ड " " " " " " " ११७ सोमानुगत अग्नि की पिण्डता १३४ ११८ भूस्थान - अग्नि 23 १४४ शुक्ल - कृष्ण - पक्ष १४५ शास्त्रीय, और लौकिक व्यवस्था १४६ आचमन, व्रतोपायन, व्रतपालन १४७ आषाढऋऋषिसम्मत व्रतोपायन १४८ भुक्तान्न की रसमलानुगता सन्तचिति १४६ सप्तविध पार्थिवधातु १५० धातुचितिरूपा भूतचिति 27 77 १४० 37 27 १४१ " " १५१ आन्तरिक्ष्य श्रजधातु " ११६ पिण्ड, और मण्डल " " १५२ दिव्य - चान्द्र - मनोधातु १२० सत्य की ऋजुता, और दीपरश्मि " १५३ शिवसंकल्पात्मक मन १२१ ऋत के तीन महिमा विव " " १५४ मनःस्वरूपदिग्दर्शन १२२ अप्तत्त्व की ऋतरूपता १५५ मनः- प्राण - वाक रूप श्रात्मा १४२ " १४३ " १२३ सत्याग्नि, ऋतसोम १३५ १५६ चान्द्र सोममय मन १२४ सत्यानृत, और देव - मनुष्यप्रना १२५ महद्गर्भित जीवात्मा " १५७ देवयजनात्मक संकल्प 22 " १५ = संकल्पानुगत - ' उपवसथ ' 22 १२६ पाँचवीं आहुति, और पुरुष 12 १५६ अतिथिधर्म्म, और ' अनशन , 11 १०
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१६० वैकारिक आत्मा १६१ अधियज्ञ - संस्मरण १६२ ऋषि और पितर १६३ असुर, और देवता १६४ गन्धर्व, और वैश्वानर शतपथ - प्रथमखण्ड १४३ १६४ अनशन का निरोध १४६ 99 १६५ अशनानशन - समन्वय 33 " " १६६ देवप्राणशून्य अन्न 27 " " १६७ तदन्न को अशनानशनता १६८ पार्थिव प्रज्ञानात्मा १४७ 21 १६५ तत्त्वात्मक ऋषि आदि 17 १६.६ सौर - विज्ञानात्मा १६६ ऋषि - पितर- आदि मौलिक प्राण " २०० आत्मग्रामानुगत- ' अहम् ' 77 १६७ सौम्य पितरप्राण १६८ दिक्, और भास्वरसोम १६६ पारमेष्ठ्य, और चान्द्रसोम १७० पितृमण्डल १७१ चन्द्रोर्ध्वभाग, और पितर १७२ पृथिव्यनुगत पितृप्राण १७३ चान्द्रकक्षावृत्त, और पितर १७४ सौरप्राण की इन्द्ररूपता १७५ चन्द्रसहानुगत इन्द्र, और अमावास्या १७६ सिनीवाली, कुहू, और दर्श, 27 २०१ हेयोपादेयानुगत धर्म्मशास्त्र " २०२ ( क ) धर्म्मशास्त्रादेश निष्कर्ष " " २०२ ( ख ) शास्त्रातीत अखण्ड परात्परात्मा ” १४४ २०३ नित्य शुद्ध -बुद्ध - मुक्त - श्रात्मा " २ • ४ श्रुत्यर्थसमन्वय २०५ क्षरात्मनिरूपक धर्मशास्त्र १४८ " २०६ क्षरानुगत पञ्चविध यज्ञात्मा २०७ दैविक - श्रात्मिक - अनुबन्धी पञ्चात्मविवर्त्त 27 29 १७७ पितरों की कालव्यवस्था " २०८ क्षरानुगत ' अधियज्ञात्मा ' 23 17 २०६ भूतात्मा, और प्रज्ञागत्मा 73 २१० अङ्करोऽग्नि, और सावित्राग्नि १४६ १७८ मासानुगत पितरदेवता १४५ २११ श्रान्तरिक्ष्य चान्द्ररस १७६ पितृश्राद्ध के सम्बन्ध में " २१२ अन्नानुगत - ' वीर्य्यभाव ' 27 १८० श्रोषध्यनुगत चान्द्र पितर " २१३ अध्यात्मोपादान भूत वीर्य्यभाव 39 १८१ देवान्नभूत सोमराजा 72 २१४ प्रज्ञानात्मरूप क्षरात्मा 71 १८२ पृथिव्यनुगत सोम 71 २१५ प्रज्ञात्मक चान्द्ररस, प्राणात्मक पार्थिवरस् 23 १८३ अनशन, और पितृप्राण 22 २१६ प्रज्ञा, और प्राण की अभिन्नता " 11 २१७ सर्वाङ्गशरीरव्याप्त प्रज्ञानात्मा 27 " २१८ ऋतधर्म्मा प्रज्ञान, एवं सत्यधर्म्मा विज्ञान " " " १८४ शनाया, और शन १८५ अशनाया के द्वारा अन्नाकर्षण १८६ तिथिभेदभिन्न विभिन्न देवप्राण १८७ प्राणदेवानुगत उपवसथ १८८ उपवसथ, और ' उपवास ' १८६ सर्गप्रवर्त्तक - देवतागण १६० देवसाम्य, और शान्ति १६१ देववैषम्य, और अशान्ति १६२ देवप्राणग्रहणात्मक - उपवासकम्म १६३ देवकार्य्य का पितृदैवत्यत्त्व " 22 २१६ ऋतमूर्ति प्रज्ञान का प्रमुख कर्म्म २२० ऐन्द्रियक विषयप्रतिष्ठारूप प्रज्ञान २२१ सर्वेन्द्रिय- अनिन्द्रिय - निरिन्द्रिय- प्रज्ञान २२२ दर्शनशास्त्रसम्मत एकादश इन्द्रियवर्ग १४६ 99 २२३ श्रुतिशास्त्रसम्मत पञ्चेन्द्रियवर्ग १५० " " 17 " ११ २२४ ' इन्द्रिय ' का स्वरूप लक्षण २२५ ' मनःषष्ठानीन्द्रियाणि ' २२६ सर्वेन्द्रियाधिष्ठाता प्रज्ञानमन " 31 " 1
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विषयसूची २२७ वासनासंस्कारोक्थ प्रज्ञानमन २२८ संस्कारले लिप्त कर्मात्मा २२६ अन्नयज्ञानुगत कर्मात्मा १५१ 77 २५१ दैवकर्मानुगत नवीन प्रज्ञानदेवता २५२ प्रज्ञान, और विज्ञान का अविनाभाव १५२ 27 २५३ उपवसथ ह के अतिथि देवता १५३ २३० केशान्तानुगत विज्ञानात्मा 17 २३१ ब्रह्मरन्ध्र, और विज्ञानात्मा " " २३२ शिखा, और ब्रह्मरन्ध्र २३३ विज्ञानसंरक्षक - शिखात्मक यूप २३४ विज्ञान प्रतिष्ठात्मक प्रज्ञान २३५ प्रज्ञानप्रतिष्ठात्मक अन्न २३६ प्रज्ञानाधिष्ठाता विज्ञानात्मा २३७ विज्ञान के द्वारा प्रज्ञान का उद्बोधन २३८ विज्ञान, और प्रज्ञान में संघर्ष २३६ विजययुक्त - प्रज्ञान २४० प्रज्ञानविजय, और दुःखपरम्परा २४१ विज्ञानवृद्धि, और दुःखनिवृत्ति २४२ वेदविद्यानुगता विज्ञान वृद्धि २४३ ' घी ' का प्रेरयिता सविता २४४ पार्थिवदेवता, और प्रज्ञानात्मा २४५ सौरदेवता, और विज्ञानात्मा २४६ प्रज्ञानज्ञान, और शारीरिक कर्म्म २४७ विज्ञानज्ञान, और विचारधारा २४८ प्रज्ञान - विज्ञान - का पार्थक्य २४६ विज्ञानानुगता देवीप्रक्रिया, और ' यज्ञ ' २५० यज्ञाकर्षक नवीन प्रज्ञानदेवता 77 २५४ अकृष्टपच्या ओषधि, और उपवास २५५ अकृत्रिम ओषधि, और वनस्पति 27 २५६ सौरप्राणनिबन्धना वनस्पतियाँ 37 २५७ फलाशन, और उपवास " २५८ अशनानशन - मीमांसा " २५ आरण्यौषधि, और उपवास २६० दर्श, पौर्णमास का तारतम्य २६१ दर्शपूर्णमासात्मक अभिन्न यज्ञ २६२ द्रष्टा ऋषि के अभिप्राय पर दृष्टि " २६३ तदु होवाच याज्ञवल्क्यः " " २६४ ' बकु ' महर्षि की वैज्ञानिकी दृष्टि २६५ व्रतोपायनब्राह्मण ( मूल ) ( ११ वीं कण्डिका ) " २६६ मूलानुवाद २६७ गार्हपत्य की पृथिवी - रूपता 13 37 " १५४ 27 " 1 १५५ " " 17 १५२ " 33 1: २६८ आहवनीय की रूपता 37 २६६ यज्ञशालानुगत उभयविध देवता 22 22 २७० शालास्वरूपदिग्दर्शन 37 " 2 २७१ गार्हपत्यागार, और आहवनीयागार 27 " २७२ भृतलशयन, और व्रतपालन " " " २७३ व्रतोपायनकर्म्मस्वरूपोपराम 29 ( १ ) - व्रतोपायनकर्म्म से अनुप्राणित विषयों की स्मारक सूचो - उपरता १ १२
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शतपथ - प्रस्वमखण्ड ( २ ) — ' ब्रह्मवरणकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची-पृष्ठस ० १५५ से १७० पर्य्यन्त १ फाल्गुनी पूर्णिमोत्तरा प्रतिपत् अनुगता प्रथभा २६ बृहस्पति से प्रापोमय यज्ञ की प्रवृत्ति १५६ पूर्णमासेष्टि १५५ २७ वेदत्रयीमूलक यज्ञ " विकल्प २ दर्शपूर्ण मास के सम्बन्ध में त्रिविध . ३ तीनों विकल्पों में कामचार २८ वेदत्रयीन सूर्य्य " " .... १५६ २६ क्षत्रसूर्य्य - प्रतिष्ठित बृहस्पतिब्रह्म " " " ३० त्रिवेदमूर्ति यज्ञब्रह्मा " " 11 ४ अग्नीषोमीय-- पूर्णमास ५ अन्वारम्भणीयेष्ट्यादि सहकारी चार कर्म्म " ६ सन्निपत्योपकारक अवान्तर ३२ कर्म्म "! ३१ ब्रह्मवरणकर्म्म ही इतिकर्त्तव्यता ३२ दक्षिण भागस्थ ब्रह्मा ३३ ब्रह्मस्वरूपानुगता प्रश्नावली १६० १६१ " ७ ‘ पाङ ्मक्लयज्ञ ' का संस्मरण १५७ ३४ उत्तर में कठिनता " " ८ श्रङ्गभूत बहिरङ्ग, अन्तरङ्गकर्म्म ३५ परिभाषाबोध की विलुप्ति .... " " ६ पञ्चविध - कर्म्मसमूह १५८ १० व्रतोपायनकर्म्म के सम्बन्ध में तीन विकल्प ,, ११ प्रथमस्थानीय व्रतोपायन की सर्वमान्यता ३६ विभिन्न शास्त्रों की विभिन्ना परिभाषाएँ ३८ अत्यन्त ऋजु वेदशास्त्र ३६ मौलिक तत्त्वात्मक- '-'वेद ' १५६ ४५ वेद की ब्रह्मरूपता ४० यौगिकतत्त्वात्मक - ' यज्ञ ' " ३७ परिभाषाज्ञानाभाव में तत्त्व की दुर्बोध्यता १६२ " १२ सहकारी कर्म्मो के सम्बन्ध में दो मत १३ द्वितीय - दिवसीय - कर्म्म १४ ग्राहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि- कुण्ड -स्वरूप १५ सप्तदशस्तोमस्थ पार्थिव अग्नि १६ गार्हपत्याग्नि से आहवनीय में अग्नि का गमन १७ श्रपणाग्निस्वरूप - परिचय १८ हविर्यज्ञानुगता हविर्वेदि १६ आहुतिरधिष्ठाता मस्तक - स्थानीय ग्रह-वनीय " " २० ' ब्रह्मवरण " और यज्ञप्रवर्त्तक ब्रह्मा २१ पारमेष्ठ्य बृहस्पति की ब्रह्मरूपता 31 " ४२ कर्म्म की यज्ञरूपता ४३ ब्रह्माधार पर प्रतिष्ठित यज्ञ ४४ यज्ञकर्म्मप्रधान शतपथब्राह्मण ४५. यज्ञविज्ञाननिरूपक - शतपथ ४६ वेदसंहितानुगत - ब्रह्मविज्ञान ४७ शतपथ के सूत्रात्मक साङ्केतिक विषय 17 ४८ ब्रह्मविज्ञान विलुप्ति से शातपथीय - यज्ञिय-तत्त्वों की दुर्बोध्यता " " ४६ ब्रहाविज्ञानानुगता परिभाषाओं की अनुगति ५० परिभाषानुगत पुनरुक्तिदोष की क्षम्यता ५२ विद्वानों के लिए भी दुरूह वेदशास्त्र " " २२ आम्भृणीवाकपति वाचस्पति बृहस्पति " ५१ शतपथभाष्य का मूलोद्देश्य २३ रोदसीयज्ञ - संरक्षक बृहस्पति 27 २४ यज्ञगोप्ता ब्रह्मा २५ यज्ञ के प्रभव बृहस्पति ब्रह्मा " " 21 ५३ मादृश भाषामात्राभिज्ञ जनों के लिए वेद की निःसौमा दुर्बोध्यता " " " " " " " " " " " 21 १६३ १३