Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 181–190
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190
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विषयसूची ५४ विद्वानों से तटस्थता ५५ लोकसामान्यजन के प्रति अनुगति ५६ लोकानुगत - पारिभाषिक क्षम्य - विस्तार ५७ स्थिति, और गति का संस्मरण ५८ स्थिति से समन्विता गति, एवं गत्यनुगता स्थिति ... ५६ गतिशून्या स्थिति की गतिरूपता ६० स्थितिशून्या गति की स्थितिरूपता ६१ उदाहरण के द्वारा स्थित का समन्वय ६२ निरपेक्ष स्थितिगतिमत् ब्रह्म ६४ ‘ –अनेजदेकं -मनसो जवीयः ' ६४ ' तदेजति, तन्न ' जति ' ५५ उल्मुक के द्वारा स्थिति - गतिभावों का सम--नय ६६ पदार्थ माध्यम से तत्त्वसमन्वय १६३ ८६ अशनायासूत्राधिष्ठाता विष्णु १६६ 37 " " " ८७ इन्द्र, और ' महादेव ' दान, विसर्ग और प्रतिष्ठा दानाधिष्ठाता सृष्टिपालक विष्णु ६० विसर्गाधिष्ठाता सृष्टिसंहारक इन्द्रात्मक--महादेव 21 37 27 ६१ प्रतिष्ठाधिष्ठाता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा 77 11 ६२ यज्ञानुवन्धिनी सवनत्रयी 29 " १६४ " 29 " " ६७ द्विमल्लानुगता रज्जु के माध्यम से समन्वय १६५, ६८ तम: प्रकाश का अविनाभाव ६६ स्थिति - गति का अविनाभाव ५० ब्रह्म, और ब्रह्मा का समन्वय 77 ६३ सवनत्रयानुगता अवस्थात्रयी ६४ अवस्थाभेदनिबन्धना इन्द्राविष्णू की प्रति-स्पर्द्धा " " ६५ वाक् – वेद – लोक — साहस्रीत्रयी ६६ मृत्युस्वरूपदिग्दर्शन ६७ प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा का संस्मरण ६८ त्रिदेव की साम्यावस्था, और जीवन. ६६ त्रिदेव की विषमावस्था, और मृत्यु १०० सर्वत्र अनुभूता त्रिदेवतात्रयी १०१ ' एका मूर्त्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुम-हेश्वराः ' 37 १६७ 77 13 37 17 ७१ ' ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ७२ विश्वप्रतिष्ठात्मक स्थितिलक्षण ब्रह्मा ७३ पराक्, प्रत्यक रूप गतिद्वयविवर्त्त ७४ उभयात्मक गतितत्त्व का ' इन्द्रत्व ' ७५ याजुषी गति का संस्मरण ७६ ऋकुंसामानुगत यजुः का गतिरूपत्च्त्व ७७ ' यद् भावात्मिका गति, और इन्द्र ७८ उत्पवन - धर्म्मा इन्द्र ७६ परागिन्द्र, और इन्द्र ८० प्रत्यगिन्द्र, और विष्णु 77 १०२ ' अग्निर्वै प्रजापतिः ' 22 १०३ ' चन्द्रमा वै ब्रह्मा ' 27 31 १०४ शुद्ध सर्वादिगगति, और ' झा ' १०५ शुद्ध -- आंगति, और ' विष्णु ' १६६ १०६ शुद्ध - गति, और ' इन्द्र ' १६८ 77 27 22 31 १०७ स्थितिगर्भिता गति, और ' अग्नि ' 77 73 १०८ स्थिति गर्भिता आगति, और ' सोम ' 27 " १०६ स्थितितत्त्वमूलक पाँच विवर्त्त 27 " ११० ब्रह्मात्मक स्वतन्त्र - विवर्त्त 27 १११ इन्द्राविष्णू स्वतन्त्र - विवर्त्त 27 ८१ इन्द्र, और उपेन्द्र " ११२ अग्नीषोमौ- स्वतन्त्र विवर्त्त " " ८२ इन्द्र, और इन्द्रावरज ११३ हृदयावच्छिन्ना ब्रह्म ेन्द्रविष्णुत्रयी 27 ८३ इन्द्रात्मक इन्द्र, और उपेन्द्रात्मक विष्णु 99 ८४ श्रागतिभावानुबन्धी विष्णु ८५ गतिभावानुबन्धी इन्द्र ११४ पिण्डावच्छिन्ना अग्नि सोमद्वयी " ११५ हृदयशब्दानुगता हृ - द - य - अक्षरत्रयी ११६ ' हृदय ' शब्द का तात्त्विकार्थसमन्वय 27 " 17 १४
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११७ अक्षर - मिति त्र्यक्षरम् ११८ अव्यक्तप्रजापतिरूप ' अक्षरन्रह्मा ' - शतपथ - प्रथमखण्ड १६८ १२८ अग्निप्रधान - विन्ध्याद्रि ( विन्ध्याचल ) १२६ सोमप्रधान - हिमाद्रि ( हिमाचल ), ११६ अक्षरप्रजापति से क्षर विश्व का आविर्भाव १६६ १३० दक्षिणभागतः अन्नपरिपाक १६६ 73 " 21 १२० अग्नीषोमात्मक यज्ञमय विश्व १२१ यज्ञाधारभत ब्रह्मतत्त्व १२२ प्रथमज ब्रह्मा का यज्ञाधारत्त्व १२३ आधिदैविक - दक्षिणभागस्थ ब्रह्मा १२४ ब्रह्मानुगत अग्नि, सोम के समन्वय से यज्ञ-द्वारा विश्वस्थिति १२५ अग्नि की ब्रह्मरूपता १२६ अग्निमूला दक्षिणा - सृष्टि की कृष्णवर्णता १२७ सोममूला - उत्तरा - सृष्टि की गौरवर्णता " १३१ प्राप्यप्राण का असुरत्त्व " १३२ दक्षिणस्थ ब्रह्माग्नि के द्वारा असुरनिरोध " " और तदभिन्ना 32 .१३३ अग्निमूर्ति यज्ञगोप्ता ब्रह्मा, वेदत्रयी १३४ सान्तपनाग्निमूर्त्ति ब्राह्मण " 71 १३५ यज्ञ के दक्षिणभाग में आसीन ब्रह्मा " 17 १३६ ब्रह्मा का ब्रह्मत्त्वेन वरण १७० 11 १३७ ब्रह्मवरणकर्म्मोपपत्तिविराम 22 ( २ ) — ' ब्रह्मवरणकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची उपरत २ ( ३ ) – ' पांप्राणयनकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची पृ ० सं ० १७० से २०१ पर्य्यन्त १ अपांप्रणयनब्राह्मण ( मूल ) १० सौर सम्वत्सर यज्ञ के उपक्रमोपसंहारात्मक [ १२ वीं कण्डिका से २१ वीं पोभाव १७५ कण्डिका- पर्य्यन्त ] 21 ' ' ऋते भूमिरियं श्रिता ' २ मूलानुबाद सन्दर्भ १७१ १० ' यज्ञो वा आपः ' 37 ३ कातीयसूत्रानुगता अपांप्रणयनकर्मेति-कर्त्तव्यता का दिग्दर्शन १७४ ४ प्रणयनकर्म का अर्थसमन्वय १७५ 77 ५ यज्ञप्रारब्धा यजमान ११ पोमय परमेष्ठी की यज्ञरूपता १३ ' पुरि शेते ', और ' पुरुष ' १४ श्रालम्बन - निमित्त - उपादानत्रयी १५ क्षर - अक्षर श्रव्ययात्मा त्रयी 27 १२ षोडशकल षोडशीपुरुष का संस्मरण 21 27 27 " ६ यज्ञारम्भानुगत अपांप्रयणयन, एवं यज्ञ-समाप्त्यनुगत अपांनिनयन ७ प्राकृतिक - नित्य यज्ञ के उपक्रमोपसंहार, प्रणयन, और निनयन " १६ ‘ त्रयं सदेकमयमात्मा ' १७ ‘ त्रात्मा उ एकः सन्न तत्त्रयम् ' " १८ आत्मरूप विश्व १५ 13 १७६ 73
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१६ आत्मा के द्वारा निम्मित विश्व २० विश्व से तटस्थ आत्मा २१ ‘ आत्मैवेदं सर्वम् ’ १७६ विषयसूची ५२ ' अप एव ससर्जादौ 77 ५३ अच्मूलक संसर्गभाव १७७ १७८ 29 ५४ श्रब्रूगर्भित आग्नेय सूर्य्य " २२ ' सर्वं हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ' 29 ५५, आपोमय सरस्वान् समुद्र 11 29 २३ ' साक्षी चेता केवलः ' २४- तत्त्वमेददृष्ट्या श्रुतिवचनं - समन्वय २५ अक्षर, और क्षरप्रकृति का पुरुषत्त्वसमन्वय २६ ‘ ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ' २७ पञ्चकलोपेता - क्षरब्रह्म प्रकृति २८ अक्षरा के द्वारा क्षरात्मक चार मुखों से विश्वसर्गों का निर्माण २६ प्राणमुखानुगता - वेदसृष्टि ३० श्रापोमुखानुगता- लोकसृष्टि " ५६ भृग्वङ्गिरोमय पारमेष्ठ्य समुद्र ५७ ' तात्मक परमेष्ठी ' ५८ भृग्वङ्गिगेरूप- आपः- तत्त्व ५६ अग्निप्रधान अङ्गिरा ६० सोमप्रधान भृगु ६१ पोमय परमेष्ठी का यज्ञत्त्व ६२ ‘ अप् ’ तत्त्व की यज्ञरूपता 27 " " " " " 27 23 ६३ पारमेष्ठ्य - ‘ अम्भः ' तत्त्व " 29 ६४ अम्भः, और पत्रमान के रासायनिक सम्मि-३१ वाङमुखानुगता देवसृष्टि 72 श्ररण से प्रबुत्पत्ति 33 ३२ अन्नादमुखानुगता - भूतसृष्टि 17 ६५ पप्रणयन की प्रथमा उपपत्ति 77 ३३ देवता - भृत- भौतिक - रूपेण सृष्टित्रयी 19 ६६ प्रणयन के द्वारा यज्ञ का वितान 77 ३४ प्रजासृष्ट्यन्तर्भुक्ता - ' गोत्रसृष्टि ' 71 ६७ ' वितानयज्ञ ' की स्वरूपपरिभाषा 27 ३५ ' धर्म्मसृष्टि ' का संस्मरण ३६ वेदात्मिका ‘ ऋषिसृष्टि ’ का स्वरूप - दिग्दर्शन 37 ३७ सद्घन ऋषिप्राण की सद्र पता 23 ६८ वैध - मानुषयज्ञ का उदर्क 22 ६६ ऋतधर्म्मा अपतत्त्व 77 १७७ ७० वितानधर्म्मा तत्त्व 27 ३८ ‘ असत् ' नामक ' ऋषि ' तत्त्व " ३६ संसृष्टिमूला सृष्टि ४० ग्रन्थिबन्धन संस्पृष्ट ऋषिप्राण ४१ प्राणमयी सृष्टिरूपा सृष्टि ४२ अपौरुषेय - ब्रह्मनिःश्वसित वेद ४३ वेदात्मिका पौरुषेया मानसीसृष्टि ४४ स्वायम्भुव - यजुः प्राण का ऋषित्त्व ४५ ' शेषे यजुः शब्दः ' 77 ४६ ब्रह्माग्निरूप प्राणवायु का संक्षोभ " ४७ संक्षोभात्मक - घर्षण ४८ घर्षणजनित तत्त्व " " " 17 ४६ परिश्रमाग्नि- प्रेमाग्नि - शोकाग्नि से बुत्पत्ति " ५० ' उष्मा ' नुगता श्रापोमयी दृष्टि ५१ ' अग्नेरापः ' ७१ सत्याधार पर ऋत का वितान ७२ अपांप्रणयन की दूसरी उपपत्ति ७३ प्रणयन - साधक · यजुर्म्मन्त्र ७५ मन्त्र की अनिरुक्ता व्याहृतियाँ ७५ परोक्षभावसूचक अनिरुक्त शब्द - ७६ प्रकृतितन्त्राध्यक्ष ईश्वरप्रजापति ७७ निग्रहानुग्राहक —– प्रजापति ७८ प्रजापति का ब्रह्माएडरूप महाराष्ट्र ७६. राष्ट्रीया प्रजा के नाम - रूप - कर्म = ० सर्वसम्पत्यधिष्ठाता राष्ट्रपति ईश्वर ८१ प्रजापति के लिए हविः स्थापन 17 " " 17 १७६ 17 " 27 17 ८२ ' नाम ' - और - ' व्याहृति ' 27 ८३ निरुक्ता - व्याहृति, और मर्यादा ८४ प्रणयन - कर्मानुगता प्रनिरुक्ता व्याहृति 17 १६
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८५ अनिरुक्त- उद्गीथ - सर्व - शब्दों का संस्मरण शतपथ - प्रथमखण्ड १७६ ११६ पिण्डस्वरूपसम्पादक -- ' भूवायु ' ११७ भूवायु और - ' एमूत्रवराह ' ८६ अनिरुक्क - प्रजापति का स्वरूप - परिचय १८० ११८ भार्गववायु की शिवरूपता ८७ वस्तुपिण्डात्मकं स्पृश्यनगत् पद वस्तु मण्डलात्मक दृश्यजगत् चित्याग्निमय - वस्तु पिण्ड ६० चितेनिधेयाग्निमय वस्तुमण्डल ६१ महिमामण्डल का स्वरूप --दिग्दर्शन २ महिमामण्डलानुगत ३३ विभाग ६२ सहस्र गौरूप प्राणमण्डल ६४ सहस्रानुगत ३३ अहर्गण ६५ दशगौरूप चतुस्त्रिंश निरुक्तप्रजापति ६६ ' सर्वप्रजापति ' का स्वरूपपरिचय ६७ त्रयस्त्रिंशदर्हगणात्मक मण्डल का केन्द्र सप्तदशस्तोम ६८ सप्तदशमूर्त्ति - ' उद्गीथप्रजापति ' ६६. ' सर्वमु ह्येवेदंं प्रजापतिः ' " " " " " " 27 " ११६ श्राङ्गिरस वायु की रुद्ररूपता १२० सातों लोकों की अबरूपता " १२१ शुक्र की आपोरूपता १२२ ‘ आपः पुरुषवचसो भवन्ति ' १२३ पञ्चाग्निविद्यामूला अपसृष्टि १२४ ' पुरुष एवेदं सर्वम् ' १२५ अप्प्रधान भौतिक — शरीर १२६ पृथिव्यनुगत आपः की बहुलता १२७ भूपिण्ड की अब्रूरूपता १८१ १२८ श्रापोमय- पुष्करपर्ण " " 39 १२६ ' सर्वमापोमयं जगत् ' १३० ‘ अद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् ' १३१ अपांप्रणयन की चौथी उपपत्ति १३२ प्रकृतियज्ञानगत नैमय1 १०० ' प्रजापतिः सर्वमसृजन ' १०१ अपांयनकी प्रतिष्ठा ब्रह्मा १०२ अनिरुक्त ब्रह्मा का मूल प्रतिष्ठात्त्व १०३ ' अनिरुक्तो वै प्रजापतिः ' १०४ अपांप्रणयन की तीसरी उपपत्ति १०५ अपतत्त्व की सर्वव्याप्ति १०६ विश्व की आपोमयता १०७ ' आप ' का तात्त्विक स्वरूप -- परिचय १०८ गाङ्ग ेय, और श्रम्भः श्रापः १०६ ऋतसमुद्रमूर्त्ति परमेष्ठी ११० सरस्वान्, और सरस्वती १५१ ऋततत्त्व की सर्वव्यापकता ११२ ‘ ऋतं तपसोऽध्यजायत ' ११३ पिण्ड की बहि: सीमा, और अपतत्त्व ११४ ऋतवायु के द्वारा पिण्ड का वेष्टन ११५ प्रत्यक्षानुभूति के द्वारा ऋत की सर्वव्याप्ति का साक्षात्कार " " " 27 23 १३३ प्राणतत्त्व की मौलिकता • ३४ यज्ञविद्या के प्रथमप्रवर्त्तक भौमदेवता १३५ ऋषि के द्वारा यज्ञविद्या की प्रतिष्ठा १३६ नित्ययज्ञ के प्रतिकृतिविवर्त्त १३७ ब्राह्मणोक्ता आर्ष - यंज्ञपद्धतियाँ १८२ १३८ ' यद्वै देवा श्रकुर्वस्त तूकर वाणि ' 37 " 31 १३६ काल्पनिक पद्धतियों से यज्ञ का अभिभव १४० सत्यसंहित मानव की सावधानी १४१ प्रज्ञापराधवश यज्ञसन्तान की विच्छित्ति १४२ यज्ञसंघनानगत पांप्रणयन १४३ अपप्रणयन की पाँचवी उपपत्ति १४४ प्रकृतियज्ञानुगत अपांप्रणयन का प्राथम्य १४५ यज्ञ का साधारण लक्षण १४६ प्रचण्डतापानगत सूर्य्यनारायण १८३ १४७ इन्द्राग्नी की समष्टि - रूप सूर्य II १४८ तापप्रवर्त्तक अग्नि, प्रकाशप्रवर्त्तक इन्द्र १४६ श्राप्यप्राणात्मक वाण असुर
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१५० नत्रतीव सुर १५१ सुरराजा वरुण १५२ यज़पति इन्द्रदेवता १५३ इन्द्र, और वरुण का अश्वमाहिष्य १५४ अग्नि - इन्द्रात्मक - सौरमण्डल की यज्ञरूपता १५५ सौरयज्ञान्न की पारमेष्ठ्य सोमरूपता १५६ आपोमय पारमेष्ठ्यमण्डल के गर्भ में भुक्त बृहत्साममय सूर्य्य 11 १५७ पारमेष्ठ्यसमुद्र का एक बुदबुदात्मक सूर्य्य 11 १५८ सौरमण्डलानुगता नीलिमा का आपोमयत्त्व " 7 १५६ सौरमण्डल पर वारुण पानी का सतत श्राक्र मण १६० महिमामण्डलात्मक सौरमण्डल की कूर्म्म-रूपता १६१ अब्रूगर्भस्थ- कूर्म्मप्रजापति १६२ आपो वायुः सोमात्मक- परमेष्ठी १६३ श्राप्न्यप्राणात्मक असुर १६४ वायव्यप्राणात्मक गन्धव १६५ सौम्यप्राणात्मक - पितर १६६ वायु की अध्वर्युरूपता १६७ प्रकाशाधिष्ठाता देवदेवता विषयसूची १८७ १८१ श्रद्धामयी श्रापः, और सोम 17 १८२ श्रद्धा की अब्रू रूपता 21 71 27 77 १८३ ' आपो ह्यस्मै श्रद्धां संनमन्ते ' इत्यपांप्रणयनोपपतिः - * -अथ अपां सादनोपपत्तिः १८४ पांसादनक का स्वरूप- परिचय १८५ गार्हपत्यसादनानुगता विप्रतिपत्ति १८६ योषात्मक आपोद्रव्य, एवं वृषात्मक अग्नि E 17 १६० " 1 " " १८७ स्त्रीप्राणात्मिका योषा एवं पुरुषप्राणात्मक वृषा 27 37 १८८ ' योषा ' शब्द का तात्त्विक निर्वाचन 77 १८६ योषाप्राणप्रधाना स्त्रीसृष्टि 37 १६.० वृषाप्राणप्रधाना पुरुषसृष्टि 13 13 77 १६ ९ योषा वृषा - के दाम्पत्य से प्रजनन 11 १८८ १६२ शुक्रानुगत पुभ्र णात्मक वृषाप्राण 22 " 31 १६३ शोणितानुगत स्त्रीभ्रूणात्मक योत्राप्राण १६४ भ्र दाम्पत्य से ही प्रजोत्पत्ति १६५ भ्रूणाभिभूति में शुक्र - शोणित के दाम्पत्य की व्यर्थता १६.१ " 1 77 27 १६८ अन्धकारानुगामी त्रारुण - असुर १६६ यज्ञारम्भकाल से पारमेष्ठ्य वारुण - असुरों का यज्ञ पर आक्रमण www. १७० श्रसुरप्राण की - ' राक्षस ' रूपता १७१ सौररश्मिप्रत्याघात से असुरपराभव १७२ ‘ विषस्य विषमौषधम ' . १७३ अत्राधिकार के द्वारा असुर- पराभव १७४ रश्मियुक्त पवित्र अपतत्त्व की वज्ररूपता १७५ अपांप्रणयनकर्म की ६ ठी उपपत्ति १७६ आध्यात्मिक प्राणानुगता - कर्म्मसम्पत्ति १७७ आध्यात्मिक प्राणदेवता - परिचय १७८ प्राणदेवता प्रेरक सवितादेवता १७६ सविता प्रेरणामूलक मनोव्यापार १८० ' सविता वै देवानां प्रसविता ' 31 १६६ भ्रूणाभिभव के आठ दोष 71 १६७ अष्टदोषनिर्त्तक वेदशास्त्र 77 " १६ योषा - वृषा - प्राण - समन्वयानुबन्धी दाम्पत्य के कतिपय उदाहरण १६६ पुराणशास्त्रानुगत प्राणनिबन्धन - दाम्प-त्याख्यानों का समन्वय २०१ सर्वविद्याधिष्ठात्री ब्रह्मविद्या 17 27 १६२ " " 17 २०२ आग्नेयप्राणनिबन्धन योषातत्त्व " १८६ २०३ सौम्यप्राणनिबन्धन योषातत्त्व २०४ आर्द्रा ', और शुक्र तत्त्वों की व्यापकता 97 २०५ स्त्री - पुरुष - स्वरूप - परिचय 77 23 " २०६ प्रजापतिपुरुष के अद्ध - श्रद्ध - भाग से नर-नारी की अभिव्यक्ति २०७ स्वयम्भू प्रजापति के दाम्पत्य से उत्पन्न योषा-वृषा - रूप अङ्गिरा, और भृगु 77 १६३ " " " १८
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२०८ अग्नित्रयीरूपा श्रङ्गिरात्रयी २०६ सोमत्रयीरूपा भृगुत्रयी २१० उभय - दाम्पत्य से ‘ विराट्पुत्रोत्पत्ति ' २११ विराट् का हिरण्यगर्भत्त्व २१२ सृष्टि का प्रथम व्यक्त प्रजापति हिरण्यगर्भ २१३ ‘ विराजमसृजत् प्रभुः २१४ क्रन्दसीत्रिलोकी के योषा वृषा शतपथ - प्रथमखण्ड १६.३ २३८ चन्द्रप्रधाना स्त्री " २३६ ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ' " " " " १६४ 99 २१५ योषा के समन्वय से ऋतु का आविर्भाव " २१६ ऋतु से सम्वत्सर का आविर्भाव " " २१७ योषाप्राणात्मिका स्त्री की कामशक्ति २१८ वृषाप्राणात्मक पुरुष की कामशक्ति २१६ स्त्रीकाम की अष्टगुणाधिकता " " २२० भुक्तान्न के अष्टम धातु में पुरुष काम का उदय २२१ भुक्तान्न के प्रथम धातु में ही स्त्रीकाम का उदय २२२ पुरुषेच्छानुगत ' स्त्रीकाम ' २२३ स्त्री- इच्छानुगत ' पुरुषकाम ' " २४० अविचारितरमणीय आक्षेप, और तन्निरा-करण २४१ भोक्तृगर्भित भोग्य की स्वतन्त्र सत्ता का अभिभव २४२ ' अत्तैवाख्यायते, नाद्यम् ' २४३ त्रैलोक्यानुगता प्राणत्रयी २४४ प्राणत्रयी के तानूनपत्र से उत्पन्न योगज अग्नि २४५ ' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' " २४६ अन्नपरिपाकाधिष्ठाता वैश्वानराग्नि २४७ वैश्वानराग्नि की पुरुषरूपता २४८ प्रामदेवताओं के द्वारा पुरुषपशु का संग्र-• हण २४६ पञ्चविध पाशुकाग्नि १६५ " १६६ 11 22 29 " 27 " " १६७ 29 11 " " " " २५० सोमानुगत वामतत्त्व, और ' वामा ' " } २२४ मकरध्वज कामदेव, और स्त्रीतत्त्व 99 २५१ पुरुष का वामभागत्मक ' स्त्रीत्व ' " " २५२ सत्रल अग्नि, और निर्बल सोम 27 " २५३ सौम्या स्त्री का श्रवशत्त्व " " २२५ मीनध्वत्र कामदेव, और पुरुषतत्त्व २२६ पारस्परिक इच्छा का समन्वय २२७ गार्हपत्याग्नि की वृषारूपता २२८ यज्ञद्वारा अपेक्षित देवात्मप्रजनन २२६ ( क ) योषा - वृषा - मूलक - प्रजनन २२६ ( ख ) गाईपत्य की गृहरूपता २२६ ( ग ) गृहानुगत सछन्दस्क दाम्पत्य २३० अपांसादन की महत्त्वपूर्ण उपपत्ति २३१ आहवनीयोत्तरभाग में अपांसादन २३२ योषा का वृषा के उत्तरभाग में हीं प्राकृतिक अवस्थान ... २३३ मिथुनस्वरूप सम्पादक अपांसादन २३४ प्राकृतिक - मिथुनभाव २३५ स्वतन्त्रान्नादाग्नि से पुरुषाविर्भाव १६५ २५४ दायादानधिकारिणी स्त्री " " 99 २५५, ' न द यादस्य च नैशत ' 33 २५६ श्राज्यरूप आग्नेय बज्र " " २५७ उत्तरदिशानुगता सौम्या श्रोषधय " " २५८ दक्षिण दिशानुगता आग्नेयी ओषधियाँ " " २५६ उत्तरानुगत सौम्य हिमालय १६८ 27 २६० दक्षिणानुगत आग्नेय विन्ध्यालय " २६१ शय्यारूद पति के दक्षिणचरण का प्राधान्य 77 91 13 27 २६२ शय्यारूढा पत्नी के वामचरण का प्राधान्य २६३ दक्षिणोत्तर - भागानुबन्धी कतिपय - प्रत्यक्ष-निदर्शन २६४ पुरुषात्मक ग्राहवनीयाग्नि २३६ परतन्त्रान्नषोम से स्त्री का श्राविर्भाव २३७ सूर्य्यप्रधान पुरुषात्मा 03 २६५ पत्न्यात्मक - अपतत्त्व 21 २६६ उत्तरानुगत – अप्तत्त्व १६ " " " "
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२६७ उत्तरानुगता पत्नी के द्वारा पुत्रप्रसूति २६८ प्रथमा कन्यासन्तति से वंशोच्छेद- सम्भा-वना, एवं तन्निरोधक पु ंसवन २६६ शुक्र - शोणितात्मक गर्भ की अवस्थाएँ २७० रेत के आधिक्य में पुत्रसन्तति २७१ शोणित के आधिक्य में कन्यासन्तति २७२ साम्ये नपुंसकसन्तति २७३ ‘ जातसंस्कारचाधायोगात् ' विषयसूची १६८ २७७ श्राहवनीयाग्निमय वृषात्मक विद्युद्भाव २७८ विजातीय प्राणसमावेश से मिथुन की उत्क्रान्ति १६६ २७६ आत्महनन - प्रपुक्तदोष २८० पांसादनमूला अवधानता २८१ अग्निनिबन्धन रुद्रप्राण २०० 11 11 २८२ अप्सादनसे रुद्र की शिवरूप में परिणति 99 २-३ शिवभाव के द्वारा प्रजोत्पत्ति २०१ 21 २७४ पुसंवन का पुंसवनत्त्व २७५ ' पुमान् सूयते - श्रनेन ' २७६ ‘ उत्तरतो हि स्त्री पुमांसमुपशेते ' २०० २८४ दाम्पत्यानुगता अङ्ग - सङ्ग - मय्र्यादा २८५ पांसादनोपपत्ति - विराम इत्यषां सादनोपपत्तिः ( ३ ) -अपांसादनानुगत - ‘ अपां प्रणयनकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक सूची उपरत प्रथमकाण्डानुगत प्रथमाध्याय का प्रथम ब्राह्मण प्रथम प्रपाठक एवं प्रथम ब्राह्मण अत्र उपरत १ "
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शतपथ - प्रथमखण्ड प्रथमकाण्डानुगत - प्रथमाध्याय का द्वितीय ब्राह्मण एव प्रथमप्रपाठक का द्वितीय ब्राह्मण उपक्रान्त II ( ४ ) - परिस्तरणानुगत पात्रासादनकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची पृ ० सं ० २०१ से २४ पर्य्यन्त १ परिस्तरणानुगत पात्रासादनब्राह्मरण ( मूल ) [ प्रथम ब्राह्मण की २२ वीं, तथा द्वितीय ब्राह्मण की प्रथम कण्डिका ] २०१ २८ युग्मपात्रों का संस्मरण २६ शूर्प स्वरूपरिचय ( १ ) २०४ 13 ३० अग्निहोत्रहवणीस्वरूप - परिचय ( २ ) २०५ ३१ ' स्पय ' -स्वरूप - परिचय ( ३ ) " २ मूलानुत्र द २०२ ३ यज्ञपात्रों की आयुधरूपता ३२ कपालस्वरूप - परिचय ( ४ ) ४ असुरत्रिनाशार्थ अपेक्षित आयुध " " २०६ " 0 ५. यज्ञपुरुषरूप सेनापति योद्धा ६ यज्ञस्वरूपसम्पादक यज्ञपात्र ७ पात्रों के द्वारा यज्ञ की अनग्नता ८ केवल त्वचायुक्त पुरुष ६ त्वचा, और चर्म्म -युक्त पशु १० चर्म - स्थानीय वस्त्र परिधान ११ निकृत्यचम्म मानव १२ त्वचा, और चर्म का पार्थक्य १३ ज्ञानमात्रा से वञ्चित पशुवर्ग १४ ज्ञानमात्रा से समन्वित मानवर्ग १५ वस्त्रशून्य मानव की नग्नता १६ यज्ञपुरुष की नग्नता १७ परिस्तरण के द्वारा अनग्नता १८ विशेषभावापन्न यज्ञपुरुष १६ विशिष्ट यज्ञिय - वस्त्र २० ' तृणैः परिस्तृणाति ' २१ ' यज्ञिया वै दर्भाः ' २२ दर्भतृणों की यज्ञरूपता २४ प्रथमपरिस्तरणानुगत श्राहवनीय मुख २३ कुण्डत्रयानुगत दर्भास्तरण २५ दर्भों का उत्तराग्रक्रम २७ युग्मरूपेण पात्रासादन २६ गार्हपत्यानुगत परिस्तरण " " 1 २०३ " ३३ शम्या स्वरूप- परिचय ( ५ ) ३४ कृष्णाजिन - स्वरूप - परिचय ( ६ ) ३५ उलूखल - स्वरूप - परिचय ( ७ ) ३६ मुसल स्वरूप परिचय ( 5 ) ३७ दृषत्- स्त्ररूप -- परिचय ( 8 ) ३ = उपल - स्वरूप - परिचय ( १० ) ३६ दश पात्र, और दशाक्षरा विराट् " " ४० ' दशाक्षरा वै विराट्र ' " " " " " " 1. ४१ यज्ञानुयायियों की योगक्षेमचिन्ता ४२ यज्ञानुगता श्रद्धा ४३ विज्ञान समन्वयाभावमूला श्रश्रद्धा ४४ देवयुगीया श्रद्धा ४५ बृहस्पति के द्वारा श्रद्धा की अभिव्यक्ति ४६ विद्युद्भावापन्न यज्ञिय - कर्मकाण्ड ४७ निदान, रहस्यादि ग्रन्थों की विलुप्ति ४८ काल्पनिक पद्धतियों का विजृम्भण ४६ शतपथानुगता वैज्ञानिकी परिभाषाएँ ५० परिभाषानुगत क्षम्य विस्तार " " ५१ बिराट् - यज्ञ का संस्मरण " ५२ श्राधिदैविक देवताओं से विश्वोत्पत्ति " २०७ 19 29 27 10 27 " २०८ " " " 37 " 1 २०६ २०४ " ५३ दैवत - श्रात्मिक - भौतिक- तन्त्रों का सम-तुलन " " ५४ ' यज्ञसम्पत् ' - स्वरूप - परिचय " " " ५५ अधिदेवत- प्राणप्रान्त्यर्थ अभिभूताश्रय , " २१
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विषयसूची ५६ भौतिक पदार्थों की मध्यस्थता २१० ५७ सम्बन्धप्रवर्त्त'क ' छन्द: ' 11 ५८८ छन्द से छन्दितं पदार्थ 11 ५६ छन्दोभेद से देवता भेद 19 ६० छन्दों से छन्दिता देवतात्रयी 31 ६१ छन्दों से छन्दित ३३ देवता ६२ ' अग्निः सर्वा देवताः ' ६३ परिमाणविशेषात्मक छन्द ६४ आकार, वर्णात्मक द्विविध रूप ६५ त्वष्टाप्राणनिबन्धन आकाररूप ६६ इन्द्रप्राणनिबन्धन वर्णरूप ६७ वर्णरूपाधिष्ठाता - ' मघवा ' इन्द्र ६८ सप्तवर्णात्मिका सूर्य्यरश्मि ६६ श्वेतवर्णनिबन्धना सप्तरश्मि ७० क्षेत्रविषमानुगत रँग - पार्थक्य ७१ सप्ताश्व का सप्तवर्ण से पार्थक्य ७२ क्रान्तिवृत्तानुगत भूपिण्ड का परिभ्रमण ७३ मध्यस्थ- ' बृहतीछन्द ' ७४ बृहतीछन्द की विष्वत्तता ७५ ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' ७६ बृहतीछन्द के दक्षिणानुगत तीन वृत्त ७७ बृहतीछन्द के उत्तरानुगत तीन वृत्त ७८ ४८ शात्मक परिसर ७६ सतवृत्तात्मक सप्त अश्व ८० सूर्य का हिरण्मय रथ ८१ सप्ताश्वों की सन्त छन्दोरूपता ८२ सप्तछन्दों की अक्षरसम्पत् ८३ वर्णरूपात्मक ' त्रयो ' भाव ८४ ' वयो ' भावानुचन्धी नाम - रूप - कर्म ८५ आकारात्मक छन्द की छन्दोरूपता ८६ मोनाधात्मक छन्दोभात्र ८० वय, वयोनाध, और वयुन वापीकूप समुद्र घट - सरोवर आदि छन्दोभेट से अप् का पार्थक्य १ " " ८६ मापदण्डात्मक छन्दोभाव ६० मात्रातारतम्य, और पदार्थस्वरूप ६१ छन्दोभेदमूलक देवताभेद ६२ छन्दः सम्पत्ति से समन्वित पदार्थ ९.३ नाम - रूप - कर्म्म - समष्टिरूप पदार्थं ६४ छन्दसे छन्दित पदार्थ ६५ पदार्थों का मनः प्राणवाङमय आत्मा 12 ६६ ‘ आत्मैवेदं सर्वम् ’ " ६७ मन: - प्राण - वाक का अविनाभाव ६८ ' वाक् ' की स्थूलरूपता ६.६ वागुरूप - ' आकाश ' तत्त्व १०० मनःप्राणमय आत्मा से वागाकाश की प्रसूति १०१ वागाकाश से अप्तत्त्व की प्रसूति २१३ , " 27 21 17 " 17 11 19 १०२ वायुरूप अपूतत्त्व 11 १०३ वायव्य श्रृप्तत्त्व से अग्नि की प्रसूति 11 १०४ अग्नि से प्रप्तत्त्व की प्रसूति 19 १०५ प्तत्त्व से भूपिण्ड की प्रसूति २११ १०६ मनः - प्राण- गर्मिता वाक् की पञ्चभूतरूप में " परिणति १०७ वाङमय पदार्थों की पञ्चभूतात्मकता १०८ वागगर्भित क्रियायय प्राणतत्त्व " १०६ प्राणगर्भित ज्ञानमय मनस्तत्त्व " 17 २१४ 17 17 17 ११० ' शृणोतु ग्रावारणः ' और चैतन्य की व्याप्ति, १११ ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' ११२ वाक् की मनःप्राणवागुरूपता ११३ नामरूपकर्म्म से अभ्भिन्न मनःप्राणवाक ११४ ' वाकपरिमाणं छन्दः ' २१२ ११५ छन्दोलक्षण का समन्वय 99 " 11 17 II " ११६ इन्द्रपत्नीरूपा छन्दः प्रवर्त्तिका वाक् 11 ११७ ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' " 17 ११८ शब्द और अर्थ का तादात्म्य 17 " 7 ११६ पार्वती - परमेश्वर का अभेद १२० शब्द की पञ्चभूतव्यापकता १२१ शब्दाविर्भावानुगता वीचियाँ २१५ II
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१२२ शब्दोत्पत्ति के तीन कारण १२३ वायुः समन्वित शब्द १२४ पिण्डानुगत वायुधरातल १२५ आकाशगत वायु का संघात १२६ वायुःसंघातजनित शब्द १२७ आघातयुक्त संयोग, और शब्द शतपथ - प्रथमखण्ड २१५ १५६ पारमेष्ठिनी ‘ आम्भृणीवाक् ’ १५७ सौम्यप्राणप्रधाना सरस्वती १५८ आग्नेयप्राणप्रधाना आम्भृणी २१६ 20 " " " " १६६ अर्थाधिष्ठात्री - आम्भृणी 33 १६० शब्दाधिष्ठात्री - सरस्वती " " " " १६१ परा - पश्यन्ती - मध्यमा - वैखरी - भेदभिन्ना १२८ संयोगज - विभागज, और शब्दज शब्द " 1 शब्दवाक् २२० १२६ ध्वनिरूपा वाक़ के उदाहरण " १६२ वर्णविभागाध्यक्ष - ' इन्द्रदेवता ' 19 १३० वर्णविभागात्मिता वाक् 19 १६३ सरस्वतीवाक् की ध्वन्यात्मकता १३१ ' तस्माद् ध्वनिः शब्दः " " 1 १६४ वीणावादिनी सरस्वती १३२ ' तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ' १३३ ' वायुः खात् शब्दस्तत् ' १३४ ' वागर्थाविव सम्पृक्तौ ' २१६ १६५ ध्वयात्मिका पारमेष्ठनी वाक् १६६ परमेष्ठी विष्णु, और कृणावतार 11 " " १६७ पारमेष्ठ्य कृष्ण, और वंशी - ध्वनि १३५ शब्दार्थ का औत्पत्तिक – सम्बन्ध .. १६८ घनावस्थापन्न अरा का अग्नित्त्व १३६ ' सर्वे सर्वार्थवाचकाः ' १३ ~ न्यायशास्त्र का ' सङ्क े तसम्बन्ध ' १३८ वृद्धव्यवहारमूलक सङ्केतसम्बन्ध १३६ पञ्चविध प्राकृतात्मा १४० प्राकृतात्माओं की मनःप्राणवाङ् मयता १६६ अग्निनिबन्धना वर्णवाक् " " 21 39 १७० मन्द - मध्य - तार - स्वरानुगता आग्नेयी वर्णवाक् " १७१ गायत्री -निबन्धन मन्दस्वर " " '७२ त्रिष्टुप् - निबन्धन - मध्यस्त्रर १७३ जगती - निबन्धन - तारतस्वर " " " " २४१ मुक्तिसाक्षी त्रिपर्वा ज्ञानात्मा १४२ सृष्टिसाक्षी त्रिपर्वा कर्मात्मा १४३ कर्म्मब्रह्म, एवं कर्म्मब्रह्म १७४ प्रातरनुगता भष्टावयवा गायत्री २२१ १७५ मध्याह्नानुगता एकादशावयवा त्रिष्टुप् " " १७६ सायं श्रनुगता द्वादशावयवा जगती " 19 १४४ ब्रह्म का श्रोत प्रोतभाव १७७ गायत्री सावित्री, और सरस्वती 39 " १४५ ' त्याग ' का काल्पनिक समन्वय १४६ सांख्य, और कर्म २१८ १७८ वर्द्धिष्णु गायत्रतेज [ [ " १७६ गायत्रादि तेजों से समन्विता त्रैवर्णिक - प्रजा " " " १४७ कर्म्म, और कर्म का समन्वय १८० छन्दस्क - चतुर्थ वर्ण " " " 3 १४८ अमृत, और मृत्यु का अविनाभाव १८१ गायत्री, और ब्राह्मण " " " १५६ ' सत्यावांकू ' और स्वयम्भू १५० स्वयम्भू, और वेदवाक् १५१ परमेडी, आर ‘ सरस्वतीवाकू ' १५२ सूर्य्य, और —— बृहतीवाक् ‘१५.३ चन्द्रमा, और ‘ सुब्रह्मण्यावाकू ' १५४ पृथिवी, और ' अनुष्ठु ब्वाक् ' १५५ चान्द्र - कृष्ण - ब्रह्मा १८२ त्रिष्टुप्, और क्षत्रिय " १८३ जगती, और वैश्य " " " १८४ प्राणास्तरणरूप श्राचमन " " " " " १८५ छन्दोभेद से आचमन में प्रकारभेद " २१६ " " १८६ आचमन के सम्बन्ध में अर्वाचीन वेदभक्तों की कल्पना १८७ वेदविरुद्धा मान्यता २२२ 20 २३