Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 191–200

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200

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विषयसूची १८८ काल्पनिक - मान्यताओं से वेदार्थ की अभिभूति २२२ १८६ छन्दोऽनुगत तीन सवन १६० सवनानुगता शब्दोच्चारणमर्य्यादा १ ९ १ सवनानुगता - स्वरमय्र्यादा १६२ सत्रनानुगता - रागगानमर्य्यादा १६३ स्वरोऽनुगता छन्दोमर्यादा के सम्बन्ध में भगवान् पाणिनि 31 १६४ शब्दप्रपञ्च के जनक अङ्गिरा १६५ शब्दोच्चारण से अग्निमात्रा का क्षय १६६ अङ्गिरा - प्रधाना सरस्वती वाक १६७ भृगु - प्रधाना आम्भृणीवाक् १६८ आम्भृणी से सर्वभूतोत्पत्ति १६६ आपो वै सर्वे देवाः २०० ‘ आपो वै सर्वाणि भूतानि ' २२३ 11 २१६ वर्ण, और क्षर २२० शब्द एवं परब्रह्म की अभिन्नता २२१ मोक्षमाणानामजिह्या राजपद्धतिः २२२ शब्दप्रयोक्ता की स्वर्गावाप्ति २२३ ‘ जपात्सिद्धिः ' का समन्वय २२४ शब्दवाङमय - ‘ शब्द च्छन्द ' २२५ अर्थवाङमय ' अर्थच्छन्द ' २२४ २२६ शब्द, और अर्थानुगत ' अक्षर ' शब्द " 27 27 " २२७ गाय छन्दस्क भूपिएड, एवं उसके अर्थात्मक आठ अक्षर ( अवयव ) २२८ महाभारतानुगता अर्थात्मिका चतुर्विंशत्यक्षरा लोकगायत्री २२६ ‘ सर्वं शब्देन भासते ' 57 २३० विषयावच्छिन्न शब्दज्ञान · 27 २२६ 21 29 17 17 २२७ 31 27 २२८ २०१ परमेष्टी की द्विविधा वागधाराएँ २०२ शब्दब्रह्म, और अर्थब्रह्म का समतुलन २.३ ‘ अकारो वै सर्वा वाक् 37 " २३१ शब्दावछिन्न विषयज्ञान २३२ अर्थवागरूंप यज्ञिय पदार्थ २३३ शब्दवाग्र् प यज्ञिय मन्त्र 77 27 " २०४ वैदिक - वर्णमातृका " " २३४ गायत्री छन्द की अष्टावयवता २०५ वेदवाङमय ब्रह्मा 77 २३५ आत्मा, पक्ष, पुच्छानुगत गायत्रीछन्द २०६ऋक्और साम की छन्दोरूपता 23 २०७ यजुर्वेद का तात्त्विक स्वरूप २०८ छन्द से छन्दित यजुर्वेद २०६ पञ्चभावापन्न स्थितितत्त्व की सर्वव्याकता का समन्वय २१० परमब्रह्मात्मक अर्थब्रह्म से समतुलित शब्द-ब्रह्म २११ अ इ उ ऋ ल नामक शब्दाक्षर २१२ ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र अग्नि- सोम नामक अर्थाक्षर " २१३ स्पर्शानुगत - सौम्य प्रयत्न २१४ ऊष्मानुगत - श्राग्नेय प्रयत्न २१५ स्पर्शोष्मानुगता - अर्थसृष्टि २१६ सोमाग्न्यनुगता अर्थसृष्टि २१७ स्फोट, और अव्यय २१८ स्वर, और अक्षर २२५ 17 २३६ गायत्र्यनुगत पुच्छ, र पुच्छस्क पुरुष २३७ त्रिकास्थिगत पुच्छ प्रतिष्ठाप्राण २३८ वानरमूला प्रतीच्या पुन्छ भ्रान्ति २३६ डारविन का काल्पनिक सिद्धान्ताभास २४० सप्तमर्त्य प्राणों का श्रीभाग २४१ अमृतरसात्मिका श्री:, और शिरः २४२ ' प्रादेशमितः प्राणः ' 29 २२६ " " 17 " २२६ २४३ सार्द्ध दशाङ्ग लिमित प्राण 17 २४४ अष्टप्रादेशात्मक - गायत्री छन्द 99 २४५, चतुरशीतिरङ्ग ल मानव 17 २४६ गायत्री की आठ व्याहृतियाँ " २४७ भौतिक छन्द के द्वारा प्राणछन्द का परिग्रह " " 77 २४८ मुख से विनिःसृत अक्षरों का अन्तरिक्ष में चिनाव २४६ शब्दात्मिका उपास्यमूर्ति 27 २३० " II

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शतपथ - प्रथमखण्ड २५० दृढभूमित्त्व के अन्यतम प्रकार २५१ भूतछन्द के द्वारा देवच्छन्द का अनुग्रह २३१ २८० शप का प्रदाता ' शब्द ' २५२ मात्रा — स्वर - वर्ण - छन्दो - रूपा दिव्या मन्त्रवाक् २५३ मन्त्रवाक -प्रयोग में सावधानी से सर्वनाश " २५४ ( क ) त्रिष्टुप् के द्वारा इन्द्रसम्पत्ति का २३० परिग्रह २५४ ( ख ) श्रष्टाकपाल - पुरोडाश के द्वारा अग्नि-: I " २८१ मरणधर्म्मा शब्द २८२ शब्द, और इन्द्रपत्नी २८३ वाक्, और इन्द्र २८४ वेदशब्देभ्यः, श्रौर वेदवाग्भ्यः २८५ वेदवाक् के द्वारा विराट् की प्रसूति २८६ श्रागति - गति - स्थिति - रूप ब्रह्मा की स्वरूप-स्थिति सम्पत्ति का परिग्रह २५५ एकादशकपाल के द्वारा इन्द्रसम्पत्ति का परिग्रह २८७ ब्रह्मात्मिका त्रयीवाक् २५६ ‘ चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' २३१ २८८ सुब्रह्मात्मिका अथर्व - वाक् 77 २८८ त्रयीवाकू के चार पर्व २३३ 23 12 " 29 २३४ " २५७ पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ: - आप: २५८ निगम, अनुगम - परिभाषाएँ २५६ परिभाषाओं का सोदाहरण - समन्वय २६० चतुर्लोकस्वरूप- परिचय २६१ चारों लोकों के चार अधिदेवता २६२ पृथिवी, और ' माच्छन्द ' २६३ अन्तरिक्ष, और ' प्रमाछन्द ' २६४ द्युलोक, और ' प्रतिमाछन्द ' २६५ आपोलोक, और ' अस्रीविछन्द ' ' २६६ अथछन्द, और शब्दछन्द का समन्वय २६७ दशात्रयव - त्रिराड्यज्ञ २६८ विराट् सम्पत्तिसंग्राहक दश यज्ञिय पात्र " २६६. वेदमूर्ति ब्रह्मा का संस्मरण " २६० अथर्ववाक के ६ पर्व २६१ त्रयी, और अथर्व की दश कलाएँ 23 23 २६२ द्विब्रह्म की चतुः ब्रह्मता " " २६३ द्विब्रह्म की षड्ब्रह्म में आहुति २३२ २६४ द्विब्रह्मात्मक पुरुषतत्त्व " " " " " 22 " २६५ षड्ब्रह्मात्मक स्त्रीतत्त्व " 23 २६६ ‘ चलाचल ' ( गति + स्थिति - मान् ) विश्व " २६.७ मातरिश्वा के द्वारा गर्भाधान " " " " २६.८ उभयात्मक -- ' महान ' " 39 २६६ महान् की विरारूपता ३०० विराट् का बन्ममहोत्सव " ३०१ विराट् - यज्ञ का प्राथम्य २३५ २७० षोडशीपुरुष का संस्मरण २७१ अमृतब्रह्मा, और मर्त्य ब्रह्मा " 1 ३०२ ‘ विराड् वै यज्ञः ’ " " २७२ प्रकृति के अमृत, मर्त्य, विव २७३ अमृतमर्त्या प्रकृति से विकारक्षरों का प्रादु--भवि २७४ विकारक्षर, और वैकारिक जगत् २७५ शब्दतन्मात्रात्मक वेदपार्थ ३०३ विराट्छंन्दोयुक्त पात्रों से विराड् - युग का " संग्रह ३०४ अनुगमभावापन्न विराट् - वचन " " ३०५ त्रैलोक्याग्नि की दशावयवरूपा विराट्सम्पत्ति '" " 71 ३०६ पार्थिव पदार्थ, और अग्नि की व्यापकता 23 " २७६ वाक् – और शब्द की अशुद्धतमा पर्य्यायता. ! I २७७ शब्द की व्याप्यता २३३ में परिणति २७८ वाक की व्यापकता " २७६ वाक् से शब्दोत्पत्ति " में परिणति २५ ३०७ ध्रुवाग्निप्रवेश से तरल ग्रुप की घन तुषाररूप ” ३०८ धर्नाग्निप्रवेश से घन तुषार की तरल अच् रूप T 27 .... २३६

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३०६ द्रवेत्त्व, और घनत्त्व धर्म्म, तथा तन्निबन्धन श्रापोद्रव्य ३१० विराड्यज्ञ की व्यापकता ३११ दर्शिनी, विंशिनी, त्रिंशिनी, चत्त्वारि-शिनी - विराट् ३१२ एकपदा विराट् ३१३ द्विपदा विराट् ३१४ त्रिपदा विराट ३१५ चतुष्पदा विराट् ३१६ श्रात्मा - प्रजा - पशु - वित्त - भावापन्न श्रात्म-स्वरूप ३१७ आत्मा, और आत्मबन्धु २१८ ग्रात्मवित्तस्वरूप - दिग्दर्शन ३१६ परमाविराट् का तात्त्विक स्वरूप ३२० विराट्प्रनापतिस्वरूप - दिग्दर्शन ३२१ चत्वारिंशिनी - परमाविराट् ३२२ विराट् के द्वारा यज्ञसम्पादन ३२३ पात्रों की द्वन्द्वता ३२४ द्वन्द्वानुगत दाम्पत्यभाव ३२५ वीर्य्यानुगत द्वन्द्वभाव ३२६ ' द्वन्द्वं वै वीर्य्यम् ' विषयसूची - ३३५ प्रकृति चतुष्टयी २३६ ३३६ यज्ञात्मिका प्रकृति II ३३७ यज्ञोपक्रमभूमि परमेष्ठी ३३८ यज्ञात्मक पारमेष्ठ्य विष्णु " ३३६ विलयनथर्मा परमेष्ठी " " ३४० चिदात्मा का यज्ञसमुद्र में विलयन " ३४१ सौर - चयन - यज्ञ 22 " " " " ३४२ चितिधर्म्मा सौर श्रग्नि ३४३ चिदात्मा का प्रतिविम्वभाव ३४४ ‘ आभास ', और जीवात्मा ३४५ पार्थिव - जीव प्रजापति ३४६ शिविविष्टप्रजापति २३७ ३४७ विद्या- अविद्यात्मक सूर्य 22 ३४८ चतुर्विधा विद्याबुद्धि २३८ ३४६ चतुर्विधा विद्याबुद्धि " " 31 ३५० ज्ञानोपकारिका विद्याबुद्धि २४० 39 " " २४१ 23 " " " " " 23 39 11 11 ३५.१ कम्मोंपकारिका विद्याबुद्धि ३५२ ज्ञानगर्भित कर्म्ममय सौरपदार्थ ३५४ स्तोमानुगता सौरयज्ञत्रयी २३६ ३५५ सत्तसंस्थ ज्योतिष्टोम २४२ 11 " 3 ३५३ सूर्य्य के तीन स्तोम " ३२७ द्वन्द्वं वै मिथुनं प्रजननम् ' " 7 ३५६ प्रतियज्ञात्मक चयनयज्ञ ३२८ ' यज्ञो वै कर्म्म ' का रहस्यात्मक — समन्वय 23 ३५७ यज्ञमूर्ति सूर्य्यनारायण 11 ३२६ ज्ञान – कर्म - मय - श्रव्ययात्मा " ३५८ कर्म की यज्ञरूपता " ३३० पञ्चकोशात्मक श्रव्ययात्मा ३३१ ‘ आदित्यं मनः ’ ३३२ पञ्चपुण्डीरा बल्शा ३३३ मृत्यु की सवव्याप्ति ३३४ ' महान ' की महत्ता २४० ३५६ यज्ञ की कर्मरूपता " 3 ३६० अग्निविवर्त्त त्रयी 23 ३६१ जीवविवर्त्त'त्रयी 27 " ३६२ ‘ कर्म्मणे वाम् ' इति ,, " ३६३ पात्रासादनकर्म्मोपपत्तिविराम " परिस्तरणानुगत - पात्रासादनकर्म्म से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची- उपरत ४ * २६

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शतपथ - प्रथमखण्ड विषयों की स्मारक - सूची ( ५ ) ' वाक्संयमनकर्म्म ' से अनुप्राणित पृष्ठसं ० २४३ से २४५ पर्यन्त १ वाक्संयमनब्राह्मण [ मूल ] २४३ [ २ री कण्डिका ] २ मूलानुवाद " ३ श्रध्वर्यु का मौनव्रत ४ मन्त्रप्रयोगानुगत शब्दानुगमन ५ व्यवहारभाषानुगत मौनव्रत ६ ‘ वाक् ' की यज्ञरूपता ७ वाक् - दोभ से यज्ञ - विक्षोभ ८ स्थानभेदभिन्न यज्ञ की विराट् चाकू-- 73 विष्णु - पुरुष - आदि सम्पत्तियाँ 23 ६ वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ - मय कर्मात्मा १० वैश्वानर का साक्षात्कार ११ यज्ञानुगता वाक - शक्ति १२ वायु से आहत यज्ञाग्नि १३ यज्ञाग्नि से वर्णोत्पत्ति " २० मन के प्राबल्य से विज्ञान का प्राबल्य स्थिरता २१ मंन की स्थिरता से विज्ञान की २२ मानसिक चाञ्चल्य से विज्ञान का चाञ्चल्य २३ व्यवसायात्मिका बुद्धि २४ ' व्यवसाय ' शब्द निर्वचन २५ एकत्वभावापन्ना बुद्धि मनः स्थैर्य्य २६ बुद्धिः - सम्पत्ति के लिए अपेक्षित २७ मनःस्थैर्य्य के लिए अपेक्षित वाक्संयम २८ निर्बलता में विकम्पन २६ मूलस्तम्भ का विकम्पनभाव ३० शाखाओं का विकम्पनभाव 29 ३१ अग्नि की वागुरूपता " ३२ श्रग्निवृद्धि से मनोवृद्धि " " ३३ ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' ३४ विज्ञान की उभयात्मिका श्रेष्ठता ३५ अव्यवसाय, और व्यवसाय १४ ' अग्निर्वाग् भूत्त्वा मुखं प्राविशत् ' 77 १५ वाक से विनाभूत प्राण १६ प्राण से अविनाभूत मन १७ मितभाषित्त्वमूला मनस्विता १८ मौनवृत्ति, और ' मुनि ' धर्म १६ मनोऽनुगत विज्ञान " ३६ व्यवसायात्मिका बुद्धियोगनिष्ठा " " ३७ ‘ वाग्वै यज्ञः ’ " ३८ ' स्वस्थे चित्ते बुद्ध्यः प्रस्फुरन्ति ' ३६ यज्ञस्वरूप - सम्पाक वाक्संयमन २४४ ४० वाक्संयमनोपपत्तिक्सिम ‘ वास्संयमनकर्म्म ' से अनुवाणित विषयों की स्मारक -सूची उपरत ५ २७ २४४ २

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विषयसूची ( ६ ) – ‘ पात्रप्रतपनकर्म्म से अनुप्राणित विषयों की स्मारक्र - सूचो १ पात्रप्रतपन ब्राह्मण [ मूल ] [ २-३ -- कण्डिका ] २ मूलानुवाद ३ पात्रप्रतपनक का स्वरूप - परिचय ४ अतत वस्तु की श्रासुरमावयुक्तता ५ पदार्थ की श्रयज्ञियता ६ प्रतपन से प्रतप्त नात्रों का दैवभाव ७ राक्षस - असुर और अराति पृष्ठसं ० २४६ से ३५४ पर्य्यन्त ८ प्रजापति के आत्मा, ब्रह्म, यज्ञ नामक तीन विवर्त्त ६ औपनिषद पुरुष - लक्षण आत्मा १० श्रात्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित ब्रह्मतत्त्व ११ ब्रह्मप्रतिष्टा पर प्रतिष्ठित यज्ञतत्त्व १२ मौलिकतत्त्वानुगत ब्रह्म १३ यौगिकतत्त्वानुगत यज्ञ १४ ब्रह्मात्मक यज्ञ के द्वारा आत्मोपलब्धि १५ शुद्धतत्त्व की विज्ञेयता १६ ब्रह्ममाध्यम से ही विज्ञेय की विज्ञेयता १७ ब्रह्म - यज्ञान्तर्भुक्त आत्मप्रजापति १८ विश्वविज्ञानात्मक ब्रह्म, यज्ञ - विज्ञान १६. संहिता वेदानुगत ब्रह्मविज्ञान २० ब्राह्मणवेदानुगत - यज्ञविज्ञान २१ रासायनिक सम्मिश्रणात्मक ' यौगिक ' तत्त्व २२ यौगिक का आधार ' मौलिक ' तत्त्व २३ लौकिक उदाहरण, और तत्त्वसम्मिश्रण २४ यज्ञविज्ञानप्रतिपादक शतपथब्राह्मण २५ मूलात्मक ब्रह्मविवत्त २६ तूलात्मक -- यज्ञविवर्त्त २७ ब्रह्मविद्यानुगता यज्ञविद्या २८ ब्रह्मविज्ञान का आधारत्त्व २४६ २६ यज्ञविज्ञान का आधेयत्त्व " 63 " " " २४७ ३० ब्रह्मविज्ञानमूला कठिनता ३१ यज्ञविज्ञानप्रचारकामना ३२ यज्ञविज्ञानमूला आचारनिष्ठा ३३ श्राचारनिष्ठात्मक मौलिक धर्म ३४ ब्रह्मविज्ञान विलुप्ति, और हमारा संक्षोभ ३५ ब्रह्मविज्ञामप्रतिपादिका ऋक्संहिता " ३६ विज्ञान - स्तुति- इतिहासात्मक संहितावेद ३७ ब्राह्मण भागानुगत यज्ञिय - कर्मकाण्ड ३८ आरण्यकभागानुगत - उपासनाकाण्ड 22 ३६. उपनिषद्भागानुगत ज्ञानकाण्ड " ४० मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के ज्ञातव्य-कर्त्तव्यात्मक षड्विध विषय " ४१ धर्म्मजिज्ञासा, और श्र श्रुति ४३ ब्रह्मविज्ञानमूलक - यज्ञविज्ञान, और हमारी भाष्यानुगता समस्या ४४ शतपथभाष्य के विस्तार के सम्बन्ध में ४५ पारिभाषिक वैदिक -- पदार्थ, और विस्तार ४६ प्राणविज्ञान से समन्वित यज्ञविज्ञान ४७ फलमुखान्वित विस्तार का अनुगमन ४८ देवता - असुर - राक्षस - प्राणत्रयी ५० कोषकार के देव, देवता, शब्द " २४८ " " 33 " " " " " 72 २४६ 27 " 1 ४२ सर्वज्ञानमय वेद 33 " " २४७ " " " 22 33 ४६. देवस्वरूपोपक्रम " " ५१ ' देवता ' शब्द की व्यापकता २८ ५.२ ' देव ' शब्द की व्याप्यता ५.३ सर्वविध प्राणमात्र का देवत्त्व ५४ यज्ञिय प्राणमात्र का देवत्त्व ५५. ' देवता ' शब्द की व्याप्ति ५६ ऋषिदैवत्य - पितृदैवत्य " " " 11

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५७ असुर दैवत्त्व - देवदैवत्त्व शतपथ - प्रथमखण्ड III ८४. दैवीसम्पत्ति - व्यवहार २५२ ५८ अनन्त देवता ५६ ३३ – देवदेवता ६० ईश्वरप्रजापति के पाँच अवयव २५० ८ श्रासुरीसम्पत्ति - व्यवहार " 23 ८६ ' देव: - आयाति भुवनानि पश्यन् ' 31 " 22 -६१ स्वयम्भू का देवता- ' ऋषिदेवता ' ६२ परमेष्ठी का देवता- ' पितरदेवता ' ६३ सूय्य का देवता- ' देवदेवता ' ६४ चन्द्रमा का देवता - ‘ गन्धर्वदेवता ' 11 21 ६ ५ पृथिवी का देवता ' असुरदेवता ' 31 ८७ ' विदाम दवान् स्वर्ज्योतिः ' ' देवा हैव देवाः ' ८६ देवस्वरूपानुगत आकर्षण ६० यास्कनिरुक्त, और देवतावाद ६ यास्काभिमत - पुरुषविध, अपुरुषविध, अपि वा उभयविध देवता " 1 ६२ पुरुषविधानुगत मत 31 ६३ पुरुषविधानुगत मत ६८ प्रकृतिसिद्धदेवासुरसंग्राम " ६४ यास्कानुगत - उभयविधवाद ६६ तमोमय - ' असुरदेवता ' ६७ ज्योतिर्म्मय ' देवदेवता ' ६६ [ क ] ' देवता ' और ' देव ' शब्द के पार्थक्य श्रीप्रमाण ६६ ( ख ) द्वादशविध ऋषिप्राण ( १२ ) ७० सप्तविध पितरप्राण ( ७ ) ७१ त्रयस्त्रिंशद्विवदेवप्राण ( ३३ ) ७२ सप्तविंशतिविध गन्धर्वप्राण ( २७ ) ७३ नवतीर्नवविध असुरप्राण ( EE ) ७४ पञ्चविध पशुप्राण ( ५ ) ७५ सर्वप्राणसमन्वय से ' अहम् ' का प्रादुर्भाव ७६ पदार्थमात्र की सर्वप्राणरूपता ७७ महतोमहीयान् ईश्वर से उत्पन्न - अणोरणी-यान् विश्वपदार्थों की सर्वरूपता ७८ सर्वताप्रतिपादक - श्रौत - वचन ७६ ‘ देवताभ्यः ' से अनुगत सर्वविध ईश्वरीय-आधिदैविक प्राण ८० श्रौतस्मार्च - वचन - समन्वय ८१ देवभावस्तुति, असुर - भाव निन्दा तथा ऐन्द्रमानव 11 ८२ असुरभावस्तुति, और देवभावनिन्दा, तथा वारुणमानव ८३ शक्तिग्राहकशिरोमणि वृद्धव्यवहार एवं तन्मूलक भेदव्यवहार 37 71 ६५ पुरुषविधता के पाँच प्रमुख कारण 23. 17 २५३ " " " " 1 ६६ चेतनायुक्ता स्तुतियाँ, और पुरुषविधता २५४ ६७ स्तुतियों का अन्यथा समन्वय, और अपुरु-विधता ६८ संवादभावनिबन्धना पुरुषविधता ६६ संवादहेतुनिराकरण, और पुरुषविधता १०० अङ्गात्मक हेतुवाद, और पुरुषविधता 29 " १०१ अङ्गहेतुनिराकरण, और अपुरुषविधता २५५ " " १०२ इष्टि - पशु - सोम - रूपा यज्ञत्रयी 11 १०३ एते वदन्ति शतवत् ' - मन्त्र १०४ सोमयज्ञानुगत वल्ली सोमरस १०५ सदोमण्डप, और हविर्द्धानमण्डप १०६ मण्डपानुगता हविर्वेदि १०७ महावेदि का वितान २५१ १०८ गर्त्तात्मक - ' उपरव ' 11 १०६ उपांशुसवनशिला ११० सोमरसरिपूर्ण द्रोणकलश 31 11 23 " 1 96 " " १११ हरित - सोमरस ११२ सोमपानार्थ देवताओं का आमन्त्रण ११३ वदन्ति - अभिक्रन्दन्ति - अश्नन्ति - श्रादि क्रिमायद, और देवताओं के इन्द्रियभाव २५६ " 7 २६

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विषयसूची निराकरण, १ १४ इन्द्रियानुगता पुरुषविधता का ११६ अपुरुषविधवाधियों का महान् तर्क मत १२१ यास्कसम्मत अनिर्णयात्मक निर्णय और अपुरुषविधता २५६ १२० यास्क से पूर्व प्रचलित देवस्वरूप में विभिन्न , ११५ पुरुषनिबन्धन- उपयोगी द्रव्यसम्मार और पुरुषविधता ११६ हेतुनिराकरण, और अपुरुषविधता २५६ ११७ कर्म्मानुगति, और पुरुषविधता ११८ हेतुनिराकरण, और पुरुषविधता २५७ १२२ परिभाषाज्ञान से संस्पृष्ट यास्क - का देवतावाद अष्टविध देवता - स्वरूपप्रकरणम् तत्र- ( १-२ सौर, तथा मनुष्यदेवता - स्वरूपदिग्दर्शनम् २५८ १२३ पुरुसबिध चेतन अनित्य - मनुष्य चान्द्रदेवता देवता ( ( २ १ ) ) ' १२४ पुरुषविध - चेतन - नित्य नित्य सौरदेवता - ( ३ ) 99 १२५ अपुरुषविध - अचेतन- देवता ( ४ ) 51 १२६ अपुरुषविध - अचेतन - भूतमय ( ५ ) 76 १२७ अभिमानीदेवता 11 १२८ मन्त्रदेवता १४५ स्वायम्भुव-- मौलिक - प्राण १४६ मौलिक - प्राण की असद्रूपता १४७ असत्प्राण का ऋषिप्राणत्त्व १४८ ऋषिप्राण से पितृप्राणोदय १४६ पितृप्राण से देवप्राणोदय २५७ 29 २५८ २५६. 17 " " १२६ आत्मदेवता १३० कर्म्मदेवता १३१ पुराणाकाशस्थ सूर्य्यनारायण १३२ ( क ) प्राणमय स्वयम्भ १३२ ( ख ) आपोमय परमेष्ठी १३३ वाङ्मय सूर्य्य १३४ अन्नमय चन्द्रमा १३५ अन्नामय भूपिण्ड १३६ इन्द्रात्मक सूय्यमण्डल, 27 १५० ऋषिप्राणमूलक देवप्राण १५१ ऋषिप्रा का स्वरूप - दिग्दर्शन १५२ रज, और लोक २५६ १५३ परोरजा - ऋषिप्रारण १५४ षडुविध रजोभाव, और परोरना १५५ ' षडिमा रजांसि ' १५६ रज से अतीत स्वयम्भू सत्य 19 11 19 " ( ३ ) २६० 13 " " 27 १५७ पारमेष्ठ्य - श्राप्यप्राण, और असुर ' " " १५८ पारमेष्ठ्य सौम्यप्राण, और पितर १५६ पारमेष्ठ्य वायव्य प्राण, और गन्धर्व और देवप्रभवस्थान ” १३७ ‘ बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ' १३८ पञ्चतन्मात्रा से संस्कृष्ट प्राण १३६ धामच्छद प्राणतत्त्व १४० स्वज्योतिष्मान् सौरप्राण १४१ प्रजाप्राणरूप सौरप्राण १४२ प्राणसमन्वय से सद्भावोत्पत्ति १४३ सामान्ये सामान्याभावः १४४ सद्रूप प्राण की असद्रूपता १६० परमेष्ठी से अधोऽवस्थित सूर्य्य १६१ सूर्य्यानुगत - ऐन्द्रप्राण 33 १६२ चान्द्र - गन्धर्वप्राण " १६३ पार्थिव - आसुर वारुण- प्राण " " 17 १६४ पार्थिव -- वैश्वानर प्राण १६५ ' प्राण ' की नित्यता १६६ अजर - अमर - नित्य प्राणतत्त्व १६७ अजर - अमर - नित्य - देवता २६० " ३०

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शतपथ - प्रथमख एड १६८ इन्द्रियातीत शक्तिरूप प्राणतत्त्व १६६ वसिष्ठागस्त्यादि परोरजाप्राण २० २०० सोम का सर्वदेवतात्त्व " २०१ विष्णु का सर्व देवतात्व १७० वसु - रुद्रा - दित्यादि देवप्राण " " २०२ एक के परिग्रह से सर्वदेव संग्रह १७१ एकविध देवप्राण " " २०३ अग्निगर्भा पृथित्री १७२ त्रिविध - देवप्राण " " २०४ इन्द्रगर्भिणी द्यौ १७३ त्रयस्त्रिंशद्विध देवप्राण " 1 २०५ सौर इन्द्रप्राण की सर्वव्याप्ति १७४ त्रिदेवता से वेदत्रयी का आविर्भाव १७५ ' सैषा त्रयी विद्या तपति ' १७६ विरलावस्थापन्न द्वादशविध आदित्यदेवता १७७ घनावस्थापन्न श्रष्टविध वसुदेवता १७८ तरलावस्थापन्न- एकादश - विधरुद्र - देवता १७६ रुद्रदेवता के विविध महिमाविवर्त्त १८० द्यावापृथिव्य नासत्य - दल -- देवता २०६ सौर बृहत्साममण्डल " 1 २०७ पार्थिवत्रैलोक्य, और बृहत्साम " २०८ ' नेन्द्रादृते पवते धाम किचन ' २६१ २०६ वासव- पार्थिव - इन्द्र 99 २१० मरुत्त्वान् - आन्तरिक्ष्य - इन्द्र "? २११ मघवा - सौर- दिव्य इन्द्र 31 २१२ रुद्रपुत्र मरुद्गण १८१ सान्ध्या प्राणद्वयी का स्वरूप परिचय १८२ देववैद्य अश्निीकुमार 19 २१३ ४६ - मरुद्ददेवता " २१४ प्रथम मरुत् - गणपति १८३ अधिदैवत - अध्यात्म - अधिभूतात्मक- दैविक-आख्यान १८४ प्रजापति, और वषटकार २१५ अन्तिम मरुत्- महावीर " " २१६ मूषकवाहन - गणपति २६२ २१७ अान्तरिक्ष्य रुद्रदेवता १८५ इन्द्र, और वषटकार २१८ इन्द्रतुरीय मरुद्गण " १८६ नासत्य, और दस्र १८७ द्यौः, और पृथिवी १८८ तैतीस करोड़ देवता २१६ चतुर्विध सोम " 7 २२० राजसोम, और राजसूय " 7 २२१ वाजसोम, और वाजपेय " 7 १८६. असंख्य संख्यात देवता " " २२२ ग्रहसोम, और ब्रहयाग १६० महिमानुगत अनन्त्य का समन्त्रय २२३ हविः सोम, और हविर्याग " " १६१ देवदेवतानुगत त्रयस्त्रिंशत् - कोटियाँ २२४ चत्वारिंशद्विध ग्रहवायु 31 १६.२ कोटि, और श्रेणिविभाग २२५ इन्द्रान्नभूत - ग्रहसोम १६.३ एक तीन - - तैंतीस कोटि देवता १६.४ श्रुतिसम्मत ३३ अणिविभाग १६५ याज्ञवल्क्य के द्वारा विभागात्मिका तैतीस-कोटियों का स्वरूप - विश्लेषण १६६ तैतीस करोड़मूला महती भ्रान्ति १६७ अग्नि का सर्वदेवतात्त्व १६८ वायु का सर्वदेवतात्त्व १६६ इन्द्र का सर्वदेवतात्त्व २६३ २३० सौरमण्डलानुगत - ' आजानदेवता ' २२६ वायु के द्वारा इन्द्र का सोमपान " २२७ सोमपायी इन्द्र 31 २२८ पितृप्राणप्रधान गयाक्षेत्र २२६. यज्ञपत्ति इन्द्रदेवता 31 " 3 २३१ सौर - ‘ इडेन्यदेवता ’ 11 २३२ पृथिवी, और चन्द्रमानुगत मौरदेवता 17 २३३ पार्थिव सौरदेवताओं का पार्थिवत्त्व ३१

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 199 का मूल पृष्ठ
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२३४ सूर्य्यविरुद्धाद्ध पृथिवी २३५ तमोमय श्रद्ध ' भूपिण्ड, और असुर २३६ अदितिपृथिवी २३७ दितिपृथिवी विषयसूची २६५ २६८ पञ्चविध - भतज्योतिर्विवर्त्त 77 २६६ उभयविध ज्योतिर्विवर्त्त, और ति २७ भूतज्योति के तीन प्रमुख विवर्त्त २७१ ज्ञानज्योति से प्रकाशित भूतज्योति २६७ 23 २६८ 29 27 २७२ स्वज्योति - पग्ज्योति का पारिभाषिक - समन्वय " २७३ चतुर्थ - अज्योतिर्भाव 13 29 २३८ इयं वै पृथिवी - अदितिः २३६ इयं वै पृथिवी - दितिः २४० अदितिगर्भस्थ ३३ देवता २४१ चित्य - चितेनिधेयाग्निमूर्ति मपिण्ड २६६ २४२ मर्त्याग्नि, और भूपिड २७४ सूर्य - पृथिवी - चन्द्रमा - शब्दों की पारिभाषिकी व्याप्ति २७५ असंख्य सूर्य्यं, चन्द्र, भू - विवर्त्त 23 २४३ अमृताग्नि, और भूमण्डल २४४ अमृताग्निमण्डल, और रथन्तरसाम २४५ सप्ताश्वयुक्त सौररथ २४६ सूर्य की रथवत्ता 39 73 २७६ स्वाती - सविता - अभिजित् आदि का सूर्यत्त्व 21 २७७ लुब्धक नक्षत्रात्मक पशुपति 29 २७८ सर्वनक्षत्र प्राण समष्टि लुब्धक 17 11 २७६ असंख्य सूर्य्यसम लुब्धक " " २४७ ' रथ ' का तरण, और रथन्तरसाम 23 २४८ त्रिवृत् और पृथिवी २४६ पञ्चदश, और अन्तरिक्ष २५० एकविंश, और लोक २५१ स्तौम्य त्रिलोकी - रूपा उख्यात्रिलोकी २८० नीलकण्ठ महादेव - और लुब्धक २८१ लुब्धक के सान्निध्यामात्र से सूर्य की बाष्प-रूपता २८२ सूर्य्य के स्वज्योतिर्भाव का समन्वय २८३ सर्वतः प्रकाशित सौरमण्डल " " २६६ " " २५२ अषाढा - पृथिवी 13 २८४ सौरमण्डल में असुर - प्रवेश निरुद्ध 17 71 २८५ सौर सपत्न- मघवा इन्द्र " " २५३ अदितिपृथिवी की सर्वरूपता २५४ अदितिमूलक ज्योतिर्मय देवता २५५ दितिमूलक - तमोमय - असुर २५६ सौरसम्वत्सरात्मक कश्यपप्रजापति २५७ कूर्म्मप्रजापति के साक्षात् दर्शन २५८ कश्यपरूप कूर्म्म की पत्नियाँ " 79 २८६ ‘ न त्वं युयुत्से ' का समन्वय २८७ देवसाम्राज्यभूमि सौरमण्डल २८८ परज्योतिर्म्मय चान्द्रमण्डल २६७ २८६ पृथिव्यनुगत एक चन्द्रमा २५६ अहोरात्रानुगत देवासुरभाव २६० देवासुरों का प्रजापतिपुत्रत्व २६१ देवासुरप्राणमय भविवर्त्त २६२ चान्द्रमण्डल, और तदनुगत देवासुर २६३ स्व - पर - रूप - भेदेन तीन ज्योतियाँ २६४ ज्योतिषांज्योतिर्लक्षणा - ज्ञानज्योति 19 17 27 17 37 २६.० मङ्गलग्रहानुगत दो चन्द्रमा " 1 २६ १ बृहस्पतिग्रहानुगत चार चन्द्रमा 33 २६२. शनिग्रहानुगत - आठ चन्द्रमा 27 " २६३ आकाश विहारी ' कृष्णचन्द्र ' 19 37 २६४ तरणिकिरणसङ्ग से प्रकाशित चन्द्रमा २७० 19 २६५ परज्योतिर्मय पदार्थ का ज्योतिस्तमोभाव 27 77 २६६ रूपज्योति की स्वरूप - परिभाषा " २६५ स्वज्योतिर्म्मय सूर्य २६६ परज्योतिर्म्मय चन्द्रमा २६७ रूपज्योतिर्म्मय भूपिण्ड 33 ३२ २६७ स्व - रूपेण प्रकाशित रूपज्योति २६८ रू. ज्योतिर्मय पार्थिवविवर्त्त २६६ परज्योति में अन्तर्भूत रूपज्योति " 23 A

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शतपथ - प्रथमखण्ड ३०० प्रकाशित चान्द्रभाग ३०१ अप्रकाशित चान्द्रभाग ३०२ अष्टविध देववर्गानुगत तीसरे पुरुषविध-नित्य - प्राण देवताओं - का संस्मरण ३०३ क्रमव्यत्यास - कारण - समन्वय ३०४ देवताप्रकरण की महती जटिलता ३०५ सनातनधर्मियों का आक्रोश 17 ३०६ वैदिक इतिहास के सम्बन्ध में ३०७ महानुभावों, और महाशयों की भ्रान्ति 11 ३०८ मानवचरित्र, और वेद की पौरुषेयता 33 ३०६ हेत्वाभास की श्रापातरमणीयता 21 ३१० वेदों में इतिहास का समर्थन 21 ३११ अधिदैवत से अनुप्राणित अध्यात्म, और अधिभूत ३१२ अधिदैवत से अधिभूत की प्रसूति ३१३ अधिदैवत, और अधिभूत प्रसूति ३१४ पूर्णमदः पूर्णमिदं का संस्मरण ३१५ अधिदैवतस्वरूपनिज्ञासा २७० ३२८ ' शेषं कोपेन पूरयेत् ' की उपेक्षा ३२६. निष्ठामूलक - आर्ष - श्रद्धान २७१ " " ३३० उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समान-धर्म्मा ' ३३१ पुरातन - कालानुगता ' साध्यजाति ' ३३२ चातुर्वर्ण्य से समतुलिता देवयुगपूर्वा - समाज-व्यस्था ३३३ ब्राह्मण - स्थानीय साध्यवर्ग ३३५ वैश्य - स्थानीय - आभास्वरवर्ग ३३४ क्षत्रिय - स्थानीय - महाराजिकवर्ग ३३६ शून्द्र - स्थानीय - तुषितवर्ग ३३७ समृद्धानन्दानुगता तद्युगव्यवस्था " ३३८ ब्रह्मसत्ता से पराङमुखा साध्यजाति ३३६ ब्रह्मसत्ता से वञ्चिता साध्यजाति की सद्-विज्ञाननिष्ठा ३४० क्षणिक - भूतविज्ञानवादी साध्यवर्ग अध्यात्म की 22 ३४१ प्रकृतिविज्ञानासक्त साध्यवर्ग ३१६ आधिभौतिक देवता और असुर ३१७ भौमदेवता और भौम असुर " ३१८ मनुष्यविध - देवता, और असुर " ३१६ भौमत्रैलोक्य - व्यवस्था का संस्मरण 72 ३२० ' बबरप्रावाहरिण कामयत ' मूला भ्रान्ति " ३२१ वैदिक - इतिहास के सम्बन्ध में वेदनिष्ठों, तथा वेदभावुकों की महती भ्रान्ति ३२२ इतिहासविस्मरण से भारतीय गौरव की पराः परावतता ३२३ सभ्यता के पुनरज्जीवन के लिए अन्वे-ष्टव्य वैदिक इतिहास ३२४ अभिनिवेशमूलक कल्पित सिद्धान्त ३२५ ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' ३७२ ३४२ विज्ञानबलाभिनिविष्टा साध्यजाति के दम्भ-" 22 २७३ पूर्णं उद्गार ३४३ वर्त्तमान भूतविज्ञानवादी से साध्यजाति का समतुलन ३४४ ब्रह्माधारवञ्चित साध्यवादों की दशविध-विभिन्नवादों में परिणति ३४५ ‘ यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ' ३४६ स्राध्यों के नास्तिवाद से प्रकृति का विकम्पन ३४७ प्रकृति के विकम्पन से पुरुष का विकम्पन ३४८ पुरुषविकम्पन मूलक ' ब्रह्म ' का अवतार ३४६. साध्यजाति में सगुणब्रहा का अवतरण २७६ ३५० ब्रह्म के द्वारा स्थिति का अवलोकन ३५१ तुषितजाति पर दृष्टिनिक्षेप ३५२ ' संधे शक्तिः ' से अनुप्राणित तुषित " " ३५३ ब्रह्मविद्या की प्रतिष्ठा ३२६ ‘ यस्तर्केणानुसन्धत्ते - स धर्म्म वेद ' ३२७ ऐतिहासिक - प्रकरणोपक्रम 22 " ३५४ विज्ञान का काल्पनिक - विजृम्भण ३५५ विज्ञान के द्वारा - ' अहम् ' की विज्ञेयता २७३ 21 11 २७४ 29 " " " 27 29 29 22 २७५ " 1 " 23 13 " " 27 33 ३३