Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 31–40

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 31 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड आदि आदि असंख्य ऐसे भी प्राणी हैं, जिनमें शत: बुद्धि विकसित रहती है । और कतिपय क्षेत्रों में तो मानव की अपेक्षा भी इनकी बुद्धि विशेष काम कर जाती है । अतएव सामान्यबुद्धि से युक्त प्राणियों को नहाँ मनोजीवी कहा जायगा, वहाँ अश्व - गनादि विशेषबुद्धि से युक्त प्राणियों को बुद्धिजीवी माना जायगा | इस बुद्धि की सीमा दिग्देशकालानुबन्धी वर्त्तमान पर ही परिसमाप्त मानी गई है । अतएव मानवेतर प्राकृत प्राणी का दिग्देशकालात्मक वर्त्तमान के अतिरिक्त भूत, भविष्यत् के परिणामों से कोई सम्बन्ध नहीं रहता | एकमात्र ‘ वर्त्तमान ' ही इसका आराध्य बना रहता है । हाँ, तो ऐसी वर्त्तमाना बुद्धि से बुद्धिमान् बना हुआ मानव भी इस प्राणीसर्ग से पृथक् नहीं माना जासकता । इसप्रकार शरीर, मन, और बुद्धि, तीनों हीं क्षेत्रों से मानव, और मानवेतर प्राणी सर्वात्मना समतुलित हैं, समानधर्म्मा है । फलतः दोनों हीं वर्ग इस प्रत्यक्ष-मृला दृष्टि से दिग्देशकालानुबन्धिनी वर्त्तमान कालानुगता तात्कालिकी उपयोगिता के क्षेत्र के ही पुरुषार्थी, १ . प्रमाणित हो रहे हैं । ' पुरुषार्थी नहीं, अपितु ' प्रकृत्यर्थी ' । क्या तात्पर्य्यं? । प्रकृति, जिसे याजका बुद्धिवादी ' नेचर ' ( Nature ) कहता है, अपना सम्पूर्ण स्वरूप ' दिग्-देशकाल ' भावत्रयी से ही अनुप्राणित रखती है । दिक्- देश - काल से बाहिर प्रकृति का कोई भी स्वरूप शेत्र नहीं बचा रहजाता । और दिग्देशकालात्मिका यह मूर्त्ता - व्यक्ता - क्षरात्मिका प्रकृति सभी के लिए प्रत्यक्ष-सुलभा है | प्रत्यक्षदृष्ट चन्द्रमा, भूपिण्ड, सूर्य, तीनों से सभी परिचित हैं । इनमें भूपिण्ड का उपग्रहभूत, निधनसामात्मक, अन्तिम पर्वात्मक ' चन्द्रमा ' ह्रीं ' दिक् ' की स्वरूप - प्रतिष्ठा बनता है । सूर्य्यं का उपग्रहभूत ‘ भूपिण्ड ' ही ' देश ' की स्वरूप प्रतिष्ठा बनता है । एवं परमेष्ठी का उपग्रहभूत ' सूर्य्य ' ही ' काल ' की स्वरूप-प्रतिष्ठा बनवा है । ये ही तीनों प्रकृतितन्त्र के प्रत्यक्ष- दृष्ट - भौतिक स्थूल - विवर्त्त हैं । इन तीनों से क्रमशः भूपि-ण्ड से प्राणियों का शरीर, चन्द्रमा से प्राणियों का मन, एवं सूर्य से प्राणियों की बुद्धि का स्वरूप - निर्माण हुआ है | देशात्मक भूपिण्ड से देशात्मक शरीर, दिगात्मक चन्द्रमा से दिगात्मक मन, एवं काला-त्मक सूर्य्य से कालात्मिका ( केवल वर्त्तमान कालात्मिका ) बुद्धि, का स्वरूप- सम्पन्न हुआ है, यही वक्तव्य-निष्कर्ष है | दिक् - देश - कालात्मक, चन्द्र - मूः सूर्य्यात्मक प्रत्यक्षदृष्ट प्राकृत - विवर्त्त से सम्पन्न निष्पन्न मनः-शरीर - बुद्धि - भाव से कृतरूप प्राणीमात्र शरीरेण, मनसा, बुद्धया च समानधर्म्मा हीं बने हुए हैं । और दिग्देशकालानुबन्धिनी प्रत्यक्षदृष्टया इसे भूतप्रकृति की दृष्टि से तो शरीर - मनो- लोकबुद्धि - धर्म्मा मानव में, एवं तद्धर्म्मा हीं मानवेतर प्राणियों में कोई भी विशेषता नहीं है । फिर वह ऐसा कौन सा तत्त्व शेष रह जाता है, जिसकी विशेषता से मानव अन्य प्राणियों से ' कुछ विशेष ' बन रहा है?, प्रश्न ही हमें प्रत्यक्षदृष्टा प्रकृति से परें भी कुछ चिन्तन करने के लिए विवश कर देता है । चन्द्रमा, और भूपिण्ड को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले व्यक्तकालात्मक - वर्त्तमान कालानुबन्धी सौर ब्रह्माण्ड पर ही सबकुछ समाप्त नहीं मान लिया जा सकता । श्रतएव मन से पर अवस्थिता बुद्धि पर ही मानव के स्वरूप का अवसान नहीं माना जासकता । अपितु सूर्य्यं से परे, व्यक्तकाल से परे, वर्त्तमानकालात्मिका व्यक्ता भौतिकी बुद्धि से भी परे कुछ अवश्य है! और वह जो कुछ है, वही सबकुछ है, जिसको आधार बना कर ही सूर्य्य चन्द्रमादि कालदिग् - भाव प्रतिष्ठित हैं । गति कदापि गति की प्रतिष्ठा नहीं बन सकती । चन्द्रमा भूपिण्ड सूर्य्य- तीनों हीं गतिशील हैं, परिभ्रममाण हैं, परिवर्तनीय हैं । इनकी यह गति तत्रतक सर्वथा अनुपपन्न है, जबतक कि इनका केन्द्रात्मक कोई स्थिर २७

पृष्ठ 32

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 32 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आत्मनिवेदन आधार नहीं रहता । स्थिति ही गति की प्रतिष्ठा बना करती है । वही स्थितितत्त्व कहलाया है - ' पुरुष ', जिसके द्वारा, किंवा जिसके महिमामय प्राङ्गण में प्रकृतिदेवी परिभ्रनमाया है । सौरोप्रकृति से, तदभिन्ना बुद्धि से क्योंकि वह परे हैं, अतएव वह अप्राकृत पुरुषतत्त्व इस प्राकृत - बुद्धि की पकड़ में नहीं आ सकता । अर्थात् हमारी लोक-बुद्धि उस लोकातीत को प्रत्यक्ष भूतवत् समझलेने में नितान्त असमर्थ है । सर्वप्रथम पञ्चभौतिक पार्थिव शरीर, तदनन्तर पार्थिव पञ्चप्राणात्मक पञ्च ेन्द्रियवर्ग, तदनन्तर चान्द्र मन, और तदनन्तर सौरी बुद्धि । इसके अनन्तर प्रतिष्ठित प्राकृत पुरुष, तथा सौरी बुद्धि के मध्य में भी अवान्तर दो सुसूक्ष्म - अव्यक्त प्राकृत विवर्त्त ' और हैं, जिह्न क्रमशः पारमेष्ठ्य महान्, तथा स्वायम्भुव अव्यक्त कहा गया है । गीताशास्त्रने इन दोनों को अव्यक्तधर्म के सादृश्य से पुरुषसीमा में हीं अन्तभूत मान लिया है । अतएव ' यो बुद्ध ेः परतस्तु सः ' इत्यादिरूपेण गीता ने बुद्धि से पर पुरुष का ही संग्रह कर लिया है, जबकि तत्त्व का सर्वात्मना विशकलन करने वाले वेदशास्त्रने बुद्धि से परे के दोनों सूक्ष्म प्राकृत - विवत्त का भी पृथ-क्त्त्वेनैव संग्रह किया है | निम्न लिखित गीतावचन, तथा श्रुतिवचन को लक्ष्य बनाइए, एवं तदाधार पर ही सहजसिद्ध विबत्त का अपनी सत्त्वप्रज्ञा से ही समन्वयानुग्रह कीजिए । * -:

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः, अर्थेभ्यश्च परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिः, बुद्ध ेरात्मा महान् परः ॥

महतः परमव्यक्त, अव्यक्तात् पुरुषः-पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा, सा परा गतिः ॥ —कठोपनिषत् १ | ३ | १०,११, *

इन्द्रियाणि पराण्याहु:, इन्द्रियेभ्यः परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिः, यो बुद्धः परतस्तु सः ॥

एवं बुद्धः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

जहि शत्रु ं महाबाहो! कामरूपं दुरासदम् ॥

—गीता ३।४३-४३,

- इन्द्रियेभ्यः परं मनः, मनसः सच्वमुत्तमम् ।

सत्त्वादधि महानात्मा, महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको ऽलिङ्ग एव च ।

यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्त्वं च गच्छति ॥

— कठोपनिषत् ६७,८, । २८

पृष्ठ 33

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 33 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड अधिदैवत - अध्यात्म - समतुलनात्मकः - परिलेखः इति नु - अधिदैवतम् दिग्देशकालातीतः - पुरुषः दिग्देशकालात्मिकाव्यक्ता -- मूर्त्ता -- प्रकृतिः इति - नु - ध्यात्मम् १ -- दिग्देशकालातीतः - सर्वव्यापकः -- पुरुषः आत्मा ( ७ ) २- अनन्तकालमूर्त्तिः - विश्वव्यापकः - स्वयम्भूः अव्यक्तम् ( ६ ) ३- अमूर्त कालमूर्ति: त्रैलोक्याधारः - परमेष्ठी महान् ( ५ ) ४ -- मूर्त्त कालमूर्त्तिः -- त्रैलोक्यमूर्त्तिः - सूर्य्यः बुद्धि: ( ४ ) ५ -- दिङमूर्त्तिः —– श्रान्तरिक्ष्यः - चन्द्रमाः मनः ( ३ ) ( क ) - त्रयस्त्रिशो दिक्सोमप्राणः- पार्थिवः इन्द्रियमनः ( ख ) - त्रिणवो भास्वर सोमप्राणः-श्रोत्रम् " ६ ( ग ) -एकविंशः - आदित्यप्राणः-" ( घ ) - पञ्चदश: -- वायन्यप्राणः--22 पार्थिवपञ्चप्राणाः चतुः प्रा. ( ङ ) - त्रिवृत: ----- आग्नेयप्राण: -" " वाक् ७ - देशमूर्त्तिः- चित्याग्निमूर्त्तिः - भूपिण्डः २६ शरीरम् III : - मनः पराण्याहु इन्द्रियाणि मनः-तत्परं --: बुद्धि तत्परा सः परतस्तुे बुद्ध यो : - ४ शरीरत १ आत्मा २ बुध्दिः ३ शरीरम्

पृष्ठ 34

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 34 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आत्मनिवेदन उक्त परिलेख कौ प्रवधानपूर्वक लक्ष्य बना लेने मात्र से ही मानव, तथा मानवेतर प्राणिवर्ग के पारस्परिक -- मौलिक -- भेद का सर्वात्मना समन्वय होजाता है । भूपिण्डानुगत शरीर से प्रारम्भ कर सैरीबुद्धि पय्यंन्त का दिग्देशकालनिबन्धन - वर्त्तमानकालात्मक -- व्यक्त --मूर्त -- प्रत्यक्षदृष्ट - भूत -- भौतिक - प्रपञ्च मानव, और मानवेतर समस्त - प्राणियों में समान है । विशेषता है बुद्धि से पर अवस्थित महद् - अव्यक्त - से समन्वित पुरुषात्मा के सम्बन्ध में । वही पुरुषात्मा मानव को ' पुरुष ' अभिधा से समन्वित करता है । इस श्रात्मपुरुष के आधार पर प्रतिष्ठित होकर ही मानवीय ' प्राकृतजीव ' ' पुरुषार्थ ' करने में समर्थ बना करता है, दिग्देश--कालातीत, किन्तु दिग्देशकालमर्यादा के संरक्षक जिस पुरुषार्थ को ही महर्षियोंनें मानव के लौकिक अभ्युदय, तथा लोकातीत निःश्र ेयस् का एकमात्र कारण माना है । इस पुरुषप्रतिष्ठा से वञ्चित रह जाने वाला मानव पुरुष नहीं, अपितु अन्य प्राकृत प्राणियों की भाँति केवल प्राकृत - जीव मात्र ही है, जिसे दिग्देशकालानुत्रन्धी शरीर - मनो - बुद्धि -- से अनुगत प्रकृत्यर्थों में हीं अपने आपको अन्यप्राणियों की भाँति परिसमाप्त कर लेना पड़ता है । पुरुषार्थशून्य ऐसा प्राकृत मानव ही भाग्यवादी यथाजात मानव कहलाया है, जिसकी अपनी कोई स्वतन्त्र स्वरूप - सत्ता अभिव्यक्त नहीं होपाती - इस प्राकृत बन्धनपाश से आबद्ध रहने के कारण । जीव, और आत्मा, दोनों शब्द सर्वथा विभिन्न तत्त्वों के ही वाचक हैं, जबकि महाग्रहग्राहात्मक दर्शनवाद के अनुग्रह से दोनों शब्द आज पर्य्यापार्थक वन बैठे हैं, फलस्वरूप -- ' जीवात्मा ' शब्द अभिव्यक्त होपड़ा है । जीव केवल प्राकृतिक तत्त्व है, जबकि ' आत्मतत्त्व ' प्रकृति से सर्वथा अतीत तत्त्व है । जीव जहाँ शरीर में रहता हुआ शरीराभिमानी - ' देही ' है, वहाँ आत्मा में शरीर - मनो- बुद्धि- जीवादि प्रतिष्ठित रहते हैं । जीव प्रतिशरीर में जहाँ भिन्न हैं, वहाँ आत्मा विभूतिसम्बन्ध से सबका आधार बना हुआ है । जीव जहाँ प्राकृत जन्म -- मृत्यु -- प्रवाह -- से सतत श्राक्रान्त है, वहाँ आत्मा इस चक्र से अतीत है । जीव को लक्ष्य बना कर जहाँ -- ‘ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रु ' वं जन्म मृतस्य च ' ( गीता २२२७ ) यह कहा जाता है, वहाँ आत्मा को लक्ष्य बनाकर — ' न जायते म्रियते वा कदाचित्, नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ' ( गीता २।२० ) यह कहा गया है । जीव शरीर में हैं, एवं शरीर आत्मा में हैं । अर्थात् जीव प्राकृत होने से व्याप्य है, परि-च्छिन्न है, दिग्देशकालात्मक है, जबकि ग्रात्मा अप्राकृत होने से अपरिच्छिन्न हैं, दिग्देशकालातीत है । ‘ न त्त्वहं तेषु, ते मयि ' के अनुसार पुरुषात्मा में सब प्रतिष्ठित हैं, न कि पुरुषात्मा किसी से सीमित है । और यों आत्मा, तथा जीव, दोनों का पार्थक्य सर्वात्मना संसिद्ध है । मानवेतर प्राणियों में भी जीव है, एवं मानव में भो जीव है । और दोनों हीं स्थलों का जीवभाग अपनी अर्थशक्तिप्रधाना पार्थिवी वैश्वानरकला से, क्रियाशक्तिप्रधाना प्रान्तरिक्ष्या तैजसकला से, तथा ज्ञान-शक्तिप्रधाना दिव्या प्राज्ञकला से यथानुपात से तत्तत् प्राणियों में प्रविष्ट है औौपपातिकरूपेण । इसी जीव-कलात्रयी की अभिव्यक्ति अनभिव्यक्ति के तारतम्य से जीवसर्गात्मक प्राणीसर्ग के असंज्ञ - अन्तः संज्ञ-ससंज्ञ रूपेण -- ऐकात्मक - द्वयात्मक - त्र्यात्मक रूपेण तीन वर्ग होजाते हैं । जिह्न पाषाणोष्टादि जड़-भूतपदार्थ कहा जाता है, उनमें जीव की केवल अर्थप्रधाना वैश्वानरकला ही अभिव्यक्त है, शेष तैजस, प्राज्ञ - नाम की दोनों कलाएँ अत्र अनभिव्यक्त हैं । अतएव संज्ञा चेष्टा- शून्य इन धातुजीवों को- ' असंज्ञजीव ' मान लिया गया है । ओषधि - वनस्पत्यादि स्तम्बवर्ग में वैश्वानर के साथ साथ तैजसकला भी अभिव्यक्त है । ३०

पृष्ठ 35

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 35 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड अतएव ये सक्रिय, किन्तु प्रज्ञाव्यापारशून्य हैं । अतएव - अन्तः संज्ञा भवन्त्येते सुख – दुःख – समन्विताः ' रूपेण इन द्वयात्मक वृक्षादि जीवों को ' अन्तः संज्ञ ' कहा गया है । तदनन्तर कृमि - कीट- पक्षी - पशु-मानत्र, इन पञ्चविध तिर्य्यक् - प्राणिसर्गों में वैश्वानर - तैजस- के साथ साथ ही ज्ञानशक्तियुता तीसरी प्राज्ञकला भी क्योंकि अभिव्यक्त रहती है । अतएव त्र्यात्मक इन जीवों को - ' ससंज्ञजीव ' मान लिया गया है | और यों जीवत्त्वेन पाँचों ही प्राणित्रर्ग सर्वात्मना समानधर्म्मा, अर्थात् प्राकृत, अर्थात् दिग्देशकालानुत्रन्धी, अर्थात् वर्त्तमानोपयोगितावादी ही प्रमाणित रहे हैं । क्या मानवेतर प्राणियों में ' आत्मा नहीं है '?, प्रश्न अत्यन्त गम्भीर है, जिसके समाधान का अत्र अवसर नहीं है । सर्वव्यापकं श्रात्मा विभूति सम्बन्ध से कहाँ नहीं है?, यह प्रतिप्रश्न भी इस प्रश्न का एक समाधान है | ‘ ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत् ' का कौन विरोध कर सकता है? । समस्या है केवल स्वरूपानुगता अभिव्यक्ति की । मानवेतर प्राणियों में ग्रात्मा स्वस्वरूप से कदापि अभिव्यक्त नहीं है, जबकि मानव में ' आत्मा ' स्वस्वरूप से सर्वात्मना अभिव्यक्त रहता है । मानव का ससंज्ञ जीवभाव इस अभि-व्यक्त श्रात्मा से नित्य - समन्वित रहता है, जबकि मानवेतर प्राणियों का जीवभाव केवल प्रकृति से ही समन्वित रहता है! यही मानव, और इतर प्राणियों में वह मह महान् विभेद है, जिसके अनुबन्ध से मानव बुद्धिजीवी प्राणियों की अपेक्षा भी श्रेष्ठ प्रमाणित होरहा है । केवल शरीरजीवी भूतों ( असंज्ञ धातुवर्ग, एवं अन्तः संज्ञ वृक्षादि वर्ग ) का एक विभाग है । इसे सामान्यवर्ग कहा जायगा, जिसके साथ कोई श्रेणि -- विभाग नहीं माना जायगा | तदपेक्षया मनोजीवी उन कृमि - कीट - पक्षी - पशु आदि सामान्य प्राणियों का स्थान आयेगा, जिह्न लोकभाषा में--' प्राणी ' कहा जाता है । भूतवर्ग की अपेक्षा अवश्य हीं इह्न ही श्रेष्ठ कहा जायगा । तदपेक्षया उन विशेष प्राणियों को श्रेष्ठ माना जायगा, जो मन के साथ साथ बुद्धिजीवा भी होंगे । और इनकी अपेक्षा भी मानव: इसलिए श्रेष्ठ माना जायगा कि, यह बुद्धि से भी प्रतीत प्रकृतिभ्यः पर अवस्थित आत्मस्वरूप से अभिव्यक्त है । इसप्रकार शरीर - मन - बुद्धि- आत्मा, इन चार प्रक्रमों के क्रमिक तारतम्य से चार प्रकार के श्रेणिविभाग स्वतः ही संसिद्ध होजायँगे, जिह्न लक्ष्य बनाकर ही राजर्षि ने कहा है कि — भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । " " बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा: " -—मनुः ( १ ) - शरीरजीविनः - जड़जीवाः --- प्रथमाः - वैश्वानर - तैजसजीवाः ( २ ) -- मनोनीविनः -- सामान्यप्राणिनः - द्वितीयाः - वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ- जीवाः ३ -- बुद्धिजीविनः– विशेषप्राणिनः -- तृतीयाः वै ० तै ० प्राज्ञाः - बुद्धिमन्तो जीवाः ( ४ ) -- आत्मनिष्ठाः -- मानवाः तुरीयाः -- श्रात्मयाजिनो - मानवाः ३१

पृष्ठ 36

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 36 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रात्मनिवेदन एक प्रासङ्गिक रहस्य - पूर्ण समन्वय । व्यंक्ता प्रकृति का जिस जीवसर्ग से सम्बन्ध है, वह गुणात्मिका, अतएव विषमा है । विषमता ही इस प्रकृति का स्वरूप - समन्वय है । अतएव दार्शनिकों नें सत्त्व - रज - स्तमो-नामक प्राकृत -- गुणों के साम्य को प्रलयावस्था का ही प्रवर्तक माना है । विषमवर्त्त नत्त्वानुगत विभिन्न-कत्तत्त्व ही प्रकृति, किंवा प्राकृत - विश्व की स्वरूप - परिभाषा है । जीवभाव इसी विषमता के आधार पर व्यवस्थित, सुरक्षित है । इसी विषमता के कारण प्राकृत जीवों में पारस्परिकी प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न होती है । इसी प्रतिद्वन्द्विता के कारण जीवों में परस्पर हिंसाभाव जागरूक है, जिसके आधार पर ही मात्स्य न्यायमूलकं-' जीवो जीवस्य नाशनम् ' यह प्राकृत-- सिद्धान्त व्यवस्थित हुआ है । प्रत्यक्ष - दृष्ट - दिग्देशकालानुबन्धी स्वार्थ पर क्रव्यादमांसानुगामी शृगालवत् श्राक्रान्त होपड़ना, तन्निरोधक को मार बैठना, और यों परस्पर के आक्रमण-भावों से जीविका - निर्वाह करते रहना, यही जीवभावापन्न यच्चयावत् प्राणियों की जीवनपद्धति है, जिसके आधार पर ही सम्भवतः -- ‘ दैवा निर्बलघातकः ' यह भावुकतापूर्णा सूक्ति प्रचलित होपड़ी है । इसी पारस्परिक अन्न--अन्नाद - भाव को लक्ष्य में रखकर श्रुतिने सर्वमिदमन्नम्, सर्वमिदमन्नादः ' यह कहा है । सब खाने वाले हैं, हिंसक हैं, एवं सत्र खाए जारहे हैं । पारस्परिकी इसी प्राकृतिकी हिंसा का नाम है- ' जीवभाव ', इसी का नाम विषमा - प्रकृति, और यही है प्राकृत- पश्वादि जीवों का सामान्य -- धर्म्म । मानव भी अंशतः नीव अवश्य है । किन्तु यह आत्मस्वरूपाभिव्यक्तित्त्व से सनातनजीव है, दिग्-देशकालातीत आत्मरूप, आत्माभिन्न जीव है । अतएव अंशतः प्राकृत रहता हुआ भी यह अपने मौलिक आत्मभाव से अप्राकृत ही है । इसी अप्राकृत - अलौकिक - आत्मभाव से यह मानव अपने प्राकृत - जीवानुगत वैषम्य पर अमुक - सीमा पर्य्यन्त नियन्त्रण लगाने में समर्थ होजाता है । उसी नियन्त्रणसूत्र का गम है— ' समदर्शन ' । श्रात्मा हीं सर्वत्र सम है, अतएव समदर्शन आत्ममूलक ही हो सकता है । श्रात्मसाम्यमूलक इसी समदर्शन से अपने प्राकृत विषमवर्त्तन को नियमित, छन्दोबद्ध बनाता हुआ मानव प्रकृति की स्वतन्त्रता-स्वैराचारिता - से अनुप्राणिता अमर्य्यादिता - निःसीमा विषमता पर विजय प्राप्त कर लेता है । श्रात्मसाम्य हीं मानव में - ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' लक्षण श्रात्मानुवन्धी नैष्ठिक - हिंसाभाव जागरूक कर देता है, जोकि ‘ अहिंसा ’ – भाव हिंसासापेक्ष ही माना गया है । आत्मसाम्य के विरोधी प्राकृत वैषम्यों की हिंसा, एवं आत्मसाम्योपयिक प्राकृत वैषम्यों का समादर, यही भारतीय - उत्तरदायित्वपूर्ण, अतएव नैष्ठिक अहिंसा - हिंसा - भावों का तात्त्विक – स्वरूप - समन्वय है, जिसके आधार पर ही - ' आततायिनमायान्तं हन्यादेवा-विचारयन् ' सिद्धान्त स्थापित हुआ है । इसी आधार पर महाभारतने हिंसक पशुओंों की मृगया का समर्थन किया है । ठीक इसके विपरीत आत्मसाम्य - विरोधी प्राकृत - वैषम्यों की हिंसा, तथा श्रात्मसाम्योपयिक वैषम्यों की हिंसा से तो प्राकृतिक - हिंसा - भाव को प्रचण्डरूपेण समुत्तेजन ही मिलता है । अतएव अहिंसा, और हिंसा की व्यवस्था का एकमात्र मापदण्ड मानव का आत्मसाम्य ही प्रमाणित होगा । इसकी उपेक्षा कर देने पर जो भी भावुकतापूर्ण - जीवभावनिबन्धन - काल्पनिक - ' अहिंसावाद ' उपक्रान्त होगा, उसके द्वारा तो हिंसा को ही प्रचण्डरूपेण प्रोत्साहन मिलेगा, जिस इस तथ्य के सम्बन्ध में भारतराष्ट्र का त्रिसहस्रवर्षात्मक इतिहास ही साक्षी है । * ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । ( गीता ) शो नानाव्यपदेशात् ( व्याससूत्र ) ३२

पृष्ठ 37

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 37 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड आत्मसाम्य से वञ्चिता, अहिंसा की प्रतिष्ठा से पराङमुखा दिग्देशकालानुबन्धिनी स्वार्थमूला जिस हिंसा से दुष्टबुद्धि दुर्योधन के द्वारा कुरुकुल के मूलोच्छेद का, तथा भारत - वैभव के सर्वनाश का ताण्डव होपड़ा था, वह भगवान् के आत्मसाम्यमूलक हिंसाभाव के आधार पर प्रतिष्ठित आततायीवध रूप उत्तरदायित्त्वपूर्ण हिंसाभाव से अंशतः उपशान्त हुआ, और यह उपशान्ति आगे के दो सहस्र - वर्ष पर्य्यन्त प्रक्रान्त रही | किन्तु आगे चलकर मानव के व्यक्तित्त्व - विमोहन से पुनः श्रात्मसाम्य विस्मृत होगया । सर्वजगदधिष्ठाता आत्मब्रह्म, सत्ताब्रह्म उपेक्षणीय बन गया प्रत्यक्षमूला भावुकता के अनुबन्ध से । परिणामतः श्रात्मसाम्य का स्थान काल्पनिक प्राकृतिक – साम्यने हीं अपहृत कर लिया, जैसाकि कदापि सम्भव है नहीं प्रकृति के सहज सिद्ध विषम क्षेत्र में । इसी काल्पनिक प्राकृतिक - साम्य के आधार पर अनात्मवादमूलक काल्पनिक ही ' अहिंसावाद ' जन्म ले पड़ा, जिसने निष्ठापूर्ण सभी आचारसूत्रों की तो करदी उपेक्षा, एवं काल्पनिक सत्य, करुणा, दया, आदि वागू-विजृम्भृणों के आधार पर सत्यं - शिवं सुन्दरं लक्षण विश्व को प्रमाणित कर दिया क्षणिकं - क्षणिकं, शून्यं-शून्यं, और दुःखं दुःखं ही । भावुकतापूर्णा इसी अहिंसाने - ' परमधर्म्म ' का स्थान ग्रहण कर लिया, जिसके अनुग्रह से ही आततायीवर्गों को राष्ट्रध्वंस के लिए पर्याप्त छिद्र मिल गया, और क्या परिणाम हुए विगत तीन सहस्रवर्षों के तथाकथित अनात्मवादमूलक - काल्पनिक सत्य - अहिंसा - करुणा - दया -- आदि विजृम्भणों से?, प्रश्न का समाधान विस्पष्टतम है । जिस क्षण से इत्थंभूता प्रकृतिनिबन्धना, श्रात्मसाम्यवञ्चिता, अनात्मवादमूला श्रहिंसा ने जन्म लिया, उस क्षण से आरम्भ १ र वर्त्तमान क्षण पर्यन्त भावुक भारतराष्ट्र हिस्रक – वर्बर -- श्रात-तायी -- दस्यु -- नरराक्षसों के द्वारा निरन्तर रक्तस्नान ही करता प्रारहा है, और हम आज भी विषमदर्शनानुगता-समवर्त्तनमूला -- महती भावुकता के वारुणपाश में आवद्ध होते हुए उसी काल्पनिकी प्राचीना? अहिंसा का निरर्थक उद्घोष ही करते जारहे हैं । जबतक हम — ' समदर्शनमूलक - विषमवर्त्तनात्मक ' वैज्ञानिक सत्य-सिद्धान्त को अपनी मूलप्रतिष्ठा नहीं बना लेते, जबतक आत्मसाम्य को मानव की आधारभूमि नहीं बना लेते, जबतक आत्मसाम्यमूला - हिंसासापेक्षा - हिंसा का मर्म्म हम हृदयङ्गम नहीं कर लेते, तबतक भावुकतापूर्ण प्रयत्न - सहस्रों से भी, प्रकृतिनिबन्धन - जीवभावानुगत - काल्पनिक – मानव - मानवता - मैत्री -- सहास्तित्त्व -आदि का उसद्घोष करते हुए भी कदापि हमारा स्वानिक अभ्युदय भी सम्भव नहीं है । क्योंकि प्रकृति का नाम कानि मानव नहीं है । कदापि शरीर, मन, बुद्धि, तीनों में से किसी का भी नाम मानव नहीं है । अपितु मानव नाम है ग्रात्मपुरुष की अभिव्यक्ति का, जिसका केन्द्रात्मक ' मनु ' से ही सम्बन्ध माना गया है । परिधि, और केन्द्र, दो के सह - समन्वय से ही मानव को परिपूर्णता निष्पन्न हुआ करती है । क्रिया-शील -- विचाली - गति -- भाव का ही नाम है - ' परिधि ', एवं निष्क्रिय - विचाली - स्थितिभाव का ही नाम है-' केन्द्र ' । हम देखते हैं कि, मानवस्वरूप से अनुप्राणित पूर्वनिर्दिष्ट शरीर, मन, बुद्धि, नामक तीनों हीं प्राकृत-तन्त्र विचाली हैं, गतिभावापन्न हैं, अतएव परिधिरूप हैं उसी प्रकार - जैसे कि इन तीनों के मूलभूत भूपिण्ड-चन्द्रमा -- सूर्य्य - तीनों हीं मण्डलात्मक बनते हुए परिधिरूप ही प्रमाणित होरहे हैं । चन्द्रमा घूम रहा है भूपिण्ड के चारों ओर, तो भूपिण्ड घूम रहा है सूर्य के चारों ओर । एवमेव सूर्य्यं घूम रहा है परमेष्ठी के चारों ओर, तो परमेष्ठी परिभ्रममाण है स्वयम्भू के चारों ओर । यही - ' वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांस्यस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ' ( ऋक संहिता - १ | १६४ | ६ | ) के अनुसार स्थिर - केन्द्रात्मक - अज - अव्ययपुरुषतत्त्व है । इसी को आधार बनाकर परिधिरूपेण सूर्य चन्द्रादि परिभ्रममाण हैं स्वस्व अक्ष -- दक्ष - क्रान्ति - -- अयनादि वृत्तों के माध्यम से । सर्वकेन्द्रात्मक वही मूलप्रतिष्ठातत्त्व अव्यय मनोरूप ' मनु ' तत्त्व है । इसी सनातन श्रात्म-३३

पृष्ठ 38

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 38 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रात्मनिवेदन मनु की रश्मियों से जहाँ प्रकृति, तथा प्राकृत जीवों का सञ्चालन होरहा है, वहाँ मनु साक्षात् केन्द्ररूप से मानव की स्वरूप -- प्रतिष्ठा बने हुए हैं । और यही स्वतन्त्र मनुः-- केन्द्रात्मक मानव की आत्मपुरुषनिबन्धना सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता है, जिसके द्वारा ही यह स्वतन्त्र पुरुषार्थ - साधन में समर्थ माना गया है, जबकि मनु के विकेन्द्रित रश्मिभावों से अनुगृहीत मानवेतर जीव स्वतन्त्र केन्द्रसम्पत्ति से वञ्चित रहते हुए स्वतन्त्र पुरुषार्थ करने में असमर्थ, अतएव प्रकृत्याधीन हीं बने रहते हैं । ' शाश्वतब्रह्मात्मक ' मनु * ह्रीं आत्मरूप पुराणपुरुष है । इसकी स्वतन्त्रा केन्द्र।त्मिका अभिव्यक्ति से ही अमुक प्राणीश्र ेष्ठ - ' मानव ' कहलाया है, जो अपनी श्रात्म--निबन्धना पुराणपुरुषता से -'अमृतस्य पुत्रा अभूम ' रूपेण ' अमृतपुत्र ' कहलाया है, ' सनातन ' माना गया है । दिग्देशकालानुबन्धिनी व्यक्ता - मूर्त्ता - वर्त्तमान कालात्मिका, अतएव प्रतिक्षणविलक्षणा - परिवर्त्तनशीला प्रकृति से अनुप्राणिता नवीनता कदापि इस पुरातन - सनातन -- श्रमुतपुत्र मानवश्रेष्ठ के स्वरूप का मापदण्ड नहीं बन सकती, नहीं बन सकती, जैसाकि निर्वचनानुगता इसकी नाममहिमा से ही स्पष्ट है । मनुपुत्रत्वेन मनु-रूप पुरातनतत्त्व प्रमाणित होने से -- ' मनोरपत्यम् ' निर्वाचन से जहाँ यह ' मानव ' नाम से प्रसिद्ध है, तथैव--' मा -- नवः ' इति -- मानवः ' निर्वचन से भी इसे ' मानव ' कहना अन्वर्थ ही प्रमाणित होरहा है | नव:, अर्थात् प्रकृतिनिबन्धन -- परिवर्त्तनात्मक नवीनभाव जिस श्रात्मनिष्ठ में अन्तर्गर्भित होजाय, नवीनता का मापदण्डात्मक एवं नवीनता का मर्य्यादाछन्दोरूप, किंवा अनर्गला --पुरुषात्मवञ्चिता काल्पनिकी नवीनता का निषेधात्मक भाव ही ' मानव ' रूपेण ' मानव ' प्रमाणित होरहा है । निश्चयेन दिग्देशकालातीत, किन्तु दिग्देकालप्रतिष्ठारूप शाश्वत सनातन - श्रात्ममनुरूप ‘ पुरुषात्मा ' ( अव्ययात्मा ) हीं मानव का आत्मभाव है, तन्निबन्धना पराप्रकृतिरूपा श्रव्यक्ता प्रकृति ही इस आत्ममानव का जीत्रभाव है, एवं अपराप्रकृतिरूपा - व्यक्ता मूर्त्ता - प्रकृति ही इस आत्ममानव की शरीर - मनो - बुद्धि - तन्त्र-त्रयी है | आत्मभावानुगत जीवभाव आत्मभाव में हीं अन्तर्भूत है । अतएव अन्ततोगत्त्वा मानव की स्वरूप-संस्था में - ' आत्मा - बुद्धि - मन - शरीर ' इन चार भावों का ही समन्वय प्रमाणित होजाता है । और यही ऋषि-दृष्ट ' मानव ' के तात्त्विक स्वरूप की ज्ञान - विज्ञान - सिद्धा सनातन - स्वरूप - व्याख्या है, जिसका आरम्भ का श्रात्मपर्व दिग्देशकालातीत- अप्राकृत - केन्द्रात्मक - ' पुरुषतत्त्व ' है, एवं बुद्धयादि तीनों पर्व दिग्देशकालात्मक-प्राकृत - परिधिरूप - ‘ प्रकृतितत्त्व ' है । पुरुष, और प्रकृति के एकत्र समन्वितरूप का ही नाम है - मानव |. पुरुषभाव मानवस्वरूपानुगत ' पुरुषभाव ' है, अतएव यह निष्ठात्मक है, एवं प्रकृतिभाव इसी मानव का‘स्त्रीभाव ' है, अतएव यह भावुकता - प्रधान है । मानव के भावुकतापूर्ण प्रकृतिलक्षण इसी स्त्रीभाव को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने एक स्थान पर कहा है कि - ' स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहु: ' ( ऋक्सं ० १ | १६४ | १६। ) । अर्थात् ' मानव अपने बाह्य व्यक्त मूर्त्त - दृश्यरूप से, शरीर - मनो- बुद्धिरूप से प्रकृतिरूप बनता हुआ वस्तुतः स्त्री ही है, जिसे कि पुरुष कहा जारहा है ' । मानव का पुरुषभाव तो दिग्देशकालातीत

* एतमके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।

इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्मशाश्वतम् ॥

-मनुः ३४

पृष्ठ 39

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 39 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड है, अप्राकृत है, अदृश्य है, परोक्ष है, जिस उस परोक्ष पुरुषात्मभाव पर ही मानव का प्रत्यक्षात्मक स्त्रीरूप ( प्राकृतस्वरूप ) प्रतिष्ठित है । अतएव श्रात्मपुरुष की प्रतिष्ठा से, योग से वञ्चित मानव की बुद्धि भी भावुक है, मन भी भावुक है, शरीर भी भावुक है । अर्थात् आत्मशून्य बौद्धिक - मानसिक - शारीरिक - व्यापार तो नितान्त भावुकतापूर्ण वैसे ' स्त्रीभाव ' ही हैं, जिनकी तात्कालिकता के अतिरिक्त और कोई भी सनातन-प्रतिष्ठा नहीं है । क्या इसका यह तात्पर्य्यं है कि, श्रात्मनिष्ठ मानव दिग्देशकालानुबन्धी- प्राकृत - व्यक्त - मूर्त्त - विश्व की उपेक्षा ही किए रहता है? । विगत तीन सहस्रवर्षों में आत्मवादी आस्तिकदर्शन, तथा अनात्मवादी नास्तिकदर्शन, दोनोंनें हीं इस प्रश्न का - ' ओमित्येतत् ' रूपेणैव समाधान करते रहने का जघन्यतम-अक्षम्य अपराध किया है । दिग देशकालातीत आत्मपुरुष के ज्ञान - विज्ञानात्मक आधिदैविक सत्यं शिवं-सुन्दरं भावापन्न विश्व के तात्त्विक स्वरूप समन्वय से संस्पृष्ट बने रह जाने वाले, केवल श्रात्मपरायण, अर्थात् आत्मविमूढ आस्तिकदर्शनने जहाँ - ' ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या ' कहते हुए श्राचारसौन्दर्य्य का ग्रीवानिकृन्तन कर लिया है, वैसे ही अनात्मवादी - केवल प्रकृतिपरायण, अर्थात् प्रकृतिविमूढ नास्तिक दर्शन ने भी विश्व को क्षणिक - शून्य - दुःखैकसार ही मान बैठने की महती भ्रान्ति करली है । और यों विगत त्रिसहस्रवर्षाांत्मक भारत-राष्ट्र के इन उभयविध ं आत्म - अनात्मवादी- दोनों ह्रीं दार्शनिकोंनें क्रमश: अपने आपको दिग्देशकालातीत-विमूढ, तथा दिग्देशकालविमूढ बनाए रखते हुए पुरुष, और प्रकृति, दोनों को ही जलाञ्जलि समर्पित कर - ‘ न स्त्री, न पुमान् ' लक्षणा सुप्रसिद्धा तृतीया श्रेणि को ही समलङ्कृत कर दिया है, जिनके इस तृतीयभावानुबन्ध से ही भारतराष्ट्र तथोक्ता अवधि में प्रजननशक्ति - सृजनशक्ति - शून्य षण्ढभाव का ही अनुगामी बनता चला रहा है, इति नुब्रह्मण्यमेव । जिसप्रकार दिग्देशकालातीत श्रात्मपुरुष प्रतिष्ठा के बिना दिग्देशकालात्मक - शरीर -- मनो - बुद्धि - व्या-पार, निरर्थक, भावुकतापूर्ण, अतएव आरम्भ में ग्रनिष्टकर, किन्तु अन्ततोगत्वा सर्वनाशकर है, तथैव दिग्--देशकालात्मिका प्रकृतित्रयी से पृथग्भूत मानवीय केन्द्रात्मक पुरुष भी अपनी ' पुरुष ' अभिधा से पृथक् होता हुआ मानवस्वरूप का उच्छेदक ही बन जाया करता है । अतएव दोनों का समन्वय ही सन्वयद्वयात्मक मानव-स्वरूप के अभ्युदय -- निःश्रेयस् का कारण बना करता है । " पुरुष की प्रतिष्ठा के आधार प ही प्रकृति की दिग्देशकालानुबन्धिनी मर्यादा का समदर्शनात्मक - विषमवर्त्तनरूपेण अनुगमन ” यही ‘ मानव की मानवता ' का एकमात्र निर्भ्रान्त राजपथ माना गया है, जो कि निर्भ्रान्त राजपथ तथाकथित आस्तिक--नास्तिक - दर्शनों की महती कृपा? से, तथा तत्सन्ततिरूप ही धर्म्मव्याजात्मकं गणित मतवादों के निग्रहा -त्मक अनुग्रह से विगत तीन सहस्रवर्षों से राष्ट्रीय - प्रज्ञा से परोक्ष ही बनता चला रहा है, इति नु मह-द्दुःखास्पदम्! हाँ, तो अब हमें उस महान् प्रश्न पर श्राजाना चाहिए जिसका -- ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' के सम्ब-न्ध में उत्थान हुआ था । प्रकृतिवादपरायण बुद्धिवादी, मनोवादी, शरीरधर्म्मा - कामभोगपरायण मानव तो यही कहेगा कि, फलकामुक, तथा यथेच्छ सामयिक - लाभप्रद -- कम्र्मों के अनुगामी मानव का न तो स्मृतिविभ्रम ही होता, न बुद्धि ही उसकी नष्ट होती । रही बात ' नाश ' की, सो इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष का भूतवादी जगत् ही प्रमाण है कि, जैसी भौतिक सुख - समृद्धि का उपभोग आज का वर्त्त मानवादी समय चतुर - लोककलाकुशल, समय ३५

पृष्ठ 40

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आत्मनिवेदन से येनकेनाप्युपायेन लाभ उठाने वाला मानव कर रहा है, शास्त्रभक्त, तत्कर्म्मभक्त - प्राचीन पन्थी तो तथाविधा सुख - समृद्धि की स्वप्न में भी कल्पना भी तो नहीं कर सकता । सत्यं चैतत् । निवेदन करेंगे हम तथाविध लाभानुगामी मानत्रों से कि, भारतीय शास्त्र की दृष्टि से भी वैसा वर्ग भी, उसकी तथाकथिकता सुख - समृद्धि? भी परोक्षा नहीं है । स्वयं श्रुति ने भी - ‘ बलं सत्यादोजीयः ' रूपेण आसुरीसम्पत्तिवद्ध'क ' बब ' ( भूतबल ) को बलारासि शची-पति -- देवन्द्रमूला शान्ति -- समृद्धि के समतुलन में आरम्भ में ' ओजस्वी ' ही माना है । और व्यामोहनात्मिका चलप्रधाना प्रकृति का यही तो प्रत्यक्ष प्रभावात्मक, अतएव नितान्त - भानुकतापूर्ण वह महान् ' वर्त्तमान ' व्या-मोहन है, जिससे श्रात्मनिष्ठा के बिना परित्राण कर लेना कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । राजर्षिने एक स्थान पर रसप्रधान - आत्मपुरुष की प्रतिष्ठा से वञ्चित, अतएव बलप्रधान -- तमोमय- प्रत्यक्ष प्रभावात् - दिग्देश-कालानुत्रन्धी - यथेच्छा -- कम्मत्मिक - ' अधर्म्म ' रूप कर्त्तव्यों के सम्बन्ध में यह स्पष्ट किया है कि, - आत्मप्रतिष्ठा-वञ्चित, अतएव अधर्म्मात्मक तमोमय - श्रासुर -- कम्मों से मानव तत्काल भूतसमृद्धि से सम्पन्न होजाता है, अर्थात् शरीर - मनोपयोगी? भूतभौतिक परिग्रह प्रचुरमात्रा में सुविधा से इसे उपलब्ध होजाते हैं । प्राप्ता इस भूत--सम्पत्ति के बल पर ही यह काम - भोगात्मक - सुख परम्परानुगत - ' भद्र ' भावों का भी अनुगामी बन जाता है । इसी भूतसमृद्धि के वितरणकौशल से यह स्वसमानधर्म्मा निर्बल प्रतिद्वन्द्वियों पर विजय भी प्राप्त कर लेता है । इसप्रकार देखने सुनने कहने कहलवाने के लिए प्राकृत - लोकचतुर मानव सर्वथैव सभी दृष्टियों से सुखी -- समृद्ध प्रतीत होने लगता है । किन्तु अन्ततोगत्त्वा, और निश्चयेन संग्रहकाल में भी इसकी आभ्यन्तर स्थिति कैसी बनी रहती है?, प्रश्न का समाधान तो भुक्तभोगी ही कर सकेंगे ' समूलस्तु विनश्यति ' के आधार पर * । क़्या तात्पर्य्य है - इस “ समूलस्तु विनश्यति ” का? | जो तात्पर्य्य - ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' का है, वही तात्पर्य्य इस मनुवचन का है । मरके के अनन्तर साम्परायगतिभोग में तथाविध मानव को किन किन नारकीय -- गतियों का माननीय अतिथि बनना पड़ता है?, लोकान्तरानुगामी इस ' नाश ' की चर्चा का हम सन्निवेश नहीं करना चाहते, इसलिए कि, बुद्धिवादी प्रत्यक्षवादी की दृष्टि में परलोक - नरफ - सभी कुछ कल्पना हीं कल्पना है । अतएव हम इस की भूतमूला प्रत्यक्षमान्यता की दृष्टि से ही दो शब्दों में ' नाश ' की परिभाषा का समन्वय - प्रयास कर लेते हैं । ' अयुक्त ' शब्द का जो अर्थ है, अंशतः वही अर्थ - ' नाश ' शब्द का है । प्रदर्शनात्मक – ‘ णश् ’ धातु. ( ' णश् ' अदर्शने ) धातु से करण में - ' घन् ' प्रत्यय करने से ही - ' नाशः ' शब्द निष्पन्न हुआ है । विद्यमान वस्तु का विलुप्त होजाना हीं उसका प्रदर्शन है । मृत्यु से शरीर दाहानन्तर क्योंकि विलुप्त होजाता है, इसलिए मरजाने का भी नाम -- ' नाश ' होगया है । तथैव यदि कोई व्यक्ति अमुक कर्म्म से लज्जा का अनुभव करता हुआ उस कर्म्म को परोक्ष बना लेता है, अथवा तो वैसा लज्जाजनक कर्म्म कर स्वयं पलायित होजाता है, तो यह भी प्रदर्शनात्मक - ' नाश ' ही कहलाया है । यदि मानव का स्वस्वरूप, स्वशान्ति किह्नीं कारणों से उच्छिन्न होजाती है, तो यह परिध्वंस भी - ' नाश ' ही कहलाया है । इसप्रकार -- ' नाशः -- पलायने,

* - श्रधर्मेणैधते तावत्, ततो भद्राणि पश्यति ।

ततः सपत्नाज्जयति, समूलस्तु विनश्यति ॥

— मनुः ३६