Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 211–220
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220
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६७६ वर्णवागनुगता मानवसृष्टि ६७७ भूवायु - और चान्द्रजीव ६७८ चान्द्रमण्डल, और चान्द्रजीव विषयसूची ३४० १०१० शास्त्रदृष्टि की प्रामाणिकता 17 १०११ चरक का भूतोपशमनीयाध्याय ३४२ 11 22 22 १०१२ ‘ मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ३४३ ६७६ चान्द्र - सौरभाव, और चान्द्रजीव ६८० भू- वायुरनुगत पिशाच, राक्षस, यक्ष ६८१ रक्तानुगत - राक्षस. ६८२ पिशाच, और यक्ष में तारतम्य ९ ८३ सौम्यवायु, और यक्ष ६८४ ' अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता ६८५ वारुणी - श्रासुरयोनि ६८६ बाल - स्त्री - वर्ग, और सुरप्राण ६८७ ' रक्षांसि योषितमनुसचन्ते ' ६८८ चतुष्पथ, और रुद्रदेवता ६८६ रुद्र का जान्धित - प्रज्ञात स्थान ६६० मध्याह्नरेखा, और चतुष्पथ ६६१ उर्वशी अप्सरा, और मध्यरात्रि ६६२ श्रौत विज्ञानसिद्धा - प्रतयोनि ६६.३ ‘ नाष्ट्रा रक्षांसि ’ ६६४ नाष्ट्रा, राक्षसों का आक्रमण ६६५ चान्द्र - परिप्लवमण्डल ६६६ चन्द्रमा, और गन्धर्वयोनि ६६७ चन्द्रमा, और पितरयोनि ६६८ चन्द्रमा, और ऐन्द्र, प्राजापत्य ६६६ देवयोनि में तारतम्य १००० इन्द्रियों का विकास - तारतम्य १००१ मानव, और ११ इन्द्रियाँ १००२ देवयोनिवर्ग, और २८ इन्द्रियाँ १००३ महर्षि पतञ्जल काप्य १००४ आथर्वण – कत्रन्ध १००५ कबन्ध से गृहीता काप्यपत्नी १००६ अथवां के महत्त्वपूर्ण प्रश्न १००७ उद्दालक की मौनवृत्ति १००८ अथर्वा के द्वारा समाधान १००६ प्रत्यक्षदृष्टि की निमूलता 77 " " 71 ३४१ 21 17 १०४३ ' असन्न व स भवति ' १०१४ चान्द्रदेवता समन्वय १०१५. त्रिविक्रमविष्णु १०१६ मूलात्मा और विष्णु १०१७ हंसात्मा, और क्रियातन्त्र १०१८ शिवात्मा और ज्ञानतन्त्र १०१६ ‘ ज्ञानमिच्छेन्महेश्वरात् ' १०२० सांख्यसम्मत १४ भूतसर्ग. 17 १०२१ वैदिक - विज्ञानानुगता जीवसृष्टि " १०२२ मूलात्मा विष्णुः 12 १०२३ हंसात्मा ब्रह्मा १०२४ इन्द्रात्मा शिवः 1 १०२५ परमप्रजापति ३४२ १०२६ अतिविराट् - परमेश्वर - महान् " १०२७ महाविराट् महेश्वर- महान् " 31 १०२८ क्षुद्रविराट् - ईश्वर - पर 11 १०२६ जन्तुविराट् - जीव - परावर " १०३० भ्रूणविराट्, जीवाणु, अवर " १०३१ एषा ब्राह्मीस्थितिः " १०३२ चान्द्रदेवधर्म्मस्वरूप - समन्वय 71 " " 22 " " " 19 ३४४ 33 " ३४५ " 73 इति - चान्द्रदेवस्वरूपदिग्दर्शनम् ३ 21 " ४४
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शतपथ - प्रथमखण्ड अथ - भूतदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् १०५२ श्रन्तर्य्यामी - देवता ४ -१०३७ वाङ् मय - भौतिकपदार्थ ३४५ " 46 १०५३ विकुर्वाण - अव्यय १०५४ कुर्वाण - अक्षर १०५५ क्रियमाण - क्षर १०५६ हृदयस्थ अन्तर्य्यामीदेवता १०५७ ब्रह्माक्षरदेवता, और ' यम् ' १०५८ इन्द्राक्षरदेवता, और ' द ' १०५६ विष्ण्वक्षरदेवता, और ' हृ ' १०६० अन्तर्य्यामी ‘ हृदयदेवता ' ३४७ " 93 27 ३४८. 39 37 ३४६ 67 " १०६१ विश्वभुवन प्रतिष्टात्मक अन्तर्यामी 17 " १०६२ सत्यप्रजापति, और अन्तर्यामी 11 " १०६३ नियतिः सत्य, और अन्तर्यामी १०३३ पुरुषविध - अचेतन - भूतदेवता १०३४ ‘ देवेभ्यश्च जगत्सर्वम् १०३५ भौतिक पदार्थ, और भूतदेवत । ११३६ देव, और देवता १०३८ भूतमयी वाक् की सर्वव्यापकता १०३६ प्राणसमन्वित वाङमय भूत १०४० ‘ प्रारणे हीमानि भूतानि युज्यन्ते ' १०४१ नीरूप - प्राणतत्त्व १०४२ प्रत्यक्षानुगत - भूतवर्ग १०४३ प्राण की व्याप्ति और प्राणदेवता १०४४ प्राणदेवमय भूत का देवतात्त्व १०४५ विधरणधर्म्मा प्राण १०४६ ‘ प्राणः प्रजानामुद्यति ' १०४७ प्राणाभिन्न भूतदेवता १०६४ नियतिचर, और अन्तर्यामी " 21 " " " १०६५ अन्तर्य्यामी का अतिक्रमण, और मनुष्य " 29 १०६६ अनृतसंहित- मनुष्य " 29 १०६७ श्रन्तर्य्यामी की स्वरूप - प्रतिष्ठा १०६८ देवताओं का प्रतिवृद्धप्रपितामहात्मक अक्षर 29 १०६६ अव्ययपुरुष, और अक्षरदेवता १०७० अव्ययोक्थात्मा ३४७ इति - भूतदेवता - स्वरूप - दिग्दर्शनम् ४ १०७१ अक्षरार्कप्राण ( १०७२ अर्क, और प्राणदेवता १०७३ ‘ आत्मदेव ' समन्वय १०७४ अन्तर्यामी, और सूत्रात्मा १०७५ अन्तर्य्यामी का यशोवर्णन अथ - ग्रभिमानी- देवता - स्वरूप - दिग्- १०७६ वस्तुस्वरूपसत्ता, और ‘ अद्द’भाव दर्शनम् ५ १०४८ श्रभिमानीदेवता १०४६ ' विशेषानुगतिभ्याम ' १०५० आत्मदेवता १०५१ एक की वैभवव्याप्ति ३४७ १०७७ आत्मदेवता, और अभिमानीदेवता III 11 " इति - अभिमानी- देवता - स्वरूप - दिग्-दर्शनम् ५ ४५
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विषयसूची अथ - मन्त्रदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् १०६३ अथ कर्म्मदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् ३५० १०७८ मन्त्रदेवता ६ १०७ ९ ' इमे अन्तरात्मन् प्राणाः ’ १०८० प्राधिदैविक - प्राणदेवता १०८१ छन्दोमय - देवता १०८२ छन्दोदेवतानुगत प्राणदेवता १०८३ बृहतीवाक्, और स्वरतत्त्व १०८४ स्वरतत्त्व, और ' मन्त्र ' १०८५ मन्त्र, और मन्त्रदेवता १०८६ मन्त्रदेवता का शक्तिभाव १०८७ मन्त्रदेवतास्वरूप – समन्वय ३४६ उपरतञ्चेदं अष्टविधदेवनिरूपणम् इति - मन्त्रदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् ay ६ 17 19 33 " १०६४ त्रयस्त्रिंशद्विध ( ३३ ) सौरदेवता " 33 १०६५ नवतीर्नवविध ( ६६ ) असुरदेवता १०६६ यशोवीर्य्यात्मक प्राणदेवता १०६७ प्राणवञ्चित प्रजापति १०६८ प्राणशून्य प्रजापति का वारुणभाव १०६६ वरुण, और पाशबन्धन ११०० पाशबन्धन, और मलीमस असुर १ ९ ०१ त्रिगुणितं सुरवर्ग ११०२ पारमेष्ठ्य - मलीमस त्रिप्राण ११०३ ' न त्रिः ', और ' अत्रि: ' ११०४ अत्रि, और त्रात्रेयी योषित् ( स्त्री ) ११०५ अस्पृश्या - मलीमसा - आत्रेयी अथ - आत्मदेवतास्वरूप - दिग्दर्शनम् ११०६ आन्य- वारुणप्राणात्मक असुर ११०७ सौम्यप्राण का पितृत्त्व ११०८ वायव्यप्राण का गन्धर्वत्त्व ११०६ श्राप्यप्राण का सुरत्त्व ३५१ 17 23 22 11 19 ३५२ 73 " 33 " १०८८ आत्मदेवता १०८६ जीवात्मलक्षण भूतात्मा १०६० श्रग्नित्रयी, और भूतात्मा १०६१ देवतात्रयी, और भूतात्मदेवता १०६२ आत्मदेवता - त्वरूप - समन्त्रय ३५० १११० प्राप्यप्राण का सौम्य प्राण पर आक्रमण " 27 ११११ वायव्यप्राण से असुरप्राणनिरोध " इति श्रात्मदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् ४६ १११२ गन्धवों के द्वारा सोम की रक्षा १११३ संख्या, और बल से प्रवृद्ध असुर १११४ संख्या, और चल से न्यून देवदेवता १११५ श्र तिवचन - समन्वय १११६ इन्द्र के द्वारा नवतीर्नव असुरों का वध १११७ मनुष्यदेवता, और मनुष्य - श्रसुर " " " ३५३ 39
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शतपथ - प्रथमखण्ड १११८ आसुर त्रैलोक्य का संस्मरण १११६ देवासुर संग्राम ११२० असुर — राक्षसों का देवकर्म्म पर श्राक्रमण ३५४११२१ पात्रप्रतपनकर्म्म, और असुरदहन ११२२ पात्रप्रतपन के द्वारा असुरविनाश ११२३ पात्रप्रतपनकम्र्मोपपत्तिविराम ( ६ ) - ' पात्रप्रतपनक से अनुप्राणित बियों की स्मारक - सूची- उपरत ६ ( ७ ) ' हविग ' हकर्म्म, तथा तत्सादनकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची-पृष्ठसं ० २४६ से ३५४ पर्य्यन्त ३५४ 11 " " " " १ हविर्ग्रहण, एवं तत्सांदनब्राह्मण. ( मूल ) ३५४ १६ मन्त्रविज्ञानोपक्रम ३६४ [ ४ कण्डिका से २६ कण्डिकापय्र्यध्त ] २० ब्रह्म के शब्द पर, नामक दो विवर्त्त २१ अर्थसृष्टि, और शब्दसृष्टि " ) " " २मुलानुवाद-– ३५७ से ३६२ पर्ज्यन्त ३ वेदार्थसम्बन्धिनी महती जटिलता ४ मूलग्रन्थप्रकाशन के सम्बन्ध में ५ उरु - अन्तरिक्ष का तंस्मरण ६ राक्षस - पिशाच - प्रेत - वर्ग ३६२ २२ मुक्तिसाक्षी ब्रह्म " ३६३ २३ सृष्टिसाक्षी ब्रह्म 71 २४ श्रानन्द विज्ञानमनोमय आत्मा " " " २५ मनःप्राणवाङमय आत्मा २६ ज्ञानमय मन, और तद्विकासभूमि श्रव्यय " ७ वरुणदेवता का साम्राज्य " २७ क्रियामय प्राण, और तद्विकासभूमि अक्षर " ८ वर्षानुगत दोषप्रकोप " २८ अर्थमयी वाक्, और तद्विकासभूमि क्षर 23 ६ देवताओं की सुपुति, और वर्षा ऋतु २६ श्रव्ययानुगत वसृष्टि " ) " १० अग्नि, और इन्द्र का सार्वदैवत्य ३० अक्षरानुगता गुणसृष्टि " " ११ रुद्रवायु की शिवरूपता " ३१ क्षरानुगता विकारसृष्टि " १२ उभयतः परिच्छिन्न नाष्ट्रा - राक्षस 23 ३२ गुण - अणु - रेणु - भूत - भौतिक - विवर्त्त 27 १३ सर्वव्यापक नाष्ट्राप्राण ३३ ' गुणकुटो द्रव्यम् ' 39 १४ यज्ञात्मा, और नाष्ट्राप्राण ३४ ' अर्थ ', और वैकारिक- विश्व " १५ पात्रगत असुरप्राण, और यज्ञातिशय - निरोध " " ३५ भाव - गुण - विकार - सृष्टि, और गीता ३६५ १६ श्रासुरप्राण - निवर्त्तक प्रतपनक 11 ३६ भूतयोनि क्षरात्मा " 1 १७ हविग्रहणार्थ शकटानुगमन १८ शकटानुगता श्रासुरप्राणसमस्या ३६४ ३७ भूतभावन अक्षरात्मा " " ३८ भूतेश्वर अव्यय ४७ " 7 "
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विषयसूची ३६ सर्वभूतनिगूढ - ' गूढोत्मा ' ४० ' गूढोत्मा न प्रकाशते ' ४१ अव्ययाभिन्न- ' कार ' अक्षर ४२ ' अकारो वै सर्वावाक् ' ३६५ ७२ अर्थविज्ञानानुरूपा शब्ददृष्टि " ७३ नित्या शब्ददृष्टि और वेदशास्त्र " 11 ७५ प्राकृतिक सछन्दस्क प्राणदेवतां ७४ परोक्षार्थनिरूपिका वाक् का मन्त्रत्त्व ३६६ ३६७ 37 23 23 ४३ शब्दप्रपञ्चाधार ' अकार ' ७६ छन्दोऽनुरूप शब्दात्मक मन्त्र " " ४४ ' मकार ' और वाङमय क्षर 23 ७७ मन्त्र की अवधेया प्रयोगशैली 27 ४५ ' उकार ' और प्राणमय अक्षर 29 ७८ प्रयोगस्खलन से अनिष्ट 27 ४६ शब्दसृष्टि की ‘ अर्द्ध मात्रा ' ४७ अखण्डा - श्रद्ध ' मात्रा, और परात्पर ४८ अनन्तविश्वाधिष्ठाता विश्वातीत पारिभाषिक परमेश्वर ४६ विज्ञेय परात्पर परमेश्वर " " ७६. मन्त्रवाक् का अग्निमयत्त्व 31 ३६६ ८० लौकिक - वागग्नि की विच्छिन्नता " " 2 ८१ स्वरयुक्ता - देवमयी - सच्छन्दरका - अलौकि-की— मन्त्रवागग्नि, और तद्द्वारा असुर-विनाश 19 37 ५० श्रविज्ञेया अनुच्चार्या श्रद्ध मात्रा " ८२ ' वागवा इन्द्रः ' ५१ परात्पर, और अद्ध मात्रा " ८३ वाङ मण्डलानुगत इन्द्रप्राण ५२ अव्यय, और अकार 33 ८४ इन्द्र, और वरुण की प्रतिद्वन्द्विता " ५३ अक्षर, ओर उकार ५४ चर, और मकार ५५ ‘ तस्य वाचकंः प्रणवः ' ५६ ' ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' ५७ गुणसृष्टिमूला पञ्चतन्मात्रा ५८ शब्दतन्मात्रा का प्राधान्य ५६ शब्दद्वारा भूतचतुष्टयी का उद्गम ६ • गुणभूत की भूत में परिणति ६१ ऋणुभूत की रेणुभूत में परिणति ६२ रेणुभूत की पञ्चमहाभूत में परिणति ६३ पञ्चमहाभूतों की मूलभूता शब्दतन्मात्रा ६४ क्षरनिबन्धना प्रथमा प्राणकला ६६ क्षरनिबन्धनाद्वितीया श्रापः कला 29 ८५ मन्त्रवाक् के द्वारा असुर - निरसन कर्म्म " ८६ यज्ञ की स्वरूप- परिभाषा " " ८७ अग्नि- सोम - समन्वयात्मक - यज्ञ ८८ अन्न - ऊर्क् - प्राण - परिग्रहात्मक यज्ञ ८६ वाक् - चित्तानुगत, क्रमात्मक यज्ञ ६० अधिदैवत - अधिभूत - प्राणसंगमनात्मक यज्ञ 93 ६१ त्रिस्थानव्याप्त यज्ञ " " " " " 22 22 ६२ अधिदैवत - सौरयज्ञ का अग्निहोत्रत्त्व ६३ सायंप्रातः सम्पादित आध्यात्मिक अन्नयज्ञ ६४ भौतिक पदार्थों का अग्निमयत्त्व " " ३६८ 17 39 " " ६५ सोमाहुति से ही भौतिक यज्ञ की स्वरूप स्थिति ” ६६ यज्ञसत्ता से ही विवर्त्तत्रयी की स्वरूप प्रतिष्ठा ” 39 ६५ प्राणकलात्मक स्वयम्भमण्डल ६७ कर्म्मप्रधान यज्ञ का उदर्क 19 99 ६ यज्ञ के विविध विवर्त ६७ अपकलात्मक - आपोमय परमेष्ठीमण्डल ६८ परमेष्ठी की भार्गवी श्रम्भृणी वाक 17 ६६ अधिकारसमर्पक - अग्निहोत्र 17 77 " १०० सोमयज्ञात्मक ज्योतिष्टोम 22 ६६ परमेष्ठी की श्राङ्गिरसी सरस्वतीवाक् ७० न सन्ति यद्दच्छाशब्दाः ' ७१ शब्दार्थ का अभेद " १०१ पार्थिव श्राङ्गिरस देवताओं का द्यौ में गमन 27 77 १०२ ' द्यामङ्गिरसो ययुः 77 71 १०३ गार्हपत्यानुगत दिव्याग्नि 33 ४८
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१०४ आहवनीयानुगत दिव्याग्नि १०५. दक्षिणानुगत अन्तरिक्ष्याग्नि १०६ चान्द्र सोम की अजस्र - आहुति १०७ अन्नान्तर्गत — स्थूल - सूक्ष्म - सुसूक्ष्मभाव १०८ अन्नानुगत स्थूल पार्थिवभाग १०६ अन्नानुगत सूक्ष्म - आन्तरिक्ष्यभाग ११० अन्नानुगत सुसूक्ष्म - दिव्यभाव १११ सुसूक्ष्म - दिव्यभाव, और ' मन ' ११२ सूक्ष्म - आन्तरिक्ष्यभाव, और ' ओज ' ११३ स्थूल - पार्थिवभात्र, और ' सप्तधातु ' ११४ ' वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमों यज्ञः ' ११५ भुक्तान्न की ‘ ऊर्क ’ --११६ ' ऊर्क ' की प्राणवस्था ११७ प्राण की अशनया ' अवस्था ११८ शनाया से अन्नाहरण ११६ अन्न का पुनः ऊक, भाव १२० ऊर्क का पुन: प्राणभाव - १२१ ' अन्नोर्कप्राणामन्योऽध्यपरिन्नहो यज्ञः ' १२२ अन्न की मनःप्राणवाङ मयता शतपथ - प्रखमखण्ड १२३ अन्नोत्पन्ना प्रजा का मन्त्र: - प्राणवाङमयत्त्व १२४ अन्नगर्भस्थ प्राण १२५ प्राणगर्भस्थ मन १२६ तद्गर्भीभूत विज्ञान, और नन्द १२७ अन्न के द्वारा पञ्चकोशात्मक ब्रह्म का परिग्रहण १२८ ' अन्न ' ब्रह्म ेति व्यजनात् ' १२६ पार्थिव अन्नयज्ञात्मक हविर्यज्ञ १३० हविर्यज्ञरूपा पौर्णमासेष्टि १३१ अपरिपक्व अन्न, और ' हवि ' १३२ परिपक्व अन्न, और ‘ पुरोडाश ' अथ हविग्रहणमीमांसा वेदशास्त्र के पारिभाषिक शब्द पारिभाषिक- ' श्रद्धा ' शब्द ३६८ १३५ तेज, और स्नेह 19 " " " 11 " 17 27 १३ · तेज, स्नेहो - रूप विश्वोपादान शुक्र 11 १३७ शुक्रानुगता स्नेहगुणात्मिका श्रद्धा १३८ अग्नि में श्रद्धाशुक्र की आहुति १३६ श्रद्धा की ' सोम ' रूप में परिणति . १४० देवताओं का अन्नभूत चान्द्रसोम १४१ अन्नमय सौम्य -मन १४२ मनोऽनुगत श्रद्धातत्त्व १४३ विषयों से युक्त मन, और श्रद्धा १४४ श्रद्धा की वैय्यक्तिकी शुद्धरूपता १४५ विषय संसर्गभेद से श्रद्धा में विभेद १ ६ दैवी श्रद्धा १४७ आसुरी श्रद्धा १४८ श्रद्धा का दार्शनिक लक्षण १४६ श्रद्धामय मनस्तन्त्र ३६६ १५० ' यो यच्छ्रदः स एव सः ' 33 १५१ असद्भावना, और असद्रूपता 19 १५.२ सद्भावना, और सद्रूपता " " 22 " " 71 36 ४६ १५.३ नास्तितत्त्वोपासकों का विलयन १५४ अस्तितत्त्वोपासकों का सनातनत्त्व १५५ भावनाप्रधान मनस्तन्त्र १५६ क्षेत्रानुगता अन्नराशि १५७ अन्नराशि का शकट में स्थापन १५८ प्रथम, और अग्रभावापन्न शकटान्न १५६ प्रथमानुगत -- भाव का देवभावत्त्व १६० आत्मबलवद्ध के अग्रभाव १६१ कार्य्यनिर्भरतात्मक प्रभाव १६२ शालान्न, और सीमाभाव १६३ सीमाभाव, और अल्पता १६४ शकटान्न ग्रहण की उपपत्ति का समन्व १६५ अभ्युदय, और निःश्रेयस् १६६ सप्तदशस्तोमात्मक स्वर्ग १६७ इष्ट - आपूर्त - दत्त १६८ विद्यानिरपेक्ष - कर्म्मत्रयी
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१६६. पितृस्वर्गप्राप्तिसाधक क १७० विद्यासापेक्ष यज्ञ - तप - दान १७१ देवस्वर्गप्राप्तिसाधक कम्म विषयसूची ३७१ २०१ भस्त्रापक्ष का निराकरण ३७४ " २०२ स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया " " २०३ ' यज्ञाद्यज्ञ ' निर्मर्मा ' " १७२ काम्यकर्म्म - परित्यागात्मक सन्यास 29 २०४ शकटाभावे इड़ पात्री से हविग्रहण " १७३ सन्यास, और निःश्रेयस ३७२ २०५ इडाप्राशनपरिपाकपात्री 11 १७४ अकर्म्म, और विकम्म " २०६ ' इड़ापात्री, और ' स्फ्य ' १७५ कर्म्म - विकर्म्ममुला दुर्गति " २०७ हविग्रहणमन्त्र " १७६ सुख - दुःख का पारिभाषिक लक्षण 27 २०८ हविग्रहक का समन्वय 12 १७७ भूमात्मक सुख 21 २०६ हविग्रहण के सम्बन्ध में महर्षि कात्यायन ३७५ 29 १७८ पात्मक दुःख १७६ सांसारिक - समृद्धानन्द १८० श्रात्मिक शान्तानन्द १८१ आनन्दद्वयी की भूमारूपता १८२ अल्पता से ही दुःखप्रवृत्ति १८३ अलंबुद्धि का प्रतिषेध १८४ राष्ट्र की अलंबुद्धि, और सर्वनाश १८५ सर्वनाश का भूलबीज सन्तोष १८६ ' दभ्रमेव त्वं ब्रह्मणो वेत्थ रूपम् ' १८८१ यज्ञ, और भूमाभाव १८८ शकटानुगत भूमाभाव और हविग्रह १८६ शकटभूमापेक्षया कृषिक्षेत्रभूमा का वैशि-ष्ट्य र सम्प्रश्न १६० कृषिभूमि की छन्दस्का यज्ञियता १६१ यज्ञियभूमा की उपादेयता १६२ यज्ञियभूमा की अनिष्टकरता १६३ शकटस्य अन्न का ही यज्ञियभूमात्त्व १६४ ' यज्ञ ेन यज्ञमयजन्त ' मूलक यज्ञ १६५ अयज्ञिय कम्मों - साधनों से संगृहीता भूमा का सवनाशकरत्त्व १६६ न्यायसङ्गता भूमा का ही वास्तविक भूमात्त्व 27 १६७ शकटभूमा की यज्ञरूपता १६८ शकटभूमा, और दिव्यमन्त्र १६६ प्रकृतिवत् मन्त्रव्यवस्था २०० भस्त्रापक्ष का अनुगमन " 29 11 इति हविग्र हणमीमांसा - उपरता * -२१० यज्ञात्मक पुरुष, और यज्ञात्मक - शकट 99 २११ यज्ञपुरुषानुगत अग्नि वेदि, और हवि-99 न 77 २१२ भूपिण्ड का गार्हपत्याग्निकुण्डत्त्व 22 २१३ भूमण्डल का महावेदित्त्व 29 २१४ सप्तदशस्तोम का ग्राहवनीयत्त्व २१५ सूर्य्यस्कम्भ का यज्ञयूपत्त्व 27 ३७३ २१६ ग्राहनीय शब्द निर्वचन -99 " २१७ अान्तरिक्ष्य अन्नात्मक उक रस २१८ अन्तरिक्षात्मक हविर्द्धानशकट २१६ शकटस्थ ऊर्क ' - रस - मय - सोमात्मक अन्न २२० हविर्द्धानानुगत सदोमण्डप २२१ अष्टविध नाक्षत्रिकाग्नि | २२२ श्रावसथ्याग्नि २२३ सभ्याग्नि ३७५ 31 21 13 27 " 11 37 22 २२४ भूपिण्डात्मक पुराणगार्हपत्य २२५ पार्थिवप्राणाग्निरूप नूतन गार्हपत्य २२६ त्रैलोक्यरूपा वेदि २२७ प्रकृतिसिद्ध हविर्द्धानात्मक सकट २२८ व्यवहार्य शकट की हविर्द्धानारूपता ३७४ २२६ शकट का श्राग्नेय ' धूः ' भाग 11 ५० २३० ' यावानु वै रसस्तावानात्मा ' ३७६ 31 " 3 " "
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२३१ शकट - नीड़ का वेदित्त्व २३२ प्रकृतिसिद्ध शकटरूप २३३ ' यद्वै देवा अकुर्वंस्तत् करवाणि ' शतपथ - प्रथमखण्ड ३७६ २६३ मुमुक्षात्मिका - मुक्तिकामना ३८० 19 २६४ सहृदय - ईश्वराव्यय 73 11 २६५ हृदयचल का प्रादुर्भाव 27 २६६ शिवसंकल्पात्मक मन " व्यापक - चैतन्यवाद पर एक दृष्टि २६७ हृदयात्मिका प्रकृति २३४ शकटाग्नि की स्तुति २३५ प्राणसत्त्व के अनादर से संकटोद्भव २३६ शकटचैतन्य के सम्बन्ध में ऊहापोह २३७ ऋषिप्रज्ञा पर श्रापातरमणीय क्षेप २३८ भूतप्रपञ्च का स्वरूप- संस्मरण २३६. प्रतीच्य जगत् का आराध्य भूतप्रपञ्च २४० जन्मान्ध के लिए दिन में भी अन्धकार २४१ चैतन्यसत्ता, और भारतीय नित्यविज्ञान २४२ सर्वव्याप्ता ' चेतना ' २४३ ‘ ईशावास्यमिदं सर्वम् ' का समन्वय २४४ अव्ययपुरुषात्मक - चिद्धन - ईश्वर २४५ ईश्वर के पाँच महिमाभाव ३७६ २६८ श्राहर्त्ता - प्राकृतभाव ३७७ २६६. विक्षेपणधर्म्मा प्राकृतभाव 33 २७० नियमनधर्मा प्राकृतभाव २७१ प्राकृत - प्रजापति " " २७२ प्राकृत प्रजापति के दो निवर्त्त 11 31 " " ३७८ '19 " 11 २७३ शुद्धरस, और ' ऐकान्तिकसुख ' २७४ रसबलसमष्टि, और ' शाश्वतधर्म्म ' २७५मायी पुरुष, और ' अव्यय ' २७६ प्रकृत्यक्षर, और ' अमृत ' २७७ प्रकृति - क्षर, और ' ब्रह्म ' २७८ पराप्रकृति के द्वारा पराप्रकृति से विश्व का निर्माण २७६ पञ्चजन - पुरञ्जन - विश्वसृद् - पुर, भावों की समष्टि, और बहिरङ्गप्रकृति 91 " 23 " 37 २४६ ज्ञान, कम्मत्मिक ईश्वरात्मा २४७ अमृत - मृत्यु - मय ईश्वरात्मा २४८ रस - बलात्मक - ईश्वरात्मा २४६ मायाबलकोश, और ईश्वर २५० मायापुर, और पुरुष २५१ ब्रह्म - कर्म्म के भौतिक स्वरूप का समन्वय २५२ मायावच्छिन्न ब्रह्म, कर्म, और मन २५,३ संकल्प - विकल्पात्मक - इन्द्रिय मन २५४ प्रज्ञाप्राणात्मक सर्वेन्द्रिय मन २५५ रस - बलात्मक- श्वोवसीयस मन २५६ ईश्वराव्ययपुरुष के ११ धर्म्म २५७ श्षोवस्यस् - ब्रह्म, और श्रुति २५.८ काम, तप, और श्रम २५६ श्वोवसीयस्मन का प्रथम रेत २६० काममय रेत का मूलप्रभवत्त्व २६१ काममय - भाव २६२ सिसृक्षात्मिका - सृष्टिकामना ३८१ 19 २८० आत्म - क्षरात्मिका - अन्तरङ्गप्रकृति '11 २८१ ग्रात्ममाया, और अन्तरङ्गप्रकृति 11 ३८१ २८२ जगत्कर्त्ता ईश्वर 17 " " २८३ क्षररूपेण जगदात्मक ईश्वर " २८४ अक्षररूपेण - जगत्कर्त्ता ईश्वर 11 २८५ श्रव्ययरूपेण जगदालम्बन ईश्वर " ३७६ २८६ कर्त्ता - काय्य - कारण - अकर्त्ता आदि भावों " का समन्वय २८७ परमेश्वर - अव्यय २८८ परावरेश्वर - अक्षर 11 11 ३८० २८६ वरेश्वर - क्षर २६० मध्यस्थ अक्षर की सर्वरूपता - ६१ चेतना, और चित् शब्द २२ पर्य्यायशब्द - भ्रान्ति " " 7 २६३ चिद्रूप - अव्यय ५१ " 19 " " "
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२६.४ चेतनारूप- अक्षर २६५ ' चेतयते -सा - चेतना ' २६.६ ' चिति ' रू / व्यापार २६७ व्यापारात्मिका ' क्रिया ' २६८ क्रियाधिष्ठाता प्राणमय अक्षर २६६. अक्षर के द्वारा अव्यय पर रस, और बल की चिति ३०० प्रथमा रसचिति, और ' विज्ञान ' ३०१ द्वितीया रसचिति, और ' आनन्द ' ३०२ रसचितिरूपा ' अन्तश्चिांत ' ३०३ तृतीया चलचिति, और ' प्राण ' ३०४ चतुर्थी बलचिति, और ' वाक ' ३०५ चलचितिरूपा बहिश्चति ३०६ चितिसमन्वित चिदात्मा - अव्यय ३८७ चितिकर्त्ता - चेतनारूप- अक्षर २३०८ श्रानन्दचिति का स्वरूप -- लक्षण ३०६ विज्ञानचिति का 31 ३१० मनश्चिति का 27 ३११ प्राणचिति का 13 ३१२ काकचित का 27 विषयसूची ३८१ ३२५ अंशी ईश्वर, और अंश जीव ३२६ ' अंशो नानः व्यपदेशात् ' ३२७ चैतन्यांशभूत विश्व का चेतनाव- समन्वय " ,, ३२८ विश्वपदार्थानुगता सहजसिद्धा क्रिया " ३२६. आदान -- विसर्गात्मिका कर्म्मधारा 97 ३३० कर्माक्रान्त विश्व 33 " ३३१ कामना - मूला क्रिया ३३१ मनोमूला - कामना ३३३ ज्ञानमय - मन ३३ ४ चैतन्यसत्ता की संसिद्धि ३८२ ३३ तत् कामस्य चेष्टितम् ' ,,, ३३६ चैतन्य के सम्बन्ध में ऐन्द्रियक प्रश्न 13 ३३७ श्रात्मसत्तानुबन्धी व्यवहार की स्तब्धता ३८२ ३८३ ३३८ इन्द्रिय - भाव, अभाव - मूलक - चेतन - जड़ - व्यवहार ३३६ भूतावरण से हृदयस्थ चैतन्य का अवरोध, और इन्द्रिय का अभाव 77 ३४० श्वोवसीयस् मन की सर्वव्याप्ति ३४१ ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' ३४२ सच्चिदानन्देश्वर प्रजापति " 11 " 1 11 22 " 11 ३१३ विश्वव्यापक चैतन्य, और चेतना ३१४ सृष्टिसाक्षी चिदात्मा ३१५ चेतनारूप अक्षर से पञ्च क्षरकलाओं का विर्भाव ३१६ पञ्चक्षर्कलाओं में पञ्च विश्वसृजों का विर्भाव ३१७ विश्वसृजों से - ‘ सर्बहुतयज्ञ ' की स्वरूप— निष्पत्त ३१८ सर्वहुतयज्ञ से पञ्च पुरञ्जनों का आविर्भाव ३२० पञ्चपुरसमष्टि की विश्वरूपता ३२१ विश्वप्रविष्ट विश्वात्मा ३२.२ विश्वात्मा के ' ब्रह्मपुर ' ३२३ महाविश्वात्मक -- ईश्वर का शरीर ३२४ क्षुद्रशरीरात्मक -- जीव का विश्व ३४३ अस्तिभावात्मिका सत्ता 22 ३.४ उपलब्धिभावात्मिका चेतना 23 71 "= " 11 11 ३४५ उपलब्धभावात्मक श्रानन्द ३४६ अस्ति - भाति -रस की सर्वव्याप्ति ३४७ सर्वान्तर्य्यामी गूढोत्मा ३४८ अभिमानी देवता, और अन्तय्यांमी • ३४६ घट - घट व्यापक अन्तर्यामी ३८४ 11 ५.२ ३५० श्रोषधियों से प्रार्थना ३५१ क्षुरिका से प्रार्थना ३५२ ग्रावाओं से प्रार्थना ३५३ घुय्य शकटाग्नि से प्रार्थना 27 ३५४ ' अग्निधुर्यो न हिनस्ति ' ३५५ ब्रह्मशक्तिमय मन्त्र 29 ३५६ आरुणि के आर्ष उद्गार ३५७ शकट - ईषा का संस्पश , " " " " 1 " 23 11 21 " 11
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शतपथ - प्रथमखण्ड ३५८ शकटस्वरूपोपवर्णन ३५६ अग्निकर्मेतिवृत्तपरिगणन ३६० सौर अग्नि ३६१ अन्तरिक्ष्याग्नि ३८५ ३६१ वराह, " और घृत ३६२ एमूषवराहरूप चर्म्मरज्जु से भूपिण्ड का वेष्टन ३६३ पार्थिव हविः की व्याप्ति ३८७ " ३६२ पारमेष्ठ्याग्नि " " ३६४ पप्रितम शब्द का समन्वय 19 27 ३६३ स्वायम्भुवाग्नि ३६४ पार्थिवाग्नि 37 ३६५ भूपिण्डानुगत भूत, और प्राण " ३६. ५ जुष्टतम शब्द का समन्वय ३६७ हुतम - शब्द का समन्वय " ३६६ देवहूतम - शब्द का समन्वय 11 " ३६६ भूतमयी पिण्डपृथिवी ( भूपिण्ड ) ३६७ प्राणमयी - मण्डलपृथिवी ( भूमण्डल ) 27 ३६८ प्रकृतिसिद्ध हविर्द्धानि शकट " ३६६ सोमांशुरूप हवि 11 ३६८ निक्का पृथिवी ३६६ अनिरुक्ता पृथिवी ३७० अमृता पृथिवी ४०० हविर्यज्ञ, और सोमयज्ञ " " ४०१ श्रात्मरूप, प्राणरूप देवता, एवं वाग्रूप भूत 11 17 ४०२ भूताग्नि, और प्राणाग्नि " " ३७१ मर्त्या पृथिवी ४०३ प्राणाग्नि के द्वारा अन्नाहरण ३८८ 23 ३७२ चित्या पृथिवी ४०४ शारीरिक चर्म से वेष्टित शकट " ३०३ चितेनिधेया पृथिवी ४०५ शरीरशकट, और हविर्द्धान 33 ३७४ आयुः संरक्षक अग्नि ४०६ चरणशील- शकट, और कर्मठता " 1 03 ३७५ प्रजापालक प्रजापति अग्नि " ३७६ परिमित अग्नि " ४०८ भारतसमाट् मनु ३७७ अपरिमित अग्नि ४०६ शवसोनपात् भौम अग्नि " ३७८ प्राजापत्य भूलोक ३७६ पार्थिवाग्नि के द्वारा द्युलोक में वर्षण ३८० आन्तरिक्ष्य पर्जन्याग्नि के द्वारा भूलोक में वर्ष ३८१ उभयलोकानुगत जलवर्षण 99 " ४०७ भौमत्रैलोक्यरूप एशियाखण्ड ४१० ' एप हि देवेभ्यो हव्यं भरति ' ४११ यज्ञविद्या का पारम्परिक वितान ४१२ हव्यवाहन अग्नि की प्रतिकृति शकट ४१३ शकट के विशेषणों की यथार्थता 71 11 " ४१४ ऋजुभाव से हविग्रहरण ३८२ वृष्टिविद्यात्मक सूत्र ३८६ ४१५ ‘ तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा ' ३८३ वह्नितम - भारवाहक- अग्नि ४१६ रातमनसा हविग्रहण ३८४ अङ्गिरोऽग्नि, और तदूर्ध्वगमन 23 ४१७ वित्तपर्यन्त आत्मव्याप्ति ३८५ ' द्यामाङ्गरसो ययुः ' ४१८ विष्णु के द्वारा शकट पर आक्रमण ३८६ अग्नि का हव्यवाहकत्त्व ३८७ वह्नितम - शब्दसमन्वय ३८० सस्नितम - शब्द - समन्वय ३८६ भूपिण्डावच्छिन्न वायुस्तर ३६० अन्तरिक्ष्य रस की धृतरूपता ३८६ " 11 31 ४१६ विश्वनिर्माता पञ्चाक्षरदेवता " " " ४२० अन्तर्यामी, और सूत्रात्मा " " ४२१ केन्द्रात्मक प्रजापति का स्वरूप - समन्वय ३६. 17 ४२३ सर्वोत्पादक- प्रजापति " ३८७ ४२२ अजायमान प्रजापति ५३