Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 221–230
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230
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४२४ केन्द्रपरिचायक धर्म ४२५ केन्द्रशक्ति का अन्तर्य्यामित्त्व ४२६ पञ्च क्षरों का अग्निप्रधानत्व ४२७ अग्नि का सार्वदैवत्य ४२८ प्रजापति का विस्रसन ४२६ क्षतिपूरक - भैषज्ययज्ञ ४३० इन्द्राविष्णू का वीरण ४३१ वेद - लोक – वषट्कार ४३२ अधामच्छद प्राणमण्डल ४३३ ' विं तदैरयेथाम् ' ४३४ लोकसाहस्री, और पोमय विष्णु ४३५ विष्णु और शनाया ४३६ अशनाया के द्वारा विष्णु का बहिर्विनि-गमन ४३७ प्राणाग्नि से समन्वित विष्णु ४३८ अग्निमय विष्णु का बहिर्विनिर्गमन ४३६ बुभुक्षामयी शनाया ४४० अन्तरिक्ष में व्याप्त प्राहुतिद्रव्य ४४१ स्तोमभेदानुगत - विष्णुविक्रम ४४२ त्रयस्त्रिंशत्तन्तवः ४४३ अग्नि की अवस्थात्रयी ४४४ त्रिवृत्सोमात्मक पृथिवीलोक ४४५ पञ्चदशस्तोमात्मक अन्तरिक्षलोक ४४६ एकविंशस्तोमात्मक द्युलोक ४४७ चतुर्थ पोलोक ४४८ चतुर्लोकात्मक पार्थिवलोक ४४६ विष्णु के तीन विक्रम, एवं त्रैलोक्य— संग्रह ४५० त्रिविक्रम विष्णु, और उनकी तीन साह-स्त्रियाँ .... ४५१ विष्णु का वामनत्त्व ४५२ यज़िय ३३ देवता ४५३ उपक्रमात्मक पश्वग्नि विषयसूची ३६० ४५५ ' अग्निरवमः, विष्णुः परमः ' ४५६ ‘ अन्तो विष्णुर्देवतानाम् ' 22 23 ४५७ ' विष्णुर्वै देवानां द्वारपः ' ४५८ वसुदेवताओं का प्रथम विक्रमण * ४५६ रुद्रदेवताओं का द्वितीय विक्रमण " ४६० श्रादित्यदेवताओं का तृतीय विक्रमण " ४६१ विक्रमण से यज्ञस्वरूप संसिद्धि ४६२ यज्ञ के द्वारा ही देवव्याप्ति 77 ४६३ शनायारूप विष्णु 23 ४६४ विष्णु के द्वारा सोम का आहरण ,, " " ४६६ सोमवंशी विष्णुदेवता ४६५ सोमाहुति से यज्ञस्वरूपसंसिद्धि ४६७ ‘ यो वै त्रिष्णुः, सोमः सः ’ ४६८ विष्णु की विक्रान्ति ३६१ ४६६. ' विष्णुस्त्वाक्रमताम् ' " " ७७० विष्णु के द्वारा शकट से हविर्ग्रहण ४७१ हविग्र हणानन्तर अध्वर्यु का विशाल अन्त-रिक्ष में दृष्टिनिक्षेप " " ४७२ शकटरूप - सीमाभाव 23 ४७३ सीमाभाव की वरुणता 23 ४७५ वरुण की सुरता ३६.२ ४७५ तन्निवृत्यर्थ भूमानिरीक्षण " III " " " 33 ४५४ विरामात्मक विष्णु नामक श्रादित्य " 3 " ४७६ ऐन्द्र अन्न की शकटानुगतां वारुणता ४७७ यज्ञविरोधी वारुण- अन्न ४७८ मन्त्रवल के द्वारा वारुणभाव का निराकरण: ४७६. चेतनायुक्त हविद्रव्य ४८० वस्त्रवेष्टन से हवि का श्वासावरोध ४८१ श्वासावरोध से असुर का आधिपत्य ४८२ असुराधिपत्य से यज्ञ की अभिभूति ४८३ ' उरु वाताय ' रूप ऐन्द्र - वायव्यभाव ४८४ प्राणात्मक इन्द्र ४८५ इन्द्रविद्य दुरूप चक्षु ४८६ चक्षुर्विद्य त् के द्वारा हवि में प्राणाधान ४८७ ' अथ प्रेक्षते ' का समन्वय ५४
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शतपथ - प्रथमखण्ड ४८८ दृष्टि - समन्वित मन्त्र से असुरनिरसन ४८६ मृत असुर का बहिः प्रक्षेष ४६० भावानुबन्धी देवता, और असुर ४६१ सजातीयभाव का देवत्व ४६.२ विजातीयभाव का असुरत्त्व ४६३ विजातीय द्रव्यों का राक्षसत्व ४६.४ विजातीयों का बहिःप्रक्षेप ४६५ अन्तरिक्ष्य - वारुण- असुर ४६६ ऐन्द्रप्राणसत्ता में असुरनिरसन ४६७ रात्रि में असुरों का साम्राज्य ४६८ मन्त्रवाक्, और दिव्य इन्द्र ४६६ तपःपूत आहिताग्नि ब्राह्मण ५०० सान्तपनाग्निमूर्ति ब्राह्मण ५०१ सर्वदेवमूर्त्ति ब्राह्मण ५०२ वैश्वानराग्निमूर्ति ब्राह्मण ५०३ ब्रह्मात्मक ब्राह्मण ५०४ विद्युन्मूर्ति ५०५ ब्रह्मबल से असुरविनाश ५०६ पञ्चाङ्ग लियों से हविग्रह ५०७ यज्ञ की सुप्रसिद्धा ' प क्तता ' ५०८८ पदाथों की यज्ञरूपता ३६४ ५२२ अङ्ग ल्यनुगत पञ्चपर्व " " ५२३ ज्ञानेन्द्रिय- पञ्चक " ५२४ कर्मेन्द्रिय - पञ्चक " 27 ५२५ शरीरविज्ञानानुगत समाधेय प्रश्न ५२६ सृष्टिमूलभूत असत् प्राण ५२७ असत्प्राण का ऋषित्त्व ५२८ सप्तपुरुष पुरुषात्मक प्रजापति " ६२६ त्रयीविद्याधन सूर्य्यनारायण ३६५ ५३० ‘ नार ’ – भव, और नारायण " 13 33 ५३१ तृतीय द्युलोकस्थ सोम ५३२ पारमेष्ठ्य सोम की नाहुति ५३३ ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा " ५३४ गायत्रीमात्रिकवेद ५३५ ऋतुरूप ऋताग्नि " ५३: ऋताग्नि का उद्ग्राम निग्राम " ५.३७ ऋतु के पाँच विवर्त्त 11 [ [ " " " ३६६ ५१० आत्ममूलक विश्वपदार्थों का घोडशकलत्त्व " 33 ... ५०६ षोडशकल आत्मा ५११ अग्नि - सोमात्मक - यज्ञमय विश्व ५.१२ सत्यानृतभावापन्न विश्व ५१४ सृष्टि के विभिन्न मुल ५१५ अपेक्षाभेद से सत्र का समन्वय 22 ५१३ विविध निगमानुगमों का समन्वय " " ५३८ शीत- ग्रीष्म - वर्षा - कालत्रयी ५३६ चातुर्मास्य का समन्वय ५४० वर्षा का चतुर्म्मासत्त्व - समन्वय ५४१ सर्वॠतुरूपा वर्षाऋतु ५४२ ऋतु के तीन सवन ५४३ प्रत्येक ऋतु की सर्व रूपता ५४४ ' एकैकस्मिन् ऋतौ सर्वेषां ऋतूनां रूपम् ' ५४५ पञ्चावयव - पाङक्त अन्न ५ ६ ऋतु से अनुगत ७२ अहोरात्र ५४७ चचारिशिनी विराट्, और चिल्ला ५४८ लोकसूक्ति का समन्वय " ५४६ ' दिन बहत्तर टाले ' ५१६ श्रौत - व्यवहारों का निर्विरोध समन्वय 21 ५५० पञ्चावयव सम्वत्सर ५१७ पाङक्तयज्ञ के कतिपय निदर्शन 21 ५५१ सौरसम्वत्सरयज्ञ की पाङक्तता ५१८ पञ्चपर्वा शिरःप्रदेश 22 ५५२ वर्षा - अन्न - रेतः - त्रयी ५१६ शरीर के अन्य पर्वों की पञ्चावयवता 38 ५५३ सम्वत्सरमूलक प्रजनन ५२० बाहुरनुगत पञ्चपर्व 87 ५५४ स्थूलशरीरान्विता भूतचिति ५२१ हस्तानुगत पञ्चपर्व 67 ५५ ५५५ सूक्ष्मशरीरान्विता देवचिति
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५५६ कारणशरीरान्विता बीज चिति ५५७ ऋतु की विजिज्ञास्या पञ्चावयत्रता ५५८ जगदाधार अव्ययात्मा ५५६ श्रधारात्मा की पञ्चावयवता ५६० आलम्बन की पञ्चावयवता ५६१ निमित्ताक्षर की पञ्चावयवता ५६२ उपादानक्षर की पञ्चावयवता ५६३ विकारक्षर की पञ्चावयवता ५६४ पञ्चजन की पञ्चावयवता ५६५ पुरञ्जन की पञ्चावयवता ५६६ पुर की पञ्चावयवता ५६७ पुरानुगत पञ्चावयव सम्वत्सर ५६८ सम्वत्सरानुगत पञ्च ऋतु ५६६ यज्ञप्रपञ्च की क्षररूपता ५७० प्रपञ्चाधिष्ठाता एकत्व ५७१ पञ्चानुगत- सान्ध्य- छिद्र - पूरक अक्षरब्रह्म विषयसूत्री ४०० ५८६ त्रैलोक्यप्रजा, और अदिति ५६० अन्नादभाव, और अदिति " ५६१ गोतत्त्व, और अदिति " ५६२ वाक्तत्त्व, और अदिति " " " " " ५६३ अदितिविज्ञान – स्वरूपोपक्रम ( १ ) -- सूर्य्यमूलादिति ५६४ भूपिण्ड, और सूर्य्यपिण्ड ५६५ सूर्य्यपिण्डानुगत लोक ५६६ भूपिण्डानुगत पृथिवीलोक ५६७ ‘ अस ं लोक: ५६८ ' यं ' लोकः * ५६६ लोकानुगता परिभाषा ६०० भूपिण्ड का क्रान्तिवृत्ताधार पर सू चारों और परिक्रमण ६०२ अग्निगर्भित भूलोक 13 22 ६०१ भूत - प्राणात्मक - उभयलोक ५७२ ' अक्षरेणैव यज्ञस्य छिद्रमपि - दधाति ' ५७३ सम्वत्सरप्रजापति का षोडशकलव " ५७४ पुरुषात्मक यज्ञ ५७५ यज्ञात्मक पुरुष ५७६ पञ्चाङ्ग ुलि, और यज्ञ की पाक्तता ५७७ ‘ तस्यैषा - श्रवमा मात्रा - यदङ्ग लयः ' ५७८ पाङ ्मक्लयज्ञसम्पत्ति, और पञ्चाङ्ग लय: ५७६ निर्णयसमिति की पाङ्कता ५८० ' हाँचों अङ्ग ुलियों की घृताक्तता ' ५८१ पञ्चाङ्गलियों से हविग्रह ५८२ सविता देवता का प्रसव ५८३ अश्विनीकुमारों के बाहू ५८४ पूषा के हाथ ५८५ मन्त्र के द्वारा नक्षत्रमूला अदिति का स्वरूप समन्वय ५८६ वैदिक - महत्त्वपूर्ण ' अदिति ' तत्त्व ५८७ त्रैलोक्य, और अदिति ५८८ केवल पृथिवी और अदिति ६०३ इन्द्रगर्भित द्युलोक ६०४ प्राण का देवतात्त्व ४०१ " " ६०५ भूताधार — प्राण 27 ६०६ भूतप्रतिष्ठित प्राणदेवता की सर्वव्याप्ति 29 ६०७ भूताग्निप्रधान भूलोक ६०८ प्राणेन्द्रप्रधान सूर्य्यलोक " " 7 ६०६ देवसमष्टिरूप सूय्र्यमण्डल 27 " " ६१० पार्थिव इन्द्रप्राण को गौणता " ६११ सौर अग्निप्राण की गौणता " ६१२ पार्थिव गायत्राग्नि की वसुरूपता ५६ ६१३ वस्वग्नि से समन्वित पार्थिव वासवेन्द्र ६१४ सौर सावित्राग्नि, और सविता ६१५ बृहत्सामात्मक ‘ महः ’ भाव ६१६ महः, और मघवेन्द्र ६१७ पार्थिव इन्द्राग्नी की सूर्य्यानुगति ६१८ सौर इन्द्राग्नी की पृथिव्यनुगति ६१६ पार्थिव - सौर- प्राणों का परस्पर सङ्गमना त्मक यजन
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६२० यजनमूलक - ‘ ऐन्द्राग्नयज्ञ ' ६२१ अग्नि की ' मनु ' रूपता ६२२ मनु, और मानव ६२३ पार्थिव प्राण की व्याप्तिसीमा ६२४ आदित्यात्मक - रथ ६२५ पार्थिवप्राण के द्वारा रथ का तरण ६२६ रथतरणात्मक पार्थिव रथन्तरसाम ६२७ वस्तुसीमात्मक अवसान ६२८ अवसान और साम ६२६ अन्तिम सामात्मक निधनसाम ६३० स्वज्योतिर्घन सूर्य्य ६३१ सूर्य्य का २१ वाँ अहर्गण शतपथ - प्रथमखण्ड ४०३ ६४८ सूर्य्यविरुद्ध - दिगनुगत तमोमय पार्थिवप्राण की - ' दिति ' रूपता " ६४६ राहु - स्वरूप - दिग्दर्शन 33 ६५० ' सिंही भत्त्वा चचार ' II 29 ६५१ सैंहिकेय - पार्थिव- राहु 39 22 39 ६५२ चान्द्रभावात्मक राहु ६५३ ' स्वर्भानु ' नामक चांन्द्रराहु ६५४ विधुन्तुद सैंहिकेय राहु 23 39 11 ६५५ भानुन्तुद स्वर्भानु राहु 23 " ६५६ पार्थिवच्छाया, और चन्द्रग्रहण " " ६५७ चान्द्रच्छाया, और सूर्यग्रहण 37 27 ६५८ प्रतिफलित सौर प्रारण का अदितित्त्व 27 29 ६५ पितृस्थानीय सू " " ६३२ बृहती, और सौर बृहत्साम ६३३ ' बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ' ६३४ वेद की प्रतिष्ठारूपा वेदि ६३५ प्रजापति की प्रतिष्ठा यज्ञ ६३६ प्रजा का प्रभव- प्रतिष्ठा - परायण - प्रजाति ६३७ सौरप्राणमण्डलात्मिका प्राणवेदि ६३८ भतवेद्यपेक्षया प्राणवेदि का महावेदित्त्व ६३६ महावेदिरूपा बहिर्वेदि ६४० सूर्य्यपिण्डरूपा अन्तर्वेदि ७ ६४१ वेदिस्वरूप – समन्वय, और श्रति ६४२ तेजोमय वितत सौरप्राण ६४३ सौरप्राण के आधार पर अदिति, और दिति का स्वरूपाविर्भाव " " ६४४ अविच्छिन्न सौर प्राण का भविएड - उभय-पार्श्व से सम्बन्ध ६४५ भूपिण्डानुगत सौर ज्योतिर्मय प्राण का अमुक नियत आकार से सूर्य की और प्रति-फलन ६४६ सौरप्राण से बञ्चित भूपिण्ड का पृष्ठभाग 33 ६४७ सूर्य्य – पृथिव्यनुगत अविच्छिन्न- सौरप्राण की ' दिति ' रूपता 22 " " " 22 ६६० मातृस्थानीया पृथिवी ६६१ पृथिवी – सम्बन्धानुगता अदिति, और अदिति का पार्थिवभावत्त्व ६६२ बहिर्वेदिरूप प्राणात्मक पार्थिवभाग ६६३ विश्वेदेवात्मक पार्थिव प्राणमण्डल ४०४ ६६४ प्रदिति के गर्भ में ३३ यज्ञिय - देवता 22 ६६५ ' अदित्यां जज्ञिरे देवाः ' ६६६ महापृथिवी - गर्भस्था तीन स्तौम्य - पृथिवियाँ 22 " " ६६७ सर्वप्रतिष्ठारूपादिति ६६८ अग्निरूपा अदिति से पञ्चजनोत्पत्ति 99 " " " ४०५ 29 29 31 22 ६६६ पञ्चजन - स्वरूप -- दिग्दर्शन ६७० पाञ्चजन्य पार्थिव - श्रग्नि " 21 27 ६७२ पाङक्त अग्नि से उत्पन्न पाँच चितियाँ " 29 ६७१ स्थावर - विभागात्मक प्रथम विभाग ६७३ पञ्चजन प्रजा, और अदिति सैषा - सूर्य्यमूला - अदितिः " " I
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२- पृथिवी मूला - - श्रदितिः ६७४ भू.पण्डके दृश्य, दृश्य भाग ६७५ दृश्यभाग का दितित्त्व ६७६ अदृश्यभाग का अदि तत्त्व ६७७ रात्रि में भी पार्थिवी अदिति की सत्ता ६७८ सूर्य्यमूला दिति का रात्रि में प्रभाव ६७ ९ सूर्य्यमूला दिति, और १२ श्रादित्य ६. ० पृथिवीमूला अदिति, और आठ आदित्य ६८१ ' पश्यन्ति सप्तमं सर्वे ' पुत्रासो अदितेः ' ६८२ ' ६८३ ' सप्तभिः पुत्रैरुदैन ' ६८४ पार्थिव - सम्पूर्ण वृत्त का अदितित्त्व ६८५ अहोरूपा - पार्थिव - दिति ६८६ रात्रिरूपा पार्थिव - दिति ६८७ अदिति, और दिति का पर्य्यावर्त्तन विषयसूची ४०६ ६६८ धर्मानुगत १० विभाग, और १० • ६६६. सौर कश्यप, र १३ कन्याएँ ७०० मरीचि, और मारीच कश्यप " ७०१ मरीचि से उत्पन्न अप्तत्त्व 99 ७०२ ' अपांशर ', और पिएडभाव 29 ७०३ वराहवायु, और भूपिण्ड कन्याएँ ४०७ " " " ४०८ 22 " " " ७०४ अग्नि, वायु, और आदित्य " 27 " " ४०७ ७०५ मरीचि श्रापोमय- त्रैलोक्य ७८६ ` स एष प्राणस्त्रेधा विहितः ' " ७०७ त्रैलोक्य, और कुर्म्म ७०८ निरावरण प्रान्त, और कूम्र्म्म ७०६ खगोलात्मक -- कूर्म्मप्रजापति 99 ७.० दधि घृत - मधु - मय कूर्म्म प्रजापति 99 ७११ देवलोकात्मक आपोलोक 99 ७१२ ‘ अमृतं ह्याप: ' और अमृतलोक ७१ ३ चतुर्विध जीवनीय रस संपा - पृथिवी - मूला - श्रदितिः ७१४ चार रसों से प्राणी २ ३ - नत्रत्रमूला - अदितिः ६८८ चन्द्रपरिभ्रमणवृत्तात्मक - दक्षवृत्त ६८६ सोम का प्रभवस्थान दक्षवृत्त ६६० सौम्यप्राण की योषारूपता ६६१ कन्याभावात्मक दक्षसोम ६६.२ दक्षप्रजापति की ६० कन्याएँ ४०७ की जीवनसत्ता ७१५ दुग्ध, औह दधि ७१६ अन्नगत स्नेहनद्रव्य, और घृत ७१७ अन्नगत - मधुररस, और मधु ७१८ अन्नगत स्वादुरस, ओर अमृत ७१६ दधि घृत मधु श्रमृत रसात्मक कश्यपप्रजापति की ' पश्यक ' रूपता का समन्वय " " ४०६ 99 " " 38 ७१० ७२० ' कश्य वै मारीचः ' 99 29 ७२१ कश्यप, और कलुआ ' " ७२२ चयनयज्ञ, और कूम्मं चिति " 99 ७२३ कूर्म्मचितिब्राह्मण के रहस्यपूर्ण संस्मरण " ६६३ वृषाप्राणमय देवताओं के भेद से ६० दक्ष-कन्याओं का विभाजन ६६.४ २७ नक्षत्रों से अनुप्राणित २७ कन्याएँ, और चन्द्रमा ६६५ चतुर्विध वस्वस्तिक, और चार कन्याएँ ५६.६ चार अरिष्टनेमि, और चार कन्याएँ ६६७ दो कृशाश्वा, और दो कन्याएँ " 37 ७२४ कूर्म्मप्रजापतिरूप सम्वत्सरप्रजापति ७२५ कश्यप की १३ पत्नियों से पार्थिव त्रैलोक्य-प्रजा का प्रजनन ७२६ दक्षप्रजापति के सम्बन्ध में पुराण ७२७ दाक्षायणियों का संस्मरण " " ७११ 33 22 ७२८ ' अदिति ' रूपा स्थिर- दाक्षायणी 99 99 ७२६ दितियुक्त सम्वत्सर से दैत्योत्पत्ति ५८
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७३० अदितियुक्त सम्वत्सर से दैवोत्पत्ति ७३१ सत्यानुगत, देवदेवता ७३२ अनृतानुगत असुरगण ७३३ देवासुरों की सहज प्रतिस्पर्द्धा ७३४ अद्ध खगोलात्मक देवमण्डल ७३५ ऋद्ध खगोलात्मक असुर मण्डल ७३६ देवानुगत - यशियमण्डल ७३७ असुरानुगत प्रयज्ञियमण्डल ७३८ स्वाती नक्षत्रानुगत दैवाकाश ७३६ अश्विनी नक्षत्रानुगत दैवाकाश ७४० रेवतीनक्षत्रानुगत दैवाकाश ७४१ नक्षत्रानुगता दिव्या श्रदिति ७४२ दिव्या दिति, और दैवाकाश ७४३ १३ || नक्षत्रात्मक अदितिमण्डल ७४४ मूलनक्षत्र, और दितिभाव ७४५ दरिद्रभावापन्ना ' दिति ' ७४६ निर्ऋति, और दिति शतपथ - प्रथमखण्ड ७११ ७५६ पूर्वक्षितिजस्थ स्वाती नक्षत्र , I ७६० पश्चिम क्षितिजस्थ अश्विनी नक्षत्र ७१२ " " ७६१ उत्तर - दक्षिण - वानुगत नक्षत्रप्राण " 39 ७६२ नक्षत्र की उत्तर, वाम - भुजाएँ " " ७६३ प्रदितिबिन्दु की मध्यस्थता 99 ७६४ पञ्चाङ्ग लियुक्त हस्तनक्षत्र " 22 ७६५ अश्विनी के बाहू, और पूषा के हाथ " " ७६६ मरुत्प्राणशक्तिमयी मारुती " " ७६७ मरुत्प्रधान पुरुष 11 " ७६८ मारुति - प्रधाना स्त्री 17 " ७६६ अदितिरूप नक्षत्रमण्डल की स्थिरता " 22 " ७७० भूपरिभ्रमण, एवं अदितिमण्डल का दृश्यानु-गत परिवर्तन ७७१ मन्त्रशक्ति के द्वारा अदितिकाल की भावना ७७२ ' देवस्य त्वा सवितुः ' मन्त्रार्थ - समन्वय ४१३ " 3 25 ७७३ श्रदितिमण्डल - परिलेखः " " ७७४ पुरोडाशसम्पादनार्थं हविग्रहरण ५४७ व रोहिणी, और ज्येष्टा ७.८ रोहिणी, और कनिष्ठा " ७७५ ग्रहणानुगत देवनामनिर्द्देश ४१४ ७७६ शकट से हविग्रहण 93 33 77 ७४६ अदिति, और लक्ष्मी ७५० नक्षत्र विद्यानुगता रोहिणी ७५१ मलनक्षत्र, और तदभिमानिनी देवता ७५२ स्थिर अदिति ७५३ नक्षत्रमूला अदिति सैषा - नक्षत्रमूला - अदितिः ३ ७७७ देत्रसमद ( संघर्ष ) की सम्भवना ७७८ समद कानिराकरण, और हविग्रहरण ४१२ ७७६ अभीष्ट फलप्राप्ति ७८० अन्नाद, और अन्नभाव " ७८१ अग्नि, और अन्नभाव ७८२ अन्न की ग्रहरूपता ७८३ अन्नग्रह, और ग्रब्राह्मण ७८४ यात्रद्वित्तं तावदात्मा ७८५ अन्न, औरतद्गत अन्नस्वामी ७८६ अन्नग्रहात्मक दृढबन्धन ७८७ नामग्रहणात्मक उत्तरदायित्व 23 ७८८ यथा देवतमन्यत् ७८६ भूताय त्वा नारातये ७६० अन्नसमृद्धि का स्वरूप - दिग्दर्शन ७६१ रातिलक्षण दानभाव ७५४ सविता, और स्वातीनक्षत्र ४१२ ७५५ नक्षत्रों का स्थिरत्त्व ७५६ दृश्यानुगत विचालित्त्व ७५७ नक्षत्रों का उदद्यात्मक प्रसवकाल ७५८ सविता का प्रसवकाल, और स्वाती नक्षत्र का उदय..... " " 97 " " " ४१५ " 27 ५६
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७६२ दान, भोगात्मिका अन्नसमृद्धि ७६३ देवहवि के द्वारा दिव्यात्मा की प्रसूति ७६४ शेषभाग के सम्बन्ध में प्रश्न ७६५ अराति ( शत्रुवर्ग ), और शेषान्न ७६६ शेषभाग से अशान्ति ७६७ भूतसमृद्धि, और शेषान्न ७६.८ शेषान्न की उपयोगिता ७६६ परिशेषयामि ८०० श्राप्यायनधर्म्म, और अन्नसम्पत्ति ८०१ ज्वोति, और पाप्मा - रूपा विश्वसृष्टि ८०२ ज्योतिम्ला देवसृष्टि ८०३ पाप्मा - मला असुरसृष्टि ८०४ प्राणात्मक - देवता ८०५ भूतात्मक असुर ६०६ स्थूलशरीरात्मक भूत ८०७ सूक्ष्मशरीरात्मक प्राण ८०८ ज्ञानमय- देवप्रञ्च ८०६ विद्यामय भूतप्रपञ्च ८१० आवरणात्मक भतप्रपञ्च ८११ सत्यात्मक – देयता ८१२ बलात्मक - सुर ८१३ बलवान् असुर ८१४ ज्ञानवान् देवता ८१५ आत्मविरोधी सुर ८१६ देवप्राणप्रभव सूर्य ८१७ प्रजाप्राणात्मक सूर्य्य ८१८ असुरभावापन्न भपिण्ड ८१६ सीमाभावापन्न शकट ८२० पामाभावयुक्त शकट ८२१ हविग्रहण के द्वारा पाप्मा - संग्रह ८२२ ज्योतिर्मय देवतात्रों का यजन ८२३ पाप्मा का निराकरण ८२४ तमोमय- श्रासुरपामा विषयसूची ४१५ ८२५ स्वर्ग, अहः, सूर्य्य, स्वर, देव, यज्ञ, भावों की सजातीयता - I ४१६ ८२६ ब्राह्मणस्पत्य पवित्र तत्त्व ८२७ अहोरूप सौरमण्डल ८२८ पार्थिवी अनुष्टब्वाक् " " ८२६ सौरी स्वरवाक्_ ८३० वर्णाधिष्ठात्री अनुष्टप- वाक " " ८३१ स्ववाङ्मय सूर्य्यमण्डल " ८३२ स्वरात्मक सू " ८३३ एकविंशस्थ श्रादित्य 13 ८३४ प्राकृतिक - ' नवाहयज्ञ ' " ८३५ नवाहयज्ञ – स्वरूप - दिग्दर्शन " ८३६ श्वेतद्वीपात्मक नवाहयज्ञ 22 ८३७ वायव्य पतत्त्व की सर्वव्याप्ति " " ८३८ चातुर्मास्य, और देवशयन 13 ८३६ पारमेष्ठ्य - गोलोक ८४० गोलोकस्थ - गोविन्द " द्व ४१ गोबिन्द का सनातन - शयन " ८४२ लक्ष्मी, और श्री ( गोबिन्द पत्नियाँ ) " ८४३ त्रिणाचिकेत - स्वर्ग मे " " ८४४ ब्रघ्नस्य विष्टपस्वर्ग " " ८८४५ अपुनर्भारस्वर्ग ८४६ अशोकमहिमस्वर्ग ८४७ इन्द्रविष्टप् " " विष्णुविष्टप् ८८ II ८४६ ब्रह्मविष्टप्1 ८५० स्वर्ग्याग्नि, और नचिकेता " ८५१ त्रिविष्टपस्वर्ग " ८५२ अभिजित् स्वर्ग II ८५३ विश्वजित् स्वर्ग ,, ८५४ सप्त देवस्वर्ग ८५५ ‘ स्वरसाम ' स्वरूप - दिग्दर्शन ८५६ विषुवदहः ४१७८५७ श्रुतिवचन - समन्वय ६०
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८५८ सप्तस्वर्गानुगत - नवाह यज्ञ - परिलेख ८५६ सूर्य की मनोतात्रयी ८६० यज्ञ, स्वर, देव, घन सूर्य्य ८६१ हविर्ग्रहणानन्तर शक्ट से अवरोहण ८६२ ' दृ हन्तां दुर्य्या ' का समन्वय ८६३ विकम्पन, और यज्ञसम्पद्विनाश शतपथ - प्रथमखण्ड ८६४ दैवत - आत्मिक - भौतिक- त्रयी - का सङ्गतिक— रणात्मक यजनक ८६५ अपेक्षितों अवधानत! ८६६ महाराज ' जान ' से अनुप्राणित वैदिक-आख्यान का संस्मरण ८६७ यजमान के दुर्य्य ( गृह ) ४१८ ८७६ शरीरत्रिलोकी रूप - पृथिवीलोक " ८०७ ब्रह्मग्रन्थि से नाभि - पर्य्यन्त पृथिवीलोक 13 ८७८ नाभि से हृदय - पर्य्यन्त अन्तरिक्ष लोक ४१६८७६ हृदय से कण्ठ – पर्य्यन्त द्यु लोक " " ८० कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र - पर्यन्त चतुर्थलोक 27 ८८१ लोकाधिष्ठाता अग्नि- वायु - आदित्य--४२० चन्द्रमा नामक देवता ... 11 ८८२ वसु - रुद्र आदित्य नक्षत्र - नामक - आधि-देवता ( गणदेवता ) ८८३ अपानदेवता, और बस्ति गुहा 27 ८८४ व्यानदेवता, और उदरगुहा " ८६८ प्रतिष्ठात्मक अविकम्पित दुर्य्य " ८६६ वंशप्रतिष्ठात्मक दुर्य्य ८७० वकम्पन - निवृत्ति ८७१ निरापदरूपेण हविग्रहरण ८७२ हविःपरिपाक में विकल्प ८८७३ पृथिवी के केन्द्र में हविःस्थापन ८८५ प्राणदेवता, और उरोगुहा ६ हृदय की सर्वकेन्द्रता 71 ८८७ प्राणापान " का सञ्चार व्यान का सर्वप्रतिष्ठात्त्व व्यानस्थान की अभयरूपता " ८६० नभ्य - प्रजापति ८६१ अदिति का अभय - उपस्थ ८७४ अदिति के उपस्थ में हविःस्थापन ८७५ नाभि, हृदय, कण्ठ - त्रयी, और केन्द्र -सम्पत्ति " " ८६२ अग्नि के द्वारा हविद्रव्य का संरक्षण ८६३ शकट से गृहीत हविद्रव्य का यथा-स्थान सादन हविर्ग हण, तथा तत्सादनकर्म्म से अनुप्राणित विषयों की " स्मारक - सूची- उपरत प्रथमकाण्डानुगत- प्रथमाध्याय का द्वितीय ब्राह्मण एवं प्रथमप्रपाठक का द्वितीय ब्राह्मण अत्र उपरत II ६१ '
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विषयसूची प्रथमकाण्डानुगत प्रथमाध्याय का तृतीय ब्राह्मण एवं प्रथमप्रपाठक का तृतीय ब्राह्मण उपक्रान्त ३ --प्रोक्षणकर्म्म से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची-पृ ० सं ० ४२२ से ४५१ पर्यन्त १ प्रोक्षण कर्म्मब्राह्मण ( मूल ). [ १ कण्डिका से- ११ कण्डिका - पर्य्यन्त ] ४२२ २ मूलानुवाद प्रकरण -४२३ से ४२७ ४२७ पर्य्यन्त ३ देवाननुविधा वै मनुष्याः ४ देवयज्ञ की प्रतिकृतिरूप वैधयज्ञ ५ अध्यात्मयज्ञ का अधिदैवतयज्ञ से सम्बन्ध-स्थापन, और वैधयज्ञ ६ नवीन - दैवात्मोत्पत्ति ७ त्रिणाचिकेतस्वर्गस्थान से श्राद्ध यज्ञिय दैवात्मा ८ देवात्मा से श्राद्ध यजमानका मानुषात्मा ६ श्रायुर्भोगानन्तर मानुषात्मा का स्वर्गगमन १० प्रजोत्पतिसाधक यज्ञ ११ प्राणोदानात्मक यज्ञ १२ आधिभौतिक पदार्थ, और यज्ञसम्पत् १३ भूतपदार्थों का दैवतपदार्थों से समतुलन १४ वैषम्य में यज्ञस्वरूप - श्रभिभव १५ अपेक्षिता कर्म्म- जागरूकता १६ श्रासुरभाव - निरसन के लिए अपेक्षित ' पवि त्रीकरण ' १७ प्रोक्षणी पानी, और कुश ४२८ " ६२ १८ यज्ञियं यज्ञिय, भेदेन पदार्थ- द्वविध्य १६ दैवभाव, और यज्ञिय पदार्थ २० आासुरभाव, और अयज्ञिय पदार्थ २१ देवप्राणप्रधान यज्ञिय पदार्थों का परिग्रहण २२ दर्भ की सोमरूपता २३ सोम की पवित्ररूपता २४ पारमेष्ठ्य सोमवंशी विष्णु २५ यज्ञिय पदार्थों में श्रेष्ठतम दर्भ २६ दर्भ का यज्ञ में समावेश २७ ‘ यज्ञो वै विष्णुः ’ २८ शरीरानुगत असुराक्रमण २६ आत्मविरोधी भावों का असुरव ३० स्रष्टा की गुणदोषमयी सृष्टि ३१ ऐन्द्रियक विषयों का उभयधर्म्मत्त्व ३२ ग्रन्नगत भूतभाग का श्रात्मविरोधित्त्व ३३ रसात्मक प्राणभाग का अनुकूलत्व ३४ मलभाग का विसर्जन ३५ रोमकूपों के द्वारा अग्नि का बहिर्विनिर्गमन ३६ यमवायु का अग्निरस पर श्राघात ३७ अग्नि की कृष्णरूप में परिणति ३८ कृष्णाग्नि की केश - लोमरूप में परिणति ३६ अधिक केश – लोम, और शीतनिरोध ४ ४२
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शतपथ - प्रथमखण्ड " 22 " 23 " 23 ४० अग्नि के मलभागरूप केश - लोम ४ ९ कम्बल का अग्निमलव ४२ शीतप्रकृतिक कम्बल ४३ केश -- श्मश्रु से अग्नि की ग्लानि ४४ अग्नि का गमननिरोध, और अग्नि सरक्षण-अभिवर्द्धन ४५ अग्निप्राय से सन्तान की बलवत्ता ४६ ' अया भवति सन्ततिः ' ४७ चूड़ाकरण- सस्कार I I I ७२ प्राणोदान की याज्ञिकी स्वरूप -- परिभाषा ४३० ७६ पान की उदानरूपता " " " 11 ७३ अपान, और प्राण का विचालित्त्व ७४ व्यान का विचालित्त्व 99 ७५ पार्थिव -पान का प्रतिरात्त्व 29 22 ७७ व्यानाधार पर प्राणोदान की प्रतिस्पर्द्धा 31 ७८ द्यावापृथिवी का प्राणोदानत्त्व ४३१ ७६ व्यानात्मक उपांशुसवनभाव ८० अपानात्मक अन्तर्य्यामभाव ४८ केश -- नख- निकृन्तन, और शुचिभाव " " ८१ प्राणात्मक उपांशुभाव 27 ४६ अहः कालानुगत अग्नि 23 ८२ उपांश्वन्तर्य्यात्मक घर्षणव्यापार ५० रात्रिकालानुगत सोम ( क्रोसकण ) ८३ तापधर्म्मा षडङ्ग वैश्वानर ,, ५१ अहोरात्रानुबन्धी अग्नि - सोमयज्ञ " " ८४ वैश्वानर की स्वरूप - प्रतिष्ठा " " ५२ रात्रिगत - ' विषप्राण ' 27 ८५ प्राणदान का ' पवित्रधर्म ' " ५३ विषाक्ता - ' सगरा ' रात्रि " ८६ प्राणीदान के द्वारा शरीर की पवित्रता " ५४ मध्यरात्रि, और विषाक्त ग्रहवायु ५५ मध्यरात्रि का उत्तरभाग, और पवमान सोम ५६ भोग्यपदार्थानुगता विषमात्रा ५७ ग्रीवानुगत विषहर - ' विषयन्त्र ' ५८ भुक्तान्न के अमृत - विष भावों का विषयन्त्र के द्वारा विशकलन 31 ५६. अमृत - जीवनीय रस का उदर में गमन ६० मर्त्य - विष का बहिर्विनिर्गमन ६१ विषयन्त्र का स्वरूप - दिग्दर्शनं ६२ शिव - शक्ति - मय -- पदार्थ 31 " 23 23 ४३० ६३ मस्तकयन्त्रानुगत शिवतत्त्व ६४ विषमात्रा से इन्द्रियदेवताओं का विकम्पन ६५ आध्यात्मिक शिव के द्वारा विषपान ६६ कण्ठ में अवरुद्ध विष, और नीलकण्ठ महादेव ६७ ‘ विषं प्राशित्रम् ' का समन्वय ६८ सप्तविध अन्न ६६ प्राणोदान सहयोगी विषयन्त्र ७० अनुशयरूपेण विष का भक्षण ७१ प्राणीदान के द्वारा ही तन्निरसन ८७ प्राण - अपान - व्यान - समान - उदानरूप पञ्च-प्राणों का स्वरूप- समन्वय प्राणदान की दिव्यरूपता पान - समान की पार्थिवरूपता ६० व्यान की अन्तरिक्षरूपता ६१ प्राणोदानानुगत निगूढभाव ६२ श्वास - प्रश्वास के द्वारा शरीर का विशुद्धी -करण ६३ सर्वग्रहणार्थ ' प्राणोदानौ ' का ग्रहण 22 " " 23 " ६४ कण्ठनाड़ी - रूपा -तेजोनाड़ी 91 " ६५ तेजोनाड़ी, और उदान 22 ६६ ' तेजो ह वा उदानः ' " ६७ तेजोनाड़ीस्थ - विषयन्त्र 27 33 ६८ श्रतिवचन समन्वय " " ६६ स्तोमानुगत - पञ्चप्राण - समन्वय - परिलेख: ४३३ " १०० प्राणों की वायुरूपता " १०१ प्राणप्रद - वायु " " १०२ मरुत्, मरुत्त्वान्, प्राण, वात, आदि नियत अभिधाएँ " "