Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 231–240
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240
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१०३ ' वात ' नामक पारिभाषिक वायु १०४ प्रवाहित - स्पर्शधर्मा वातवायु १०५प्राङ, और प्रत्यङ रूप प्राणवायु १०६ एक प्राणवायु की द्विरूपता १०७ प्राणापानस्थानीय दर्भ १०८ एक कुशा की द्विरूपता १०६ ' ताविमौ प्राणोदानौ ' ११० ' तस्माद् द्व े भवतः ' १११ त्रित्त्व की अवैज्ञानिकता ११२ ' पवित्रं वा आपः ' ११३ ' मेध्या वा आपः ' विषयसूची ४३४ १३१ मिथ्याकथा, और असदाख्यान १३२ असदाख्यान का एक उदाहरण " " " १३३ असदाख्यानों की महती उपकारकता १३४ व्यावहारिक - शिक्षणपथ, और उपायभूत सन्मार्ग " 13 १३५ अक्षरज्ञानानुगता सल्लिपि १३६ ' असत्ये वर्त्मनि स्थित्त्वा ततः सत्यं समीहते ' " १३७ आध्यात्मिक आख्यान ( १ ) 37 १३८ आधिभौतिक ( २ ) 23 १३६ आधिदैविक 31 ( ३ ) ११४ पवित्र मेध्य - पानी का कुशा के द्वारा पवित्री - -करण, एवं तत्सम्बन्ध में प्रश्नात्मिका जिज्ञासा 77 दर्भोत्पत्तिरहस्य ११५ नित्य - सिद्ध - अनादिधर्म ११६ महापुरुषों के द्वारा सुरक्षित धर्म्म ११७ पाश्चात्यदृष्टि, और १ ११८ पाश्चात्य जगत् की भूतदृष्टि ११६ भूतदृष्टि, और भूतविज्ञान १२० वाङ् मय भौतिक जड़वाद १२१ दर्भ - मृगचर्म्म - शङ्ख, सुवर्ण आदि की प्रकृतिसिद्धा प्राणात्मिका पवित्रता १२२ विरोधी - भावों का समन्वय १२३ प्राप्तवाक्य की प्रामाणिकता " १४० आध्यात्मिक आधिभौतिक, ( ४ ) १४१ आध्यात्मिक, आधिदैविक, ( ५ ) १४२ आधिदैविक, आधिभौतिक, ( ६ ) १४३ दैविक - भौतिक आत्मिक -१४४ असदाख्यान ४३४ १४५ एक का सम्पूर्ण वैभव 33 " 19 " १४६ ‘ एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' , ( ७ ) १४७ एक से उत्पन्न पदार्थों का पारस्परिक आश्च-मय पार्थक्य १४८ भेदस्वरूप - जिज्ञासा १४६ भेदवादानुगति १५० मूलतत्त्व का स्वरूप - दिग्दर्शन १५१ सर्वधर्मोपपन्न ब्रह्म " १५२ विविध बलकोश 22 १५३ अमृत - ब्रह्म - शुक्र- विवर्त्तत्रयी १५४ विश्वोपादन भूत शुक्रतत्त्व ४ १२४ तर्क, वितर्क का प्रवेश निषिद्ध १२५ विज्ञानाधार पर प्रतिष्ठित भारतीय धर्म १२६ दर्भेत्पत्ति - विज्ञानोपक्रम १२७ अधिदैवत - अध्यात्म- अधिभूत - अधियज्ञादि विश्वविव १२८ ब्राह्मणग्रन्थों की विज्ञानप्रधाना भाषा १२६ पुराणशास्त्र की इतिहास भाषा १३० पुराणों की मिथ्याकथाएँ " १५५ आधारभूत - अमृततत्त्व 21 ४३५ १५६ निर्माता ब्रह्मतत्त्व १५७ उपादान - शुक्रतत्त्व १५८ प्रजापति की सर्व पता 21 29 १५६. ' परिता बभूव ' 22 १६० भोक्ता, भोगसाधन, भोग्य त्रयी 32 १६१ आत्मा - प्राण- पशु - त्रयी ६४
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१६२ पशुपति -पाश - पशु त्रयी १६३ समष्ट्यात्मक प्रजापति १६४ अन्तर्भोग्य, एवं बहिर्भाग्य १६५ भोगायतन, और भाग्य १६६ शरीर की भोग्यता १६७ वहिर्वित्त - स्वरूप - दिग्दर्शन १६८ बहिःपिण्डात्मक पशुमान १६६ पिण्डगर्भित प्राणभाव १७० पिण्ड केन्द्रस्थ आत्मभाव १७१ प्रजापति का स्थूलशरीर १७२ प्रजापति का सूक्ष्मशरीर १७३ प्रजापति का कारणशरीर १७४ प्रज्ञा - प्राण - भूत - मात्रात्रयी १७५ बीज - देव - भूत - चितित्रयी १७६ चिदात्मा का स्वरूप - सयन्त्रय १७७ श्रात्मयोनिर्भाव, और अमृत १७८ प्रकृतियोनिर्भाव, और ब्रह्म १७६ त्रिकृतियोनिर्भाव, और शुक्र १८० ' सचते स षोडशी ' १८१ ' केष्वन्तः पुरुष आविवेश ' १८२ ‘ पञ्चस्त्रन्तः पुरुष विवेश ' १८३ प्राणब्रह्म, और मुण्डकश्रु ति १८४ श्रात्मा - प्राण- पशु - त्रयी - परिलेख १८५ पशुपति -पाश- पशु - त्रयी -- परिलेख १८६ षोडशकला - स्वरूप - परिलेख १८७ पञ्चब्रह्मस्वरूप परिलेख १८८ पटशुक्रस्वरूप- परिलेख १८६ अमृतब्रह्म की समानव्याप्ति १६० ब्रह्म, और शुक्र का वैषम्य १६२ पदार्थभेद का मौलिक - कारण १६२ अग्नीषोमात्मक विश्व का समन्वय १६३ प्रकार - भेदात्मक विश्वभेद १६.४ अमृतब्रह्मरूपा ' विद्या ' १ ९ ५ मर्त्यकरूपा ' अविद्या ' शतपथ- प्रथमखण्ड ४३७ १६६ अमृत - मृत्यु का श्रोतप्रोतभाव १६७ विद्या अविद्या का समन्वय 32 १६८ कर्म्म कर्म का समन्वय , १६६ ब्रह्माधार पर प्रतिष्ठित कर्म्म " २०० सृष्टि की मौलिक - श्राधारत्रयी " ., २०१ सृष्टि की सामान्या अनुबन्ध - त्रयी २०२ विश्वनिर्माता ब्रह्मशुक्रात्मा " २०३ तपोनिष्ठ - प्रजापति २०४ तप का स्वरूप लक्षण २०५ तपश्चर्या से सर्वसिद्धि " २०६ भृग्वङ्गिरोमय तप 3. २०७ तपोमूला कर्म्मठता " २०८ प्राजापत्य तत्र का प्रभाव " ४३८ २०६ तप की काल्पनिक परिभाषा से हमारा अधः-पतन " २१० महान् साधनभूत ' तप ' २११ तप से ब्रह्म, सुब्रह्म का आविर्भाव " २१२ तपोमूलक ब्रह्म का स्वरूप - परिचय " २१३ तपोमूलक सुब्रह्म का स्वरूप - परिचय २१४ तपोमूला वेदसृष्टि २१५ सत्यमूर्ति वेद का सर्वप्रतिष्ठात्त्व २१६ सुब्रह्मात्मक अथर्व के महिमामय वितान " २१७ सुब्रह्म के गर्भ में प्रतिष्ठित गायत्रीमात्रिक-" सौरवेद ४३६ २१८ वाकू, आप:, अग्नि- त्रयी " २१६ अमृत मर्त्य - भेदेन षड्विध - शुक्र , ४४०२२० शुक्रमूला सृष्टि का संक्षिप्त स्वरूपेतिवृत्त २२१ वेद - सुवेदानुगत - षड्विध -शुक्रपरिलेख: " , २२२ दर्भोत्पत्ति का उपक्रम २२३ अग्निमय सूर्य " २२४ पोमय परमेष्ठी 32 २२५ अमृतप्राणात्मक सौर तेजोमण्डल 33 ०२६ मृतप्राण का इन्द्रत्त्व २२७ मघवेन्द्र का रूपाधिष्ठातृत्त्व ६५
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२२८ रोदसी - त्रैलोक्याविष्ठाता सूर्य २२६. आपोमय, एवं सोममय परमेष्ठी २३० सूर्यभक्षक प्रपतत्त्व २३१ व्याप्तिधर्म्मा अप्तत्त्व २३२ सौरप्राण- आवरक पारमेष्ठ्य वृत्रासुर 31 २३३ वृत्रासुर के द्वारा सौरब्रह्माण्ड का सीमाबन्धन 67 २३४ पारमेष्ठ्य - सोमाहुति से इन्द्र की बलवत्ता 91 २३५ रश्मिरूप वज्र से वृत्रासुर का संहार २३६ वृत्रात्मक पानी का निराकरण २३७ वृत्रासुर का आधिपत्यस्थान २३८ इन्द्र के द्वारा इतवीर्य्य वृत्रासुर २३६ अब्रूगर्भिता सौररश्मियाँ २४० ज्योतिर्म्मय रश्मिमय अपतत्त्व २४१ रश्मिशून्य पूयित वृत्रपानी २४२ ज्योतिर्म्मय पानी, और वेन २४३ वेन के द्वारा दिव्य सौन्दर्य की अभिव्यक्ति २४४ वृत्र के द्वारा उगकर - भाव की अभिव्यक्ति 23 विषयसूची ४४४ २६१ दर्भ की वेनरूपता 16 17 २६२ असुरविनाशक दर्भ २६३ ग्रहणदोषनिवर्त्तक दर्भ २६४ ऋत - सत्यात्मक विश्व २६५ ऋत - सत्य की स्वरूप - परिभाषा २६६ ऋत में सत्य का आधान २६७ सत्य में ऋत का आधान " २६८ सविता का स्वतन्त्र ग्रह्त्त्व 13 २६६ ग्रहोपग्रहों के कक्षात्मक तारतम्य ४४५ २७० सूर्योर्ध्वस्थित सविताग्रह 23 19 22 11 २७१ सूर्य्यद्वारेण समागत सविताप्राण २७२ द्वारत्वेन सूर्य का सविता त्व २७३ सूर्य्यात्मक त्रयीमय सविता २७४ सत्यात्मक सौर अग्नि २७५ सविताप्राण की सर्वव्याप्ति २७६ च्छिद्र पवित्र सविता ४४६ ४४ " 11 " 13 97 11 " 96 11 112 २४५ वेन का तात्त्विक – स्वरूप -- समन्वय २४६ वसतीवरी - निग्राभ्या - एकधना नामक पारिभाषिक - प्रप्तत्त्व २४७ अवरुद्ध पानी, और त्रृत्रासुर २४८ स्यन्दमान पानी, और इन्द्र २४६ प्राकृतिक ' वसतीवरी ' २५० सोमवल्ली का वसतीवरी से अभिषेक २५१ वेन की स्तुति २५२ भाष्यकार, और वेनशब्दार्थ २५३ पृश्निगर्भा वेन २५४ रज के विमान में स्थित वेन २५- वेन की शिशुवत् आराधना ३५६ मति मात्र के द्वारा उपास्य वेन २५७ भूतदृष्टि से अतीत वेनतत्त्व २५८ ज्योतिर्ज्जरायु वेन और अप्तत्त्व २५६ सौरमण्डलस्थ - ज्योतिर्मय -- वेन २६० वेन से दर्भ का स्वरूप निर्माण 27 17 " " " 22 " " 17 " 11 " २७७ च्छिद्रपवित्र वायु २७८ विरोध – समन्वय २७६. इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते २८. उत्पवितारः- सूर्य्यरश्मयः ' २८१ वेन से निर्मित कुशाओं का सूर्यरश्मित्त्व-समन्वय २८२ संकोच, और अल्पता २८३ विकास, और भूमा २८४ भूमा, और समृद्धानन्द २८६ भूमाभाव का आशंसन २८७ निम्नगामी अप्नत्त्व २८८ अगुवः विशेषण का समन्वय २८६ ' पुवः ' विशेषण का समन्वय २६० श्रग्रभाव - प्राप्ति, और यज्ञसमृद्धि २६१ सोम का प्रथम भक्षण २६२ पवमान सोम, और अपतत्त्व ४४६ २६३ अधिदैवत के साथ अधियज्ञ का समतुलन 39 २६४ अन्तरतम - मनस्तन्त्र ६३ " ४४८ " 1 I " "
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२६५ देवसङ्गमन, और अप्तत्त्व • ६६ अन्नमय सौम्य मन २६७ अङ्गिराप्राण की अरूपता २६८ प्राण की अनग्नता २६६ अमृतापिधानात्मक अपतत्त्व ३०० अमृतोपस्तरणात्मक तत्व ३०१ दैवत - श्रात्मिक - प्राणों का सङ्गमन ३०२ ‘ देवयुव ' श्रपूतत्त्व ३०३ प का यज्ञपतित्त्व ३०४ इन्द्र, और वृत्रासुर ३०५ वज्र से वृत्रासुर का संहार ३०६ वृत्रवध में सशक्त अपूतत्त्व शतपथ - प्रथमखण्ड ४४६_३०७ पारस्परिक संघठन, और शत्रुविनाश " ३०८ विद्रव्य और यज्ञपात्रों का प्रोक्षण ,, ३०६ रथकार का शूद्रत्त्व < " " ३१० स्पर्शदोष से पात्रों का अशुचित्त्व " ३११ दोषनिराकरणार्थ अपेक्षित प्रोक्षण ३१२ तत्त्वमूला स्पृश्यास्पृश्य व्यवस्था 63 ३१३ प्रकृति का आधिदैविक चातुर्वर्ण्य ४५० ३१४ प्रकृतिसिद्धा वर्णचतुष्टयी ३१५ प्रकृतिसिद्धा अवर्णचतुष्टयी ३१६ प्रकृत्यनुगता वर्णव्यवस्था ३१७ प्रकृतिसिद्ध शौचाचार - व्यवस्थापन ३१८ प्रोक्षणकर्मोपपत्ति का उपराम प्रोक्षणकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक सूची उपरत प्रथमकाण्डानुगत - प्रथमाध्याय का तृतीय - ब्राह्मण एवं प्रथम- प्रपाठक का तृतीय - ब्राह्मण अत्र उपरत ३ ६७
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विषयसूची प्रथमकाण्डानुगत - प्रथमाध्याय का चतुर्थ ब्राह्मण एवं प्रथम- प्रपाठक का चतुर्थ ब्राह्मण ४ ६ - ' पुरोडाशसम्पादनाङ्गकर्म्म ' से अनुप्राणित विषयों की स्मारक - सूची-पृष्ठसं ० ४५२ से ६१० पर्यन्त १ पुरोडाशसम्पादनाङ्गकर्म्मन्ब्राह्मण ( मूल ) ४५२ से - ४०५ पर्य्यन्त [ १ कण्डिका से २४ कण्डिका - पर्यन्त ] २ मूलानुवाद प्रकरण ४५५ से पर्यन्त ३ त्रयीविद्यास्वरूप - कृष्णमृगचर्म्म ४६५ ४ कृष्णमृगचर्म्म के कृष्णलोम, और ऋग्वेद " ५ ६ ७ ८ 17 " 71 १५ पौराणिक कथावाचकों के द्वारा पुराणशास्त्र का अभिभव 77 १६ निगमागमवत् अभिभूत पुराणशास्त्र १७ पाश्चात्यजगत् का वेदार्थ, और हमारा -तदन्धानुकरण १८ ब्रह्मविज्ञाननुगता परिभाषाएँ, और वेदार्थ १६ कृष्णमृगचर्म्म का वेदत्त्व शुक्ललोम, और सामवेद २० तन्निबन्धन परिभाषोपक्रम शुक्ललोम, और ऋग्वेद 17 २१ प्रजापति की सर्वता कृष्णलोम, और सामवेद 27 वलोम, और यजुर्वेद 27 ६ श्रुति के सामान्य अक्षर, और तदनुबन्धी-१० ब्रह्मविज्ञानपरिभाषाएँ, और वेदार्थ ११ पारिभाषिक रहस्यशास्त्र की विलुप्ति, और वेदार्थ की जटिलता 77 १२ निदान - गाथा – कुम्ब्या - आदि पारिभाषिक तत्त्वों का श्रभिभव 71 १३ पुराणशास्त्र के द्वारा कठिनता का प्रशिक-समन्वय १४ पुराणशास्त्र का प्रथमशास्त्रत्त्व 17 17 11 २२ ‘ सर्वमु ह्ये वेदं प्रजापतिः ’ २३ निरुक्त - अनिरुक्त - उद्गीथ - सर्व - सत्य-यज्ञ - रूप प्राजापत्य - विवर्त्त ४६७ 77 17 19 २४ सत्यप्रजापतिविवर्त्त -४६६ २५ यज्ञप्रजापतिविवर्त्त २६ यज्ञप्रतिष्ठात्मक सत्य २७ निदान, और कृष्णमृगचर्म का सत्यप्रजा-पतित्त्व २८ दशवादान्तर्गत- ' अम्भोवाद ' २६ अम्भोवादमूलक —– ' सलिलतत्त्व ' ३० सरित् - इरारस, और ‘ सरिर ’ ३१ सरिरु, और सजिल 77 " 77 ६८
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शतपथ - प्रथमख एड ३२ सलिल की ऋतरूपता ३३ ऋत का स्वरूप - समन्वय ३४ ' आपो वा इदम सलिलमेवास ' ३५ स्नेहात्मक - ऋततत्व ३६ तेजोमय - ऋततत्त्व ३७ ऋततत्त्व के स्नेहानुबन्धी तीन त्रिवर्त्त ३८ तेजोऽनुवन्धी तीन विवर्त ३६ तेजोरूप ऋत की सत्यरूप में परिणति ४० पतत्त्व की विश्वप्रभवता ४१ सलिलरूप आपः का सत्यभाग, और वेदत्रयी 77 ४२ वेदत्रयीरूप सत्यप्रजापति का गर्भ में अवस्थान ४३ गर्भस्था त्रयीविद्या, और अथर्व ति ४४ पोमय समुद्र में परिव्याप्त परमाणुरूप अङ्गिरोऽग्नि.... और आदिवराह ४५ स्वयम्भू, ४६ परमेष्ठी, और यज्ञवराई ४७ सूर्य्य, और श्वेतवराह ४८ चन्द्रमा, और ब्रह्मवराह ४६ भूपिण्ड, और एमूषवराह ४६७ ६४ त्रयीवेद का दोहन " ६५ वेदग्रन्थ, और पौरुषेय वेदशास्त्र 27 ६६ वेदतत्त्व, और अपौरुषेय वेदशास्त्र " ६७ प्रथमजब्रह्म, और प्रतिष्ठाब्रह्म " 1 ६८ वेद का स्वरूप - विचार 37 27 ४६८ " ६६ ‘ विद् सत्तायाम्, और विद्यते ' ७० ' विद ज्ञाने, और वेत्ति ' ७१ विद्लृ लाभे, और विन्दति ' ७२ ‘ उपलब्धिवेद ' स्वरूप - दिग्दर्शन ७३ उपलब्धि, और प्राप्ति ७४ उपलब्धि, और ज्योति 11 ७५ ' अस्ति ', ओर वस्तुप्रतिष्ठा ७६ अस्ति, और भान ७७ भाति, अस्ति ७८ ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ७६. ब्रह्म की सच्चिदानन्दरूपता ८० विश्व की सच्चिदानन्दरूपता 91 ८१ अस्ति भाति -रस- त्रयी " ८२ ‘ अस् ' धातु, और ‘ अस्ति ’ 31 ५० भार्गववायु, और यज्ञवराह ५१ ' वराह ' शब्द का स्वरूप - समन्वय ५२ ' सहसो जात श्रोजसः ' ५३ सहोजा अग्निदेव ५४ अग्निज्ज्वाला का आविर्भाव ५५ अग्निमूत्तिं अंशुमान् की अभिव्यक्ति ५६ ' आपः, और सत्यम् 77 23 ४६६ 22 ८३ अस्तित्व की स्वरूप - व्याख्या ८४ मनः- प्राण- वाक् - और अस्तित्त्व ८५ काम - तपः - श्रम - और अस्तित्त्व ८६ पञ्चभूत, और वाग्वि { र्त्त ८७ मात्राभाव - समन्वय घटनिर्माता कुम्भकार ८ कुम्भकार की मनःप्राणवाङ्मयी सत्ता 17 ६० ज्ञानजन्या इच्छा ५.७ ‘ ता आपः सत्यमजृजन्त ' ! " " ६१ इच्छाजन्य क्रतु ( कृति ) ५८ के गहर में सत्याग्नि 27 ६२ तुजन्य कर्म्म ५६ ' अपां गम्भन्त्सीद ' 22 ६३ ' घटोऽस्ति ' और सत्ताभाव ६० ‘ तद्यत् - तत्सत्यं, आप एव तत् ' 22 ६४ ‘ मनःप्राणवाचां संघातः सत्ता ' ६१ सत्य की ब्रह्मरूपता 22 ६५ तिब्रह्म का संस्मरण ६२ सौराग्नि, और सत्य " " ६६ नास्तिक दर्शनाभिमत सत्तालक्षण ६३ सौरसत्याग्नि के त्रैलोक्यात्मक महिमाभाव 11 ६७ ' अर्थक्रियाकारित्त्वं सत् ' ६६. II
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६८ ' उत्पादव्ययधौत्र्यं सत् ' ६६ ' उपलब्धिः सत् ' १०० अस्ति, सत, और सत्ता १०१ चेतना, और आनन्द १०२ मन: - प्राण - वाक - विज्ञान - श्रानन्द १०३ मन: प्राणवाक्, और सत् १०४ विज्ञान, और चित् विषयसूची ४७३ १३१ व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का बाह्य स्वरूप 11 " १३२ व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का आभ्यन्तर स्वरूप " १३३ छन्दोरूप - बाह्य व्यक्तित्व १३४ छन्दितरूप आभ्यन्तर व्यक्तित्त्व १३५ उभयव्यक्तित्त्वानुबन्धी- रेखाचित्र १३६ पदार्थचैतन्य और तदुपलब्ध ४७५ 19 " " ३७६ ४७७ १०५ रस, और आनन्द 17 १३७ त्रिविध चैतन्यरूप, ' प्रत्यय ' का लक्षण " " १३८ उदाहरण के द्वारा लक्षण समन्वय 22 " १४० व्यक्ति, और अभिव्यक्ति 11 श्रात्मभाव १४१ अभिव्यक्ति, और उपलब्धि " १४२ ग्रनन्त व्यक्ति, और अनन्तोपलब्धि 23 11 १४३ उपलब्धि, और वेद " 12 १४४ भरद्वाज महर्षि के अनन्तवेद १०६ रस की श्रानन्दरूपता १०७ उक्थ - ब्रह्म - सामात्मक १०८ अमृत - मृत्यु - की स्वरूप - परिभाषा १०६. समृद्धानन्द, और विश्व ११० नाम - रूप- कर्म्म -का परिवर्तन १११ मनः- प्राण - वाक का अपरिवर्तन ११२ अस्तित्त्वानुगत - अस्तिभाव ११३ नास्तित्त्वानुगत अस्तिभाव ११४ अस्ति की सर्वव्यापकता ११५ शान्तानन्द, और श्रात्मा ११६ विविधज्ञान, और मृत्युभाव ११७ भेदव्यवहार, और श्रुतिं ११- अभेदव्यवहार, और श्रुति ११६ सामान्य सत्तारूप निष्कैवल्यत्रह्म १२० श्रस्ति - भाति -रस- की अभिन्नता १२१ अस्तित्त्व की उपलब्धि १२२ उपलब्धिरूपा ब्रह्मसत्ता १२३ सत्ताब्रह्म, और कठोपनिषत् १२४ उपलब्धिवेदानुगत सच्चिदानन्दब्रह्म १२५ विद्यते - वेत्ति - विन्दति - रूप - सच्चिदानन्द ब्रह्म १२६ सत्तापूर्वक ज्ञान १२७ ज्ञानपूर्विका सत्ता १२८ समाधेया समस्या १२६ प्रत्ययैक सत्योपनिषन्मूलक समस्या निराकरण १३० अन्तर्जगत्, और बहिर्जगत् 13 १४५ सामान्यसत्ता - भाव 33 १४६ सामान्यज्ञाश- माव 32 " १४७ सामान्योपलब्धि - भाव " " १४८ ' त्रय्यां वात्र विद्यायां सर्वाणि भूतानि ' ४७८ ४७४ १५० सत्यवेदस्वरूपोपक्रम 21 11 १५१ मानसी - मैथुनी - याज्ञिकी - सृष्टिधाराएँ 19 १५२ गोषाप्राणात्मिका पत्नी " " १५.३ प्राणात्मक पति 23 " १५४ दाम्पत्यमलक- प्रजनन १५५ अग्नि - सोम – मूलक दाम्पत्य १५६ स्त्रायम्भुव ब्रह्मनिःश्वसितवेद 27 23 22 १५७ ऋक् – यजुः - साम का स्वरूप - परिचय और १५८ यज्जू ँ , यजुः " " १५६ श्राकाशानुगत वायु, और यजुः " 17 १६० वांगनुगत प्राण, और यजुः ४७५ १६१ वाजसनेयश्रुति, और यजुः 72 77 23 ४७६ १६२ ऋषिप्राणरूप सप्तपुरुष पुरुषात्मक चित्य-प्रजापति 27 " 3 १३३ सप्तपुरुषात्मक पुरुष, और श्रौत - सन्दर्भ 22 १६४ स्वयम्भू ब्रह्म के ज्येष्ठपुत्र 29 " १६५ त्रयीविद्यात्मक श्रण्डवत्त 22 ७०
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शतपथ - प्रखमखण्ड १६६ ब्रह्मात्मक वेद का अण्डवृत्त, और ' ब्रह्माण्ड ' ४७६ २०० वस्तुपिण्ड, और ऋग्वेद १६७ वेद का द्वितीय अवतार १६८ स्वायम्भुव - ब्रह्मनिः श्वसितवेद १६६ सौर - गायत्रीमात्रिकवेद १७० प्रथमवेद का ज्ञानज्योतिर्मयत्व १७१ द्वितीय वेद का भूतज्योतिर्मयत्त्र १७२ उस का प्राणमुखत्त्व १७३ इस का अग्निमुखत्व १७४ तस्य पौरुषेयत्त्व ४८१ ४८० २०१ वस्तुगति, और यजुर्वेद 21 २०२ वस्तुमण्डल, और सामवेद 11 " } " " २०३ महर्षि तित्तिरि, और मूर्ति - गति - मण्डल -वेदत्रयी २०४ मन्त्रश्रुति का स्वरूप – समन्त्रय २०५ त्रयीविद्या के द्वारा सम्पूर्ण विश्व का प्रादु-र्भाव “ २०६ ऋग् - यजुः - साम - तत्त्वों का त्रिवृत्करण 39 29 " ४८२ " १७५ अस्य पौरुषेयत्त्व १७६ सौरवेद का सत्यवेदत्त्व १७७ द्वितीय वेद, और श्रौतसन्दर्भ १७८ त्रयीविद्याधन सू १७६ सौर ऋक्तत्त्व, और महोक्थ १८८० सौर सामतत्त्व, और महाव्रत १८१ सौर यजुस्तत्त्व, और पुरुष १८२ वस्तु के दृश्यमण्डल १८३ दृश्यमण्डलों का उत्तरोत्तर हूसीयस्त्व १८४ मूर्त्तय:, और उक्थामद १८५ मूर्ति, और ऋक् १८६ अर्चिर्म्मण्डल, और साम १८७ साम, और अवसान १८८ साम का व्रतत्त्व " २०७ ऋक् का वेदत्रयत्त्व 71 २०८ यजुः का वेदत्रयत्त्व " २०६ साम का वेदत्रयत्त्व " 76 11 " 1 २१० तालिका, तथा रेखाचित्र - माध्यमेन तत्त्वा-त्मक वेदपुरुष का स्वरूप समन्वय - प्रयास " २११ ( क ) –अग्निमय - मूलवेदपरिलेख ३८३ २१२ ( ख ) - आत्म - प्रतिष्ठा - ज्योति - वेदत्रयी 11 २१३ ( ग ) -रस - छन्दो - वितान - वेदत्रयी-परिलेख २१४ ( घ ) –सच्चिदानन्दवेदत्रयी – स्वरूप— परिलेख ४८१ २१५ ( ङ ) - यजुर्वेदे - वेदत्रयोपभोगः २१७ ( छ ) -ऋग्वेदे वेदत्रयोपभोगः 97 २१६ ( च ) - सामवेदे - वेदत्रयोपभोगः " १८६ व्रत, और महाव्रत " २१८ ( ज ) - सच्चिदानन्दवेदत्रयी १६० मर्चि, और मण्डलात्मक वयोनाव " 1 २१६ ( झ ) -त्रिवृत्करणवेदविभाग १६१ वयोनाध की त्रायतनरूपता " २२० ( ञ ) - समष्टिवेदपरिलेखः " " 29 11 ४८४ " ४८५ 99 29 ४८६ ४८७ १६२ वय, और अग्नि १६३ अग्नि, और यजुः १६४ यजु, और पुरुष १६५ सैषा त्रयी विद्यातपति १६६ त्रयीविद्यात्मक-- श्रौतसन्दर्भ १६७ वस्तुपिण्डभाव ९ ६८ वस्तुगतिभाव १६६ वस्तुमण्डलभाव " 11 17 " " ७१ २२१ ( ट ) - मूलवेदत्रयी २२२ आकाश - समुद्र - इलान्दमूर्त्ति - त्रयीवेद-स्वरूप- परिलेखः २२३ रोदसीत्रैलोक्य - वितानपरिचयात्मकः-परिलेख: २२४ छन्दोमा - गोसव - सम्वत्सर - यज्ञमय – वेदस्वरूप – परिलेखः 22 ४८८ ४८६ II
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४६१ २२५ त्रैलक्य- त्रिलोकी - वितान - परिचयात्मकः परिलेखः २२६ सौर सम्वत्सर चक्रानुगत -- सामत्रयी-विषयसूची २४४ मण्डलात्मक पृष्ठ्य रश्म्यात्मक अमि प्लव - मण्डल -स्वरूप - परिलेखः २४५ त्रिधा त्रिभक्ता - वेदत्रयी परिलेखः ( रेखाचित्रात्मकः ) ४६२ २४६ ‘ त्रिःसत्या वै देवाः ' २२७ रश्म्यर्कसहस्रवितानपरिलेखः ४६३ २४७ सत्यप्रतिष्ठा, और त्रिःसत्यवाद २२८ छन्दो- वितान - रस - भावानुगत त्रयी - वेद-स्त्ररूप - परिलेखः २४८ शन्तिपाठ का त्रित्त्व ४६४ २४६ त्रिकलवेदमूर्ति सत्यात्मा २२६ विष्कम्भ ( व्यास ) - भावानुगत स्त्रिगुणित-२५० सर्वमूलभूता वेदत्रयी परिणाहमण्डलपरिलेखः ४६५ २५१ संख्या - सम्पदनुगत निगमवचन २३॰ छन्दोवेदप्रतिकृतिप्रदर्शनात्मकः— २५२ त्रित्त्वोदाहरणोपक्रम परिलेखः ४६६ २५३ लोकत्रयी ( १ ) २३१ अणु - स्कन्ध - प्रतिकृति - प्रदर्शनात्मकः २५४ वेदत्रयी ( ३ ) परिलेखः ४६७ २५५ देवत्रयी ( ३ ) २३२ व्यासाणुबिन्दुवितानपरिलेखः ४६८ २५६ अधिदेवत्रयी ( ४ ) २३३ व्यासाणुसाहस्रीवितानपरिलेखः ४६६ २५७ प्रजात्री ( ५ ) २३४ छन्दोवेदात्मक- विष्कम्भवितानपरि— २५८ श्रग्निंत्रयी ( ६ ) लेख: .... ५०० २५६ छन्दस्त्रयी ( ७ ) २३५ विष्कम्भ -- मूर्त्ति -- वितान -- समप्रि - परि-२६० त्रीणि छन्दांसि ( ८ ) लेखः ५०१ २६१ ऋतत्रयी ( ६ ) २३६ व्यासानुगत - परिणाह साहस्री - वितान-२६२ आत्मकलात्रयी ( १० ) परलेखः ४०२ २६३ वर्णत्रयी ( ११ ) २३७ प्रकारान्तरेण सहस्र सामवितानपरि— २६४ स्वायम्भुवमनोतात्रयी ( १२ ) लेख: ५०३ २६५ पारमेयमनोतात्रयी ( १३ ) २३८ अभिप्लवस्तोमार्कवितानपरिलेखः ५०४ २६६ पारमेठ्यतत्त्वत्रयी ( १४ ) २३६ परिणाहात्मक - साममण्डलवितान-२६७ सौरमनोतात्रयी ( १५ ) परिलेखः २६८ चान्द्रमनोतात्रयी ( १६ ) ५०५ २४० परिणाहात्मक सहस्र सामवितान - परि-लेख: २६६ पार्थिवमनोतात्रयी ( १७ ) २७० भृगुत्रयी ( १८ ) ५६ २७१ तेजस्त्रयी ( १६ ) २४१ वेदत्रयी - समप्रि - परिलेखः ५०७ २७२ आत्मभावत्रयी ( २० ) २४२ सूर्य्यानुगत - उक्थामद ( मूर्त्ति ) - वितान -परिलेखः २ ३ पार्थिवसामत्रयी ( २१ ) ५०८ २७४ सौरसामत्रयी ( २२ ) २४३ सप्त -- देवच्छन्दोमय - सौररथ -चक्र-परिलेखः २७५ शुक्रत्रयी ( २२ ) ५८६ २७६ कर्म्मनिवन्धनत्रयी ( २४ ) ७२
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२७७ धातुत्रयी ( २५ ) २७८ नाड़ित्री ( २६ ) २७६ पर्वत्रयी ( २७ ) २८० इड़ादित्रयी ( २८ ) २८१ पुरुषत्रयी ( २६ ) २८२ गुणत्रयी ( ३० ) २८३ महत्कलात्रयी ( ३१ ) २८४ प्राजापत्यकलात्रयी ( ३२ ) २८५ पदार्थ अवस्थात्रयी ( ३ ) २८६ शारीरिक अवस्थात्रयी ( ३४ ) २८७ वयोऽनुगत अवस्थात्रयी ( ३५ ) २८८ ब्रह्मकलात्रयी ( ३६ ) २८६ वृत्तित्रयी ( ३७ ) २६० अभ्वत्रयी ( ३८ ) २६१ आत्मव्यापारत्रयी ( ३६ ) २६२ कालकलात्रयी ( ४० ) २६.३ महाकालकलात्रयी ( ४१ ) २६४ सृड़िसाक्षित्रयी ( ४२ ) २६५ सम्बन्धत्रयी ( ४३ ) २६६ अध्यात्मकलात्रयी ( ४४ ) २६७ भूतकलात्री ( ४५ ) २६८ अभिव्यक्तित्रयी ( ४६ ) २६६ यज्ञत्रयी ( ४७ ) ३०० सामत्रयी ( ४८ ) ३०१ ब्रह्मणोऽवस्थात्रयी ( ४६ ) ३०२ शक्तित्रयी ( ५० ) ३०३ आत्मगतित्रयी ( ५१ ) ३०४ काण्डत्रयी ( ५२ ) ३०५ ज्ञानत्रिपुटीत्रयी ( ५३ ) ३०६ प्रत्ययत्रिपुटी त्रयी ( ५४ ) ३०७ विद्यासमुञ्चितकर्मत्रयी ( ५५ ) ३०८ विद्यानिरपेक्ष - कर्म्मत्रयी ( ५६ ) ३०६ कर्म्म - त्रिपुटी - त्रयी ( ५७ ) ३१० उपासना - त्रयी ( ५८ ) शतपथ- प्रथमखण्ड ५१३३११ आकस्मिकता, और दैववाद ३१२ दैवसंयोग - स्वरूप - समन्वय " " ३१३ प्राणदेवतानुबन्धी कार्यकारणभाव 93 ३१४ भूतभव्यभवदधिष्ठाता वेद ५१४ ३१५ त्रिसत्य की सर्वव्याप्ति ३१६ तत्त्वत्रयी ( १ ) 17 ३१७ आधारत्रयी ( ३ ) >> ३१८ ईश्वरत्रयी ( 3 ) " " ३१६ श्रीवत्री ( ४ ) " " ३२० साक्षी - त्रयी ( ५ ) 23 ३२१ ऋषित्रयी ( ६ ) " " ३२२ कर्म्मत्रयी ( ७ ) 97 ३२३ कर्म्मत्रयी ( ८ ) 39 ३२४ क्रियात्रयी ( ६ ) 99 ३२५ ग्रामन्त्रयी ( १० ) " ३२६ गुणत्रयी ( ११ ) " ५१५ ३२७ संहितात्रयी ( १२ ) ३२८ संसितात्रयी ( १३ ) " ३२६ प्राणी - त्रयी ( १४ ) " ३३० भूतसर्गत्रयी ( १५ ) 79 ३३१ चान्द्रसर्गत्रयी ( १६ ) ,,, ३३२ अनात्म्यजीवत्रयी ( १७ ) ., ३३३ पापत्रयी ( १८ ) ,, ३३४ भेदत्रयी ( १६ ) ३३५ लक्षणत्रयी ( २० ) " ३३६ वाक्यप्रकारत्रयी ( २१ ) " " ३३७ शरीरत्रयी ( २१ ) " ३३८ मानवत्री ( २३ ) " ५१६ ३३६ पुरुषत्रयी ( २४ ) ३४० वचनत्रयी ( २५ ) 29 ३४१ संज्ञाभेदत्रयी ( २६ ) " ३४२ संज्ञानङ्गत्रयी ( २७ ) " ३४३ सन्धित्रयी ( २८ ) 27 ३४४ गणितत्रयी ( २६ ) " ७३