Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 41–50
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50
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शतपथ - प्रथमखण्ड मृत्यौ - परिध्वस्ता - दर्शने ' ( हैम: ) के अनुसार पलायन, मृत्यु, स्वरूपध्वंस, प्रदर्शन, आदि अनेक भावों के साथ ‘ नाश ' शब्द समन्वित हो रहा है । नाशशब्द की इस व्याप्ति को आधार बना कर ही तो - ' बुद्धिना --शात् - प्रणर्थ्यात ’, - एवं - ‘ समूलस्तु विनश्यति ' का समन्वय किया जायगा | मानव स्वस्वरूपतः मानव है, तव मूलतः श्रात्मनिष्ठ है, अतएव च मूलरूपेणैव सत्कर्म्मानुगामी है । अतएव प्राकृतिक - तात्कालिक - व्यामोहनों में आसक्त होकर जब भी मानव असत्कम्मों में प्रवृत्त होते लगता है, तो वह स्वयं ही अपने मनःक्षेत्र में इन से लज्जित होपड़ता है । तत्काल आरम्भ की सत्त्वबुद्धि इसे उद्बोधन प्रदान करती है कि, ' काम बुरा कर रहे हो ' । ' परिणाम अच्छा नहीं होगा ' । किन्तु सङ्गदोष, एवं श्रविद्या - दोषादि की प्रचलता से यह अपनी इस उद्बोधन - वाणी पर कोई ध्यान नहीं देता, और असत्कर्म्म कर बैठता है । असत्कर्मानुगति से होने वाली तथाकथिकता लज्जा से क्षणमात्र के लिए अभिभूत होजाना हीं इसका पलायनात्मक - ' नाश ' माना जायगा, जिसका प्रारम्भ में यह स्वयं भी अपने अन्तर्जगत् में अनुभव कर लेता है । सत्कर्म्मकरणकाल में न तो इसकी सत्त्वस्मृति ही काम करती, न सत्त्वबुद्धि का ही प्रभाव इस पर होता । श्रपितु सत्त्वस्मृतिभ्रंशरूपेण - सत्त्वबुद्धि के अभिभवात्मक नाश से इसका असत्कर्म्म-करणात्मक नाश हो ही तो जाता है । यदि महद्भाग्य से, किंवा शिक्षा - विद्या -- सुसङ्गादि के अनुग्रह से इस प्रथम क्षण में होनेवाली सत्त्वबुद्धि की चेतावनी से यह सँभल जाता है, तब तो इस नाश का नियन्त्रण होजाता है । और प्रत्यक्षमूला भावुकता के प्रवेश से यदि सत्त्वबुद्धि की ध्वनि की यह उपेक्षा कर देता है, तो यहाँ से नाश - परम्परा प्रचण्डवेग से प्रक्रान्त होपड़ती है, जिसका पर्य्यवसान अन्ततोगत्त्वा -- ' मूलनाश ' पर ही हुआ करता है । वही ' मूलनाश ' इसे अत्र समझ लेना है । शास्त्र, किंवा धर्म्म, किंवा प्राचीनता का नाम लेना तो सम्भवतः श्राज के शास्त्रधर्म्म -- निरपेक्ष सत्ता-तन्त्र के युग में रुचिकर न होगा । अतएव सुप्रसिद्ध, ' गान्धीवाद ' के आधार पर प्रतिष्ठिता राष्ट्रीया वर्त्त -माना ' नैतिकता ' से अनुप्राणित ' मद्य ' ( शराब ) का ही उदाहरण ' मूलनाश ' के सम्बन्ध में सामयिक मान लिया जायगा । मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने अपने वर्तमान जीवनपर्यन्त मद्य का नामस्मरण भी नहीं किया । क्रिन्तु तद्गुण - उपवर्णयिताओं के अधिक सङ्ग - व्यासङ्ग - से, तद्वारा दृष्ट मद्यपानादि - जनित मद्यपरमाणुरूप वासना - संस्कार से इस विशुद्ध भी मानव का स्नेहगुणक ( सोमगुणक ) मन समन्वित होने लग पड़ता है-' संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति ' न्याय से । श्रज्ञातरूपेणैव शनैः शनैः मद्यवासना - संस्कार इसके संस्कार-ग्राहक अज्ञात - सर्वेन्द्रिय - मन पर खचित होते जाते हैं, जिन संस्कारों का आरम्भ में इसे भान भी नहीं होने पाता । अपितु अपनी भावुकता से आरम्भ के उन सङ्ग प्रवाहों में वीतराग - आत्मनिष्ठ - परमहंसवत् यह यही उद्घोष करता रहता है कि, “ हम पर किसी का बुरा प्रभाव नहीं पड़ सकता । कोई हमें दुर्गुणों में आसक्त नहीं कर सकता ” इत्यादि इत्यादि, जबकि आत्मनिष्ठाशून्य, अतएव सहजभावुक इस व्यक्ति पर मद्य संस्कार अपना प्रभाव स्थापित करते जाते हैं, जिस इस संस्कारप्रभाव को भी हम ' नाश ' ही कहेंगे । इस ' नाश ' की अनु-भूति इसे तत्र होपाती है, जबकि सङ्ग के चिरकालिक - अनुध्यान से ये संस्कार कालान्तर में पुटरूपेण उक्थ- बिम्ब-रूप में परिणत होजाते हैं, एवं उक्थविम्ब के बनते ही उससे कामनामय अर्क निकल पड़ते हैं, जिस इस तथ्य का पूर्व में– “ ध्यायतो विषयान्पुं सः सङ्गस्तेषूपजायते ' इत्यादि वचन - समन्वय - प्रसङ्ग से स्पष्टीकरण किया जाचुका है । कामनामय इह्रीं अर्को ( रश्मियों ) का नाम है - ' मद्यपान की प्रारम्भिक इच्छा ', जिस इस ३७
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श्रात्मनिवेदन इच्छा का अभिनय इसके मन में इसीप्रकार होपड़ता है कि- “ एक दिन अपन भी पी कर तो देखें, कैसा आनन्द? मिलता? है । महान्नाश के इस प्रथम क्षण में अमुक सीमापर्य्यन्त अभीतक मानस - संस्कारों के वारुण - पाश - बन्धन से बची रह जाने वाली सत्त्वबुद्धि तत्काल इसे उद्बोधन प्रदान करती है कि - ' देखो, मद्यपान अत्यन्त पतन का कारण है । इसीलिए ' । यहीं कुछ समय के लिए बुद्धि, और मन में प्रति-द्वन्द्विता प्रारम्भ होजाती है । बुद्धि अपने सहज सत्त्वगुणानुबन्ध से पुन: पुन: इसे यही कहती जाती है कि-‘ मद्यपान असत् कर्म्म है ', तो सङ्गदोषजनित मद्यसंस्कारों से पतित मन उत्तर में पुनः पुनः यही कहता जाता है कि, “ एक बार, केवल एकबार ' । एकबार में क्या बनता बिगड़ता है " इत्यादि । मूल श्रात्म— निष्ठा का अभाव, सांस्कृतिक बल का संस्पर्श, तद्विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रभावों का प्राचुर्य्य, भूपिण्डोपग्रहभूत चान्द्र-मन के समतुलन में विदूरस्था सौरीबुद्धि की विदूरता, आदि आदि दुर्भाग्यपूर्ण अनेक कारणों से बुद्धि का उद्बोधन व्यर्थ चलाजाता है, और.... श्रालायालमेव " सङ्गजनित - भातिसिद्ध - संस्कारों की प्रतिद्वद्विता में हीं जब सत्त्वबुद्धि का उद्बोधन संस्कारासक्त मन की इच्छा की प्रतिद्वन्द्विता में सफल नहीं हो सका, तो साक्षाद्रूपेण मद्यपान कर लेने से सत्तासिद्ध मद्य-संस्कार से ओर भी अधिक प्रबल बन जाने वाले मन की प्रतिद्वन्द्विता में तो सत्त्वबुद्धि का उद्बोधन कैसे सफल होसकता है । यों बुद्धि का सदसत् - विवेकधर्म्म उत्तरोत्तर अभिभूत ही होता जाता है, और विवेकसङ्ग से भ्रष्ट, एवं अविवेक्सङ्ग । मद्यसङ्ग से समाप्लुत मन का शतमुख विनिपात ही उपक्रान्त होजाता है - विवेक-भ्रष्टानां विनिपातः शप्तमुखम् ' न्याय से | फिर भी बुद्धि ' बुध्दि ' जो है । असत्कर्म्मनिरोध इसका सहज स्वभाव है । तदनुत्रन्धनैव यह सत्त्वबुद्धि उस सीमा पर्य्यन्त इस विवेकभ्रष्ट मद्यपी को उद्बोधन प्रदान करती ही रहती है, जिस सीमापर्य्यन्त स्वयं बुद्धि का सत्त्वगुण प्रात्यन्तिकरूपेण अन्तम्मुख नहीं बन जाता | इधर मन भी अपने अभ्यस्त मद्यपानावसान - कालों में बुद्धि की वह उबोधनध्वनि मयसंस्कार - सम्पुटों के उत्तरोत्तर वृद्धि - भावानुगत तारतम्य के अनुपात से यदा कदा सुन कर तत्क्षण के लिए लज्जित सा होता रहता है, जैसे भित्तिपार से इसे दूर से कोई चेतावनी दे रहा हो । यही इस मद्यपी की नाशात्मिका वह सङक्रमणावस्था है, जिसमें आंशिकरूपेण सत्त्वबुद्धि की उद्बोधन - ध्वनि भी गम्भीररूपेण श्रुतोपश्रु ता बनी रहती है, एवं मन का गतिरूप ‘ चेतना ' धर्म्म भी मद्यावसानक्षणों में गच्छतः स्खलनरूपेण अंशतः - जागरूक बना रहता 1 किन्तु? | किन्तु, यही कि. मद्यपी एक दिन उस अवस्था में पहुँच ही जाता है, जिस अवस्था में बुद्धि का सत्त्वगुण भी ग्रात्यन्तिकरूपेण श्रभिभूत होजाता है, और इधर मन का चेतनारूप - गतिभाव भी निश्चेष्ट - जड़-मृतवत् - शिथिल बन जाता है । यही मूलनाशात्मिका वह सर्वनाशावस्था है, जिसके श्रागमन के कुछ पूर्व ही बुद्धि का वह सत्त्वगुण सर्वथा ही अभिभूत हो जाता है, जिसके अनुबन्ध से ही बुद्धि बोध — बोधन-उद्बोधन - रूप - सदसद्विकासधर्म्म से पलायित होजाती है । इस पलायन की दृष्टि से ही भगवान् ने ' बुद्धि– नाशात् ' कहा है, एवं मन की प्रात्यकि जड़ता के अनुबन्ध से ही - ' प्रणश्यति ' कहा है । न तो इस पतना-वस्था में बुद्धि ही बोध - धर्मानुगामिनी रहती, एवं न मन हीं मनन- चिन्तन - धर्मानुगामी बना रह पाता | दोनों हीं सहैव परिसमाप्त, और यही -- ' बुद्धिनाशात् प्ररणश्यति ' का संक्षिप्ततम समन्वय । ३८
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शतपथ - प्रथमखण्ड सत्त्वगुणेोद्रेकदशा में बोधात्मिका जो बुद्धि मद्यपान के प्रति घृणा अभिव्यक्त करती रहती थी, एवं तद्गुणसमाश्रित मननधर्म्मा जो मन मद्य को लज्जाजनक कर्म्म मानता था, नाश की तथोक्ता चरम सीमा पर पहुँचते ही बुद्धि का सत्त्वगुणात्मक देवभाव सुरभाव से आक्रान्त होजाता है, एवं मन का मननभाव-जड़ता निबन्धन अनर्गल प्रलाप के रूप में परिणत होजाता है । पतनावस्था की सुरीबुद्धि का अब इस नाशा --वस्था में यही उद्घोष होपड़ने लगता है कि- ' अरे! कौन कहता है कि, मद्य बुरी वस्तु है । इससे तो इत्यादि । उधर इत्थंभूता श्रासुरीबुद्धि के संरक्षण से अभय - निर्भय बन जाने वाले मनो महाभाग भी उस पूर्वजा का प्रत्यक्ष में उपहास ही करने लग पड़ते हैं, जिस लज्जा से मद्यपान करते समय एक दिन ये अव--नतशिरस्क बन जाया करते थे । इसी आत्यन्तिक - पतनावस्था, किंवा सर्वनाशावस्था का नामकरण गीताशास्त्र मेंहुआ है- ' सर्वज्ञानविमूढ ' । ऐसे विनष्टतम अभिनिविष्ट -- प्रतिक्रियावादी मानवाधमों के लिए तो – ‘ नष्टाः ’ उपाधि के अतिरिक्त और कुछ भी तोशेष नहीं रह जाता गीता के ही इन शब्दों में कि - ' सर्वज्ञानविमूढाँस्तान्-विद्धि नष्टानचेतसः ' ( गीता ) । अभी राजर्षि मनुः – सम्मत - ‘ समूलस्तु विनश्यति ' का यथावत् समन्वय नहीं हो सका | अतएव दो शब्दों में इस ब्रसङ्ग का समन्वय भी कर ही लेना चाहिए । हम समझते हैं- ' मद्यपान को नैतिकता के लिए महान् अपराध - मानने वाले आज के धम्मनिरपेक्ष - शास्त्रनिरपेक्ष - राष्ट्रीय मानव को भी उक्त उदाहरण से यह तो मान हीं लेना पड़ेगा कि, ‘ मद्यपान करने वाले की नैतिकता, तदनुगता नैतिकबुद्धि, नैतिक मन सभी कुछ नटु होजाते हैं ", जबकि आज के बड़े बड़े भूतविज्ञानवादी, ख्यातिप्राप्त राष्ट्रसञ्चालक मद्यपान में भी कोई दोष नहीं मानते । अपितु ' ड्रिंक् ' तो उनकी भौतिकी सभ्यता का प्रमुख अङ्ग बना हुआ है । इसके साथ ही बुद्धि से वे विलक्षण विलक्षण भौतिक श्राविष्कार भी करते जारहे हैं, इस बुद्धि से वे अपने अपने राष्ट्रों का सञ्चालन भी भूतसमृद्धिदृष्ट्या कौशलपूर्वक करते ही जारहे हैं । और सर्वोपरि हमारा भारतराष्ट्र आज उनकी सभ्यता, उनकी नैतिकता, उनके आदर्श, उनकी जीवनपद्धति का ही अन्धानुकरण भी करता जारहा है । तो क्या ये सत्र गुण मद्यपान के ही मान लिए जायँ? | समाधान करने का अनुग्रह करेंगे वे धर्म्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी कि, इन्होंने किस आधार पर मद्यपान को -- ' नैतिकता ' - ' बुध्दि ' आदि का प्रतिबन्धक मान लिया, जबकि ' ' इत्यालप्यालमेव । रही बात भारतीय शास्त्र की, सो उसका तो मद्यपान के सम्बन्ध में अत्यन्त ही वैसा क्रान्ति-कारी दण्डविधान है, जिसके सुननेमात्र से ही हृत्कम्प होपड़ता है । प्रकृत में दो शब्दों में-- मूलनाश ' का समन्वय कर इस प्रक्रान्तचर्चा को उपरत किया जा रहा है । श्रूयताम्! श्रुत्वा चाप्यवधार्य्यताम्!! * -- सुरापानजनितपाप के लिए प्रायश्चित्त - विधान— सुरां पीच्या द्विजो मोहादग्निवर्णा ं सुरां पिबेत् ॥ तया स काये निर्दग्धे मुच्यते किल्विषात्ततः ॥ १ ॥
गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा ॥ पयो घृतं वामरणाद्गोशकृद्रसमेव वा ॥ २ ॥
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श्रात्मनिवेदन पुरुष उसी का मूलरूप है रसप्रधान बनता हुआ, एवं प्रकृति उसी का तूलरूप है बलप्रधानां चनती हुई । उसीका, अर्थात् दिग्देशकालातीत, विश्वातीत सर्वत्रलविशिष्टर सैकघन मूर्ति, ' शाश्वतत्रह्म ' नामक परात्पर परमेश्वर का वही रूप रसानुबन्धेन ' मूलपुरुष ' है, जिसे प्रकृतिनिबन्धना षोडश - कलाओं के सम्बन्ध से ' घोडशकलपुरुष ' कहा गया है ( देखिए प्रश्नोपनिषत् ६ प्रश्न ) । वही बलानुबन्धेन - ‘ तूलाप्रकृति ' है, जिसके पञ्च प्रमुख पर्व माने गए हैं - ( पञ्चपर्वामधीमः -- श्वे ० उप ० ) । रसानुबन्धी पुरुषात्मा यद्यपि स्वस्वरूप से अकल, निष्कल, एवं सदैकरस ही है । तथापि अपनी परा, अपरा नाम की अक्षर - क्षर - रूपा अन्तरङ्गप्रकृति के द्वारा इसका विश्वानुबन्धी पुरुष - विवर्त्त षोडशकलायों से सम-न्वित होजाता है । षोडशकल इस पुरुष की बहिरङ्गप्रकृति ही पञ्चपर्वा वह विश्वप्रकृति है, जिसे अन्तरङ्ग -प्रकृति के समतुलन में - ‘ त्रिकृति ' ही कहा गया है । पूर्व में हमने मानव के जिस पुरुप्रभाव का दिग्दर्शन करणान्वा भक्षयेदब्द पिण्याकं वा सकृन्निशि ॥ सुरापानापनुच्यर्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥ ३ ॥
सुरा नै मलमन्नानां, पाप्मा च मलमुच्यते ।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥ ४ ॥
गौड़ी - पैष्टी- विज्ञेया त्रिविधा सुरा । -च माध्वी च यथैका, तथा सर्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः ॥ ५ ॥
— मनुः ११।६० से ६४ श्लोकपर्य्य - व ताड़गुड़ादि से विनिर्मिता ताड़ी गौड़ी, यव [ जौ ] तन्दुल [ चाँवल ] यादि से विनिर्मिता पैष्टी, एवं द्राक्षा - मधु- [ अङ्ग ूर, शहद ] आदि से विनिर्मिता माध्वी, भेदेन त्रिधा विभक्ता सुरा [ मद्य - शरात्र ] अपने मद्यधर्म्म से समानरूपेण पतन का कारण है, अतएव कदापि इन में से किसी का भी पान नहीं करना चाहिए [ ५ ] यदि अज्ञानवश त्रैवर्णिक मानव सुरापान कर ले, तो उसे तत्रतक अग्निवत् तन्त [ गरम ] सुरा पीते रहने चाहिए, जत्रतक कि उस का प्राणान्त न होजाय । तभी वह सुरापानजनित पाप से छुटकारा पासकता है [ १ ] । अथवा तो इसे गोमूत्र, पानी, दूध, घृत, गोमय [ गोबर ] इन पाँचों में से यथारुचि किसी एक को प्रचण्डरूपेण तप्त कर मृत्युपय्र्यन्त पीते रहना चाहिए [ २ ] ये प्रायश्चित्त ऐच्छिक मद्यपान के हैं । यदि इसे बलपूर्वक मद्य पिलादी जाती है, तो उस अवस्था में इसे एक वर्ष पर्य्यन्त गाय के बालों का तो वस्त्र पहिने रहना चाहिए, सुरापात्रचिह्नों को अपने हाथ में रखना चाहिए, क्षौरकर्म्म से पृथक् रह कर जटी बना रहना चाहिए, तण्डुल कणिकाओं को, किंवा तेल निकले हुए शुष्क तिलकणों [ पिण्या कों ] को अमुक परि-मित मात्रा में रात्रि में एक बार खाना चाहिए । तभी बलप्रयोग से पीगई [ पिलाई गई ] सुरा का दोष हटता है [ ३ ] । सचमुच सुरा अन्नों का वैसा ' मल ' भाग ही है, जो आधुरप्राणात्मक - तमोमय ‘ पाप्मा ' नामक दोष कहलाया है, जिससे मानव के दैवीगुण सर्वथा ही अभिभूत होजाते हैं । अतएव कदापि द्विजातिप्रजा को मद्यपान नहीं करना चाहिए [ ४ ] ॥ II
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शतपथ - प्रथमखण्ड ' कराया है, वह घोडशकल पुरुष अन्तरङ्गप्रकृतिविशिष्ट पुरुष ही है, एवं जिसे ' प्रकृति ' कहा है, वह पञ्चपर्वा -विकृतिरूपा ' विश्वप्रकृति ' ही है । यों षोडशकला - समन्वित पुरुष ( अन्तरङ्गप्रकृतिविशिष्ट पुरुष ), तथा पञ्च-' पर्वा विश्वप्रकृति, दोनों क्रमशः रस, और बलप्रधान बनते हुए विश्व के मूल, और तूल हुए हैं । फलतः रसात्मक पुरुषात्मा का मूलत्त्व, तथा बलात्मिका विश्वप्रकृति का तूलच्व भलीभाँति समन्वित होजाता है । जिसप्रकार चीजरसात्मक वृक्षमूल के आधार पर शाखा प्रशाखा - पर्ण- मञ्जरी - पुष्प फलादि से समन्वित वृक्ष प्रतिष्ठित रहता है, एवमेव विविधा - पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्य - बलशाओं से कृतरूप दिग्देशकालात्मक विश्ववृक्ष ( संसारमहीरुह ) बीजात्मक उस मूलपुरुष के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । जिसप्रकार बीजात्मक मूल-रस के अभिभूत, शुष्क बन जाने से तदाधार पर प्रतिष्ठित वृक्ष सूख जाता है, तथैव रसात्मक मूलपुरुष के अन्तर्मुख बन जाने से बलात्मक विश्व भी सुखा वृक्ष ही बना रहता है । निष्प्राण, नीरस काष्ठ ही मूल-शून्य वह वृक्ष है, जिसका रसस्रोत अभिभूत होचुका है । ऋषिप्रज्ञाने अन्यान्य दोषों के समतुलन में एक तथ्य के आधार पर -‘मिथ्याभाषरण ' को ही मानव के पुरुषात्मक उस मूलरस का अन्यतम प्रतिबन्धक माना है । क्योंकि वह पुरुष ही मानव का केन्द्रप्रतिष्ठारूप वह ' सत्य ' भाव है, जिसके आधार पर मानवीय जीव की ज्ञान - क्रिया- अर्थ - मयी मनःप्राणशक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं । जैसा मानसिक संकल्प, वैसा ही प्राणव्या-पार, एवं तदनुरूपा ही वाणी, सहसमन्वयात्मिका इस ऋजुता से ही मनःप्राणवाक् - कलाएँ केन्द्रानुगामिनीं बनीं रहतीं हैं । फलतः केन्द्रात्मक पुरुषरस ऐसे ऋजुधर्मा मानवीय जीव में प्रवाहित होता रहता है । मानवप्रकृति-रूप भौतिकवृक्ष सूखने नहीं पाता । यदि मानव के संकल्प - प्रयत्न - चेष्टाएँ - वाणी - आदि विभिन्न पथानुगामी बन जाते हैं, तो केन्द्रसत्य के सहयोग से मानवीय जीव का सम्बन्ध पृथक् होजाता है । और इस मूलरसप्रवाह
से वञ्चित जीवभाव कालान्तर में परिशुष्यत्येव । ( सूख ही जाता है ॥
असत्यभाषण का तात्पर्य है मन, कर्म्म, वाणी तीनों को विषमघरातलानुगामी बना लेना । सोचना कुछ ओर, करना कुछ ओर ही, और कहते जाना तद्विपरीत ही, इसीका नाम दुरात्मता है, एवं मनः प्राणवाग्-व्यापारों का समानपथानुगामित्त्व ही ' महात्मता ' हैं * । ' दुरात्मता ' का अर्थ है केन्द्रीय मूल सत्यरस से जीव का पृथक् होकर इसका केवल प्राकृत बन जाना, एवं महात्मता का अर्थ है केन्द्रीय मूल सत्यरस से जीव का समन्वित रहते हुए इसका अप्राकृत बने रहना, जिस इस रहस्यपूर्ण मूल तूल- निबन्धन सत्य का कदापि मानव की प्राकृतबुद्धि समन्वय नहीं कर सकती । पुरुषरूप मूलरस से पृथग्भूता मानव प्रकृति किस प्रकार शुष्कवृक्ष से समतुलिता होजाया करती है?, प्रश्न का समन्वय ' बुद्धि ' का विषय नहीं, अपितु ' बोध ' का विषय है, निस बुद्धि, और बोध में अहोरात्र का अन्तर है । सत्यभाषण से केन्द्रस्थ केन्द्ररूप हृ - द - य - रूप-सत्यधर्म्मा पुरुषात्मा, मूलात्मा अन्तर्मुख बन जाता है, मानव प्रकृति सूख जाती है । अतएव पुरुषरस से पृथग्भूता मानवीया बुद्धि, मानवीय मन, और शरीर, किसी में भी रसानुगता सहज - प्रवणता उपलब्ध नहीं होती । बुद्धि केवल वितण्डात्मिका, मन केवल सद्विषय - परायण, और शरीर केवल परपीड़क, ये रूक्ष-ग्रासुरधर्म्म हीं आत्मरसवञ्चित मानव के प्रमुख अध्यवसाय बन जाया करते हैं । और इसी स्थिति को माना
* मनस्येकं, वचस्येकं, कर्म्मण्येकं महात्मनाम् ।
मनस्यन्यत्, वचस्यन्यत्, कर्म्मण्यनद्दुरात्मनाम् ॥
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श्रात्मनिवेदन गया है - ' मूलनाश ' । अर्थात् ' मूल के साथ सम्बन्ध - विच्छेद से होपड़ने वाली प्राकृत - स्वरूप की शुष्कता, नीरसता, क्रूरता, उद्दण्डता, धृष्टता, स्तब्धता, जड़ता, भूतपरायणता, आहारविहार - मात्र-कामुकता, शठता, दीघसूत्रता नैकृतिकता, एवं अलसता । इसी मूलनाश की ओर सङ्केत करते हुए ऋषिने – ' समूलो बा एष परिशुष्यति, योऽनृतमभिवदति ' ( प्रश्नोपनिषत् ६ ) यह् कहा है । वस्तुतत्त्व यही है कि, सृष्टिवारा सत्यसृष्टि, तथा ऋतसृष्टि - भेद से दो भागों में विभक्त है । श्रात्मानु-गता प्राणप्रधाना सृष्टि ही सत्यसृष्टि है, एवं प्राणानुता भूतप्रधाना सृष्टि ही ऋतसृष्टि है । सत्यसृष्टि ' केन्द्र-सृष्टि ' है, एवं ऋतसृष्टि परिधिसृष्टि है । परिधिरूपा ऋतसृष्टि जहाँ ' पर ' ( दूसरे ) तन्त्र से सञ्चालित रहती हुई परतन्त्रसृष्टि है, वहाँ केन्द्ररूपा सत्यसृष्टि ' स्व ' तन्त्र से सञ्चालित रहती हुई - ' स्वतन्त्रसृष्टि ' है । ग्रात्मनि-भरता से समन्विता स्वतन्त्रसृष्टि ही सत्यसृष्टि है, एवं प्रकृतिनिर्भरता से समन्विता परतन्त्रसृष्टि ही ऋतसृष्टि है । सत्यसृष्टि को ही पुरुषसर्ग कहा गया है, एवं ऋतसृष्टि को ही ' प्रकृतिसर्ग ' माना गया है | मानवसर्ग, और मानवेतर प्राणीसर्ग, दोनों सर्गों में यही महान् अन्तर है । केन्द्रसत्य से समन्वित मानत्र सत्यसर्ग है, एवं परिधिऋत से समन्वित प्राणी ऋतसर्ग है । मानव मूलसर्ग है, तो प्राणीवर्ग अमूलसर्ग है । ‘ अमरत्त्व ’ जहाँ मानव की स्वरूप - प्रतिष्ठा है, वहाँ ' मृत्यु ' पशु का स्वरूप - परिचय है । मानव अपनी प्रकृति से अभिव्यक्त होता है अमरत्त्व की संसिद्धि के लिए, तो पशु व्यक्त होता है मरने के लिए ही । दिग्देशकालानुबन्धी प्रति-क्षण - विलक्षण - प्राकृत - परिवर्तनों से यत्किञ्चित् भी विकम्पित न होते हुए शाश्वत - सनातन - नैष्ठिकी— शान्ति से कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठ बने रहते हुए अन्ततोगत्वा प्राकृतपाश को अहिःकञ्च किवत् फेंक कर परज्योति में विलीन होजाना जहाँ मानव का सहजधर्म है, वहाँ दिग्देशकालात्मक प्राकृत परिवर्तनों से परिवर्तित होते हुए, इतस्ततः ग्रहोरात्र दन्द्रम्यमाण बने रहते हुए, केवल काम - भोग - परायण -पथों का अनुसरण करते हुए सदा के लिए परिसमा'त होजाना पशु का सहजधर्म है । मानवधर्म्म आत्ममूलत्वेन जहाँ सत्यधर्म्म है *, वहाँ पशुधर्म्म प्रकृतितूलत्वेन ऋतधम्म है । अविनाश ही मानवधर्म्म की स्वरूप - व्याख्या है, एवं विनाश ही पशुधर्म्म की स्वरूप - व्याख्या है । क्या प्राकृत पशुओं में मानव की भाँति - शरीर - मन - बुद्धि- नहीं हैं? । हैं, और अवश्य हैं । फिर ये -पशु क्यों कहलाए? | यदि मानव की मानवता का मापदण्ड यही त्रयी है, तो फिर पशु भी मानत्र क्यों नहीं? | क्या उत्तर है बुद्धिवादी के कोश में इस अनतिप्रश्नात्मक उस समाधेय प्रश्न का, प्रत्यक्ष-जो अपनी मूला - भूततर्कात्मिका - जड़भावान्विता - भूतबुद्धि के व्यामोहन से श्रात्ममूलानुग्रह से वञ्चित होता हुआ इस दिशा में सर्वथा मूक ही बना रह जाता है सदैव । शरीर - मन - बुद्धि - से अतीत आत्मपुरुषमूलक सत्य, सदाचार, सापेक्षा अहिंसा, सापेक्षा दया, करुणा, श्रात्मसाम्यमूला समदर्शनानुगता सहज मैत्री, साम्यानुगत सहास्तित्त्व, मानवता, मानवधर्म्म, आदि आदि से एकान्ततः विरुद्धा जड़भावापन्ना विषमभावात्मिका - प्रकृति से सह समन्वित-* हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ - उपानपत् II
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शतपथ- प्रथमखण्ड ( प्रकृतिमूलक ) -शरीर - मनो - बुद्धि भावानुगत काल्पनिक सत्य - नैतिकता -निरपेक्षा भावुकतापूर्णां हिंसा, अस-मथभावसमन्विता दया, हीन वीर्य्यात्मिका निर्मूला दया, श्रात्मसाम्य से वञ्चिता, श्रतएव प्रच्छन्नशत्रुता गर्भिता काल्पनिकी मैत्री, प्राकृत वैषम्यानुगत काल्पनिक - सहास्तित्त्व, प्राकृत - विषमवर्त्तन- दृष्ट्या सर्वथैव दानवतोपमा काल्पनिकी - मानवता, तदनुप्राणित श्रात्मधर्म्मविरोधी धर्मात्मक ही काल्पनिक मानवधर्म्म, आदि आदि विजृम्भणों का इसके अतिरिक्त और कुछ भी अर्थ शेष नहीं रह जाता कि, हम अपनी जघन्या स्वार्थ-लिप्साओं की पूर्ति के लिए, प्रकृति की इन लिप्सातरङ्गी में सर्वतन्त्र स्वतन्त्र - रूपेण प्रवाहित होते रहने के लिए व्याजबुद्धया घोषणा तो मानवता - मानवधर्म्म - सत्य - अहिसा - करुणा- दया- मैत्री - सहास्तित्त्व - मद्यपान-निषेध आदि आदि की करते रहें, एवं इन शब्दघोषणाओं के व्याज से सदा ही अपने प्रत्येक कर्म्म में मनसा - वाचा-कर्म्मणा - अन्यथा ही बने रहते हुए ' सत्य ' के माध्यम से प्रचण्ड ' मिथ्या ' के, ' मानवता ' के माध्यम से दानवता के, मानवधर्म्म के माध्यम से स्वैराचाररूप पशुधर्म्म, किंवा परपीड़नात्मक असुरधर्म्म के, ' अहिंसा ' के माध्यम से मानवीय - आत्मविभूतियों की निर्मम हिंसा करुणा के माध्यम से दैन्य के, दया के माध्यम से परत्रशता के, मैत्री के माध्यम से स्वस्वरूपविमोहन के, ' सहास्तित्त्वं ' के माध्यम से ' स्ववर्गभेदप्रवृत्ति ' के, एवं ‘ मवनिरोध ' के माध्यम से रहसि ( एकान्त में ) मद्यपाननित्रेन के ही परमाचार्य्य बनते रहें । ऐसा क्यों? | ऐसा यों, और इसलिए कि - ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति, ततस्तु ' समूलस्तु विनश्यति ' । जो गुरुतम अपराध चिंगत शताब्दियों में भारतराष्ट्र के शास्त्र - धर्म - आदर्श - संस्कृति - आदि का उच्च उद्घोष करते रहने वाले दार्शनिक - शास्त्रभक्त - - उपदेशकादि तथाकथित ग्रहग्राहों के द्वारा होता आरहा है, वहीं अपराध उह्रीं श्रादर्शशब्दों के छल से आज हम करते जारहे हैं । कोई अन्तर नहीं है, उनमें, औरहम । इसीलिए तो आज तथाकथित शास्त्र - धर्म - भक्त प्राचीनों?, तथा नैतिकता के भक्त अर्वाचीनों में परस्पर वैसा अश्वमाहिष्य ही प्रक्रान्त है, जिसे देख सुनकर भारत का मस्तिष्क लज्जा से अवनत ही होरहा है । प्राचीनताभिनिविष्टवर्ग काल्पनिक शास्त्र की दुहाई देता हुआ धर्मनिरपेक्ष वर्ग की निन्दा करता जारहा हैं, तो धर्म्मनिरपेक्ष राष्ट्रीयवर्ग भावुकतापूर्णा काल्पनिकी ' नैतिकता - मानवता - मानवधर्म्म का उच्च उद्घोत्र करता हुआ ‘ प्राचीनता ' के नाम श्रवण से भी उद्विग्न बनता जारहा हैं | और यों बुद्धिवादासक्त प्राचीनपथा-नुगामी शास्त्राभिनिविष्ट वर्ग, तथा बुद्धिवादविमूढ़ अर्वाचीनपथस्भर्त्तामात्र नीति - अभिनिविष्ट वर्ग, दोनों हीं अर्जुन - दुर्योधन - त्- ' नहीं करेंगे ' - ' नहीं मानेंगे ' मूला निषेधभावना के उपासक बनते हुए भारतराष्ट्र में आज पुनः ' महाभारत ' की स्मृति को ही अभिव्यक्त कर देने के लिए सञ्जीभूत हैं । इति नु अब्रह्मण्यम्! ब्रह्मण्यम्!! महती विडम्बना!!! प्राकृत मानव के दिग्देशकालानुबन्धी बुद्धिवादात्मक कोश में अब एक काल्पनिक तर्क यही शेष रह जाता है कि, " हम दिग्देशकाल के अतिरिक्त क्योंकि कुछ भी नहीं देख पाते, सुन पाते, अतएव दिग्देशकालातीत मूलपुरुषात्मा, तदनुत्रन्धी आत्मसाम्य, परमात्मा, आत्मा, ब्रह्म, आदि आदि की कोई बात हमारी समझ में तो नहीं छाती । हमतो - यथार्थवादी, अर्थात् ' प्रेक्टिकल ' के अनुयायी । जो सामने है, वही हमारे लिए सबकुछ है । अतएव” ------ -इत्यादि, इत्यादि । ' नैषा तर्केण मतिरापनेया ' ( उपनिषत् ) के अनुसार सहज - आत्मनिष्ट ऋषिमानव के प्रज्ञाकोश में इस सौम्य उत्तर के अतिरिक्त और कोई तर्कात्मक उत्तर नहीं है । अपनी सहज-सिद्धा श्रात्मानुबन्धिनी मानवता से अपने अन्तर्जगत् में सबकुछ समझते हुए भी मातृकतामूलक अभिनिवेश-४३
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श्रात्मनिवेदन दुराग्रह - के आकर्षण से स्वस्वरूपोद्बोधन का तिरस्कार करते रहना हीं यदि ' मानवता ' है, तो हमें अत्र तूष्णीं हीं बन जाना है । अवश्य ही वैसे भी असंख्य सर्ग बुद्धि - मनः - शरीर - पूर्वक जीवित तो फिरते ही रहते हैं, जिनका प्राकृत - कामभोग के अतिरिक्त ओर कोई भी कर्त्तव्य नहीं है । बुद्धि के आत्मानुगामी ' बोध ' से जिन पश्वादि सर्गों का यत्किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है, परमात्मा के विश्वसाम्राज्य में उह्न भी जीवित रहने का अधिकार तो प्रकृत्यैव प्राप्त है ही । यदि मानवने अपने स्वरूप का विश्राम इत्थंभूत प्रत्यक्षसिद्ध - प्राकृत — भूत-जीवन पर ही कर लिया है, तो कुछ भी वक्तव्य शेष नहीं रह जाता । ' समानमेतत् - पशुभिर्नराणाम् ’ ‘ काले कारुणिक! त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ' रूपेण तथाविध प्राकृत - मानव के लिए हम यह मङ्गल-कामना व्यक्त करते हुए पुन: अपने नैष्ठिक पाठकों का ध्यान उस ' कारणता ' की ओर आकर्षित कर रहे हैं, जिसके स्वरूप - विश्लेषण के लिए ही हमें तथोक्त प्रासङ्गिक - इतिवृत्त का अनुगमन कर लेना पड़ा है । तात्कालिक – प्रत्यक्ष - प्रभावात्मक - वर्त्तमानोपयोगितावादात्मक - व्यामोहन का मूल सर्जक ' फलाधिकार ' ही बन जाया करता है । कर्म्मापेक्षया कर्मफल की विशेष चर्व्वणा हीं मानव को आत्ममूला कर्त्तव्यनिष्ठा से वञ्चित करती हुई इसे दिगदेशकालविमूढ़ बना दिया करती है । सत्कम्मों से अयुक्तता, तथा असत्कम्मों को आसक्ति का मूल ‘ फलाधिकार ' ही बन जाया करता है । अतएव भगवान् को - कर्म्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ' यह कहना पड़ा है, जिसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि, ' मानव को कामनारहित होकर, फलोद्द ेश्य से विमुख होते हुए, किंवा फल को ईश्वरेच्छा पर छोड़ते हुए कर्म्म का अन्धानुकरण करते रहना चाहिए " । कामना रहनी ही चाहिए, फलोद्द ेश्य निश्चित ही रहना चाहिए | तत्साधक कर्म्म को ही फल का जनक समझना चाहिए । कर्म्मजनित समृद्धिरूप फल का मर्य्यादापूर्वक भोग भी करना हीं चाहिए । और यों प्रकृतिसिद्ध मनोविज्ञाननिबन्धन सभी विधि - विधानों का यथावत् अनुगमन करते हुए ही प्रकृतिसिद्ध - स्वधर्मात्मक--विभक्त - नियत - कर्त्तव्य - कम्मों में मानव को यावज्जीवन प्रतिष्ठित रहना ही चाहिए । इति नु सर्वं सुस्थमेव । प्रकृतिसिद्ध उक्त तथ्य के लिए किसी भी मानव को ही क्या, किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार की शिक्षा - दीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है । प्रत्येक प्राणी अपने मन से इच्छा करता है । इच्छानुरूप फल को उद्द ेश्य बनाता है । फलप्राप्ति के लिए इच्छानुरूप यथाप्राप्ता बुद्धि का भी सहयोग लेता है । और यों बुद्धिसहकृता मन की इच्छा से फलोद्द ेश्यपूर्वक वह प्राणी फलप्राप्त्यर्थ ही तत्कर्म्म में प्रवृत्त होजाता है । एवं प्राप्त फूल का भोग भी कर लेता है । यह सब तो प्रकृतिसिद्ध - दिग्देशकालानुबन्धी- प्राणीमात्र में व्याप्ता सामान्या पद्धति है । फिर भगवान् ने क्या अपूर्वता स्थापित की उक्त वचन के द्वारा । ' फल की इच्छा मानव न करे, फल को उद्देश्य ही न बनावे, बिना इच्छा के निष्कामभावना से केवल कर्म्म हीं करता रहे ' क्या इस अपूर्वता - - स्थापन के लिए भगवान् का संशोधनसूत्र उपस्थित हुआ है? |
* कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म्म लिप्यते नरे ॥
४४ - उपनिषत्
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शतपथ - प्रथनखण्ड नहीं, क्योंकि गीता स्मृतिशास्त्र है, श्रुतिशास्त्र नहीं । एवं स्मृति का वही वचन प्रामाणिक माना जाता है, जो श्रु तित्रचन से निर्विरोध समन्वित होजाता है । श्रुति के द्वारा उद्घोषपूर्वक हम यह सुनते श्रारहे हैं कि, " इस विश्व के निर्माता ईश्वरप्रजापतिने विश्ववैभवरूप फल की प्राप्ति के उद्द ेश्य से ही अपने ज्ञान-मय मन से - ‘ एकोऽहं बहु - स्याम् ' रूपे सर्वप्रथम ' इच्छा ' की, इच्छा के अनुरूप अपने क्रियामय प्राण से तप ( यत्न ) किया । तपोऽनुरूप अर्धमयी वाक् से श्रम ( भौतिक- व्यापार ) किया । काम -- तपः - श्रम - रूप इच्छा - यत्न -- व्यापार - रूप तीनों अध्यवसायों के समन्वितरूप से प्रजापति ने अमुक सृष्टफल प्राप्त कर लिया । यही नहीं, अपितु -- ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार ही प्रजापति अपनी इच्छा-परिश्रम ( तप ) -- श्रम से उत्पन्न विश्वरूप फल के गर्भ में प्रविष्ट होकर उसका स्वतन्त्रता - पूर्वक भोग करते हुए- ' विश्वात्मा'- विश्वेश्वर ' आदि नामों से प्रसिद्ध होगए, जैसाकि – ' सोऽकामयत, स तपोऽतप्यत, सोऽम्यत् । तस्य श्रान्तस्यत तप्तस्य तेजो रसो निरवर्त्तताग्निः ' इत्यादि श्र तिवचन से स्यष्ट प्रमाणित है । स्वयं गीताशास्त्र मानव को - ' ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' के अनुसार ईश्वरप्रजापति का ही ' अंश ' मान रहा है । " आत्मा वै जायते पुत्रः " इस श्रुतिसिद्धान्त के अनुसार, तथा — ' कारणगुणाः कार्य्यगुणानारभन्ते ' इस दार्शनिक मान्यता के अनुसार अंशीरूप कारणात्मक पिना के गुण - धर्म्म हीं अंशरूप - कार्य्यात्मक पुत्र में संक्रान्त हुआ करते हैं । जबकि अंशी प्रजापति कामयमान है, तप्यमान है, श्रमा-नुग़त है, फलानुगत है, फलगर्भ में फलभोगार्थ सामाविष्ट है, तो तदंशरूप मानव क्या इन तथ्यों से वञ्चित रह जायगा?, असम्भव । अतएव गीता यदि इस श्रौत तथ्य के विपरीत इच्छा शून्य, फलशून्य निष्कामकर्म्म का ही आदेश देना चाहती है, तो प्रकृतिविरुद्ध, एवं मूलशास्त्रविरुद्ध ( वेदविरुद्ध ) वैसा आदेश कदापि हमें मान्य नहीं होसकता । ७ अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!! हम यह कैसा प्रायश्चित्तात्मक उद्वेग अभिव्यक्त कर बैठे । श्रौतमर्थ्यादा के संरक्षणमात्र के लिए ही प्रवृत्त गीताशास्त्र श्रतिविरुद्ध तथ्य का समर्थन करेगा, ऐसी धारणा भी हमें प्रायश्चित्तं का ही भागी बना रही है । अतएव हमें प्रकृतिमूलक - प्रत्यक्षदृष्ट-- भावुकतापूर्ण बुद्धिवाद के प्रभाव से अपने आपको सर्वथा संस्पृष्ट रखते हुए, अपनी ओर से किसी कल्पना - मान्यता का समावेश न करते हु गीता के मूलाक्षरों के माध्यम से ही वस्तुस्थिति का समन्वय करना चाहिए, और तदाधारेणैव गीता के— ' निष्कामकम्म योगात्मक ' कर्त्तव्यपथ की आराधना में प्रवृत्त होना चाहिए । जैसाकि पूर्व में निवेदन किया है, सत्य, और ऋत, रूपेण सर्ग दो भागों में विभक्त हैं । सामान्य-प्राकृत - ऋतसर्ग ही पशुसर्ग है, एवं विशेष अप्राकृत - सत्यसर्ग ही मानवसर्ग है । अवश्य ही पुरुषा-न्त्मक सत्य, एवं प्रकृत्यात्मक ऋत के भेद से इन दोनों सर्गों की कर्म्मप्रणाली में भेद ही माना जायगा । प्रकृत्य-नुगता सङ्करव्यवस्था, एवं पुरुषानुगता व्यवच्छेदावस्था, के माध्यम से ही हमें मानवसर्ग, तथा पशुसर्ग की कर्त्तव्यानुगता -- जीवनपद्धति का पृथक् पृथक् रूपेण समन्वय देखना पड़ेगा | फलोद्द ेश्यानुगता फलकामना, फल-सावक कर्म्म, कर्म्मजनित फल, फलभोग, फलभोगपरिणामात्मक प्रवर्ग्यभाग ( मलभाग ) का त्याग, आदि आदि सभी प्राकृत भावों के पूर्वापर्य्यं का कोई नियमन नहीं । सब उच्चावचरूपेण - अव्यवस्थितरूपेण-सहैत्र प्रक्रान्त, इसी का नाम है सङ्करव्यस्थानुगता जीवनपद्धति, और यही पद्धति है प्राकृत पशुस सामान्या भूतजीवनपद्धति । पशु को लक्ष्य बनाइए । वह दिग्देशकालानुत्रन्धी यथाप्राप्त खाद्य - वस्तुपरिग्रह ४५
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आत्मनिवेदन को देखने के साथ ही द्रुतगति से उस ओर दौड़ पड़ता है । इसकी इच्छा, फलोद्दश्य, और फलभोग, मभी एक साथ ही संक्रान्त होंपड़ते हैं । न तो इनमें खाद्याखाद्य का ही विवेक है, न यही विवेक है कि, अत्र अन-धिकारप्रवेश से ताड़न भी सम्भावित है । इस फलभोग के साथ साथ ही मलमूत्रविसर्जनादि - लक्षण प्रवर्ग्य-का त्याग भी सहैव प्रक्रान्त है । तदतिरिक्त अन्यान्य भी ऐन्द्रियक वासनाएँ क्रियाशील हैं । यों ग्रंथ से इति पर्य्यन्त इनके इच्छा -- कर्म्म - फल भोगादि - सभी सहैव सङ्करभावापन्न बने हुए हैं । इसी सङ्करकर्म्मपद्धति का नाम हे — ' काम्यकर्म्म ', जिसमें कर्म्मकाल के साथ साथ ही फल भी समन्वित होरहा है । परिणाम क्या होता है इस जीवन - पद्धति का? प्रश्न के समन्वय का अत्र अवसर नहीं है । मानव की जीवनपद्धति का विचार कीजिए । मानव में भी प्रकृति है अवश्य । श्रतएव प्राकृत-पशुओं की भाँति इसका भी प्राकृत शरीर, प्राकृत मन, एवं प्राकृत लोकबुद्धि, तीनों हीं सहैव सबकुछ करने -भोगने - के लिए आकुल - व्याकुल बने रहते हैं तात्कालिक रूपेणैव । इसी प्राकृत – प्रवृत्ति के कारण इसके लिए भी विलम्ब असह्य होपड़ता है । कालपरिपाकानुगता धृति असह्या बन जाती है इस के लिए भी । किन्तु इस प्राकृत - भाव के साथ साथ ही इसमें दिग्देशकालातीत अप्राकृत मूलात्मक वह पुरुषभाव भी प्रतिष्ठित रहता है, जो मानव की प्रकृत्यनुबन्धिनी तात्कालिकी संकरता का नियन्त्रण करता रहता है । इस आत्मनियन्त्रण का ही नाम है - व्यवस्थिता जीवनपद्धति, जिसमें इच्छा, फलोद्दश्य, फलसाधक कर्म्म, कर्म्मणा संसिद्ध फलभोग, भुक्त-फल का प्रवर्ग्यानुचन्धी त्याग, आदि आदि सभी तन्त्र विभक्त - पृथक रूपेणैव सुव्यवस्थित बने रहते हैं । शास्त्र का केवल यही मूलोद्द ेश्य है कि, वह मानव के सम्मुख पौरुष, और प्राकृत, दोनों स्वरूपों का ज्ञान - विज्ञा-नात्मक मौलिक स्वरूप रख दे, एवं तद्द्द्वारा पुरुषनिबन्धना मानवीया विभक्ता - जीवनव्यवस्था से ही इसे समन्वित करदे । श्रात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति से वञ्चित मानवेतर पशुसर्ग कदापि विभक्ता - जीवन-पद्धति का अनुगामी नहीं बन सकता । अतएव विश्व के किसी भी राष्ट्र के शिक्षाशास्त्रीने पश्वादि प्राणियों के लिए कोई भी संविधान आजतक उपनिबद्ध नहीं किया, जबकि सभी वित्रि - विधान एकमात्र मानव के लिए ही गलग्रह ने हुए हैं । ' नान्यः पन्था विद्यते अयनाय ' । महद्भाग्यशाली पशुसर्ग को जहाँ प्रकृत्यैव शिक्षित माना जाता है, वहाँ प्रकृत्या उत्पन्नमात्र यथाजात मानव को तो तबतक प्रशिक्षित - मूर्ख - रासभतुल्य - ही माना गया सभी मानवतावादियों के द्वारा, जबतक कि, वह प्रकृति के अमुक विधि - विधानों में एकप्रकार की अमुक व्यवस्था से सुपरिचित होता हुआ तदनुपात से ही जीवनपद्धति व्यवस्थित नहीं कर लेता । अवश्य ही प्रकृत्या उत्पन्न मानव प्रकृत्यैव उत्पन्न पशुसर्गवत् स्वत: शिक्षित तो कुत्रापि नहीं माना गया । अतएव यह भी स्वत: ही संसिद्ध है कि, पशुसर्ग जहाँ प्रकृत्या पूर्ण है, वहाँ प्रकृतिविजय का दम्भ करने वाला प्राकृत मानव प्रकृत्या तो सर्वथा अपूर्ण ही है । इसकी पूर्णता का मापदण्ड क्या कभी प्रकृति ही बन सकती है?, कदापि नहीं । प्रकृति के द्वारा प्रकृति का नियन्त्रण सर्वथा असम्भव है । क्योंकि प्रकृति स्वस्वरूप से त्रिगुणा-त्मिका बनती हुई सर्वथा विश्रमभावापन्ना है । अतएव प्रकृतिमूलक वैषम्य स्वयं विषमा प्रकृति से कदापि साम्य-भाव में परिणत नहीं होसकता । अतएव प्रकृति से अनुप्राणित विषमसत्य स्वगर्भ में असत्य को ही समुत्तेजित करता रहता है । तथैव प्रकृतिनिबन्धना अहिंसा स्वगर्भ में उत्तरोत्तर हिंसा को ही प्रवृद्ध करती रहती है । ४६