Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 371–380
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380
पृष्ठ 371
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथमाध्य ११४ - मतवादाभिनिष्ट हिंसादि वादों की निःसारिता --महत्सौभाग्य है आज यह भारतराष्ट्र वा कि, वह भी पुन: इसी तथ्य की ओर आकर्षित होता जारहा है । वह भी यह अनुभव करने लगा है कि, सत्य - हिंसा - तप- दम - शम - श्रादि मूलक मानवीय श्रात्मम्मों से ही मानव ' विश्वशान्ति ' के सुखस्वप्नों को अन्वर्थ प्रमाणित कर सकता है । समदर्शनमूलक सह अस्तित्व का इस प्रकार अनुदिन अपनी घोषणाओं से समर्थन करने वाला भारत राष्ट्र अवश्य ही निकट भविष्य में ह्रीं अपने राष्ट्र की ज्ञानविज्ञानपरिपूर्णा प्राजापत्यनिधि के अन्वेषण में प्रवृत्त होगा ही, यह आशा की जा सकती है । किन्तु "? सर्वंविनाशक इस ' किन्तु ' के मुक्त - प्रकान्त इतिहास की रूपरेखा के माध्यम से यह अवश्य ही निवेदन कर दिया जायगा कि, केवल गतानुगतिकता से कदापि ऐसी आशाएँ कार्थ्यरूप में परिणत नहीं हो नाया करतीं । केवल सत्य - श्रहिंसा - पञ्चशील सहास्तिस्व - आदि शब्दों के परायण पाठ से ही ज्ञान-विज्ञानात्मक सत्य कदापि परिगृहीत नहीं होनाया करता तबतक, जबतक कि इन शब्दों के चिरन्तन मौलिक इतिहास को अपने क्रोड़ में प्रतिष्ठित रखने वाले भारतराष्ट्र के सर्वज्ञान विज्ञानकोशात्मक वेदशास्त्र की अत्मा -नुगता ब्रह्म - यज्ञ- भूत - भेदभिन्ना विज्ञानधारायत्रयी का श्राश्रय नही ले लिया जाता । और कहना पड़ेगा कि श्रात्यन्तन्तिकरूप से काल्वालीकृता विगत २ - ३ सहस्र वर्षों की अवधि में मानव के उद्बोधक जितनें भी मतवाद इस राष्ट्र में आविर्भूत हुए, उनमें से कतिपय वेदशास्त्र की तथाकथिता विज्ञानधारात्री से पराङमुख रहे इसे न समझने के कारण, एवं कितनें एक शरीरात्मवादी लोकायतिक इस प्राजापत्यनिधि के स्वरूपसम्पर्क से ही पृथक् बने रह गए । अपरिचित रह जाने वाले वेदभक्तों ने केवल ज्ञान की घोषणा की, तो सर्वथैव पृथक् रह जाने वाले लोकायतिकों ने अपनी मान्यताओं के अनुसार स्त्य - अहिंसादि की कल्पित व्याख्या से भावुक जनता को व्यामुग्ध कर लिया । इन्हीं दो प्रधान मतवादों के अनुग्रह से अवान्तर वैसे अनेक मतवाद आविर्भूत हो पड़े विगत अवधि में इस राष्ट्रप्राङ्गण में, जिनसे राष्ट्र की समन्वयमूला ज्ञानविज्ञानात्मिका-श्रार्ष चिरन्तनपद्धति के अभिभव के साथ साथ मतवादमूला अहमहमिका का ही ताण्डवनृत्य जागरूक बन गया । कहीं हम आज इस जागरण की पावन वेला में परप्रत्ययनेयमूला - प्रत्यक्ष प्रभावोत्पादिका - उसी भावुक -तामात्र में प्रविष्ट होकर उन कल्पित सत्य - अहिंसा - आदि भावों का अनुगमन करते हुए पुन: किसी मतवाद विशेष के ही विजृम्भण के पथिक न बन बैठें, जिस इत्थंभूत कल्पित विजृम्भण के कारण ही अनेक शताब्दियौं से हम अपने मौलिक स्वरूपबोध से वञ्चित होते रहे हैं । अतएव अत्यन्त सावधानी से नागरूक बन कर स्थिरप्रज्ञ बन कर ही हमें आत्म - बुद्धि - मनः- शरीर - समन्वयात्मिका उस जीवनपद्धति को ही खोन निकाल लेना है, जिसके मूलसूत्र इस भारतराष्ट्र के सर्वादिभूत निर्भ्रान्त - सम्प्रदायवाद से संस्पृष्ट ज्ञान विज्ञानसिद्ध प्राजापत्यशास्त्र में ही सुगुप्त हैं, और दुर्भाग्यवश वही सर्वमूर्द्धन्य प्राजापत्यशास्त्र राष्ट्र की प्रज्ञा से श्राज तिरोहित ही बना हुआ है । राष्ट्रीय प्रजा अपनी इस निधि का स्वरूपबोध प्राप्त करे तन्माध्यम से विलप्त -प्राया ज्ञान - विज्ञान - परिभाषाओं के अन्वेषण में प्रवृत्त शरीर-हो, तद्द्द्वारा मानव की आत्म- बुद्धि - - मनः- म मूला जीवनपद्धति को सुव्यवस्थित प्रमाणित करे, यही ' विज्ञान ' शब्द का भारतीय दृष्टिकोण से किञ्चिदिव स्वरूप समन्वयेतिवृत्त है । इसी पारिभाषिक भारतीय ' विज्ञान ' शब्द के माध्यम से प्रस्तुत भाष्य का ' शतपथ-विज्ञानभाष्य ' यह नामकरण हुआ है । १०६
पृष्ठ 372
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पारिभाषिक सूचनाएँ ११५ – कल्पित समन्वय से गौरवाभिभूति— भारतीय दृष्टिकोण से ' विज्ञान ' के तक उपवर्णित समन्वयेतिवृत्त को लक्ष्य बना कर ही हमें इस भारतीय ' विज्ञान ' शब्द के तत्त्वानुगत समन्वय में प्रवृत्त होना चाहिए । तभी सम्भवतः हम भारतीय - दृष्टिकोण से ' विज्ञान ' शब्द के ठीक ठीक अर्थसमन्वय में सफलता प्राप्त कर सकेंगे । अपने इस मौलिक इतिवृत्त से अपरिचित रह कर, अथवा तो परिचय प्राप्त करने के अनन्तर भी ज्ञात - अज्ञात कारणों के निग्र-हात्मक अनुग्रह से इसके प्रति उपेक्षित रह कर केवल ' विज्ञान ' शब्द के ही व्यामोहनाकर्षण से यदि हम वेदशास्त्र के ज्ञानगर्भित विज्ञान शब्द के समन्वय में प्रवृत्त हो पड़े, तो निश्चयेन अपनी मान्यतामात्र से अनुप्राणित, अथवा तो अपने भौतिक दृष्टिकोणमात्र से वेदार्थ के समन्वय में प्रवृत्त पश्चिमी विद्वानों के अन्धानुकरणात्मक निग्रह से प्राप्त होने वाली केवल बुद्धिवादात्मिका दृष्टि से समन्वित वेदार्थ के प्रति अनुगत इत्थंभूत समन्वय कदापि हमें तथ्यानुगामी न बना सकेगा । ऐसे गतानुगतिक विज्ञानशब्दव्यामोहन से तो हम अहित ही कर लेंगे अपना, एवं तद्द्द्वारा श्रभिभूत ही प्रमाणित कर लेंगे वेदशास्त्र के ज्ञानविज्ञा-नात्मक चिरन्तन गौरव को । ११६-- आस्थाश्रद्धाशून्य बुद्धिवादों के विजृम्भण-आज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारत की स्वतन्त्र प्रज्ञ प्रज्ञा ने अपने इस मौलिक साहित्य, तथा तन्मूला राष्ट्रीय संस्कृति का कैसा स्वरूप समझा - समझाया?, प्रश्न इसलिए सर्वथा मीमांस्य है कि, आसन्न प्राप्ता अभिनव – स्त्रतन्त्रता की स्वातन्त्र्यचर्व्वणा से मनः - शरीर - विभोर बने हुए जन - गण के अन्तराल को इस कटुप्रश्न की कटुमीमांसा से संक्षुब्ध कर देना हमें अभीष्ट नहीं है । ' संस्कृति ' के नाम पर जहाँ - जैसा - जो कुछ अकाण्ड - ताण्डवरूप से घटित - विघटित हो रहा है, वही बहुत सम्भव है निकट भविष्य में हीं राष्ट्रीय जन-मानस को उद्बोधन प्रदान करदे । एतदतिरिक्त जबतक भारतीय विद्वान् अपने मौलिक साहित्य को, एवं तन्मूला राष्ट्रीय संस्कृति को अनेक शताब्दियों से प्रक्रान्त काल्पनिक मतवादों के आवेशों से उन्मुक्त कर उसे विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण से, ज्ञानविज्ञान स्वरूप से राष्ट्र के सम्मुख समुपस्थित नहीं कर देते, तत्रतक राष्ट्रीय प्रजा से इस म्बन्ध में कुछ भी आमह करना केवल दुराग्रह ही माना जायगा । श्रवश्य ही हमें इस दिशा में उन प्रतीच्य विद्वानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर देनी चाहिए, जिन्होंनें वैदिक साहित्य के उन दुर्लभ ग्रन्थों का प्रकाशन कर अपनी प्राच्य - सांस्कृतिक निष्ठा से भारतराष्ट्र को ऋणी बनाया है, जब कि आा वैदिक साहित्य की नामभक्ति में विभोर भारतराष्ट्र के सामान्य जनमानस की कौन कहे, अधिकांश विद्वानों को भी उन ग्रन्थों के नाम भी विदित नहीं है । रही बात प्रतीच्य विद्वानों के द्वारा संकलिता अर्थसमन्वयात्मिका व्याख्याओं की । सो इसलिए अमीमांध्य है कि, जब कि स्वयं भारतीय विद्वान् हीं तथाकथितरूपेण " व्याख्या जगत् " की दृष्टि से मीमांस्य हैं, तो जिन प्रतीच्य विद्वानों के साहित्य-विमर्श का एकमात्र आधार विशुद्ध बुद्धिवादमात्र है, वे यदि इस दिशा में अपनी मान्यताओं के अनुपास से ही भारतीय श्रार्ण साहित्य की व्याख्या करें, तो कोई आश्चर्य नहीं है । साथ ही जो आधुनिक भारतीय विद्वान्, जिनके आदर्श एक हेलया प्रतीच्यविद्वान् ही बने हुए हैं, वे भी यदि वेदव्याख्या के सम्बन्ध में उन्हीं के विचारों का अनुसरण करें, तो इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है । विशुद्ध बुद्धिवादात्मिका इन प्रतीच्य १०७
पृष्ठ 373
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथमाध्य व्याख्यात्रों का केवल एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा यह प्रमाणित करने के लिए कि आस्था श्रद्धा से समन्वित वैदिक पारिभाषिक तत्त्वार्थसमन्वय से वश्चित केवल बुद्धिवाद किस प्रकार पूर्वनिर्दिष्ट विज्ञानशब्द-समन्वयेतिवृत्त को विकृत कर दिया करता है? । ११७-- प्राच्य - प्रतीच्य व्याख्याताओं की भ्रान्ति का सोदाहरण स्पष्टीकरण— ब्राह्मणग्रन्थों में सुप्रसिद्ध ऐतरेयब्राह्मण का आरम्भ - ' ओं - श्रग्निर्वै देवानामवमः विष्णुः परमः । तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' ( ऐत ० ब्रा ० १ । १ । १ ) इस वचन से हुआ है । बुद्धिवादी प्रतीच्य • व्याख्यातात्रों नें, एवं तदनुगामी केवल बुद्धिवादी अर्वाचीन भारतीय व्याख्याताओं ने उक्त वचन का तात्त्विक? समन्वय करते हुए अपने ये विचार व्यक्त किए हैं कि - " यज्ञारम्भकाल में भारतीय प्रधान रूप ' से अग्नि को ही प्रधानता देते थे । किन्तु आगे जाकर अग्नि का स्थान विष्णुपूजा ने ग्रहण कर लिया । फलस्वरूप अग्नि गौण देवता बन गए, एवं विष्णु प्रधान देवता बन गए । इन दोनों के अतिरिक्त अन्य देवता अनुपात से विभिन्न स्थान - सम्मानों के अधिकारी मान लिए गए । अग्नि देवताओं की श्रवर कक्षा में प्रतिष्ठित हैं, एवं विष्णु उच्च श्रेणि में प्रतिष्ठित हैं, इस ऐतरय वचन का इस ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ही सम्बन्ध है " । प्राच्य भारतीय वेदव्याख्याख्याता सर्वश्री सायणाचार्य ने उक्त वचन का कैसा, और क्या समन्वय किया है?, यह भी देख लीजिए । जैसा कि निवेदन किया गया है. इन प्राच्य भारतीय व्याख्याता श्रों की दृष्टि भी केवल कम्मैपद्धतियों पर ही है । अतएव पद्धति के माध्यम से ही ये वेदार्थ में प्रवृत्त हुए हैं । सायणाचार्य्यं कहते हैं- " जो देवता ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है, उन्हें देवताओं के मध्य में अवम - प्रथम समझना चाहिए । जो विष्णु हैं, वे परम - उच्म हैं । ऐसा समझने में - ' अग्निमुखं प्रथमो देवतानामुत्तमो विष्णुरासीत् ' इत्यादि मन्त्र ही प्रमाण है ( अर्थात् मन्त्र में अग्नि को ' प्रथम ', एवं विष्णु को ' उत्तम ' कहा है । अतः यहाँ के अवम - परम - शब्दों को प्रथम - उत्तम - परक लगा लेना चाहिए ) । अथवा ' वै ' शब्द उपपत्ति का द्योतक है । और उपपत्ति की योजना ( समन्वय ) यों कर लेनी चाहिए कि, यद्यपि ' देव ' शब्द सामान्यार्थक बनता हुआा सम्पूर्ण देवताओं का वाचक है । तथापि यहाँ प्रकरणचल से ' अग्निसोम ' नामक यज्ञ के अह्नों से सम्बन्ध रखने वाले शस्त्रक्रमों में प्रतीयमाना प्रधान देवता ही विवक्षित है । शस्त्र १२ हैं । इन में. पहिला ' प्राज्यशस्त्र ' है, इसके सम्बन्ध में - ' भूरग्निर्ज्योतिरग्निः ' यह मन्त्र विहित है । ' आग्निमारुत ' नामक शस्त्र अन्तिम ( १२ वां ) शस्त्र है | इसके सम्बन्ध में - ' विष्णोर्नु कम् ' यह मन्त्र विहित है । इसप्रकार अग्निष्टोमसंस्था में द्वादश शस्त्रपाठापेक्षया अग्नि का प्रथमत्त्व, एवं विष्णु का उत्तमत्त्व प्रमाणित हो रहा है । ( एवं यही पूर्ववचन के अवम - परम शब्दों की उपपत्ति है ) । अथवा सभी संस्थाओं में उक्त न्यायानुसार अग्नि का प्राथम्य, एवं विष्णु का उत्तमत्त्व स्थापित है । ( यह भी उपपत्ति मानी जा सकती है ) । श्रथवा - प्रथमा दीक्षणीयेष्टि में अग्नि का यनन होता है, एवं अन्त की उपसदवसानीयेष्टि के स्थान में वानसेनयी लोग वैष्णवी पूर्णाहुति करते हैं । इसलिए भी श्रग्नि- विष्णु को अवम - परम- माना जा सकता है । सभी उपपत्तिर्यो का सार? यही है कि, स्तोतव्य, तथा यष्टव्य देवताओं की अपेक्षा अग्नि का प्राथम्य, एवं विष्णु का उत्तमत्त्व ही युक्तियुक्त है । अतएव सम्पूर्ण देवताओं के दोनों ओर रक्षक की भाँति अग्नि- विष्णु ही. प्रशस्त मान लिए गए हैं " । - देखिए ऐ ० वा ० १११।१ का सायणभाष्य १०८
पृष्ठ 374
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पारिवार्षिक सूचनाएँ शास्त्रवादी ( शास्त्राभिनिविष्ट ) प्राच्य व्याख्याता कहते हैं- " अमुक अमुक स्थलों में अग्नि- विष्णु को प्रथम - उत्तम कहा है, इसलिए अग्नि को देवताओं में श्रवम तथा विष्णु को परम मान लिया है ” । एवं बुद्धिवादी प्रतीच्य व्याख्याता कहते हैं - ' आरम्भ में अग्निपूजन प्रधान था. कालान्तर में विष्णुपूजन प्रधान गया । उसी युग में ऐसी मान्यता बन गई कि, अग्नि का गौण स्थान है, .वष्णु का प्रमुख स्थान है " । ११८ - उदाहरण का ज्ञान विज्ञानात्मक समन्वय— क्या उक्त दोनों दृष्टिकोणों से हम किसी तास्विक दृष्टिकोण का श्रनुगमन कर सकते हैं! | नेति होवाच । इसीलिए तो हमें यह निवेदन करना पड़ा कि, तत्त्ववाद की विलुप्ति ने हीं इसप्रकार वेदार्थ के सम्बन्ध में विविध - भ्रान्तियों का सर्जन कर डाला है । पारिभाषिक तत्त्ववोध का श्रभाव, एवं अपने कल्पित सिद्धान्तों के माध्यम से वेदाक्षरों के समन्वय की अनधिकार चेष्टा ही इस अनर्थ का प्रधान कारण है । पारिभाषिक तत्त्वसमन्वय की दृष्टि से ' यद्वा ' ' यद्वा ' की परम्परा से सम्बन्ध रखने वाली संशयवृत्तियों की कोई श्रावश्यकता नहीं हैं | अपितु सर्वथा निर्णीत - व्यवस्थित समन्वय है वेदवचनों का । प्रकृत उदाहरण को ही लक्ष्य बनाइए । ' त्रयस्त्रिंशद् सर्वे देवाः ' इत्यादि निगमवचन के अनुसार पार्थिव आग्नेय प्राणदेवता ३३ कोटियों ( श्रेणियों विभागों ) में विभक्त हैं । " यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी " इत्यादि मन्त्रश्रुत्ति के अनुसार भूपिण्डोपलक्षिता पृथिवी के गर्भ में प्राणाग्नि प्रतिष्ठित है, एवं सूर्य्योपलक्षित्ता द्यु के गर्भ में प्राणेन्द्र प्रतिष्ठित है । भूगर्भस्थ प्राणाग्नि अपने रश्म्यात्मक अर्कभाव से भूपिण्ड से निकल कर चारों ओर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता है, जिस प्राणाग्निमण्डल को ' रथन्तरसाम ' कहा गया है । मण्डल में व्याप्त इस प्राणाग्नि की घन - तरल - विरल ये तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं, जो अवस्थाएँ वैदिक परिभाषानुसार क्रमश: ध्रुव - धर्त्र - धरुण कहलाई हैं । ध्रुवाग्नि ( घनाग्नि ) ' प्राणाग्नि ' नाम से, धर्नाग्नि ( तरला ग्नि ) ' प्राणवायु ' नाम से, एवं धरुणाग्नि ( विरलाग्नि ) ' प्राणदित्य ' नाम से प्रसिद्ध है | इन तीनों प्राणाग्नियों के साथ क्रमशः अष्टाक्षर गायत्रीछन्द, एकादशाक्षर त्रिष्टुप्छन्द, एवं द्वादशाक्षर जगतीछन्द, इन तीन वाक्परिणामात्मक छन्दों का सम्बन्ध होता है । इन छन्दाक्षरों के सम्बन्ध से प्राणाग्नि-वायु - श्रादित्य तीनों के क्रमशः ८-११-१२ - ये अवान्तर अवस्था विभाग हो जाते हैं, जो क्रमशः आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य इन नामों से प्रसिद्ध हैं । तीनों में आठ और ग्यारह के मध्य में, तथा ११ और १२ के मध्य में दो सान्ध्य प्राण और उद्भूत है । सम्भूय एक ही प्राणाग्नि के अवान्तर ३३ दिर्त हो जाते हैं । एवं यही पार्थिव ३३ प्राणदेवता हैं ÷ ।
- अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम! ।
यादित्या वसवो रुद्रा - श्विनौ च परन्तप । ॥
अष्टौ - वसवः --- वाल्मीकिः एकादश- रुद्राः --११ द्वादश- आदित्या: - १२ द्वौ - अश्विनौ-- २ ३३ १०६
पृष्ठ 375
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथभाष्य आरम्भ के आठ वसुत्रों में पहिला वस्वग्नि ' अग्नि ' कहलाया है, एवं यही ३३ सों प्राणाग्नि-देवताओं का उपक्रमस्थान है । एवं अन्त के १२ श्रादित्यों में सर्वान्त का श्रादित्य ' विष्णु ' नाम से प्रसिद्ध *, एवं यही तेतीसों प्राणाग्निदेवताओं का उपसंहारस्थान है । श्रारम्भ में ' अग्नि ' नामक वस्वग्नि, सर्वान्त में ' विष्णु ' नामक अन्तिम आदित्य, शेष मध्यस्थ ३१ सों प्राणदेवता दोनों के मध्य में भुक्त, सैषा प्राकृतस्थितिः । वैध यज्ञ के द्वारा यज्ञकर्त्ता इन प्राकृतिक पार्थिव श्राधिदैविक प्राणाग्निदेवताओं को अपने आधिभौतिक प्राणाग्नि में अन्तम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित करना चाहता है । इस आधिदैविक - कम्र्माधिकार की योग्यता सम्पादन करने के लिए जो प्रारम्भ में ' इष्टिकर्म्म ' किया जाता है, वही - ' दीक्षणीयेष्टि ' कहलाया है । इस से यज्ञकर्त्ता दीक्षित ( अधिकारी ) बन जाता है । इस दीक्षणीयेष्टि में ' आग्नावैष्णव पुरोडाश ' द्रव्य सम्पन्न होता है, जैसा कि - ' याग्नावैष्णवं पुरोडाश निर्वपति दीक्षणीयमेकादशकपालम् ' ( ऐ ० ब्र ० १ | १ | २ | ) इत्यादि उत्तरवचन से स्पष्ट है । इस दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला पुरोडाश ( हविर्द्रव्य ) श्राग्ना वैष्णव क्यों होता है?, दूसरे शब्दों में दीक्षणीयेष्टिक में अग्नि, और विष्णु को ही क्यों प्रधानता दी जाती है १, इसी प्रश्न की मौलिक उपपत्ति ( उपनिषत् ) बतलाते हुए भगवान् ऐतरेय ने कहा है कि-' अग्निर्वै देवानामवमः - विष्णुः परमः । तदन्वरेण सर्वा अन्या देवताः । तात्पर्य्यं स्पष्टतम है । तेतीसों प्राणाग्निदेवताओं के साथ यज्ञकर्ता को अन्तर्थ्यामसम्बन्ध स्थापित करना है । एवं यह प्रयोजन सर्वादिभूत अग्निदेव, तथा सर्वान्तभूत विष्णुदेव के संग्रह से सांसद्ध हो जाता है । क्योंकि इतर सम्पूर्ण प्राणदेवता इन दोनों अवम ( उपक्रम ) - परम ( उपसंहार ) स्थानीय प्राणदेवताओं से संगृहीत हैं । कहना न होगा कि, परिभाषाओं के समन्वय के बिना स्पष्टतम भी इत्थंभूत समन्वय प्राच्य - प्रतीच्य व्याख्याताओं के अनुग्रह से एक जटिल समस्या प्रमाणित कर दिए गए हैं । लमतिपल्लवितेन । ११६ - मामयं ब्रहरिष्यति— सम्भवतः ही क्यों, निश्चय ही इसी आधार पर यह सूक्ति प्रचलित हुई है कि - ' बिभेत्यल्प श्रुताद्व दो मामयं प्रहरिष्यति ' । अर्थात् परिभाषाज्ञान से वञ्चित जो व्यक्ति अपनी कल्पना - मान्यता के आधार पर, अथवा तो ' गतानुगतिकन्याय ' से दूसरों की कल्पित धारणाओं के आधार पर वेदार्थ -: मन्वय में प्रवृत्त हो पड़ता है, मानों उस समन्वयकर्ता से वेदशास्त्र इसलिए भयत्रस्त ही बन जाते हैं कि – ' अरे! यह तो ऐसे समन्वयार्थ से मेरे तत्व पारिभाषिक स्वरूप को ही नष्ट कर रहा है ' । १२० - तच्चवाद विलुप्ति के दुष्परिणाम — तत्त्ववाद की विलुप्ति के दुष्परिणामस्वरूप श्राविर्भूत हो पड़ने वाले विभिन्न मतवादों के निग्रह से अपनी परम्परानुगता ज्ञानविज्ञानसमन्विता सत्त्वगुणान्विता सहज आस्था - श्रद्धा से सर्वथैव पराङ्मुख बन बाने ५ २ ३ I ५ ६ ७ - धाता - भगः - पूषा - मित्रो ऽ - थ वरुणो ऽर्य्यमा । * - इन्द्रो-६ १० ११ १२ अंशु - विवस्वान् - त्वष्टा च - सविता - " विष्णु " रेव च ॥ ११०
पृष्ठ 376
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पारिभाषिक सूचनाएँ वाली भारतीय प्रज्ञा की विगत कुछ एक शताब्दियों से कुछ ऐसी मनोवृत्ति बन गई है कि, वह भारतीय निगम - आगम - पुराणादि आई शास्त्रों के स्वरूपान्वेषण में प्रवृत्त होती हुई अपनी मान्यता से अनुप्राणित मतवादविशेष के समर्थन - पोषण के माध्यम से ही शास्त्रीय तत्त्वों के समन्वय में संलग्न हो पड़ती है । चिरन्तन परम्पराओं से सर्वथा असंस्पृष्ट, सहज ग्रास्थाश्रद्धा से एकान्ततः वियुक्त इत्थंभूत काल्पनिक मतवाद के निग्रह पुष्पित - पल्लवित हो पड़ने वाले काल्पनिक बुद्धिवाद के माध्यम से ही सम्बन्ध रखने वाली उसकी यह शास्त्रीय तत्त्वसमन्वयप्रवृत्ति आज उसे शास्त्र के पारिभाषिक अर्थसमन्वय से पराङ्मुख बनाए हुए है । १२१ - वित्त - लौकैपणाव्यामोहन से बुद्धिवाद का आविर्भाव — सहज भाषा के अनुसार इसी पराङ्मुखता का इन शब्दों में भी अभिनय किया जासकता है कि, यह श्रपनी लोकैषणात्मिका नामख्याति - यश ख्यापन - बड़े बन जाने की भूख के ब्यामोहन से व्यामुग्ध होकर गतानुगतिक रूप से ही शास्त्रसमन्वय में प्रवृत्त हो पड़ती है । एवं तात्कालिक युगधर्म से आक्रान्त मान्यतात्मक मतवादों के समर्थन के द्वारा अपनी तथाकथिता लोकेषणा को चरितार्थ करने के लिए ही यह इस मतवादा--म कल्पित सिद्धान्तवाद की दृष्टि से ही शास्त्रतत्त्वसमन्वय की अनुगामिनी बन बैठती है । स्वयं शास्त्र का पारिभाषिक समन्वय क्या है?, शास्त्र क्या कहता है?, पूर्यापरममन्वय के अनुबन्ध से शास्त्रसन्दर्भ का क्या अर्थ सम्भव है?, इत्यादि उपक्रमोपसंहारादि मीमांसाशास्त्र सम्मत नियमों की श्रात्यन्तिकरूप से उपेक्षा कर बैठने वाले ये भारतीय श्रभिनव व्याख्याता अपनी ' मान्यता ' के समर्थन के लिए ही शास्त्रसमन्वय में प्रवृत्त हो पड़ते हैं 1 । और यही वह ऐसा महान् व्यामोहन है, जिसके अनुग्रह से शास्ज्ञ के समन्वय के तात्पर्य्य से ये बुद्धिवादी अभिनव - व्याख्याता सर्वथैव वञ्चित रह जाते हैं । १२२ – बुद्धिवाद, और वेदार्थ की पराः परावतता— और भी स्पष्ट भाषा में यह कहा जा सकता है कि, आज हम भारतीयों को शास्त्रस्वरूपसमन्वय की कोई चिन्ता नहीं है । चिन्ता है अपनी मान्यताओं की, किंवा लोषणासमर्द्धक - युगधर्म्मानुगत वर्त्तमान - कल्पित मान्यताओं के समन्वय की । श्रपना एक स्वतन्त्र सिद्धान्त बना लिया जाता है, एवं उस मान्यतानुचन्धी सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिए शास्त्र का अनुगमन किया जाता है । और शब्दाक्षरवर्णादि के साम्य - मात्र से यह प्रमाणित करने की चेष्टा की जाती है कि, शास्त्र मानों हमारे इस कल्पित सिद्धान्त का मतवाद का ही सम-र्थन कर रहा है | ' हम जैसा मानते हैं, सोचते हैं, वैसा ही शास्त्र में है ' इसप्रकार के इस व्यामोहन ने ही निगमागमशास्त्र के वास्तविक ज्ञानविज्ञानसम्मत समन्वय से हमें सर्वथा पृथक कर दिया है । इसी का तो यह दुष्परिणाम है कि, आज- ' सोऽकामयत, स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् ' इत्यादि सृष्टिविज्ञान रहस्यप्रतिपादक इस भौत वाक्य सन्दर्भ के - ' सोऽश्रान्यत् ' वाक्यावयव में पटित ' श्राम्यत् ' के आधार पर किसी अभिनव वेदभक्त ने यह कल्पना कर डाली है कि, ' वेद तो स्पष्ट शब्दों में हमारे राष्ट्रीय श्रमदान का ही समर्थन कर रहा है ' । कहीं- ' नमो मरुद्गणेभ्यः ' के ' गण ' शब्द से वेद को गणतन्त्र का समर्थक माना जा रहा है, तो कहीं ' प्रजापत्तिः प्रजया संरराण: ' से प्रजातन्त्र के मूल ढूँढे जा रहे हैं । कुछ समय पूर्व ही तो राजस्थान के ही किसी परिचित बन्धु ने हम से ऐसा आग्रह किया था कि - ' पूर्वकाल में पुष्कर ब्रह्मा सामूहिक श्रमदान के रूप में जो यज्ञ किया था, उसके कुछ प्रमाण हम संकलित करना चाहते हैं १११
पृष्ठ 377
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- शतपथभाष्य वेद से ' । क्या ' ' आदि आदि । ऐसा ही तो कुछ घटित विघटित हो रहा है विगत कुछ एक शताब्दियों से वेदार्थ के सम्बन्ध में । कोई अपने नगन्मिथ्यात्ववादात्मक श्रद्वैत सिद्धान्त के समर्थन के लिए बेद को प्रमाण मान रहा है, तो कोई अपने शुद्धाद्वै तसम्प्रदाय को ही वेदसम्मत घोषित कर रहा है 1 । तो तीसरा विशिष्टाद्वैतवाद को ही एकमात्र वेद का वास्तविक तात्पर्य्य संसिद्ध करने के लिए आतुर बना हुआ है । कभी वेद को गणतन्त्र का समर्थक माना जारहा है, तो कभी उपनिषत् के सृष्टिविज्ञानात्मक यज्ञ - तप - दानादि शब्दों के द्वारा विविध प्रकार के कल्पित यज्ञों ( चलयज्ञों ) की, कल्पित दान ( भूदान ) तपों भावों की घोषणा की जा रही है । और यों आज वेदशास्त्र मानों मानव की मतवादात्मिका काल्पनिकी मान्यताओं का, आस्था - श्रद्धा-शून्यशुष्क बुद्धिवादों का ही क्रीड़ास्थल प्रमाणित होता हुआ अपने पारिभाषिक ज्ञान - विज्ञान - समन्वयात्मक वास्तविक तथ्य पे सर्वथैव पराः परावत ( अत्यन्त ही विदूर ) बनता जा रहा है । १२३ - वेदार्थसमन्वय की मूलप्रतिष्ठा का दिग्दर्शन – अतएव यह आवश्यक है कि, वेदशास्त्र के समन्वय में प्रवृत्त होने से पूर्व हमें अपनी गतानुगतिक भावनिबन्धना, लोकैषणा - वित्तैषणादि वृत्तियों से समनुप्राणिता उन समस्त कल्पित मान्यताओं को सर्वथा विस्मृत करते हुए स्वयं वेदशास्त्र की सहजसिद्धा निगम - अनुगम - नाम की परिभाषाओं के माध्यम से ही वेदार्थसमन्वय में प्रवृत्त होना चाहिए | तभी सम्भवतः हम वेदार्थसमन्वय के पात्र बन सकेंगे, जिस अधिकार-ग्रहणयोग्यतानुबन्धिनी पात्रता का उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड में विस्तार से स्वरूप विश्लेषण हुआ है । ' उतो त्वस्मै तन्वं विसत्रे, जायेव पत्ये उशती सुवासा ' इत्यादि रूप से स्वयं वेदशास्त्र ही अपने पारिभाषिक रहस्यपूर्ण ज्ञानविज्ञानात्मक समन्वय को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त कर देने में सक्षम है | वेदशास्त्र स्वयं अपनी व्याख्या है 1 | मन्त्रभाग यदि वेदशास्त्र का मौलिकस्वरूप है, तो विधि - श्रारण्यक - उपनिषत् - भेद से तीन भागों में विभक्त ब्राह्मणभाग इस संहितात्मक - मन्त्रभाग की रहस्यपूर्णा व्याख्या है । इसप्रकार स्वयं वेदशास्त्र ही मन्त्ररूप से जहाँ शास्त्र है, वहाँ ब्राह्मण - रूप से स्वयं वेदशास्त्र ही अपनी व्याख्या भी बना हुआ है । और यही वह चिरन्तन श्रार्षपरम्परा है, जिसे विस्मृत कर आज हमने विगत कुछ एक शताब्दिों से उद्भूत हो पड़ जाने वाले स्व - स्व - मतवादों में अभिनिविष्ट व्याख्याताओं की मान्यतानुबन्धिनी व्याख्याओं को ही ' परम्परा'सिद्ध अर्थ ' मान बैठने की महती भ्रान्ति कर डाली है । ब्राह्मणग्रन्थों में यत्रतत्र निर्दिष्ट ऋषिवंश-परम्परा ही वास्तविक परम्परा है । एवं इस परम्परा से मंसिद्ध मन्त्रब्राह्मणात्मक तात्त्विक स्वरूप ही पारम्परिक अर्थसमन्वय का मूलाधार है । एवं एकमात्र यही यच्चयावत् वित्त - लोकैषणाओं से पृथक् रहते हुए आस्था-श्रद्धापूर्वक शरणीकरणीय है । नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय । प्रतिक्षण विलक्षण - भावों से सतत परिवर्तनशील मानवीय मन से अनुप्राणिता मान्यताएँ बदलती रहीं हैं, बदलतीं हीं ‘ हेंगी । इत्थंभूत मनस्तन्त्र से समन्विता मानव की नपनवोन्मेषशालिनी बुद्धि भी सभ्यतानुबन्धी युगधर्मों के उच्चावच - चंक्रमणों से यों ही चंक्रमयाणा बनी ही रहेगी 1 । इत्यंभूत बुद्धिगर्भित मनोराज्य के अनुग्रह से विभिन्न मत्तवाद भी यों हीं आविर्भूत - तिरोभूत होते ही रहेंगे । लोकसंग्रहदृष्टि से गच्छतः - स्खलन रूप से बुद्धि - मनः - शरीर - रूपा - भूपिण्ड - चन्द्र - सूर्य्य - समन्विता प्रकृति के व्यामोहन भी इसीप्रकार प्रवाहित ११२
पृष्ठ 378
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पारिभाषिकसूचनाएँ होते ही रहेंगे । इन सभी झञ्झावातों का लोकसंग्रहदृष्टि से तटस्थरूप से समादर करते हुए भी भारतीय आर्ष-प्रज्ञा को चिरन्तन - चिरपुरातन - चिरनूतन - अपने सांस्कृतिक ज्ञानकोशात्मक प्राजापत्यशास्त्र की उपासना में हीं निष्ठा-पूर्बक प्रवृत्त रहना ही है । एवं इसी ' आत्मनिष्ठा ' के अनुग्रह से इसे युगधर्म्मानुगत उन सभी आपातरमणीय तात्कालिक प्रलोभनों से, वित्तैषणा – लोकैषणा - उत्तेजक व्यासङ्गों से, तथाविध ही अन्यान्य व्यामोहनों से अपने अन्तर्जगत् को सर्वथा असंस्पृष्ट ही बनाए रख ही लेना है, जो इत्यंभूत युगधर्म्मानुगत व्यामोहन कहने - सुनने मात्र के लिए तात्कालिकरूप से सुख - सुविधा- समर्पक बनते हुए भी वस्तुगत्या ' मानव ' के मनुनिबन्धन हृद्य प्राजापत्यस्वरूप के उच्छेदक ही बन जाया करते हैं । शारीरिक कष्ट, मानसिक परिताप, बौद्धिक प्रतारणा, आदि को अवनतशिरस्क बनकर, इन्हें अपनी निष्ठा का पुरस्कार ही मानते हुए भारतीय मानव को अनन्य श्रात्मनिष्ठा से अपनी प्राजापत्यशास्त्रनिधि के अन्वेषण -- समन्वय - अनुगमन में हीं प्रवृत्त रहना है मृत्युक्षणपर्य्यन्त जरा-मर्य्यसत्त्रवत् । भारतराष्ट्र की भारत अग्निदेव - मूला इस ' भारत ' नाम की सर्वमूर्द्धन्या पावन श्रभिधा को एक भारतीय मानव तभी अन्वर्थ प्रमाणित कर सकता है, जिसके प्रमाणनं के लिए ही विज्ञानशब्दसमन्वयेति-वृत्तप्रसङ्ग में यह प्रासङ्गिक अवधेय दृष्टिकोण उपस्थित हो पड़ा है । पारिभाषिकश्चनाप्रकरण - उपरत ---११३
पृष्ठ 379
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शुक्लयजुर्वेदीये - माध्यन्दिन - शतपथब्राह्मणभाष्ये ' हविर्यज्ञं ' नाम प्रथमं काण्डम् १
पृष्ठ 380
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ओं तत् सद् ब्रह्मणे नमः शुक्लयजुर्वेदीये माध्यन्दिन - शतपथब्राह्मणभाष्ये ' हविर्यज्ञम् ' नाम प्रथमं काण्डम् प्रथमकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः, प्रथमोऽध्यायः, प्रथमं ब्राह्मणम् १।१।१ । – १।१।१ । अथ दर्शपूर्णमासः प्रारम्भः १- व्रतोपायनम्. ( मूल ) – हरि - ओ ३ म् । व्रतमुपैश्यन्नन्तरेणाहवनीयं च गार्हपत्यं च प्राङ् तिष्ठन्नप उपस्पृशति । तद्यदप उपस्पृशति - श्रमेध्यो बै पुरुषो यदनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः । मेध्या वा यः । मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति । पवित्रं वा आपः । पवित्रपूतो व्रतमुपाया-नीति । तस्माद्वाप उपस्पृशति ॥ १ ॥
( अनुवाद ) – “ दर्शपूर्णमास " यज्ञ करने के लिए ब्राहण करता हुआ यजमान ( व्रत ग्रहण से पहिले ) आहवनीय और गार्हपत्याग्निकुण्ड के बीच में पूर्वाभिमुख खड़ा होकर आचमन करता है ( वह प्रयोजन बतलाते हैं ) । मनुष्य स्वभावतः मिथ्याभाषण करता है । अतएव वह अमेध्य ( संस्कारग्रहण के अयोग्य ) रहता है । पानी मेध्य ( संस्कार ग्रहण धम्म ) है । हम मेध्य बन कर व्रतग्रहण करें । पानी पवित्र है । हम पवित्र होकर व्रतग्रहण करें । इन्हीं दो प्रयोजनों के लिए यह यजमान सर्वप्रथम अप उपस्पर्श ( आचमन ) करता है ॥ १ ॥
( भाष्य ) – वितानयज्ञ, एवं पाकयज्ञ भेद से यज्ञ दो प्रकार के होते हैं । वितानयज्ञ को श्रौतयज्ञ कहते हैं, पाकयज्ञ को गृह्य किंवा स्मार्त्तयज्ञ कहते हैं । वितानयज्ञ में ग्राहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, ये तीन अग्नि रहते हैं । अतएव इसे ‘ त्रेताग्नि ' यज्ञ भी कहा जाता है । गार्हपत्याग्नि पृथ्वी - स्थानीय है, दक्षिणाग्नि आन्त-रिक्ष्य है, एवं ग्राहवनीय दिव्यलोक -स्थानीय है । पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, इन तीनों लोकों में व्याप्त प्राकृतिक नित्य श्रग्नीषोमीय यज्ञ पृथ्वी से द्युलोक पर्य्यन्त ( सूर्य्यं पर्य्यन्त ) वितत - व्याप्त रहने के कारण ‘ वितानयज्ञ ' कहलाता है । क्योंकि यजमान से किया जाने वाला यह वैधयज्ञ उसी प्राकृतिक वितानयज्ञ की प्रतिकृति ( नकल ) है । अतएव इसे भी वितानयज्ञ कहा जाता है । अग्नि में सोम की आहुति देने का नाम हीं यज्ञ है । भूपिण्ड से २१ वें अहर्गण पर ( एकविंशस्तोम पर ) भगवान् सूर्य स्थित हैं | एकविंशस्तोम पर स्थित यह सूर्य सर्वथा अग्निमय है । इसका जो अग्निमय प्रकाशमण्डल है, वह ' सौर - संस्था ' कहलाती है । इस सौर - संस्था के चारों और सोम-समुद्र भरा हुआ है । महाकाश में व्यापक अन्नरूप सोम के लिए ' त्वमाततन्थोर्वन्तरिक्षम्'१ । ( इस विशाल
१ - त्वमिमा प्रोषधीः सोम! विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः ।
त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ॥
—ऋक्सं ० १।६१ | २२ | ११७