Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 381–390

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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प्रथमकाण्ड अन्तरिक्ष में तुम व्याप्त हो रहे हो, यह कहा जाता है । इस सोमाहुति से ही सूर्य्य प्रकाशित है । प्रकाश इसी सोमाहुति का प्रभाव है । अग्निमय सूर्य्य भी घोर काला है, एवं सोम भी सर्वथा काला है । न अग्निमय सूर्य्य में प्रकाश है, न अन्नमय सोम में प्रकाश है । प्रकाश है दोनों के समन्वय में । जिस प्रकार दाहक अग्नि में ग्राहुत घृत तैल - आदि दाह्य पदार्थ ज्वाला उत्पन्न कर देते हैं, तथैव यह सोम सौराग्नि में हुत होकर सूर्य्य को प्रकाशयुक्त बना देता है । प्रकाश का एकमात्र कारण सोमाहुति ही है | अतएव सोम के लिए “ त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ ” ( तुमने ज्योति से सम्पूर्ण अन्धकार को दूर कर दिया है ऋ ० १६१ २२ ) यह कहा जाता है । जिस दिन सोमाहुति न होगी, सौर अग्नि न रहेगा । जिस दिन सौर - सम्वत्सरयज्ञ न रहेगा, उस दिन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड लयावस्था में हीं परिणत हो जायगा | क्योंकि “ नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ” १ ( प्राणिमात्र सूर्य्य से ही उत्पन्न हुए हैं ) “ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च, २ ( जङ्गम, और स्थावर, दोनों का आत्मा यही सूर्य्य है ) “ निवेशयन्नमृतं मर्त्यन " ३ ( अमृत और मर्त्य, दोनों प्रजाओं का यथास्थान सन्निवेश करता हुआ ) “ चित्रं देवानामुद्गादनीकम् ' ( देवताओं का समूहरूप सूर्य्य उदित हुआ है ) इत्यादि श्रुतियाँ सूर्य्यं को ही रोदसी - ब्रह्माण्ड का अधिष्ठाता बतला रहीं हैं । जिस समुद्र में सूर्य्यस्वरूपरक्षक यह अन्नरूप सोम भरा हुआ है, उसे पारमेष्ठ्य समुद्र कहते हैं । निरन्तर होने वाली इस सोमाहुति के कारण हीं यह सूर्य्य ' अग्निहोत्र ' ४ कहलाता है । इसी प्राकृतिक ग्रग्नीषोमात्मक यज्ञ से — जिसे कि सम्वत्सरयज्ञ भी कहते हैं - सम्पूर्ण विश्व का निर्माण हुआ है । ' इसीलिए सम्वत्सरयज्ञं को ‘ प्रजापति ' कहा जाता है । अतएव “ अग्नीषोमात्मकं जगत् " यह श्रुति चरितार्थ होती है । सूर्य्य में ज्योतिः, गौः, श्रायुः - ये तीन मनोता रहते हैं । इन तीनों में मनःप्राणवाङमय सूर्य्य का मनोभाग श्रोतप्रोत रहता है । अतएव इन्हें मनोता कहा जाता है । ज्योतिर्भाग से वसुरुद्रादित्यादि ३३ देयता उत्पन्न होते हैं, गोभाग से सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं, एवं आयुर्भाग से आत्मा ( भूतात्मा, देही ) अभिव्यक्त होता है ।

१ – दिवो रुक्म उरुचक्षा उदेति दूरे अर्थस्तरणिर्भ्राजमानः ।

नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता श्रयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि ॥

—ऋक्सं ० ७ | ६३ | ४ |

२ - चित्रं देवानामुद्गादनीकं चतुम्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।

आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥

—ऋक्सं ० १।११५।१ ॥

३ - कृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च ।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥

—ऋक्सं ० १ | ३५ | २ | ४ – सूर्यो ह वाऽअग्निहोत्रम् | तत् - यत् - एतस्या अग्राहुतेरुदैत्, तस्मात् - सूर्यो-ऽग्निहोत्रम् । - शतपथना ० २ | ३ | १ | १ | ११८

पृष्ठ 382

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शतपथब्राह्मण सूर्य्य के इन तीनों मनोताओं के साथ अपने मनः प्राणवाङमय आत्मा का सम्बन्ध करने के लिए क्रमशः ज्योतिष्टोम, गोट्रोम, आयुष्टोम, ये तीन यज्ञ करने पड़ते हैं । जिसप्रकार प्राकृतिक सौरयज़ से जड़, एवं चेतनात्मक सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है, वैसे ही प्राकृतिक यज्ञ के अनुकरण पर किये गये यजमान के यज्ञ से यजमान का एक नवीन स्वरूप उत्पन्न होता है । इसे ही दिव्यात्मा कहते है । क्योंकि इसकी उत्पत्ति का कारण यज्ञ है, इसलिए जो मनुष्य यज्ञ नहीं करते, उनका वह स्वरूप कदापि नहीं बन सकता । प्राकृतिक अग्नी-षोमीयं सौर सम्वत्सरयज्ञ में चन्द्रमा ब्रह्मा हैं, अग्नि होता हैं वायु अध्वर्यु हैं, आदित्य उद्गाता हैं, एवं सम्वत्सरप्रजापति यजमान हैं । इन चार प्राणदेवतारूप ऋत्विजों से सम्वत्सरप्रजापति अग्नीषोमीय यज्ञ, और तद्द्वारा सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न किया करते हैं । प्रजापतिजन्य इसी यज्ञविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए यज्ञेश्वर भगवान् मधुसूदन कहते हैं—

सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥

- गीता ३ | १० | यह सम्वत्सरयज्ञमय भगवान् सूर्य्य मनः प्राणवाङमय है, एवं उसी मनःप्राणवाङमय सूर्य्य से निम्मित मनुष्ययजमान का श्रात्मा भी मन: प्राणवाङमय ही है, जैसाकि आगे चल कर स्पष्ट होने वाला है । मनुष्य का मनःप्राणवाक पृथ्वी के सम्वत्सर से बद्ध रहता । क्योंकि इसका जन्म पृथ्वीलोक में होता है । " पृथ्वी के M आकर्षण से आकर्षित मनुष्य के मनःप्राणवाङ्मय आत्मा को सौरसम्वत्सरयज्ञप्रजापति के मनः-प्राणवाक् के साथ मिलाकर मानुष आत्मा को पार्थिव श्राकर्षण से विमुक्त कर दिव्यलोक से सम-न्वित कर देना ' यज्ञ का एकमात्र फल है । क्योंकि यजमानात्माको दिव्यात्मा के साथ सम्बद्ध करना है । अतएव इस वैध यज्ञ में स्तोत्र, शस्त्र, एवं ग्रह, ये तीन कर्म्म किए जाते हैं । साम से स्तोत्र किया जाता है, ऋक् से शस्त्र किया जाता है, एवं यजु से ग्रह किया जाता । “ मैं पृथिवी के बन्धन से विमुक्त होकर सौर सम्बत्सरमण्डल में जारहा हूँ ” यजमान की इस भावना को ही मनोव्यापार कहते हैं । यह मन प्राण -- वाक्, इन दोनों का आवलम्बन है । “ मैं स्वर्ग जारहा हूँ । यज्ञ के द्वारा प्रादेशमित मनः प्राणवाड्मय मेरा श्रात्मा दिव्यलोकपर्य्यन्त व्याप्त हो रहा है " इसप्रकार की सत्य - भावना ही इसे स्वर्ग में प्रतिष्ठित करने का एकमात्र प्रधान कारण है । यदि भावना नहीं है, श्रद्धा का प्रभाव है, तो सम्पूर्ण कर्मकलाप व्यर्थ है । अतः सत्रसे पहिले मन को ही आगे रखना आवश्यक है । आदित्य मनोमय है । " मैं उस सम्वत्सरयज्ञ से मिल रहा हूँ ” इस भात्रना से यजमान का मन उस श्रादित्यमन के साथ आबद्ध होजाता है । यहाँ से वहाँ पर्य्यन्त एक मनोरूप श्रद्धामय ं धरातल प्रतिष्ठित होजाता है । यजमान को प्राणव्यापार, एवं वाग्व्यापार भी करना पडता है । अतएव मऩ निर्बल हो जाता है । प्राणवाक् की और झुकने से श्रद्धामय मनोव्यापार में शिथि— लता आजाती है । इस मन की कमी को पूरी करने के लिए दक्षिणाक्रीत ब्रह्मा को यज्ञ में समाविष्ट किया आता हैं । ब्रह्मा केवल मनोव्यापार करते हुए यजमान के मन को प्रबल बनाए रखते हैं । सभी ऋत्विक् दक्षिणाक्रीत हैं । अतएव ये जो कुछ कर्म्म करते हैं, सबका फल यजमान को ही मिलता है । प्राणवाङमय ११६

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' प्रथमकाण्ड प्रपञ्च का आधार ' मन ' है । अतएव तद्वा इदं मनस्येव परमे प्रतिष्ठितम् ' ( सम्पूर्ण प्रपञ्च उस परम मन में ही प्रतिष्ठित है " तै ० ब्रा ० २२ इति ) यह कहा जाता है । प्राण यजुर्वेद है, वाक् ऋगवेद है, एवं मन सामवेद है | यह मन सत्र पर अधिष्ठित है । अतएव मनोमय ब्रह्मा प्राणरूप अध्वर्यु, एवं बाग्रूप होता उदगाता, इन सब पर शासन करता है । अतएव ब्रह्मा वही हो सकता है, जोकि तीनों वेदों का विद्वान् हो । इसी वेदत्रयी के प्रभाव से ब्रह्मा ऋग्वेदी होता का, यजुर्वेदी अध्वर्यु का, सामवेदी उद्गाता का, इन तीनों का निरीक्षण करने में समर्थ बनता है । कहना यही है कि, ब्रह्मा की सहायता से सर्वप्रथम यजमान का मन उस सौरसम्वत्सरप्रजापति के मन से आबद्ध होजाता है । मन के ऊपर वाक का वितान होता है । पृथिवी की वाक् ‘ अनुष्टुब् ' कहलाती है । क्योंकि मनुष्य पृथिवीलोक में उत्पन्न होता है । अतएव इसमें अनु-ष्टब्र्वाक् ही प्रधान रहती है । एवं सौरयज्ञप्रजापति की वाक् ' बृहतीवाक् ' कहलाती है । यजमान की अनु-ष्ट वाक को मनोमय धरातल के द्वारा सूर्य की बृहतीवाक् पर्य्यन्त वितत कर देना उद्गाता का काम है । उद्गाता सामगान करता है । संकुचितपद्य को वितत कर बोलना हीं ' गान ' कहलाता है । इसी का नाम ‘ वितान ' है । सामवाक् के द्वारा उद्गाता यजमान की वाक् को पृथिवीलोक से द्युलोक पर्य्यन्त वितत कर देता है । इसी कर्म्म को ‘ स्तोत्र ' कहते हैं । द्युलोकपर्धन्त वितत इस यजमान की अनुष्टुब्वाक् पर सौरी बृहतीवाक् को प्रतिष्ठित करना होता का काम है । होता इस वाक् पर वाङमय देवताओं को प्रतिष्ठित करता है | वाङ् मय पात्र में वाङमय देवताओं का आह्वान कर इस यजमानवाक् पर उन्हें प्रतिष्ठित करने के कारण हीं यह ं ऋत्त्विक् ' होता ' ( ग्राह्वानकर्त्ता ) कहलाया है । उद्गाता जिस अनुष्टुत्र्वाक् को द्युलोक पर्य्यन्त वितत करता है, उसके पीछे होता अपनी वाक् का प्रयोग करता है । अतएव इसकी वाक् ' अनुवाक् ' ( पीछे होने वाली वाक् ) कहलाती है । एवं तत्सम्बन्धिनी ऋचाएँ ' अनुवाक्या ' कहलातीं हैं । इस वाग्द्वयी को परस्पर आबद्ध करने वाला प्राणाधिष्ठाता अध्वर्यु है । प्राण हीं भौतिक पदार्थ का संघठन रखता है । जिस वस्तु से प्राण निकल जाता है, वह उसी क्षण छिन्नभिन्न होजाती है । यजमान के मनोधरातल पर होता, तथा उद्गाता के द्वारा प्रतिष्ठित अनुष्ट प - बृहतीवाक् का परस्पर ग्रन्थिबन्धन करने के लिए अध्वर्यु ' ' याज्या ' करता है । ' यजन ' नाम है मिलने का | मनोवाक को प्राणसूत्र से श्राद्ध कर तीनों को मिलाने के कारण हीं अध्वर्यु का कर्म्म ' याज्या ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इस मनः प्राणवाक् की समन्वित अवस्था को ही ' ग्रह ' कहा जाता है । ग्रह एक अवयव है । अनेक ईटों के चिनाव से जैसे एक मकान बनता है, हाथ, पैर, धड़, मस्तक, आदि अवयवों के चिनाव से जैसे मनुष्य का शरीर बनता है, वैसे ही इन ग्रहरूप अवयवों से यज-मान का दिव्य शरीर बनाया जाता है । इसप्रकार सामवेद, ऋग्वेद, अजुर्वेद, इन तीनों वेदों के द्वारा क्रमशः स्तोत्र, शस्त्र, ग्रह - पुरश्चरण इन तीनों कम्मों से यजमान का दिव्यात्मा बनाकर उसे १७ हवें स्वर्ग में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है । ‘ प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वमसृजत - यदिदं किंच ' ( ' है ' कहने योग्य जितने भी पदार्थ हैं, उन सबको प्रजापतिने हीं उत्पन्न किया है ' शत ० ६ १ | ११ ' ) इस श्रुति से प्रजापति को ही संसार का मूलकारण मानना पड़ता है । इस प्रजापति में सत्य, और विश्व, ये दो भाग हैं । सत्य ' आत्मा ' है, विश्व उस सत्यात्मा का ' शरीर ' है । आत्मा ' नित्य ' है, ' अमृत ' स्वरूप है । विश्वरूप शरीर सर्वथा ' अनित्य ' है, ' मरणधर्म्मा ' है । आधा भाग अमृत है, आधा मर्त्य है । इस अमृतरूप सत्य आत्मा को ' षोडषीपुरुष ' १२० '

पृष्ठ 384

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शतपथब्राह्मण कहा आता है । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर, एवं परात्पर, इन की समष्टि का नाम हीं षोडशीपुरुष है । इन तीनों में अव्ययपुरुष जगत् का आलम्बन है, अक्षर निमित्तकारण है, एवं क्षर उपादानकारण है | इसी त्रिपुरुषविज्ञान का प्रतिपादन करते हुए भगवान् कृष्ण कहते हैं-द्वाविमौ पुरुषौ लोके चरश्चाक्षर एव च क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते । १ । उत्तमः पुरुस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः यो लोकत्रयमाविश्य विमर्त्यव्यय ईश्वरः । २ । - गीता १५ १६, १७, इन तीनों पुरुषों में वस्तुतः पुरुषपदवाच्य अव्यय ही है । अक्षर, और क्षर तो इस पुरुष की प्रकृति है । अक्षर ' पराप्रकृति ' है, क्षर ' अपराप्रकृति ' है । किन्तु यह प्रकृतिद्वयी पुरुष से अविनाभूत है । अतएव इसे भी पुरुष कह दिया जाता है । प्रकृति, और पुरुष, दोनों की समष्टि का नाम हीं ' षोडशी - सत्य - आत्मा ' है । इस प्रकृति की श्रव्यक्तावस्था का नाम हीं ' अक्षर ' है, एवं व्यक्तावस्था का नाम हीं ' तर ' है । आदि में ‘ अव्यक्त ' है, मध्य में ‘ व्यक्त ' विश्व है, अन्त में पुनः अव्यक्तका अव्यक्त है । इसप्रकार यह सम्पूर्ण विश्व व्यक्त । यही मध्यका ' अस्तिक्षण ' है । आदि में अव्यक्त अर्थात् ' नास्ति ' है । अन्त में अव्यक्त है । इसप्रकार यह बलरूप विश्व नास्ति अस्ति नास्ति ( अव्यक्त - व्यक्त - अव्यक्त ) भेदसे त्रिक्षण प्रमाणित हो रहा है । इसी अव्यक्ततत्व का स्वरूप व्यक्त हुए करते गीताचार्य्यं कहते हैं—

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत! ।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

-गीता २ | २८ | इस अव्यक्ता - प्रकृति की जो व्यक्तावस्था ( क्षरावस्था ) है, वही ' अरब्रह्म ' है । एवं हमारे महाविश्व की अपेक्षा से यही क्षरब्रह्म ' सत्य - श्रात्मा ' है । यद्यपि क्षर - अक्षर अव्यय से अविनाभूत है । तथापि यज्ञ के सम्बन्ध से यहाँ हम क्षर को ही आत्मा कहेंगे । इम क्षर श्रात्मा का ही दूसरा नाम है ' वेदमय ब्रह्मा ' । इस क्षरसत्य में अव्यय विद्यमान है । अव्यय की आनन्द - विज्ञान - मनः - प्राण - वाक् - ये पाँच कला हैं । पाँचों में श्रानन्द - विज्ञान मुक्ति के प्रदाता हैं । प्राणवाक् सृष्टि के कारण हैं । मध्यम में मन प्रतिष्ठित है | मन यदि विज्ञान की और जाता हुआ आनन्द में पहुँच जाता है, तो आत्मा बन्धन से मुक्त हो जाता है । यदि प्राणवाक् की और चला जाता है, तो सृष्टि के बन्धन में श्राबद्ध हो जाता है । मन हीं बन्धन का कारण है, और मन हीं मुक्ति का कारण है । अतएव शास्त्र कहता है—

न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परंतप! ।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध - मोक्षयोः ॥

—सुप्रसिद्धा सूक्ति: १२१

पृष्ठ 385

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प्रथमकाण्ड हमको यज्ञेति कर्त्तव्यता बतलानी है । यज्ञ ही विश्व यहाँ पर क्षरात्मा में मनः बारावाङमय आत्मा का ही ग्रहण किया क्षरात्मा मनः - प्राणवाङमय है । अतएव ' स वा एष आत्मा जाता है ॥ विश्वसाक्षी मनःप्राणवाक् है । अतएव जाता है । वेदमयी सृष्टि का उपादानभूत वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' यह कहा इसी वेदमय विश्वसृट् क्षर आत्मा को पौराणिक - परिभाषा में " ब्रह्मा " कहा जाता है | यह ' क्षर -ब्रह्म ' गीतादि शास्त्रों में ' पुरुष ' कहलाता है । इस पुरुषप्रयुक्त पु ंस्त्व की अपेक्षा से क्षरब्रह्म को ब्रह्म न कहकर ‘ ब्रह्मा ’ कहा जाता है । इस वेदमूर्ति क्षरब्रह्मा की प्राण- आपः- वाक् – अन्न – आन्नाद, ये पाँच कलाएँ हैं । ये ही पाँचो कलाएँ क्षरब्रह्मा के पाँच मुख कहलाते हैं । इनमें से जो अन्नाद है, उसीका नाम अग्नि है । अग्नि को ही ‘ रुद्र ' कहते हैं, जैसा कि श्रुति कहती है- “ रुद्रो वा एष यदग्नितस्यैते द्व े तनुवौ – घोरान्या च शिवान्या च ” । एवं अन्न का नाम सोम है । जबतक सोम अग्नि से पृथक रहता है, तबतक वह अपने स्वरूप से स्थित रहता है । परन्तु जैसे अग्नि में आहुत घृत अग्नि ही बन जाता है, तथैव अग्नि में हुत सोम स्वस्वरूप को छोड़ता हुआ अग्नि ही बन जाता है । हम जबतक अन्न को नहीं खाते, तबतक वह अन्न अन्न कहलाता है | शरीराग्नि में हुत होने के अनन्तर वह अन्न ' अन्नपना ' छोड़कर ' शरीराग्नि ' स्वरूप ही बन जाता है । कहना यही है कि - अन्न अन्नादाग्नि में आहुत हो कर अन्नाद ही बन जाता है । दोनों मिलकर एक वस्तु बन जाते हैं । इसप्रकार पञ्चमुख ब्रह्मा अन्नादस्वरूप अग्निरुद्र के कारण चुतर्मुखही बने रहजाते हैं | अग्निरुद्र के कारण ब्रह्मा का सोममुख कट जाता है, अर्थात् अग्नि में आहुत सोम अग्नि ही बन जाता है । इसी वैज्ञानिक - रहस्य का पुराणों में " रुद्रने ब्रह्मा का एक मस्तक काट दिया । अत एव ब्रह्मा के चार ही मुख रह गये " इसप्रकार की कल्पित कथा के द्वारा प्रतिपादन किया गया है । कहना यही है कि, क्षरब्रह्मा हीं सृष्टि के उपादान करण हैं । एवं यह ब्रह्मा विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल पर स्थिर रहकर अपने प्राण - आपः - वाक् अन्नगर्भित अन्नाद नामक इन चारों मुखों से चार प्रकार की सृष्टियाँ बनाया करते हैं । प्राणमुख से ' वेदसृष्टि ' का, आपोमुख से लोकसृद्धि का, वाङ्मुख से प्रजासृष्टि का, एवं अन्नादमुख से धर्मसृष्टि का निर्माण करते. ऋक् - यजुः - साम- अथर्व, चारों वेद प्राणमय हैं | भूः, भुवः, स्व:, मह:, जनत्, तपः, सत्यं, ये सातों लोक श्रापोमय हैं । एवं ऋषि, पितर, गन्धर्व, असुर, मनुष्य, देवता, आदि प्रजा वाङमयी है । गोत्र सृष्टि का भी इसी प्रजासृष्टि में अन्तर्भाव है । एवं धर्मसृष्टि अन्नादमयी है । ४ ही मुख हैं, ४ ही प्रकार की सृष्टियाँ हैं । इन सृष्टिधाराओं का विशद विवेचन आगे के सृष्टि - ब्राह्मणो में विस्तार से सम्भवित है । यहाँ उसका सूक्ष्म निदर्शनमात्र करा दिया जाता है । मन: प्राण - वाङमय क्षरब्रह्मा की जो प्राण - श्रापः - वाक् - अन्नाद - अन्न नाम की पाँच कलएँ है, ये पाँचों पाचों में ग्राहुत हो जातीं हैं । इसी को पञ्चीकरण कहते हैं । इन पञ्चीकृत प्रारणादि क्षरों को पञ्चजन कहा जाता है । यद्यपि पाँचों में पाँचों हैं । किन्तु ' वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वाद: ' इस न्याय से ये पाँचों पञ्चजन भी प्राण, प: - वागादि नाम ही व्यवहृत होते हैं । 6 क्योंकि ये पांचों सबकी सत्र में बहुत होने से उत्पन्न होते हैं श्रतएव इस यज्ञ को ' सर्वहुत ' यज्ञ कहा जाता है । तदनन्तर इन पाँचों पञ्चजनों का ( पञ्चीकृत प्राणादि क्षरों का ) परस्पर यज्ञ होता है । पाँचों पञ्चजन पांच यज्ञ हैं, इन यज्ञों से पुनः यज्ञ होता है । यज्ञ से पाँच पुरञ्जन उत्पन्न होते हैं । पुरञ्जनोत्पादक इसी यज्ञ के द्वारा होने वाले यज्ञ के लिये श्रुति ने कहा है-१२२

पृष्ठ 386

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शतपथब्राह्मण यज्ञेन यज्ञमजयन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ —ऋक्सं ० १० | ६ | १६ | येही पांचों पुरञ्जन क्रमशः स्वयम्भु, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, इन नामों से व्यवहृत हुये हैं । स्वयम्भू प्राणमय है । परमेष्ठी पोमय है 1 । सूर्य वाङमय है । चन्द्रमा अन्नमय । पृथ्वी अन्नादमयी है । इन पाँचों के केन्द्र में ये वेदमय प्रजापति ब्रह्मा प्रतिष्ठित रहते हैं । पाँचो यज्ञरूप हैं | यज्ञ को ही विष्णु कहते हैं । इन्ही पर भगवान् ब्रह्मा विराजमान हैं । ब्रह्मा स्वयं प्रतिष्ठारूप होते हुये भी यज्ञरूप विष्णुप्रतिष्ठा की अपेक्षा रखते हैं, अत एव विष्णु को ' प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा ' कहा जाता है । पाँचों पिण्ड ही पुष्कर हैं, अर्थात् कमल हैं । प्रत्येक पिण्ड में हृत्पृष्ठ, अन्तःपृष्ट, बहिपृष्ठ, तीन तीन पृष्ठ होते हैं । पिण्ड का केन्द्रस्थान हृत्पृष्ठ कहलाया है । इसे ही ' दहरपुण्डरीक ( छोटाकमल ) ' कहते हैं । एवं स्वयं पिण्ड अन्तः-पृष्ठ है, यही दूसरा पुष्कर है । इसको अन्तःपृष्ठ क्यों कहा जाता है? इस प्रश्न का विवेचन - ' वेदस्वरूपनिरू-पण प्रकरण में किया जायगा । इस पिण्ड के बाहिर पिण्ड की महिमा रहती है । इस महिमामण्डल को ( जिसे कि हम देखते हैं ) चहिःपृष्ठ कहते हैं । हम अन्तःपृष्ठ को नहीं देखते, उसका केवल स्पर्श कर सकते हैं, अतएव इसे स्पृश्यपिण्ड कहा जाता है | एवं बहिःपृष्ठ दृष्टि के द्वारा प्रत्यक्ष बनता हुआ दृश्यपुण्डरीक कहलाता है । इसप्रकार हृत्पुण्डरीक, अन्तः पुण्डरीक, एवं बहिः पुण्डरीक, इन तीनों पुष्करों में ब्रह्मा निवास करते है । ब्रह्मा जत्र भी रहेंगे, पुष्कर में ही रहेंगे । वही पिण्ड महिमा के वितान के कारण ४८ स्तोम पर्यन्त व्याप्त हो जाता है, अतएंव ‘ पुरुकरत्त्वात् ' इसे ' पुष्कर ' कहा जाता है । इस पुष्कर के केन्द्र में प्रजापति भगवान् रहते हैं । प्रजापति ब्रह्मा आत्मक्षरधर्म्म से स्वयं अनुत्पन्न हैं । स्वयं स्वयम्भू है | परन्तु सब कुछ इन्हीं से उत्पन्न होता है । इसी तथ्य को लक्ष्य बनाकर श्रुति ने कहा है –

प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।

तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥

यजुःसं > ३१।२२ । ' पुष्करतीर्थ में ब्रह्माने यज्ञ किया था । ब्रह्मा की जन्मभूमि पुष्कर ( बुखारा ) था, इत्यादि पौरा-णिक कथाओं का ऐतिहासिक ब्रह्मा से सम्बन्ध समझना चाहिये । प्रकृत में निवेदनीय यही है कि, ये क्षरब्रह्मा हीं सम्पूर्ण विश्व के मूल कारण हैं । इन्हीं का नाम स्वयम्भू है । इन स्वयम्भू ब्रह्मा के द्वारा सर्वप्रथम अप्त्तत्त्व ही उत्पन्न होता है, जैसाकि भवबान् मनु कहते हैं—

सोऽमिध्याय शरीरात् स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।

अप एव ससर्जादौ तासु वीजमवासृजत् ॥

१२३ - मनु १८

पृष्ठ 387

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प्रथमकाण्ड प्राणमय स्वयम्भ से उत्पन्न होने वाले इसी आपोमय समुद्र को “ परमेष्ठीमण्डल " कहते हैं । यह आपोमय समुद्र हमारी “ रोदसी - त्रिलोकी ” के ( सूर्य्यमण्डल के ) भी परमस्थान में रहता है, अतएव इसे ' परमेष्ठी ' कहा जाता है । जैसे ज्योतिः, गौः, आयु:, सूर्य के ये तीन मनोता हैं, तथैत्र इस परमेष्ठी के भृगु, अङ्गिरा, अत्रिः, ये तीन मनोता हैं । इन तीनों में भृगु - आपः, वायु, सोम, भेद से तीन प्रकार का है, एवं अंगिरा - श्रग्निः, यमः, आदित्य:, भेद से तीन प्रकार का है । सूर्यप्रकाशावरोधक तीसरा प्राण क्योंकि भृगु - अङ्गिरावत् तीन नहीं है । अतएव इसको ' न त्रिः ' इस व्युत्पत्ति से ' अत्रिः ' कहा जाता है । इन तीनों में से भृगु, अङ्गिरा को ही अथर्वा कहते हैं । ब्रह्मा की पहली सृष्टि यही अथर्वमय परमेष्ठी है | अतएव इन्हें ब्रह्मा का ज्येष्ठपुत्र कहा जाता है । स्वयम्भू प्राणमय है । प्राण ही वेद का कारण है । यह वेद सर्वप्रथम अथर्वा में ही प्रतिष्ठित होता है । ऊपर से नीचे के मण्डलों में उतरता हुआ सर्वप्रतिष्ठारूप वेद अथर्वा में ( परमेष्ठी - मण्डल में ) उतरता है । इसी अभिप्राय से वेदमहर्षि कहते हैं—

ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्या - प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥

- मुण्डकोपनिषत् ११ ११ आधिदैविक ब्रह्मा, और आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) ब्रह्मा का चरित्र समान है । इसी समानता को बतलाने के लिए “ प्राह ” कहा है । इस अथर्वा का जो भृगु भाग है - वह घन, तरल, विरल, इन तीन अवस्थाओं के कारण आपः, वायु, सोम, इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । आपः भृगु की घनावस्था है, वायु तरलावस्था है, एवं सोम विरलावस्था है । इन में जो सोम है, वही सूर्य्याग्नि में आहुत होता रहता है । इसी अग्नी -सोमात्मक यज्ञ से संसार का निर्माण हो रहा है । इस सोम का नाम ही ' महान् ' है । स्वयम्भू में रहने वाले चिदात्मा - अव्यय का प्रतिविम्ब इसी महान् पर पड़ता है । सर्वत्र रहता हुआ भी सूर्य जैसे बिना पानी के प्रतिबिम्बित नहीं होता, तथैव सर्वत्र व्यापक भी चित् का बिना महान् के प्रतिचिम्ब नहीं पड़ता । महान् सोम ही चित की योनि है । इसी में अव्ययपुरुष गर्भ धारण करते हैं । यह महान् सोम क्योंकि आपः, वायु, सोम, भेद से तीन प्रकार का है, एवं इसी पर चित् का प्रतिबिम्ब पड़ता है । अतएव संसार में जीव आप्य, वायव्य, सौम्य, भेद से कुल तीन ही प्रकार के होते हैं । ये तीनों अव्ययाक्षरयुक्त मन: प्राणवाङमय क्षरप्रजापति के अंश हैं । अतएव जीवमात्र मन: - प्राण - वाङ - मय हैं । मनोता - विभाग के अनुसार पृथिवी वाङ्मयी है, अन्तरिक्ष प्राणमय है एवं आदित्य मनोमय है । यद्यपि हैं तीनों में तीनों हीं । तथापि प्रधानता के कारण तीनों क्रमश: - मनः प्राण वाङमय नामों से व्यवहृत होते हैं । वाक् अग्नि है, यही ऋग्वेद का जनक है । वायु प्राण है, इसी से यजुर्वेद प्रादुर्भूत होता है । मन आदित्य है, इसी से साम प्रादुर्भूत होता है । वाक्, प्राण, मनोमय, अग्नि, वायु, आदित्य ही ऋग्, यजुः, सामात्मिका वेदत्रयी के ( गायत्रीमात्रिकवेद के ) उद्भावक हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं— १२४

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शतपथब्राह्मण

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयंब्रह्म सनातनम् ।

दुदोह यज्ञसिध्यर्थं ऋग्यजुःसामलक्षणम् ॥

- मनुः १ | २३ | मनः - प्राण - वाक् – कहो, अग्नि - वायु -आदित्य कहो, ऋक् - यजुः साम कहो, एक ही बात है । अतएव इस यज्ञाधिष्ठाता प्रजापति को मनः प्राणवाङमय, वेदमय, इत्यादि नामों से व्यवहृत कर दिया जाता है । उस विश्वाधिष्ठाता महाप्रजापति की नो- अग्नि, वायु, आदि प्रजा है, वह सत्यसंहिता है । ईश्वरप्रजापति अवि-द्यादि दोषों से शून्य रहने के कारण एकरूप रहता है, सदा सत्यरूप रहता है । अतएव उससे बद्ध प्राणदेवता भी सत्यरूप ही रहते हैं । परन्तु नीवप्रजापति का मनः प्राणवाङमय आत्मा दोषों के कारण सत्यपथ से विमुख होजाता है । मनुष्य का आत्मा मिथ्या बोलने के कारण कुटिल होजाता है । एक मन से रहना सत्यता है | जिधर मन है, उधर ही वाक् है । प्राण से चेष्टा अभिप्र ेत है । मन से इच्छा अभिप्रेत है, वाक् से शब्द अभिप्रेत है । तीनों यदि एक मार्ग पर हैं, तो तीनों सत्यमार्ग पर हैं । ऐसे ही मनुष्यों को ' महात्मा ' कहा जाता है | यदि तीनों विभिन्न मार्ग से जारहे हैं, तो सत्य से च्युत हो रहे हैं । ऐसे ही मनुष्य ' दुरात्मा ' कहलाए हैं । मनःप्राणवाक् के कुटिल होते ही आत्मा का स्वरूप बिगड़ जाता है । आत्मा पर मिथ्याप्रयुक्त मैल चढ़ जाता है । इससे दिव्यसंस्काराधान उसी प्रकार नहीं होने पाता, जैसे कि तेल चढ़े वस्त्र पर रँग नहीं चढ़ सकता | मिथ्या बोलने से शरीर का कुछ नहीं बिगड़ता । बिगड़ता है आत्मा का । इसलिए तेन ' पूतिरन्तरतः ' कहा है | मल को हटाकर वस्तु को पवित्र बना देना, एवं संस्कारग्राहक स्नेहगुण उत्पन्न कर देना प्राप्यप्राण का काम है । मेध्य में और पवित्र में अन्तर है । लोटा बिल्कुल पवित्र है । उस पर यत्किञ्चित् मैल नहीं हैं । परन्तु उस पर जो कुछ डालते है, स्नेहगुण के अभाव से उसे वह पकड़ नहीं सकता । चूंन बिखरा हुआ है, पानी डाल दीजिए | उसी समय सम्पूर्ण विशकलित परमाणु गुथ जायँगे । रूक्षभाव का नाम हीं अमेध्य है । पानी इस दोष को हटाता है । कपड़ा चिकना था । पानी ने चिकनाई उतार कर वस्त्र को पवित्र ( स्वच्छ ) करदिया, परन्तु उसका अमेध्य भाव न हटा । रँग पकड़ने का स्नेहगुण भी पानी से ही श्रावेगा । रँग चढ़ाने के लिए भी कपड़े को पानी में ही डालना पड़ेगा । आत्मा मिथ्या दोष से अमेध्य, और पवित्र रहता है । पानी मल को हटा देता है, आत्मा पवित्र होजाता है । वही पानी पवित्र आत्मा को स्नेह गुण से युक्त कर दैवसंस्कारग्रहणयोग्य बना देता है । यज्ञ के द्वारा दैवप्राणाधान करना तत्रतक सर्वथा व्यर्थ है, जबतक कि आत्मा को पवित्र, और मेध्य न बना लिया जाय । अतः सर्वप्रथम श्राचमन करना नितान्त आवश्यक है । अध्यात्मप्राण श्रधिदैवताप्राण से पानी के द्वारा ही मिल सकता है । जैसे अन्न से मन वनता है, तथैव पानी से प्राण बनता है । बिना पानी के प्राण रूखा रहता है । अतएव धर्म्माचाय्यनें अन्नयज्ञ ( भोजन ) के ग्राद्यन्त में ग्राचमन का विधान किया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है— “ अनग्नताया वै बिभेमि ॥ ते अनग्नता? । आपो वा अनग्नता ” इति । अतएव सोमान्नयज्ञ के प्रारम्भ में गार्हपत्य ग्राहवनीय के बीच में खड़े रहकर यजमान आचमन करता है | यजमान को यज्ञ के द्वारा पृथिी से स्वर्ग में जाना है । परन्तु मानवायुर्भोग पर्य्यन्त पृथिवी पर भी रहना है । ग्राहवनीय स्वर्ग की प्रतिकृति है, गार्हपत्य पृथिवी - स्थानीय है । ऐसी अवस्था में गार्हपत्य से पश्चिम भाग में लड़े रहकर आचमन किया जायगा, तो स्वर्ग से सम्बन्ध नहीं होगा । यदि श्राहवनीय के १२५

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प्रथमकाण्ड पूर्व भाग में खड़े रहकर आचमन किया जायगा, तो पृथिवी से सम्बन्ध टूट जायगा । अतः दोनों के चीच में ही आचमन करना उचित है । स्वयम्भू की प्राणसृष्टि मानसीसृष्टि है । मैथुनी सृष्टि का ( याज्ञिकसृष्टि का ) प्रारम्भ श्रापोमय परमेष्ठी से ही होता है । यज्ञ के द्वारा दिव्यात्मा उत्पन्न करना है । एवं उत्पत्ति का उपक्रम पानी है । इसीलिए यज्ञ में सबसे पहिले ' आपांप्रणयन ' कर्म किया जाता है, जिसका विशद विवेचन आगे के ' आपांप्रणयन ' कर्म में किया जायगा । यहाँ केवल इतना हीं समझलेनां पर्य्याप्त होगा कि, यज्ञकर्त्ता यजमान का आत्मा मिथ्यादोष से अपवित्र है, अमेध्य है । अतएव यह सत्यमय देवताओं का अपने आत्मा में तत्रतक प्रधान नहीं कर सकता, जबतक कि इसका आमा पवित्र, एवं मेध्य नहीं जन जाता । दोनों शक्तियाँ पानी में है । अतएव पवित्र, और मेध्य बनकर व्रत ग्रहण करने के लिए यह यजमान सबसे पहिले ' अप उपस्पर्श ' ही ( आचमन ही ) करता है । ॥१ ॥

( मूल ) सोऽग्निमेवाभीक्षमाणो व्रतमुपैति - ' अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छ-केयं तन्मे राध्यताम् ' ( १ ० ५ मं ० ) इति । अग्निर्वै देवानां व्रतपतिः, तस्मा एवैतत् प्राह व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयम्, तन्मे राध्यतामिति । नात्र तिरोहितमिवास्ति || २ ॥ ( अनुवाद ) - वह यजमान आहवनीय अग्नि को ही देखता हुआ ' अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् ' ( यह् मन्त्र बोलता हुआ ) व्रतग्रहण करता है | ( आह-बनीय अग्नि देवताओं के व्रतपति हैं । उन्हीं व्रतपति अग्नि के लिए ' व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् ' यह कहा है । ' सोऽग्निमेव ० ' इत्यादि पहिले वाक्य में, और ' अग्निर्वै देवानां ० ' इत्यादि दूसरे वाक्य में कोई भी बात छिपी हुई नहीं है । अर्थात् दोनों का अर्थ स्पष्ट है ॥ २ ॥

( भाष्य ) - पूर्व के प्रकरण में बतला दिया गया है कि, यज्ञ का एकमात्र फल स्वर्गप्राप्ति ही है । जिस यज्ञ से स्वर्ग मिलता है, उसे ज्योतिष्टोम ' ' यज्ञ कहते हैं । यही यज्ञ ' सोमयाग ' कहलाता है । इस यज्ञ का सौरसम्वत्सरमण्डल से सम्बन्ध है । ज्योतिष्टोमयज्ञ से यजमान का मानुष ( पार्थिव ) आत्मा पार्थिव सम्वत्सर के आकर्षण से विमुक्त होकर नरामरण रहित सौर सम्वत्सर में प्रतिष्ठित होजाता है । सौरसम्व-त्सराग्नि - अहोरात्र, शुक्ल - कृष्णपक्ष, ऋतु, अयन, इन चार भागों में विभक्त है । उस सौर अग्नि के अहोरात्र ( दिनरात ) के अनुपात से ७२० विभाग होते हैं । पक्ष के अनुपात से २४ विभाग होते है । एवं अयन की अपेक्षा से उत्तरायण और दक्षिणायन, ये दो विभाग होते हैं । अयन के अनन्तर सम्वत्सरमण्डल है । इसप्रकार सम्वत्सराग्नि सम्वत्सर के संयोग से पञ्चसंस्थ होजाता है । ' विधा ' और ' संस्था ', दोनों में से ‘ संस्था ’ में यह नियम है कि, यदि यजमान उत्तरसंस्था से सम्बन्ध करना चाहेगा, तो पहिले उसे पूर्व की संस्था करनी पड़ेगी । इस परिभाषा के अनुसार सम्वत्सरसंस्था ( ज्योतिष्टोम ) करने वाले को पहिले अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन, ये चारों संस्थाएँ करनीं पड़तीं हैं । कारण इसका यही है कि, सम्वत्सर का अग्नि एक समय में एक साथ नहीं पकड़ा जा सकता । श्रपितु सोपान ( सीढ़ी ) परम्परा की भाँति जिस क्रम से वह विभक्त है, उसी क्रम से उसे पकड़ा जासकता है । उसका पहिला विभाग है अहोरात्र | अतएव सबसे पहिले इस हो -१२६

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शतपथब्राह्मण रात्र अग्नि को आत्मसात् करना आवश्यक है । इसे आत्मसात् करने के लिए ही यज्ञकर्त्ता यजमान को सायं प्रातः ' अग्निहोत्र ' करना पड़ता है । अहोरात्र के अनन्तर है - पक्षाग्नि । इसे आत्मसात् करने के लिए ' दर्शपूर्णमासेष्टि ' करनी पड़ती है । श्रमावास्था को दर्शेष्टि होती है, पूर्णिमा को पौर्णमासेष्टि होती है | पक्ष के अनन्तर है ऋतु । ऋतु - अग्नि को आत्मसात् करने के लिए ' चातुर्मास्य ' करना पड़ता है । यह चातु-र्मास्य अन्न, और ऋतु भेद से दो प्रकार का होता है । इन दोनों से श्रन्नचातुर्मास्य ब्रीहि, यत्र, श्यामाक भेद से तीन प्रकार का होजाता है | अन्नचातुर्मास्य को ही ' आग्रणेयष्टि ' कहते हैं । शीतत्तु ' में उत्पन्न होने वाले चाँवलों को ‘ ' ब्रीहि ' कहते हैं । इनमें रहने वाले दिव्याग्नि को आत्मसात् करने के लिए इस ऋतु में ' व्रीह्याप्रयणेष्टि ' करनी पड़ती है । ग्रीष्म ऋतु में ' यव ' पैदा होते हैं । अतएव इस ऋतु में ' यवाप्रय-टि ' करनी पड़ती हैं । एवं वर्षाऋतु में ' श्यामाक ' धान उत्पन्न होता है । तद्गत दिव्याग्नि को आत्म-सात् करने के लिए ' श्यामाकाप्रयणेष्टि ' करनी पड़ती है । इसीप्रकार ऋतु के सम्बन्ध से भी ' वैश्वदेव ' ‘ वरुणप्रघास ' ‘ साकमेध ' तीन चातुर्मास्य होजाते हैं । व्रीहि आदि अन्न ऋतुओं में हीं उत्पन्न होते है, अतएव अन्नच।तुर्मास्य का ऋतुचातुर्मास्य में ही अन्तर्भाव होजाता है । ऋतु के अनन्तर है अयन । अय-नाग्नि को आत्मसात् करने के लिए ' पशुबन्ध ' यज्ञ करना पड़ता है । इसप्रकार अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध, इन चारों से क्रमश: अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन, इन चारों संस्थाओं का अग्नि जत्र पकड़ में आजाता है, तो इसके अनन्तर सम्वत्सरयज्ञ का अधिकार प्राप्त होता है । इतना और समझ लेना चाहिए कि, मनुष्य के आत्मा में जन्म से ही पार्थिव आग्नेय प्राण प्रधान रहता है । क्योंकि पृथिवी के ऊपर उत्पन्न होने से इस यजमान में सौर अग्नि की अपेक्षा पार्थिवाग्नि का ही अधिकमात्रा में रहना न्यायप्राप्त है । ऐसी अवस्था में अग्निहोत्रादि से अध्यात्म के साथ दिव्याग्नि का सम्बन्ध तभी होसकता है, जबकि अध्यात्म में दिव्य अग्नि का मूल पहिले से वर्त्तमान हो । उस मूलस्थापन के लिए ही ( पार्थिवा-ग्निप्रधान अध्यात्म में सौरदिव्याग्नि के प्रधान के लिए ही ) अग्निहोत्र से भी पहिले ' अग्न्याधान ', किया जाता है । निसर्गतः उल्वण ( अभिव्यक्त ) पार्थिवाग्नि में दिव्याग्नि को ग्राहित करने के लिए, अहो -रात्रादि के द्वारा आए हुए अग्नि को प्रतिष्ठित करने के लिए सबसे पहिले अग्न्याधान करना आवश्यक है । तात्पर्य्य यही है कि, सजातीय पदार्थों में हीं परस्पर आकर्षण होता है । मिट्टी के ढेले को आप कितना हीं ऊँचा उछालिए, वह उसी क्षण नीचे गिरेगा । अग्निज्वाला को कितना हीं नीचे दबाने का प्रयास कीजिए, वह सदा ऊपर की ओर ही जायगी । इसका एकमात्र कारण सजातीय श्राकर्षण ही है । ढेला पृथिवी की वस्तु है, अग्नि सू की वस्तु है । अतएव ठेला पृथिवी की ओर ही आता है, अग्नि सूर्य्य की ओर ही जाता है | चेतनजगत् में भी यही नियम है । पशु का पशु से सम्बन्ध होता है, मनुष्य का मनुष्य से सम्बन्ध होता है । निष्कर्ष यही है कि, तत्तजातीय पदार्थों का तत्तज्जातीय पदार्थों से ही सम्बन्ध होता है । यही सामान्य परिभाषा है । इस वैज्ञानिक नियम से सिद्ध होजाता है कि, दिव्याग्नि का दिव्य अग्नि से ही मेल होसकता है, न कि पार्थिव अग्नि से । ऐसी अवस्था में अहोरात्रादि के दिव्याग्नि को अध्यात्म में प्रतिष्ठित करने के लिए पहिले अध्यात्म में दिव्य अग्नि का आधान आवश्यक है । जिस कर्म्म से यह धान किया जाता उसीको ‘ अग्न्याधान ' कहते हैं । अग्न्याधान से जब अध्यात्म में दिव्याग्नि प्रजाता है, तो सजातीयाकर्षण - सिद्धान्त के अनुसार अहोरात्रादि का अग्नि अध्यात्म में प्रतिष्ठित हो जाता है । अग्निहोत्रादि सम्वत्सरयज्ञ के अङ्ग हैं, एवं अग्न्याधान त्रङ्गों का अङ्ग बनता हुआ सर्वात है । अग्न्याधान १२७