Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 51–60

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60

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शतपथ - प्रथमखण्ड एवमेव प्राकृतिक समत्रर्त्त'न के गर्भ में श्रात्यन्तिक विषमवर्त्तन ही पुष्पित - पल्लवित होता रहता है । तथैव प्राकृ-तिक मैत्री की सीमा में प्रचण्डशत्रुता ही अभिवृद्ध होती रहती । एवमेव प्राकृतिक सहास्तित्त्व के प्राङ्गण में सहविघटनात्मक विभिन्न वर्गवाद ही अभिव्यक्त होते रहते हैं । एवमेत्र प्रकृतिनिबन्धना विमा मानवता के क्षेत्र में दानवता ही ताण्डव नृत्य करती रहती है । और ऐसा ही कुछ घटित - विघटित होता रहा है विगत तीन सहस्र वर्षात्मक - अनात्ममूलक - प्राकृत- सत्य - हिंसा - दया- मैत्री - बन्धुत्त्व -आदि नामों के प्राकृत -- ग्राक-र्षण से, जो आकर्षण आज के स्वतन्त्र भारतराष्ट्र में तो दुर्भाग्यवश निरतिशयरूपेणैव जागरूक होपड़ा है । और इसी विश्रमभावापन्न, अतएव सर्वात्मना असत्य - हिंसा - विषमता - शत्रुता --विवठन -- दानवता आदि प्राकृत-प्रतिद्वन्द्वीभावों को ही स्वगर्भ में उत्तरोत्तर पुष्पित पल्लवित करते रहने वाले अनात्मवादमूलक आज के ये प्राकृत-सत्य -- अहिंसा - समता -- मैत्री - सहास्तित्त्र- मानवता - आदि आदि उद्घोष एकान्ततः न केवल व्यर्थ ही, अपितु भारतराष्ट्र की निष्ठापूर्ण आत्ममूलक सत्य - हिंसा - भावों के अभिकर्ता ही प्रमाणित होते जा रहे हैं, जिस इस भयावहा संक्रमणावस्था का, संकरभावापन्ना विपना प्राकृत - जीवनपद्धति का दिग्देशकालानुबन्धी तात्कालिक - फलकामनाओं में आपादमस्तक मजित उन सांस्कृतिक - विद्वानों की ओर से भी तो नियन्त्रण नहीं किया जारहा, जो अपने अन्तर्जगत् में सम्भवतः इस भयानकता से सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः तो अव--श्य ही परिचित होंगे, इति नु महद्दुःखास्पदमेव । तो आइए, अत्र गीता के उस संशोधन - वाक्य का समन्वय - प्रयास करलें, जिस के द्वारा मानव को प्रकृतिनिबन्धन फल की चणा से पृथक् कर पुरुषनिबन्धना कर्म्मनिष्ठा से ही समन्वित किया गया है । सर्व-प्रथम मानव की ' इच्छा ' का प्रश्न उपस्थित होता है, जिसमें प्राकृतिक - स्वातन्त्र्य का विरोध ही किया है -- गीता ने -- ‘ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ' इत्यादि रूपेण । प्रकृतिनिबन्धंना स्वतन्त्रेच्छा मानव के आत्मभाव की इन्क्ला नहीं है, जिस ग्रात्मेच्छा को - ' ईश्वरेच्छा ' कहा गया है । श्रपितु प्राकृतेच्छा तो मानव के प्राकृत -- भावनिबन्धन उस जीव को ही दिग्देशकालानुबन्धिनी कामाम्रक्तिमयी इच्छा है, जो कदापि इसे व्यवस्थित – कर्म्मपद्धति में प्रतिष्ठित नहीं रहने दे सकती । हाँ, जिन प्राप्त तत्त्वद्रष्टा पुरुषों में आत्मबोधनिष्ठा सर्वात्मना अभिव्यक्त होजाती है, वे ही ' स्त्रस्य च प्रियमात्मनः ' रूपेण श्रात्ममूला इच्छा में स्वतन्त्र माने गए हैं, जिनकी यह इच्छा शास्त्रीया इच्छा से सर्वात्मना समन्वित ही रहा करती है । दूसरा स्थान ' फलोद्देश्य--निर्णय ' का है इसमें भी मानव की बुद्धि कोई निर्णय नहीं कर सकती । अपितु कर्मानुसार ही फलोद्द ेश्य निर्णीत है । तीसरा स्थान स्वयं ' क ' का है । इसनें यथाशास्त्रविधि मानव स्वतन्त्ररूपेण अधिकृत है । चौथा स्थान ‘ फलभोग ' का है | इसमें भी ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा: ' नियमन अनिवार्य्यरूप से अपेक्षित है । इसप्रकार इच्छा, फलोद्द ेश्य, फलसाधक कर्म्म, कर्म्मजनित फलभोग, इनमें एकमात्र फलसाधक कर्म्म के प्रति ही मानव का प्रधान उत्तरदादित्त्व । इसके प्रति यत् किञ्चित् भी स्खलन से मानव की आत्मेच्छा जीवेच्छारूप में परिणत होजाती है, फलोद्द ेश्य असत्फलोद्दश्य में परिणत होजाता है, फलभोग के प्रति आत्मपचनरूपा कदर्य्यता उत्पन्न होजाती है, कर्म शिथिल बन जाता है, फल में मन सर्वात्मना श्रासक्त होजाता है । इन सब विसंवादों, प्रकृतिवैषम्यों से आत्मत्राण का एकमात्र उपाय हैं - कर्म्मकाल में फल की चर्व्वणा से आत्यन्तिकरूपेण तटस्थ व॑ने रहना । फल का उत्तरदायित्त्व फलसाधक कर्म्म पर ही छोड़ते हुए एकमात्र कर्म्म के प्रति ही उत्तरदायित्त्व-बुद्ध्या प्रतिष्ठित रहना । इसी व्यवस्थापद्धति को, कर्म्मकौशल को लक्ष्य बनाते हुए भगवान् ने कहा है – ४७

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श्रात्मनिवेदन “ कर्म्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन " । हमारी प्राकृत – बुद्धि के लिए अभी स्थिति का सर्वात्मना स्पष्टीकरण नहीं हुआ । तत्सम्बन्ध में यही निवेदन किया जायगा कि, जो जिसका हेतु, कारण, उत्पादक होता है, उसे ही तत्कार्य के प्रति अधिकार, किंवा उत्तरदायित्त्व रहता है । मानव स्वयं साक्षात् रूप से फल का कारण, किंवा उत्पादक नहीं है । अपितु मानव का कर्म्म हीं फल के प्रति प्रमुख हेतु है । प्रचण्ड फलकामना रखता हुआ भी मानव फलहेतुभूत कर्म के अनु-ष्ठान के बिना इच्छा सहस्रों से भी अभीष्ट फल उत्पन्न नहीं कर सकता! ऐसी अवस्था में फलोद्दश्यानुगता अपनी प्राकृत इच्छा के प्रति, एवं ' फल ' के प्रति इन दोनों के प्रति ही अधिकाबुद्धि रखना क्या मानव की स्वयं अपनी हीं विडम्बना नहीं है? | ' मा फलेषु कदाचन ' से सङ्केतित इसी तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए भग-वान् को आगे जाकर विस्पष्टभाषा में यही उद्बोधन प्रदान कर देना पड़ा कि— " मा कर्मफलहेतुभू: " “ जब कर्म्मफल के प्रति कर्म्म ही हेतु है, तुम ( मानव ) नहीं, तो फिर अधिकारविरुद्ध कर्म्मफल के प्रति अधिकारबुद्धि करते हुए तुम किस आधार पर कर्मफल के हेतु बन सकते हो ” । क्या मानव को यह विदित है कि, अधिकारविरुद्धा फलासक्तिरूपा इस फलहेतुता के क्या क्या दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं इस फले'सु ं मानव को? | कर्म्म ' कर्म्म ' है, अर्थात् गतिप्राणात्मक ओजस्वी वैसा तत्त्व है, जिसके अनुग्रह से मानव के शारिरिक - मानसिक, तथा बौद्धिक, इन तीनों हीं प्राकृत विवत्तों में एकप्रकार का स्फूर्त्तिरूप जीत्रनीय तत्त्व प्रवाहित रहता है । जीवनीय रसप्रवाह से उपलब्धा नैष्ठिकी शान्ति के समतुलन में फलासक्ति का यत्किञ्चित् भी तो महत्त्व नहीं है । अनन्यनिष्ठा से कर्माग्नितप में तपोनिष्ट बने रहने वाले गतिशील - प्राणवान् के सम्मुख तो भौतिकफल सदा ही प्रवर्ग्यरूपेण करबद्ध ही उपस्थित होते रहते हैं, जिनका उदासीनवदासीनरूपेण भौतिक जीवनयात्रामात्र के निर्वाह के लिए ही नियमितमात्रा से वह कर्मठ तपस्वी अनुगमन करता रहता है । किन्तु जो केवल फलासक्त हैं, कर्म्मफल के ही जो मानव हेतु बने रहते हैं, उनका कर्म शिथिल होजाता है, प्राणाग्नि का गतिशील प्रोज मन्द होजाता है । प्रयुक्त बन जाने वाले कर्म-वञ्चित ऐसे फलेप्लु ही स्तब्ध - शठादि बन जाते हैं । और अन्ततोगत्वा ' कर्म्मरूपफल ' की चर्वणा में ही इनका जीवन समाप्त होजाता है । कर्म का फल ' अकर्म्म ' ही माना गया है । क्योंकि कर्म्म से उत्पन्न फल पर ही कर्म्म का अवसान है । मत्मिक यह फल मानव को एक ओर जहाँ कर्म्मस्वरूप से सर्वात्मना सम्पन्न करने में प्रतिबन्धक बन जाता है, वहाँ अपने कर्म्मरूप - भौतिक - जड़भाव से कालान्तर में यही फलव्यासङ्ग्र मानव को सर्वात्मनैव कर्म्मशून्य भी बना दिया करता है । निरन्तर श्रालस्य, दीर्घसूत्रता, तत्प्रतिक्रियात्मक आक्रोश; तज्जनित ध्वंसात्मक आासुरकर्म, आदि आदि असंख्य विभीषिकाओं को उत्पन्न करदेने वाली ‘ अकर्म्म ' रूपा यह फलाधिकारबुद्धि सचमुच ही तो मानव के सर्वनाश का ही कारण बन जाया करती है । इसी अन्तिम तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् ने कहा है—

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शतपथ - प्रथमखण्ड ‘ मा ते सङ्गोऽस्त्वक + मेणि ’ — ' कर्म्मरूपे फले ते सङ्गः -- मास्तु ' – इति निष्कर्षः ' प्राकृत कामना ' कर्म्म की अपेक्षा फल की चर्व्वणा में हीं विशेषरूप से निमज्जित रहती है, जबकि कर्त्त'-व्यकर्म्माधिकारमूला ‘ श्रात्मकामना ' कर्म्मस्वरूपसिद्धिमात्र में अधिकृत रहती हुई इसलिए फल की ओर से तट-स्थ ही बनी रहती है कि, इसे अपने कर्म की फलजनकता में अणुमात्र भी सन्देह नहीं रहता । फलभोग कदापि संस्कारबन्धनरूपा आसक्ति का कारण नहीं है । अन्तुि फलेच्छा से समन्वित भोगसंस्कार ही ग्रन्थिबन्धन के कारण बना करते हैं, जिस ग्रन्थिबन्धन को ही - ' सङ्ग ' कहा गया है । फलरूप कर्म्मका सङ्ग ही इस श्रासक्तिबन्धनरूप सङ्ग का जनक बनता है । इसके साथ ही विशुद्ध कर्म्म का सङ्ग कर्मानुगत - प्राणगत्यात्मक ग्रसङ्ग तेजोभाव - ग्राग्नेयभाव के कारण न तो फलसङ्गसंस्कार को ही दृढमूल बनने देता, और न मानवीय मन को यह कर्म्माग्नि कामलिप्सु ही बनने देता । फलतः कर्म्मसङ्ग जहाँ सर्वात्मना मानव को प्रसङ्ग बनाए रखता हुआ तटस्थरूपेणैव इसे कर्म्मफलभोग से समन्वित, एवं कर्मफल की आसक्ति से संस्पृष्ट बनाए रखता है, ठीक इसके विपरीत वहाँ फलसङ्ग मानव को फलकामासक्त बनाते हुए निरन्तर कामकामी ( इच्छावशवर्त्ती ) ही प्रमाणित करता रहता है । ' फलतः यही फलसङ्ग इसे कर्म्मसङ्ग से भी वञ्चित कर देता हैं, तदनुपात से ही सिद्धकर्म्मानु-बन्धी सिद्धफलभोग से भी वह वञ्चित ही बना रहजाता है । और यही प्रवञ्चना फलासक्त, अतएव कर्म्मविमूढ मानव को अन्ततोगत्त्वा समूलनाशात्मिका आत्मविस्मृति, तत्प्रवर्त्तिका सत्वबुद्धि - विस्मृति का ही सम्मान्य तिथि बना दिया करती है । आत्मकामनात्मिका ' कामना ' हीं - ' उत्थितांकाक्षा ' कहलाई है, जिसका प्रवर्त्तक अव्ययपुरुषात्मा से अभिन्न ‘ पुरुषमानव ’ ही बना करता है । इस श्रात्मकामना का प्रमुख द्वार आत्मा से युक्ता सत्त्वगुणा--न्विता असङ्गा सौरी बुद्धि ही बना करती है । अतएव सहजेच्छारूपा यह श्रात्मकामना ' बुध्दिकामना ' भी कहला सकती है । इच्छाप्रयुक्त फलसङ्गबन्धन का यहाँ अभाव है । अतएव उत्थिताकांक्षारूपा यह पुरुषकामना ' अकामना ' ही कहलाई है । दूसरी विषयकामनात्मिका ' इच्छा ' ही ' उत्थाप्याकांक्षा ' है, जिसका कि प्रवर्त्तक ' प्रकृतिमानव ' ही बना करता है । इस प्रकृतिकामना का प्रमुख द्वार फलसंस्कारचर्व्वणा से श्राक्रान्त स्नेहात्मक सोमगुणक मानवीय मन हीं बना करता है । अतएव कृत्रिमेच्छारूपा यह प्रकृतिकामना - ' मनः--कामना ' भी कहला सकती है । इच्छाप्रयुक्त रागद्वेषात्मक बन्धन का यहाँ प्राचुर्य्य है, अतएव उत्थाप्याकांक्षा--रूपा यह प्रकृतिकामना हीं वास्तविक - ' कामना ' कहलाई है । कामनात्मिका बुद्धिसहकृता, श्रतएव असङ्ग-भावापन्ना कर्म्माधिकारसमन्विता उत्थित्याकांक्षारूपा पुरुषमानव की आत्मकामना से अनुप्राणित कर्त्तव्यक ही गीतापरिभाषा में - ' निष्काम कर्म्मयोग ' कहलाया है, यही - ' सहजकर्म ' - ' यज्ञार्थकर्म्म ' - ' अबन्धनकर्म्म'-‘ अनासक्तकर्म्म ’ -- ‘ बुध्दियोग ' आदि नामों से गीताशास्त्र में उपवर्णित है । ठीक इसके विपरीत कामना-मिका, मनः सहकृता, अतएव ससङ्गभावापन्ना, फलाधिकारसमन्विता उत्थाप्याकांक्षारूपा प्रकृतिमानव की जीव-कामना से अनुप्राणित फलानुगत संसङ्ग - कर्म्म ही ' काम्यकर्म ' कहलाया है, वही प्रयोग - भ्रष्टयोग - हीन-योग --- अकृतात्म योग- आसक्तियोग - आदि विविध नामों से उपवर्णित हुआ है । एवं निम्नलिखित समू--हात्मक पूर्वपद्य से इसी तथ्य का अत्यन्त ही रहस्यपूर्णा ऋजुभाषा में भगवान् के द्वारा उद्घोष हुआ है, जिसके &

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आत्मनिवेन इत्थंभूत श्रुतिमूलक समन्वय के बिना आज जोकि अनर्थ परम्परया श्रात्ममूलक सत्य, रहा है— गीताशास्त्र के निष्कामकर्म्मयोग का भी वही अनर्थ प्रक्रान्त है, अहिंसा, आदि तात्त्विक - शब्दों के साथ घटित, विघटित हो कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । , मा कम्मफलहेतुर्भूः, मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्म्मणि ॥ - गीता " ब्राह्मण क्यों षडङ्ग वेदशास्त्र के स्वाध्याय में निष्कारण, फलोद्देश्य के बिना हीं यावज्जी-वन प्रवृत्त रहे, जबकि श्रुतिश्रास्त्र तथा लोकानुभव बिना कामनात्मक कारण के कर्म की प्रवृत्ति सम्भव ही नहीं मान रहा?, इस प्रारम्भिक प्रश्न के समन्वय के लिए ही हमें काम, तथा निष्काम भावों का प्रासङ्गिक समन्वय करना पड़ा । सचमुच तथोक्त कामभाव से ही, तन्मूला कारणता से ही, तन्निबन्धना दिग्देशकालानुबन्धिनी - प्रत्यक्ष प्रभावमूला तात्कालिकी - प्रावाहिकी - फलोपयोगिता के व्यामोहन से ही मन्त्रब्राह्म-णात्मक वेदशास्त्र के ज्ञान विज्ञानात्मक - मौलिक - निष्कारण - स्वाध्याय - पथ से वञ्चित ही होता रहा है-भारतराष्ट्र का प्रज्ञाशील वर्ग विगत तीन हस्र वर्षों से, विशेषतः वह ब्राह्मणवर्ग, जिसे ही इस तत्त्वसंरक्षण-( अनुशीलन ) का प्रमुखरूपेण ऋषिप्रज्ञा के द्वारा महान् उत्तरदायित्त्व मिला था । एवं जिस सांस्कृतिक उत्तरदायिव के संरक्षण - अनुशीलन के आधार पर ही भारतराष्ट्र प्रकृतिमूला दिग्देशकालानुबन्धिनी तात्कालिकी उपयोगिताओं के व्यामोहनपाश से अपने आपको उन्मुक्त रखता हुआ आत्मक्षेत्र में शान्तिरूप से, बुद्धि-क्षेत्र में तृप्तिरूप से, मनः क्षेत्र में तुष्टिरून से, एवं शरीरक्षेत्र में पुष्टिरूप से सर्वात्मना स्वोत्तरदायित्त्व से आत्मनिष्ठापूर्वक आत्मनिर्भर रहता हुआ वास्तविकरूपेणैव सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र बना हुआ था । फलमुखानुगत ‘ कारण ’ जैसे महान् अभ्व के विमोहन से ही मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के विज्ञान -स्तुति - ज्ञतिहास, लक्षण ज्ञातव्य - विषयों का, तथा कर्म्म - उपासना - ज्ञान - लक्षण - कर्त्त व्य - विषयों का सम्प्रदायवादनिरपेक्ष, ज्ञानविज्ञा-नात्मक - स्वरूप तो होगया अन्तर्मुख, एवं तत्स्थाने च काल्पनिक विज्ञान, काल्पनिक स्तुतियाँ, कल्पनिक इतिहास, काल्पनिक यज्ञकर्म्म, काल्पनिक भक्तिवाद, एवं जगन्मिथ्यात्ववादानुगत काल्पनिक ही ज्ञानवादात्मक . वेदान्तदर्शनवाद, आदि आदि परःशत वैसे वैसे मलीमस मतवाद होपड़े आविर्भूत, जिन से हमारी मानसिक-भावुकता को, तन्निबन्धना फलकारणता को उत्तरोत्तर प्रोत्साहन ही मिलता गया । उसी का यह दुष्परिणाम है कि, जिस ब्राह्मण को ऋषिप्रज्ञा की ओर से निष्कारणरूपेण वेदशास्त्र – स्वाध्याय का आदेश मिला था, जिस वेदस्वाध्याय के बिना मन्वादि धम्माचाय्यनें ब्राह्मण को बंशसहित शूद्रकोटि में मान लिया था *, वह ब्राह्मण

( १ ) योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।

स जीवन व शूद्रं चमाशु गच्छति सामन्वयः ॥

- मनु २।१६८ | ( २ ) -- अनभ्यासेन वेदानां, श्राचारस्य च वर्जनात् आलस्यात्, अन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिर्घासति ॥ -मनुः ५ | ३ | ५०

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शतपथ - प्रथमखण्ड भी आज - ‘ कारणतामूलक - उपयोगितावाद ' जैसे ' दिग्देशकालानुबन्धी वर्त्तमान ' के व्यामोहन में आपाद-. मस्तक निमजित ही होगया है । और यों राष्ट्र की सांस्कृतिक - प्रज्ञाओं की भी आज राष्ट्र की इस मूलनिधि के प्रति उसीप्रकार निरपेक्षता ही होपड़ी है, जैसे कि... इत्यालप्या मेव । सचमुच ही तो दिग्देशकालानुगत - वर्त्तमान से अनुप्राणित कारणतात्मक उपयोगितावाद मानव की भावुक - प्रकृति को तत्क्षण विमुग्ध कर देने वाले वैसे प्रचण्डतम अभ्व - यक्ष ही हैं, जिनसे त्राण पाजाना असम्भव नहीं, तो कठिनत्तम तो अवश्य ही है । और उस अवस्था में तो तत्त्राण इसलिए असम्भव भी मान लिया जाय, तो कोई अत्युक्ति न होगी कि, विगत तीन सहस्रवर्षों से भारतराष्ट्र की प्रज्ञाओंोंनें यहाँ की राष्ट्रप्रज्ञा को शास्त्र, धर्म्म, आचार, ज्ञान, भक्ति, सत्य, अहिंसा, परोपकार, त्याग, तपस्या, बलिदान, आदि आदि विमोहक - शब्दजाल-परंम्पग़ के माध्यम से ज्ञानविज्ञानसिद्धा, कर्त्त व्यकम्र्म्मात्मिका सहज ग्रात्मनिष्ठा से उत्तरोत्तर पराङमुख ही कर दिया है । अतएव श्राज तो स्थिति ऐसी होपड़ी है कि, शास्त्र - धर्म्म - ज्ञान - भक्ति - श्रादि के नामश्रवणमात्र से भी वर्त्तमानयुग की राष्ट्रीय प्रज्ञा तो उन्मत्त - प्रमत्तवत् प्रलाप ही करने लग पड़ती है, जिसके लिए कदापि राष्ट्रप्रज्ञा को ही एकलया दोषी नहीं ठहराया जासकता । आज के इस सर्वतन्त्र स्वतन्त्र अभिनव भारतराष्ट्र के नवजागरणकाल में राष्ट्रप्रज्ञा की तथोक्ता भ्रान्ति का यथासम्भव शीघ्र से शीघ्र निराकरण कर देने में ही राष्ट्र का अभ्युदय है । अन्यथा प्रतीच्य - जगत् के आत्मनिष्ठाशून्य, अतएव फलमुखानुगत, अतएव भौतिक उपयोगितामात्र में परिसमाप्त जिस वैज्ञानिक चाकचि-क्यने, तदनुप्राणिता, सर्वनाशकारिणी अनुकूलता से समन्विता भूतसभ्यता ने आज भारतराष्ट्र की प्राच्यचेतना को जिस - निर्म्मता से अभिभूत कर लिया है, आत्ममूलक, अतएव श्रश्मावरणसमतुलित श्रच्छेद्य - अभेद्य - प्राच्य-भारतीय ज्ञानविज्ञानकोशात्मक वेदशास्त्र के मूलस्वरूप के द्वारा यदि इस अभिभूति का अविलम्ब ही निरा-करण नहीं कर दिया गया, तो निश्चयेन थोड़ी अवधि के अभ्यास के अनन्तर भारत का भारतत्त्व सभी दृष्टि-कोणों से परा: परावत ही प्रमाणित होजायगा, और उस दशा में हमारा यह - ' स्वतन्त्र ' शब्द सर्वात्मना ‘ स्व ’ रूपा आत्मनिष्ठा से अभिभूत होता हुआ ' पर ' रूपा ' भूतकुनिष्ठा ' से ही समन्वित बन जायगा, जिस - ‘ पर ’ भावाक्रान्ति को ही - ' परतन्त्रता ' कहा गया है । हमारी आस्था है, ग्रात्मनिष्ठा है कि, कदापि भारतराष्ट्र अत्र ' स्त्र ' तन्त्र को विस्मृत नहीं करेगा | कदापि तात्कालिक – दिग्देशकालानुबन्धी- ये भौतिक व्यामोहन अब इसे और अधिक व्यामुग्ध नहीं करेंगे | आत्मसाम्यमूलक समदर्शनानुगत, एवं प्रकृतिमूलक विषमवर्त्तनात्मक, तदित्थं ' उभयसमन्वयात्मक साम्यवाद ' ही निकट अविष्य में भारतराष्ट्र की पुन: मूलप्रतिष्ठा प्रमाणित होगा । सम्भव है, और बहुत सम्भव है कि निकट भविष्य में ही - ‘ संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति ' न्याय से हमारा भारतराष्ट्र भूतसाम्यमूलक कल्पित - साम्य-वाद के वारुण - पाश में आबद्ध होजाय । किन्तु इससे भारत को कदापि विकम्पित नहीं होना चाहिए । अर्थात् जो ब्राह्मण वेदशास्त्र का स्वाध्याय न कर अन्य लौकिक शास्त्रों में श्रम - परिश्रम करने लग पड़ता है, वह अपनी जीवित - दशा में ही अपने परिवार सहित ' शूद्रकोटि ' में हीं आजाता है ( १ ) । वेंदा-भ्यास के परित्याग से, आचारविहीनता से, आलस्य से, एवं अन्नदोष से मृत्यु ब्राह्मण का हनन कर देती है । अर्थात् इन पाँचों दोषों से समन्वित ब्राह्मण जीता हुआ भी ' मरा ' हुआ ही है । ( २ ) । ५१

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आत्मनिवेदन भारतराष्ट्र की आत्मसाम्यमूला पावन धरित्री में इससे पूर्व भी अनेक ' वाद ' आए, और निमजित होगए काला-न्तर में इसी आत्मसाम्य का गुणगान करते हुए । वही स्थिति भौतिक - साम्यवाद की सुनिश्चित है । अतएव इस नवीव अभ्व को हम तो भारतराष्ट्र की आत्मचेतना के उद्बोधन का ही कारण मानेंगे । मा भैषीः! अभयं वै ब्रह्म!! परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति!!! हाँ, आज अविलम्ब आवश्यकता इस बात की अवश्य है कि, विगत तीन सहस्र वर्षों से प्रक्रान्ता जिस भावुकता ने भारतीया आत्मनिष्ठा भी प्रजा को ज्ञानविज्ञानात्मिका जिस मूल संस्कृति से परा: परावत बना रक्खा है, उसका स्वरूप - सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः तो राष्ट्रप्रजा के सम्मुख रख ही देना चाहिए | ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' । इसी पावन उद्देश्य से मानवाश्रम के इस साहित्य - सेवी भारतीय ब्राह्मण के द्वारा मूल - तूल - रूपेण राष्ट्रभाषा - हिन्दी में द्विधा विभक्त सांस्कृतिक - साहित्य -- उपनिबद्ध हुआ है । मूलसाहित्य का जहाँ चिरन्तन - स्वाध्याय से सम्बन्ध है, अतएव वह जहाँ अमुक परिगणित सांस्कृतिक -- प्रज्ञाओं के ही अनुरञ्जन का साधक है, वहाँ उद्बोधनात्मक तूलसाहित्य से त्रिसहस्रवार्षिकी समस्याओं से अनुप्राणित ऐतिह्य - तथ्य - विश्ले-घणपूर्वक भारतीय संस्कृति का, श्रुतिसिद्ध ज्ञानविज्ञानात्मक तत्त्वों का उपलालनात्मिका वैसी मनःप्रधाना भाषा में हीं स्वरूप उपनिबद्ध हुआ है, जिसे सर्वसामान्यजनानुरञ्जक, एवं उद्बोधक कहा जासकता है * । उभय--साहित्यात्मक इस भाषासाहित्य में से मूलसाहित्य के ' शतपथ हिन्दी विज्ञानभाष्य ' का ही कुछ अंश प्रस्तुत प्रथमखण्ड के द्वारा राष्ट्र की सांस्कृतिक-- प्रज्ञाओं की पावन - सेवा में हम श्रद्धापूर्वक समर्पित कर रहे हैं, जिस शऩपथभाष्य के सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव दिग्देशकालानुबन्धी ' आत्मनिवेदन ' कर देना अप्रासङ्गिक न माना जायगा । वेदत्रयी के प्रकृतिशिल्पात्मक पतित्रतम कृष्णमृगचर्म पर समासीन तत्त्वद्रष्टा आत्मनिष्ठ महर्षियोंनें मन्त्रब्राह्मणात्मक अपौरुषेय वेदशास्त्र का साक्षात्कार किया, एवं साक्षात्कृत तत्त्वात्मक इस मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्रको मूल प्रतिष्ठा बना कर ही उह्नोंनें नित्या मन्त्रवाक् के द्वारा उस तत्त्वात्मक शास्त्र को शब्दात्मक ' स्वाध्यायशास्त्र ' के रूप में उपनिबद्ध किया । वेदशास्त्र के सम्बन्ध में प्रान जो अनेक प्रकार के विसंवाद प्रज्ञाजगत् में श्रुतोपश्रुत हैं, उन सत्र विसंवादों का एकमात्र मूलकारण है शब्दात्मक -- वेदशास्त्र के द्वारा प्रति-पादित तत्त्वात्मक वेदशास्त्र के स्वरूप से अनेक - शताब्दियों से - ( सामान्यप्रजा की कौन कहे ) सांस्कृतिक - विद्वत्प्रज्ञा का भी सर्वथा अपरिचित ही बने रह जाना । प्रतिमानात्मक अभिमान से अपने आपको एकान्नत: असंस्पृष्ट ही अनुभूत करते हुए अत्यन्त प्रणतभाव से यह निवेदन कर देने में हम अणुमात्र भी संकोच का अनुभव नहीं कर रहे कि, मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के तत्त्वात्मक स्वरूप से आज के ही नहीं, अपितु विगत तीन सहस्र-वर्षों के दार्शनिक – कलहात्मक - संघर्षात्मक युग के विद्वान् सर्वथा गजनिमीलिका ही करते आरहे हैं | यदि ऐसी गजनिमीलिका न होती, यदि विद्वत्प्रज्ञा तत्त्वात्मक वेदस्वरूप से समन्वय किए रहती, तो न तो वैदिक तत्त्ववाद * # -- वेद के कतिपय सूक्त शतपथ - उपनिषत् गीता - श्रादि के बृहद्भाष्यों से अनुप्राणित मूलसाहित्य अनुमानतः ८० ( अस्सी ) सहस्रपृष्ठों में, एवं उद्बोधनात्मक सामयिक तुलसाहित्य अनुमानतः पाँच सहस्र-पृष्ठों में अद्यावधि सम्पन्न हुआ है, जिस इस ८५ सहस्रपृष्ठात्मक साहित्य में से अबतक दिग्देशकालानुबन्ध से केवल १० सहस्रपृष्ठात्मक साहित्य ही प्रकाशित होसका है । ५२

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शतपथ - प्रथमखण्ड विस्मृति के गर्भ में विलीन होता, एवं न पौरुषेय - श्रपौरु पेय - जैसा नितान्त - भावुकतापूर्ण वाक्कलह ही जन्म लेता, जिस कहलने ही वेद के मौलिक -- स्वरूप के अन्तस्तल का स्पर्श करने हीं नहीं दिया भारतीय--विद्वानों को । जिसे. ऋषिने अपौरुषेय - ब्रह्म निःश्वसितवेद कहा है, कदापि वह किसी शब्दात्मक उस ग्रन्थविशेष का नाम नहीं है, जिस शब्दात्मक पौरुषेय वेदग्रन्थ का निर्माण ऋषियों की सत्त्वबुद्धि से ही हुआ है * । तत्त्वात्मक वेद, और ग्रन्थात्मक वेद में वही अन्तर है, जो कि अन्तर भूतदृष्ट्या सौम्य - ऐन्द्र - ध्रौव - भेद से त्रिधा विभक्ता विद्य ुच्छक्ति, एवं तत्प्रतिपादक विद्युद्ग्रन्थ में हैं । विद्यच्छक्ति जहाँ सनातनशक्ति है, अंत-एव मानव की प्राकृतरचना से पृथक् रहती हुई अपौरुषेया है, वहाँ विद्य ग्रन्थ मानव का पुरुषार्थ होने से पौरुषेय ही है | उदाहरण भौतिक है, अतएव सर्वथा एकदेशी, अतएव च केवल उपलालनात्मक | जबकि तत्त्वात्मक वेद भूतों का स्रष्टा प्राणात्मक ही माना गया है । अतएव भौतिक विद्युदादि उदाहरणों की श्रेणि में उसे समुपस्थित नहीं किया जासकता । अत्र उदाहरणविधि से यही निवेदनीय है कि, वेद उस मौलिक तत्त्व का नाम है, जिसके आधार पर ही पाञ्चभौतिक विश्व का, तथा विश्वप्रजा का स्वरूप निर्माण हुआ है | शब्दात्मक वेदग्रन्थों पर ही अपनी भावुकतापूर्णा वेदभक्ति परिसमाप्त करते रहने वाले भारतीय-विद्वान् अवश्य ही इस तथ्य से स्तब्धवत् ही बन जायँगे क्षणमात्र के लिए । क्योंकि, उनकी दृष्टि में तो उसी प्रकार वेदमन्त्र ऋषियों के अन्तःकरण में अवतरित हुए हैं, जैसेकि - अन्य सम्प्रदायवादियों की मान्यता में उनके शस्त्रीय वचन स्वयं ईश्वर की ओर से ही अमुक महान् व्यक्तिविशेष में अवतरित हैं । यही तो भारतीय विद्वानों का महतो महीयान् वह आत्मविमोहन है, जिसने इह्न वेदशास्त्रसिद्ध विज्ञान - स्तुति - इतिदासादि आचा रनिष्ठाओं से चिरकाल से वञ्चित ही बनाए रक्खा है । सृष्टि के गहनतम ज्ञान - विज्ञानात्मक तत्त्वों के प्रतिपादक मन्त्रब्राहाणात्मक शब्दात्मक वेदशास्त्र में सबसेदुरुह, कठिनतम तत्त्व ' वेदतत्त्व ' ही है । अर्थात् वेद में प्रतिपादित तात्त्विक - वेद का स्वरूप ही सर्व-मूलभूत तत्त्वत्त्वेन सचमुच ही तो मादृश प्राकृत - बुद्धियों के लिए तो अत्यन्त ही गहन - गभीर, अतएव दुर्बो-ध्यतम है । सृष्टिमूलभूत तत्त्ववेद की इसी रहस्यपूर्णा दुर्बोध्यता की यत् किञ्चिदुपासना की धृष्टता के लिए ही हमें अठारहसौ पृष्ठात्मक – खण्डत्रयात्मक - ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध उपनिबद्ध कर देना पड़ा है, जो प्रकाशित भी हो चुका है । इस प्रासङ्गिक आत्मनिवेदन में तो उस वेदतत्त्व की संक्षिप्ता सूची उद्धृत कर देना भी कठिन है । हाँ, स्वयं प्रथमखण्डात्मक - प्रस्तुत शतपथभाष्य के हविः पेषणात्मक कर्म्म-विशेष से अनुप्राणित कृष्णमृगचर्म्म के स्वरूप - समन्वय - प्रसङ्ग से रेखाचित्रों के माध्यम से तत्त्ववेद की तात्त्विक स्वरूप - दिशा का अवश्य ही दिग्दर्शन - प्रयास हुआ है, जैसाकि पाठक तत्प्रकरण में देखेंगे । मानव की स्वरूप - मीमांसा करते हुए पूर्व में मानव के पुरुषमानव, प्रकृतिमानव, भेद से दो विभिन्न स्वरूपों का दिग्दर्शन कराया गया था । तत्त्ववेद के प्रसङ्ग से पुनः उह्नीं दोनों विवर्त्तो की ओर हम आप का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं | पुरुषमानव का मूल षोडषकल विश्वात्मा अव्ययपुरुष है, एवं प्रकृतिमानव का * बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ( कणादसूत्र, वैशेषिकदर्शन ) ५३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
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आत्मनिवेदन मूल अव्ययपुरुष से समन्विता पञ्चपर्वा क्षरप्रकृति - लक्षणा विश्वप्रकृति है । विश्वात्मा श्रव्ययपुरुष दिग्देश-कालातीत बनता हुआ जहाँ अनाद्यनन्त है, वहाँ विश्वप्रकृतिं दिग्देशकालात्मिका बनती हुई सादिसान्ता है । अनाद्यनन्त - पुरुषतन्त्र, तथा सादिसान्त प्रकृतितन्त्र, दोनों हीं तन्त्रों के साथ तत्त्वात्मक वेद सह समन्वित है | अतएव वेदतत्त्व के भी पुरुषवेद, प्रकृतिवेद, भेद से दो ही विवर्त्त होजाते हैं । पुरुषवेद अनन्तपुरुष के सान्निध्य से जहाँ अनाद्यनन्त है, वहाँ प्रकृतिवेद सादिसान्ता प्रकृति के अनुबन्ध से सादिसान्त है | महर्षि -भरद्वान के प्रति अभिमानी - देवात्मक देवेन्द्र के द्वारा जिस वेद के लिए - ' अनन्ता वै वेदा: ' यह उद्घोष हुआ है, वह अनन्तवेद जहाँ - ' पुरुषवेद ' है, वहाँ सावित्राग्नि के माध्यम से बुद्धिग्राह्य जिस तत्त्ववेद का इन्द्र के द्वारा स्वरूपोपवर्णन हुआ है, वह सादिसान्त — प्रकृतिवेद है— देखिए तैत्तिरीय ब्राह्मणान्तार्गत ' इन्द्र - भरद्वाज -सवाद, ३ काण्ड, १०३ प्रपाठक, २१ अनुवाक ) । पुरुषात्मक श्रनन्तवेद् सच्चिदानन्दमूर्त्ति श्रव्ययपुरुषब्रह्म से समतुलित होता हुआ ' सच्चिदानन्दमय ' है, जैसाकि स्वयं वेद शब्द के त्रिधा विभक्त - त्रिधातुमय - निर्वचनार्थ से ही संसिद्ध है । सत्तार्थक विद धातु ( विद - सत्तायाम् ) से सम्पन्न वही ' वेद ' शब्द विद्यते रूपेण स्तिभावात्मक - ' सत् ' भाव का संग्रह कर रहा है | ज्ञानार्थक चिद ध! तु ( विद ज्ञाने ) से निष्पन्न ' वेद ' शब्द ' वेत्ति ' रूपेण ज्ञानभावात्मक - ' चित् ' भाव का संग्राहक बन रहा है । एवमेव लाभार्थक्र - ' विद् ' धातु ( विद्लृ लाभे ) से कृतरूप वेद शब्द – ‘ विदन्ति ’ रूपेण लाभात्भक – रसरूप - ' आनन्दभाव ' का संग्राहक प्रमाणित होरहा है । तदित्थं ' विद्यते इति वेदः ” मूलक ‘ सद् ’ भाव, ‘ वेत्ति - इति - वेदः ' मूलक- ' चिद ' भाव, तथा - ' विन्दुति - इति वेदः ' मूलक आनन्दभाव से सम्पन्न — निष्पन्न तात्त्विक वेद त्रिधातुमूर्ति, त्रित्त्वमूर्ति त्रिज्योतिर्मय पोडशी प्रजापतिरूप अनन्ताव्ययब्रह्म के सच्चिदानन्द - स्वरूप से सर्वात्मना समतुलित होरहा है । यही पुरुषवेद की अनन्तभावात्मिका सच्चिदानन्द-रूपता का संक्षिप्ततम संस्मरण है । इसी आधार पर उस सच्चिदानन्द अव्ययब्रह्म को इस वेदात्मक - सच्चिदानन्द से ही वे I माना है यहाँ की ऋषिप्रज्ञा ने, जैसा कि – ' वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ' ( गीता १५ | १५ ) इत्यादि स्पष्ट है । दूसरा है - प्राकृतवेद, जिसे ' विश्व वेद ' - ' प्रकृतिवेद ' - ' छन्दोवेद ’ - ‘ वितानवेद ’, - ‘ रसवेद ' आदि-रूपेण तत्तत् - प्राकृतिक- विशेषताओं के भेद से विभिन्न नामों से व्यवस्थित किया गया है । सादिसान्ता प्रकृति के अनुबन्ध से यह प्राकृतवेद भी सादिसान्त बना हुआ है, जिसका प्राकृत लय के साथ ही सच्चिदानन्द– वेदमूर्त्ति व्ययपुरुष में लय होजाता है । सम्पूर्ण विश्व - ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इत्यादि बृहज्जाबालोप— निषत् - सिद्धान्त के अनुसार ' अग्नीषोमात्मक ' है । ब्रह्मा - इन्द्र - विष्णु - रूप हृदयात्मक ं सत्यप्रजापति से गर्भित अग्नि, और सोम का समन्वय ही विश्व की स्वरूप - व्याख्या है । वही प्राकृत प्रजापति अपनी अन्तःस्था-ब्रह्म ेन्द्रविष्णु - नाम की अक्षरत्रयी से -'अन्तर्यामी ' कहलाया है, एवं तदाधार पर प्रतिष्ठिता अपनौ बहिःस्था अग्नि, सोम - नाम की अक्षरद्वयी से ' सूत्रात्मा ' कहलाया है । अन्तर्यामी से समन्वित अग्नीषोमात्मक सूत्रात्मा हीं पाञ्चभौतिक विश्व का स्वरूप - समन्वय है । * - प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी । –यजुः संहितायाम् ५४

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 59 का मूल पृष्ठ
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शतपथ - प्रथमखण्ड विश्व के बाह्य - भौतिक संस्थान के सरक्षक, एवं सर्वस्व बने हुए अग्निदेव अग्नित्रयी में विभक्त हैं, एवं सोमदेव सोमद्वयी में विभक्त हैं । ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, भूताग्नि, रूपेण अग्नि के ये तीन प्रमुख विवर्त्त हैं, जिनके आधार पर ही एकता, द्विता, त्रिता, नाम से प्रसिद्ध, यज्ञपरिभाषा में प्यादेवता ' रूपेण उपवर्णित, एवं विज्ञानभाषा में ' अग्निभ्रातरः ' नाम से समन्वित तीन प्रकार के परिधि - मण्डलात्मक त्रेताग्नि प्रतिष्ठित हैं । तथैव ब्रह्मणस्पति नामक पवमानसोम, एवं वृत्रात्मक अन्नसोम नाम से सोम दो महिमाभावों में विभक्त है । तीन अग्नि, और दो सोम, इन पञ्चविध अग्नि - सोमों से ही प्राकृत विश्व पञ्च-पर्वा बना हुआ है, जिस इस पञ्चपर्वा, अग्नीषोमात्मिका ( अग्नित्रयी, और सोमद्वयीरूपा ) विश्वप्रकृति के लिए- ' पञ्चपर्वामधीमः ' * प्रसिद्ध है । तीनों अग्नि- ' अन्नाद ' हैं, तो दोनो सोम - ' अन्न ' हैं । अन्नाद - अग्नि तेजोगुणक रूक्ष - शुष्क तत्त्व है, तो अन्नसोम स्नेहगुणक आर्द्र - तत्त्व है । पञ्चपर्वा विश्व में गतिप्रकृतिक - तेजोधर्म्मा-अन्नादमूर्ति अग्नि, तथा स्थितिप्रकृतिक - स्नेहधर्म्मा - अन्नमूर्ति सोम, इन दो ही तत्त्वों का प्राधान्य है, जैसाकि निम्नलिखित निगम - अनुगम - वचनों से स्पष्ट प्रमाणित है— ( १ - तेजो वा अग्निः ( शत २ | ५ | ४ | ८ ) | ( २ ) -द्वयं वा इदं सर्व - स्नेहश्चैव, तेजश्च । तदुभयमहोरात्राभ्यामाप्तम् ( अहरा-ग्नेयः, तेजोमयः । रात्रिः ( ३ ) - द्वयं वा इदं अत्ता चैव, ( यदाद्यं तत् सोमः ) | सोम्या स्नेहमयी ) | - शां ० वा ० १७ | ५ | श्रद्य च । स वै यः सः - अत्ता, अग्निरेव सः । - शत ० प्रा ० १०/६१२. १, २, ( ४ ) - अन्नादो ऽग्निः ( शत ० २।१।४।२८ | ) | ( ५ ) - अन्नं वै चन्द्रमाः सोमः ( तै ब्रा ० ३ । २ । ३।४ । ) । ( ६ ) - अग्नीषोमौ भ्रातरौ स इन्द्रः - अब्रवीत, अहमेव दें सर्वं स्याविति । तयोरन्नाद एव - अन्यतरोऽभवत्, अन्नमन्यतरः । अन्नाद् एव अग्निरभवत्, अनं सोमः । अन्नादश्च वा इदं सर्ग - अन्नञ्च । - शत ० ब्रा ०११ | १ | ६ | १६ | ( ७ ) -द्वयं वा इदं, न तृतीयमस्ति श्रद्रश्च व, शुष्कश्च । यच्छुष्कं तदाग्नेयं, यदाद्र-तत्सौम्यम् । शत ० प्रा ० १ | ६ | ३ | २३ | * –पञ्चस्रोतोऽम्बु ', पञ्चयो न्युग्रवक्रां, पञ्चप्राणोम्मि, पञ्चबुद्धयादिमूलाम् । पञ्चावर्त्ता, पञ्चदुःखौघवेगां, पञ्चाषड्भेर्दा, पञ्चपर्वामधीमः ॥ – श्वेता ० उप १।५ ५५

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आत्मनिवेदन आग्नि, और सोम नामक आङ्गिरस, तथा भार्गव - तत्त्वों की उक्ता सर्वव्याप्ति को अवधान पूर्वक लक्ष्य बनाते हुए ही हमें विश्वमूलभूत - श्रग्नीषोमात्मक प्राकृत - ' विश्ववेद ' स्वरूप का अन्वेषण करना चाहिए । तीन अग्नियों में पहिले, ( सर्व वृद्ध, सर्वप्रमुख, सर्वज्येष्ठ, अतएव - ' पलितवाम ' नाम से प्रसिद्ध *, पञ्चपर्वा विश्व में सर्वप्रथम उबुद्ध होने के कारण, एवं सनातन ज्ञानशक्तिप्रधान होने से ही ) ' ब्रह्मा— ग्नि ' को – ‘ पलित ' ( श्वेतकेशा अतिवृद्ध - वयोवृद्ध भी, और ज्ञानवृद्ध भी ) कहा गया है । पुरुषवेदात्मक अव्ययात्मक – अज - सच्चिदानन्द वेदात्मा विश्वातीत ( प्रकृत्यतीत अव्यय ) जहाँ - ' अजस्यावक्रचेतसः ' के अनु— सार वक्र है, ऋजु है, वहाँ अपने परमाकाशात्मक महिमामण्डल से कालात्मा ब्रह्माग्निरूप यह पलित तत्त्व सर्वत्सरेण – छद्मगतित्त्वेन कुटिल - वक्र - ही बना हुआ है । प्रत्येक वत्तुल - मण्डल ( गोलाकार ) अपनी प्रति-बिन्दु से कुटिल ही होता है । प्राणरश्मियों की यह तिरश्चीनता - कुटिलता - वक्रता - अर्थात् वामता [ टेढापन ] ही मण्डलवृत्त की स्वरूप – सम्पादिका बनती है, जैसा कि - ' तिरश्चीनो विततो रश्मिरेबाम् ० ' [ १ ] इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । इसी तिरश्चीनता से उस ' पलित ' ब्रह्माग्नि को - ' वाम ' कहा गया है । अपने सर्वस्वाहुत्यात्मक सुप्रसिद्ध – ‘ सर्वहुतयज्ञ ' की स्वरूप - सिद्धि के लिए यही अपने आकर्षण से सम्पूर्ण प्राणों का आह्वान करता है - ‘ स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ' रूपेण [ २ ], अतएव इस वामपलित को ऋषि ने ' होता ' कहा है, जिस के तृतीय रूप को लक्ष्य बना कर ही ' अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् ' [ ३ ] यह प्रसिद्ध है । इत्थंभूत वामपलित वह प्रथम ब्रह्माग्नि हीं विश्व के सर्वादिभूत - ' स्वयम्भूपर्व ' का स्वरूप - प्रवर्त्त'क बनता है | ब्रह्माग्नि के सम्बन्ध से ही स्वयम्भू ' ब्रह्म ', किंवा ' ब्रह्मा ' कहलाया है - ' ब्रह्म वै स्वयम्भू- भू- अभ्यानर्षत् ' । * - श्वेतकेशा - [ ज्ञानशक्तिघन ], अतएव ' पलितवाम ' नामक इस प्रथम स्वायम्भुव - ' ब्रह्माग्नि ' के आधार पर वितत - व्याप्त सम्पूर्ण विश्वविज्ञान का संक्षेप से स्पष्टीकरण करने के लिए ही महर्षि दीर्घतमा के द्वारा - ' अस्य वामस्य पलितस्य होतुः ' इत्यादि सुप्रसिद्ध ' अस्यवामीय सूक्त ' उपनिबद्ध हुआ है । [ ऋक– सं ० १।१६४ सूक्त ] ।

( १ ) - तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।

रेतोधा आसन्, महिमान आसन्, स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥

--ऋक्सं १० | १ | २६ | ५ |

[ २ ] -या ते धामानि परमाणि, या अवमा, या मध्यमा, विश्वकर्म्मन्नुतेमा ।

शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधा वः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ॥

[ ३ ] - न दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् ।

अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥

– सामसंहिता १ | १ | १ | ५६ ऋक् सं ० १० | ८१ | ५ |