Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 441–450

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 441–450

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प्रथमकाण्ड विजातीय प्राणों के घर्षण से पानी के उत्पन्न होते हीं संसर्गभावका जन्म होगया है । इस पानी के गर्भ में सूर्य्य रहता है । यह आपोमण्डल सूर्य से भी ऊपर के स्थान में रहता है । अतएव इस श्रापोमय समुद्रको सरस्वान् कहा जाता है । इस आपोमय परमेष्ठी में भृगु और अङ्गिरा, दो वस्तु हैं । स्नेहतत्त्वका नाम भृगु है, तेजस्तत्त्वका नाम श्रृङ्गिरा है । दोनों पानी में नहीं रहते, अपितु दोनों अब्रूरूप अर्थात् दोनों ऋत हैं | अतएव ‘ ऋतमेव परमेष्ठी ' यह कहा जाता हैं । भृगु और अङ्गिरा की इसी ऋतावस्था का स्वरूप बत— लाती हुई श्रति कहती है—

' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।

अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥

—गोपथब्राह्मण . भृगु सोम है. अङ्गिरा अग्नि है । अग्नि में सोम की प्राहुति होने का नाम हीं यज्ञ है । यज्ञक्रम के अधिष्ठाता भृगु श्रङ्गिरा का प्रादुर्भाव परमेष्ठी में ही होता है, अतएव हम अवश्य ही इस आपोमय पारमेष्ठ्य समुद्र को यज्ञमय, एवं यज्ञप्रवर्त्तक बहस्वते हैं । स्वयं पानी पूर्वश्रुति के अनुसार भृग्वङ्गिरो-मय है | भृग्वङ्गिरा के सम्बन्ध का नाम हीं यज्ञ है, अतएव अवश्य ही पानी के लिए ' यज्ञो वा आपः ' यह कहा जासकता है । यह यजमान वैधयज्ञ के द्वारा उसी प्राकृतिक यज्ञ को अपने अधिकार में करना चाहता है । भौतिक पदार्थों में पानी यज्ञस्वरूप है । क्योंकि पारमेष्ठ्य श्रम्भः नाम के वायुरूप पानी के ( जो कि श्रम्भः गाङ्गेय का जनक है ), और पवमान के रासायनिक सम्मिश्रण से ही यह स्थूल पानी उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में वैधयज्ञ में सबसे पहिले पानी को अपने अधिकार में कर लेना ' यज्ञ को ' ही अपने अधिकार में करना है । इसीलिए यह यजमान अपने इस वैधयज्ञ में सबसे पहिले पप्रणयन करता है । ' अपां -प्ररणयन क्यों किया जाता है '?, इस प्रश्न की यही पहिली उपपत्ति है, इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रखकर— ' यज्ञो वा आपः, यज्ञमेवैतत् प्रथमेन कर्म्मणाभिपद्यते ' यह कहा गया है । अपिच - पानी का जो प्रणयन करना है, वह यज्ञ को फैलाना है । ब्राह्मण के प्रारम्भ में बतलाया गया था कि, इस यज्ञ में गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, ये तीन अग्नि हैं । अतएव इसे वितानयज्ञ कहा जाता है । इस वैध वितानयज्ञ के द्वारा प्रादेश परिमित यज्ञात्मा को पृथिवीपृष्ठ से म्वर्गलोक पर्य्यन्त ( १७ वें स्तोम पर्य्यन्त ) फैलाया जाता है | वैधयज्ञ का फल है - यज्ञात्मा का १७ वें अहर्गण पर्य्यन्त वितत होना, परिमित श्रात्मा का अपरिमित भाव में परिणत हो स्वगसुख प्राप्त करना । तात्पर्य्य यही है कि, यज्ञ के वितान पर आत्मा का वितान अवलम्बित है, एवं आत्मवितान पर स्वर्गसुख प्रतिष्ठित है । पानी ऋत है । वितत होना ऋतपानी का ही धर्म है | सत्यभाव का वितान नहीं हुआ करता । ऐसी अवस्था में सबसे पहिले पानी का प्रणयन करना यज्ञ को फैलाना हीं है । इसके द्वारा वितानयज्ञ के वितान - भाव को ही प्राप्त करना है । इसप्रकार वितान - यज्ञ को अपने अधिकार में करने के लिए भी अपप्रणयन किया जाता है । यही अपांप्रणयन की दूसरी उप-पात्त है ॥१२ ॥

‘ कस्त्त्वा युनक्ति, स त्त्वा युनक्ति, कस्मै त्त्वा युनक्ति, तस्मै त्त्वा युनक्ति ' इस मन्त्र से ‘ अपां-प्रणयन ' किया जाता है | इस मन्त्र का नाम ' अनिरुक्त व्याहृति ' है । " कौन तुझारा योग करता है?, वही १७८

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शतपथब्राह्मण तुह्मारा योग करता है । किस के लिए तुम्हारा योग करता है?, उसके लिए तुझारा योग करता है " मन्त्र का यही अर्थ है | कौन, वह, किसके लिए, उसके लिए, ये व्यवहार सर्वथा अनिरुक्त हैं । चारों हीं शब्द परोक्षभाव का प्रतिपादन कर रहे हैं । जैसे गुप्तचर विभाग का मनुष्य ( गुप्तचर ) अपने एक दूसरे सहयोगी को साधारण जनता से छिपाने के लिए परोक्षभाव से सांकेतिक भाषा को अपना कर किसी विषय को समझाता है, ठीक वही भाव ‘ कस्त्त्वा युनक्ति ' इस मन्त्र में है । मन्त्र में किसी देवता के नाम का प्रत्यक्षरूप से उल्लेख नहीं है । अतएव इसे प्रजापति का प्रतिपादक माना जाता है । जिसप्रकार आधिभौतिक जगत् में राजतन्त्र है, उसी प्रकार प्रकृति में भी राजतन्त्र है । प्राकृतिक शासनसत्ता राजतन्त्र पर प्रतिष्ठित है । सम्पूर्ण प्रकृति-मण्डल का एक अधिपति है । उसी को ' ईश्वर ' कहते हैं । सम्पूर्ण प्रजा पर वह शासन करता है । सब का निग्रह, अनुग्रह करना उसी के हाथ में है, अतएव उस विश्वेश्वर को ' प्रजापति ' कहा जाता है । ब्रह्माण्ड के चर अचर सत्रका प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण वही है । उसी से सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है, उत्पन्न होकर उसी पर प्रति-ष्ठित रहता है, अन्त में उसी में विलीन होजाता है । उस प्रजापति का राष्ट्र यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है । राष्ट्र के गर्भ में रहने वाली प्रजा के नाम, रूप, कम्र्म्म, तीनों ही नियत हैं । जिसप्रकार जिस सम्पत्ति का कोई भी स्वामी नहीं रहता, वह सम्पत्ति राजा की समझी जाती है, उसीप्रकार जिन शब्दों से किसी व्यक्ति का ग्रहण नहीं होता, उन शब्दों से प्रजापति का ही ग्रहण होता है । कः, सः, कस्मै, तस्मै, इत्यादि शब्द ऐसे ही हैं । इनसे किसी व्यक्ति का बोध नहीं होता | अत: - ' जो किसी का नहीं, वह राजा का ' इस न्याय के अनुसार ऐसे अनिरुक्तशब्द प्रजापति के नाम मान लिए जाते हैं । अत: वेद में जहाँ जहाँ ' क ' ' स ' आदि शब्द आवें, वहाँ वहाँ ( कोई विशेष विधान न हो तो ) प्रजापति ही अभिप्र ेत समझना चाहिए । अतएब ' कस्मै देवाय हविषा विधेम ' इसका ' प्रजापति के लिए हविः स्थापन करते हैं ' यह अर्थ किया जाता है । प्रजापति को छोड़कर जितने भी नाम हैं, उनके लिए ' नाम ' शब्द का ही प्रयोग होता है, परन्तु प्रजापति के नाम के लिए ‘ व्याहृति ' शब्द का प्रयोग होता है | तात्पय्यं दोनों का एक ही है । ' भोजन कीजिए, काँसा आरोगिए, दोनों का तात्पर्य्यं एक ही है । गलाध: करणानुकूल व्यापार दोनों में समान है । तथापि ' भोजन कीजिए ' यह वाक्य साधारण मनुष्यों के लिए प्रयुक्त होता है, एवं ' काँसा आरोगिए ' यह वाक्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है । वैसे ही प्रजापति के नाम के लिए ' व्याहृति ' शब्द नियत है । ‘ मघवा इन्द्र का नाम है ' इस वाक्य में नाम के लिए नाम ही प्रयुक्त हैं । किन्तु ' क प्रजापति का नाम है ' यह कहना होगा, तो ‘ क प्रजापति की व्याहृति है ' यह कहा जायगा । अव्यय, षोडशी, सच्चिदानन्द, विश्वेश्वर, आदि भी प्रजापति के नाम है । एवं- कः, सः, कस्मै, तस्मै, इत्यादि नाम भी प्रजापति के नाम हैं । दोनों में पूर्व के नाम निरुक्त हैं, उत्तर के नाम अनिरुक्त हैं । इसप्रकार निरुक्त निरुक्त भेद से प्रजापति-सम्बन्धिनी व्याहृति ( नाम ) भी अनिरुक्त, निरुक्त दो प्रकार की होजातीं हैं । ' कस्त्त्वा युनक्ति ' इत्यादि मन्त्र अनिरुक्त प्रजापति का वाचक है । श्रतएव इस समूचे मन्त्र को ' अनिरुक्त व्याहृति ' कहा गया है । इस अनिरुक्त व्याहृति से ही ‘ अपां प्रणयन ' किया जाता है । निरुक्तन्याहृति से प्रणयन करने से विशेष तात्पर्य्य सिद्ध होता है, जिसका प्रतिपादन कर देना असंगत न होगा । प्रजापति के अनन्त रूप हैं । उन अनन्त रूपों का श्रनिरुक्त, उद्गीथ, सर्व, इन तीन स्वरूपों में अन्तर्भाव होजाता है । इन तीनों में जो अनिरुक्त प्रजापति है, वही मूलतत्त्व है । अनिरुक्तप्रजापति ही १७६

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प्रथमकाण्ड उद्गीथ प्रजापति है, अनिरुक्त प्रजापति ही सर्वप्रजापति है । प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई केन्द्र अवश्य होता है । उस केन्द्र में रहने वाला जो अक्षर - तत्त्व है, जिसका कि स्वरूप ' ब्रह्मवरणोपपत्ति ' प्रकरण में विस्तार के साथ बतला दिया गया है, उसी का नाम अनिरुक्त प्रजापति है । हृदय ही उसका स्वरूप है । जिसका वाणी से निर्वचन नहीं हो सकता, उसे अनिरुक्त कहा जाता है । हृद्य प्रजापति का कथमपि वाणी से स्वरूप नहीं बतलाया जासकता | इस हृदयबिन्दु को समझाने के लिए कागज पर जो बिन्दु बनाई जाती है, वह भी सर्वथा मिथ्या ही है, समझाने के लिए उपासना की भाँति भावमयी प्रतिमामात्र है । क्योंकि इस बिन्दु में भी केंन्द्र है | क्योंकि केन्द्रबिन्दु का अभिनय कथमपि नहीं हो सकता, अतएव हम अवश्य ही हृदयरूप प्रजापति को अनिरुक्त प्रजापति कहसकते हैं । इस केन्द्र प्रजापति से ही अग्नि - सोम के द्वारा वस्तुपिण्ड, और उस पिण्ड की महिमा, दोनों का निर्माण होता है । जिसे श्राप वस्तुपिण्ड कहते हैं, वह स्पृश्यपिण्ड है । आप इसका प्रत्यक्ष नहीं कर सकते । प्रत्यक्ष महिमामण्डल का ही होता है । पिण्ड जितने भी हैं, सब के सत्र सोमगर्भित अग्निमय हैं । अग्नि-मर्त्य, अमृत भेद से दो प्रकार का होता है । मर्त्याग्नि को वैदिक परिभाषानुसार ' चित्याग्नि ' कहा जाता है, एवं अमृताग्नि को ' चितेनिधयाग्नि ' कहा जाता है । चित्य से पिएड बनता है, चितिनिधेय से महिमा बनती है । एक वस्तु सामने रख लीजिए, एवं उस पर दृष्टि डालिए । उस वस्तु को अपने नियत स्थान पर रहने दीजिए, एवं उस पर दृष्टि रखते हुए - आप उससे पीछे हटते जाइए । जितने आप पीछे हटते जायगे, उत्तरोत्तर वह वस्तु क्रमशः छोटे रूप में दिखलाई देने लगेगी । अन्ततोगत्वा एक ऐसा स्थान आवेगा, जहाँ पहुँचने के अनन्तर वह वस्तु बिन्दुमात्र ही दिखाई देगी । यदि उस स्थान से श्राप और भी पीछे हट जायँगे, तो उस वस्तु का दीखना ही बन्द हो जायगा । जिस स्थान पर खड़े रहने से वस्तुपिण्ड आपको त्रिन्दुमात्र दिखलाई देरहा है, आप उस स्थान पर खड़े हो जाइए । वहाँ खड़े होकर उस वस्तु पिण्ड को केन्द्र बनाते हुए अपने स्थितिस्थान से एक गोलमण्डल बनाइए । इसी मण्डल का नाम ' महिमामण्डल ' होगा । यहाँतक वस्तु श्रभिव्याप्त रहती है । वस्तु अभिव्याप्त नहीं रहती, वस्तु की महिमा अभिव्याप्त रहती है । इसी को हम देख रहे हैं । यह महिमामण्डल पिण्ड के बाहिर रहता है, अतएव इसे बहिर्मण्डल कहा जाता है । इस बहिर्मंण्डल में वही प्राणरूप चितेनिधेयाग्नि भरा हुआ है । जिसप्रकार हिसाब सबझने के लिए वृत्त ( सर्किल ) मात्र के ३६० अंश मान रक्खे हैं, तथैव वैज्ञानिक भावों को समझने के लिए इस महिमामण्डल के ३३ विभाग मान रक्खे हैं । यह विभागव्यवस्था निरी कल्पना ही है - यह बात नहीं है, इस कल्पना में भी विशेष तथ्य है । १००० गौ विभाग किए जाते हैं । महिमा -होता है । इसप्रकार ६०, ६० गौ वाँ प्रजापति कहलाता है । उन ३३ इस विषय का विषद विज्ञान हम आगे केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, चितेनिधेय प्राण भरा रहता है । इसके के आधार पर - ३०, ३०, गौ का एक एक विभाग मान कर ३३ मण्डल में एक हजार गौ रहतीं हैं । ३०, ३०, का एक एक विभाग में ३३ त्रिभाग हो जाते हैं । - १० गौ शेष बच जातीं हैं, यही ३४ विभागों को ‘ अहर्गण ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । आने वाले ‘ वषट्कार ' निरूपण में बतलाने की चेष्टा करेंगे । यहाँ वस्तु के चाहिर वस्तु का मण्डल रहता है, एवं उस वस्तुमण्डल में ३३ विभाग हैं । ३३ के बाहिर १० गौ बच जातीं हैं, वही ३४ वाँ निरुक्लप्रजापति है । इस ३४ वें प्रजापति १८०

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शतपथब्राहाण के उदर में सम्पूर्ण प्रपञ्च है, अतएव इसे ' सर्वप्रजापति ' कहा जाता है । एक प्रजापति केन्द्र में है, एक प्रधि में है । एक इस छोर में है, एक उस छोर में हैं । कहने को दो है । जो इस छोर में है, वही उस छोर में है । वस्तु के चाहि जो ३३ अहर्गण का एक मण्डल है, उसका एक स्वतन्त्र केन्द्र और बनता है । वह केन्द्रबिन्दु १७ वें अहर्गण पर पड़ती है । यह तीसरा प्रजापति है । बहिर्मंण्डल को दोनों ओर से समान रूप से प्रति-ष्ठित रखना इसी प्रजापति का काम है । १७ वें स्थान पर रहने के कारण हीं इसे ' सप्तदशप्रजापति ' कहा जाता है । इसी को ‘ उद्गीथप्रजाप्रति ' कहते हैं । इसप्रकार वस्तुपिण्ड, और महिमामण्डल, दोनों में निरुक्त, उद्गीथ ( सप्तदश ), एवं सर्व ( चतुस्त्रिंश ), तीन प्रजापतियों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में ( वह चाहे जड़ हो, अथवा चेतन हो, ऋणु हो अथवा महान् हो ) तीनों प्रजापतियों की सत्ता । यज्ञका नाम हीं संसार । संसार अग्नीषोमात्मक है । अग्नि सोम के समन्वय का ही नाम यज्ञ । अतएव अवश्य ही संसार को यज्ञस्वरूप कहा जासकता है । उसी अनिरुक्त ईश्वर प्रजापति से अग्नीषोम के द्वारा सम्पूर्ण विश्व चना है । विश्त्रयज्ञ का निर्माण कर विश्वरूप में परिणत हो वही अनिरुक्त प्रजापति श्राज निरुक्त बन गया है । निराकार ही साकार हो गया है । अभीतक जोक, स, आदि अनिरुक्त नामों से व्यवहृत होता था, वही विश्वयज्ञ से युक्त हो ग्राज विश्वेश्वर, जगदाधार, जगन्नियन्ता, आदि निरुक्तव्याहृतियों से व्यवहृत होने लग पड़ा है | आप विश्व में जो कुछ देखते हैं, वह सब प्रजापति ही है । सर्वप्रजापति का ही आप प्रत्यक्ष कर रहे हैं | इसी विज्ञान के आधार पर ' सर्वमुह्ये वेदं प्रजापतिः ' ( सब कुछ प्रजापतिही है ) यह कहा जाता है । प्रजापति ही कर्त्ता है, वही कारण है । कर्त्ता के अभिप्राय से उसी के लिए ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वमसृजत-यदिदं किंच ' ( जो कुछ ‘ है ' कह कर व्यवहृत करने योग्य है - उस सम्पूर्ण प्रपञ्च को प्रजापतिने ही उत्पन्न किया है ) यह कहा जाता है । यज्ञ का मूलाधार प्रजापति निरुक्त प्रजापति ही है । यदि प्रजापति है, तो यज्ञ है, अन्यथा यज्ञका अभाव है । इसीलिए तो अपांप्रणयन से भी पहिले इस वैधयज्ञ में वेदि के दक्षिणभाव में ब्रह्माको प्रतिष्ठित किया जाता है । अपांप्रणयनकर्म्म करता हुआ अध्वर्यु यज्ञ प्रारम्भ करने वाला है । यज्ञ के अधिष्ठाता सर्वप्रजापति में अनिरुक्त है, अनिरुक्त प्रजापति, और । मूल तूल में सर्व है । अभी यज्ञ का मूलभूत अपांप्रणयनकर्म्म ही प्रारम्भ हुआ है । जत्र यज्ञ पूरा होजायगा, तत्र सर्वप्रजापति का उदय होगा । अभी तो यज्ञ के मूलभूत अनिरुक्तप्रजापति की ही सत्ता है । अतएव अनिरुक्तव्याहृतियों से प्रणयन करना उचित है । प्रजापति यज्ञ का उपादान है । मृद्घटवत् कारणं कार्य्य से भिन्न है । अतएव प्रजापतिको भी यज्ञ कहा जासकता है | ऐसी अवस्था में अनिरुक्तव्याहृतियों से अपप्रणयन करना प्रजापतिरूप यज्ञ को ही प्रारम्भ करना है । यदि उपांशुरूप से ( चुपचाप ) ही अपप्रणयन कर लिया जायगा, तो ' ब्रह्मवै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' इस श्रुतिप्रमाण से सिद्ध प्रतिठारूप प्रजापति के प्रभाव से यज्ञ कथमपि प्रतिष्ठित नहीं होगा | श्रुतः यज्ञकी प्रतिष्ठा के लिए अनिरुक्तप्रजापति को आधार बनाना आवश्यक है । एतदर्थ - अनिरुक्त-व्याहृतियों से ही श्रपांप्रणयन करना उचित है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अनिरुक्तो वै प्रजापतिः । प्रजापतिर्यज्ञः । तत् प्रजापतिमेवैतद्यज्ञं युनक्ति ' यह कहा गया है । अपांप्राणयन क्यों करना चाहिए १, इस प्रश्न की यही तीसरी उपपत्ति है ॥ १३ ॥

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प्रथमकाण्ड अपिच - पानी से सम्पूर्ण विश्व अभिव्याप्त है । सम्पूर्ण विश्व में पानी हीं पानी भरा हुआ है । विश्व में पानी भरा हुआ है, यही नहीं अपितु स्वयं विश्व भी आपोमय ही है । सातों लोक श्रापोमय हैं, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । जिसे साधारण यथाजात मनुष्य पानी कहते हैं, प्रकृत में पानी शब्द से, वह स्थूल पानी अभिप्रेत नहीं है । अपितु यहाँ पानी से ' ऋततत्त्व ' ही अभिप्रेत है । यह ऋततत्त्व श्रापोमय परमेष्ठी का ‘ मनोता ’ है । वास्तविक पानी तो यही ऋततत्व है । भृगु और अङ्गिरा, यही उसका स्वरूप है । दोनों में से भृगु की जो घन, तरल, विरल, ये तीन अवस्थाएँ हैं, उन्हीं को क्रमशः आपः, वायु, सोम, इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । तीनों में जो श्रापः हैं, वह भी वायुरूप है, परन्तु स्थूल पानी का प्रारम्भ होने से इसे ' आपः ' कह दिया जाता है । सूर्य्य से ऊपर अपना प्रभव रखने वाले इसी श्राप: को ' अम्भः ’ कहा जाता है । पुराणों में सूर्य्याण्ड को एक ब्रह्माण्ड माना गया है । यह अम्भः पानी इस ब्रह्माण्ड का भेदन कर हमारे पृथिवीलोक में आता है । गङ्गाजल में यही अम्भः पानी है । यह है यद्यपि सर्वत्र, सभी पानियों में । परन्तु गङ्गाजल में सबसे अधिक मात्रा में है । अतएव गङ्गाजल के लिए ' ब्रह्माण्ड फोड़कर पृथिवा लोक में भागीरथी आई है ' यह कहा जाता है । आपोमय परमेष्ठी विष्णुस्थान कहलाता है । वहीं से इस गङ्गाजल का आगमन होता है । अतएव इसका प्रादुर्भावस्थान बिष्णुचरण बतलाया जाता है | कहना यही है कि, इस अम्भ पानी के, और परमेष्ठी में रहने वाले पवमान वायु के मेल से ( रासायनिक संयोग से ) स्थूल पानी उत्पन्न होता है । इस श्रम्भः पानी के समुद्र को ' ऋतसमुद्र ' कहते हैं । इसी का नाम परमेष्ठी है । रसमय होने से इसी आपोमय परमेष्ठी को ' सरस्वान् ' कहा जाता है । सरस्वान् के सम्बन्ध से हीं परमेष्ठी - मण्डल की वाक् ' सरस्वती ' कहलाती है । वायु, सोम, आदि इतर ऋतपदार्थ भी इसी परमेष्ठीरूप ऋतसमुद्र में रहते हैं । न केवल ऋत ही, अपितु सत्य भी ( पिण्ड भी ) इसी ऋत के उदर में रहता है । सत्य का स्वरूप पूर्व के प्रकरण में बतलाया जाचुका है । सकेन्द्र सशरीरी वस्तुका नाम हीं ' सत्य ' है । फलतः पिण्डका सत्य होना सिद्ध होजाता है । इस सत्यपिण्डका स्वरूप ऋतपरमेष्ठी से ही बनता है । सत्य सदा ऋत से आवृत रहता है । सत्य के चारों ओर जबतक ऋत है, तभीतक सत्य सत्य है । ओर तो ओर, स्वयंम्भूसत्य भी ऋत श्रावृत रहता । अतएत्र इस ऋतंतत्त्व को सृष्टि का मूलकारण माना जाता है | सब के बाहिर ऋत है | ऋतकों लाँघने की शक्ति किसी में नहीं है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदभगवान् कहते हैं—

ऋतमेव परमेष्ठी ऋतं नात्येति किञ्चन ।

ऋते समुद्र आहित ऋते भूमि - ( सत्यपिण्ड ) - रियं श्रिता ॥

— गोपथब्राह्मण इसीलिए ‘ ऋतञ्च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ० ' इत्यादि सृष्टिप्रतिपादिका श्रुति ऋऋ॒त— तत्त्व को पहिला स्थान देती है । सत्यका स्वरूप ऋत पर निर्भर है, एवं सत्य सदा ऋत से आवृत रहता है । यह केवल कहना हीं कहना नहीं है, यह विज्ञान केवल शब्द प्रमाण पर ही प्रतिष्ठित नहीं है । अपितु इस विज्ञान की विज्ञानता प्रत्यक्षप्रमाण पर भी अवलम्बित है । पिण्ड के बाहिर चारों ओर रिक्त स्थान रहता है । इसमें प्राणरूप भृगु ( आपः, वायु, सोम ) व्याप्त रहता है । वायु भी भृगु है, पानी भी भृगु है, एवं सोम भी भृगु १८२

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शतपथब्राह्मण है । आपः और सोम को छोड़िए । शेष बचता है वायु । रिक्त स्थान में यह ऋत वायु भरा रहता है, यह तो सामान्य मनुष्य भी जानते हैं । ऐसा कोई भी सत्यपिण्ड नहीं है, जो इस ऋतवायु से वेष्टित न हो । अतएव ' ऋतं नात्येति किंचन ' इन स्पष्ट शब्दों में ऋत की व्यापकता बतलाई जारही है । यदि रिक्त स्थान न ' हो, तो वस्तु का स्वरूप ही न बने । आँख मीच लीजिए, और एक वस्तुपर हाथ रखिए । हाथ को वस्तुपर फेरिए । जहाँ वस्तु की अन्तिम सीमा होगी - वहाँ जाकर हाथ रुक जायगा । इसीप्रकार चारों ओर की सीमापर हाथ रुक जायगा । इसी स्पर्शानुमान से आपको, ( और एक अन्धेको भी ) वस्तु के स्वरूप का ज्ञान होजाता है । मान लीजिए, वस्तु के चारों ओर रिक्त स्थान नहीं है । अन्धा हाथ फेरता जारहा है । किन्तु वस्तु का अन्त ही नहीं आता है । ऐसी अवस्था में त्रिकाल में भी वस्तु के स्वरूप का उसे ज्ञान न होगा । अयं घटः, अयं पटः, अयं मठः, आदि वस्तुज्ञान रिक्त स्थान पर ही निर्भर है । इसीका नाम ऋत है । इसमें रहने वाला वायु भी ऋत है । इसी से सत्यपिण्ड श्रावृत रहता है । अपिच- प्रत्येक पिण्ड के बाहिर उसी पिण्ड से सम्बन्ध रखनेवाला एक वायुस्तर रहता है । उसी वायुस्तर के चापन ( दबाव ) से उस वस्तुपिण्ड की सत्ता है । पृथिवीपिएड के चारों ओर भी यह वायु है । इसी को ' भूवायु ' कहा जाता है । एवं पुराणपरिभाषानुसार इसी भूवायु को ' एमूज़वराह ' कहा जाता है । पृथिवीपिण्ड अग्निका गोला है । अग्नि विशकलनधर्म्मा है । अतएव यह प्रतिक्षण पृथिवीपिण्ड के खण्ड खण्ड करने की चेष्टा कर रहा है । परन्तु उस वराह के दबाव से अग्निका बल अभिभूत होजाता है । अतएव पिण्डका कुछ नहीं बिगड़ता । पृथिबीपिण्ड की रक्षा करना इसी वायुस्तर का काम है, अतएव इस एमूषवराह को पृथिवी का उद्धार करने वाला बतलाया जाता है । उदाहरणमात्र है । पिण्डमात्र के बाहिर उस उस पिण्ड का एक एक प्रातिस्विक वायुस्तर अवश्य ही रहता है । यह वायु भार्गव है । अतएव इसे ' शिव ' कहा जाता है । रुद्रवायु इस शिववायु का विच्छेदक है । यदि रुद्रवायु प्रत्रलरूप से इस ऋत शिववायु पर आक्रमण कर देता है, तो यह शिववायुस्तर छिन्नभिन्न होजाता है । ऋतवायु के आधार पर रहने वाला सत्य उस ऋत के परा: पराबत होजाने से उसी क्षण विलीन होजाता है । इसप्रकार पूर्व के कथन से तत्त्व की व्यापकता भलीभाँति सिद्ध होजाती है । अपिच - हमने ब्रह्मप्रजापति के प्राण, आप:, वाक्, अन्नान्नाद, ये चार मुख बतलाए हैं । इन चारों मुखों में जो दूसरा आपोमुख है, उसी से लोकसृष्टि होती है, जैसाकि पूर्व में बतलाया गया है | भूः, भुत्रः, स्वः, महः, ननत्, तपः, सत्यम्, ये सातों लोक पोमुख से उत्पन्न होने के कारण आपोमय हैं । न केवल लोकसृष्टिं ही, अपितु लोकमें रहनेवाली प्राणी - सृष्टि का भी प्रभव ये ही ऋत पानी हैं । पानी से अन्न उत्पन्न होता है | अन्न जत्र खाया जाता है, तो उससे रसाङमांसादि के क्रमसे ' शुक्र ' बनता है । इसी शुकाहुति से सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं । शुक्र पानी है । यही उपादान है । छांदोग्य, एवं बृहदारण्यकोपनिषत् में भी यह सिद्धान्त कर दिया गया है कि, पानी से ही पुरुष ( प्राणिमात्र ) की उत्पत्ति होती है । ' वेत्थ यथा पञ्चम्या-माहुतावापः पुरुषबचसो भवन्ति ' ( प्रवाहण महर्षि अरुण महर्षि के पुत्र श्वेतकेतुसे पूछते हैं कि, हे श्वेतकेतो! यदि तुम जानते हो, तो बतलाओ – पाँचवीं आहुति में पानी पुरुष कैसे कहलाने लगता है?, अर्थात् पानी पुरुष कैसे बन जाता है? ) इस प्रश्न के समाधान में - ' द्यु, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष, योषा, इन पाँचों अग्नियों में क्रमशः ' श्रद्धा ' पुरुषरूप में परिणत होजाती है । श्रद्धा को ही पानी कहते १८३

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प्रथमकाण्ड हैं । यही श्रद्धापानी क्रमशः रेतोरूप में परिणत होकर योषाग्नि ( स्त्री के गर्भाशय के रुधिरगत अग्नि ) में आहुत होकर पुरुष का उपादान बनता है ' यह बतलाकर अन्त में प्रकरण का उपसंहार करते हुए ‘ इति तु पञ्चम्यामाहुतात्रापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( इस पूर्व प्रदर्शित क्रमके अनुसार पाँचवीं श्राहुति में पानी पुरुष नाम से व्यहृत होने लगता है, ( छान्दोग्य उप ० ५।३२, एवं बृ ० प्रा ० उप ० ६।२ । ) यह कहा गया है । यहाँ के पुरुष शब्द को प्राणी मात्र का उपलक्षण समझना चाहिए | इसी अभिप्राय से ‘ पुरुष एवेदं सर्वम् ' यह कहा जाता है । अपिच - शरीर की ओर दृष्टिपात करते हैं, तो वहाँ भी पानी का भाग ही अधिक मात्रा में उपलब्ध है । हमारे पृथिवीलोक में एक भाग पृथिवी है, तीन भाग पानी M | स्वयं पृथिवी भी पानी है । अतएव पृथिवी को पुष्करपर्णं * कहा जाता है, एवं पानी को ही पुष्करपर्ण करते हैं । जहाँ देखो, वहीं पानी का साम्राज्य है । ' पानी सर्वत्र व्याप्त होरहा है ' इसमें इससे अधिक और क्या प्रमाण हो सकता है । स्वयं ' आपः ' शब्द ही अपनी व्या-पकता प्रकट कर रहा है ÷ । श्राप्लृ व्याप्तौ से आपः शब्द बना है । सर्वत्र व्याप्त रहने के कारण हीं इस का नाम ‘ आपः’है । अतएव ‘ सर्त्रमापोमयं जगत् ' X यह कहा जाता है । इसप्रकार सबसे पहिले अपांप्रणयन करता हुआ । अध्वर्यु ' सर्वत्र व्यापक इस पानी से भावना के द्वारा प्रथम हीं कर्म से सबकुछ प्राप्त करलेता है । इस कर्म्म से त्रैलोक्य पर यजमान का आत्मा प्राप्त होजाता है । सम्पूर्ण सम्पत्ति पर इसका अधिकार होजाता 1 इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर - ' अद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् । तत् प्रथमेनेवैतत् - कर्म्मणा सर्वमा-प्नोति ' यह कहा गया है । पांप्रणयन कर्म्म की यही चौथी उपपत्ति है || १४ ॥ पिच - पूर्व में बतला दिया गया है कि, प्रकृतियज्ञ के आधार पर ही इस वैधयज्ञ का वितान किया जाता है । प्रकृतियज्ञ के अधिष्ठाता अग्नि, वायु, आदित्यादि प्राणदेवता हैं । सभी देवता प्रारणरूप हैं, प्राण मौलिकतत्त्व होने से सूक्ष्मतम है, अतएव अप्रत्यक्ष है, अदृष्ट है । उनके आधार पर होने वाला प्राकृतिक यज्ञ भी अस्मदादि स्थूलबुद्धियों की दृष्टि में अप्रत्यक्ष ही है । इस यज्ञविद्या के प्रथम प्रवर्त्तक भौम-स्वर्गवासी मनुष्य देवता थे, जिनका कि स्वरूप आगे आने वाले ऐतिहासिक प्रकरणों में बतलाया जायगा |

* यद्वेव पुष्करपर्णमुपदधाति - प्रतिष्ठा वै पुष्करपर्णम् ।

इयं ( पृथिवी ) पुष्करपर्णम् । इयमु वै प्रतिष्ठा ॥

- शतपथ ७ | ४ | १ | १२ सोऽपोऽसृजत - वाच एव लोकात् । वागेवास्य सा - असृज्यत । सा - इदं सर्वमाप्नोत् यदिदं किञ्च । यदाप्नोत् तस्मादापः । यदवृणोत् - तस्मात् - वाः ( वारि ) ।

X अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः ।

आपोमयाः सर्वरसाः - ' सर्वमापोमयं जगत् ' ॥

- शतपथ ६ | १ | १ | ६ | -महाभारते १८४

पृष्ठ 448

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शतपथब्राह्मण भारतीय महर्षियोंनें अपने ज्ञानबल के प्रभाव से इन्हीं भुवनस्वर्गवासी मनुष्यदेवताओं से बड़े परिश्रम के द्वारा यह अलौकिक यज्ञसम्पत्ति प्राप्त की थी । साक्षात्कृतधर्म्मा महर्षियोंनें वैधयज्ञसम्बन्धिनी जो पद्धति चलाई थी, उसी के आधार पर आज ये सम्पूर्ण यज्ञ किए जाते हैं । यह वैधयज्ञ प्रकृतिसिद्ध नित्ययज्ञ की प्रतिकृति है । तएव ब्राह्मणग्रन्थ जिन विषयों की उपपत्ति ( विस्तारभयात् ) नहीं बतलाता है, एवं उपपत्ति न देखकर जो इतर सम्प्रदाय वाले उस पर आक्षेप कर बैठते हैं, अथवा उस में संशोधन करना चाहते हैं - उनका धोर विरोध करता हुआ ' यद्वै देवा अकुर्वं स्तत् करवाणि ' । ( जो कुछ देवताओंोंनें किया है, मैं वैसा ही करूँ ) यह मर्य्यादावचन सामने रखता हुआ उस कर्म्म का पद्धति के अनुसार ज्यों का त्यों करने का आदेश देता है । कारण इसका यही है कि, हम साधारण मनुष्य सभी वैज्ञानिक उपपत्तियाँ समझने के अधिकारी नहीं हैं । ऐसी अवस्था में विदितवेदितव्य महर्षियोंनें हमारे लिए जैसी पद्धति बनादी हैं, उसके आधार पर चलने में हीं ( पद्धतिग्रन्थों के - ब्राह्मणग्रन्थों के अक्षर अक्षर मानने में हीं ) हमारा अभ्युदय है । ' यज्ञ से हवा फिल्टर होती है - यज्ञ से सम्पूर्ण कीटाणु मारे जाते हैं ' ऐसी ऐसी कपोल-कल्पित उपपत्तियों को आगे रख कर यज्ञिय द्रव्यों में केसर, कपूर, कस्तूरी, आदि कल्पित पदार्थों का सन्निवेश कर नई पद्धतियों के चना डालने का साहस करना घोर अनर्थ है । जो ऐसा करते हैं, एवं जो मनुष्य ऐसे कल्पित मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे वैदिक सभ्यता के, वेदग्रन्थों के, एवं वेदग्रन्थों के द्रष्टा पूज्य महर्षियों के घोर शत्रु ही हैं । ऐसे ही महाशयों की कृपा से आज हमारा भारतं. ' भाहत ' होता जा रहा है । अतः अपनी सभ्यता का अभ्युदय चाहने वालों को प्राचीन महर्षियों के द्वारा निर्मित पद्धतियों का ही अनुसरण करना चाहिए | कहना यह ही है कि, यशकर्त्ता यजमान, एवं दक्षिणाक्रीत अध्वर्यु, अग्नीध्र, होता, उद्गाता, ब्रह्मा, आदि यज्ञ के ऋत्विक, सभी अपनी समझ में पद्धति के अनुसार बहुत सोच समझ कर ही काम करते हैं । तथापि ये सत्र मनुष्य हैं । मनुष्य स्वभावत: असत्यसंहित होता है, जैसाकि पूर्व में बतला दिया गया है । ऐसी अवस्था में इन सभी याज्ञिक मनुष्यों से भूल हो जाना स्वाभाविक है । यदि इन में से कोई भी मनुष्य किसी कर्म्म को भूल से छोड़ जाता है, अथवा उसके स्वरूप में परिवर्तन कर देता है, तो यज्ञसन्तान विच्छिन्न होजाती है । इसका प्रभाव वैधयज्ञ के द्वारा उत्पन्न होने वाले नवीन यज्ञपुरुष ( दिव्यात्मा ) पर होता है । यहाँ विच्छेद हो जाता है, तो उसका स्वरूप भी विच्छिन्न हो जाता है । इस से कृत, और कारित ( किया कराया ) सम्पूर्ण कर्म्म व्यर्थ चला जाता है । इस दोष की निवृत्ति के लिए भी महर्षियोंनें यज्ञ के प्रारम्भ में सब से पहिले अपांप्रणयन कर्म्म रक्खा है । पानी यज्ञस्वरूप है, सर्वत्र व्याप्त है । इसके प्रणयन से यजमान को एक अवि-च्छिन्न अब्रूरूप यज्ञधरातल मिल जाता है । चटाई पर रक्खे हुए सिल पर पीसी जाने वाली पिट्ठी जैसे भूतल पर नहीं गिरती, वैसे ही यज्ञधरातलरूप अपां प्रणयन कर्म के अनन्तर यदि किसी से कोई त्रुटि भी होजाती है, तो भी कोई अनिष्ट नहीं होता । उसी अच्यज्ञ से इस यज्ञ का सन्धान ( स्वरूपसंरक्षण ) होजाता है । इस प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर भी सत्र से पहिले अपांप्रणयन किया जाता है । यही इस कर्म्म की पाँचवीं उपपत्ति है | इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रख कर - ' यद्व वास्यात्र होता वा अध्वर्युवा ० तदेवास्यैतेन ( कर्म्मणा ) आप्तं भवति ' यह कहा गया है ॥ १५ ॥

अपिच —– अपांप्रणयन करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयोजन और भी है । पूर्व में अपांप्रणयन की जितनी भी उपपत्तियाँ बतलाई गई हैं, मानलीजिए वे सब कल्पित हैं | परन्तु फिर भी हमें अपने इस वैधयज्ञ में १८५

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प्रथमकाण्ड सब से पहिले पांप्रणयन अवश्य ही करना चाहिए । कारण इसका यही है कि, हमारा यह वैधयज्ञ प्राकृतिक नित्ययज्ञ की प्रतिकृति है, जैसाकि हम पूर्व में अनेकधा कह चुके हैं । अतएव जैसा वहाँ होरहा है, हमें बाध्य होकर इस यज्ञ में वैसा ही करना पड़ता है । प्राकृतिक यज्ञ में सबसे पहिले अपां प्रणयन ही होता है । अतएव ‘ यद्देत्रा अकुर्वस्तत् करवाणि ' इस मर्य्यादा के अनुसार उपपत्तियों की छान बीन की ओर ध्यान न देकर आज्ञानुसार हमें बिना किसी नचनुच के पांप्रणयन कर ही लेना चाहिए । हम सबसे पहिले अपने यज्ञ में अपांप्रणयन क्यों करते हैं?, उसकी उपपत्ति प्राकृतिकयज्ञ ही है । अब केवल प्रश्न यह बच जाता है कि, प्राकृतिक यज्ञ में सबसे पहिले अपांप्रणयन क्यों होता है?, एवं कैसे होता है?, १६ वीं १७ वीं कण्डिकाओं में इसी प्रश्न का समाधान है । अग्नि में सोम की आहुति होने का नाम हीं यज्ञ है । और यज्ञ का यही साधारण लक्षण है । यदि आकाश की ओर हम अपनी दृष्टि डालते हैं, तो हमें प्रचण्ड ताप से विश्व को तपाते हुए भगवान् सूर्य्य के दर्शन होते हैं । इसका प्रकाश त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । यह सूर्य्यं क्या १, इसका यदि कोई उत्तर है, तो इन्द्राग्नि की समष्टि । इन्द्र, और अग्नि, दोनों के समूह का नाम हीं सूर्य्य है | यह सूर्य्य इन्द्रमय है, और अग्निमय है । इसलिए तो इसमें ताप ( गर्मी ) है । एवं इन्द्रमय है, इसलिए प्रकाश है | प्रकाश के अधिष्ठाता इन्द्र ही हैं । बिना इन्द्र के प्रकाश नहीं हो सकता । वस्तुतस्तु ‘ त्त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ ' इस श्रुतिप्रमाण से प्रकाश के अधिष्ठाता सोम हीं हैं । परन्तु सोम जबतक अग्निगर्नित इन्द्र का अन्न नहीं बन जाता, तबतक वह प्रकाश करने में सर्वथा असमर्थ रहता है । अतएव ' रूपं रूपं मघत्रा बोभवीति ’ – ‘ इन्द्रो रूपाणि करिकृदचरत् ' इत्यादि श्रुतियाँ इन्द्र को ही प्रकाश का अधिष्ठाता बतलातीं हैं । जिसप्रकार प्रकाश इन्द्र का धर्म है, एवमेव ताप अग्नि ( वैश्वानर ) का धर्म है । सूर्य में तापधर्म्मा अग्नि, और प्रकाशधर्म्मा इन्द्र, दोनों हैं । सूर्य्य में दोनों क्या हैं, दोनों की समष्टि का ही नाम सूर्य्य है । अतएव उसमें ताप भी है, और प्रकाश भी है । साधारण मनुष्यों की दृष्टि में ताप जैसे अग्नि का धर्म है, वैसे ही प्रकाश भी अग्नि का धर्म्म है | परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । ताप अग्नि का ही धर्म है, एवं प्रकाश इन्द्र का ही धर्म्म है । दोनों सर्वथा व्यवस्थित हैं । इसका प्रत्यक्ष आप चन्द्रमा में, और गरम पानी में भलीभाँति कर सकते हैं । चन्द्रमा में प्रकाशाधिष्ठाता केवल सूर्य्य का इन्द्रभाग है । अतः वहाँ प्रकाश ही प्रकाश है । चन्द्रमा की चन्द्रिका में ताप का लेश भी नहीं है । उधर दिन भर धूप में रक्खे हुए गरम पानी में केवल सूर्य्यं का अग्निभाग है । अतएव वहाँ केवल ताप ही ताप है । गरम पानी की गरमी में प्रकाश का लेश भी नहीं है । कारण इसका यही है कि, इन्द्र और वरुण दोनों प्राणदेवताओं में परस्पर घोर शत्रुता है | इन्द्र पूर्वदिशा के लोकपाल हैं, तो वरुण पश्चिमदिशा के लोकपाल हैं । दोनों की दृष्टि सर्वथा विरुद्ध है । पानी में रहने वाले अधिष्ठाता श्राप्यप्राण का नाम वरुण है । ग्राप्यप्राण ६६ जातिका है । इनमें जो सत्रका अधिष्ठाता एक अन्यतम प्राण है, उसी का नाम वरुण है, अतएव वरुण को असुरों का राजा बताया जाता है | एवं ज्योतिर्म्मय प्राण का नाम इन्द्र है । इस ज्योतिर्म्मय प्राण की ३३ जातियाँ हैं । इनमें जो अधिष्ठाता प्राण है, जिसके कि आधिपत्य में इतर सम्पूर्ण प्राणदेवता हैं, वही इन्द्र है । इन्द्र सब का अधिपति है, अतएव इसे ' यज्ञपति ' कहा जाता है । १८६

पृष्ठ 450

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शतपथब्राह्मण इन्द्र और वरुण, दोनों एक स्थान पर उसी प्रकार नहीं रह सकते, जैसे कि एक राज्य में दो दो तलवारें नहीं रह सकतीं । जहाँ वरुण है, वरुण है, अतएव यहाँ प्रकाशधिष्ठाता इन्द्र अग्नि एवं इन्द्र के सम्बन्ध से विभाग शासक शासन नहीं कर सकते, एवं जैसे कि एक कोश में वहाँ इन्द्र नहीं, जहाँ इन्द्र है, वहाँ वरुण नहीं । पानी में नहीं घुस सकता । इसप्रकार ताप और प्रकाश का, सर्वथा सिद्ध हो जाता है । ताप और प्रकाश एक ही देवता के धर्म नहीं हैं । ताप अग्नि का ही धर्म है, प्रकाश इन्द्र का ही धर्म है । सूर्य्य में दोनों का समन्वय है । इन दोनों में जो अग्निभाग है, उसे हमने अन्नाद ( अन्न खाने वाला ) बतलाया । जबतक अन्न ( सोम ) की आहुति होती रहती है, तभी -तक इस अन्नाद अग्नि की सत्ता रहती है । जिस दिन आहुतिक्रम बन्द हो जायगा, सौर अग्नि सर्वथा नष्ट हो जायगा । इस सौर अग्नि को हम सदा ही प्रज्वलित देखते हैं । अतएव मानना पड़ता है कि, अवश्य ही इस अन्नादाग्नि में अन्न की आहुति हो रही है । यदि आहुति न होती, तो सूर्य कभी का नष्ट हो गया होता । क्योंकि सौराग्नि में अन्न की आहुति हो रही है, एवं इस आहुतिक्रम का नाम हीं यज्ञ है, अत: इस सौर-मण्डल को हम अवश्य ही यज्ञमण्डल कह सकते हैं । इस सूर्य्य में जिस अन्न की आहुति होती है, उसका नाम है पारमेष्ठ्य सोम । पाठकों को स्मरण होगा कि, हमने सूर्य्यं के ऊपर परमेष्ठीमण्डल की सत्ता बतलाई थी । जैसे सूर्य्यपिण्ड पृथिवी के ऊपर है, वैसे ही परमेष्ठीपिण्ड सूर्य के ऊपर है । एवं जैसे पृथिवीपिण्ड सूर्य्यपिण्ड के महिमामण्डल के उदर में ( इसी महिमामण्डल को पृथिवी के महिमामण्डल की अपेक्षा बहुत बड़ा होने के कारण बृहत्साम कहा जाता है ) यत्त्कञ्चित् से स्थान में यह छोटासा पृथिवीपिण्ड समा रहा है, वैसे ही उस महाविशाल पोमय परमेष्ठी - पिण्ड के महिमामण्डल के अल्पप्रदेश में महिमा - मण्डल विशिष्ट सूर्य भुक्त होरहा है । पृथिवी से अनेक सहस्र - गुणित बड़े सूर्य के सामने जो प्रतिष्ठा इस छोटे से पृथिवीपिण्ड की है, उस अनन्त पारमेष्ठ्य समुद्र के सामने वही प्रतिष्ठा इस सूर्य्य की है । अतएव पुराणों में इस सूर्य को उस आपो-मय परमेष्ठी - मण्डल का एक बुदबुद ( बुलबुला ) बतलाया गया है । कहना इससे हमें यही है कि, इस इन्द्रा-ग्निमय सौरमण्डल के, दूसरे शब्दों में अग्नीषोमात्मक यज्ञमण्डल के चारों ओर पारमेष्ठ्य पानी अभिव्याप्त होरहा है | सौरसंस्था के चारों ओर जो नीलिमा दिखलाई देती है, वही वायुरूप आपोमय पारमेष्ठ्य समुद्र है | इसी में शेषशय्यापर भगवान् विष्णु सोरहे हैं । इस विषय का वैज्ञानिक विवेचन किसी ग्रागे के प्रकरण में किया जायगा । अभी केवल यही समझलेना पर्याप्त होगा कि, सूर्य के चारों ओर पानी भरा हुआ है । सूर्य्य चारों ओर से ग्राने वाले पानी के आक्रमण में आक्रान्त हो रहा है । यह पानी इस यज्ञमय सूर्य्यं को एकबार में ही अपने में लीन कर लेना चाहता है । परन्तु नहीं कर सकता, जैसाकि अनुपद में हीं बतलाने वाले हैं । सूर्य्य के चारों ओर पानी है । इस सूर्य्यं का जो प्रकाशमण्डल है, वह दृश्यमण्डल की अपेक्षा कछुए के आकार में परिणत रहता है । अतएव इस महिमामण्डल विशिष्ट सूर्य्य को ' कश्यप ' किंवा ' कूर्म्म ' कहा जाता है | यह कूर्म्मप्रजापति ( महिमाविशिष्ट सूर्य्यप्रजापति ) पारमेष्ठ्य समुद्र के मध्य में प्रतिष्ठित रहता है, इसमें निम्नलिखित श्रुति ही प्रमाण है— ' अपांगम्भन्त्सीद मा त्वा सूर्योभिताप्सीन्माग्निवैश्वानरः ' । - यजुः ० १३ | ३० मं ० इति १८७