Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 451–460
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–460
पृष्ठ 451
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड हे कश्यपप्रजापति जल की गंभीरता ( गहराई ) में आप विराजिए । सूर्य्य और त्रैलोक्य में व्याप्त वैश्वानर अग्नि आपको संताप न पहुँचावें । कश्यप का महिमाप्राण से सम्बन्ध है । अतएव सूर्य्य को उससे पृथक् माना गया है । इस मन्त्र की विशद व्याख्या शतपथ में ( ७५ । १८ ) देखनी चाहिए । इस आपोमय परमेष्ठी - मण्डल में आपः, वायु, सोम, इन तीन पदार्थों की सत्ता है । यद्यपि सत्ता अनन्त पदार्थों की है, परन्तु प्रकृत में इन्हीं तीनों से सम्बन्ध है । इन तीनों में जो आप्पप्राण है, उसे असुर कहते हैं । सौम्यप्राण पितर कहलाता है, जैसाकि पहिले बतलाया नाचुका है । इन तीनों में से सोम की इस आग्नेय सूर्य में आहुति होती रहती है । इसी आहुति से सौरप्राण प्रादुर्भूत होता है । जिस समय इस सूर्य्य में पारमेष्ठ्य सोम की अध्वर्यु नाम से प्रसिद्ध वायु के द्वारा ( प्राकृतिक नित्ययज्ञ में वायु के द्वारा ही हुति होती है, एक वस्तु को दूसरी ओर लेजाना सदागतिधर्म्मा वायु का ही काम है, अतएव इस वायु को प्राकृतिक यज्ञ का अध्वर्यु ' कहा जाता है - देखिए - तै ० ब्रा ० ३।१२६३ ) आहुति होने लगती है, उसी समय आप्यप्राणप्रधान श्रापः भाग का भी सूर्य्य पर आक्रमण होता है । सौर अग्नि के लिए दाय सोम जितना हीं उपकार है, पानी उतना हीं अपकारक है । सोम से अग्नि प्रज्ज्वलित होता है, पानी से उपशान्त होजाता है | अतएव हम इस पानी को, दूसरे शब्दों में आप्यप्राण को इन सौर श्राग्नेय प्राणदेवताओं का शत्रु कह सकते हैं । परमेष्ठी में भूतज्योति का अभाव है, अतएव वहाँ घोर अन्धकार है । आसुरप्राण को यहीं अपनी सत्ता रखने का अवकाश मिलता है । अन्धकार ही असुरों के जीवन का साधन है । इसी से यह जीवित रहते हैं । प्रकाश इनके लिए यमराज है, अन्धकार इनके लिए अन्न है - ( देखिएश ० २ | ४ | २ | ५ ) | यह तमोमय श्राप्यप्रधान श्रासुरप्राण सौरप्राणदेवताओं के सोमगर्भित श्राग्नेयमण्डल - स्वरूप यज्ञम एडल पर निरन्तर आक्रमण करते रहते हैं । जब से यज्ञ आरम्भ हुआ है, तभी से इन दुष्टों का आक्रमण प्रक्रान्त है । सृष्टि के आरम्भ से आजतक निरन्तर इनका आक्रमण हो रहा है । जैसे सोम का आना अनिवार्य है, वैसे ही इस सूर्य्य पर पारमेष्ठ्य पानी का आक्रमण होना भी अनिवार्य है । सोम अन्न है । अतः वह तो देवताओं में. हुत होजाता है । परन्तु विरोधी होने के कारण सूर्य की रश्मियों के आघात से प्राप्यप्राण इन में प्रविष्ट नहीं हो पाता । प्राण सोमाहुति के साथ ही प्रविष्ट होकर यज्ञक्रम को सहसा अवरुद्ध कर देना चाहता है, रोक देना चाहता है, इसी विज्ञान के आधार पर वैज्ञानिक महर्षियोंनें इस श्रासुरप्राण का नाम ' राक्षस ' रक्खा है । मान लीजिए -सूर्य में पारमेष्ठ्य सोम के साथ ग्राम्यप्राण आकर यज्ञ को नष्ट करना चाहता है । परन्तु सौर रश्मियां - उन दोनों ( सोम - पानी में से पहिले पानी को अपने अधिकार में कर लेती हैं । पानी का उसी स्थान में स्तम्भन कर देतीं हैं । जब सौर रश्मियों के द्वारापानी अधिकार में कर लिया आता है, तो पानी में रहने वाला आसुरप्राण भी इनके अधिकार में आजाता है । उधर प्राण के बन्धन से मुक्त होकर इस अग्नि में वह शुद्ध सोम आहुत होपड़ता है । आहुति के साथ ही यज्ञक्रम चल पड़ता है । इसप्रकार देव-ताों का यज्ञ निर्विघ्न होता रहता है । ' विषस्य विष्मौषधम् ' ( ' विष की चिकित्सा विष हीं है ', ' काँटा काँटे से ही निकलता है ' ) इस लौकिक न्याय के अनुसार आयप्राणरूप असुरों को नष्ट करने का एकमात्र उपाय पानी को अपने अधिकार में करना है । इससे सुरप्राण पर आत्मसत्ता प्रतिष्ठित होजाती है । प्राकृतिक अपांप्रणयन का यहीं स्वरूप १८८
पृष्ठ 452
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण है | यज्ञ करने से पहिले सौरप्राणदेवता श्रासुरप्राण पर अपना अधिकार प्रतिष्ठित करने के लिए पारमेठ्य पानी पर अपनी सत्ता प्रतिष्ठित कर लेते हैं । यदि उस पानी को अपने अधिकार में न किया जाता, तो यह पानी क्षणमात्र में सम्पूर्ण सौग्मण्डल को आपोमय बना डालता । क्योंकि पानी से सुरप्राण की शक्ति नष्ट होजाती है, वृत्रसोम की घनता नष्ट होजाती है । इस पानी के द्वारा आसुरप्राण का यज्ञमण्डल में प्रवेश रोका जाता | अतएव असुरों के लिए इस पानी को अवश्य ही वज्र कहा जासकता है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जा चुका है । आज उसी प्रकृतियज्ञ के आधार पर यह यजमान सबसे पहिले अपांप्रणयन करता है । इस यजमान का श्रात्मा सूर्य से बना है । इसका आत्मा प्रतिबिम्बित सूर्य्य है । ऐसी अवस्था में इसका यज्ञ करना सूर्य्य का ही यज्ञ करना है । सूर्य्यभगवान् अपने सम्वत्सरयज्ञ में सत्र से पहिले अपां– प्रणन के द्वारा असुरों को मार कर निरुपद्रव शान्त वातावरण में यज्ञ करते हैं । अतएव तत्प्रतिबिम्बभूत इस यजमान को भी सबसे पहिले अपां प्रणयन हीं करना चाहिए । यदि यह श्रपांप्रणयन न करेगा, तो सचमुच इस के श्रात्मा पर असुरप्राण आक्रान्त होजायगा, जिसका कि हम साधारण मनुष्य अपने चर्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष नही कर सकते । इस आक्रमण को रोकने का एकमात्र उपाय है ' अपांप्राणायन ' । अपप्रणयन की यही ६ ठी उपपत्ति है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' देवान् ह वै यज्ञेन यज-मानान् ० ' इत्यादि । तैत्तिरीय, मैत्रायणि. ऐतरेय, गोपथ, आदि श्रुतियों में इस अपां प्रणयन - कर्म की ओर ओर भी उपपत्तियाँ बतलाई गई हैं । विस्तारभय से उन सत्र में से केवत्र एक श्रावश्यक उपपत्ति बतला कर इस प्रकरण को हम उपरत करते हैं । तैत्तिरीय- श्रुति में पांप्रणयन की निम्नलिखित उपपत्ति बतलाई गई है— हम जो कुछ काम करते हैं, वह सम्पूर्ण महिमा प्राणदेवतओं की ही है । हमारे शरीर में जो आध्यात्मिक प्राणदेवता हैं, वे जो कुछ काम करते हैं, उसे ही हम अपना काम कहने लगते हैं । वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, एवं मन, पाँचों इन्द्रियाँ - क्रमश: - अग्नि, वायु, आदित्य, दिक्सोम, भास्वरसोम ( चन्द्रमा ) ये पाँच देवता हैं | ये ही पांचों दिव्य देवता अधिदैवत में अग्नि वायु इत्यादि नामों से व्यवहृत होने लगते हैं, एवं अध्यात्म में श्राकर ये ही वाक्, प्राण, चक्षु, आदि नामों से पुकारे जाने लगते हैं । इतर इन्द्रियों का इन्हीं पाँच इन्द्रियों में अन्तर्भाव हो जाता है, जैसा कि पहिले बतलाया जा चुका है । इन सम्पूर्ण प्राण– देवताओं को अपने अपने कर्म्म के लिए प्रेरित करने वाला जो एक श्रादित्यविशेष है, उसे ही सविता कहते हैं | प्रेरणा करना इसी सविताका काम है । यह सविता यद्यपि सूर्य्य से भी ऊपर है । परन्तु हमारी रोदसी त्रिलोकी में सूर्य्य के द्वारा ही इस सविताप्राण का सम्बन्ध होता है । अत: सूर्य को सविता कह दिया जाता है | अध्यात्म में इस सविता का सबसे पहिले हमारे मन के साथ सम्बन्ध होता है ( देखिए यजु ० सं ० ११ अ ० मन्त्र ) । मन अन्नमय होने से जड़ है । इस सविताप्राण की प्रेरणा से ही मन होने ' व्यापार लगता है, जो कि मनोव्यापार ' इच्छा ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं मन की प्रेरणा से इतर सम्पूर्ण प्राणदेवता काम करने लगते हैं । मनकी जो प्रेरणा है, वह वास्तव मन में प्रविष्ट मनोमय सविता की ही प्रेरणा है | अतएव ' सविता वै देवनां प्रसविता ' यह कहा जाता है । यह मन सोममय है । सोम परमेष्ठी की वस्तु है । पारमेष्ठ्य पानी की विरलावस्था का नाम हीं सोम है, जैसा कि पहिले बतलाया जा चुका है । १८६
पृष्ठ 453
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड इस पानी का नाम हीं श्रद्धा है । श्रद्धापानी की दूसरी अवस्था का नाम हीं ' सोम ' है । जबतक इस मन में श्रद्धाभाव का उदय नहीं होता, तत्रतक किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती । पुरुष श्रद्धामय हैं । उधर पानी श्रद्धा है । यदि यज्ञ के प्रारम्भ में पानी का सम्बन्ध हो जाता है, तो पुरुष का श्रद्धाभाव सजातीय - बन्धन के प्रभाव से जाग्रत हो पड़ता है । इससे श्रद्धा प्रबल हो जाती है । श्रद्धा के प्रबल होने से ‘ श्रद्धामयोऽयं पुरुषो योयच्छ्रद्धः स एव सः ' इस विज्ञान के अनुसार इस यजमान का यज्ञ सफल हो जाता ' है | प्राणदेवता, और मनुष्यदेवता, दोनों इस पर श्रद्धा करने लगते हैं । अर्थात् ऋत्विजों के मन: - प्राण-वाक् का, और प्राणदेवताओं का दोनों का यजमान के दिव्यात्मा के साथ इस श्रद्धासूत्र से ग्रन्थिबन्धन हो जाता है । इस श्रद्धाभाव की प्राप्ति के लिए भी सत्र से पहिले अपांप्रणायन किया जाता है । इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रख कर तै ० श्रुति कहती है- ' यो वै श्रद्धामनारभ्य यज्ञेन यजते-- नास्येाय श्रद्द-ad | अपः प्रणयति । श्रद्धा वा श्रपः । श्रद्धामेवारभ्य यज्ञेन यजते । उभयेऽस्य देवनुध्या इष्टाय श्रद्दधते ' । तै ० सं ० २६८ ) । इसी अभिप्राय से इस क की उपपत्ति बतलाते हुए ऐतरेयश्रुति में - ' आपो ह्यस्मै श्रद्धा संनमन्ते पुण्याय कर्म्मणे ' यह कहा जाता है || १६,१७ ॥ इति अपां प्रणयनोपपत्तिः । अथ असादननोपपत्तिः-अपांप्राणयन क़्यों करना चाहिए?, इसका सोपपत्तिक निरूपण हो चुका । अत्र क्रमप्राप्त ' अपांसादन ' कर्म की उपपत्ति की ओर हम अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं । श्राहवनीय के समीप प्रणी-तापात्र को रख देने का नाम हीं अपांसादन है । इस प्रणीतापात्र को ग्राहवनीय के समीप रखने से पहिले गार्हपत्य के उत्तर भाग में रक्खा जाता है । यहाँ पर प्रश्न होता है कि, जबकि इन पानियों को ग्राहवनीय के समीप ही रखना आवश्यक है, तो फिर पहिले उसे थोड़ी देर के लिए गार्हपत्य के उत्तर भाग में क्यों रक्खा जाता है?, प्रथम इसी प्रश्न का समाधान करते हैं । यह पानी योषा है, और अग्नि वृषा योत्रा । ओर वृषा, दोनों पारिभाषिक शब्द हैं 1 । स्त्रीप्राण के लिए योषा शब्द नियत है, और पुरुषप्राण के लिए ' वृषा ' शब्द नियत है । ' यू ' मिश्रण मिश्रणयोः - धातु से योषा शब्द बनता है । कन्या अपने पिता का घर छोड़ कर पति के घर से युक्त होती है, अपने आत्मा को दूसरे के साथ मिलाती है । अतएव इसे योषा कहा जाता है । एवं रेताहुति ( रेतवर्षण ) करने के कारण पुरुषप्राण वृषा कहलाता है । जिस में योषा-प्राण की प्रधानता रहती है, प्राणी सृष्टि में वही वृषा ( पुरुष ) कहलाता है, एवं जिस में वृत्राप्राण की प्रधानता रहती है, वह वृषा ( पुरुष ) कहलाता है । इस वृषा योषा के संयोग से ही ' मिथुनभाव से ही ) प्रजोत्पत्ति होती हैं । संतान होना स्त्री पुरुष के संयोग पर निर्भर नहीं है । अपितु योषा वृषा नाम के प्राण के संयोग पर निर्भर है । जबतक दोनों प्राण नहीं मिलते, तत्रतक चाहे स्त्री - पुरुष यावज्जन्म संयोग करते रहें, कभी प्रजोत्पत्ति नहीं होगी । गर्भाशय में स्थित स्त्री के रुधिर में, और पुरुष के शुक्र में एक प्रकार का कीटाणु होता है । इसी कीटको आयुर्वेदशास्त्र में ' भ्रूण ' कहा जाता है । स्त्री के भ्रूण में रहने वाला १६०
पृष्ठ 454
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण प्राणयोषा है पुरुष के भ्रूण , और में रहने वाला प्राण वृषा है । यदि दोनों में भ्रूण जीवित रहते हैं, अर्थात् दोनों के बोघा वृत्रा प्राण जीवित रहते हैं, तो संतानोत्पत्ति होती है । यदि दोनों में से एक का भी भ्रूण मरा हुआ रहता है, तो कदापि संतान नहीं होती । यह भ्रूण क्यों मर जाता है?, इसके लिए हमारे शास्त्रकारोंने नाग, पितृ, ग्रह, नाड़ी गर्भाशय, आदि ८ दाष गिन डाले हैं । एवं साथ ही इन आठों दोषों को दूर -- करने के उपाय भी बतला दिए हैं । पितृदोष को हटाने का एकमात्र उपाय पितृश्राद्ध ही है । अतएव इसे नित्य होते हुए भी काम्यकर्म बतलाया जाता है । तक्षक के द्वारा इसे जाने के कारण अपने स्वर्गीय पिता परीक्षित की मृत्यु का सर्पवंश से बदला लेने के लिए होने वाले परीक्षित के पुत्र जनमेजय के सर्पयज्ञ में मन्त्रत्रल से आहवनीय में चारों ओर से आकर ग्राहुत होने वाले सर्पों की रक्षा करने वाले आस्तीक ऋषि के पिता जरत्कारुने विवाह कर इसी पितृश्राद्ध के द्वारा श्रास्तीक जैसा पुत्ररत्न प्राप्तकर अन्धेरे कूप में प्रोंधे लटके हु अपने पूर्वज यायावर ऋषि का उद्धार किया था । हम बतला रहे थे कि, प्रजोत्पत्ति में स्त्री पुरुष का संयोग प्रधान कारण नहीं है । अपितु तद्गत योषा वृषा प्राण का संयोग ही प्रधान कारण है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, बिना भी स्त्री पुरुष के संयोग के केवल योषा वृषा के संयोग से जीवसृष्टि हो जाती है । इसके लिए दो चार उदाहरण बतला देना अनुचित न होगा । आपने देखा होगा कि, श्राकाश में कपोत से कुछ ही बड़ी आकृति के पक्षी अपनी पंक्ति बाँधकर उड़ा करते हैं । ये पक्षी कभी एकाकी नहीं रहते । अपितु जब निकलते हैं - १००-५० मिलकर बराबर बराबर समानभाव से एक पंक्ति बाँधकर निकलते हैं । इन पक्षियों को ' बलाका ' कहते हैं । इनका कण्ठ त्रिस ( कमलतन्तु ) के समान होता है, यही इनकी पहचान है । जहाँ पानी होता है, यह पक्षिभुण्ड प्रायः वहीं उतरा करता है । इसे पानी से बड़ा प्रेम है | जैसे बाज इतर पक्षियों के ऊपर झपाटे के साथ गिर पड़ता है, एवमेव यह झुण्ड सपाटे के साथ तालाब में घुस पड़ता है । पानी में सोम अधिकमात्रा से रहता है । पानी हीं सोम का प्रभवस्थान है । सोम हीं साक्षात् रेत ( वीर्य्य ) है | अतः हमारी अपेक्षा इस चलाका पक्षी का शुक्र अधिक बलवान् होता है | अतएव इसे मिथुन नाव में परिणत होने की आवश्यकता नहीं होती । इसकी अश्रुबिन्दु को नारी बलाका ( मादा ) पी जाती है, इसीसे गर्भाधान होजाता है । पिच - एक हरित और नील, दोनों रङ्गों से युक्त छोटा सा उड़ना कीड़ा हाता है, यह बड़ा ही विषाक्त होता है । इसकी आकृति ततैय्या से मिलती जुलती है । यह कोड़ा सर्वथा विजातीय एक मकड़ी के बच्चे को पकड़ लाता है, एवं किसी भित्ति पर पहिले से ही बनाए हुए मिट्टी के घोंसले में उसे बन्द कर देता है । यह मिट्टी पीली मिट्टी जैसी होती है । इसमें बन्द करके वह कीड़ा उस घोंसले का मार्ग मिट्टी से ही बन्द करदेता है | एवं आप उस द्वार पर आकर भिन्न भिन्न किया करकता है, एवं उसपर बैठा करता है | जिसप्रकार अड़े पर बैठकर चिड़िया अपने शरीर की गर्मी डालकर उसका परिपाक किया करती है, ठीक यही व्यापार यहाँ होता है । आपको सुनकर आश्चार्य होगा कि, थोड़े समय के अनन्तर उस घोंसले का द्वार उसी कीट के द्वारा खोल दिया जाता है, और वह सर्वथा विजातीय मकड़ी का बच्चा उस कीड़े के आकार में परिणत होकर निकल जाता है । बतलाइए! यहाँ कौनसा मिथुनभाव था? । और आगे बढ़िए - गोमय ( गोबर ) में आप दही और केले का रस डाल दीजिए, थोड़े समय के पीछे उसमें सैंकड़ों बिच्छू उत्पन्न हो जायँगे । अपिच वर्षाकाल में इसी योषावृषा के संगयोग से सड़कों की १६१
पृष्ठ 455
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड प्रत्येक लालटेन के समीप असंख्य जीव उत्पन्न होजाते हैं । ' अमुक महर्षिने अमुक स्त्री की ओर देखा, देखते ही उसमें गर्भस्थिति होगई । ब्रह्माजी के कर्णमल से अमुक उत्पन्न होगया ' आदि ऐसी ऐसी पौराणिक कथाओं को देखकर आजकल का नवीन समाज इस भारत की दिव्य विभूति पर, सर्वस्व पर मनमाने आक्षेप करने लग पड़ता है । विज्ञान का अभिमान रखने वालें इन पाश्चात्यशिक्षादीक्षित महानुभावों का, और अपने आपको वेदधुरीण, एवं तर्काचार्य्यं मानने वाले महाशयों का कहना है कि संतानोत्पत्ति, ---दूसरे शब्दों में जीवोत्पत्ति बिना स्त्री पुरुष ( नरमादीन ) के संयोग के नहीं होसकती । केवल दृष्टिसंयोग से, एवं कर्णमलादि से कथमपि प्रजोत्पत्ति नहीं होसकती । ऐसा होना प्रकृति के विरुद्ध है | ऐसे महानु– भावों, और महाशयों के प्रति हमें यही कहना है कि, प्रकृति के ठेकादारों! क्या तुमने सम्पूर्ण प्राकृतिक विज्ञान समझ लिया है । तुह्मारी प्रकृति के अनुसार बकरे के स्तन नहीं होने चाहिए, स्त्री के बकरे का बच्चा उत्पन्न नहीं होना चाहिए । स्त्री के त्रिच्छू, सर्प आदि की आकृति के बच्चे नहीं होने चाहिए | परन्तु होते है । प्रत्यक्ष करना होतो आगरे के ( Museum ) में चले जाओ । दूध देनेवाला एक स्तनका बकरा देखना होतो जयपुर के म्यूजियम में आने का कष्ट करो | हमें तरस आता है उन भूले भठके महानुभावों, और महाशयों पर, जो दूसरों के बहकाव में आकर शास्त्र का वास्तविक मर्म्म न समझकर उस पर मनमाने आक्षेप करने लगते हैं । उन्हें विदित होना चाहिए कि, प्रजोत्पत्ति का स्त्री - पुरुष के संयोग से कोई सम्बन्ध नहीं है । स्त्री - पुरुष का सम्बन्ध गौण है, योषावृपा का सम्बन्ध प्रधान है । उसमें भी गर्भ धारण करते समय स्त्री का ध्यान जिस ओर रहता है, उसका योषाप्राण ( भ्रूणगत प्राण ) उसी आकार में परिणत हो जाता है । यह योषावृषा - प्राण सूर्य और पृथिवी, दोनों में मध्य में भरा हुआ है । आप उसे पहिचान जाइए । दोनों के मिलाने की क्रिया सीख जाइए, आप स्वयं नई सृष्टि बना सकते हैं | परमेश्वर का सृष्टिक्रम अव्यवस्थित नहीं है । अपितु उसका प्रत्येक कार्य्यं किसी ध्रुवनियम के आधार पर प्रतिष्ठित है । राजा शासन नहीं करता, राजा के बनाए हुए नियम शासन करते हैं । उन नियमों के बनाने की, और उनका लोक में संचार करने की शक्ति प्राप्त कर लीजिए । आप स्वयं राजा बन सकते हैं । ठीक इसीप्रकार ईश्वर शासन नहीं करता । सृष्टि बनाना ईश्वर का काम नहीं है, ईश्वर के नियम सृष्टि बनाते हैं । राजा की नियमसमष्टि जैसे ' कानून ' कहलाती है, उसीप्रकार ईश्वर की नियमसमष्टि ' प्रकृति ' कहलाती है । प्रकृति ही संसार बनाती है । उस प्रकृति को पहिचानना ब्रह्म का पहिचानना कहलाता है । इस ब्रह्म-विद्या को आप जान जाइए । आप भी ईश्वर की भाँति कत्तु मकतु ' मन्यथाकत्तु समर्थ होसकते हैं । इसी अभिप्राय से वेदमहर्षि कहते हैं— I ' ब्रह्मविद्यया ह वै सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ' ( शत ० १४/३/२/२० ) इति । इसी ब्रह्मविद्या के प्रभाव से योषावृषा - प्राण के मिथुन के द्वारा वसिष्ठ के प्रतिद्वन्द्वी राजर्षि विश्वामित्र ने त्रिशंकु का पक्ष समर्थन करने के लिए नई सृष्टि बनाना प्रारम्भ कर दिया था । वास्तव में बात यथार्थ है । जो इन दोनों को पहिचान गया, वह विदितवेदितव्य बन गया । सम्पूर्ण प्रकृतिब्रह्म उसके अधिकार में आगया । योषावृषा कोई अपूर्व वस्तु नहीं है । अपितु प्रकरण के प्रारम्भ से जिस अग्नि, और सोम की गाथा हम सुनते आरहे हैं, उन्हींका नाम योषावृषा है । श्राग्नेय प्राण का नाम वृषा है, एवं सौम्यप्राण का नाम योषा है । अग्नि १६२
पृष्ठ 456
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण और सोम के अतिरिक्त वास्तव में कोई तीसरी वस्तु नहीं है । एक शुष्क ( सूखा ) तत्त्व है, एक आर्द्र ( गीला ) तत्त्व है । सुखे ( अग्नि ) और गीले ( सोम ) के अतिरिक्त तीसरी वस्तु का सर्वथा अभाव है ' । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-“ द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति - आर्द्रा चैव, शुष्कं च । यच्छुकं तदाग्नेयम्, यदाद्र " - तत् सौम्यम् ' ( शत ० १ | ५ | २।२३ ) इति । अग्नि पुरुष है, सोम स्त्री है । परमेष्ठी - मण्डल को अपने महिमामण्डल के गर्भ में रखने वाले स्व-यम्भू प्रजापति ने सृष्टि की इच्छा से अपने आपको इन्हीं दोनों स्त्री पुरुषों के रूप में परिणत कर रक्खा है | ' परमेश्वर ने सृष्टि की इच्छा से अपने आपको स्त्री और पुरुष बना डाला । आधे भाग से वह प्रजापति पुरुष बन गया, एवं आवे भाग से स्त्री बन गया । इन्ही दोनों के मिथुन से उस ने संसार उत्पन्न किया ' वेदार्थ का उपबृंहण करने वाले पुराणशास्त्र के इस आख्यान में जिंस स्त्री पुरुष का वर्णन है, वह यही अग्नि सोम, एवं दूसरे शब्दों में वृषा योषा है । सबसे पहिले सृष्टि के आरम्भक ये दोनों उत्पन्न होते हैं । भृगु ( सोम ) और अंगिरा ( अग्नि ) परमेष्ठी के मनोता हैं । स्वयम्भू से सबसे पहले इन्ही का जन्म होता है । ये ही दोनों विश्वप्रनाको उत्पन्न करने वाले पति - पत्नी हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में मनु रखकर राजर्षि कहते हैं—
द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।
अर्द्धनारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥
- मनुः १ | ३२ इति अग्नि को अग्नि, वायु, आदित्य, ये तीन अवस्थाएँ हैं । सोम की प:, वायु, सोम, ये तीन अवस्थाएँ हैं | अग्नित्रयी अंगिरा है, सोमत्रयी भृगु है । दोनों सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठी में उत्पन्न होते हैं, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । इन दोनों के सम्मिश्रण से सूर्य्यं की उत्पत्ति होती है, इसी सूर्य्य का नाम विराट् है | रोदसी त्रिलोकी में यह सूर्य ही सबसे विशेषरूप से दीप्त हो रहा है, अतएव इसे ' विराट् ' कहा जाता 1 इस सूर्य्य के परमाणु आग्नेय हैं । अग्नि का वर्ण सुनहरी है, अतएव इस सौरमण्डल को हम हिरण्मय कहते हैं | यह विराट् सूर्य्य अपने हिरण्मय महिमामण्डल के केन्द्र में रहता है, अतएव इसे ' हिर-ण्यगर्भ ' कहा जाता है । हमारे त्रैलोक्य में स्वयम्भू से उत्पन्न पति - पत्नी ( भृगु - अंगिरा ) के मिथुन से सबसे पहिले रोदसी त्रिलोकी के प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण - स्वरूप इसी हिरण्यगर्भ विराट् पुरुष ( सूर्य्य ) का जन्म होता है । इसी प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए वेद महर्षि कहते हैं—
हिरण्यगर्भः समवता भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
१६३ --- ऋक्सं ० ] १०।१२१।१
पृष्ठ 457
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड इसी अभिप्राय से - ' स विराजमसृजत् प्रभुः ' यह कहा गया है । रोदसी त्रिलोकी में सूर्य के द्वारा ' ही योषा वृषा प्राण आता है, अतएव सूर्य्य के लिए ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' - ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' इत्यादि कहा जाता है । ' क्रन्दसी त्रिलोकी से आने वाला योषा प्राण ( प्राणविशिष्ट सोम ) रोदसी त्रैलोक्य की उत्तर दिशा में प्रतिष्ठित होता है, एवं वृषा ( अग्नि ) दक्षिण भाग में प्रतिष्ठित होता है । वृषा अपने प्रभव दक्षिणस्थान से उत्तर की ओर जाया करता है, एवं योत्रा अपने प्रभव उत्तर स्थान से दक्षिण की ओर आया करता है । साथ ही इतना और समझ लेना चाहिए कि, यह अग्नि ऋत है, इसके एवं सोम के संयोग से जो एक स्वरूप बनता है, उसे इस ऋताग्नि के सम्बन्ध से ' ऋतु ' कहा जाता है । योषा वृषा के सम्मिश्रण से प्रथम ऋतु का जन्म होता है, ऋतुओं से सम्वत्सर का स्वरूप बनता है, इसी सम्वत्सरप्रजापति से आगे की सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है । शास्त्रकारोंनें योषाप्राणात्मिका स्त्री में वृषाप्राणात्मक पुरुष की अपेक्षा काम आठ गुना अधिक बतलाया है । प्रसंगावत इसकी उपपत्ति बतला देना भी अनुचित न होगा । शरीर - रस, असृक्, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, इन धातुओं की समष्टिमात्र है | अन्न के क्रमिक विशकलन से इनका स्वरूप बनता है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है | स्त्री और पुरुष, दोनों के काम का श्रायतन ( रहने का स्थान ) भिन्न भिन्न है | पुरुष के शुक्र नाम के, अन्न की अपेक्षा से आठवीं संख्या में आने वाले ८ वें धातु में काम रहता है । इधर स्त्री के दसरे अटक ( रुधिर ) धातु में ही काम रहता है । अन्न से रस बना, रस से असृक् बनां, और कामोदय हो गया । उधर पुरुष को सात सीढ़ियाँ पार करनीं पड़तीं हैं । तत्र कहीं काम को अवसर मिलता है । इसीलिए स्त्री का काम अधिक प्रबल रहता है, और पुरुष का स्त्री की अपेक्षा आठवें धातु में कामोदय होने से आठगुना कम रहता है, स्त्री का पुरुष की अपेक्षा ग्राठगुना अधिक होता है । एक चमत्कार और है । स्त्री के रुधिर में काम है, इसीलिए स्त्री पुरुष की इच्छा करती है, एवं के में काम है, अतएव वह स्त्री की इच्छा करता है । हमने बतला दिया है कि, अग्नि का नाम पुरुष शुक्र पुरुष है, एवं सोम का नाम स्त्री है | रुधेिर साक्षात् अग्नि है । इस अन के अधिष्ठाता मंगल है । मंगल आग्नेय ग्रह है । इसी से रुधिरप्राण का निर्माण होता है, इसीलिए रुधर लाल होता है । क्योंकि रुधिर का उत्पादक मंगल स्वयं लाल है । यह मंगलग्रह ' मकर राशि पर उच्च का रहता है, स्त्री के रुधिर में इसी की सत्ता है, एवं इसी रुधिर में कामसत्ता है । अतएव इस स्त्री के काम को ' मकरध्वज ' कहा जाता हैं । मकरध्वज नाम सूचित करता है कि, स्त्री के काम में आग्नेयप्राण ( पुरुत्रप्राण ) समझो | उधर के में काम है । शुक्र सोम है । इम्मका अधिष्ठाता ' शुक्र ' ग्रह है । शुक्रग्रह से ही शुक्रप्राण का पुरुष शुक्र निर्माण होता | ' मीनराशि ' में आया हुआ शुक्र उच्च का कहलाता है, शुक्र में इसी की सत्ता है । त-एव पुरुष के काम को ‘ मीनध्वज ' कहा जाता है । मीनध्वज सौम्य होने से स्त्री का काम है, यह पुरुष में प्रतिष्ठित है । उधर मकरध्वज आग्नेय होने से पुरुष का काम है, यह स्त्री में रहता है । यही कारण है कि, स्त्री सदा पुरुष की इच्छा किया करती है । क्योंकि उसका काम पुरुषमय है । एवं पुरुष सदा स्त्री की इच्छा किया करता है, क्योंकि उसका काम स्त्रीमय है । १ आठ प्रकार की त्रिलोकियों में से एक त्रिलोकी का नाम ' क्रन्दसी ' है । महर्लोक, और जनलोक का इससे सम्बन्ध है । इन त्रिलोकियों का स्वरूप किसी आगे के प्रकरण में बतलाया जायगा । १६४
पृष्ठ 458
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राण इस सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, पानी योषा है, एवं गार्हपत्याग्नि वृषा है । इस योषा वृषा के मिथुन से इस अध्वर्यु को यजमान का नया दिव्यात्मा उत्पन्न करना है । मिथुनभाव घर में ही होता है । इधर पृथिवी - स्थानीय होने से यह गार्हपत्य यजमान का घर इस के समीप योषारूप पानी को रखता हुआ श्रध्वर्यु घर में ही मिथुनभाव से प्रजनन करता है | घर से यहाँ प्रतिष्ठातत्त्व अभिप्र ेत है । मार्ग में चलते हुए मिधुनभाव नहीं होसकता । स्थिर, और शान्त, तथा परोक्षस्थान में हाँ मिथुन होता है । गाईपत्य ऐसा ही स्थान है । पृथिवी स्वरूप होने से इस में स्थिरता है, अतएव शान्ति है । इसी लिए गार्हपत्य के उत्तर भाग में पहिले योषारूप पानी को रक्खा जाता है । इस उपपत्ति का तात्पर्य्यार्थ यही है कि, ग्राहवनीय श्रग्नि स्वर्ग की प्रतिकृति है । इस के समीप प्रणीतापात्र को रखने का नाम हीं अपांप्रणयन है । इस ग्राहवनीयदिव्याग्निस्वरूप वृषा, और समीपस्थ अब्रूरूप योषा के मिथुन से दिव्यात्मा उत्पन्न होने वाला है । इस दिव्यात्मा का यजमान के मानुषात्मा के साथ सम्बन्ध होना परम आवश्यक है । यदि इस दिव्यात्मा का यजमान के मानुषात्मा के साथ ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध न होगा, तो यह मानुषात्मा नियत श्रायु के समाप्त होने पर कभी स्वर्ग नहीं जा सकेगा । ऐसी अवस्था में यज्ञ . करना हीं व्यर्थ होगा । इस आपत्ति को हटाने के लिए पहिले गार्हपत्याग्नि के साथ सम्बन्ध करा दिया जाता है । गाईपत्य मानुषात्मा का घर है, इसका आयतन है । यहाँ सम्बन्ध करने के अनन्तर इसका आहव-नी से सम्बन्ध करने से दिव्यात्मा, और मानुषात्मा का परस्पर ग्रन्थिबन्धन हो जाता है । इस सम्बन्ध के प्रभाव से दिव्यात्मा की पकड़ में बँधा हुआ मानुषात्मा देहत्यागानन्तर अवश्य ही स्वर्ग चला जाता 1 गार्हपत्य के उत्तर भाग में पहिले इस पानी को क्यों रक्खा जाता है?, इस की यही पहली उपपत्ति है । इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रखकर ' योषा वा आपः, वृषाग्निः । गृहा नै गार्हपत्यः । तद्गृहेष्वे-वैतन्मिथुनं प्रजननं क्रियते ' यह कहा गया है । दूसरी उपपत्ति अनुवाद से ही गतार्थ हो जाती है | १८ | १६ || उस पानी को थोड़े समय गार्हपत्य के उत्तरभाग में रखकर अनन्तर आहवनीय के उत्तरभाग में रख दिया जाता है । आहवनीयाग्नि वृषा है, पानी योषा है । अतः योषारूप पानी को वृषारूप अग्नि के उत्तरभाग में हीं रखना उचित है । क्योंकि दोनों का मिथुन करवाना है । प्रकृति में इसीप्रकार से मिथुन होता है, अतएव हमें भी ऐसा ही करना उचित है । उत्तरभाग को वामभाग कहते हैं, एवं दक्षिण दक्षिणभाग कहलाता है | स्त्री सौम्या है, पुरुष आग्नेय है । सोम अग्नि का भोग्य है । सोम अग्नि में आहुत होजाता है । श्रग्नि भोक्ता है, अपनी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित है । उधर सोम अन्न है, अतएव प्रतिष्ठित है । ग्रन्नादाग्नि ही अन्नसोम की प्रतिष्ठा है । इसी पराश्रित, अतएव परतन्त्र सोम से स्त्री का आत्मा बनता है । एवं स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित, अतएव स्वतन्त्र अग्नि से पुरुष का श्रात्मा बनता है । पुरुष के श्रात्मा में सूर्य की प्रधानता है, स्त्री के आत्मा में निशानाथ चन्द्रमा की प्रधानता है । उधर चन्द्रमा सूर्य के आधीन है । सूर्य सदा चन्द्रमा पर अपना प्रभुत्त्व रखता है, अतएव यहाँ भी सूर्य्य स्थानीय पुरुष चन्द्रस्थानीया स्त्री पर सदा ही अपनी दृष्टि रखता है | पुरुष में स्त्री को भोग्य ' समझने की स्वाभाविक वृत्ति है! इसी विज्ञान के आधार पर " न स्त्री स्वातन्त्र्यर्महति " ( स्त्री कभी स्वतन्त्रता की अधिकारिणी नहीं है ) यह कहा जाता है । परम कारुणिक प्रातःस्मरणीय पूज्य महर्षियों पर, हमारे शास्त्रकारों पर श्राजदिन पक्षपात का दोष मत्थे १६५
पृष्ठ 459
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड ढ़ाता है । " शास्त्र बनाने वाले पुरुष थे, साथ ही में वे ब्राह्मण भी थे, इसीलिए उन्होंनें अपने लिए सब प्रकार की सुविधाएँ रक्खी हैं, एवं स्त्रो और शूद्रों के लिए अनेक प्रकार के बन्ध लगा दिए हैं जिससे कि वे उन्नति से वंचित होकर उनके स्वार्थ में बाधा न पहुँचा सकें ” ऐसे उद्गार निकालकर आजकल के सभ्य महानुभाव आवेशाविष्ट बनते जारहे हैं । परन्तु बनते रहें, ऐसे आक्षेपों का वास्तविक तथ्यदृष्टया कोई भी मूल्य नहीं है । हमारे शास्त्रों का आधार प्राकृतिक विज्ञान है । शास्त्रकारोनें अपनी ओर से कल्पित व्यवस्थाएँ नहीं की हैं । अपितु जैसा प्रकृति में होरहा है, --एवं प्रकृति के अनुसार जिसका जैसा स्वरूप है, शास्त्रकी सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ उसी के अनुकूल हैं | आप हमारे ऊपर आक्षेप करते हुए कहते हैं कि, पुरुषोंने सत्र में अपनी प्रधानता रक्खी है । हम कहते हैं कि, जिस वेद को आप ईश्वर · का निःश्वास मानते हैं, वह स्वयं अपने मुख से ' पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ' ( जो कुछ उत्पन्न हो गया है, एवं जो आगे होने वाला है, वह सत्र पुरुष ही पुरुष है ) यह कहकर स्त्रीसत्ता का उन्मूलन कर केवल पुरुष की ही सत्ता बतला रहा है । बात वास्तव में यथार्थ है । भोग्यवस्तु की स्वतन्त्र गणना नहीं होती । भोग्य भोक्ता के आधीन हो भोक्तृमय बन जाता है । संसार में अग्नि पुरुष है, सोम स्त्री है - जैसा कि पूर्व में श्रनेकधाबतलाया जाचुका है । अग्नि ' अत्ता ' है, सोम ' आद्य ' है । जब आद्य ( भोग्य ) अत्ता में ( भोक्ता में ) चला जाता है, तो उस अवस्था में केवल अत्ता की ही सत्ता रह जाती है । इसी अभि-प्राय से श्रुति कहती है— ‘ द्वयं वाऽइदमत्ता चैवाद्य ं च । तद्यदोभयं समागच्छति, अत्चैवाख्यायते नाद्यम् । स वै यः सोऽचाग्निरेत्र सः, ० इत्यादि ' ( शत ० १० २६ । ३ । १ । १ । २ इति । यहाँ जिस अत्ता अग्नि का वर्णन है, उससे वैश्वानर अग्नि ही अभिप्रेत है । पृथिवी के अपान अग्नि, सूर्य्यं के प्राण अग्नि, एवं अन्तरिक्ष के व्यान अग्नि, तीनों के समन्वय से दूसरे शब्दों में पृथिवी, अन्त-रिक्ष, द्यु ु , इन तीनों विश्वों के नरों के ( अधिष्ठाताओं के ) परस्पर के घर्षण से जो एक तापधर्म्मा नवीन अग्नि उत्पन्न होता है, उसीका नाम वैश्वानर है । यह वैश्वानर पृथिवी से लेकर द्युलोक पर्य्यन्त अभिव्याप्त है | अतएव इसके लिए— ‘ आ यो द्यां भात्यापृथिवीम् ' - ' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' यह कहा जाता है 1 । अधिदैवत की भाँति अध्यात्म में भी मूलाधारस्थ अपानप्राण, कण्ठस्थानीय प्राणप्राण, एवं हृदयस्थानीय व्यानप्राण, इन तीनों प्राणों के घर्षण से नवीन वैश्वानर उत्पन्न होता है । उत्पन्न होकर नखाग्र, और लोमों को छोड़ कर यह सर्वाङ्ग शरीर में अभिव्याप्त हो जाता है । शरीर को हम जिस स्थान में छूते हैं, उसी स्थान को गरम पाते हैं, यही इस वैश्वानर की दृष्टि ( प्रत्यक्ष ) है । एवं नाक और कानों को बन्द करने पर बो एक धक् धक् शब्द सुनाई पड़ता है, वही इसकी श्रुति है । खाए हुए अन्न का परिपाक करना इसी वैश्वानर का काम है । इसी अभि— प्राय से गीताचार्य कहते हैं-अह वेश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्न ं चतुर्विधम् ॥ - गीता १५ | १४ | इति । १६६
पृष्ठ 460
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण इसी वैश्वानर को पुरुष कहते हैं । यद्यपि पुरुषशब्द अव्ययात्मा का वाचक है । तथापि ‘ अबध्नन् पुरुषं पशुम् ' ( उक्थत्रिम्ब रूप ) प्रजापति के अर्क ( रश्मि ) रूप प्राणदेवताओंने इस पुरुष का पशु-रूप से ग्रहण किया - यजुः ३१।१५ ) इत्यादि वचनों से सम्पूर्ण पुरुषसूक्त में इसीका प्रतिपादन मानना पड़ता है । क्योंकि ' पुरुष, अश्त्र, गो, अवि ( भेड ) अज, इन पाँचों पशुओं में से वैश्वानराग्नि को ही पुरुष पशु कहते हैं । सम्पूर्ण त्रैलोक्य में इसी वैश्वानरपुरुष का प्रभुत्त्व है । यद्यपि संसार में वैश्वानर अग्नि, और सोम, दो की सत्ता है, इसीलिए ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' यह कहा जाता है । परन्तु सोम अग्नि में आहुत हो अग्नि हीं बन जाता | सोम अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखने पाता । इसीलिए सन्दिग्ध शब्दों में- ' पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ' यह कह दिया जाता है । इसप्रकार पुरुष की स्वतन्त्रता, और स्त्री की परतन्त्रता भलीभाँति सिद्ध हो जाती है । उसी वैश्वानरपुरुष से पुरुष का आत्मा बनता है, एवं सोम से स्त्री का आत्मा बनता है । स्त्री का प्रभव सोम उत्तर भाग में रहता है, उत्तर को ही नाम कहते हैं, अत-एव स्त्री को ' वामा ' कहा जाता है । स्त्री सदा पुरुष के वाम भाग में ही रहती है । यही कारण है कि, सामुद्रिक शास्त्रानुसार जत्र केवल पुरुष के हाथ से उसकी स्त्री के लक्षणों की परीक्षा की जाती है, तो उस समय उसका वाम हाथ ही प्रधान रहता है । क्योंकि पुरुष का वामभाग सौम्य होने से स्त्री भाग है । अग्नि सबल है, सोम निर्बल है । अतएंव पुरुष में आत्मनिर्भरता है, स्त्री में आत्मनिर्भरता नहीं है । इसीलिए सौम्या स्त्री को ‘ अबला ' कहा जाता है । क्योंकि स्त्री पराश्रिता है, इसमें आत्मनिर्भरता नहीं है, अतएव पिता की, एवं श्वशुर की सम्पत्ति में पुत्रादिकी की भाँति इनका विभाग नहीं होता । पति की मृत्यु के अनन्तर यह केवल अन्नवस्त्र की अधिकारिणी समझी जाती हैं । क्यों समझी जाती हैं?, इसकी एक दूसरी वैज्ञानिक उप-पत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है-‘ ता हता निरष्टा नात्मनश्च नैशत, न दायादस्य च नैशत ' । ( आज्यरू आग्नेय वज्र से हतवीर्य्य होने से न इन स्त्रियों में आत्मनिर्भरता ही है, एवं न ये दायाद की ही अधिकारिणीं हैं, शत ० ४ । ४ । २ । १३ इति ) । इस विषय का विशद विवेचन नहीं किया जायगा । अभी केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि - सोम उत्तर भाग में रहता है, एवं यह भोग्य होने से निर्बल है । अग्नि दक्षिण भाग में रहता है, एवं वह प्रबल है । इसी विज्ञान के आधार पर हमारा । आयुर्वेदशास्त्र उत्तरदिशा में सौम्य ओषधियों को श्रेष्ठ बतलाता है, और दक्षिण दिशा में श्राग्नेय श्रोषधियों को श्रेष्ठ बतलाता है । आयुर्वेद के मतानुसार श्राग्नेय ओषधियाँ दक्षिणभागस्थ विन्ध्यपर्वत के समीप की ही हित-कर हैं, एवं सौम्य ओषधियाँ उत्तरभागस्थ हिमालय के समीप की ही हितकर हैं । इसी अभिप्राय से ॰ ' इत्यादि कहा जाता है । इसी विज्ञान ' आग्नेया को लक्ष्य में रख कर वाग्भट कहते हैं— १ इन पाँचों पशुओं का स्वरूप क्या है?, वैश्वानर को पुरुषपशु कैसे कहते हैं १, इत्यादि विषयों का विस्तृत विवेचन ६ ठे काण्ड के ' पञ्चपशुब्राह्मण ' में ( श ० ६ । १।२ ) किया जायगा । १६७